श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 142वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:

श्लोक 1, 2, 3, 4, 5 और 6

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। प्रतिजग्राह तं भीष्मो गुरुं पाण्डुसुतैः सह। पौत्रानादाय तान्सर्वान्वसूनि विविधानि च।। (1-142-1) शिष्य इति ददौ राजन्द्रोणाय विधिपूर्वकम्। तदा द्रोणोऽब्रवीद्वाक्यं भीष्मं बुद्धिमतां वरम्।। (1-142-2) कृपस्तिष्ठति चाचार्यः शस्त्रज्ञः प्राज्ञसंमतः। मयि तिष्ठति चेद्विप्रो वैमनस्यं गमिष्यति।। (1-142-3) युष्मान्किंचिच्च याचित्वा धनं संगृह्य हर्षितः। स्वमाश्रमपदं राजन्गमिष्यामि यथागतम्।। (1-142-4) एवमुक्ते तु विप्रेन्द्रं भीष्मः प्रहरतां वरः। अब्रवीद्द्रोणमाचार्यमुख्यं शस्त्रविदां वरम्।। (1-142-5) कृपस्तिष्ठतु पूज्यश्च भर्तव्यश्च मया सदा। त्वं गुरुर्भव पौत्राणामाचार्यस्त्वं मतो मम। प्रतिगृह्णीष्व पुत्रांस्त्वमस्त्रज्ञान्कुरु वै सदा।। (1-142-6)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—भीष्म जी ने पाण्डुपुत्रों तथा अपने सभी पौत्रों को साथ लेकर और भाँति-भाँति के धन तथा उपहार लेकर विधिपूर्वक द्रोणाचार्य को अपना गुरु स्वीकार किया। तब द्रोण ने बुद्धिमानों में श्रेष्ठ भीष्म से कहा—"आचार्य कृप पहले से ही यहाँ आचार्य पद पर हैं, वे शस्त्रज्ञ और विद्वानों द्वारा संमत हैं। यदि मैं भी आचार्य बन गया, तो वे विप्र वैमनस्य (मनमुटाव या दुःख) को प्राप्त हो जाएंगे। इसलिए हे राजन्! मैं आप लोगों से कुछ धन प्राप्त करके हर्षित मन अपने आश्रम को लौट जाऊँगा।" द्रोण के ऐसा कहने पर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म जी ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मण (द्रोण) से कहा—"कृपजी भी यथावत पूज्य रहेंगे और उनका भरण-पोषण मेरे द्वारा सदा होता रहेगा। परंतु आप ही मेरे पौत्रों के गुरु बनिए, आप ही मेरे मत में मुख्य आचार्य हैं। आप इन बालकों को शिष्य रूप में स्वीकार करें और इन्हें सदा अस्त्र-विद्या में निपुण करें।"
  • व्याख्या: द्रोण की विनम्रता और आचार्य कृप के प्रति सम्मान के भाव को देखकर भीष्म ने स्पष्ट किया कि दोनों ही आदरणीय हैं और द्रोण ही हस्तिनापुर के राजकुमारों को अस्त्र-विद्या सिखाएंगे।

श्लोक 7, 8, 9, 10 और 11

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। ततः संपूजितो द्रोणो भीष्मेण द्विपदां वरः। विशश्राम महातेजाः पूजितः कुरुवेश्मनि।। (1-142-7) विश्रान्तेऽथ गुरौ तस्मिन्पौत्रानादाय कौरवान्। शिष्यत्वेन ददौ भीष्मो वसूनि विविधानि च।। (1-142-8) गृहं च सुपरिच्छन्नं धनधान्यसमाकुलम्। भारद्वाजाय सुप्रीतः प्रत्यपादयत प्रभुः।। (1-142-9) स ताञ्शिष्यान्महेष्वासः प्रतिजग्राह कौरवान्। पाण्डवान्धार्तराष्ट्रान्च द्रोणो मुदितमानसः।। (1-142-10) प्रतिगृह्य च तान्सर्वान्द्रोणो वचनमब्रवीद। रहस्येकः प्रतीतात्मा कृतोपसदनांस्तथा।। (1-142-11)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब मनुष्यों में श्रेष्ठ महातेस्वी द्रोण भीष्म द्वारा भली-भांति पूजित होकर कुरुराज भवन में विश्राम करने लगे। जब गुरु द्रोण विश्राम कर चुके, तब भीष्म जी ने कौरव और पाण्डव सभी पौत्रों को तथा भाँति-भाँति के धन को शिष्यत्व के रूप में उन्हें सौंप दिया। प्रभु भीष्म ने भारद्वाज (द्रोण) के रहने के लिए धन-धान्य से परिपूर्ण और अच्छी प्रकार सुसज्जित एक सुंदर घर बहुत प्रसन्नता के साथ प्रदान किया। महान धनुर्धर द्रोण ने भी प्रसन्न चित्त से पाण्डवों और धृतराष्ट्र के पुत्रों—सभी कौरवों को अपने शिष्यों के रूप में स्वीकार कर लिया। उन सभी शिष्यों को ग्रहण करने के बाद, द्रोण ने एकांत में उन शरणागत शिष्यों से प्रसन्न चित्त होकर यह बात कही—
  • व्याख्या: द्रोण को हस्तिनापुर में सभी सुख-सुविधाओं और आवास से सुसज्जित कर दिया गया, जहाँ उन्होंने दुर्योधन-पाण्डवों समेत सभी राजकुमारों को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया।

श्लोक 12, 13 और 14

श्लोक:

