श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 140वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:

श्लोक 1

श्लोक:

जनमेजय उवाच। कृपस्यापि मम ब्रह्मन्संभवं वक्तुमर्हसि। शरस्तम्बात्कथं जज्ञे कथं वाऽस्त्राण्यवाप्तवान्।। (1-140-1)

  • हिंदी अनुवाद: राजा जनमेजय ने पूछा—"हे ब्रह्मन्! आप मुझे आचार्य कृप की उत्पत्ति के विषय में भी बताइए कि वे शरस्तम्ब (सरकंडे के झुंड) से कैसे उत्पन्न हुए और उन्होंने किस प्रकार अस्त्र-विद्या प्राप्त की?"
  • व्याख्या: राजा जनमेजय के मन में आचार्य कृप के जन्म और उनकी असाधारण अस्त्र-विद्या को लेकर जिज्ञासा उत्पन्न हुई, जिसका समाधान वैशंपायन जी आगे की कथा में कर रहे हैं।

श्लोक 2, 3 और 4

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। महर्षेर्गौतमस्यासीच्छरद्वान्नाम गौतमः। पुत्रः किल महाराज जातः सहशरैर्विभो।। (1-140-2) न तस्य वेदाध्ययने तथा बुद्धिरजायत। यथास्य बुद्धिरभवद्धनुर्वेदे परन्तप।। (1-140-3) अधिजग्मुर्यथा वेदास्तपसा ब्रह्मचारिणः। तथा स तपसोपेतः सर्वाण्यस्त्राण्यवाप ह।। (1-140-4)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे महाराज! महर्षि गौतम के कुल में शरद्वान् नामक एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो जन्म के समय से ही अपने साथ बाण (शर) लेकर पैदा हुआ था। हे परंतप! वेद-अध्ययन में उसकी वैसी बुद्धि नहीं थी जैसी धनुर्वेद (युद्धविद्या) में थी। जैसे ब्रह्मचारी लोग तपस्या करके वेदों का अध्ययन करते हैं, वैसे ही उन्होंने तपस्या के बल पर समस्त अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति कर ली थी।
  • व्याख्या: कृप के पिता शरद्वान् जन्मजात धनुर्धर थे और उन्होंने अपनी तपस्या के बल पर संपूर्ण धनुर्वेद पर महारत हासिल कर ली थी।

श्लोक 5, 6, 7 और 8

श्लोक:

धनुर्वेदपरत्वाच्च तपसा विपुलेन च। भृशं सन्तापयामास देवराजं स गौतमः।। (1-140-5) ततो जालवतीं नाम देवकन्यां सुरेश्वरः। प्राहिणोत्तपसो विघ्नं कुरु तस्येति कौरव।। (1-140-6) सा हि गत्वाऽऽश्रमं तस्य रमणीयं शरद्वतः। धनुर्बाणधरं बाला लोभयामास गौतमम्।। (1-140-7) तामेकवसनां दृष्ट्वा गौतमोऽप्सरसं वने। लोकेऽप्रतिमसंस्थानां प्रोत्फुल्लनयनोऽभवत्।। (1-140-8)

  • हिंदी अनुवाद: धनुर्वेद के प्रति प्रेम और अपनी विपुल तपस्या के कारण उन गौतम (शरद्वान्) ने देवराज इंद्र को बहुत अधिक संताप (भय) में डाल दिया। हे कौरव! तब इंद्र ने उनकी तपस्या में विघ्न डालने के लिए 'जालवती' नामक एक देवकन्या (अप्सरा) को भेजा और कहा कि तुम जाकर उनकी तपस्या भंग करो। वह बाला शरद्वान् के रमणीय आश्रम में गई और धनुष-बाण धारण किए हुए गौतम को अपने सौंदर्य से लुभाने लगी। वन में उस अप्सरा को केवल एक वस्त्र में तथा संसार में अद्वितीय रूप वाली देखकर गौतम की आँखें विस्मय से खिल गईं।
  • व्याख्या: शरद्वान् की कठिन तपस्या से चिंतित होकर इंद्र ने उनकी साधना भंग करने के लिए जालवती नामक अप्सरा को उनके आश्रम में भेजा, जिसने उनके संयम को चुनौती दी।

श्लोक 9, 10, 11 और 12

श्लोक:

धनुश्च हि शरास्तस्य कराभ्यामपतन्भुवि। वेपथुश्चास्य सहसा शरीरे समजायत।। (1-140-9) स तु ज्ञानगरीयस्त्वात्तपसश्च समर्थनात्। अवतस्थे महाप्राज्ञो धैर्येण परमेण ह।। (1-140-10) यस्तस्य सहसा राजन्विकारः समदृश्यत। तेन सुस्राव रेतोऽस्य स च तन्नान्वबुध्यत।। (1-140-11) धनुश्च सशरं त्यक्त्वा तथा कृष्णाजिनानि च। स विहायाश्रमं तं च तां चैवाप्सरसं मुनिः।। (1-140-12)

  • हिंदी अनुवाद: उनके हाथों से धनुष और बाण अचानक पृथ्वी पर गिर पड़े और उनके शरीर में अचानक कंपकंपी (कौरव रूपी कंपन) छूट गई। किंतु वे महाप्राज्ञ मुनि अपने ज्ञान की गहराई और तपस्या के बल पर परम धैर्य के साथ स्थिर रहे। हे राजन्! उनके शरीर में जो अचानक विकार प्रकट हुआ, उसके कारण उनका वीर्य स्खलित हो गया, लेकिन उन्हें इस बात का तुरंत ज्ञान नहीं हुआ। वे अपना धनुष-बाण, काले मृगछाल (कृष्णाजिन) तथा उस आश्रम और अप्सरा को वहीं छोड़कर तुरंत वहाँ से चल दिए।
  • व्याख्या: यद्यपि मुनि शरद्वान् ने अप्सरा के प्रलोभन के सामने अपने संयम को टूटने नहीं दिया, फिर भी अनजाने में मानसिक विचलितता के कारण उनका वीर्यस्खलित हो गया, जिसे वे छोड़कर वन से चले गए।

श्लोक 13, 14, 15 और 16

श्लोक:

जगाम रेतस्तत्तस्य शरस्तम्बे पपात च। शरस्तम्बे च पतितं द्विधा तदभवन्नृप।। (1-140-13) तस्याथ मिथुं जज्ञे गौतमस्य शरद्वतः। `महर्षेर्गौतमस्यास्य ह्याश्रमस्य समीपतः।।' मृगयां चरतो राज्ञः शान्तनोस्तु यदृच्छया।। (1-140-14) कश्चित्सेनाचरोऽरण्ये मिथुनं तदपश्यत। धनुश्च सशरं दृष्ट्वा तथा कृष्णाजिनानि च।। (1-140-15) ज्ञात्वा द्विजस्य चापत्ये धनुर्वेदान्तगस्य ह। स राज्ञे दर्शयामास मिथुनं सशरं धनुः।। (1-140-16)

  • हिंदी अनुवाद: उनका वह वीर्य जाकर सरकंडे के झुंड (शरस्तम्ब) पर गिरा। हे नृप! शरस्तम्ब पर गिरने से वह वीर्य दो भागों में बँट गया और उससे महर्षि शरद्वान् (गौतम) के दो जुड़वां बच्चे (एक लड़का और एक लड़की) उत्पन्न हुए। महर्षि गौतम के उस आश्रम के समीप ही शिकार खेलते हुए राजा शांतनु दैवयोग से आ निकले। जंगल में घूमते हुए राजा के किसी सैनिक (सेनाचर) ने उस मिथुन (जुड़वां बच्चों) को देखा। साथ ही वहाँ धनुष-बाण और कृष्णाजिन भी पड़े थे। यह पहचान कर कि ये धनुर्वेद के मर्मज्ञ किसी ब्राह्मण की संतानें हैं, उस सैनिक ने वे दोनों बच्चे, धनुष और बाण राजा शांतनु को लाकर दिखाए।
  • व्याख्या: मुनि का स्खलित वीर्य सरकंडे पर गिरने से कृप और कृपी का जन्म हुआ, जिन्हें राजा शांतनु के एक सैनिक ने जंगल में पाकर राजा को सौंप दिया।

श्लोक 17, 18 और 19

श्लोक:

स तदादाय मिथुनं राजा च कृपयान्वितः। आजगाम गृहानेव मम पुत्राविति ब्रुवन्।। (1-140-17) ततः संवर्धयामास संस्कारैश्चाप्ययोजयत्। प्रातिपेयो नरश्रेष्ठो मिथुनं गौतमस्य तत्।। (1-140-18) कृपया यन्मया बालाविमौ संवर्धिताविति। तस्मात्तयोर्नाम चक्रे तदेव स महीपतिः। `तस्मात्कृप इति ख्यातः कृपी कन्या च साऽभवत्।।' (1-140-19)

