महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 146वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1, 2, 3, 4 और 5
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। एतस्मिन्नेव काले तु तस्मिञ्जनसमागमे। दत्तेऽवकाशे पुरुषैर्विस्मयोत्फुल्ललोचनः। विवेश रङ्गं विस्तीर्णं कर्णः परपुरञ्जयः।। (1-146-1) सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलोद्द्योतिताननः। स धनुर्बद्धनिस्त्रिंशः पादचारीव पर्वतः।। (1-146-2) कन्यागर्भः पृथुयशाः पृथायाः पृथुलोचनः। तीक्ष्णांशोर्भास्करस्यांशः कर्णोऽरिगणसूदनः।। (1-146-3) सिंहर्षभगजेन्द्राणां बलवीर्यपराक्रमः। दीप्तिकान्तिद्युतिगुणैः सूर्येन्दुज्वलनोपमः।। (1-146-4) प्रांशुः कनकतालाभः सिंहसंहननो युवा। असङ्ख्येयगुणः श्रीमान्भास्करस्यात्मसंभवः।। (1-146-5)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—उसी समय उस जनसमूह में जब लोगों ने मार्ग दिया, तब विस्मय से फैली हुई आँखों वाले, शत्रुओं के नगर को जीतने वाले अंगराज कर्ण ने उस विशाल रंगभूमि में प्रवेश किया। (1-146-1) वे अपने जन्मजात कवच को धारण किए हुए थे, कुण्डलों से जिनका मुख चमक रहा था, हाथ में धनुष और कमर में तलवार बाँधे हुए वे ऐसे चल रहे थे मानो चलते-फिरते पर्वत हों। (1-146-2) वे कुंती के गर्भ से (कुँवारी अवस्था में) उत्पन्न, विस्तृत यश वाले, बड़े-बड़े नेत्रों वाले, सूर्य के अंश से प्रकट हुए शत्रुओं का नाश करने वाले कर्ण थे। (1-146-3) सिंह, श्रेष्ठ वृष और गजराज के समान उनका बल, वीर्य और पराक्रम था; दीप्ति, कांति और प्रभा के गुणों में वे सूर्य, चंद्रमा और अग्नि के समान प्रतीत हो रहे थे। (1-146-4) वे ऊँचे कद के, ताड़ के वृक्ष के समान लंबे, सिंह के जैसी छाती (संहनन) वाले, युवा, असंख्य गुणों से युक्त, श्रीमान् और सूर्यदेव के औरस पुत्र थे। (1-146-5)
- व्याख्या: कर्ण का रंगभूमि में अद्भुत और भव्य प्रवेश होता है। उनके स्वाभाविक कवच-कुंडल, सूर्य जैसी दीप्ति और विशाल शरीर को देखकर सभी की आँखें उन पर टिक जाती हैं।
श्लोक 6 और 7
श्लोक:
स निरीक्ष्य महाबाहुः सर्वतो रङ्गमण्डलम्। प्रणामं द्रोणकृपयोर्नात्यादृतमिवाकरोत्।। (1-146-6) स समाजजनः सर्वो निश्चलः स्थिरलोचनः। कोऽयमित्यागतक्षोभः कौतूहलपरोऽभवत्।। (1-146-7)
- हिंदी अनुवाद: उन महाबाहु कर्ण ने चारों ओर रंगमंडल का निरीक्षण किया और द्रोण तथा कृप आचार्य को मानों बिना किसी विशेष आदर के (साधारण सा) प्रणाम किया। (1-146-6) वहाँ बैठा हुआ समस्त समाज निश्चल और स्थिर नेत्रों से उन्हें देखता हुआ "यह कौन है?" इस प्रकार के क्षोभ और कौतूहल में डूब गया। (1-146-7)
- व्याख्या: कर्ण का बिना ज्यादा औपचारिकता के गुरुओं को प्रणाम करना और उनका रहस्यमय एवं तेजवान स्वरूप देखकर पूरी सभा में खलबली और आश्चर्य फैल गया कि यह नया वीर कौन है।
श्लोक 8, 9, 10 और 11
श्लोक:
सोऽब्रवीन्मेघगम्भीरस्वरेण वदतां वरः। भ्राता भ्रातरमज्ञातं सावित्रः पाकशासनिम्।। (1-146-8) पार्थ यत्ते कृतं कर्म विशेषवदहं ततः। करिष्ये पश्यतां नॄणां माऽऽत्मना विस्मयं गमः।। (1-146-9) असमाप्ते ततस्तस्य वचने वदतां वर। यन्त्रोत्क्षिप्त इवोत्तस्थौ क्षिप्रं वै सर्वतो जनः।। (1-146-10) प्रीतिश्च मनुजव्याघ्र दुर्योधनमुपाविशत्। ह्रीश्च क्रोधश्च बीभत्सुं क्षणेनान्वाविवेश ह।। (1-146-11)
- हिंदी अनुवाद: वक्ताओं में श्रेष्ठ कर्ण ने मेघ के समान गंभीर स्वर में, इंद्र के पुत्र (अर्जुन) से, जो अभी तक भाई के रूप में अज्ञात था, कहा— (1-146-8) "हे पार्थ! तुमने जो-जो कौशल यहाँ दिखाया है, उससे भी बढ़कर विशेष कर्म मैं इन सब मनुष्यों के देखते-देखते करके दिखाऊँगा। तुम अपने मन में विस्मय मत करो।" (1-146-9) वक्ताओं में श्रेष्ठ कर्ण के वे वचन अभी समाप्त भी नहीं हुए थे कि चारों ओर का जनसमूह ऐसे अचानक उठ खड़ा हुआ, मानो किसी यंत्र (मशीन) से उछाला गया हो। (1-146-10) हे मनुजव्याघ्र! उस समय दुर्योधन के हृदय में अपार प्रसन्नता समा गई, और क्षणभर में ही लज्जा तथा क्रोध ने अर्जुन को घेर लिया। (1-146-11)
- व्याख्या: कर्ण ने सरेआम अर्जुन को चुनौती दे डाली, जिससे दर्शकों में हलचल मच गई। इस घटना से दुर्योधन अत्यंत प्रसन्न हुआ, जबकि अर्जुन को क्रोध और संकोच हुआ।
श्लोक 12, 13, 14 और 15
श्लोक:
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः कर्णः प्रियरणः सदा। यत्कृतं तत्र पार्थेन तच्चकार महाबलः।। (1-146-12) अथ दुर्योधनस्तत्र भ्रातृभिः सह भारत। कर्णं परिष्वज्य मुदा ततो वचनमब्रवीत्।। (1-146-13) स्वागतं ते महाबाहो दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मानद। अहं च कुरुराज्यं च यथेष्टमुपभुज्यताम्।। (1-146-14) कर्ण उवाच। कृतं सर्वमहं मन्ये सखित्वं च त्वया वृणे। द्वन्द्वयुद्धं च पार्थेन कर्तुमिच्छाम्यहं प्रभो।। (1-146-15)
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर युद्धप्रिय महाबलवान कर्ण ने द्रोणाचार्य से अनुमति पाकर, वही सब पराक्रम किया जो थोड़ी देर पहले पार्थ ने किया था। (1-146-12) हे भारत (जनमेजय)! इसके बाद दुर्योधन अपने भाइयों के साथ प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ा और कर्ण को गले लगाकर यह वचन बोला— (1-146-13) "हे महाबाहो! आपका स्वागत है। सौभाग्य से आप यहाँ पधारे हैं, हे मान देने वाले! यह मैं और सारा कुरुराज्य, दोनों ही आपके अधीन हैं, इनका यथेष्ट उपभोग कीजिए।" (1-146-14) कर्ण ने कहा—"मैंने अपना सब कुछ सफल मान लिया है, मैं केवल आपकी मित्रता चाहता हूँ। हे प्रभो! इसके साथ ही मैं पार्थ के साथ द्वंद्वयुद्ध करना चाहता हूँ।" (1-146-15)
- व्याख्या: कर्ण ने अर्जुन के समान ही सभी कलाओं का प्रदर्शन किया। दुर्योधन ने तुरंत आगे बढ़कर कर्ण को गले लगाया और अपना राज्य व मित्रता अर्पित की, जिसके उत्तर में कर्ण ने अर्जुन से द्वंद्वयुद्ध की इच्छा जताई।
श्लोक 16 और 17
