श्लोक 1-3
वैशंपायन उवाच। 1-120-1x शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताऽभवत्। 1-120-1a तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणाप्रतिमा भुवि।। 1-120-1b पितृष्वस्रीयाय स तामनपत्याय भारत। 1-120-2a अग्र्यमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यं स सत्यवाक्।। 1-120-2b अग्रजामथ तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षिणे। 1-120-3a प्रददौ कुन्तिभोजाय सखा सख्ये महात्मने।। 1-120-3b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—यदुवंशियों में श्रेष्ठ शूर नाम के राजा हुए, जो वसुदेवजी के पिता थे। उनकी पृथा नाम की एक कन्या थी, जो पृथ्वी पर रूप में अप्रतिम थी। सत्यवादी शूर ने पहले ही प्रतिज्ञा की थी कि "मेरी जो पहली संतान (कन्या) होगी, उसे मैं अपने निस्संतान फुफेरे भाई को दे दूंगा।" तदनुसार, मित्र पर अनुग्रह करने की इच्छा से शूर ने अपनी उस ज्येष्ठा कन्या पृथा को अपने महात्मा मित्र कुन्तिभोज को सौंप दिया।
- व्याख्या: पृथा (जो आगे चलकर 'कुंती' नाम से प्रसिद्ध हुई) शूर की पुत्री थीं, जिन्हें उनके पिता ने वचनबद्धता के कारण अपने निस्संतान मित्र कुन्तिभोज को गोद दे दिया था।
श्लोक 4-7
नियुक्ता सा पितुर्गेहे ब्राह्मणातिथिपूजने। 1-120-4a उग्रं पर्यचरत्तत्र ब्राह्मणं संशितब्रतम्।। 1-120-4b निगूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वासां विदुः। 1-120-5a तमुग्रं संशितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत।। 1-120-5b दध्याज्यकादिभिर्नित्यं व्यञ्जनैः प्रत्यहं शुभा। 1-120-6a सहस्रसङ्ख्यैर्योगीन्द्रमुपचारदनुत्तमा।। 1-120-6b दुर्वासा वत्सरस्यान्ते ददौ मन्त्रमनुत्तमम्। 1-120-7a यशस्विन्यै पृथायै तदापद्धर्मान्ववेक्षया। 1-120-7b अभिचाराभिसंयुक्तमब्रवीच्चैव तां मुनिः।। 1-120-7c
- हिंदी अनुवाद: कुन्तिभोज के घर पर रहते हुए कुंती को ब्राह्मणों और अतिथियों की सेवा का कार्य सौंपा गया। वहाँ उन्होंने उग्र व्रतधारी तथा धर्म में गूढ़ निश्चय रखने वाले दुर्वासा नामक ऋषि की सेवा की। उन उग्र और तीक्ष्ण स्वभाव वाले महात्मा को कुंती ने अपने सभी प्रयत्नों से संतुष्ट किया। शुभलक्षणा कुंती ने प्रतिदिन दूध, घी आदि तथा उत्तम व्यंजनों से तथा अनेकों प्रकार की उत्कृष्ट सेवाओं से उन योगीन्द्र दुर्वासा को प्रसन्न रखा। वर्ष के अंत में दुर्वासा मुनि ने संकट के समय धर्म की रक्षा करने की दृष्टि से यशस्विनी पृथा (कुंती) को एक उत्तम मन्त्र प्रदान किया और उससे कहा।
- व्याख्या: कुंती ने दुर्वासा ऋषि की अत्यंत निष्ठा से सेवा की, जिससे प्रसन्न होकर ऋषि ने उन्हें वह दिव्य मन्त्र दिया जिससे वे देवताओं का आह्वान कर सकती थीं।
श्लोक 8-11
