श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः

श्लोक 1-4

वैशंपायन उवाच।1-123-1xधृतराष्ट्राभ्यनुज्ञातः स्वबाहुविजितं धनम्। भीष्माय सत्यवत्यै च मात्रे चोपजहार सः।।1-123-1a 1-123-1bविदुराय च वै पाण्डुः प्रेषयामास तद्धनम्। सुहृदश्चापि धर्मात्मा धनेन समतर्पयत्।।1-123-2a 1-123-2bततः सत्यवतीं भीष्मं कौसल्यां च यशस्विनीम्। शुभैः पाण्डुर्जितैरर्थैस्तोषयामास भारत।।1-123-3a 1-123-3bननन्द माता कौसल्या तमप्रतिमतेजसम्। जयन्तमिव पौलोमी परिष्वज्य नर्षभम्।।1-123-4a 1-123-4b

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—धृतराष्ट्र द्वारा अनुमति दिए जाने पर धर्मात्मा राजा पांडु ने अपने बाहुबल से जीते हुए धन को भीष्म, सत्यवती, माता (अम्बिका/कौसल्या) तथा विदुर के पास भेजा और अपने अन्य मित्रों को भी उस धन से संतुष्ट किया। हे भारत! तदनंतर पांडु ने जीते हुए शुभ अर्थों से सत्यवती, भीष्म और यशस्विनी कौसल्या को संतुष्ट किया। माता कौसल्या ने अप्रतिम तेजस्वी नरश्रेष्ठ पांडु को, जैसे इंद्राणी (पौलोमी) जयंत को आलिंगन करती है, वैसे ही गले लगाकर आनंदित हुईं।
  • व्याख्या: दिग्विजय से लौटे पांडु ने अपने जीते हुए अपार धन को हस्तिनापुर के बड़े-बुजुर्गों, माताओं, भीष्म और विदुर में बाँटकर सबका सम्मान बढ़ाया।

श्लोक 5-7

तस्य वीरस्य विक्रान्तैः सहस्रशतदक्षिणैः। अश्वमेधशतैरीजे धृतराष्ट्रो महामखैः।।1-123-5a 1-123-5bसंप्रयुक्तस्तु कुन्त्या च माद्र्या च भरतर्षभ। जिततन्द्रीस्तदा पाण्डुर्बभूव वनगोचरः।।1-123-6a 1-123-6bहित्वा प्रासादनिलयं शुभानि शयनानि च। अरण्यनित्यः सततं बभूव मृगयापरः।।1-123-7a 1-123-7b

  • हिंदी अनुवाद: उस वीर (पांडु) के पराक्रम से प्राप्त धन द्वारा धृतराष्ट्र ने सैकड़ों-हजारों दक्षिण वाले तथा बड़े-बड़े महामख (अश्वमेध यज्ञ) किए। हे भरतर्षभ! तदनंतर कुंती और माद्री के साथ रहने वाले पांडु ने अपनी आलस्य-निद्रा को जीतकर वन में निवास करना शुरू कर दिया। वे राजमहल के महलों और शुभ शय्याओं को छोड़कर हमेशा के लिए वनवासी हो गए और निरंतर मृगया (शिकार) में तत्पर रहने लगे।
  • व्याख्या: पांडु द्वारा लाए गए धन से धृतराष्ट्र ने अश्वमेध यज्ञ किए, और पांडु अपनी दोनों पत्नियों—कुंती व माद्री—के साथ महलों का सुख त्यागकर वनों में निवास करने लगे।

श्लोक 8-11

स चरन्दक्षिणं पार्श्वं रम्यं हिमवतो गिरः। उवास गिरिपृष्ठेषु महाशालवनेषु च।।1-123-8a 1-123-8bरराज कुन्त्या माद्र्या च पाण्डुः सह वने चरन्। करेण्वोरिव मध्यस्थः श्रीमान्पौरन्दरो गजः।।1-123-9a 1-123-9bभारतं सह भार्याभ्यां खङ्गबाणधनुर्धरम्। विचित्रकवचं वीरं परमास्त्रविदं नृपम्। देवोऽयमित्यमन्यन्त चरन्तं वनवासिनः।।1-123-10a 1-123-10b 1-123-10cतस्य कामांश्च भोगांश्च नरा नित्यमतन्द्रिताः। उपजह्रुर्वनान्तेषु धृतराष्ट्रेण चोदिताः।।1-123-11a 1-123-11b

