भाग 1: श्लोक 1 से 25
श्लोक 1
वैशंपायन उवाच। 1-124-1x तं व्यतीतमुपक्रम्य राजा स्वमिव बान्धवम्। सभार्यः शोकदुःखार्तः पर्यदेवयदातुरः।। 1-124-1a / 1-124-1b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—मृत ऋषि को अपने सगे भाई की तरह मरा हुआ देखकर, शोक और दुःख से आर्त हुए राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ दुखी होकर विलाप करने लगे।
- व्याख्या: पांडु से अनजाने में जो पाप हुआ था, उससे वे बहुत आहत थे और मृत ऋषि के पास विलाप कर रहे थे।
श्लोक 2
पाण्डुरुवाच। 1-124-2x सतामपि कुले जाताः कर्मणा बत दुर्गतिम्। प्राप्नुवन्त्यकृतात्मानः कामजालविमोहिताः।। 1-124-2a / 1-124-2b
- हिंदी अनुवाद: पांडु ने कहा—हा! संतों के कुल में उत्पन्न हुए संयमहीन लोग भी कामजाल से मोहित होकर कर्मवश दुर्गति को प्राप्त हो जाते हैं।
- व्याख्या: पांडु अपनी इस भूल का कारण काम-मोह को मान रहे हैं और सोच रहे हैं कि कैसे अच्छे कुल में जन्म लेने के बाद भी इंसान भटक जाता है।
श्लोक 3
शश्वद्धर्मात्मना जातो बाल एव पिता मम। जीवितान्तमनुप्राप्तः कामात्मैवेति नः श्रुतम्।। 1-124-3a / 1-124-3b
- हिंदी अनुवाद: सदा धर्मात्माओं के कुल में उत्पन्न हुए मेरे पिता बचपन में ही जीवन के अंत को प्राप्त हो गए थे, और हमने ऐसा सुना है कि वे भी कामात्मा ही थे।
- व्याख्या: पांडु अपने पूर्वजों और पिता के जीवन के प्रसंग को याद करते हुए अपने पारिवारिक इतिहास पर विचार कर रहे हैं।
श्लोक 4
तस्य कामात्मनः क्षेत्रे राज्ञः संयतवागृषिः। कृष्णद्वैपायनः साक्षाद्भगवान्मामजीजनत्।। 1-124-4a / 1-124-4b
- हिंदी अनुवाद: उन कामात्मा राजा के क्षेत्र (पत्नी) में संयतवाक् ऋषि साक्षात् भगवान कृष्णद्वैपायन (वेद व्यास जी) ने मुझे उत्पन्न किया था।
- व्याख्या: पांडु अपने जन्म के रहस्य का उल्लेख कर रहे हैं कि उनका जन्म नियोग प्रथा के अंतर्गत वेद व्यास जी द्वारा हुआ था।
श्लोक 5
तस्याद्य व्यसने बुद्धिः संजातेयं ममाधमा। त्यक्तस्य देवैरनयान्मृगयां परिधावतः।। 1-124-5a / 1-124-5b
- हिंदी अनुवाद: देवताओं द्वारा त्यागे गए और वनों में शिकार के लिए दौड़ने वाले मुझ पापी की आज इस महान व्यसन में ऐसी अधम बुद्धि उत्पन्न हो गई है।
- व्याख्या: पांडु अपने द्वारा किए गए इस अनर्थपूर्ण कर्म के लिए स्वयं को पूरी तरह से दोषी मान रहे हैं और अपनी बुद्धि की निंदा कर रहे हैं।
श्लोक 6
मोक्षमेव व्यवस्यामि बन्धो हि व्यसनं महत्। सुवृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम्।। 1-124-6a / 1-124-6b
- हिंदी अनुवाद: अब मैं मोक्ष का ही निश्चय करता हूँ, क्योंकि यह संसार-बंधन ही सबसे बड़ा व्यसन है। इसलिए मैं अपने पिता की उस अक्षय उत्तम वृत्ति का ही अनुसरण करूँगा।
- व्याख्या: राजपाट और भोग-विलासिता को छोड़कर अब पांडु पूरी तरह से वैराग्य और मोक्ष मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय करते हैं।