द्रोण उवाच। कार्यं मे काङ्क्षितं किंचिद्धृदि संपरिवर्तते। कृतास्त्रैस्तत्प्रदेयं मे तदेतद्वदतानघाः।। (1-142-12) वैशंपायन उवाच। तच्छ्रुत्वा कौरवेयास्ते तूष्णीमासन्विशांपते। अर्जुनस्तु ततः सर्वं प्रतिजज्ञे परन्तप।। (1-142-13) ततोऽर्जुनं तदा मूर्ध्नि समाघ्राय पुनः पुनः। प्रीतिपूर्वं परिष्वज्य प्ररुरोद मुदा तदा।। (1-142-14)

  • हिंदी अनुवाद: द्रोण ने कहा—"मेरे हृदय में एक विशेष कार्य की अभिलाषा छिपी है। जब तुम लोग अस्त्र-विद्या में पूर्ण रूप से निपुण हो जाओगे, तब तुम्हें वह कार्य मेरे लिए करना होगा। हे अनघाः (पापरहित शिष्यों)! तुम मुझे यह वचन दो।" वैशंपायन जी कहते हैं—हे राजन्! द्रोण की यह बात सुनकर सभी कौरव राजकुमार चुप रह गए, परंतु परंतप अर्जुन ने तुरंत ही उस कार्य को पूरा करने की प्रतिज्ञा कर ली। तब द्रोण ने अत्यंत प्रसन्न होकर बार-बार अर्जुन के मस्तक को सूंघा, स्नेहपूर्वक उसे गले से लगाया और आनंद के मारे उनकी आँखों से प्रेम के आँसू बह निकले (वे प्रफुल्लित हो उठे)।
  • व्याख्या: द्रोण ने अपने मन की प्रतिज्ञा (द्रुपद को बंदी बनाने की इच्छा) पूरी कराने का वचन शिष्यों से माँगा, जिसे केवल अर्जुन ने आगे बढ़कर स्वीकार किया, जिससे द्रोण का अर्जुन के प्रति विशेष स्नेह और प्रगट हो गया।

श्लोक 15, 16 और 17

श्लोक:

अश्वत्थामानमाहूय द्रोणो वचनमब्रवीत्। सखायं विद्धि ते पार्थं मया दत्तः प्रगृह्यताम्।। (1-142-15) साधुसाध्विति तं पार्थः परिष्वज्येदमब्रवीत्। अद्यप्रभृति विप्रेन्द्र परवानस्मि धर्मतः।। (1-142-16) शिष्योऽहं त्वत्प्रसादेन जीवामि द्विजसत्तम। इत्युक्त्वा तु तदा पार्थः पादौ जग्राह पाण्डवः।। (1-142-17)

  • हिंदी अनुवाद: द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा को बुलाकर कहा—"तुम इन पाण्डुपुत्र अर्जुन को अपना मित्र समझो, मैंने इन्हें तुम्हें सौंप दिया है, इन्हें अपना मित्र मानकर स्वीकार करो।" अर्जुन ने "बहुत अच्छा, बहुत अच्छा" कहकर अश्वत्थामा को गले से लगाया और कहा—"हे विप्रेन्द्र! आज से मैं धर्मपूर्वक आपके अधीन (आपकी इच्छा पर निर्भर) हूँ। हे द्विजसत्तम! मैं आपका शिष्य हूँ और आपकी कृपा से ही जीवित रहूँगा।" ऐसा कहकर पाण्डुपुत्र अर्जुन ने द्रोण के चरणों को पकड़ लिया (प्रणाम किया)।
  • व्याख्या: द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा और अर्जुन के बीच गहरी मित्रता स्थापित की, और अर्जुन ने अत्यंत विनीत भाव से द्रोण को अपना गुरु व सर्वस्व मान लिया।

श्लोक 18, 19, 20, 21 और 22

श्लोक:

ततो द्रोणः पाण्डुपुत्रानस्त्राणि विविधानि च। ग्राहयामास दिव्यानि मानुषाणि च वीर्यवान्।। (1-142-18) राजपुत्रास्तथा चान्ये समेत्य भरतर्षभ। अभिजग्मुस्ततो द्रोणमस्त्रार्थे द्विजसत्तमम्।। (1-142-19) वृष्णयश्चान्धकाश्चैव नानादेश्याश्च पार्थिवाः। सूतपुत्रश्च राधेयो गुरुं द्रोणमियात्तदा।। (1-142-20) स्पर्धमानस्तु पार्थेन सूतपुत्रोऽत्यमर्षणः। दुर्योधनं समाश्रित्य सोऽवमन्यत पाण्डवान्।। (1-142-21) अभ्ययात्स ततो द्रोणं धनुर्वेदचिकीर्षया। शिक्षाभुजवलोद्योगैस्तेषु सर्वेषु पाण्डवः।। (1-142-22)

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद वीर द्रोण ने पाण्डुपुत्रों को अनेक प्रकार के दिव्य और मानवीय अस्त्र-शस्त्रों की शिक्षा दी। हे भरतर्षभ! अन्य राजकुमारों तथा विभिन्न देशों के राजाओं, वृष्णि और अन्धक वंश के वीरों के साथ-साथ सूतपुत्र कर्ण (राधेय) ने भी धनुर्वेद सीखने की इच्छा से गुरु द्रोण के पास आकर शरण ली। अर्जुन के साथ ईर्ष्या और स्पर्धा रखने वाला वह अत्यंत क्रोधी सूतपुत्र (कर्ण) दुर्योधन का आश्रय लेकर पाण्डवों का अपमान करने लगा था। वह धनुर्वेद सीखने के लिए द्रोण के पास गया। किंतु शिक्षा, बाहुबल और उद्यम के मामले में उन सभी शिष्यों में पाण्डुपुत्र अर्जुन सबसे आगे निकल गए।
  • व्याख्या: द्रोण के आश्रम में कुरु-पाण्डवों के साथ कर्ण समेत कई देशों के राजकुमार अस्त्र-विद्या सीखने आए, जहाँ कर्ण दुर्योधन के पक्ष में रहकर अर्जुन से स्पर्धा रखने लगा।

