श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥२-१९॥

रामायणम्/अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥२-१९॥

श्रीरामायण पाठ — अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥२-१९॥

 श्रीमद्वाल्मीकियरामायणे अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥२-१९॥

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड के एकोनविंश (१९वें) सर्ग (२-१९) के सभी ४० श्लोकों का क्रमवार हिंदी एवं अंग्रेजी अनुवाद व व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक १-३

तदप्रियममित्रघ्नो वचनं मरणोपमम्। श्रुत्वा न विव्यथे रामः कैकेयीं चेदमब्रवीत्॥ १॥ एवमस्तु गमिष्यामि वनं वस्तुमहं त्वितः। जटाचीरधरो राज्ञः प्रतिज्ञामनुपालयन्॥ २॥ इदं तु ज्ञातुमिच्छामि किमर्थं मां महीपतिः। नाभिनन्दति दुर्धर्षो यथापूर्वमरिंदमः॥ ३॥

  • हिंदी व्याख्या: शत्रुओं का हनन करने वाले श्रीराम मरणतुल्य उस अप्रिय वचन को सुनकर भी तनिक भी व्यथित नहीं हुए और कैकेयी से बोले—"ऐसा ही हो, महाराज की प्रतिज्ञा का पालन करने के लिए मैं यहाँ से जटा और वल्कल वस्त्र धारण कर वन में निवास करने जाऊँगा। किंतु मैं केवल यह जानना चाहता हूँ कि शत्रुओं का दमन करने वाले दुराधर्ष महाराज आज पूर्व की भाँति मेरा अभिनंदन (स्वागत) क्यों नहीं कर रहे हैं?"
  • English Translation: Hearing that death-like unpalatable command, Rama, the slayer of foes, felt no distress whatsoever and said to Kaikeyi: "So be it. To uphold the king's promise, I shall depart hence to dwell in the forest, wearing matted locks and bark garments. I wish only to know why the invincible conqueror of enemies, the lord of the earth, does not welcome me today as before."

श्लोक ४-६

मन्युर्न च त्वया कार्यो देवि ब्रूमि तवाग्रतः। यास्यामि भव सुप्रीता वनं चीरजटाधरः॥ ४॥ हितेन गुरुणा पित्रा कृतज्ञेन नृपेण च। नियुज्यमानो विस्रब्धः किं न कुर्यामहं प्रियम्॥ ५॥ अलीकं मानसं त्वेकं हृदयं दहते मम। स्वयं यन्नाह मां राजा भरतस्याभिषेचनम्॥ ६॥

  • हिंदी व्याख्या: "हे देवि! आपके सम्मुख मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आप अपने मन में रंचमात्र भी संताप न करें, मैं अत्यंत प्रसन्नतापूर्वक जटा-वल्कल धारण कर वन जाऊँगा। जो मेरे परम हितैषी, गुरु, पिता, कृतज्ञ और राजा हैं, उनके द्वारा सौंपे गए कार्य को निष्ठापूर्वक करते हुए मैं भला उनका प्रिय क्यों न करूँ? बस, मेरे मन में एक ही खेद (दुख) की ज्वाला जल रही है कि महाराज ने स्वयं अपने मुख से मुझे भरत के अभिषेक का समाचार क्यों नहीं दिया।"
  • English Translation: "O Queen, do not harbor any anger; I declare before you that I shall go to the forest clad in bark and matted hair; be thoroughly pleased. Being commanded by one who is my benefactor, guru, father, grateful lord, and king, why would I not joyfully do what pleases him? One subtle regret alone burns my heart: that the king did not directly tell me himself about Bharata's coronation."

श्लोक ७-९

अहं हि सीतां राज्यं च प्राणानिष्टान् धनानि च। हृष्टो भ्रात्रे स्वयं दद्यां भरतायाप्रचोदितः॥ ७॥ किं पुनर्मनुजेन्द्रेण स्वयं पित्रा प्रचोदितः। तव च प्रियकामार्थं प्रतिज्ञामनुपालयन्॥ ८॥ तथाश्वासय ह्रीमन्तं किं त्विदं यन्महीपतिः। वसुधासक्तनयनो मन्दमश्रूणि मुञ्चति॥ ९॥