  • हिंदी अनुवाद: वे हिमालय पर्वत के रमणीय दक्षिणी भाग में विचरते हुए पर्वतों की चोटियों और बड़े-बड़े शाल के वनों में निवास करने लगे। कुंती और माद्री के साथ वनों में विचरते हुए श्रीमान पांडु ऐसे सुशोभित होते थे, जैसे दो हथियों के बीच में देवराज इंद्र का श्रेष्ठ हाथी सुशोभित हो। खंग, बाण और धनुष धारण किए हुए, विचित्र कवच पहने, परमास्त्रों के ज्ञाता उस वीर नृप को अपनी दोनों पत्नियों के साथ वन में विचरते देख वनवासी उन्हें देवता ही मानते थे। धृतराष्ट्र की प्रेरणा से लोग निरंतर तंद्राहीन होकर वन में उनके लिए सभी प्रकार की भोग-सामग्री और मनचाही वस्तुएँ पहुँचाते रहते थे।
  • व्याख्या: पांडु हिमालय के वनों में कुंती और माद्री के साथ जीवन बिताने लगे। हस्तिनापुर से धृतराष्ट्र उनके लिए आवश्यक सभी भोग-सामग्री भिजवाते थे।

श्लोक 12-15

तदासाद्य महारण्यं मृगव्यालनिषेवितम्। तत्र मैथुनकालस्थं ददर्श मृगयूथपम्।।1-123-12a 1-123-12bततस्तं च मृगीं चैव रुक्मपुङ्खैः सुपत्रिभिः। निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः।।1-123-13a 1-123-13bस च राजन्महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः। भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण सङ्गतः।।1-123-14a 1-123-14bस संयुक्तस्तया मृग्या मानुषीं वाचमीरयन्। क्षणेन पतितो भूमौ विललापातुरो मृगः।।1-123-15a 1-123-15b

  • हिंदी अनुवाद: एक दिन मृगों और हिंसक जीवों से सेवित एक महाअरण्य में पहुँचकर उन्होंने मैथुन के समय में संलग्न मृगों के यूथपति (मुख्य मृग) को देखा। तब पांडु ने सोने के पंखों वाले तीखे और तेज पाँच बाणों से उस मृग और मृगी दोनों को बींध डाला। हे राजन्! वे महातेजस्वी और तपोधन ऋषिपुत्र थे, जो अपनी पत्नी के साथ मृग का रूप धारण करके वहाँ जुड़े हुए थे। उस मृगी के साथ जुड़े हुए वे ऋषि (मृग रूप में) मनुष्य की सी वाणी में विलाप करने लगे और क्षणेन ही आर्त होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
  • व्याख्या: पांडु ने वध के उद्देश्य से एक मृग-युग्म पर बाण चलाया, किंतु वे साधारण मृग न होकर मृग रूप में एक तपस्वी ऋषि और उनकी पत्नी थे।

श्लोक 16-18 (मृग का विलाप और उक्ति)

मृग उवाच।1-123-16xकाममन्युवशं प्राप्ता बुद्ध्यन्तरगता अपि। वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः।।1-123-16a 1-123-16bन विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः। विधिपर्यागतानर्थान्प्रज्ञावान्प्रतिपद्यते।।1-123-17a 1-123-17bशस्वद्धर्मात्मनां मुख्ये कुले जातस्य भारत। कामलोभाभिभूतस्य कथं ते चलिता मतिः।।1-123-18a 1-123-18b

  • हिंदी अनुवाद: मृग (ऋषि) ने कहा—काम और क्रोध के वश में पड़े हुए तथा बुद्धि के फेर में आए हुए लोग भी पाप में रत होने पर भी क्रूर कर्मों से बचते हैं। प्रज्ञा विधि को नहीं ग्रसती, बल्कि विधि प्रज्ञा को ग्रस लेती है; इसलिए प्रज्ञावान पुरुष दैववशात् आए हुए अनर्थों को प्राप्त होता है। हे भारत! सदा धर्मात्माओं के मुख्य कुल में उत्पन्न हुए काम-लोभ से अभिभूत तुम्हारी बुद्धि कैसे विचलित हो गई?
  • व्याख्या: घायल ऋषि-मृग ने पांडु को उनके कुल और धर्म का स्मरण कराते हुए इस क्रूर कर्म के लिए ताड़ना दी।

श्लोक 19-24 (पांडु का उत्तर)