श्लोक 7
अतीव तपसात्मानं योजयिष्याम्यसंशयम्। तस्मादेकाहमेकाहमेकैकस्मिन्वनस्पतौ।। 1-124-7a / 1-124-7b
- हिंदी अनुवाद: मैं निश्चित रूप से अत्यधिक तपस्या द्वारा अपनी आत्मा को संयुक्त करूँगा। इसलिए प्रतिदिन एक-एक वृक्ष के नीचे निवास करूँगा।
- व्याख्या: पांडु ने एकाग्र होकर कठोर तपस्या करने और एक-एक वृक्ष के नीचे जीवन बिताने का संकल्प लिया।
श्लोक 8
चरन्भैक्षं मुनिर्मुण्डश्चरिष्यामि आश्रमानिमान्। पांसुना समवच्छन्नः शून्यागारकृतालयः।। 1-124-8a / 1-124-8b
- हिंदी अनुवाद: मुनिवर मुंडित सिर होकर, भिक्षा माँगकर खाऊँगा, धूल से ढका रहूँगा और शून्य घरों या वनों को अपना आलय बनाऊँगा।
- व्याख्या: उन्होंने संन्यासियों की तरह भिक्षावृत्ति अपनाने और शरीर पर धूल-मिट्टी लपेटकर साधारण जीवन जीने की बात कही।
श्लोक 9
वृक्षमूलनिकेतो वा त्यक्तसर्वप्रियाप्रियः। न शोचन्न प्रहृष्यंश्च तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः।। 1-124-9a / 1-124-9b
- हिंदी अनुवाद: वृक्षों की जड़ को अपना निवास स्थान बनाऊँगा, सारे प्रिय-अप्रिय को त्याग दूँगा। न शोक करूँगा, न प्रहर्ष (हर्ष) करूँगा, तथा निंदा और स्तुति को समान मानूँगा।
- व्याख्या: वे सुख-दुःख, मान-अपमान और राग-द्वेष से पूरी तरह ऊपर उठने का प्रण ले रहे हैं।
श्लोक 10
निराशीर्निर्नमस्कारो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहः। न चाप्यवहसन्कंचिन्न कुर्वन्भ्रुकुटीं क्वचित्।। 1-124-10a / 1-124-10b
- हिंदी अनुवाद: मैं आशारहित, नमस्काररहित (किसी से अपेक्षा न रखने वाला), निर्द्वंद्व और परिग्रहरहित हो जाऊँगा। किसी की हँसी नहीं उड़ाऊँगा और कहीं भी भृकुटी (क्रोध से त्यौरियाँ) नहीं तानूँगा।
- व्याख्या: पांडु ने अपने भीतर से सारी उम्मीदों, संग्रह की प्रवृत्ति और क्रोध को पूरी तरह मिटा देने की बात कही।
श्लोक 11
प्रसन्नवदनो नित्यं सर्वभूतहिते रतः। जङ्गमाजङ्गमं सर्वमविहिंसंश्चतुर्विधम्।। 1-124-11a / 1-124-11b
- हिंदी अनुवाद: मेरा मुख हमेशा प्रसन्न रहेगा, मैं सभी भूतों (प्राणियों) के हित में रत रहूँगा और जंगम तथा स्थावर चारों प्रकार के प्राणियों की अहिंसा करूँगा।
- व्याख्या: वे सभी जीवों के प्रति दया भाव रखते हुए पूर्ण अहिंसक जीवन जीने का संकल्प लेते हैं।
श्लोक 12
स्वासु प्रजास्विव सदा समः प्राणभृतः प्रति। एककालं चरन्भैक्षं कुलानि दश पञ्च च।। 1-124-12a / 1-124-12b
- हिंदी अनुवाद: अपनी प्रजा की तरह सभी प्राणधारियों को समान देखूँगा और पंद्रह (दस और पाँच) कुलों से एक समय ही भिक्षा माँगकर खाऊँगा।
- व्याख्या: भिक्षा माँगने के लिए भी उन्होंने अत्यंत संयमित नियम (केवल कुछ ही घरों से एक समय भोजन) तय किए।
श्लोक 13
असंभवे वा भैक्षस्य चरन्ननशनान्यपि। अल्पमल्पं च भुञ्जानः पूर्वालाभे न जातुचित्।। 1-124-13a / 1-124-13b