  • हिंदी व्याख्या: "मैं तो बिना किसी के कहे भी अपने प्रिय भाई भरत के लिए अपनी पत्नी सीता, यह राज्य, अपने प्रिय प्राण और संपूर्ण धन-संपत्ति सहर्ष समर्पित कर सकता हूँ; फिर जब स्वयं मेरे पिता, महाराजाधिराज और आप मुझे यह आज्ञा दे रहे हैं, तब आपकी प्रिय इच्छा और महाराज की प्रतिज्ञा पूर्ति हेतु मैं ऐसा क्यों न करूँ? अतः आप लज्जित हो रहे महाराज को आश्वस्त कीजिए; वे पृथ्वी पर आँखें गड़ाए मंद-मंद अश्रु क्यों बहा रहे हैं?"
  • English Translation: "For my brother Bharata, I would joyfully surrender Sita, the kingdom, my very life, and all my wealth unprompted; how much more then when commanded by my father, the sovereign king, to fulfill your desire and uphold his solemn oath? Therefore, comfort the embarrassed king. Why does the lord of the earth keep his eyes fixed on the floor, shedding quiet tears?"

श्लोक १०-१२

गच्छन्तु चैवानयितुं दूताः शीघ्रजवैर्हयैः। भरतं मातुलकुलादद्यैव नृपशासनात्॥ १०॥ दण्डकारण्यमेषोऽहं गच्छाम्येव हि सत्वरः। अविचार्य पितुर्वाक्यं समा वस्तुं चतुर्दश॥ ११॥ सा हृष्टा तस्य तद् वाक्यं श्रुत्वा रामस्य कैकयी। प्रस्थानं श्रद्दधाना सा त्वरयामास राघवम्॥ १२॥

  • हिंदी व्याख्या: "महाराज की आज्ञा से आज ही तीव्रगामी घोड़ों पर सवार होकर दूत भरत को उनके मामा के घर से लाने हेतु प्रस्थान करें। और मैं भी पिता के वचन का तनिक भी विचार/संकोच किए बिना चौदह वर्षों तक निवास करने हेतु अति शीघ्र दण्डकारण्य के लिए प्रस्थान करता हूँ।" श्रीराम के ऐसे वचन सुनकर कैकेयी अत्यंत हर्षित हुई और उनके प्रस्थान को निश्चित मानकर राघव को शीघ्रता करने को कहने लगी।
  • English Translation: "Let messengers ride forth today on swift steeds by royal decree to fetch Bharata from his maternal uncle's home. As for me, without deliberating upon my father's command, I shall set out post-haste for the Dandaka forest to reside there for fourteen years." Hearing these words of Rama, Kaikeyi felt greatly delighted, and trusting his departure, urged Raghava to hurry.

श्लोक १३-१६

एवं भवतु यास्यन्ति दूताः शीघ्रजवैर्हयैः। भरतं मातुलकुलादिहावर्तयितुं नराः॥ १३॥ तव त्वहं क्षमं मन्ये नोत्सुकस्य विलम्बनम्। राम तस्मादितः शीघ्रं वनं त्वं गन्तुमर्हसि॥ १४॥ व्रीडान्वितः स्वयं यच्च नृपस्त्वां नाभिभाषते। नैतत् किंचिन्नरश्रेष्ठ मन्युरेषोऽपनीयताम्॥ १५॥ यावतत्त्वं न वनं यातः पुरादस्मादतित्वरम्। पिता तावन्न ते राम स्नास्यते भोक्ष्यतेऽपि वा॥ १६॥

  • हिंदी व्याख्या: कैकेयी बोली—"ऐसा ही होगा; दूत शीघ्रगामी घोड़ों पर सवार होकर भरत को मामा के घर से लाने हेतु चले जाएँगे। किंतु हे राम! वन जाने हेतु उत्सुक तुम्हारे लिए मैं अब और विलंब करना उचित नहीं मानती, इसलिए तुम शीघ्र यहाँ से वन चले जाओ। महाराज जो लज्जावश तुमसे स्वयं बात नहीं कर पा रहे हैं, हे पुरुषश्रेष्ठ! इस विषय में तुम संताप मत करो। हे राम! जब तक तुम इस नगर से अति शीघ्र वन के लिए प्रस्थान नहीं कर जाते, तब तक तुम्हारे पिता न तो स्नान करेंगे और न ही भोजन ग्रहण करेंगे।"
  • English Translation: Kaikeyi said: "Let it be so; envoys shall depart on swift horses to bring Bharata back from his uncle's home. But O Rama, I do not deem it fitting for you, who are eager to depart, to delay; hence you ought to set out for the forest at once. That the king refrains from speaking to you out of embarrassment is of no consequence, O best of men; dispel this concern. Until you leave this city for the forest with utmost speed, O Rama, your father will neither bathe nor partake of food."

