महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 145वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1, 2, 3 और 4
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। कुरुराजे हि रङ्गस्थे भीमे च बलिनां वरे। पक्षपातकृतस्नेहः स द्विधेवाभवज्जनः।। (1-145-1) जय हे कुरुराजेति जय हे भीम इत्युत। पुरुषाणां सुविपुलाः प्रणादाः सहसोत्थिताः।। (1-145-2) ततः क्षुब्धार्णवनिभं रङ्गमालोक्य बुद्धिमान्। भारद्वाजः प्रियं पुत्रमश्वत्थामानमब्रवीत्।। (1-145-3) वारयैतौ महावीर्यौ कृतयोग्यावुभावपि। मा भूद्रङ्गप्रकोपोऽयं भीमदुर्योधनोद्भवः।। (1-145-4)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—रंगभूमि में कुरुराज (दुर्योधन) और बलवानों में श्रेष्ठ भीम के आ जाने पर वहाँ उपस्थित जनता का स्नेह और पक्षपात दो भागों में बँट गया। (1-145-1) "जय हो कुरुराज की!" और "जय हो भीम की!"—इस प्रकार पुरुषों के अत्यंत ऊँचे और जोरदार जयकारे अचानक गूँज उठे। (1-145-2) तब क्षुब्ध (उथल-पुथल) समुद्र के समान उस उत्तेजित रंगभूमि को देखकर बुद्धिमान भारद्वाज (द्रोण) ने अपने प्रिय पुत्र अश्वत्थामा से कहा— (1-145-3) "इन दोनों महाबली और अस्त्र-विद्या में प्रशिक्षित योगियों को रोको, कहीं ऐसा न हो कि भीम और दुर्योधन के इस द्वंद्व के कारण रंगभूमि में कोई भयंकर प्रकोभ (हिंसक विवाद) उत्पन्न हो जाए।" (1-145-4)
- व्याख्या: दुर्योधन और भीम के गदायुद्ध के समय दर्शकों में तीव्र पक्षपात और उत्तेजना फैल गई। स्थिति को बिगड़ते देख आचार्य द्रोण ने अपने पुत्र अश्वत्थामा को दोनों को तुरंत शांत करने का आदेश दिया।
श्लोक 5 और 6
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। तत उत्थाय वेगेन अश्वत्थामा न्यवारयत्। गुरोराज्ञा भीम इति गान्धारे गुरुशासनम्। अलंकारितासु वेगं च साहसमित्युत।। (1-145-5) ततस्तावुद्यतगतौ गुरुपुत्रेण वारितौ। युगांतनानिलसंक्षुब्धौ महावेलाविवार्णवौ।। (1-145-6)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब अश्वत्थामा ने वेगपूर्वक उठकर उन्हें रोका और कहा—"हे भीम! और हे गान्धारनन्दन दुर्योधन! गुरु की आज्ञा है कि अब युद्ध रोक दिया जाए। शिक्षा के इस वेग और दुस्साहस को अब यहीं समाप्त करो।" (1-145-5) तब गुरुपुत्र अश्वत्थामा द्वारा रोके जाने पर, गदा उठाए हुए वे दोनों वीर ऐसे शांत हुए, मानो प्रलय काल की वायु से क्षुब्ध हुए समुद्र की दो विशाल लहरें शांत हो गई हों। (1-145-6)
- व्याख्या: गुरु के आदेश पर अश्वत्थामा ने बीच में आकर भीम और दुर्योधन को अलग किया, जिससे संभावित बड़ा टकराव टल गया।