- हिंदी अनुवाद: भिक्षा न मिलने पर उपवास करते हुए चलूँगा। बहुत ही कम भोजन करूँगा और पहले ही घर से पर्याप्त मिलने पर आगे नहीं जाऊँगा।
- व्याख्या: अतिलोभ का त्याग करते हुए उन्होंने संतोषी जीवन जीने के कड़े नियम बनाए।
श्लोक 14
अन्यान्यपि चरँल्लोभादलाभे सप्त पूरयन्। अलाभे यदि वा लाभे समदर्शी महातपाः।। 1-124-14a / 1-124-14b
- हिंदी अनुवाद: लोभ के कारण अन्य घरों में न जाकर, यदि पहले न मिले तो सात घरों तक भिक्षा पूरी करूँगा। लाभ हो या अलाभे (न लाभ हो), महातपस्वी समदर्शी बनूँगा।
- व्याख्या: परिस्थिति चाहे जैसी हो, मन की समता बनाए रखना ही उनका मुख्य उद्देश्य होगा।
श्लोक 15
वास्यैकं तक्षतो बाहुं चन्दनेनैकमुक्षतः। नाकल्याणं न कल्याणं चिन्तयन्नुभयोस्तयोः।। 1-124-15a / 1-124-15b
- हिंदी अनुवाद: यदि कोई एक बाहु को कुल्हाड़ी से काट रहा हो और दूसरा चंदन लगा रहा हो, तो मैं उन दोनों ही अवस्थाओं में न कल्याण की सोचूँगा और न अकल्याण की।
- व्याख्या: यह श्लोक पूर्ण स्थितप्रज्ञता (सुख-दुःख में समान भाव) की पराकाष्ठा को दर्शाता है।
श्लोक 16
न जिजीविषुवत्किंचिन्न मुमूर्षुवदाचरन्। जीवितं मरणं चैव नाभिन्दन्न च द्विषन्।। 1-124-16a / 1-124-16b
- हिंदी अनुवाद: न तो जीने की बहुत इच्छा रखूँगा और न मरने की चाह रखूँगा। जीवन और मरण दोनों में न भेद करूँगा और न किसी से द्वेष करूँगा।
- व्याख्या: जीवन और मृत्यु के प्रति भी मोह या भय से मुक्त होकर जीने का संकल्प।
श्लोक 17
याः काश्चिज्जीवता शक्याः कर्तुमभ्युदयक्रियाः। ताः सर्वाः समतिक्रम्य निमेषादिव्यवस्थितः।। 1-124-17a / 1-124-17b
- हिंदी अनुवाद: जीवित रहते हुए मनुष्य द्वारा जो भी अभ्युदय की क्रियाएँ की जाती हैं, उन सबका अतिक्रमण करके मैं निमेषमात्र में स्थित हो जाऊँगा।
- व्याख्या: सांसारिक उन्नति या कर्म-कांडों से ऊपर उठकर आत्मिक स्थिति में लीन होना।
श्लोक 18
तासु चाप्यनवस्थासु त्यक्तसर्वेन्द्रियक्रियः। संपरित्यक्तधर्मार्थः सुनिर्णिक्तात्मकल्मषः।। 1-124-18a / 1-124-18b
- हिंदी अनुवाद: उन सभी अवस्थाओं में इंद्रियों की क्रियाओं को त्यागकर, धर्म और अर्थ का भी संन्यास कर मैं अपने अंतःकरण के मैल को पूरी तरह धो डालूँगा।
- व्याख्या: सभी प्रकार की बाहरी आसक्तियों और कर्मबंधनों से मुक्ति पाना।
श्लोक 19
निर्मुक्तः सर्वपापेभ्यो व्यतीतः सर्ववागुराः। न वशे कस्यचित्तिष्टन्सधर्मा मातरिश्वनः।। 1-124-19a / 1-124-19b
- हिंदी अनुवाद: समस्त पापों से मुक्त होकर, संसार के सभी प्रपंचों (वागुरा) से पार पाकर, किसी के वश में न रहकर मैं वायु (मातरिश्वा) के समान स्वतंत्र हो जाऊँगा।
- व्याख्या: हवा की तरह स्वतंत्र और किसी बंधन में न बँधने वाले जीवन की कामना।
श्लोक 20
एतया सततं वृत्त्या चरन्नेवंप्रकारया। देहं संस्थापयिष्यामि निर्भयं मार्गमास्थितः।। 1-124-20a / 1-124-20b
