महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 143वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1, 2 और 3
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ततो धनञ्जयं द्रोणः स्मयमानोऽभ्यभाषत। त्वयेदानीं प्रहर्तव्यमेतल्लक्ष्यं विलोक्यताम्।। (1-143-1) मद्वाक्यसमकालं ते मोक्तव्योऽत्र भवेच्छरः। वितत्य कार्मुकं पुत्र तिष्ठ तावन्मुहूर्तकम्।। (1-143-2) एवमुक्तः सव्यसाची मण्डलीकृतकार्मुकः। तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः।। (1-143-3)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—इसके बाद द्रोणाचार्य मुस्कुराते हुए धनंजय (अर्जुन) से बोले—"अब तुम्हें प्रहार करना है, तुम इस लक्ष्य को अच्छी तरह देख लो।" (1-143-1) "हे पुत्र! मेरे बोलने के साथ ही तुम्हारा बाण छूट जाना चाहिए। तुम अभी अपना धनुष तानकर एक मुहूर्त के लिए इसी प्रकार खड़े रहो।" (1-143-2) गुरु के ऐसा कहने पर, दोनों हाथों से समान रूप से बाण चलाने वाले सव्यसाची अर्जुन ने गुरु के वचनों से प्रेरित होकर अपने धनुष को पूर्ण मंडल (गोलाकार) की तरह तान लिया और उस पक्षी (भास) को लक्ष्य करके खड़े हो गए। (1-143-3)
- व्याख्या: अन्य सभी शिष्यों के असफल होने के बाद, द्रोण ने अर्जुन को अपनी अद्वितीय एकाग्रता और कौशल दिखाने का अवसर दिया। अर्जुन ने तुरंत आज्ञा पाकर धनुष को पूरी तरह तान लिया।
श्लोक 4, 5 और 6
श्लोक:
मुहूर्तादिव तं द्रोणस्तथैव समभाषत। पश्यस्येनं स्थितं भासं द्रुमं मामपि चार्जुन।। (1-143-4) पश्याम्येकं भासमिति द्रोणं पार्थोऽभ्यभाषत। न तु वृक्षं भवन्तं वा पश्यामीति च भारत।। (1-143-5) ततः प्रीतमना द्रोणो मुहूर्तादिव तं पुनः। प्रत्यभाषत दुर्धर्षः पाण्डवानां महारथम्।। (1-143-6)
- हिंदी अनुवाद: कुछ ही क्षणों बाद द्रोण ने अर्जुन से वैसे ही प्रश्न किया—"हे अर्जुन! क्या तुम इस वृक्ष पर बैठे हुए भास (पक्षी) को, इस पेड़ को और मुझे भी देख रहे हो?" (1-143-4) हे भारत (जनमेजय)! पार्थ अर्जुन ने द्रोण को उत्तर दिया—"मैं केवल एकमात्र उस भास (पक्षी) को ही देख रहा हूँ; न तो इस वृक्ष को देख रहा हूँ और न ही आपको देख रहा हूँ।" (1-143-5) तब अजेय और प्रीतमना द्रोण ने कुछ क्षणों के बाद पाण्डवों के उस महारथी अर्जुन से फिर कहा— (1-143-6)
- व्याख्या: अर्जुन की एकाग्रता इतनी गहरी थी कि उनका पूरा ध्यान केवल और केवल अपने लक्ष्य (पक्षी की आँख या सिर) पर केंद्रित था, संसार की अन्य वस्तुएँ उनकी चेतना से ओझल हो चुकी थीं।
श्लोक 7, 8, 9 और 10
श्लोक:
भासं पश्यसि यद्येनं तथा ब्रूहि पुनर्वचः। शिरः पश्यामि भासस्य न गात्रमिति सोऽब्रवीत्।। (1-143-7) अर्जुनेनैवमुक्तस्तु द्रोणो हृष्टतनूरुहः। मुञ्चस्वेत्यब्रवीदर्थं स मुमोचाविचारयन्।। (1-143-8) ततस्तस्य गस्थस्य क्षुरेण निशितेन च। शिर उत्कृत्य तरसा पातयामास पाण्डवः।। (1-143-9) तस्मिन्कर्मणि संसिद्धे पर्यष्वजत पाण्डवम्। मेने च द्रुपदं सङ्ख्ये सानुबन्धं पराजितम्।। (1-143-10)
- हिंदी अनुवाद: "यदि तुम इस पक्षी को देख रहे हो, तो अपनी बात फिर से ठीक-ठीक बताओ।" तब अर्जुन ने उत्तर दिया—"मैं इस पक्षी का केवल सिर देख रहा हूँ, इसका शरीर नहीं।" (1-143-7) अर्जुन के ऐसा कहने पर द्रोण का रोम-रोम हर्ष से पुलकित हो उठा। उन्होंने अर्जुन से कहा—"बाण छोड़ो!" और अर्जुन ने बिना किसी एक पल की भी देरी या विचार के तुरंत बाण छोड़ दिया। (1-143-8) तब पाण्डुपुत्र अर्जुन ने अपने तीखे क्षुरार (खुर के आकार वाले पैने बाण) से वेगपूर्वक उस लक्ष्य का सिर काटकर नीचे गिरा दिया। (1-143-9) उस कार्य के पूर्ण होने पर द्रोण ने पाण्डव अर्जुन को गले से लगा लिया और मन-ही-मन मान लिया कि संग्राम में सगे-सम्बन्धियों सहित राजा द्रुपद उनके द्वारा पराजित हो चुके हैं। (1-143-10)
- व्याख्या: अर्जुन की इस सफलता से द्रोण अत्यधिक संतुष्ट हुए क्योंकि उन्हें विश्वास हो गया कि अर्जुन उनकी प्रतिज्ञा (द्रुपद को हराने की) को अवश्य पूरा करेंगे।
श्लोक 11, 12, 13 और 14
श्लोक:
कस्य चित्त्वथ कालस्य सशिष्योऽङ्गिरसां वरः। जगाम गङ्गामभितो मज्जितुं भरतर्षभ।। (1-143-11) अवगाढमथो द्रोणं सलिले सलिलेचरः। ग्राहो जग्राह बलवाञ्जङ्घान्ते कालचोदितः।। (1-143-12) स समर्थोऽपि मोक्षाय शिष्यान्सर्वानचोदयत्। ग्राहं हत्वा तु मोक्ष्यध्वं मामिति त्वरयन्निव।। (1-143-13) तद्वाक्यसमकालं तु बीभत्सुर्निशितैः शरैः। अवार्यैः पञ्चभिर्ग्राहं मग्नमम्भस्यताडयत्।। (1-143-14)
- हिंदी अनुवाद: हे भरतर्षभ! तदनंतर कुछ समय बीतने पर अङ्गिरा वंश में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य शिष्यों के साथ गंगा जी में स्नान करने के लिए गए। (1-143-11) जब द्रोण जल के अंदर उतरे हुए थे, उसी समय काल से प्रेरित एक बलवान जलचर ग्राह (मगरमच्छ) ने आकर उनकी जंघा को पकड़ लिया। (1-143-12) यद्यपि द्रोण स्वयं उस ग्राह से छूटने में पूरी तरह समर्थ थे, फिर भी उन्होंने अपने सभी शिष्यों को यह देखने के लिए प्रेरित किया कि वे संकट के समय क्या करते हैं; मानो वे जल्दी से यह कह रहे हों—"इस ग्राह को मारकर मुझे छुड़ाओ!" (1-143-13) द्रोण के मुँह से वे शब्द निकलते ही, उनके बोलते-बोलते ही बीभत्सु (अर्जुन) ने जल के भीतर छिपे उस ग्राह पर अपने पाँच अजेय और पैने बाणों से प्रहार कर दिया। (1-143-14)
- व्याख्या: यह द्रोण द्वारा ली गई शिष्यों की एक और व्यावहारिक परीक्षा थी, जिसमें यह देखना था कि संकट के क्षण में कौन सा शिष्य गुरु की रक्षा के लिए तुरंत आगे आता है।
श्लोक 15, 16 और 17
श्लोक:
इतरे त्वथ संमूढास्तत्रपत्र प्रपेदिरे। तं तु दृष्ट्वा क्रियोपेतं द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम्।। (1-143-15) विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत्तदा। स पार्थबाणैर्बहुधा खण्डशः परिकल्पितः।। (1-143-16) ग्राहः पञ्चत्वमापेदे जङ्घां त्यक्त्वा महात्मनः। सर्वक्रियाभ्यनुज्ञानात्तथा शिष्यान्समानयत्।। (1-143-17)
- हिंदी अनुवाद: अन्य सभी शिष्य तो उस समय चकित होकर अस्त्रहीन या स्तब्ध खड़े रह गए। परंतु अर्जुन के उस उचित और त्वरित कर्म को देखकर द्रोण ने समझ लिया कि अर्जुन सभी शिष्यों में सबसे विशिष्ट और श्रेष्ठ हैं, और वे बहुत प्रसन्न हुए। (1-143-15, 16) अर्जुन के तीखे बाणों द्वारा टुकड़े-टुकड़े किया गया वह ग्राह महात्मा द्रोण की जंघा को छोड़कर मृत्यु को प्राप्त हो गया (मारा गया)। तदनंतर द्रोण ने सभी प्रकार की अस्त्र-विद्या की पूर्णता की अनुमति देते हुए अपने सभी शिष्यों को फिर से एकसाथ बुलाया। (1-143-17)
- व्याख्या: अर्जुन ने अपनी तत्परता और अचूक निशानेबाजी से मगरमच्छ का वध कर गुरु के प्राण बचाए, जिससे द्रोण का उनके प्रति स्नेह और अधिक बढ़ गया।
श्लोक 18, 19, 20 और 21
श्लोक:
दुर्योधनं चित्रसेनं दुःशासनविविंशती। अर्जुनं च समानीय ह्यश्वत्थामानमेव च।। (1-143-18) शिशुकं मृण्मयं कृत्वा द्रोणो गङ्गाजले ततः। शिष्याणां पश्यतां चैव क्षिपति स्म महाभुजः।। (1-143-19) चक्षुषी वाससा चैव बद्ध्वा प्रादाच्छरासनम्। शिशुकं विद्ध्यतेमं वै जलस्थं बद्धचक्षुषः।। (1-243-20 / संदर्भाधारित 1-143-20) तत्क्षणेनैव बीभत्सुरावापैर्दशभिर्वशी। पञ्चकैरनुविव्याध मग्नं शिशुकमम्भसि।। (1-143-21)
- हिंदी अनुवाद: महाबाहु द्रोण ने दुर्योधन, चित्रसेन, दुःशासन, विविंशति, अर्जुन और अश्वत्थामा—इन सभी प्रमुख शिष्यों को अपने पास बुलाया। (1-143-18) उन्होंने गंगा के जल में मिट्टी का एक पुतला (शिशुक या जलजंतु विशेष) बनवाया और सभी शिष्यों के देखते-देखते उसे जल में फेंक दिया। (1-143-19) फिर शिष्यों की दोनों आँखों को कपड़े से बाँधकर उन्हें धनुष-बाण दिया और कहा—"तुम सब अपनी आँखें बंद करके इस जल के अंदर छिपे हुए शिशुक को अपने बाण से वेधकर दिखाओ।" (1-143-20) उस वशीभूत शिष्यों में बीभत्सु (अर्जुन) ने अपनी अद्भुत कुशलता दिखाते हुए उसी क्षण, बिना आँखों के देखे केवल शब्द और दिशा के अनुमान से, जल में मग्न उस शिशुक को दस और पाँच बाणों से तुरंत विन्धि डाला (छेद डाला)। (1-143-21)
- व्याख्या: द्रोण ने एक बार फिर आँख बंद करके शब्दभेदी बाण चलाने की परीक्षा ली, जिसमें केवल अर्जुन ही पूर्ण रूप से सफल हुए, जो यह सिद्ध करता था कि वे सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर हैं।
श्लोक 22, 23, 24 और 25