श्लोक 23, 24, 25 और 26

श्लोक:

अस्त्रविद्यानुरागाच्च विशिष्टोऽभवदर्जुनः। तुल्येष्वस्त्रप्रयोगेषु लाघवे सौष्टवेषु च।। (1-142-23) सर्वेषामेव शिष्याणां बभूवाभ्यधिकोऽर्जुनः। ऐन्द्रिमप्रतिमं द्रोण उपदेशेष्वमन्यत।। (1-142-24) एवं सर्वकुमाराणामिष्वस्त्रं प्रत्यपादयत्। कमण्डलुं च सर्वेषां प्रायच्छच्चिरकारणात्।। (1-142-25) पुत्राय च ददौ कुम्भमविलम्बनकारणात्। यावत्ते नोपगच्छ्ति तावदस्मै परां क्रियाम्।। (1-142-26)

  • हिंदी अनुवाद: अस्त्र-विद्या के प्रतिगामी अनुराग, समान अस्त्र प्रयोग, हाथ की फुर्ती (लाघव) और सुंदरता (सौष्टव) के कारण अर्जुन सभी शिष्यों में सर्वोपरि और विशिष्ट हो गए। द्रोण यह भली-भांति मानते थे कि उपदेश देने में इन्द्रपुत्र अर्जुन के समान कोई दूसरा प्रतिम (तुलना करने योग्य) नहीं है। इस प्रकार द्रोण ने सभी कुमारों को अस्त्र-विद्या सिखाई। अभ्यास के दौरान उन्होंने सभी शिष्यों को बहुत देर से भरने वाले कमण्डलु दिए, किंतु अपने पुत्र अश्वत्थामा को बिना किसी विलंब (तुरंत) के भरने वाला कुंभ (बड़ा कमण्डलु) दे दिया ताकि वह जल्दी विद्या प्राप्त कर सके।
  • व्याख्या: अर्जुन अपनी एकाग्रता और प्रतिभा के कारण सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बने, जबकि द्रोण ने अपने पुत्र मोह के कारण अश्वत्थामा को गुप्त रूप से अधिक उन्नत अभ्यास और शिक्षा का अवसर दिया।

श्लोक 27, 28, 29 और 30

श्लोक:

द्रोण आचष्ट पुत्राय कर्म तज्जिष्णुरौहत। ततः स वारुणास्त्रेण पूरयित्वा कमण्डलुम्।। (1-142-27) सममाचार्यपुत्रेन गुरुमभ्येति फाल्गुनः। आचार्यपुत्रस्तस्मात्तु विशेषोपचयेऽपृथक्।। (1-142-28) न व्यहीयत मेधावी पार्थोऽप्यस्त्रविदां वरः। अर्जुनः परमं यत्नमातिष्ठद्गुरुपूजने।। (1-142-29) अस्त्रे च परमं योगं प्रियो द्रोणस्य चाभवत्। तं दृष्ट्वा नित्यमुद्युक्तमिष्वस्त्रं प्रति फाल्गुनम्।। (1-142-30)

  • हिंदी अनुवाद: जिष्णु (अर्जुन) ने ताड़ लिया कि आचार्य अपने पुत्र को कौन सी विशेष शिक्षा दे रहे हैं। तब अर्जुन ने भी वारुणास्त्र के प्रयोग से अपने कमण्डलु को तुरंत भरकर आचार्य पुत्र अश्वत्थामा के साथ ही गुरु के पास पहुँचना शुरू कर दिया। इस प्रकार विशेष शिक्षा के मामले में भी मेधावी और अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ पार्थ आचार्य पुत्र से पीछे नहीं रहे। अर्जुन गुरु की पूजा और सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। अस्त्र-विद्या के अभ्यास में उनका मन हमेशा लगा रहता था और वे द्रोण के अत्यंत प्रिय शिष्य बन गए।
  • व्याख्या: अर्जुन की तीक्ष्ण बुद्धि और लगन ऐसी थी कि उन्होंने बिना किसी औपचारिक भेदभाव के अपनी मेहनत और प्रतिभा से अश्वत्थामा के बराबर ही उच्च अस्त्र-विद्या सीख ली और द्रोण के सबसे चहेते शिष्य बने।

श्लोक 31, 32, 33, 34 और 35

श्लोक:

आहूय वचनं द्रोणो रहः सूदमभाषत। अन्धकारेऽर्जुनायान्नं न देयं ते कदाचन। न चाख्येयमिदं चापि मद्वाक्यं विजयेत्वया।। (1-142-31) ततः कदाचिद्भुञ्जाने प्रववौ वायुरर्जुने। तेन तत्र प्रदीपः स दीप्यमानो विलोपितः।। (1-142-32) भुक्त एव तु कौन्तेयो नास्यादन्यत्र वर्तते। हस्तस्तेजस्विनस्तस्य अनुग्रहणकारणात्।। (1-142-33) तदभ्यासकृतं मत्वा रात्रावपि स पाण्डवः। योग्यां चक्रे महाबाहुर्धनुषा पाण्डुनन्दनः।। (1-142-34) तस्य ज्यातलनिर्घोषं द्रोणः शुश्राव भारत। उपैत्य चैनमुत्थाय परिष्वज्येदमब्रवीत्।। (1-142-35)