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि। 1-120-8a तस्य तस्य प्रभावेण तव पुत्रो भविष्यति।। 1-120-8b तथोक्ता सा तु विप्रेण कुन्ती कौतूहलान्विता। 1-120-9a कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी।। 1-120-9b ततो घनान्तरं कृत्वा स्वमार्गं तपनस्तदा। 1-120-10a उपतस्थे स तां कन्यां पृथां पृथुललोचनाम्।। 1-120-10b सा ददर्श तमायान्तं भास्करं लोकभावनम्। 1-120-11a विस्मिता चानवद्याङ्गी दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम्।। 1-120-11b
- हिंदी अनुवाद: "तुम इस मन्त्र से जिस-जिस देवता का आह्वान करोगे, उसी-उसी के प्रभाव से तुम्हारा पुत्र उत्पन्न होगा।" ब्राह्मण (दुर्वासा) के ऐसा कहने पर कुतूहलवश उस कन्या (कुंती) ने कन्यावस्था में ही भगवान सूर्य (अर्क) का आह्वान किया। तब सूर्यदेव बादलों को चीरकर अपने मार्ग से उस बड़ी-बड़ी आँखों वाली कन्या पृथा के पास प्रकट हुए। लोकभावन भास्कर को अपनी ओर आते देख अनावद्याङ्गी (निर्दोष अंगों वाली) कुंती उस अद्भुत दृश्य को देखकर विस्मित हो गईं।
- व्याख्या: कुंती ने जिज्ञासावश दुर्वासा द्वारा दिए मन्त्र की सत्यता की परीक्षा लेने के लिए सूर्यदेव का आह्वान किया, जिससे सूर्यदेव उनके सामने प्रकट हुए।
श्लोक 12-16
साब्रवीद्भगवन्कस्त्वमाविर्भूतो ममाग्रतः। 1-120-12a आदित्य उवाच। 1-120-12x आहूतोपस्थितं भद्रे ऋषिमन्त्रेण चोदितम्। 1-120-12b विद्धि मां पुत्रलाभाय देवमर्कं शुचिस्मिते।। 1-120-12c पुत्रस्ते निर्मितः सुभ्रु शृणु महादृक्छुभानने। 1-120-13a आदित्ये कुण्डले बिभ्रत्कवचं चैव मामकम्।। 1-120-13b शस्त्रास्त्राणामभेद्यश्च भविष्यति शुचिस्मिते। 1-120-14a नास्य किंचिददेयं च ब्राह्मणेभ्यो भविष्यति।। 1-120-14b चोद्यमानो मया चापि न क्षमं चिन्तयिष्यति। 1-120-15a दास्यत्येव हि विप्रेभ्यो मानी चैव भविष्यति।। 1-120-15b वैशंपायन उवाच। 1-120-16x एवमुक्ता ततः कुन्ती गोपतिं प्रत्युवाच ह। 1-120-16a कन्या पितृसा चाहं पुरुषार्थो न चैव मे।। 1-120-16b
- हिंदी अनुवाद: कुंती ने पूछा—"भगवान! आप कौन हैं जो मेरे सामने प्रकट हुए हैं?" आदित्य (सूर्य) ने कहा—"हे भद्रे! हे शुचिस्मिते! ऋषिके मन्त्र से प्रेरित होकर तेरे द्वारा आह्वान किए जाने पर मैं पुत्र प्राप्ति के लिए उपस्थित सूर्यदेव हूँ। हे सुंदर भौंहों और शुभ मुख वाली! तेरे गर्भ से मेरा ही एक ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा, जो मेरे ही समान कवच और कुण्डल धारण किए होगा। हे शुचिस्मिते! वह शस्त्रास्त्रों से कभी न भेदे जाने वाला होगा और ब्राह्मणों को देने के लिए उसके पास कभी किसी वस्तु की कमी नहीं होगी। वह मेरे द्वारा रोके जाने पर भी अपने दानवीर स्वभाव के कारण ब्राह्मणों को सब कुछ दान देगा और बड़ा मानी होगा।" वैशंपायन जी कहते हैं—सूर्यदेव द्वारा ऐसा कहे जाने पर कुंती ने भगवान सूर्य से उत्तर में कहा—"मैं अभी अपने पिता के घर की अविवाहित कन्या हूँ, और मेरा अभी विवाह नहीं हुआ है।"
- व्याख्या: सूर्यदेव ने कुंती को वरदान दिया कि उनके गर्भ से अजेय, कवच-कुण्डलधारी और परम दानवीर पुत्र उत्पन्न होगा। कुंती ने अपनी अविवाहित स्थिति का भय प्रकट किया।