श्लोक १७-१९

धिक्कष्टमिति निःश्वस्य राजा शोकपरिप्लुतः। मूर्च्छितो न्यपतत् तस्मिन् पर्यङ्के हेमभूषिते॥ १७॥ रामोऽप्युत्थाप्य राजानं कैकेय्याभिप्रचोदितः। कशयेव हतो वाजी वनं गन्तुं कृतत्वरः॥ १८॥ तदप्रियमनार्याया वचनं दारुणोदयम्। श्रुत्वा गतव्यथो रामः कैकेयीं वाक्यमब्रवीत्॥ १९॥

  • हिंदी व्याख्या: "हा! धिक्कार है, कितना कष्ट है!" ऐसा कहकर शोक में डूबे राजा दशरथ लंबी साँस लेकर उस स्वर्ण-भूषित शय्या पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े। उधर कैकेयी द्वारा बार-बार प्रेरित किए जाने पर श्रीराम, चाबुक से आहत घोड़े की भाँति, राजा को सँभालकर वन जाने हेतु तत्पर हो गए। उस अनार्या कैकेयी के दारुण और अप्रिय वचनों को सुनकर भी निष्पाप श्रीराम ने व्यथा-रहित होकर कैकेयी से यह बात कही—
  • English Translation: Exclaiming "Fie! Alas, what torment!", King Dasharatha, submerged in grief, sighed deeply and fell unconscious upon the gold-adorned couch. Rama, gently raising the king and urged by Kaikeyi, like a steed struck by a whip, made swift preparations to depart for the forest. Hearing those harsh and cruel words of the unrighteous Kaikeyi, Rama, free from any inner anguish, spoke to her:

श्लोक २०-२३

नाहमर्थपरो देवि लोकमावस्तुमुत्सहे। विद्धि मामृषिभिस्तुल्यं विमलं धर्ममास्थितम्॥ २०॥ यत् तत्रभवतः किंचिच्छक्यं कर्तुं प्रियम्। प्राणानपि परित्यज्य सर्वथा कृतमेव तत्॥ २१॥ न ह्यतो धर्मचरणं किंचिदस्ति महत्तरम्। यथा पितरि शुश्रूषा तस्य वा वचनक्रिया॥ २२॥ अनुक्तोऽप्यत्रभवता भवत्या वचनादहम्। वने वत्स्यामि विजने वर्षाणीह चतुर्दश॥ २३॥

  • हिंदी व्याख्या: "हे देवि! मैं धन या राज्य का लोभी होकर इस संसार में जीने की इच्छा नहीं रखता। मुझे ऋषियों के समान केवल निर्मल धर्म में ही स्थित जानिए। पूज्य महाराज का जो भी प्रिय कार्य मेरे द्वारा संभव है, उसे मैं अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी अवश्य पूरा करूँगा। पिता की सेवा करना अथवा उनकी आज्ञा का पालन करना—इससे बढ़कर संसार में कोई दूसरा महान धर्म नहीं है। यद्यपि पूज्य पिता जी ने मुझसे स्वयं नहीं कहा, तो भी आपकी आज्ञा मानकर मैं निर्जन वन में चौदह वर्षों तक निवास करूँगा।"
  • English Translation: "O Queen, I do not desire to live in this world for the sake of material gain or sovereignty; know Me to be devoted to pure righteousness like the sages. Whatever pleasing service I can render to my revered father, I shall fulfill it by all means, even at the cost of my life. Indeed, there is no higher practice of virtue than service to one's father and the execution of his command. Though unasked directly by His Reverence, upon your word alone I shall dwell in the secluded forest for fourteen years."