- हिंदी अनुवाद: इस प्रकार की सतत वृत्ति से आचरण करते हुए, निर्भय मार्ग पर चलकर मैं अपने इस शरीर का अंत (समाप्ति) करूँगा।
- व्याख्या: पांडु ने अपने जीवन के अंतिम समय तक इसी कठोर तपस्या मार्ग पर चलने का दृढ़ निश्चय किया।
श्लोक 21
नाहं सुकृपणे मार्गे स्ववीर्यक्षयशोचिते। स्वधर्मात्सततापेते चरेयं वीर्यवर्जितः।। 1-124-21a / 1-124-21b
- हिंदी अनुवाद: मैं उस कृपण (नीच) मार्ग पर नहीं चलूँगा जो अपने पराक्रम के क्षय से शोचित हो और स्वधर्म से सदा अलग हो; मैं वीर्यवर्जित होकर ऐसा नहीं करूँगा।
- व्याख्या: क्षत्रिय उचित मार्ग और अपने पुरुषार्थ के अनुरूप ही तपस्या का मार्ग चुनेंगे, कायरों की तरह नहीं।
श्लोक 22
सत्कृतोऽसत्कृतो वाऽपि योऽन्यां कृपणचक्षुषा। उपैति वृत्तिं कामात्मा स शुनां वर्तते पथि।। 1-124-22a / 1-124-22b
- हिंदी अनुवाद: जो कामात्मा मनुष्य सत्कार या तिरस्कार मिलने पर कृपण दृष्टि से दूसरों की वृत्ति का आश्रय लेता है, वह कुत्तों के मार्ग पर चलता है।
- व्याख्या: दूसरों के टुकड़ों पर पलने या दीनता दिखाने वाली कामात्मा प्रवृत्ति की कड़ी निंदा।
श्लोक 23
वैशंपायन उवाच। 1-124-23x एवमुक्त्वा सुदुःखार्तो निःश्वासपरमो नृपः। अवेक्षमाणः कुन्तीं च माद्रीं च समभाषत।। 1-124-23a / 1-124-23b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—ऐसा कहकर, दुःख से आर्त और लंबी साँसें लेते हुए राजा ने कुंती और माद्री की ओर देखकर कहना शुरू किया।
- व्याख्या: पांडु अपनी दोनों पत्नियों के समक्ष अपने मन की बात रखने के लिए तैयार हुए।
श्लोक 24-25
कौसल्या विदुरः क्षत्ता राजा च सह बन्धुभिः। आर्या सत्यवती भीष्मस्ते च राजपुरोहिताः।। 1-124-24a / 1-124-24b ब्राह्मणाश्च महात्मानः सोमपाः संशितव्रताः। पौरवृद्धाश्च ये तत्र निवसन्त्यस्मदाश्रयाः। प्रसाद्य सर्वे वक्तव्याः पाण्डुः प्रव्राजितो वने।। 1-124-25a / 1-124-25b / 1-124-25c
- हिंदी अनुवाद: कौसल्या, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, बान्धव, सत्यवती, भीष्म, पुरोहित, महात्म ब्राह्मण तथा आश्रित पौरवृद्धों को समझाकर यह कह देना कि 'पांडु वन में प्रव्राजित (वानप्रस्थी) हो गए हैं।'
- व्याख्या: पांडु ने हस्तिनापुर के सभी परिजनों और नागरिकों तक अपना संदेश भिजवाने की बात कही।
भाग 2: श्लोक 26 से 51
श्लोक 26
निशम्य वचनं भर्तुस्त्यागधर्मकृतात्मनः। तत्समं वचनं कुन्ती माद्री च समभाषताम्।। 1-124-26a / 1-124-26b
- हिंदी अनुवाद: त्यागधर्म में मन लगाने वाले अपने स्वामी के उस वचन को सुनकर कुंती और माद्री ने भी उनके अनुकूल ही बात कही।
- व्याख्या: दोनों रानियों ने पांडु के फैसले का विरोध नहीं किया, बल्कि उनके साथ चलने का निर्णय लिया।
श्लोक 27
अन्येऽपि ह्याश्रमाः सन्ति ये शक्या भरतर्षभ। आवाभ्यां सह वस्तुं वै धर्ममाश्रित्य चिन्त्यताम्। आवाभ्यां धर्मपत्नीभ्यां सह तप्तुं तपो महत्।। 1-124-27a / 1-124-27b / 1-124-27c
