श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 144वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 1, 2 और 3

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। कृतास्त्रान्धार्तराष्ट्रांश्च पाण्डुपुत्रांश्च भारत। दृष्ट्वा द्रोणोऽब्रवीद्राजन्धृतराष्ट्रं जनेश्वरम्।। (1-144-1) कृपस्य सोमदत्तस्य वाह्लीकस्य च धीमतः। गाङ्गेयस्य च सान्निध्ये व्यासस्य विदुरस्य च।। (1-144-2) राजन्संप्राप्तविद्यास्ते कुमाराः कुरुसत्तम। ते दर्शयेयुः स्वां शिक्षां राजन्ननुमते तव।। (1-144-3)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे भारत (जनमेजय)! धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों) और पाण्डुपुत्रों को अस्त्र-विद्या में पूर्ण रूप से निपुण हुआ देखकर, द्रोणाचार्य ने राजाधिराज धृतराष्ट्र से कहा। आचार्य कृप, सोमदत्त, बुद्धिमान वाह्लीक, गंगापुत्र भीष्म, महर्षि व्यास और विदुर जी की उपस्थिति में द्रोण ने कहा—"हे राजन! कुरुसत्तम! ये सभी राजकुमार अब विद्या प्राप्त कर चुके हैं। यदि आपकी अनुमति हो, तो ये अपनी अस्त्र-विद्या का प्रदर्शन (कौशल) यहाँ जनता के सामने करें।"
  • व्याख्या: राजकुमारों की शिक्षा पूरी होने के बाद, द्रोण ने हस्तिनापुर के सम्राट धृतराष्ट्र और अन्य वरिष्ठ जनों के समक्ष उनकी कला के सार्वजनिक प्रदर्शन की अनुमति माँगी।

श्लोक 4, 5, 6 और 7

श्लोक:

ततोऽब्रवीन्महाराजः प्रहृष्टेनान्तरात्मना। धृतराष्ट्र उवाच। भारद्वाज महत्कर्म कृतं ते द्विजसत्तम।। (1-144-4) यदानुमन्यसे कालं यस्मिन्देशे यथायथा। तथातथा विधानाय स्वयमाज्ञापयस्व माम्।। (1-144-5) स्पृहयाम्यद्य निर्वेदान्पुरुषाणां सचक्षुषाम्। अस्त्रहेतोः पराक्रान्तान्ये मे द्रक्ष्यन्ति पुत्रकान्।। (1-144-6) क्षत्तर्यद्गुरुराचार्यो ब्रवीति कुरु तत्तथा। न हीदृशं प्रियं मन्ये भविता धर्मवत्सल।। (1-144-7)

  • हिंदी अनुवाद: तब महाराज धृतराष्ट्र ने अत्यंत प्रसन्न अंतःकरण से कहा—हे द्विजसत्तम भारद्वाज! आपने बहुत बड़ा कार्य किया है। आप जिस समय, जिस स्थान पर और जिस प्रकार इस प्रदर्शन की व्यवस्था करना उचित समझें, उसके लिए स्वयं मुझे आज्ञा दीजिए। अस्त्र-विद्या के लिए पराक्रम दिखाने वाले मेरे इन पुत्रों को आज जो लोग अपनी आँखों से देखेंगे, मैं उन नेत्रों वाले पुरुषों के भाग्य की सराहना करता हूँ (इच्छा करता हूँ)। हे क्षत्तः (विदुर)! गुरु आचार्य जो कुछ कहें, उसके अनुसार सारा प्रबंध करो। हे धर्मवत्सल! इससे बढ़कर मेरे लिए और कोई प्रिय बात नहीं हो सकती।
  • व्याख्या: धृतराष्ट्र राजकुमारों की सफलता पर अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने विदुर को निर्देश दिया कि आचार्य द्रोण की इच्छा के अनुसार रंगभूमि और प्रदर्शन की सभी तैयारियाँ पूरी निष्ठा से की जाएँ।

श्लोक 8, 9, 10, 11 और 12

श्लोक:

ततो राजानमामन्त्र्य विदुरानुमतोपि हि। भारद्वाजो महाप्राज्ञो मापयामास मेदिनीम्।। (1-144-8) समामवृक्षां निर्गुलमामुदक्प्रवणसंस्थिताम्। तस्यां भूमौ बलिं चक्रे तिथौ नक्षत्रपूजिते।। (1-144-9) अवघुष्टं पुरं चापि तदर्थं भरतर्षभ। रङ्गभूमौ सुविपुलं शास्त्रदृष्टं यथाविधि।। (1-144-10) प्रेक्षागारं सुविहितं चक्रस्ते तस्य शिल्पिनः। रक्षां सर्वायुधोपेतां स्त्रीणां चैव नरर्षभ।। (1-144-11) मञ्चांश्च कारयामासुर्यत्र जानपदा जनाः। विपुलानुच्छ्रयोपेताञ्शिबिकाश्च महाधनाः।। (1-144-12)

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद महाप्राज्ञ भारद्वाज (द्रोण) ने राजा की अनुमति लेकर और विदुर जी की सहमति से अस्त्र-प्रदर्शन के लिए एक समतल भूमि का माप करवाया। वह भूमि ऊँचे पेड़ों और झाड़ियों से रहित तथा उत्तर दिशा की ओर ढलान वाली थी। उस शुभ तिथि और नक्षत्र में उन्होंने उस भूमि पर वास्तु पूजन एवं बलि दी। हे भरतर्षभ! इसके लिए पूरे नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया गया। शिल्पकारों ने शास्त्रोक्त विधि से रंगभूमि में एक अत्यंत विशाल प्रेक्षागार (दर्शक दीर्घा) का निर्माण किया। हे नरर्षभ! उस प्रेक्षागार में स्त्रियों के बैठने के लिए सभी प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों से सुरक्षित विशेष प्रबंध किया गया। साथ ही, वहाँ जनसाधारण (नगरवासियों) के बैठने के लिए ऊँचे-ऊँचे और भव्य मञ्च तथा बहुमूल्य तंबू आदि बनवाए गए।
  • व्याख्या: आचार्य द्रोण ने शास्त्र सम्मत विधि से रंगभूमि का चयन कर वहाँ दर्शकों, महिलाओं और विशिष्ट अतिथियों के बैठने के लिए भव्य और सुरक्षित दीर्घाओं का निर्माण करवाया।

श्लोक 13, 14, 15 और 16

श्लोक:

तस्मिंस्ततोऽहनि प्राप्ते राजा ससचिवस्तदा। भीष्मं प्रमुखतः कृत्वा कृपं चाचार्यसत्तमम्।। (1-144-13) कुरूनन्यांश्च सचिवानादाय नगराद्बहिः। रङ्गभूमिं समासाद्य ब्राह्मणैः सहितो नृपः।। (1-144-14, 15) मुक्ताजालपरिक्षिप्तं वैदूर्यममिशोभितम्। शातकुम्भमयं दिव्यं प्रेक्षागारमुपागमत्।। (1-144-16)

  • हिंदी अनुवाद: तदनंतर वह निश्चित दिन आने पर, राजा धृतराष्ट्र अपने मंत्रियों, अंतःपुर के लोगों और सचिवों के सहित, तथा भीष्म जी और आचार्य कृप को सबसे आगे करके वहाँ पहुँचे। बाहْلীক, सोमदत्त, भूरिश्रवा तथा अन्य कुरुवंशी मंत्रियों को साथ लेकर राजा ब्राह्मणों के सहित नगर से बाहर रंगभूमि में आए। मोतियों के जालों से घिरे हुए, वैदूर्य मणियों से सुशोभित और शुद्ध स्वर्ण (शातकुम्भ) से बने हुए उस दिव्य प्रेक्षागार में वे प्रविष्ट हुए।
  • व्याख्या: प्रदर्शन के दिन राजा धृतराष्ट्र, भीष्म, कृप और अन्य प्रतिष्ठित कुरुवंशी व पुरवासी स्वर्ण और मणियों से सुसज्जित भव्य प्रेक्षागार में पधारे।