श्लोक 7, 8, 9 और 10
श्लोक:
ततो रङ्गाङ्गणगतो द्रोणो वचनमब्रवीत्। निवार्य वादित्रगणं महामेघनिभस्वनम्।। (1-145-7) यो मे पुत्रात्प्रियतरः सर्वशस्त्रविशारदः। ऐन्द्रिरिन्द्रानुजसमः स पार्थो दृश्यतामिति।। (1-145-8) आचार्यवचनेनाथ कृतस्वस्त्ययनो युवा। बद्धगोधाङ्गुलित्राणः पूर्णतूणः सकार्मुकः।। (1-145-9) काञ्चनं कवचं बिभ्रत्प्रत्यदृश्य फाल्गुनः। सार्कः सेन्द्रायुधतडित्ससन्ध्य इव तोयदः।। (1-145-10)
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर महामेघ के समान गंभीर गर्जना करने वाले वाद्यों के समूहों को चुप कराकर, रंगभूमि के बीच में खड़े द्रोणाचार्य ने यह घोषणा की— (1-145-7) "जो मेरे पुत्र (अश्वत्थामा) से भी अधिक प्रिय हैं, सभी शस्त्रों की विद्या में विशारद हैं, इंद्र के पुत्र (कुन्तीपुत्र अर्जुन) हैं और भगवान विष्णु (इन्द्र के छोटे भाई) के समान पराक्रमी हैं, अब उन पार्थ (अर्जुन) को देखा जाए।" (1-145-8) आचार्य द्रोण के उस वचन के अनुसार, स्वस्तिवाचन कराकर युवा अर्जुन रंगभूमि में प्रकट हुए। उन्होंने हाथों में गोधा की खाल के दस्ताने (अंगुलित्राण) बाँध रखे थे, पीठ पर भरा हुआ तरकस था, हाथ में धनुष था और उन्होंने स्वर्ण का कवच पहन रखा था। (1-145-9, 10क) वे ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सूर्य, इंद्रधनुष, बिजली और संध्याकालीन बादलों से युक्त कोई मेघ हो। (1-145-10ख)
- व्याख्या: द्रोण ने घोषणा कर अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को रंगभूमि में आमंत्रित किया। स्वर्ण कवच और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित अर्जुन का प्रकटना दिव्य और प्रतापी लग रहा था।
श्लोक 11, 12, 13 और 14
श्लोक:
ततः सर्वस्य रङ्गस्य समुत्पिञ्जलकोऽभवत्। प्रावाद्यन्त च वाद्यानि सशङ्खानि समन्ततः।। (1-145-11) प्रेक्षका ऊचुः। एष कुन्तीसुतः श्रीमानेष मध्यमपाण्डवः। एष पुत्रो महेन्द्रस्य कुरूणामेष रक्षिता।। (1-145-12) एषोऽस्त्रविदुषां श्रेष्ठ एष धर्मभृतां वरः। एष शीलवतां चापि शीलज्ञाननिधिः परः।। (1-145-13) वैशंपायन उवाच। इत्येवं तुमुला वाचः शुश्रुवुः प्रेक्षकेरिताः। कुन्त्याः प्रस्रवसंयुक्तैरस्रैः क्लिन्नमुरोऽभवत्।। (1-145-14)