- हिंदी अनुवाद: कुंती और माद्री बोलीं—हे भरतर्षभ! अन्य आश्रम भी हैं जहाँ हम दोनों आपके साथ रह सकती हैं। धर्म का आश्रय लेकर हमारे साथ महान तप करने का विचार कीजिए।
- व्याख्या: दोनों पत्नियों ने आग्रह किया कि वे भी उनके साथ वन में रहकर तपस्या करना चाहती हैं।
श्लोक 28
शरीरस्यापि मोक्षाय धर्मं प्राप्य महाफलम्। त्वमेव भविता भर्ता स्वर्गस्यापि न संशयः।। 1-124-28a / 1-124-28b
- हिंदी अनुवाद: शरीर के मोक्ष और महाफलदायक धर्म को प्राप्त करने में आप ही हमारे स्वर्ग के भी भर्ता (नियतकर्ता) होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है।
- व्याख्या: रानियों ने पांडु को ही अपना सर्वोच्च मार्गदर्शक और धर्म का आधार बताया।
श्लोक 29
प्रणिधायेन्द्रियग्रामं भर्तृलोकपरायणे। त्यक्त्वा कामसुखे ह्यावां तप्स्यवो विपुलं तपः।। 1-124-29a / 1-124-29b
- हिंदी अनुवाद: हम इंद्रियों को वश में करके, पतिलोकपरायण होकर तथा काम-सुखों को त्यागकर विपुल तपस्या करेंगी।
- व्याख्या: कुंती और माद्री ने भी पूर्ण संयम और तपस्या का जीवन जीने की इच्छा जताई।
श्लोक 30
यदि चावां महाप्राज्ञ त्यक्ष्यसि त्वं विशांपते। अद्यैवावां प्रहास्यावो जीवितं नात्र संशयः।। 1-124-30a / 1-124-30b
- हिंदी अनुवाद: हे महाप्राज्ञ विशांपते! यदि आप हम दोनों को छोड़ देंगे, तो हम आज ही अपने प्राण त्याग देंगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
- व्याख्या: दोनों पत्नियों ने स्पष्ट कर दिया कि पति के बिना उनका जीवित रहना असंभव है।
श्लोक 31
पाण्डुरुवाच। 1-124-31x यदि व्यवसितं ह्येतद्युवयोर्धर्मसंहितम्। स्ववृत्तिमनुवर्तिष्ये तामहं पितुरव्ययाम्।। 1-124-31a / 1-124-31b
- हिंदी अनुवाद: पांडु ने कहा—यदि तुम दोनों का यह निश्चय धर्मसंहित है, तो मैं भी अपने पिता की उस अक्षय उत्तम वृत्ति का अनुसरण करूँगा।
- व्याख्या: पांडु ने रानियों के आग्रह को स्वीकार कर लिया और उन्हें अपने साथ वन में रखने का निर्णय लिया।
श्लोक 32
त्यक्त्वा ग्राम्यसुखाहारं तप्यमानो महत्तपः। वल्कली फलमूलाशी चरिष्यामि महावने।। 1-124-32a / 1-124-32b
- हिंदी अनुवाद: ग्राम्य सुख और आहार को त्यागकर, महातप करता हुआ, वल्कल पहनने वाला और फल-मूल खाने वाला बनकर महावन में विचरूँगा।
- व्याख्या: पांडु ने पूर्णतः तपस्वियों जैसा कंद-मूल और वल्कल वस्त्रों वाला जीवन स्वीकार किया।
श्लोक 33
अग्नौ जुह्वन्नुभौ कालावुभौ कालावुपस्पृशन्। कृशः परिमिताहारश्चीरचर्मजटाधरः।। 1-124-33a / 1-124-33b
- हिंदी अनुवाद: दोनों समय अग्नि में आहुति दूँगा, दोनों समय स्नान करूँगा, शरीर से कृश, परिमिताहारी तथा वल्कल (चीर), चर्म और जटा धारण करने वाला बनूँगा।
- व्याख्या: उन्होंने अग्नि-होत्र, नित्य स्नान और जटा-चर्म धारण करने जैसे वानप्रस्थ नियमों का ब्योरा दिया।
श्लोक 34
शीतवातातपसहः क्षुत्पिपासानवेक्षकः। तपसा दुश्चरेणेदं शरीरमुपशोषयन्।। 1-124-34a / 1-124-34b