श्लोक 17, 18, 19 और 20

श्लोक:

गान्धारी च महाभागा कुन्ती च जयतां वर। स्त्रियश्च राज्ञः सर्वास्ताः सप्रेष्याः सपरिच्छदाः।। (1-144-17) हर्षादारुरुहुर्मञ्चान्मेरुं देवस्त्रियो यथा। ब्राह्मणक्षत्रियाद्यं च चातुर्वर्ण्यं पुराद्द्रुतम्।। (1-144-18) दर्शनोप्सुः समभ्यागात्कुमाराणां कृतास्त्रताम्। क्षणेनैकस्थतां तत्र दर्शनोप्सुर्जगाम ह।। (1-144-19) प्रवादितैश्च वादित्रैर्जनकौतूहलेन च। महार्णव इव क्षुब्धः समाजः सोऽभवत्तदा।। (1-144-20)

  • हिंदी अनुवाद: हे जयियों में श्रेष्ठ (जनमेजय)! महाभागा गांधारी, कुंती तथा राजा की अन्य सभी रानियाँ अपनी दासियों और साज-सज्जा के साथ हर्षपूर्वक मञ्चों पर इस प्रकार चढ़ गईं, जैसे देवस्त्रियाँ सुमेरु पर्वत पर चढ़ती हैं। नगर के ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि चारों वर्णों के लोग राजकुमारों की अस्त्र-विद्या देखने की तीव्र इच्छा से तुरंत दौड़ पड़े और क्षणभर में ही वह पूरा परिसर दर्शकों की भीड़ से भर गया। तरह-तरह के बाजे-गाजे बजाए जाने और लोगों के भारी कौतुहल के कारण उस समय वह समाज क्षुब्ध महासागर (उछलते हुए समुद्र) के समान प्रतीत हो रहा था।
  • व्याख्या: राजपरिवार की महिलाओं सहित नगर के चारों वर्णों के लोग उस ऐतिहासिक अस्त्र-प्रदर्शन को देखने के लिए भारी उत्साह के साथ रंगभूमि में एकत्र हुए, जिससे वहाँ का वातावरण समुद्र जैसा उमड़-घुमड़ रहा था।

श्लोक 21, 22, 23 और 24

श्लोक:

ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लयज्ञोपवीतवान्। शुक्लकेशः सितश्मश्रुः शुक्लाल्यानुलेपनः।। (1-144-21) रङ्गमध्यं तदाचार्यः सपुत्रः प्रविवेश ह। नभो जलधरैर्हीनं साङ्गारक इवांशुमान्।। (1-144-22) व्यासस्यानुमते चक्रे बलिं बलवतां वरः। ब्राह्मणांस्तु सुमन्त्रज्ञान्कारयामास मङ्गलम्।। (1-144-23) प्रददौ दक्षिणां राजा द्रोणाय च कृपाय च।। (1-144-24)

  • हिंदी अनुवाद: तदनंतर श्वेत वस्त्र धारण किए, श्वेत यज्ञोपवीत पहने, सफेद बालों और सफेद दाढ़ी वाले तथा श्वेत चंदन व सुगंधित लेप लगाए हुए आचार्य द्रोण अपने पुत्र अश्वत्थामा के साथ रंगभूमि के बीचों-बीच प्रविष्ट हुए। वे ऐसे शोभा पा रहे थे, मानो बादलों से रहित आकाश में अंगारकों (मंगल ग्रह) सहित सूर्य चमक रहे हों। बलवानों में श्रेष्ठ द्रोण ने व्यास जी की अनुमति से वास्तु बलि दी और मन्त्रों के ज्ञाता ब्राह्मणों से मंगल पाठ करवाया। राजा धृतराष्ट्र ने द्रोण और कृप को प्रचुर मात्रा में सुवर्ण, मणि, रत्न और भाँति-भाँति के वस्त्र दक्षिणा के रूप में प्रदान किए।
  • व्याख्या: श्वेत वेशभूषा और तेज से परिपूर्ण आचार्य द्रोण अपने पुत्र के साथ रंगभूमि में पधारे, जहाँ विधिवत मंगलपाठ और गुरुओं का सत्कार किया गया।