- हिंदी अनुवाद: अर्जुन के प्रकट होते ही संपूर्ण रंगभूमि में भारी कोलाहल और हर्षोत्फुल्ल ध्वनि गूँज उठी। चारों ओर शंखों के साथ बाजे बजने लगे। (1-145-11) दर्शकगण आपस में कहने लगे—"ये श्रीमान् कुंतीपुत्र हैं, ये मध्यम पाण्डव (अर्जुन) हैं। ये महान इंद्र के पुत्र और कौरवों के रक्षक हैं।" (1-145-12) "ये अस्त्र-विद्या जानने वालों में श्रेष्ठ हैं, धर्म का पालन करने वालों में उत्तम हैं और शीलवानों में भी सर्वोच्च शील तथा ज्ञान के भंडार हैं।" (1-145-13) वैशंपायन जी कहते हैं—दर्शकों के मुँह से इस प्रकार के कोलाहलपूर्ण और प्रशंसनीय वचन सुनकर माता कुंती के स्तनों से स्वतः दूध बह निकला और उनके आनंद-प्रेमांसुओं से उनका वक्षःस्थल भीग गया। (1-145-14)
- व्याख्या: अर्जुन को देखते ही दर्शक उनकी प्रशंसा में मुखर हो गए। अपने पुत्र की ऐसी कीर्ति और लोक-सम्मान को देखकर माता कुंती का हृदय वात्सल्य और प्रेम के आँसुओं से भर आया।
श्लोक 15, 16, 17 और 18
श्लोक:
तेन शब्देन महता पूर्णश्रुतिरथाब्रवीत्। धृतराष्ट्रो नरश्रेष्ठो विदुरं हृष्टमानसः।। (1-145-15) क्षत्तः क्षुब्धार्णवनिभः किमेष सुमहास्वनः। सहसैवोत्थितो रङ्गे भिन्दन्निव नभस्तलम्।। (1-145-16) विदुर उवाच। एष पार्थो महाराज फाल्गुनः पाण्डुनन्दनः। अवतीर्णः सकवचस्तत्रैव सुमहास्वनः।। (1-145-17) धृतराष्ट्र उवाच। धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि रक्षितोऽस्मि महामते। पृथारणिसमुद्भूतैस्त्रिभिः पाण्डववह्निभिः।। (1-145-18)
- हिंदी अनुवाद: उस महान कोलाहल से आकाश गूँज उठा। तब प्रसन्न मन वाले श्रेष्ठ नरेश धृतराष्ट्र ने विदुर से पूछा— (1-145-15) "हे क्षत्तः (विदुर)! आकाश को चीरता हुआ यह क्षुब्ध समुद्र के समान अत्यंत भारी कोलाहल अचानक रंगभूमि में क्यों उठ रहा है?" (1-145-16) विदुर ने उत्तर दिया—"हे महाराज! कवच धारण करके रंगभूमि में उतरे हुए पाण्डुनंदन पार्थ (फाल्गुन) को देखकर ही यह भारी कोलाहल हो रहा है।" (1-145-17) धृतराष्ट्र ने कहा—"हे महामते! कुंती रूपी अरणि से उत्पन्न हुए पाण्डव रूपी इन तीनों (या पाण्डव) अग्नियों से आज मैं धन्य हो गया हूँ, अनुगृहीत हो गया हूँ और पूरी तरह सुरक्षित हो गया हूँ।" (1-145-18)
- व्याख्या: भारी शोर का कारण पूछने पर विदुर ने धृतराष्ट्र को बताया कि अर्जुन के रंगभूमि में आने से जनता में हर्ष की लहर दौड़ गई है, जिसे सुनकर धृतराष्ट्र ने संतोष व्यक्त किया।
श्लोक 19, 20, 21 और 22
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। तस्मिन्प्रमुदिते रङ्गे कथंचित्प्रत्युपस्थिते। दर्शयामास बीभत्सुराचार्यायास्त्रलाघवम्।। (1-145-19) आग्नेयेनासृजद्वह्निं वारुणेनासृजत्पयः। वायव्येनासृजद्वह्निं पार्जन्येनासृजद्धनान्।। (1-145-20) भौमेन प्रासृजद्भूमिं पार्वतेनासृजद्गिरीन्। अन्तर्धानेन चास्त्रेण पुनरन्तर्हितोऽभवत्।। (1-145-21) क्षणात्प्रांशुः क्षणाद्ध्रस्वः क्षणाच्च रथधूर्गतः। क्षणेन रथमध्यस्थः