- हिंदी अनुवाद: शीत, वायु और धूप को सहन करने वाला, क्षुधा-पिपासा की परवाह न करने वाला तथा दुश्चर तपस्या से इस शरीर को सुखाने वाला बनूँगा।
- व्याख्या: शारीरिक कष्टों की परवाह किए बिना केवल तपस्या पर ध्यान केंद्रित करना।
श्लोक 35
एकान्तशीली विमृशन्पक्वापक्वेन वर्तयन्। पितृन्देवांश्च वन्येन वाग्भिरद्भिश्च तर्पयन्।। 1-124-35a / 1-124-35b
- हिंदी अनुवाद: एकांत में रहने वाला, पके या अपके जो भी मिल जाए उससे निर्वाह करने वाला, तथा वन्य पदार्थों, वाणी और जल से पितरों व देवताओं को तृप्त करने वाला बनूँगा।
- व्याख्या: एकांतवास करते हुए देवता और पितरों का पूजन व तर्पण जारी रखना।
श्लोक 36
वानप्रस्थजनस्यापि दर्शनं कुलवासिनः। नाप्रियाण्याचरिष्यामि किं पुनर्ग्रामवासिनाम्।। 1-124-36a / 1-124-36b
- हिंदी अनुवाद: वानप्रस्थ जनों और कुलवासियों को भी कभी प्रिय न लगने वाला आचरण नहीं करूँगा, फिर ग्रामवासियों के लिए तो बात ही क्या है!
- व्याख्या: किसी भी जीव या व्यक्ति को अपने आचरण से कष्ट न पहुँचाने का संकल्प।
श्लोक 37
एवमारण्यशास्त्राणामुग्रमुग्रतरं विधिम्। काङ्क्षमाणोऽहमास्थास्ये देहस्यास्याऽऽसमापनात्।। 1-124-37a / 1-124-37b
- हिंदी अनुवाद: इस प्रकार आरण्यक शास्त्रों के उग्र से उग्रतर विधि की इच्छा करता हुआ मैं इस शरीर के अंत होने तक इसका पालन करूँगा।
- व्याख्या: जीवन के अंतिम क्षण तक वनों के कठिन नियमों का पालन करने की प्रतिबद्धता।
श्लोक 38-40
वैशंपायन उवाच। 1-124-38x इत्येवमुक्त्वा भार्ये ते राजा कौरवनन्दनः। ततश्चूडामणिं निष्कमङ्गदे कुण्डलानि च।। 1-124-38a / 1-124-38b वासांसि च महार्हाणि स्त्रीणामाभरणानि च। वाहनानि च... रत्नानि विविधानि च।। 1-124-39a से 1-124-40b
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—अपनी पत्नियों से ऐसा कहकर कौरवनन्दन राजा ने चूड़ामणि, निष्क, अंगद, कुंडल, महार्ह वस्त्र, स्त्री-आभूषण, वाहन, शस्त्र, कवच, स्वर्णपात्र, पर्यंक, मणि, प्रवाल और विविध रत्न—सब कुछ त्याग दिया।
- व्याख्या: पांडु ने अपने समस्त राजसी आभूषण, वस्त्र और बहुमूल्य रत्न त्याग दिए।
श्लोक 41
प्रदाय सर्वं विप्रेभ्यः पाण्डुर्भृत्यानभाषत। गत्वा नागपुरं वाच्यं पाण्डुः प्रव्राजितो vne...।। 1-124-41a / 1-124-41c
- हिंदी अनुवाद: वह सब कुछ ब्राह्मणों को दान करके पांडु ने भृत्यों से कहा—'नागपुर (हस्तिनापुर) जाकर कह देना कि पांडु वन में प्रव्राजित हो गए हैं।'
- व्याख्या: राजपाठ और धन का दान कर सेवकों को हस्तिनापुर संदेश देने के लिए भेजा गया।
श्लोक 42
प्रतस्थे सर्वमुत्सृज्य सभार्यः कुरुनन्दनः। ततस्तस्यानुयातारस्ते चैव परिचारकाः।। 1-124-42a / 1-124-42b
- हिंदी अनुवाद: सब कुछ त्यागकर कुरुनन्दन पांडु अपनी पत्नियों के साथ प्रस्थान कर गए। तब उनके अनुयायी और परिचारक (सेवक)...