  • हिंदी अनुवाद: द्रोण ने एकांत में अपने रसोईिए (सूद) को बुलाकर यह आदेश दिया—"अंधेरे में अर्जुन को कभी भी भोजन नहीं दिया जाना चाहिए और न ही मेरी यह बात कभी अर्जुन को बताई जानी चाहिए।" तदनंतर एक दिन जब अर्जुन भोजन कर रहे थे, तब तेज हवा चली, जिससे जलता हुआ दीपक बुझ गया। अंधेरा होने पर भी अर्जुन का हाथ अभ्यास के कारण बिना चूके सीधे मुख तक भोजन पहुँचाने लगा (क्योंकि गुरु के अनुग्रह और उनके अभ्यास का बल था)। यह देखकर अर्जुन ने विचार किया कि अंधकार में भी यदि ऐसा अभ्यास संभव है, तो क्यों न मैं रात में भी धनुष का अभ्यास करूँ? ऐसा सोचकर महाबाहु पाण्डुनंदन अर्जुन ने रात्रि के समय भी धनुष का अभ्यास शुरू कर दिया। हे भारत! उनकी प्रत्यंचा के टंकार की आवाज़ द्रोण ने सुन ली। तब द्रोण ने पास आकर, उठकर उन्हें गले से लगाया और यह बात कही—
  • व्याख्या: द्रोण ने जब देखा कि अंधेरे में भी अर्जुन बिना भटके भोजन कर सकता है और रात में भी धनुष बाण चला सकता है, तो उन्हें अहसास हुआ कि अर्जुन की लगन अद्वितीय है और उन्होंने उसे दुनिया का सबसे श्रेष्ठ धनुर्धर बनाने का संकल्प लिया।

श्लोक 36, 37, 38 और 39

श्लोक:

द्रोण उवाच। प्रयतिष्ये तथा कर्तुं यथा नान्यो धनुर्धरः। त्वत्समो भविता लोके सत्यमेतद्ब्रवीमि ते।। (1-142-36) वैशंपायन उवाच। ततो द्रोणोऽर्जुनं भूयो हयेषु च गजेषु च। रथेषु भूमावपि च रणशिक्षामशिक्षयत्।। (1-142-37) गदायुद्धेऽसिचर्यायां तोमरप्रासशक्तिषु। द्रोणः संकीर्णयुद्धे च शिक्षयामास कौरवान्।। (1-142-38) तस्य तत्कौशलं श्रुत्वा धनुर्वेदजिघृक्षवः। सजानो राजपुत्राश्च समाजग्मुः सहस्रशः।। (1-142-39)

  • हिंदी अनुवाद: द्रोण ने कहा—"मैं ऐसा प्रयत्नह करूँगा कि इस संसार में तुम्हारे समान दूसरा कोई भी धनुर्धर न हो सके। मैं तुमसे यह सत्य कहता हूँ।" वैशंपायन जी कहते हैं—इसके बाद द्रोण ने अर्जुन को घोड़ों पर, हाथियों पर, रथों पर और भूमि पर रहकर भी युद्ध करने की विशेष शिक्षा दी। इसके अतिरिक्त द्रोण ने गदायुद्ध, तलवार बाजी (असिचर्या), तोमर, प्रास, शक्ति तथा सभी प्रकार के संकीर्ण (मिश्रित) युद्धों की शिक्षा कौरव राजकुमारों को दी। द्रोण का ऐसा अद्भुत कौशल सुनकर धनुर्वेद सीखने की इच्छा रखने वाले हजारों राजकुमार और राजाओं के पुत्र उनके पास सहस्रों की संख्या में चले आए।
  • व्याख्या: द्रोण ने अर्जुन को विश्व का अद्वितीय धनुर्धर बनाने का दृढ़ संकल्प लिया और सभी शिष्यों को विभिन्न युद्ध कलाओं में पारंगत किया, जिससे उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई।

श्लोक 40, 41 और 42

श्लोक:

ततो निषादराजस्य हिरण्यधनुषः सुतः। एकलव्यो महाराज द्रोणमभ्याजगाम ह।। (1-142-40) न स तं प्रतिजग्राह नैषादिरिति चिन्तयन्। शिष्यं धनुषि धर्मज्ञस्तेषामेवान्ववेक्षया।। (1-141/42-41) द्रोण उवाच। शिष्योऽसि मम नैषादे प्रयोगे बलत्तरः। निवर्तस्व गृहानेव अनुज्ञातोऽसि नित्यशः।। (1-142-42)

  • हिंदी अनुवाद: हे महाराज! इसके बाद निषादराज हिरण्यधनुष का पुत्र एकलव्य द्रोणाचार्य के पास आया। धर्मज्ञ द्रोण ने यह विचार करके कि यह निषादपुत्र है (और इससे आगे चलकर अन्य क्षत्रिय शिष्यों व राजनीति के समक्ष जटिलता आ सकती है), उसे धनुष की शिक्षा देने के लिए शिष्य रूप में स्वीकार नहीं किया। द्रोण ने उससे कहा—"हे निषाद कुमार! यद्यपि तुम मेरे शिष्य नहीं हो, फिर भी प्रयोग और बल के मामले में तुम श्रेष्ठ हो। तुम अपने घर वापस लौट जाओ, तुम्हें मेरी ओर से सदा के लिए अनुमति है।"
  • व्याख्या: एकलव्य जब द्रोण के पास शिक्षा मांगने आया, तो कुरुक्षेत्र की भावी राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों (विशेषकर क्षत्रिय राजकुमारों की सुरक्षा और श्रेष्ठता) को ध्यान में रखते हुए द्रोण ने उसे सीधे तौर पर शिष्य रूप में स्वीकार नहीं किया।