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्तु कर्णेन राजन्दुर्योधनस्तदा। कर्णं दीर्घाञ्चितभुजं परिष्वज्येदमब्रवीत्।। (1-146-16) भुङ्क्ष्व भोगान्मया सार्धं बन्धूनां प्रियकृद्भव। दुर्हृदां कुरु सर्वेषां मूर्ध्नि पादमरिन्दम।। (1-146-17)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे राजन्! कर्ण द्वारा ऐसा कहे जाने पर दुर्योधन ने लंबी और सुंदर भुजाओं वाले कर्ण को फिर से गले लगाकर कहा— (1-146-16) "हे अरिन्दम! तुम मेरे साथ समस्त भोगों को भोगो और मेरे भाइयों के प्रिय बनो। हमारे जितने भी शत्रु (दुर्हृद) हैं, उन सबके सिर पर अपना पैर रखो (अर्थात उन्हें पराजित करो)।" (1-146-17)
- व्याख्या: दुर्योधन ने कर्ण को पूर्ण आश्वस्त किया कि वह उनके साथ मिलकर शत्रुओं का दमन करे और सभी सुखों का भोग करे।
श्लोक 18, 19, 20 और 21
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ततः क्षिप्तमिवात्मानं मत्वा पार्थोऽभ्यभाषत। कर्णं भ्रातृसमूहस्य मध्येऽचलमिव स्थितम्।। (1-146-18) अर्जुन उवाच। अनाहूतोपसृष्टानामनाहूतोपजल्पिनाम्। ये लोकास्तान्हतः कर्ण मया त्वं प्रतिपत्स्यसे।। (1-146-19) कर्ण उवाच। रङ्गोऽयं सर्वसामान्यः किमत्र तव फाल्गुन। वीर्यश्रेष्ठाश्च राजानो बलं धर्मोऽनुवर्तते।। (1-146-20) किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत। गुरोः समक्षं यावत्ते हराम्यद्य शिरः शरैः।। (1-146-21)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब भाइयों के समूह के बीच में पर्वत की तरह अचल खड़े हुए कर्ण को देखकर, अर्जुन ने अपने को अपमानित (क्षिप्त) सा मानकर उनसे कहा— (1-146-18) "हे कर्ण! बिना बुलाए जो लोग यहाँ आ जाते हैं और बिना आमंत्रण के बढ़-बढ़कर बातें करते हैं, जो गति ऐसे लोगों की होती है, वही गति आज मैं तुम्हें मारकर तुम्हें प्राप्त कराऊँगा।" (1-146-19) कर्ण ने उत्तर दिया—"यह रंगभूमि सबके लिए सामान्य (खुली) है, हे फाल्गुन! इसमें तुम्हारा विशेष अधिकार क्या है? वीरश्रेष्ठ राजा लोग बल और धर्म के अनुसार ही चलते हैं।" (1-146-20) "हे भारत! इस तरह व्यर्थ के कटु वक्षों और कमजोरों जैसे प्रयासों से क्या लाभ? अपने बाणों से अभी गुरु (द्रोण) के सामने ही तुम्हारा सिर काट कर अलग किए देता हूँ।" (1-146-21)
- व्याख्या: अर्जुन ने कर्ण के आगमन और चुनौती को अपनी अवमानना मानकर उन पर कटाक्ष किया, जिसके जवाब में कर्ण ने रंगभूमि की सार्वभौमिता का हवाला देते हुए अर्जुन को सीधे प्राणघातक युद्ध की चुनौती दे डाली।
श्लोक 22, 23, 24, 25 और 26
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्तः परपुरञ्जयः। भ्रातृभिस्त्वरयाश्लिष्टो रणायोपजगाम तम्।। (1-146-22) ततो दुर्योधनेनापि स भ्रात्रा समरोद्यतः। परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः।। (1-146-23) ततः सविद्युत्स्तनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः। आवृतं गगनं मेघैर्बलाकापङ्क्तिहासिभिः।। (1-146-24) ततः स्नेहाद्धरिहयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम्। भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान्घनान्।। (1-146-25) मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः। सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत।। (1-146-26)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब आचार्य द्रोण से अनुमति पाकर, शत्रुओं के नगर को जीतने वाले पार्थ (अर्जुन) को भाइयों ने जल्दी से गले लगाया और वे युद्ध के लिए आगे बढ़े। (1-146-22) उधर युद्ध के लिए तत्पर कर्ण को भी दुर्योधन ने अपने भाइयों के साथ गले लगाया और वे हाथ में बाण सहित धनुष लेकर खड़े हो गए। (1-146-23) उसी समय बिजली की चमक, बादलों की गरज, इंद्रधनुष और सफेद बगुलों की पंक्तियों से युक्त काले बादल आकाश में छा गए। (1-146-24) तब अपने पुत्र (इंद्र के पुत्र अर्जुन) के प्रति स्नेह के कारण रंगभूमि का यह दृश्य देखकर सूर्यदेव ने भी अपने पास आए हुए बादलों को नष्ट (छिन्न-भिन्न) कर दिया। (1-146-25) बादलों की छाया से घिरे होने के कारण अर्जुन तो बादलों की छाया में छिपे से दिखाई दिए, किंतु सूर्य की धूप से घिरे होने के कारण कर्ण साक्षात सूर्यपुत्र की तरह चमकते हुए दिखाई दिए। (1-146-26)
- व्याख्या: दोनों योद्धा युद्ध के लिए आमने-सामने आ गए। प्रकृति ने भी ऐसा अद्भुत संयोग बनाया कि अर्जुन बादलों की छाया में और कर्ण सूर्य की सीधी धूप के प्रकाश में सुशोभित हुए।
श्लोक 27, 28, 29 और 30
श्लोक:
धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन्देशे व्यवस्थिताः। भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन्।। (1-146-27) द्विधा रङ्गः समभवत्स्त्रीणां द्वैधमजायत। कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह।। (1-146-28) तां तथा मोहमापन्नां विदुरः सर्वधर्मवित्। कुन्तीमाश्वासयामास प्रेष्याभिश्चन्दनोदकैः।। (1-146-29) ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभौ परिदंशितौ। पुत्रौ दृष्ट्वा सुसंभ्रान्ता नान्वपद्यत किंचन।। (1-146-30)
- हिंदी अनुवाद: जिधर कर्ण थे, उधर धृतराष्ट्र के पुत्र (कौरव) खड़े थे; और जिधर पार्थ थे, उधर द्रोणाचार्य, कृप और भीष्म पितामह खड़े हो गए। (1-146-27) इस प्रकार पूरी रंगभूमि दो भागों में बँट गई और स्त्रियाँ भी दो पक्षों में विभाजित हो गईं। यह रहस्य जान लेने के कारण कुन्तिभोज की पुत्री कुंती मूर्छित होकर गिर पड़ीं। (1-146-28) सब धर्मों को जानने वाले विदुर जी ने मूर्च्छा को प्राप्त हुई उन कुंती को दासियों और चंदन के जल से सांत्वना देकर होश में लाए। (1-146-29) होश में आने पर, अस्त्र-शस्त्रों से पूरी तरह सज्जित अपने दोनों पुत्रों (कर्ण और अर्जुन) को आमने-सामने खड़े देखकर कुंती अत्यंत भयभीत और संभ्रमित हो गईं और उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा था कि वे क्या करें। (1-146-30)
- व्याख्या: रंगभूमि पूरी तरह कौरव और पांडव पक्षों में विभाजित हो गई। जब कुंती ने अपने दोनों पुत्रों (कर्ण और अर्जुन) को जानलेवा द्वंद्वयुद्ध के लिए आमने-सामने खड़े देखा, तो मातृत्त्व के भय से वे मूर्छित हो गईं।
श्लोक 31, 32, 33 और 34
श्लोक:
तावुद्यतमहाचापौ कृपः शारद्वतोऽब्रवीत्। द्वन्द्वयुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित्।। (1-146-31) अयं पृथायास्तनयः कनीयान्पाण्डुनन्दनः। कौरवो भवता सार्धं द्वन्द्वयुद्धं करिष्यति।। (1-146-32) त्वमप्येवं महाबाहो मातरं पितरं कुलम्। कथयस्व नरेन्द्राणां येषां त्वं कुलभूषणम्।। (1-146-33) ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतियोत्स्यति वा न वा। वृथाकुलसमाचारैर्न युध्यन्ते नृपात्मजाः।। (1-146-34)
- हिंदी अनुवाद: तब द्वंद्वयुद्ध के नियमों में कुशल और सभी धर्मों को जानने वाले शारद्वत आचार्य कृप ने, हाथ में बड़े-बड़े धनुष उठाए हुए उन दोनों योद्धाओं से कहा— (1-146-31) "ये पाण्डुनंदन और पृथा (कुंती) के सबसे छोटे पुत्र अर्जुन हैं, जो तुम्हारे साथ द्वंद्वयुद्ध करेंगे। (1-146-32) हे महाबाहो! इसी प्रकार तुम भी अपने माता, पिता और उस कुल का परिचय इन राजाओं को दो, जिसके तुम कुलभूषण हो। (1-146-33) इसके बाद तुम्हारा कुल परिचय जानकर ही पार्थ तुम्हारे साथ युद्ध करेंगे या नहीं करेंगे, इसका निर्णय होगा। राजकुमार कभी भी अज्ञानी या अज्ञात कुल के लोगों के साथ यों ही युद्ध नहीं करते।" (1-146-34)
- व्याख्या: आचार्य कृप ने शास्त्र-नियमों का हवाला देते हुए कर्ण से कहा कि युद्ध करने से पहले वे अपने माता-पिता और कुल का परिचय दें, क्योंकि शाही नियम के अनुसार राजकुमार केवल उच्च कुल के योद्धाओं से ही द्वंद्वयुद्ध करते हैं।
श्लोक 35, 36, 37 और 38
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्य कर्णस्य व्रीडावनतमाननम्। बभौ वर्षाम्बुविक्लिन्नं पद्ममागलितं यथा।। (1-146-35) दुर्योधन उवाच। आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चये। सत्कुलीनश्च शूरश्च यश्च सेनां प्रकर्षति।। (1-146-36) `अद्भ्योऽग्निर्ब्रह्मतः क्षत्रमश्मनो लोहमुत्थितम्। तेषां सर्वत्रगं तेजः स्वासु योनिषु शाम्यति।।' (1-146-37) यद्ययं फाल्गुनो युद्धे नाराज्ञा योद्धुमिच्छति। तस्मादेषोऽङ्गविषये मया राज्येऽभिषिच्यते।। (1-146-38)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—आचार्य कृप के ऐसा कहने पर लज्जा से कर्ण का मुख नीचे झुक गया। उनका वह मुख वर्षा के जल से भीगकर डाल से टूटे हुए कमल के फूल के समान शोभा पाने लगा। (1-146-35) तब दुर्योधन ने कहा—"हे आचार्य! शास्त्रों के निर्णय के अनुसार राजाओं की तीन प्रकार की योनियाँ होती हैं—सत्कुलीन (उच्च कुल में उत्पन्न), शूरवीर, और सेना का नेतृत्व करने वाला सेनापति। (1-146-36) जल से अग्नि, ब्रह्म (ब्राह्मण) से क्षत्रिय और पत्थर से लोहा उत्पन्न होता है। उन सबका तेज सर्वत्र फैलता है, किंतु वे अंततः अपनी ही मूल योनि (उद्गम) में शांत होते हैं (अर्थात मूल योनि का महत्त्व नहीं होता, पराक्रम प्रधान होता है)। (1-146-37) यदि यह फाल्गुन (अर्जुन) केवल राजा न होने के कारण इनके साथ युद्ध करना नहीं चाहता, तो लो आज मैं इस कर्ण को 'अङ्ग देश' के राज्य पर राजा के रूप में अभिषिक्त करता हूँ।" (1-146-38)
