श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

 श्लोक 1-4

वैशंपायन उवाच। 1-122-1x ततः शान्तनवो भीष्मो राज्ञः पाण्डोर्यशस्विनः। विवाहस्यापरस्यार्थे चकार मतिमान्मतिम्।। 1-122-1a 1-122-1b सोऽमात्यैः स्थविरैः सार्धं ब्राह्मणैश्च महर्षिभिः। बलेन चतुरङ्गेण ययौ मद्रपतेः पुरम्।। 1-122-2a 1-122-2b तमागतमभिश्रुत्य भीष्मं वाहीकपुङ्गवः। प्रत्युद्गम्यार्चयित्वा च पुरं प्रावेशयन्नृपः।। 1-122-3a 1-122-3b दत्त्वा तस्यासनं शुभ्रं पाद्यमर्घ्यं तथैव च। मधुपर्कं च मद्रेशः पप्रच्छागमनेऽर्थिताम्।। 1-122-4a 1-122-4b

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनंतर बुद्धिमान शांतनुपुत्र भीष्म ने यशस्वी राजा पांडु के दूसरे विवाह के लिए विचार किया। वे वृद्ध मंत्रियों, ब्राह्मणों, महर्षियों और चतुरङ्गिणी सेना के साथ मद्रपतिकी (शल्य) नगरी की ओर गए। भीष्म के आगमन को सुनकर वाहीकवंशियों में श्रेष्ठ मद्रराज (शल्य) ने आगे बढ़कर उनका स्वागत-सत्कार किया और उन्हें अपने नगर में प्रवेश कराया। मद्रेश ने उन्हें उत्तम आसन, पाद्य, अर्घ्य और मधुपर्क प्रदान करके उनके यहाँ आने का प्रयोजन पूछा।
  • व्याख्या: पितामह भीष्म राजा पांडु के दूसरे विवाह के प्रस्ताव को लेकर मद्रराज शल्य के पास स्वयं मद्र देश पहुँचे, जहाँ शल्य ने उनका भव्य स्वागत किया।

श्लोक 5-7

तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं कुरूद्वहः। आगतं मां विजानीहि कन्यार्थिनमरिन्दम।। 1-122-5a 1-122-5b श्रूयते भवतः साध्वी स्वसा माद्री यशस्विनी। तामहं वरयिष्यामि पाण्डोरर्थे यशस्विनीम्।। 1-122-6a 1-122-6b युक्तरूपो हि संबन्धे त्वं नो राजन्वयं तव। एतत्संचिन्त्य मद्रेश गृहाणास्मान्यथाविधि।। 1-122-7a 1-122-7b

  • हिंदी अनुवाद: कुरूद्वह भीष्म ने मद्रराज से कहा—"हे अरिन्दम! तुम मुझे कन्या की इच्छा से आया हुआ ही समझो। ऐसा सुना जाता है कि तुम्हारी साध्वी और यशस्विनी बहन माद्री यहाँ है। मैं यशस्वी पांडु के लिए उन यशस्विनी माद्री का वरण करता हूँ। हे राजन्! संबंध के लिए तुम हमारे और हम तुम्हारे अत्यंत योग्य हैं। हे मद्रेश! इस बात पर विचार करके विधिपूर्वक हमें स्वीकार करो।"
  • व्याख्या: भीष्म जी ने पांडु के लिए मद्रराज की बहन माद्री का हाथ माँगा और दोनों कुलों के बीच इस संबंध को अत्यंत उपयुक्त बताया।

श्लोक 8-11

तमेवंवादिनं भीष्मं प्रत्यभाषत मद्रपः। न हि मेऽन्यो वरस्त्वत्तः श्रेयानिति मतिर्मम।। 1-122-8a 1-122-8b पूर्वैः प्रवर्तितं किंचित्कुलेऽस्मिन्नृपसत्तमैः। साधु वा यदि वाऽसाधु तन्नातिक्रान्तुमुत्सहे।। 1-122-9a 1-122-9b व्यक्तं तद्भवतश्चापि विदितं नात्र संशयः। न च युक्तं तथा वक्तुं भवान्देहीति सत्तम।। 1-122-10a 1-122-10b कुलधर्मः स नो वीर प्रमाणं परमं च तत्। तेन त्वां न ब्रवीम्येतदसंदिग्धं वचोऽरिहन्।। 1-122-11a 1-122-11b