श्लोक 43, 44 और 45

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। स तु द्रोणस्य शिरसा पादौ गृह्य परन्तपः। अरण्यमनुसंप्राप्य कृत्वा द्रोणं महीमयम्।। (1-142-43) तस्मिन्नाचार्यवृत्तिं च परमामास्थितस्तदा। इष्वस्त्रे योगमातस्थे परं नियममास्थितः।। (1-142-44) परया श्रद्धयोपेतो योगेन परमेण च। विमोक्षादानसन्धाने लघुत्वं परमाप सः।। (1-142-45)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—परंतप एकलव्य ने सिर झुकाकर द्रोण के चरणों का स्पर्श किया और वहाँ से वन में चला गया। वन में जाकर उसने मिट्टी (कीचड़) की द्रोणाचार्य की एक मूर्ति बनाई। उस मिट्टी की मूर्ति में ही वह परम आचार्य की भावना रखकर अस्त्र-शस्त्र की साधना और योग में लीन हो गया तथा कठोर नियमों का पालन करने लगा। परम श्रद्धा और उच्च योग-साधाना से युक्त होकर उसने बाण छोड़ने, उठाने और संधान करने (लाघव) में परमोत्कृष्ट गति (फुर्ती व निपुणता) प्राप्त कर ली।
  • व्याख्या: एकलव्य ने द्रोण को ही अपना मानसिक गुरु मानकर मिट्टी की मूर्ति स्थापित की और अपनी अगाध श्रद्धा व अभ्यास से अद्वितीय धनुर्विद्या में महारत हासिल कर ली।

श्लोक 46, 47, 48, 49, 50 और 51

श्लोक:

अथ द्रोणाभ्यनुज्ञाताः कदाचित्कुरुपाण्डवाः। रथैर्विनिर्ययुः सर्वे मृगयामरिमर्दनाः।। (1-142-46) तत्रोपकरणं गृह्य नरः कश्चिद्यदृच्छया। राजन्ननुजगामैकः श्वानमादाय पाण्डवान्।। (1-142-47) तेषां विचरतां तत्र तत्तत्कर्मचिकीर्षया। शवाचरन्स पथा क्रीडन्नैषादिं प्रति जग्मिवान्।। (1-142-48) स कृष्णमलदिग्धाङ्गं कृष्णाजिनजटाघरम्। नैषादिं श्वा समालक्ष्य भषंस्तस्थौ तदन्तिके।। (1-142-49) तदा तस्याथ भषतः शुनः सप्त शरान्मुखे। लाघवं दर्शन्नस्त्रे मुमोच युगपद्यथा।। (1-142-50) स तु श्वा शरपूर्णास्यः पाण्डवानाजगाम ह। तं दृष्ट्वा पाण्डवा वीराः परं विस्मयमागताः।। (1-142-51)

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद एक दिन द्रोण की अनुमति पाकर शत्रुओं का मर्दन करने वाले सभी कुरु और पाण्डव राजकुमार रथों पर सवार होकर शिकार खेलने के लिए वन में गए। हे राजन्! उनके साथ एक सेवक और एक कुत्ता भी स्वेच्छा से उनके साथ गया था। वे वन में विहार कर रहे थे, तभी वह कुत्ता खेलते-खेलते भटकते हुए एकलव्य के पास जा पहुँचा। उस कुत्ते ने शरीर पर मैल और काला कीचड़ लगाए हुए, काले मृगचर्म तथा जटा धारण किए हुए निषाद कुमार (एकلव्य) को देखा और उसके पास खड़े होकर भौंकने लगा। तब भौंकते हुए उस कुत्ते के मुँह में एकलव्य ने अपनी अद्भुत अस्त्र-विद्या और फुर्ती का प्रदर्शन करते हुए एक साथ सात बाण दाग दिए। वह कुत्ता मुँह में बाणों से भरा हुआ ही दौड़कर पाण्डवों के पास वापस आ गया। उस कुत्ते को देखकर वीर पाण्डव अत्यधिक विस्मय में पड़ गए।
  • व्याख्या: जब पाण्डवों का कुत्ता एकलव्य के पास भौंकने लगा, तो एकलव्य ने बिना किसी हिंसा के केवल अपने बाण-कौशल से कुत्ते का मुँह बाणों से इस प्रकार भर दिया कि वह भौंक न सके और पाण्डवों के पास लौट आया।

श्लोक 52, 53, 54 और 55

श्लोक:

लाघवं शब्दवेधित्वं दृष्ट्वा तत्परमं तदा। प्रेक्ष्य तं व्रीडिताश्चासन्प्रशशंसुश्च सर्वशः।। (1-142-52) तं ततोऽन्वेषमाणास्ते वने वननिवासिनम्। ददृशुः पाण्डवा राजन्नस्यन्तमनिशं शरान्।। (1-142-53) न चैनमभ्यजानंस्ते तदा विकृतदर्शनम्। तथैनं परिपप्रच्छुः को भवान्कस्य वेत्युत।। (1-142-54) एकलव्य उवाच। निषादाधिपतेर्वीरा हिरण्यधनुषः सुतम्। द्रोणशिष्यं च मां वित्त धनुर्वेदकृतश्रमम्।। (1-142-55)

  • /हिंदी अनुवाद: उस कुत्ते के मुँह में शब्दभेदी बाण चलाने का वह परम कौशल देखकर पाण्डव लज्जित हुए और सबने उसकी प्रशंसा की। हे राजन्! इसके बाद वन में उसकी खोज करते हुए उन पाण्डवों ने एक वनवासी को निरंतर बाण चलाते हुए देखा। विकृत वेश-भूषा के कारण वे उसे पहचान नहीं पाए और उससे पूछा—"आप कौन हैं और किसके पुत्र हैं?" एकलव्य ने उत्तर दिया—"हे वीरो! तुम मुझे निषादराज हिरण्यधनुष का पुत्र और धनुर्वेद का अभ्यास करने वाला द्रोण का शिष्य जानो।"
  • व्याख्या: पाण्डवों ने जब उस अद्भुत तीरंदाज को खोजा, तो एकलव्य ने गर्व से स्वयं को द्रोण का शिष्य बताया, जिसे सुनकर पाण्डव और अधिक चकित हुए।