श्लोक 25, 26, 27, 28, 29 और 30

श्लोक:

सुपुण्याहघोषस्य पुण्यस्य समनन्तरम्। विविसुर्विविधं गृह्य शस्त्रोपकरणं नराः।। (1-144-25) ततो बद्धाङ्गुलित्राणा बद्धकक्ष्या महारथाः। बद्धथूणाः सधनुषो विविशुर्भरतर्षभाः।। (1-144-26) रङ्गमध्ये स्थितं द्रोणमभिवाद्य नरर्षभाः। चक्रुः पूजां यथान्यायं द्रोणस्य च कृपस्य च।। (1-144-27) आशीर्भिश्च प्रयुक्ताभिः सर्वे संहृष्टमानसाः। अभिवाद्य पुनः शस्त्रान्बलिपुष्पैः समर्चितान्।। (1-144-28) रक्तचन्दनसंमिश्रैः स्वयमर्चन्ति कौरवाः। रक्तचन्दनदिग्धाश्च रक्तमाल्यानुधारिणः।। (1-144-29) सर्वे रक्तपताकाश्च सर्वे रक्तान्तलोचनाः। द्रोणेन समनुज्ञाता गृह्य शस्त्रं परन्तपाः।। (1-144-30)

  • हिंदी अनुवाद: पवित्र पुण्याहवाचन और मंत्रघोष के तुरंत बाद, लोग विभिन्न प्रकार के शस्त्र और उपकरण लेकर रंगभूमि में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात हाथों में अंगुलित्राण (दस्ताने/कवर) बाँधे, कमर कसे, पीठ पर तरकस टाँगे और धनुष धारण किए हुए भरतर्षभ (कौरव-पाण्डव महारथी) वहाँ उतरे। रंगभूमि के बीच में खड़े आचार्य द्रोण का अभिवादन करके उन नरश्रेष्ठों ने द्रोण और कृप जी की यथानियम पूजा की। गुरुओं के आशीर्वाद से सबके मन प्रसन्न हो गए। इसके बाद उन कौरव-पाण्डव वीरों ने लाल चंदन और पुष्पों से पूजित अपने अस्त्रों को प्रणाम किया। वे सभी वीर स्वयं भी शरीर पर लाल चंदन का लेप लगाए हुए थे, लाल मालाएँ पहने हुए थे, उनके फहराते हुए झंडे भी लाल रंग के थे और उनके नेत्र भी उत्साह से लाल हो रहे थे। द्रोण की अनुमति पाकर शत्रुओं को संताप देने वाले वे वीर अस्त्र लेकर आगे बढ़े।
  • व्याख्या: सभी राजकुमार रंगभूमि में पूर्ण युद्ध-सज्जा के साथ उतरे। उन्होंने गुरुओं का आशीर्वाद लेकर अपने लाल रंग के प्रतीकों (चंदन, माला, पताका) के साथ अस्त्र-शस्त्रों की पूजा की और प्रदर्शन के लिए तैयार हुए।

श्लोक 31, 32, 33, 34 और 35

श्लोक:

धनूंषि पूर्व संगृह्य तप्तकाञ्चनभूषिताः। सज्यानि विविधाकाराः शरैः सन्धाय कौरवा।। (1-144-31) ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यमोहयत।। (1-144-32) अनुज्येष्ठं च ते तत्र युधिष्ठिरपुनरोगमाः। चक्रुरस्त्रं महावीर्याः कुमाराः परमाद्भुतम्।। (1-144-33) केषांचित्तत्र माल्येषु शरा निपतिता नृप। केषांचित्पुष्पमुकुटे निपतन्ति स्म सायकाः।। (1-144-34) केचिल्लक्ष्याणि विविधैर्बाणैराहितलक्षणैः। बिभिदुर्लाघवोत्सृष्टैर्गुरूणि च लघूनि च।। (1-144-35)