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म के ऐसा कहने पर मद्रराज शल्य ने उत्तर दिया—"मेरी ऐसी बुद्धि है कि आपसे बढ़कर मेरे लिए अन्य कोई वर श्रेष्ठ नहीं है। नृपसत्तमो! हमारे कुल में पूर्वजों द्वारा जो परंपरा चलाई गई है, वह चाहे अच्छी हो या बुरी, मैं उसका उल्लंघन करने का साहस नहीं कर सकता। यह बात स्पष्ट रूप से आपको भी विदित है, इसमें कोई संदेह नहीं है। हे सत्तम! आपके द्वारा यह कहना उचित नहीं है कि 'आप कन्या दीजिए।' हे वीर! यह हमारे कुल का धर्म है और वही हमारे लिए परम प्रमाण है। हे अरिहन्! इसी कारण से मैं आपसे वह (कन्या शुल्क या पारंपरिक नियम) स्पष्ट रूप से नहीं कह रहा हूँ।"
  • व्याख्या: शल्य ने विवाह का प्रस्ताव तो स्वीकार किया, किंतु मद्र देश के कुल-नियमों (संभवतः कन्या-शुल्क या विशिष्ट प्रथा) की ओर संकेत किया, जिसे भीष्म भली-भांति समझते थे।

श्लोक 12-16

तं भीष्मः प्रत्युवाचेदं मद्रराजं जनाधिपः। धर्म एष परो राजन्स्वयमुक्तः स्वयंभुवा।। 1-122-12a 1-122-12b नात्र कश्चन दोषोऽस्ति पूर्वैर्विधिरयं कृतः। विदितेयं च ते शल्य मर्यादा साधुसंमता।। 1-122-13a 1-133-13b इत्युक्त्वा स महातेजाः शातकुम्भं कृताकृतम्। रत्नानि च विचित्राणि शल्यायादात्सहस्रशः।। 1-122-14a 1-122-14b गजानश्वान्रथांश्चैव वासांस्याभरणानि च। मणिमुक्ताप्रवालं च गाङ्गेयो व्यसृजच्छुभम्।। 1-122-15a 1-122-15b तत्प्रगृह्य धनं सर्वं शल्यः संप्रतीमानसः। ददौ तां समलङ्कृत्य स्वसारं कौरवर्षभे।। 1-122-16a 1-122-16b

  • हिंदी अनुवाद: जनाधिप भीष्म ने मद्रराज से कहा—"हे राजन्! स्वयं स्वयंभू ब्रह्माजी ने इस परम धर्म को कहा है। इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि पूर्वजों द्वारा यह विधि बनाई गई है। हे शल्य! यह सज्जनों द्वारा संमत मर्यादा तुम्हें ज्ञात ही है।" ऐसा कहकर महातेजस्वी गांगेय (भीष्म) ने हजारों प्रकार के सोने (परिष्कृत और अपरिष्कृत) तथा भाँति-भाँति के रत्न शल्य को प्रदान किए। गांगेय ने हाथी, घोड़े, रथ, वस्त्र, आभूषण, मणि, मूँगा और प्रवाल आदि शुभ वस्तुएँ भेंट कीं। उस सारे धन को ग्रहण करके शल्य का मन संतुष्ट हो गया और उन्होंने अपनी बहन को भली-भांति अलंकृत करके कौरवर्षभ (पांडु के लिए) को सौंप दिया।
  • व्याख्या: मद्र देश की पारंपरिक प्रथा के अनुसार बहुमूल्य स्वर्ण, रत्न और उपहार देकर भीष्म ने माद्री का विवाह पांडु के लिए निश्चित किया और शल्य ने अपनी बहन का विवाह कर दिया।

श्लोक 17-20

स तां माद्रीमुपादाय भीष्मः सागरगासुतः। आजगाम पुरीं धीमान्प्रविष्टो गजसाह्वयम्।। 1-122-17a 1-122-17b तत इष्टेऽहनि प्राप्ते मुहूर्ते साधुसंमते। विवाहं कारायामास भीष्मः पाण्डोर्महात्मनः। ग्राह विधिवत्पाणिं माद्र्याः पाण्डुर्नराधिपः।। 1-122-18a 1-122-18b 1-122-18c ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा कुरुनन्दनः। स्थापयामास तां भार्यां शुभे वेश्मनि भामिनीं।। 1-122-19a 1-122-19b स ताभ्यां व्यचरत्सार्धं भार्याभ्यां राजसत्तमः। कुन्त्या माद्र्या च राजेन्द्रो यथाकामं यथासुखम्।। 1-122-20a 1-122-20b