श्लोक 56, 57, 58 और 59

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। ते तमाज्ञाय तत्त्वेन पुनरागम्य पाण्डवाः। यथा वृत्तं वने सर्वं द्रोणायाचख्युरद्भुतम्।। (1-142-56) कौन्तेयस्त्वर्जुनो राजन्नेकलव्यमनुस्मरन्। रहो द्रोणं समासाद्य प्रणयादिदमब्रवीत्।। (1-142-57) नन्वहं परिरभ्यैकः प्रीतिपूर्वमिदं वचः। भवतोक्तो न मे शिष्यस्त्वद्विशिष्टो भविष्यति।। (1-142-58) अथ कस्मान्मद्विशिष्टो लोकादपि च वीर्यवान्। अन्योऽस्ति भवतः शिष्यो निषादाधिपतेः सुतः।। (1-142-59)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—पाण्डवों ने वास्तविकता जानकर वापस आकर वन में घटी वह सारी अद्भुत घटना द्रोणाचार्य को कह सुनाई। हे राजन्! कुंतीपुत्र अर्जुन एकलव्य का स्मरण करके एकांत में द्रोण के पास गए और प्रेमपूर्वक बोले—"क्या आपने पहले मुझे यह स्नेहपूर्वक वचन नहीं दिया था कि 'मेरे शिष्यों में तुम्हारे जैसा विशिष्ट कोई दूसरा नहीं होगा'? फिर संसार में ऐसा कौन दूसरा वीर है, जो निषादराज का पुत्र होते हुए भी मुझसे अधिक पराक्रमी और आपका शिष्य है?"
  • व्याख्या: जब अर्जुन को पता चला कि कोई अन्य युवक द्रोण का शिष्य बनकर उनसे भी श्रेष्ठ धनुर्विद्या का प्रदर्शन कर रहा है, तो उन्होंने अपने गुरु द्रोण को उनके पुराने वचन का स्मरण कराया।

श्लोक 60, 61, 62 और 63

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। मुहूर्तमिव तं द्रोणश्चिन्तयित्वा विनिश्चयम्। सव्यसाचिनमादाय नैषादिं प्रति जग्मिवान्।। (1-142-60) ददर्श मलदिग्धाङ्गं जटिलं चीरवाससम्। एकलव्यं धनुष्पाणिमस्यन्तमनिशं शरान्।। (1-142-61) एकलव्यस्तु तं दृष्ट्वा द्रोणमायान्तमन्तिकात्। अभिगम्योपसंगृह्य जगाम शिरसा महीम्।। (1-142-62) पूजयित्वा ततो द्रोणं विधिवत्स निषादजः। निवेद्य शिष्यमात्मानं तस्थौ प्राञ्जलिरग्रतः।। (1-142-63)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—द्रोण ने एक मुहूर्त तक कुछ विचार करके निश्चय किया और सव्यसाची (अर्जुन) को साथ लेकर वे एकलव्य के पास गए। उन्होंने देखा कि एकलव्य शरीर पर मैल और कीचड़ लगाए, जटा और वल्कल (छाल के वस्त्र) पहने हाथ में धनुष लिए निरंतर बाण चला रहा है। एकलव्य ने दूर से ही द्रोण को आते हुए देखा तो वह उनके पास गया, उनके चरण छुए और पृथ्वी पर सिर रखकर प्रणाम किया। निषाद पुत्र एकलव्य ने विधिपूर्वक द्रोण की पूजा की और अपने आपको उनका शिष्य बताते हुए हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हो गया।
  • व्याख्या: द्रोण अर्जुन को लेकर स्वयं एकलव्य के पास पहुँचे, जहाँ एकलव्य ने अपने परम गुरु (जिन्हें उसने मानसिक रूप से माना था) का सत्कार किया।

श्लोक 64, 65, 66 और 67

श्लोक:

ततो द्रोणोऽब्रवीद्राजन्नेकलव्यमिदं वचः। यदि शिष्योऽसि मे वीर वेतनं दीयतां मम।। (1-142-64) एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा प्रीयमाणोऽब्रवीदिदम्। किं प्रयच्छामि भगवन्नाज्ञापयतु मां गुरुः।। (1-142-65) न हि किंचिददेयं मे गुरवे ब्रह्मवित्तम।। (1-142-66) वैशंपायन उवाच। तमब्रवीत्त्वयाङ्गुष्ठो दक्षिणो दीयतामिति।। (1-142-66b) एकलव्यस्तु तच्छ्रुत्वा वचो द्रोणस्य दारुणम्। प्रतिज्ञामात्मनो रक्षन्सत्ये च नियतः सदा।। (1-142-67)

  • हिंदी अनुवाद: तब द्रोण ने राजन्! एकलव्य से यह बात कही—"हे वीर! यदि तुम मेरे शिष्य हो, तो मुझे मेरा गुरु-वेतन (दक्षिणा) दो।" एकलव्य ने यह सुनकर अत्यंत प्रसन्न होकर कहा—"भगवन्! आप मुझे आज्ञा दीजिए, मैं आपको क्या दूँ? ब्रह्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ गुरु के लिए मेरे पास कुछ भी ऐसा नहीं है जो देय न हो (अर्थात मैं सब कुछ दे सकता हूँ)।" वैशंपायन जी कहते हैं—तब द्रोण ने उससे कहा—"तुम मुझे अपना दाहिना अंगूठा दक्षिणा में दे दो।" एकलव्य ने द्रोण के उस दारुण (कठोर) वचन को सुनकर अपनी सत्य की प्रतिज्ञा और गुरु-निष्ठा की रक्षा करते हुए...
  • व्याख्या: द्रोण ने अर्जुन को दिए गए अपने वचन (कि अर्जुन के समान कोई दूसरा नहीं होगा) को सत्य रखने के लिए एकलव्य से उसकी सबसे बड़ी ताकत—दाहिने हाथ का अंगूठा—गुरुदक्षिणा के रूप में माँग लिया।