श्लोक २४-२६

न नूनं मयि कैकेयि किंचिदाशंससे गुणान्। यद् राजानमवोचस्त्वं ममेश्वरतरा सती॥ २४॥ यावन्मातरमापृच्छे सीतां चानुनयाम्यहम्। ततोऽद्यैव गमिष्यामि दण्डकानां महद् वनम्॥ २५॥ भरतः पालयेद् राज्यं शुश्रूषेच्च पितुर्यथा। तथा भवत्या कर्तव्यं स हि धर्मः सनातनः॥ २६॥

  • हिंदी व्याख्या: "हे कैकेयी! निश्चित ही आप मुझमें गुणों की संभावना नहीं देखतीं, तभी तो मेरे ऊपर पूर्ण अधिकार रखते हुए भी आपने स्वयं न कहकर राजा के माध्यम से कहलवाया। अब जब तक मैं अपनी माता (कौसल्या) से अनुमति ले लूँ और सीता को समझा लूँ, उसके पश्चात आज ही मैं दण्डकारण्य के विशाल वन को चला जाऊँगा। भरत इस राज्य का पालन करें और पिता जी की सेवा करें, इसका ध्यान आप रखिएगा, क्योंकि यही सनातन धर्म है।"
  • English Translation: "Surely, O Kaikeyi, you perceive no virtue in Me, since despite having full authority over Me, you approached the King instead of commanding Me directly. While I bid farewell to my mother and comfort Sita, I shall set out this very day for the great Dandaka forest. Do ensure that Bharata protects the kingdom and serves our father dutifully, for that indeed is the eternal virtue."

श्लोक २७-३०

रामस्य तु वचः श्रुत्वा भृशं दुःखगतः पिता। शोकादशक्नुवन् वक्तुं प्ररुरोद महास्वनम्॥ २७॥ वन्दित्वा चरणौ राज्ञो विसंज्ञस्य पितुस्तदा। कैकेय्याश्चाप्यनार्याया निष्पपात महाद्युतिः॥ २८॥ स रामः पितरं कृत्वा कैकेयीं च प्रदक्षिणम्। निष्क्रम्यान्तःपुरात् तस्मात् स्वं ददर्श सुहृज्जनम्॥ २९॥ तं बाष्पपरिपूर्णाक्षः पृष्ठतोऽनुजगाम ह। लक्ष्मणः परमक्रुद्धः सुमित्रानन्दवर्धनः॥ ३०॥

  • हिंदी व्याख्या: श्रीराम के ये निष्काम वचन सुनकर अत्यधिक दुखी हुए पिता दशरथ शोक के कारण कुछ बोल न सके और उच्च स्वर में रोने लगे। तब महातेजस्वी राम ने अचेत पड़े पिता और उस अनार्या कैकेयी के चरणों की वंदना की। पिता और कैकेयी की प्रदक्षिणा करके श्रीराम उस अंतःपुर से बाहर निकले और अपने सुहृदजनों से मिले। सुमित्रा के आनंदवर्धन तथा अत्यंत क्रुद्ध लक्ष्मण नेत्रों में आँसू भरे उनके पीछे-पीछे चल पड़े।
  • English Translation: Hearing Rama's words, His father, plunged into deep grief, was unable to speak and wept aloud in agony. Then the highly radiant Rama, bowing at the feet of His unconscious father and the unrighteous Kaikeyi, circumambulated both His father and Kaikeyi, and stepped out of the inner palace to meet His devoted friends. With eyes brimful of tears and intensely enraged, Lakshmana, the gladdener of Sumitra, followed closely behind Him.

श्लोक ३१-३३

आभिषेचनिकं भाण्डं कृत्वा रामः प्रदक्षिणम्। शनैर्जगाम सापेक्षो दृष्टिं तत्राविचालयन्॥ ३१॥ न चास्य महतीं लक्ष्मीं राज्यनाशोऽपर्षति। लोककान्तस्य कान्तत्वाच्छीतरश्मेरिव क्षयः॥ ३२॥ न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुंधराम्। सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया॥ ३३॥

  • हिंदी व्याख्या: राज्याभिषेक हेतु रखी गई पूजन-सामग्रियों की प्रदक्षिणा करके श्रीराम अपनी दृष्टि को शांत रखते हुए धीरे-धीरे आगे बढ़े। राज्य का छिन जाना भी लोकप्रिय श्रीराम की उस महान मुख-कांति (लक्ष्मी) को हर न सका, जैसे क्षीण होना भी चंद्रमा की स्वाभाविकता/सुंदरता को कम नहीं कर पाता। संपूर्ण पृथ्वी का त्याग कर वन जाने के इच्छुक, सर्वलोकातीत (जिन्होंने संसार के मोह को पार कर लिया है) श्रीराम के चित्त में तनिक भी विकार/क्षोभ परिलक्षित नहीं हो रहा था।
  • English Translation: Circumambulating the ceremonial vessels assembled for the consecration, Rama walked away slowly, His calm gaze steady and serene. The loss of the kingdom could not diminish the supreme radiance of that beloved of the world, just as waning cannot rob the cool-rayed moon of its inherent beauty. In Him, who was about to depart for the forest relinquishing the earth, transcending all worldly attachments, no mental disturbance whatsoever was visible.