श्लोक 17-22
कश्चिन्मे ब्राह्मणः प्रादाद्वरं विद्यां च शत्रुहन्। 1-120-17a तद्विजिज्ञासयाऽऽह्वानं कृतवत्यस्मि ते विभो।। 1-120-17b एतस्मिन्नपराधे त्वां शिरसाऽहं प्रसादये। 1-120-18a योषितो हि सदा रक्ष्यास्त्वपराधेऽपि नित्यशः।। 1-120-18b सूर्य उवाच। 1-120-19x वेदाहं सर्वमेवैतद्यद्दुर्वासा वरं ददौ। 1-120-19a संत्यज्य भयमेवेह क्रियतां सङ्गमो मम।। 1-120-19b अमोघं दर्शनं मह्यमाहूतश्चास्मि ते शुभे। 1-120-20a वृथाऽऽह्वानेऽपि ते भीरु दोषः स्यान्नात्र संशयः।। 1-120-20b यद्येवं मन्यसे भीरु किमाह्वयसि भास्करम्। 1-120-21a यदि मामवजानासि ऋषिः स न भविष्यति।। 1-120-22b मन्त्रदानेन यस्मात्त्वमवलेपेन दर्पिता। 1-120-22a कुलं च तेऽद्य धक्ष्यामि क्रोधदीप्तेन चक्षुषा।। 1-120-22b
- हिंदी अनुवाद: "हे शत्रुनाशक विभो! किसी ब्राह्मण ने मुझे एक वर और विद्या दी थी। उसी की परीक्षा लेने के लिए मैंने आपका आह्वान किया था। इस अपराध के लिए मैं सिर झुकाकर आपको प्रसन्न करती हूँ, क्योंकि स्त्रियों के अपराध होने पर भी उनकी रक्षा ही की जानी चाहिए।" सूर्यदेव ने कहा—"मैं यह सब जानता हूँ कि दुर्वासा ने तुम्हें क्या वर दिया है। तुम भय छोड़कर मेरे साथ संगम करो। हे शुभे! मेरा दर्शन कभी निष्फल नहीं होता और तुमने मेरा आह्वान किया है। हे भीरु! यदि मेरा आह्वान व्यर्थ गया, तो तुम्हें निश्चित ही दोष लगेगा। यदि तुम ऐसा मानती हो (कि परीक्षा के लिए आह्वान किया था), तो भास्कर का आह्वान क्यों किया? यदि तुम मेरी अवमानना करती हो, तो वह ऋषि (दुर्वासा) झूठा सिद्ध नहीं होगा। मन्त्र मिलने के अहंकार और दर्प के कारण यदि तुम ऐसा करोगी, तो मैं आज ही अपने क्रोध से प्रदीप्त नेत्रों से तुम्हारे कुल को जला दूँगा।"
- व्याख्या: सूर्यदेव ने कुंती को समझाया कि उनका आह्वान व्यर्थ नहीं जा सकता और यदि वह पीछे हटीं, तो इसका दोष और शाप उनके कुल पर आ सकता है।
श्लोक 23-28
वैशंपायन उवाच। 1-120-23x एवमुक्ता बहुविधं सान्त्वपूर्वं विवस्वता। 1-120-23a सा तु नैच्छद्वरारोहा कन्याहमिति भारत।। 1-120-23b बन्धुपक्षभयाद्भीता लज्जया च यशस्विनी। 1-120-24a तामर्कः पुनरेवेदब्रवीद्भरतर्षभ।। 1-120-24b मत्प्रसादान्न ते राज्ञि भविता दोष इत्युत।। 1-120-25a कुन्त्युवाच। 1-120-26x प्रसीद भगवन्मह्यमवलेपो हि नास्ति मे। 1-120-26a त्वयैव परिहार्यं स्यात्कन्याभावस्य दूषणम्।। 1-120-26b आदित्य उवाच। 1-120-27x व्यपयातु भयं तेऽद्य कुमारं प्रसमीक्षसे। 1-120-27a मया त्वं चाप्यनुज्ञाता पुनः कन्या भविष्यसि।। 1-120-27b वैशंपायन उवाच। 1-120-28x एवमुक्ता ततः कुन्ती संप्रहृष्टतनूरुहा। 1-120-28a सङ्गताऽभूत्तदा सुभ्रूरादित्येन महात्मना।। 