श्लोक 68, 69 और 70

श्लोक:

तथैव हृष्टवदनस्तथैवादीनमानसः। छित्त्वाऽविचार्य तं प्रादाद्द्रोणायाङ्गुष्ठमात्मनः।। (1-142-68) ततः शरं तु नैषादिरङ्गुलीभिर्व्यकर्षत। न तथा च स शीघ्रोऽभूद्यथा पूर्वं नराधिप।। (1-142-69) ततोऽर्जुनः प्रीतमना बभूव विगतज्वरः। द्रोणश्च सत्यवागासीन्नान्योऽभिभविताऽर्जुनं।। (1-142-70)

  • हिंदी अनुवाद: ...बिना किसी दीनता के, प्रसन्न मुख से ही अपने दाहिने हाथ का अंगूठा काटकर तुरंत द्रोण को सौंप दिया। नराधिप! इसके बाद वह निषाद पुत्र अपनी उंगलियों से बाण खींचने लगा, किंतु अब वह पहले की तरह तीव्र गति (फुर्ती) से बाण नहीं चला पाता था। तब अर्जुन प्रसन्नमन हुए और उनका सारा मानसिक संताप (ज्वर) दूर हो गया। द्रोण की बात भी सत्य हो गई और अब संसार में कोई भी अर्जुन को परास्त करने वाला नहीं रहा।
  • व्याख्या: एकलव्य ने बिना एक क्षण हिचकिचाए अपना अंगूठा काटकर गुरु को सौंप दिया। अंगूठे के बिना उसकी तीरंदाजी की गति धीमी हो गई, जिससे अर्जुन की सर्वोच्चता सुरक्षित हो गई।

श्लोक 71, 72, 73, 74 और 75

श्लोक:

द्रोणस्य तु तदा शिष्यौ गदायोग्यौ बभूवतुः। दुर्योधनश्च भीमश्च सदा संरब्धणानसौ।। (1-142-71) अश्वत्थामा रहस्येषु सर्वेष्वभ्यधिकोऽभवत। तथाऽतिपुरुषानन्यान्त्सारुकौ यमजावुभौ।। (1-142-72) युधिष्ठिरो रथश्रेष्ठः सर्वत्र तु धनञ्जयः। प्रथितः सागरान्तायां रथयूथपयूथपः।। (1-142-73) बुद्धियोगबलोत्साहः सर्वास्त्रेषु च निष्ठितः। अस्त्रे गुर्वनुरागे च विशिष्टोऽभवदर्जुनः।। (1-142-74) तुल्येष्वस्त्रोपदेशेषु सौष्ठवेन च वीर्यवान्। एकः सर्वकुमाराणां बभूवातिरथोऽर्जुनः।। (1-142-75)

  • हिंदी अनुवाद: द्रोण के शिष्यों में दुर्योधन और भीम ये दोनों गदा युद्ध में अत्यंत कुशल और हमेशा एक-दूसरे से स्पर्धा करने वाले बन गए। अश्वत्थामा सभी गोपनीय शस्त्रों और रहस्यों में सबसे आगे निकल गया। इसी प्रकार यमराज के समान पराक्रमी नकुल और सहदेव भी अतिरथी बने। युधिष्ठिर श्रेष्ठ रथियों में गिने गए और धनंजय (अर्जुन) तो समुद्रपर्यंत इस पृथ्वी पर समस्त रथियों के भी मुख्य रथी के रूप में प्रसिद्ध हुए। बुद्धि, योग, बल, उत्साह और सभी अस्त्रों में निपुणता के साथ-साथ गुरु के प्रति अनुराग में अर्जुन सबसे विशिष्ट थे। समान अस्त्र-उपदेश मिलने पर भी अपनी श्रेष्ठ निपुणता के कारण अर्जुन ही सभी कुमारों में एकमात्र सर्वोच्च 'अतिरथी' बने।
  • व्याख्या: द्रोण के सभी शिष्यों की अलग-अलग विशेषताएँ स्थापित हुईं—भीम-दुर्योधन गदायुद्ध में, नकुल-सहदेव आदि अपने पराक्रम में, और अर्जुन अपनी अद्वितीय प्रतिभा व गुरु-भक्ति के बल पर सर्वश्रेष्ठ अतिरथी बने।

श्लोक 76, 77, 78, 79 और 80

श्लोक:

प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनञ्जयम्। धार्तराष्ट्रा दुरात्मानो नामृष्यन्त परस्परम्।। (1-142-76) तांस्तु सर्वान्समानीय सर्वविद्यास्त्रशिक्षितान्। द्रोणः प्रहरणज्ञाने जिज्ञासुः पुरुषर्षभः।। (1-142-77) कृत्रिमं भासमारोप्य वृक्षाग्रे शिल्पिभिः कृतम्। अविज्ञातं कुमाराणां लक्ष्यभूतमुपादिशत्।। (1-142-78) द्रोण उवाच। शीघ्रं भन्तः सर्वेऽपि धनूंष्यादाय सर्वशः। भासमेतं समुद्दिश्य तिष्ठध्वं सन्धितेषतः।। (1-142-79) मद्वाक्यसमकालं तु शिरोऽस्य विनिपात्यताम्। एकैकशो नियोक्ष्यामि तथा कुरुत पुत्रकाः।। (1-142-80)