  • हिंदी अनुवाद: धीमान गंगापुत्र भीष्म उन माद्री को साथ लेकर अपनी पुरी हस्तिनापुर (गजसाह्वय) में आए। तदनंतर शुभ और मनोनुकूल मुहूर्त तथा तिथि आने पर भीष्म ने महात्मा पांडु का विवाह संपन्न कराया। नराधिप पांडु ने विधिपूर्वक माद्री का पाणिग्रहण किया। विवाह संपन्न होने पर कुरुनन्दन राजा पांडु ने उस भामिनी (माद्री) को शुभ भवन में स्थापित किया। राजसत्तम राजेन्द्र पांडु कुंती और माद्री—दोनों पत्नियों के साथ अपनी इच्छा और सुख के अनुसार विहार करने लगे।
  • व्याख्या: भीष्म माद्री को लेकर हस्तिनापुर लौटे, जहाँ पांडु के साथ उनका विधिपूर्वक विवाह हुआ और पांडु अपनी दोनों पत्नियों—कुंती और माद्री—के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।

श्लोक 21-24

ततः स कौरवो राजा विहृत्य त्रिदशा निशाः। जिगीषया महीं पाण्डुर्निरक्रामत्पुरात्प्रभो।। 1-122-21a 1-122-21b स भीष्मप्रमुखान्वृद्धानभिवाद्य प्रणम्य च। धृतराष्ट्रं च कौरव्यं तथान्यान्कुरुसत्तमान्। आमन्त्र्य प्रययौ राजा तैश्चैवाप्यनुमोजितः।। 1-122-22a 1-122-22b 1-122-22c मङ्गलाचारयुक्ताभिराशीर्भिरभिनन्दितः। गजवाजिरथौघेन बलेन महताऽगमत्।। 1-122-23a 1-122-23b स राजा देवगर्भाभो विजिगीषुर्वसुन्धराम्। हृष्टपुष्टबलैः प्रायात्पाण्डुः शत्रूननेकशः।। 1-122-24a 1-122-24b

  • हिंदी अनुवाद: हे प्रभो! कुछ दिनों तक विहार करने के पश्चात कौरवराज पांडु पृथ्वी को जीतने (दिग्दर्शन/दिग्विजय) की इच्छा से अपने नगर से बाहर निकले। वे भीष्म आदि वृद्धों, धृतराष्ट्र तथा अन्य कुरुसत्तमो को प्रणाम और अभिवादन कर, उनकी अनुमति प्राप्त कर यात्रा पर निकले। मंगलाचार से युक्त आशीर्वादों द्वारा अभिनंदित होकर वे हाथियों, घोड़ों और रथों के विशाल बल के साथ आगे बढ़े। देवगर्भ के समान कांतिमान, पृथ्वी को जीतने की इच्छा रखने वाले राजा पांडु प्रसन्न और पुष्ट सेना के साथ अनेक शत्रुओं की ओर प्रस्थान कर गए।
  • व्याख्या: कुछ समय पश्चात राजा पांडु ने अपनी सैन्य शक्ति का विस्तार करने और दिग्विजय प्राप्त करने के लिए भीष्म व बड़ों की अनुमति से हस्तिनापुर से अभियान शुरू किया।

श्लोक 25-29

पूर्वमागस्कृतो गत्वा दशार्णाः समरे जिताः। पाण्डुना नरसिंहेन कौरवाणां यशोभृता।। 1-122-25a 1-122-25b ततः सेनामुपादाय पाण्डुर्नानाविधध्वजाम्। प्रभूतहस्त्यश्वयुतां पदातिरथसंकुलाम्।। 1-122-26a 1-122-26b आगस्कारी महीपानां बहूनां बलदर्पितः। गोप्ता मगधराष्ट्रस्य दीर्घो राजगृही हतः।। 1-122-27a 1-122-27b ततः कोशं समादाय वाहनानि च भूरिशः। पाण्डुना मिथिलां गत्वा विदेहाः समरे जिताः।। 1-122-28a 1-122-28b तथा काशिषु सुह्मेषु पुण्ड्रेषु च नरर्षभ। स्वबाहुबलवीर्येण कुरूणामकरोद्यशः।। 1-122-29a 1-122-29b