श्लोक:
ताः स दृष्ट्वा क्रियाः सर्वा द्रोणोऽमन्यत पाण्डवम्। विशिष्टं सर्वशिष्येभ्यः प्रीतिमांश्चाभवत्तदा।' तथाब्रवीन्महात्मानं भारद्वाजो महारथम्।। (1-143-22) गृहाणेदं महाबाहो विशिष्टमतिदुर्धरम्। अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम सप्रयोगनिवर्तनम्।। (1-143-23) न च ते मानुषेष्वेतत्प्रयोक्तव्यं कथंचन। जगद्विनिर्दहेदेतदल्पतेजसि पातितम्।। (1-143-24) असामान्यमिदं तात लोकेष्वस्त्रं निगद्यते। तद्धारयेथाः प्रयतः शृणु चेदं वचो मम।। (1-143-25)
- हिंदी अनुवाद: उन सभी क्रियाओं और परीक्षाओं को देखकर द्रोण ने समझ लिया कि अर्जुन सभी शिष्यों में सर्वोपरि विशिष्ट हैं और वे अत्यंत प्रसन्न हुए। तब भारद्वाज (द्रोण) ने उन महारथी महात्मा अर्जुन से प्रेमपूर्वक कहा— (1-143-22) "हे महाबाहु! तुम इस अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट 'ब्रह्मशिर नामक अस्त्र' को ग्रहण करो, जिसे चलाने (प्रयोग) और वापस बुलाने (निवर्तन) दोनों की विधि तुम्हें ज्ञात हो।" (1-143-23) "इस अस्त्र का प्रयोग किसी भी स्थिति में साधारण मनुष्यों पर कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि यह किसी अल्पतेजस्वी (कमजोर या साधारण शत्रु) पर छोड़ दिया जाए, तो यह संपूर्ण जगत को जलाकर भस्म कर सकता है।" (1-143-24) "हे तात! संसार में इस अस्त्र को सबसे असामान्य (अद्भुत व महान) कहा गया है। तुम पूरी पवित्रता और संयम के साथ इसे धारण करना और अब मेरे इस वचन को सुनो—" (1-143-25)
- व्याख्या: अर्जुन की सर्वोच्चता और गुरु-भक्ति से संतुष्ट होकर द्रोण ने उन्हें ब्रह्मांड के सबसे विनाशकारी और शक्तिशाली 'ब्रह्मशिर अस्त्र' की दीक्षा दी, साथ ही इसके प्रयोग को लेकर कड़ी चेतावनी भी दी।
श्लोक 26 और 27 (अध्याय का समापन)
श्लोक:
बाधेतामानुषः शत्रुर्यदि त्वां वीर कश्चन। तद्वधाय प्रयुञ्जीथास्तदस्त्रमिदमाहवे।। (1-143-26) तथेति संप्रतिश्रुत्य बीभत्सुः स कृताञ्जलिः। जग्राह परमास्त्रं तदाह चैनं पुनर्गुरुः। भविता त्वत्समो नान्यः पुमाँल्लोके धनुर्धरः।। (1-143-27)
- हिंदी अनुवाद: "हे वीर! यदि युद्ध के मैदान में कभी कोई अमानुषी (दिव्य या मायावी) शत्रु तुम्हें पीड़ित करे, तभी उसके वध के लिए इस अस्त्र का प्रयोग युद्ध में करना।" (1-143-26) बीभत्सु (अर्जुन) ने हाथ जोड़कर "बहुत अच्छा, आपकी आज्ञा शिरोधार्य है" ऐसा कहकर उस परमास्त्र को स्वीकार कर लिया। तब गुरु द्रोण ने उनसे पुनः कहा—"इस संसार में तुम्हारे समान दूसरा कोई भी पुरुष धनुर्धर नहीं होगा।" (1-143-27)
- व्याख्या: इस प्रकार द्रोण ने अर्जुन को अस्त्र-विद्या के सर्वोच्च शिखर पर स्थापित कर दिया और उन्हें इस बात का पूर्ण आशीर्वाद दिया कि वे संसार के अद्वितीय धनुर्धर बनेंगे।