  • हिंदी अनुवाद: तब राजा शांतनु ने करुणा से भरकर उन दोनों बच्चों को ले लिया और यह कहते हुए अपने महल ले आए कि "ये मेरे ही पुत्र हैं।" नरश्रेष्ठ प्रतिप्रसुत (प्रतिनन्दन/प्रतिप्सुत के पुत्र शांतनु) ने उन बच्चों का पालन-पोषण किया और उनके सभी उचित संस्कार करवाए। राजा ने सोचा कि मैंने दयावश इन बालकों का संवर्धन (पालन) किया है, इसलिए करुणा (कृपा) के कारण ही उन महीपति ने उनका नामकरण किया—लड़के का नाम 'कृप' पड़ा और कन्या का नाम 'कृपी' हुआ।
  • व्याख्या: राजा शांतनु ने दया भाव से उन बच्चों को पाला और 'कृपा' से मिले होने के कारण उनका नाम कृप और कृपी रखा गया।

श्लोक 20, 21 और 22

श्लोक:

पितापि गौतमस्तत्र तपसा ताववन्दित। आगत्य तस्मै गोत्रादि सर्वमाख्यातवांस्तदा।। (1-140-20) `कृपोऽपि च तदा राजन्धनुर्वेदपरोऽभवत्।' चतुर्विधं धनुर्वेदं शास्त्राणि विविधानि च।। (1-140-21) निशिलेनास्य तत्सर्वं गुह्यमाख्यातवान्पिता। सोऽचिरेणैव कालेन परमाचार्यतां गतः।। (1-140-22)

  • हिंदी अनुवाद: उधर तपस्या से प्रतिष्ठित उनके पिता महर्षि गौतम (शरद्वान्) को जब इस बात का पता चला, तो वे स्वयं वहाँ आए और उन्होंने उन बच्चों को उनका कुल, गोत्र और अपनी पितृसत्ता की सारी बातें बता दीं। हे राजन्! इसके बाद कृप भी धनुर्वेद के पारावार हो गए। उनके पिता ने चतुर्विध धनुर्वेद और विभिन्न शास्त्रों का सारा गुप्त रहस्य उन्हें भली-भांति सिखा दिया। अल्पकाल में ही कृप परम आचार्य के पद को प्राप्त हो गए।
  • व्याख्या: बाद में महर्षि शरद्वान् ने खुद आकर कृप और कृपी को अपना परिचय दिया और अपनी सारी अस्त्र-विद्या अपने पुत्र कृप को सौंप दी, जिससे वे महान आचार्य बने।

श्लोक 23, 24 और 25

श्लोक:

कृपमाहूय गाङ्गेयस्तव शिष्या इति ब्रुवन्। पौत्रान्परिसमाधाय कृपमाराधयत्तदा।। (1-140-23) ततोऽधिजग्मुः सर्वे ते धनुर्वेदं महारथाः। धृतराष्ट्रात्मजाश्चैव पाण्डवाः सह यादवैः।। (1-140-24) वृष्णयश्च नृपाश्चान्ये नानादेशसमागताः। `कृपमाचार्यमासाद्य परमास्त्रज्ञतां गतः।' (1-140-25)

  • हिंदी अनुवाद: तब भीष्म पितामह (गांगेय) ने आचार्य कृप को बुलाकर अपने पौत्रों को उनके सुपुर्द किया और कहा कि "ये आपके शिष्य हैं।" इस प्रकार भीष्म जी ने कृप का आदर-सत्कार किया। इसके बाद धृतराष्ट्र के पुत्रों (कौरवों), पाण्डवों, यादवों, वृष्णि और अन्य विभिन्न देशों से आए हुए राजाओं ने महारथी कृप को अपना आचार्य पाकर परम अस्त्र-ज्ञान प्राप्त किया।
  • व्याख्या: भीष्म जी ने कौरव और पाण्डव राजकुमारों की शिक्षा-दीक्षा के लिए आचार्य कृप को नियुक्त किया, जहाँ सभी ने उनसे अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा ली।