  • हिंदी अनुवाद: कौरवों का यश बढ़ाने वाले नरसिंह पांडु ने सबसे पहले अपराधी दशार्ण देश में जाकर वहाँ के राजाओं को युद्ध में जीत लिया। तदनंतर नाना प्रकार की ध्वजाओं से सुसज्जित, बहुत से हाथियों, घोड़ों, पदाति सैनिकों और रथों से परिपूर्ण सेना को लेकर पांडु आगे बढ़े। बल के अहंकार में डूबे हुए तथा अनेक राजाओं को अपराध में फँसाने वाले मगध राष्ट्र के रक्षक (दीर्घ) को राजगृह में मार गिराया। इसके पश्चात वहाँ से राजकोष और बहुत से वाहन प्राप्त करके पांडु ने मिथिला जाकर विदेह देश के लोगों को युद्ध में जीत लिया। हे नरर्षभ! इसी प्रकार काशी, सुह्म और पुण्ड्र देशों में भी उन्होंने अपने बाहुबल और पराक्रम से कौरवों का यश बढ़ाया।
  • व्याख्या: पांडु ने अपने सैन्य पराक्रम से दशार्ण, मगध (दीर्घ सम्राट का वध), विदेह (मिथिला), काशी, सुह्म और पुंड्र देशों को पराजित कर कुरुवंश का आधिपत्य स्थापित किया।

श्लोक 30-35

तं शरौघमहाज्वालं शस्त्रार्चिषमरिन्दमम्। पाण्डुपावकमासाद्य व्यवह्यन्त नराधिपाः।। 1-122-30a 1-122-30b ते ससेनाः ससेनेन विध्वंसितबला नृपाः। पाण्डुना वशगाः कृत्वा कुरुकर्मसु योजिताः।। 1-122-31a 1-122-31b तेन ते निर्जिताः सर्वे पृथिव्यां सर्वपार्थिवाः। तमेकं मेनिरे शूरं देवेष्विव पुरन्दरम्।। 1-122-32a 1-122-32b तं कृताञ्जलयः सर्वे प्रणता वसुधाधिपाः। उपाजग्मुर्धनं गृह्य रत्नानि विविधानि च।। 1-122-33a 1-122-33b मणिमुक्ताप्रवालं च सुवर्णं रजतं बहु। गोरत्नान्यश्वरत्नानि रथरत्नानि कुञ्जरान्।। 1-122-34a 1-122-34b खरोष्ट्रमहिषांश्चैव यच्च किंचिदजाविकम्। कम्लाजिनरत्नानि राङ्कवास्तरणानि च। तत्सर्वं प्रतिजग्राह राजा नागपुराधिपः।। 1-122-35a 1-122-35b 1-122-35c

  • हिंदी अनुवाद: बाणों के समूह रूपी महाज्वाला से और शस्त्रों की शिखाओं से युक्त उस अरिन्दम पांडु रूपी अग्नि के सामने आकर सभी नराधिप नष्टप्राय हो गए। उन राजाओं ने अपनी सेना सहित पांडु की सेना के सामने पराजय स्वीकार की और पांडु ने उन्हें अपने वश में कर कुरुराज्य के कार्यों में लगा दिया। पृथ्वी के समस्त राजाओं द्वारा पराजित किए जाने पर वे सब पांडु को देवताओं में पुरन्दर (इन्द्र) के समान एक ही शूरवीर मानने लगे। वे सभी वसुधाधिप (राजा) हाथ जोड़े हुए, नतमस्तक होकर नाना प्रकार के धन और रत्न लेकर उनके पास आए। मणि, मुक्ता, प्रवाल, सोना, बहुत सा चाँदी, उत्तम बैल (गोरत्न), घोड़े, रथ, हाथी, गधे, ऊँट, भैंसे, भेड़-बकरियाँ, कंबलों के श्रेष्ठ आस्तरण और रेशमी वस्त्र—वह सारा धन नागपुराधिप राजा पांडु ने स्वीकार किया।
  • व्याख्या: पांडु के प्रचंड पराक्रम से भयभीत होकर पृथ्वी के तमाम राजाओं ने उन्हें कर (राजस्व) और बहुमूल्य उपहार अर्पित किए, जिन्हें पांडु ने स्वीकार किया।