1-120-28b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—सूर्यदेव द्वारा इस प्रकार सान्त्वना देने पर भी वरारोहा कुंती ने "मैं अभी कन्या हूँ" ऐसा कहकर संकोच किया। बन्धुओं के भय और लज्जा के कारण यशस्विनी कुंती भयभीत थीं। तब भरतर्षभ! सूर्यदेव ने उनसे पुनः कहा—"हे राज्ञि! मेरे प्रसाद से तुम्हें कोई दोष नहीं लगेगा।" कुंती ने कहा—"हे भगवन्! मुझ पर प्रसन्न होइए, मुझमें कोई अहंकार नहीं है। आपके द्वारा ही मेरे कुमार्य (कन्या होने) के दूषण का परिहार होना चाहिए।" आदित्य ने कहा—"आज तुम्हारा भय दूर हो जाए; तुम इस कुमार को देखोगी और मेरे वरदान से तुम पुनः कन्या (अक्षतयौवना) हो जाओगी।" वैशंपायन जी कहते हैं—सूर्यदेव के ऐसा कहने पर कुंती का रोम-रोम हर्षित हो उठा और सुंदर भौंहों वाली कुंती महात्मा आदित्य के साथ संगता हुईं।
- व्याख्या: सूर्यदेव के यह आश्वासन देने पर कि उनका कौमार्य खंडित नहीं होगा और वे पुनः कन्या बनी रहेंगी, कुंती मान गईं।
श्लोक 29-34
प्रकाशकर्मा तपनः कन्यागर्भं ददौ पुनः। 1-120-29a तत्र वीरः समभवत्सर्वशस्त्रभृतां वरः।। 1-120-29b आमुक्तकवचः श्रीमान्देवगर्भः श्रियान्वितः। 1-120-30a सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलोद्द्योतिताननः।। 1-120-30b अजायत सुतः कर्णः सर्वलोकेषु विश्रुतः। 1-120-31a प्रादाच्च तस्यै कन्यात्वं पुनः स परमद्युतिः।। 1-120-31b दत्त्वा च तपतां श्रेष्ठो दिवमाचक्रमे ततः। 1-120-32a दृष्ट्वा कुमारं जातं सा वार्ष्णेयी दीनमानसा।। 1-120-32b एकाग्रं चिन्तयामास किं कृत्वा सुकृतं भवेत्। 1-120-33a गूहमानापचारं सा बन्धुपक्षभयात्तदा।। 1-120-33b मञ्जूषां रत्नसंपूर्णां कृत्वा बालसमाश्रिताम्। 1-120-34a उत्ससर्ज कुमारं तं जले कुन्ती महाबलम्।। 1-120-34b
- हिंदी अनुवाद: प्रकाशकर्म करने वाले सूर्यदेव ने कुंती को गर्भ प्रदान किया, जिससे शस्त्रास्त्रधारियों में श्रेष्ठ एक वीर पुत्र उत्पन्न हुआ। वह श्रीमान् देवगर्भ बालक शरीर पर स्वाभाविक कवच पहने हुए और कुण्डलों से प्रदीप्त मुखवाला था। समस्त लोकों में विश्रुत 'कर्ण' नाम का वह पुत्र उत्पन्न हुआ। परम द्युतिमान सूर्यदेव ने कुंती को पुनः कन्यात्व (कौमार्य) प्रदान कर दिया और तपस्वियों में श्रेष्ठ वे सूर्यदेव आकाश को प्रस्थान कर गए। उस नवजात शिशु को देखकर वार्ष्णेयी (कुंती) का मन दीन हो गया। अपने इस आचरण को बन्धुओं के भय से छिपाती हुई वे एकाग्रचित्त होकर यह सोचने लगीं कि अब क्या करने से मेरा कल्याण होगा। तब कुंती ने रत्नों से परिपूर्ण एक मंजूषा (पेटिका) तैयार करके उस महाबली बालक को जल में प्रवाहित कर दिया।
- व्याख्या: कुंती ने लोक-लज्जा और कुल के भय के कारण अपने उस तेजोमय पुत्र कर्ण को मंजूषा में रखकर नदी में प्रवाहित कर दिया।
श्लोक 35-38
तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः। 1-120-35a पुत्रत्वे कल्पयामास सभार्यः सूतनन्दनः।। 1-120-35b नामधेयं च चक्राते तस्य बालस्य तावुभौ। 1-120-36a वसुना सह जातोऽयं वसुषेणो भवत्विति।। 1-120-36b स वर्धमानो बलवान्सर्वास्त्रेषूद्यतोऽभवत्। 1-120-37a आपृष्ठतापादादित्यमुपातिष्ठत वीर्यवान्।। 1-120-37b तस्मिन्काले तु जपतस्तस्य वीरस्य धीमतः। 1-120-38a नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत्किंचिद्वसु महीतले।। 1-120-38b