  • हिंदी अनुवाद: प्राणों से भी बढ़कर प्रिय भीमसेन और अस्त्र-विद्या में पूर्ण रूप से निपुण धनंजय को देखकर दुरात्मा धृतराष्ट्र के पुत्र (कौरव) आपसी ईर्ष्या के कारण उन्हें सहन नहीं कर पाते थे। तब पुरुषर्षभ द्रोण ने उन सभी राजकुमारों को, जो सभी विद्याओं और अस्त्र-शस्त्रों में शिक्षित हो चुके थे, अस्त्र-कौशल की परीक्षा लेने के लिए एकत्रित किया। उन्होंने कारीगरों से एक कृत्रिम (बनावटी) पक्षी (भास) बनवाया और उसे एक वृक्ष की चोटी पर इस प्रकार रखवाया कि राजकुमारों के लिए वह एक गुप्त लक्ष्य बन सके। द्रोण ने कहा—"हे भन्तो (भद्रों)! तुम सब लोग शीघ्र ही अपने-अपने धनुष और बाण लेकर इस भास (पक्षी) को निशाना बनाकर तान कर खड़े हो जाओ। मेरे आदेश देते ही इसका सिर काट कर गिरा देना। पुत्रों! मैं बारी-बारी से तुम सबको नियुक्त करूँगा, तुम वैसा ही करना।"
  • व्याख्या: कौरवों की ईर्ष्या के बीच द्रोण ने सभी शिष्यों की एकाग्रता और निशानेबाजी की परीक्षा लेने के लिए एक कृत्रिम पक्षी को वृक्ष पर लक्ष्य के रूप में स्थापित किया।

श्लोक 81, 82, 83, 84, 85, 86, 87, 88 और 89

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। ततो युधिष्ठिरं पूर्वमुवाचाङ्गिरसां वरः। संधत्स्व बामं दुर्धर्ष मद्वाक्यान्ते विमुञ्चतम्।। (1-142-81) ततो युधिष्ठिरः पूर्वं धनुर्गृह्य परन्तपः। तस्थौ भासं समुद्दिश्य गुरुवाक्यप्रचोदितः।। (1-142-82) ततो विततधन्वानं द्रोणस्तं कुरुनन्दनम्। स मुहूर्तादुवाचेदं वचनं भरतर्षभ।। (1-142-83) पश्यसि त्वं द्रुमाग्रस्थं भासं नरवरात्मज। पश्यामीत्येवमाचार्यं प्रत्युवाच युधिष्ठिरः।। (1-142-84) स मुहूर्तादिव पुनर्द्रोणस्तं प्रत्यभाषत। अथ वृक्षमिमं मां वा भ्रातॄन्वाऽपि प्रपश्यसि।। (1-142-85) तमुवाच स कौन्तेयः पश्याम्येनं नवस्पतिम्। भन्तं च तथा भ्रातॄन्भासं चेति पुनःपुनः।। (1-142-86) तमुवाचापसर्पेति द्रोणोऽप्रीतमना इव। नैतच्छक्यं त्वया वेद्धुं लक्ष्यमित्येव कुत्सयन्।। (1-142-87) ततो दुर्योधनादींस्तान्धार्तराष्ट्रान्महायशाः। तेनैव क्रमयोगेन जिज्ञासुः पर्यपृच्छत।। (1-142-88) अन्यांश्च शिष्यान्भीमादीन्राज्ञश्चैवान्यदेशजान्। यदा च सर्वे तत्सर्वं पश्याम इति कुत्सिताः।। (1-142-89)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब अंगिरा वंश में श्रेष्ठ द्रोणाचार्य ने सबसे पहले युधिष्ठिर से कहा—"हे दुर्धर्ष! तुम बाण संधान करके अपने धनुष की प्रत्यंचा खींचो और मेरे आदेश देने पर ही छोड़ना।" गुरु के वाक्य से प्रेरित होकर परंतप युधिष्ठिर ने सबसे पहले धनुष उठाया और उस पक्षी को लक्ष्य करके खड़े हो गए। कुरुनंदन युधिष्ठिर को ताने हुए धनुष के साथ खड़े देख, भरतर्षभ द्रोण ने एक मुहूर्त बाद उनसे यह बात पूछी—"हे नरकुमार! क्या तुम वृक्ष के अग्रभाग पर बैठे हुए उस भास (पक्षी) को देख रहे हो?" युधिष्ठिर ने आचार्य से उत्तर दिया—"हाँ आचार्य, मैं देख रहा हूँ।" कुछ ही क्षणों बाद द्रोण ने उनसे फिर पूछा—"क्या इसके अलावा तुम इस वृक्ष को, मुझे या अपने भाइयों को भी देख रहे हो?" तब कौन्तेय युधिष्ठिर ने उत्तर दिया—"हाँ, मैं इस वृक्ष को, अपने भाइयों को और इस पक्षी—इन सबको बार-बार देख रहा हूँ।" द्रोण ने अप्रसन्न मन से जैसे उन्हें डाँटते हुए कहा—"तुम यहाँ से हट जाओ। तुम्हारे द्वारा यह लक्ष्य नहीं वेधा जा सकता।" इसके बाद महायशस्वी द्रोण ने इसी क्रम से दुर्योधन आदि अन्य धृतराष्ट्र पुत्रों, भीम तथा अन्य देश-विदेश के राजकुमारों को भी बारी-बारी से बुलाया और यही प्रश्न पूछा। उन सभी ने भी यही उत्तर दिया कि वे पेड़, गुरु, भाइयों और पक्षी—सबको देख रहे हैं, जिससे द्रोण ने उन सभी की निंदा की (उन्हें लक्ष्य भेदने के योग्य नहीं माना)।
  • व्याख्या: द्रोण की इस परीक्षा का उद्देश्य यह देखना था कि एकाग्रता का स्तर किसका सबसे तीव्र है। युधिष्ठिर और अन्य सभी राजकुमारों ने लक्ष्य के साथ-साथ अपने आसपास की अन्य चीजें (वृक्ष, भाई, गुरु आदि) भी देखीं, जिससे वे परीक्षा में असफल घोषित हुए।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि द्विचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 142 ।।

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