- व्याख्या: कुल परिचय न होने के कारण जब कर्ण अपमानित महसूस करने लगे, तो दुर्योधन ने तुरंत आगे आकर तर्क दिया कि शूरवीर का कुल से नहीं, बल्कि पराक्रम से मूल्य होता है। और अर्जुन की आपत्ति को दूर करने के लिए दुर्योधन ने कर्ण को तुरंत अंग देश का राजा घोषित कर दिया।
श्लोक 39, 40, 41, 42, 43, 44, 45 और 46 (अध्याय का समापन)
श्लोक:
वैशंपायन उवाच।
ततो राजानमामन्त्र्य गाङ्गेयं च पितामहम्। अभिषेकस्य संभारान्समानीय द्विजातिभिः।। (1-146-39) गोसहस्रायुतं दत्त्वा युक्तानां पुण्यकर्मणाम्। अर्होऽयमङ्गराज्यस्य इति वाच्य द्विजातिभिः'।। (1-146-40) ततस्तस्मिन्क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः। काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः।। (1-146-41) अभिषिक्तोऽङ्गराजे स श्रिया युक्तो महाबलः।स मौलिहारकेयूरः सहस्ताभरणाङ्गदः। राजलिङ्गैस्तथाऽन्यैश्च भूषितो भूषणैः शुभैः।' सच्छत्रवालव्यजनो जयशब्दोत्तरेण च।। (1-146-43) उवाच कौरवं राजन्वचनं स वृषस्तदा। अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते।। (1-146-44) प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप। अत्यन्तं सख्यमिच्छامیत्याह तं स सुयोधनः।। (1-146-45) एवमुक्तस्ततः कर्णस्तथेति प्रत्युवाच तम्। हर्षाच्चोभौ समाश्लिष्य परां मुदमवापतुः।। (1-146-46)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब राजा धृतराष्ट्र और पितामह भीष्म से आज्ञा लेकर, ब्राह्मणों द्वारा अभिषेक की सभी सामग्रियाँ जुटाई गईं। (1-146-39) पुण्यकर्म करने वाले ब्राह्मणों से "यह कर्ण अंग राज्य के योग्य है" ऐसा कहलवाकर दस हजार गौएँ दान में दी गईं। (1-146-40) तदनंतर उसी क्षण, मन्त्रों के ज्ञाता विद्वानों द्वारा स्वर्ण के कलशों, खील और फूलों से सुसज्जित स्वर्ण के आसन पर बैठकर महारथी कर्ण का राज्याभिषेक किया गया। (1-146-41, 42) इस प्रकार वे महाबलवान कर्ण अंगदेश के राजा के रूप में सुशोभित हुए। वे मुकुट, हार, बाजूबंद (केयूर), हाथों के आभूषणों तथा अन्य राजसी चिह्नों से विभूषित किए गए। उनके ऊपर श्वेत छत्र तान दिया गया, चँवर डुलाए जाने लगे और चारों तरफ 'जय-जयकार' के शब्द गूँज उठे। (1-146-42, 43) तब वृष (कर्ण) ने राजा दुर्योधन से कहा—"राजन्! आपने मुझे यह राज्य प्रदान किया है, इसके बदले में मैं आपको क्या दूँ? हे राजशार्दूल! अपनी इच्छा बताइए, मैं वह सब करने को तैयार हूँ।" तब दुर्योधन ने उत्तर दिया—"मैं केवल आपकी अत्यंत गहरी मित्रता चाहता हूँ।" (1-146-44, 45) दुर्योधन के ऐसा कहने पर कर्ण ने "तथास्तु" (वैसा ही होगा) कहकर उत्तर दिया और हर्ष से दोनों ने एक-दूसरे को गले लगा लिया तथा परम आनंद को प्राप्त हुए। (1-146-46)
- व्याख्या: दुर्योधन ने कर्ण को अंग देश का राजा बना दिया, जिससे कर्ण का सामाजिक स्तर अर्जुन के समकक्ष हो गया। इस उपकार से अभिभूत होकर कर्ण जीवनभर के लिए दुर्योधन के पक्के मित्र बन गए और दोनों ने प्रसन्नतापूर्वक एक-दूसरे को गले लगाया।