श्लोक 36-41

तदादाय ययौ पाण्डुः पुनर्मदितवाहनः। हर्षयिष्यन्स्वराष्ट्राणि पुरं च गजसाह्वयम्।। 1-122-36a 1-122-36b शान्तनो राजसिंहस्य भरतस्य च धीमतः। प्रनष्टः कीर्तिजः शब्दः पाण्डुना पुनराहृतः।। 1-122-37a 1-122-37b ये पुरा कुरुराष्ट्राणि जह्रुः कुरुधनानि च। ते नागपुरसिंहेन पाण्डुना करदीकृताः।। 1-122-38a 1-122-38b इत्यभाषन्त राजानो राजामात्याश्च सङ्गताः। प्रतीतमनसो हृष्टाः पौरजानपदैः सह।। 1-122-39a 1-122-39b प्रत्युद्ययुश्च तं प्राप्तं सर्वे भीष्मपुरोगमाः। ते नदूरमिवाध्वानं गत्वा नागपुरालयाः।। 1-122-40a 1-122-40b आवृतं ददृशुर्हृष्टा लोकं बहुविधैर्धनैः। नानायानसमानीतै रत्नैरुच्चावचैस्तदा।। 1-122-41a 1-122-41b

  • हिंदी अनुवाद: तदनंतर उस धन को लेकर, प्रसन्न वाहनों वाले पांडु अपने राष्ट्र और हस्तिनापुर (गजसाह्वय) नगर को हर्षित करने के लिए वापस लौटे। राजसिंह शांतनु और धीमान भरत की जो कीर्ति धूमिल हो गई थी, उस यश को पांडु ने पुनः प्राप्त कर लिया। जो लोग पहले कुरुराज्यों और कुरुओं के धन को लूटते थे, नागपुर के सिंह पांडु ने उन सबको कर देने वाला (अधीन) बना लिया। राजा और उनके मंत्री तथा पौर-जनपद के लोग प्रसन्नचित्त होकर ऐसा कहने लगे। भीष्म को आगे करके नागपुर के सभी निवासी उनका स्वागत करने के लिए दूर तक आगे बढ़कर पहुँचे। उन्होंने नाना प्रकार के वाहनों और ऊँचे-नीचे रत्नों से भरे हुए उस अपार धन को देखकर अत्यंत हर्षित होकर उस समुदाय को देखा।
  • व्याख्या: पांडु ने अपनी इस यशस्वी दिग्विजय से कुरुवंश की खोई हुई प्रतिष्ठा वापस दिलाई, जिससे पूरा राष्ट्र और हस्तिनापुरवासी अत्यधिक प्रसन्न हुए।

श्लोक 42-45

हस्त्यश्वरथरत्नैश्च गोभिरुष्ट्रैस्तथाऽऽविभिः। नान्तं ददृशुरासाद्य भीष्मेण सह कौरवाः।। 1-122-42a 1-122-42b सोऽभिवाद्य पितुः पादौ कौसल्यानन्दवर्धनः। यथाऽर्हं मानयामास पौरजानपदानपि।। 1-122-43a 1-122-43b प्रमृद्य परराष्ट्राणि कृतार्थं पुनरागतम्। पुत्रमाश्लिष्य भीष्मस्तु हर्षादश्रूण्यवर्तयत्।। 1-122-44a 1-122-44b स तूर्यशतशङ्खानां भेरीणां च महास्वनैः। हर्षयन्सर्वशः पौरान्विवेश गजसाह्वयम्।। 1-122-45a 1-122-45b

  • हिंदी अनुवाद: भीष्म के साथ आए कौरवों को हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, गाय, ऊँट और भेड़ों के उस धन का अंत ही नहीं दिखाई दे रहा था। कौसल्या (अम्बिका) के आनंद को बढ़ाने वाले पांडु ने आकर पिता (धृतराष्ट्र/भीष्म) के चरणों में प्रणाम किया और पौर-जानपदों का यथोचित सम्मान किया। शत्रु राष्ट्रों को जीतकर और कृतकार्य होकर लौटे हुए अपने उस पुत्र को आलिंगन करके भीष्म हर्ष के आँसू बहाने लगे। सैकड़ों तूर्य (वाद्य यंत्र), शंखों और भेरियों के महास्वन के साथ, सभी नागरिकों को हर्षित करते हुए पांडु ने हस्तिनापुर (गजसाह्वय) में प्रवेश किया।
  • व्याख्या: अपार धन-सम्पदा और विजय के साथ लौटे पांडु का भीष्म और हस्तिनापुरवासियों ने भव्य स्वागत किया, और पांडु ने नगर में प्रवेश किया।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्वाविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः।। 122 ।।

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