- व्याख्या: पांडु अपनी दोनों पत्नियों के साथ वनों की ओर चल पड़े।
श्लोक 43-44
श्रुत्वा भरतसिंहस्य विधिधाः करुणा गिरः। भममार्तस्वरं कृत्वा हाहेति परिचुक्रुशुः।। 1-124-43a / 1-124-43b उष्णमश्रु विमुञ्चन्तस्तं विहाय महीपतिम्। ययुर्नागपुरं तूर्णं सर्वमादाय तद्धनम्।। 1-124-44a / 1-124-44b
- हिंदी अनुवाद: भरतसिंह पांडु की करुण बातें सुनकर सेवकों ने 'हा! हा!' करके आर्त स्वर में विलाप किया। गर्म आँसू बहाते हुए उस महीपति को छोड़कर वे सारा धन लेकर शीघ्र नागपुर लौट गए।
- व्याख्या: सेवक पांडु की इस दशा पर फूट-फूट कर रोए और दिए गए धन को लेकर हस्तिनापुर लौट आए।
श्लोक 45-47
ते गत्वा नगरं राज्ञो यथावृत्तं महात्मनः। कथयांचक्रिरे राज्ञस्तद्धनं विविधं ददुः।। 1-124-45a / 1-124-45b श्रुत्वा तेभ्यस्ततः सर्वं यथावृत्तं महावने। धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठः पाण्डुमेवान्वशोचत।। 1-124-46a / 1-124-46b न शय्यासनभोगेषु रतिं विन्दति कर्हिचित्। भ्रातृशोकसमाविष्टस्तमेवार्थं विचिन्तयन्।। 1-124-47a / 1-124-47b
- हिंदी अनुवाद: नगर में पहुँचकर उन्होंने राजा धृतराष्ट्र को सब हाल कह सुनाया और वह धन दे दिया। वह सब सुनकर धृतराष्ट्र भाई के शोक में डूब गए और पांडु का ही चिंतन करने लगे। वे शय्या, आसन या भोगों में कभी सुख नहीं पाते थे।
- व्याख्या: हस्तिनापुर पहुँचकर सेवकों ने धृतराष्ट्र को घटना बताई, जिससे धृतराष्ट्र अत्यधिक दुःखी और शोकाकुल हो गए।
श्लोक 48
राजपुत्रस्तु कौरव्य पाण्डुर्मूलफलाशनः। जगाम सह पत्नीभ्यां ततो नागशतं गिरिम्।। 1-124-48a / 1-124-48b
- हिंदी अनुवाद: इधर राजपुत्र कौरव्य पांडु मूल-फलाहारी होकर अपनी दोनों पत्नियों के साथ नागशत (हिमालय) पर्वत की ओर चले गए।
- व्याख्या: पांडु अपनी पत्नियों के साथ हिमालय के दुर्गम पर्वतीय क्षेत्रों की ओर बढ़ चले।
श्लोक 49-50
स चैत्ररथमासाद्य कालकूटमतीत्य च। हिमवन्तमतिक्रम्य प्रययौ गन्धमादनम्।। 1-124-49a / 1-124-49b रक्ष्यमाणो महाभूतैः सिद्धैश्च परमर्षिभिः। उवास स महाराज समेषु विषमेषु च।। 1-124-50a / 1-124-50b
- हिंदी अनुवाद: वे चैत्ररथ वन और कालकूट को पार कर, हिमालय को लांघकर गन्धमादन पर्वत पर पहुँचे। महाभूतों, सिद्धों और परमर्षियों द्वारा रक्षित सम तथा विषम स्थानों में महाराज पांडु निवास करने लगे।
- व्याख्या: पांडु ने विभिन्न पवित्र और दिव्य वनों तथा पर्वतों को पार करते हुए गन्धमादन क्षेत्र में निवास किया।
श्लोक 51
इन्द्रद्युम्नसरः प्राप्य हंसकूटमतीत्य च। शतशृङ्गे महाराज तापसः समतप्यत।। 1-124-51a / 1-124-51b
- हिंदी अनुवाद: इन्द्रद्युम्न सर पर पहुँचकर और हंसकूट को लांघकर, हे महाराज! वे शतशृंग पर्वत पर एक तापसी की भाँति तपस्या करने लगे।
- व्याख्या: अंततः पांडु ने हिमालय के 'शतशृंग पर्वत' को अपना आश्रय बनाया और वहीं कठोर तपस्या करने लगे।