पाण्डुरुवाच।1-123-19xशत्रूणां या वधे वृत्तिः सा मृगाणां वधे स्मृता। राज्ञां मृग न मां मोहात्त्वं गर्हयितुमर्हसि।।1-123-19a 1-123-19bअच्छद्मनाऽमायया च मृगाणां वध इष्यते। स एव धर्मो राज्ञां तु तद्धि त्वं किं नु गर्हसे।।1-123-20a 1-123-20bअगस्त्यः सत्रमासीनश्चकार मृगयामृषिः। आरण्यान्सर्वदैवत्यान्मृगान्प्रोक्ष्य महावने।।1-123-21a 1-123-21bप्रमाणदृष्टधर्मेण कथमस्मान्विगर्हसे। अगस्त्यस्याभिचारेण युष्माकं विहितो वधः।।1-123-22a 1-123-22bन रिपून्वै समुद्दिश्य विमुञ्चन्ति नराः शरान्। रन्ध्र एषां विशेषेण वधकालः प्रशस्यते।।1-123-23a 1-123-23bप्रमत्तमप्रमत्तं वा विवृतं घ्नन्ति चौजसा। उपायैर्विविधैस्तीक्ष्णैः कस्मान्मृग विगर्हसे।।1-123-24a 1-123-24b

  • हिंदी अनुवाद: पांडु ने कहा—हे मृग! शत्रुओं के वध की जो वृत्ति है, वही मृगों के वध के लिए भी स्मृत है; इसलिए तुम मोहवश मुझे गर्हति (दोषी) देने योग्य नहीं हो। छल-छद्म और माया के बिना मृगों का वध अभीष्ट होता है, और राजाओं के लिए यही धर्म है, फिर तुम इसकी निंदा क्यों कर रहे हो? महर्षि अगस्त्य ने सत्र (यज्ञ) में बैठकर महावन में सभी देवताओं वाले अरण्य के मृगों का प्रोक्षण करके शिकार किया था। प्रमाणसम्मत धर्म के अनुसार तुम हमारी निंदा कैसे कर रहे हो? शत्रुओं को उद्देश्य बनाकर मनुष्य बाण नहीं छोड़ते, बल्कि उनके रंध्र (कमजोरी/अवसर) को देखकर ही वधकाल प्रशस्त माना जाता है। प्रमादी हो या अप्रमादी, खुले में शत्रु को बलपूर्वक विभिन्न तीखे उपायों से मारा जाता है, अतः हे मृग! तुम क्यों मेरी निंदा कर रहे हो?
  • व्याख्या: पांडु ने अपनी सफाई में क्षत्रिय धर्म और राजाओं द्वारा मृगया (शिकार) खेलने की पारंपरिक विधि का हवाला दिया।

श्लोक 25-40 (मृग का शाप)

मृग उवाच।1-123-25xनाहं घ्न्तं मृगन्राजन्विगर्हे चात्मकारणात्। मैथुनं तु प्रतीक्ष्यं मे त्वयेहाद्यानृशंस्यतः।।1-123-25a 1-123-25bसर्वभूतहिते काले सर्वभूतेप्सिते तथा। को हि विद्वान्मृगं हन्याच्चरन्तं मैथुनं वने।।1-123-26a 1-123-26b... (अग्रिम श्लोकों में ऋषि किंदम ने पांडु को शाप दिया कि वे भी अपनी किसी पत्नी के साथ मैथुन करते समय मृत्यु को प्राप्त होंगे।)

  • हिंदी अनुवाद: मृग (किंदम ऋषि) ने कहा—हे राजन्! मैं मारे जाने या अपने आत्मकारण से तुम्हारी निंदा नहीं कर रहा हूँ, बल्कि तुमने आज निर्दयतापूर्वक मेरे मैथुन के समय में बाधा डाली है। सभी भूतों के हित के समय और संपूर्ण जीवों द्वारा वाञ्छित समय में कौन सा विद्वान पुरुष वन में मैथुन करते हुए मृग की हत्या करेगा? ...तुमने काम-मोहित होकर मेरा वध किया है, अतः जब तुम भी अपनी किसी प्रियतमा के साथ मैथुन में संलग्न होगे, तभी तुम्हारी भी मृत्यु हो जाएगी।
  • व्याख्या: किंदम ऋषि ने मैथुनरत अवस्था में वध किए जाने के कारण पांडु को भीषण शाप दिया कि वे भी अपनी पत्नी के साथ मिलन के समय मृत्यु को प्राप्त होंगे।

श्लोक 41 (अध्याय का उपसंहार)

वैशंपायन उवाच।1-123-41xएवमुक्त्वा सुदुःखार्तो जीवितात्स व्यमुच्यत। मृगः पाण्डुश्च दुःखार्तः क्षणेन समपद्यत।।1-123-41a 1-123-41b

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—ऐसा कहकर वे सुदुःखार्त मृग (ऋषि) अपने प्राणों से मुक्त हो गए, और राजा पांडु भी उस शाप के कारण क्षणेन अत्यंत दुःखी हो गए।
  • व्याख्या: ऋषि किंदम प्राण त्याग देते हैं, और पांडु इस अनर्थ तथा ऋषि के शाप से अत्यधिक व्यथित और शोकाकुल हो जाते हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रयोविंशत्यधिकशततमोऽध्यायः।। 123 ।।

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