  • हिंदी अनुवाद: पहले उन्होंने तपाये हुए स्वर्ण से भूषित अपने-अपने सुंदर धनुषों को उठाया, उनमें प्रत्यंचा (ज्ये) चढ़ाई और बाणों का संधान किया। उन्होंने धनुष की प्रत्यंचा की टंकार और हाथों की थाप (तलघोष) से वहाँ उपस्थित सभी प्राणियों को चकित कर दिया। महावीर्यवान वे राजकुमार युधिष्ठिर को आगे करके अपनी आयु और ज्येष्ठता के क्रम से रंगभूमि में परम अद्भुत अस्त्र-कौशल दिखाने लगे। हे नृप (जनमेजय)! उनमें से कुछ वीरों के बाणों ने (निशाने पर इस प्रकार प्रहार किया कि वे लक्ष्य के रूप में रखे गए) फूलों की मालाओं को काट दिया, तो कुछ के बाण पुष्पमुकुटों पर जा गिरे। कई राजकुमारों ने अपनी फुर्ती (लाघव) से छोड़े गए विभिन्न बाणों द्वारा छोटे-बड़े विभिन्न प्रकार के लक्ष्यों को खंड-खंड कर दिया।
  • व्याख्या: राजकुमारों ने अपने धनुषों की टंकार से दर्शकों को मुग्ध कर दिया और ज्येष्ठानुसार क्रमबद्ध होकर अपनी असाधारण तीरंदाजी और निशानेबाजी का शानदार प्रदर्शन किया।

श्लोक 36, 37, 38 और 39

श्लोक:

केचिच्छराक्षेपभयाच्छिरांस्यवननामिरे। मनुजा धृष्टमपरे वीक्षाञ्चक्रुः सुविस्मिताः।। (1-144-36) ते स्म लक्ष्याणि बिभिदुर्बाणैर्नामाङ्कशोभितैः। विविधैर्लाघवोत्सृष्टैरुह्यन्तो वाजिभिर्द्रुतम्।। (1-144-37) तत्कुमारबलं तत्र गृहीतशरकार्मुकम्। गन्धर्वनगराकारं प्रेक्ष्य ते विस्मिताभवन्।। (1-144-38) सहसा चुक्रुशुश्चान्ये नराः शतसहस्रशः। विस्मयोत्फुल्लनयनाः साधुसाध्विति भारत।। (1-144-39)

  • श्लोक अनुवाद: तीरों के तेजी से आने के भय से कुछ दर्शक अपने सिर झुका लेते थे, तो कुछ साहसी लोग अत्यंत विस्मित होकर उस दृश्य को टकटकी लगा कर देखते थे। वे राजकुमार घोड़ों पर तेजी से दौड़ते हुए अपनी फुर्ती से विभिन्न प्रकार के लक्ष्यों को अपने नाम के अंकों से अंकित बाणों द्वारा भेद रहे थे। हाथ में धनुष-बाण थामे हुए उस राजकुमारों की सेना के कौशल को देखकर ऐसा प्रतीत होता था मानो कोई 'गन्धर्वनगर' (मायावी नगर) प्रकट हो गया हो, जिसे देखकर सब लोग चकित रह गए। हे भारत! आश्चर्य से खिली हुई आँखों वाले लाखों लोग एक साथ "साधु! साधु!" (बहुत अच्छे!) कहकर अचानक जोर-जोर से चिल्लाने लगे।
  • व्याख्या: राजकुमारों की तीव्र गति, घुड़सवारी पर निशाना साधने की कला और अचूक बाण-संधान को देखकर दर्शक चकित रह गए और चारों ओर प्रशंसा की गूँज उठ उठी।

श्लोक 40, 41 और 42

श्लोक:

कृत्वा धनुषि ते मार्गान्रथचर्यासु चासकृत्। गजपृष्ठेऽश्वपृष्ठे च नियुद्धे च महाबलाः।। (1-144-40) गृहीतखड्गचर्माणस्ततो भूयः प्रहारिणः। त्सरुमार्गान्यथोद्दिष्टांश्चेरुः सर्वासु भूमिषु।। (1-144-41) लाघवं सौष्ठवं शोभां स्थिरत्वं दृढमुष्टिताम्। ददृशुस्तत्र सर्वेषां प्रयोगं खड्गचर्मणोः।। (1-144-42)

  • हिंदी अनुवाद: धनुष-बाण का कौशल दिखाने के बाद, उन महाबली राजकुमारों ने रथ चलाने की कला (रथचर्या), हाथियों की पीठ पर और घोड़ों की पीठ पर तथा मल्लयुद्ध (नियुद्ध) का बार-बार प्रदर्शन किया। इसके बाद हाथों में तलवार और ढाल (खड्ग-चर्म) लेकर वे प्रहार करने वाले वीर सभी दिशाओं और भूमियों पर निर्धारित तलवारबाजी की चालों (त्सरुमार्ग) का अभ्यास करते हुए आगे बढ़े। वहाँ उपस्थित सभी लोगों ने उन सबका हाथ की फुर्ती (लाघव), सुंदर भंगिमा (सौष्टव), शारीरिक शोभा, स्थिरता और मुट्ठी की दृढ़ता के साथ तलवार और ढाल के प्रयोग को अपनी आँखों से देखा।
  • व्याख्या: तीरंदाजी के बाद राजकुमारों ने रथ, हाथी, घोड़े की सवारी के युद्ध कौशल, मल्लयुद्ध और अंत में अत्यंत आकर्षक तलवार-ढाल के संचालन का अद्भुत प्रदर्शन किया।

श्लोक 43, 44, 45 और 46 (अध्याय का समापन)

श्लोक:

अथ तौ नित्यसंहृष्टौ सुयोधनवृकोदरौ। अवतीर्णौ गदाहस्तावेकशृङ्गाविवाचलौ।। (1-144-43) बद्धकक्ष्यौ महाबाहू पौरुषे पर्यवस्थितौ। बृंहन्तौ वासिताहेतोः समदाविव कुञ्जरौ।। (1-144-44) तौ प्रदक्षिणसव्यानि मण्डलानि महाबलौ। चेरतुर्मण्डलगतौ समदाविव कुञ्जरौ।। (1-144-45) विदुरो धृतराष्ट्राय गान्धार्याः पाण्डवारणिः। न्यवेदयेतां तत्सर्वं कुमाराणां विचेष्टितम्।। (1-144-46)

  • हिंदी अनुवाद: तदनंतर सदा प्रसन्न रहने वाले और स्पर्धा करने वाले सुयोधन (दुर्योधन) और वृकोदर (भीमसेन)—ये दोनों महाबाहु वीर हाथ में गदा लिए मैदान में उतरे। वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो दो एक सींग वाले पर्वत हों, या हथिनी के लिए आपस में लड़ने वाले दो मतवाले हाथी हों, जो कमर कसे अपनी पूरी ताकत और पौरुष के साथ आमने-सामने खड़े हों। उन दोनों महाबली वीरों ने घेरे के भीतर चक्कर काटते हुए गदायुद्ध के दक्षिणावर्त और सव्यावर्त (दाएँ-बाएँ) मण्डल (गतियाँ) चलना शुरू कर दिया, मानो दो मतवाले हाथी मण्डल बनाकर घूम रहे हों। विदुर जी ने धृतराष्ट्र को, तथा पाण्डवों की माता (कुंती) और गांधारी ने, राजकुमारों की इस संपूर्ण चेष्टा और कला का सारा विवरण आपस में संवाद करते हुए सुनाया।
  • व्याख्या: रंगभूमि के इस भाग में दुर्योधन और भीम ने हाथ में गदा लेकर मतवाले हाथियों की तरह अपने शक्ति और पराक्रम का रोमांचक गदायुद्ध प्रदर्शन किया, जिसका वर्णन विदुर और राजमाताएँ राजा धृतराष्ट्र को सुना रही थीं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 144 ।।

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