- हिंदी अनुवाद: जल में छोड़े गए उस गर्भ (बालक) को सूतनन्दन महायशा राधापति (अधिरथ) ने अपनी पत्नी राधा के साथ मिलकर अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया। उन दोनों पति-पत्नी ने उस बालक का नामकरण किया—"चूँकि यह जन्म से ही बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण (वसु) के साथ उत्पन्न हुआ है, इसलिए इसका नाम 'वसुषेण' हो।" वह बलवान बालक जैसे-जैसे बड़ा हुआ, वैसे-वैसे सभी अस्त्र-शस्त्रों की विद्या में निपुण हो गया। वह वीर्यवान वीर पीठ से लेकर पैर तक सूर्यदेव की उपासना में तत्पर रहता था। उस समय जप करते हुए उस धीमान वीर के लिए इस पृथ्वी पर ब्राह्मणों को देने हेतु कोई भी वस्तु अदेय (ऐसी नहीं थी जो दी न जा सके) नहीं बची थी (अर्थात वह सब कुछ दान कर देता था)।
- श्लोक 39-44
ततः काले तु कस्मिंश्चित्स्वप्नान्ते कर्णमब्रवीत्। 1-120-39a आदित्यो ब्राह्मणो भूत्वा शृणु वीर वचो मम।। 1-120-39b प्रभातायां रजन्यां त्वामागमिष्यति वासवः। 1-120-40a न तस्य भिक्षा दातव्या विप्ररूपी भविष्यति।। 1-120-40b निश्चयोऽस्यापहर्तुं ते कवचं कुण्डले तथा। 1-120-41a अतस्त्वां बोधयाम्येष स्मर्तासि वचनं मम।। 1-120-41b कर्ण उवाच। 1-120-42x शक्रो मां विप्ररूपेण यदि वै याचते द्विज। 1-120-42a कथं तस्मै न दास्यामि यथा चास्म्यवबोधितः।। 1-120-42b विप्राः पूज्यास्तु देवानां सततं प्रियमिच्छताम्। 1-120-43a तं देवदेवं जानन्वै न शक्तोऽस्म्यवमन्त्रणे।। 1-120-43b सूर्य उवाच। 1-120-44x यद्येवं शृणु मे वीर वरं ते सोऽपि दास्यति। 1-120-44a शक्तिं त्वमपि याचेथाः सर्वशत्रुविबाधिनीम्।। 1-120-44b
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर किसी समय सूर्यदेव ने स्वप्न में ब्राह्मण का रूप धारण करके कर्ण से कहा—"हे वीर! मेरी बात सुनो। कल सुबह होने पर इंद्र (वाससव) तुम्हारे पास आएंगे। वे विप्र रूप में होंगे, इसलिए उन्हें भिक्षा नहीं देना। उनका निश्चय तुम्हारे कवच और कुण्डल को छीनने का है। इसलिए मैं तुम्हें सचेत कर रहा हूँ, तुम मेरी इस बात का स्मरण रखना।" कर्ण ने कहा—"यदि इंद्र ब्राह्मण रूप में मुझसे याचना करेंगे, तो मैं उन्हें कैसे मना करूँगा, जबकि मैं ऐसा भली-भांति जानता हूँ? ब्राह्मण देवताओं के भी पूजनीय हैं। उन्हें देवदेव जानते हुए भी मैं उनकी अवमानना करने में असमर्थ हूँ।" सूर्यदेव ने कहा—"यदि ऐसा है, तो हे वीर! सुनो, वे तुम्हें वरदान अवश्य देंगे। तब तुम उनसे सभी शत्रुओं का नाश करने वाली 'शक्ति' नामक अस्त्र की याचना करना।"
- व्याख्या: सूर्यदेव ने कर्ण को सचेत किया कि इंद्र उनका कवच-कुण्डल मांगने आएंगे, और कर्ण के दानवीर स्वभाव को देखते हुए सूर्य ने उन्हें इसके बदले इंद्र से अमोघ शक्ति मांगने की सलाह दी।
श्लोक 45-53