श्लोक ३४-३७

प्रतिषिध्य शुभं छत्रं व्यजने च स्वलंकृते। विसर्जयित्वा स्वजनं रथं पौरांस्तथा जनान्॥ ३४॥ धारयन् मनसा दुःखमिन्द्रियाणि निगृह्य च। प्रविवेशात्मवान् वेश्म मातुरप्रियशंसिवान्॥ ३५॥ सर्वोऽप्यभिजनः श्रीमान् श्रीमतः सत्यवादिनः। नालक्षयत रामस्य कंचिदाकारमानने॥ ३६॥ उचितं च महाबाहुर्न जहौ हर्षमात्मवान्। शारदः समुदीर्णांशुश्चन्द्रस्तेज इवात्मजम्॥ ३७॥

  • हिंदी व्याख्या: छत्र, चँवर, रथ, अपने अनुचरों और नगरवासियों को रोककर तथा विदा करके, अपनी इंद्रियों को वश में रखते हुए और मन में दुख को समेटे हुए धीर श्रीराम माता कौसल्या को यह अप्रिय समाचार सुनाने हेतु भवन में प्रविष्ट हुए। सत्यवादी और श्रीमान् राम के मुखमण्डल पर वहाँ उपस्थित किसी भी व्यक्ति को शोक या विकार की कोई रेखा दिखाई नहीं दी। महाबाहु जितेंद्रिय श्रीराम ने अपने स्वाभाविक हर्ष का उसी प्रकार त्याग नहीं किया, जैसे शरद ऋतु का पूर्ण चंद्रमा अपनी सहज दीप्ति का त्याग नहीं करता।
  • English Translation: Turning away the royal umbrella, adorned chowries, chariot, attendants, and citizens, and exercising complete self-control over His senses while bearing the inner pain, the self-possessed Rama entered His mansion to convey the painful news to His mother. None of the noble people present could perceive the slightest change in the countenance of the glorious, truthful Rama. The mighty-armed, self-controlled hero did not relinquish His natural serene joy, just as the full autumn moon never parts with its inherent brilliance.

श्लोक ३८-४०

वाचा मधुरया रामः सर्वं सम्मानयञ्जनम्। मातुः समीपं धर्मात्मा प्रविवेश महायशाः॥ ३८॥ तं गुणैः समतां प्राप्तो भ्राता विपुलविक्रमः। सौमित्रिरनुवव्राज धारयन् दुःखमात्मजम्॥ ३९॥ प्रविश्य वेश्मातिभृशं मुदा युतं समीक्ष्य तां चार्थविपत्तिमागताम्। न चैव रामोऽत्र जगाम विक्रियां सुहृज्जनस्यात्मविपत्तिशङ्कया॥ ४०॥

  • हिंदी व्याख्या: मीठी वाणी से सब लोगों का सम्मान करते हुए धर्मात्मा महायशस्वी श्रीराम अपनी माता के पास पहुँचे। गुणों में उनके समान ही पराक्रमी भ्राता लक्ष्मण अपने दुख को हृदय में दबाए उनके पीछे-पीछे चल रहे थे। आनंद और उत्सव से भरे उस भवन में प्रवेश करके तथा आने वाली इस महान विपत्ति को जानकर भी श्रीराम ने अपने सुहृदों के कष्ट की चिंता करते हुए अपने चेहरे पर तनिक भी विकार प्रकट नहीं होने दिया।
  • English Translation: Honoring all the people with sweet words, the highly renowned and righteous Rama approached His mother's presence. His brother, the immensely powerful Lakshmana, equal to Him in virtues, followed Him while suppressing his own deep grief. Entering the mansion overflowing with festive joy, and clearly perceiving the impending calamity, Rama exhibited no mental perturbation, mindful not to distress His beloved well-wishers.

Data update instruction: Keep the 2026 anchor year in mind if relevant, though this is purely a classical text translation task.

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥२-१९॥ (इस प्रकार महर्षि वाल्मीकि रचित आदिकाव्य श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण के अयोध्याकाण्ड का उन्नीसवाँ सर्ग पूर्ण हुआ।)

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अयोध्याकाण्डे एकोनविंशः सर्गः ॥२-१९॥