क्षणेनावतरन्महीम्।। (1-145-22)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—जब रंगभूमि में इस प्रकार प्रसन्नता का वातावरण बन गया, तब बीभत्सु (अर्जुन) ने अपने आचार्य द्रोण को अस्त्रों की फुर्ती और उनके संचालन का अद्भुत कौशल दिखाना शुरू किया। (1-145-21) उन्होंने आग्नेयास्त्र से अग्नि प्रकट की, वारुणास्त्र से जल की वर्षा की, वायव्य अस्त्र से वायु और पर्जन्यास्त्र से घने बादल (वर्षा) प्रकट कर दिए। (1-245-20) भौम अस्त्र से पृथ्वी और पर्वतास्त्र से बड़े-बड़े पर्वतों को प्रकट कर दिया। इसके बाद अंतर्धान अस्त्र का प्रयोग करके वे पलभर में सबको अदृश्य (ओझल) हो गए। (1-145-21) वे क्षणभर में बहुत लंबे, क्षणभर में छोटे, क्षणभर में रथ की धुरी पर बैठे हुए, क्षणभर में रथ के बीच में और क्षणभर में पृथ्वी पर उतरते हुए दिखाई देने लगे। (1-145-22)
- व्याख्या: अर्जुन ने अपनी महान दिव्य अस्त्र-विद्या (आग्नेय, वारुण, पर्जन्य, भौम आदि) और अपनी मायावी एवं शारीरिक फुर्ती का ऐसा अद्भुत प्रदर्शन किया कि दर्शक अचंभित रह गए।
श्लोक 23, 24, 25 और 26
श्लोक:
सुकुमारं च सूक्ष्मं च गुरु चापि गुरुप्रियः। सौष्ठवेनाभिसंयुक्तः सोऽविध्यद्विविधैः शरैः।। (1-145-23) भ्रमतश्च वराहस्य लोहस्य प्रमुखे समम्। पञ्चबाणानसंक्तान्संमुमोचैकबाणवत्।। (1-145-24) गव्ये विषाणकोशे च चले रज्ज्ववलम्बिनि। निचखान महावीर्यः सायकानेकविंशतिम्।। (1-145-25) इत्येवमादि सुमहत्खड्गे धनुषि चानघ। गदायां शस्त्रकुशलो मण्डलानि ह्यदर्शयत्।। (1-145-26)
- हिंदी अनुवाद: गुरु द्रोण के प्रिय शिष्य अर्जुन ने सुकुमार, सूक्ष्म और भारी—सभी प्रकार के लक्ष्यों को अपनी सुंदर भंगिमा (सौष्ठव) और विभिन्न बाणों से बेधकर दिखाया। (1-145-23) घूमते हुए लोहे के वराह (सूअर के आकार के लक्ष्य) के मुख में उन्होंने एक ही बाण छूटने की तरह पाँचों बाण एक साथ सम्यक् रूप से छोड़ दिए। (1-145-24) रस्सी पर लटके हुए हिलते-डुलते गोवंश के सींग के कोटर (छेद) में महाबली अर्जुन ने इक्कीस बाणों को एकसाथ गाड़ दिया। (1-145-25) हे अनघ (जनमेजय)! इस प्रकार शस्त्रों में कुशल अर्जुन ने तलवार (खड्ग), धनुष और गदा आदि के संचालन के भी महान और अद्भुत मण्डल (कौशल) प्रदर्शित किए। (1-145-26)
- व्याख्या: अर्जुन ने अत्यंत सूक्ष्म, गतिशील और कठिन लक्ष्यों को अपने बाणों से भेदकर अपनी अद्वितीय तीरंदाजी और शस्त्र-कौशल का पूर्ण परिचय दिया।
श्लोक 27, 28, 29 और 30
श्लोक:
ततः समाप्तभूयिष्ठे तस्मिन्कर्मणि भारत। मन्दीभूते समाजे च वादित्रस्य च निःस्वने।। (1-145-27) द्वारदेशात्समुद्भूतो माहात्म्यबलसूचकः। वज्रनिष्पेषसदृशः शुश्रुवे भुजनिःस्वनः।। (1-145-28) दीर्यन्ते किं नु गिरयः किंस्विद्भूमिर्विदीर्यते। किंस्विदापूर्यते व्योम जलधाराघनैर्घनैः।। (1-145-29) रङ्गस्यैवं मतिरभूत्क्षणेन वसुधाधिप। द्वारं चाभिमुखाः सर्वे बभूवुः प्रेक्षकास्तदा।। (1-145-30)
- हिंदी अनुवाद: हे भारत (जनमेजय)! जब वह अस्त्र-प्रदर्शन का कार्यक्रम लगभग समाप्त होने को था और दर्शकों का कोलाहल तथा बाजों की आवाजें मन्द पड़ चुकी थीं, (1-145-27) तभी रंगभूमि के द्वार की ओर से महात्म्य और अपार बल को सूचित करने वाली, वज्र के गिरने (टकराने) जैसी भारी आवाज़ सुनाई दी—वह किसी की भुजाओं की थाप (भुजनिःस्वन) की आवाज़ थी। (1-145-28) हे वसुधाधिप! उस भयानक आवाज़ को सुनकर रंगभूमि के सभी लोगों के मन में ऐसा विचार आया—"क्या पर्वत फट रहे हैं? क्या पृथ्वी विदीर्ण हो रही है? या घने बादलों से आकाश जलधाराओं से भर रहा है?" (1-145-29, 30क) यह सोचते हुए सभी दर्शक तुरंत रंगभूमि के द्वार की ओर मुँह करके देखने लगे। (1-145-30ख)
- व्याख्या: जब रंगभूमि का कार्यक्रम समाप्त हो रहा था, तभी द्वार पर किसी अति शक्तिशाली योद्धा (कर्ण) के भुजदंडों की गड़गड़ाहट (थाप) गूँजी, जिससे पूरी सभा का ध्यान उस ओर आकर्षित हो गया।
श्लोक 31, 32 और 33 (अध्याय का समापन)
श्लोक:
पञ्चभिर्भ्रातृभिः पार्थैर्द्रोणः परिवृतो वभौ। पञ्चतारेण संयुक्तः सावित्रेणेव चन्द्रमाः।। (1-145-31) अश्वत्थाम्ना च सहितं भ्रातॄणां शतमूर्जितम्। दुर्योधनममित्रघ्नमुत्थितं पर्यवारयत्।। (1-145-32) स तैस्तदा भ्रातृभिरुद्यतायुधै- र्गदाग्रपाणिः समवस्थितैर्वृतः। बभौ यथा दानवसंक्षये पुरा पुनन्दरो देवगणैः समावृतः।। (1-145-33)
- हिंदी अनुवाद: उस समय पाँचों पाण्डव भाइयों से घिरे हुए आचार्य द्रोण ऐसे शोभा पा रहे थे, मानो पाँच तारों से युक्त आकाश में चंद्रमा सुशोभित हो रहा हो। (1-145-31) उधर, शत्रुओं का नाश करने वाले दुर्योधन ने अपने भाई अश्वत्थामा और अपने सौ ऊर्जस्वित (पराक्रमी) भाइयों के साथ उठकर उस स्थिति को चारों ओर से घेर लिया (सँभाला)। (1-145-32) हाथों में गदा लिए और अस्त्र-शस्त्र उठाए हुए उन भाइयों से घिरे हुए दुर्योधन ऐसे प्रतीत हो रहे थे, मानो प्राचीनकाल में दानवों के संहार के समय देवगणों से घिरे हुए देवराज इंद्र सुशोभित हुए हों। (1-145-33)
- व्याख्या: एक ओर पाँचों पाण्डवों के साथ द्रोण शोभा पा रहे थे, तो दूसरी ओर दुर्योधन अपने सौ भाइयों और अश्वत्थामा के साथ गदा और अस्त्र लेकर सतर्क अवस्था में खड़े हो गए, जिससे रंगभूमि का दृश्य किसी आसन्न महायुद्ध या देव-दानव सभा जैसा प्रतीत होने लगा।