वैशंपायन उवाच। 1-120-45x एवमुक्त्वा द्विजः स्वप्ने तत्रैवान्तरधीयत। 1-120-45a कर्णः प्रबुद्धस्तं स्वप्नं चिन्तयानोऽभवत्तदा।। 1-120-45b तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थं भूतभावनः। 1-120-46a कुण्डले प्रार्थयामास कवचं च महाद्युतिः।। 1-120-46b उत्कृत्याविमनाः स्वाङ्गात्कवचं रुधिरस्रवम्। 1-120-47a कर्णौ पार्श्वे च द्वे छित्त्वा प्रायच्छत्स कृताञ्जलिः।। 1-120-47b प्रतिगृह्य तु देवेशस्तुष्टस्तेनास्य कर्मणा। 1-120-48a अहो साहसमित्याह मनसा वासवो हसन्।। 1-120-48b देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। 1-120-49a न तं पश्यामि यो ह्येतत्कर्म कर्ता भविष्यति।। 1-120-49b प्रीतोऽस्मि कर्मणा तेन वरं ब्रूहि यदिच्छसि। 1-120-50a कर्ण उवाच। 1-120-50x इच्छामि भगवद्दत्तां शक्तिं शत्रुनिबर्हणीम्।। 1-120-50b वैशंपायन उवाच। 1-120-51x शक्तिं तस्मै ददौ शक्रो विस्मयाद्वाक्यमब्रवीत्। 1-120-51a देवदानवयक्षाणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्।। 1-120-51b यस्मै क्षेप्स्यसि रुष्टः सन्सोऽनया न भविष्यति। 1-120-52a हत्वैकं समरे शत्रुं ततो मामागमिष्यति। 1-120-52b इत्युक्त्वान्तर्दधे शक्रो वरं दत्त्वा तु तस्य वै।। 1-120-52c प्राङ्नाम तस्य कथितं वसुषेण इति क्षितौ। 1-120-53a कर्णो वैकर्तनश्चैव कर्मणा तेन सोऽभवत्।। 1-120-53b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—स्वप्न में ऐसा कहकर वे ब्राह्मण (सूर्य) वहीं अंतर्धान हो गए। जागने पर कर्ण उस स्वप्न के विषय में विचार करने लगे। तदनंतर भूतभावन महाद्युतिमान इंद्र ने अर्जुन की रक्षा (पुत्रार्थ) के लिए ब्राह्मण का रूप धारण कर कर्ण से उनके कवच और कुण्डलों की याचना की। बिना किसी मनःताप के, कर्ण ने अपने शरीर से खून बहते हुए भी अपने दोनों कानों के पास से कवच और कुण्डल को काटकर कृतांजलि होकर उन्हें सौंप दिया। इस कर्म से संतुष्ट देवेश इंद्र ने ग्रहण करके मन में हँसते हुए कहा—"अहो! क्या साहस है!" उन्होंने कहा कि देव, दानव, यक्ष, गंधर्व, उरग और राक्षस—इनमें मैं किसी को भी ऐसा साहसी कार्य करने वाला नहीं देखता। मैं तुम्हारे इस कर्म से प्रसन्न हूँ, जो इच्छा हो वर माँगो। कर्ण ने कहा—"मैं भगवान से शत्रु का नाश करने वाली 'शक्ति' नामक अस्त्र की इच्छा रखता हूँ।" वैशंपायन जी कहते हैं—इंद्र ने उन्हें वह शक्ति प्रदान की और विस्मयपूर्वक कहा—"क्रोध में आकर जिस किसी पर तुम इस शक्ति का प्रयोग करोगे, वह जीवित नहीं बचेगा। युद्ध में एक शत्रु का वध करके यह शक्ति पुनः मेरे पास लौट आएगी।" ऐसा कहकर और वर देकर इंद्र अंतर्धान हो गए। पृथ्वी पर जिनका नाम पहले 'वसुषेण' कहा गया था, वे अपने इसी अद्भुत कर्म (कान और कवच काटने) के कारण कर्ण और वैकर्तन नाम से प्रसिद्ध हुए।
- व्याख्या: कर्ण ने अपने जन्मजात कवच और कुण्डल दान कर दिए, जिससे प्रसन्न होकर इंद्र ने उन्हें 'शक्ति' अस्त्र प्रदान किया। इसी घटना के बाद वे 'कर्ण' कहलाए।