श्लोक 25 (उत्तरार्ध), 26, 27 और 28

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। विशेषार्थी ततो भीष्मः पौत्राणां विनयेप्सया।। (1-140-25c) इष्वस्त्रज्ञान्पर्यपृच्छदाचार्यान्वीर्यसंमतान्। नाल्पधीर्नामहाभागस्तथा नानस्त्रकोविदः।। (1-140-26) नादेवसत्वो विनयेत्कुरूनस्त्रे महावलान्। इति संचिन्त्य गाङ्गेयस्तदा भरतसत्तमः।। (1-140-27) द्रोणाय वेदविदुषे भारद्वाजाय धमते। पाण्डवान्कौरवांश्चैव ददौ शिष्यान्नरर्षभ।। (1-140-28)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब भीष्म जी ने अपने पौत्रों में विशेष विनय और अस्त्र-कौशल की प्राप्ति के लिए वीर्यवान और अस्त्र-ज्ञान में श्रेष्ठ आचार्यों के विषय में विचार किया। उन्होंने सोचा कि कोई साधारण बुद्धि वाला, कम भाग्य वाला या अस्त्र-विद्या में अल्पज्ञ व्यक्ति इन महाबली कौरव-पाण्डवों को ठीक से विनययुक्त और अस्त्र-निपुण नहीं बना सकता। ऐसा सोचकर भरतश्रेष्ठ गांगेय (भीष्म) ने वेदज्ञ, भारद्वाज पुत्र तथा प्रतापी द्रोणाचार्य को उन पाण्डवों और कौरवों की शिक्षा के लिए आचार्य के रूप में नियुक्त कर दिया।
  • व्याख्या: हालांकि कृप आचार्य थे, परंतु भीष्म चाहते थे कि राजकुमारों को और अधिक उन्नत तथा दिव्य अस्त्रों की शिक्षा मिले, इसलिए उन्होंने द्रोणाचार्य को कुल गुरु के रूप में आमंत्रित किया।

श्लोक 29, 30 और 31

श्लोक:

शास्त्रतः पूजितश्चैव सम्यक्तेन महात्मना। स भीष्मेण महाभागस्तुष्टोऽस्त्रविदुषां वरः।। (1-140-29) प्रतिजग्राह तान्सर्वाञ्शिष्यत्वेन महायशाः। शिक्षयामास च द्रोणो धनुर्वेदमशेषतः।। (1-140-30) तेऽचिरेणैव कालेन सर्वशस्त्रविशारदाः। बभूवुः कौरवा राजन्पाण्डवाश्चामितौजसः।। (1-140-31)

  • हिंदी अनुवाद: महाभाग भीष्म द्वारा शास्त्रोक्त विधि से भली-भांति पूजित होकर, अस्त्र-विदों में श्रेष्ठ उन महायशा द्रोण ने अत्यंत प्रसन्नता के साथ उन सभी राजकुमारों को अपना शिष्य के रूप में स्वीकार कर लिया। द्रोणाचार्य ने उन्हें संपूर्ण धनुर्वेद की शिक्षा दी। हे राजन्! अल्पकाल में ही वे सभी कौरव और अमित तेजस्वी पाण्डव समस्त शस्त्र-विद्या में पारंगत (विशारद) हो गए।
  • व्याख्या: भीष्म के अनुरोध और पूर्ण सम्मान के साथ द्रोणाचार्य ने कौरवों और पाण्डवों को अपने शिष्य के रूप में स्वीकार किया और उन्हें श्रेष्ठ योद्धा बना दिया।

श्लोक 32 और 33

श्लोक:

जनमेजय उवाच। कथं समभवद्द्रोणः कथं चास्त्राण्यवाप्तवान्। कथं चागात्कुरून्ब्रह्मन्कस्य पुत्रः स वीर्यवान्।। (1-140-32) कथं चास्य सुतो जातः सोश्वत्थामाऽस्त्रवित्तमः। एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं विस्तरेण प्रकीर्तय।। (1-140-33)

  • हिंदी अनुवाद: राजा जनमेजय ने पूछा—"हे ब्रह्मन्! द्रोण की उत्पत्ति कैसे हुई थी? उन्होंने अस्त्र-विद्या कैसे प्राप्त की थी? वे किसके वीर पुत्र थे और कुरुवंश के पास कैसे पहुँचे? उनके अस्त्र-विशारद पुत्र अश्वत्थामा का जन्म किस प्रकार हुआ था? मैं इन सब बातों को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ, कृपया वर्णन करें।"
  • व्याख्या: जनमेजय की जिज्ञासा द्रोणाचार्य के जन्म, उनके दिव्य अस्त्र प्राप्ति और अश्वत्थामा के जन्म के इतिहास को जानने की है, जिसका उत्तर वैशंपायन जी आगे दे रहे हैं।

श्लोक 34, 35, 36 और 37

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। गङ्गाद्वारं प्रति महान्बभूव भगवानृषिः। भरद्वाज इति ख्यातः सततं संशितव्रतः।। (1-140-34) सोऽभिषेक्तुं गतो गङ्गां पूर्वमेवागतां सतीम्। महर्षिभिर्भरद्वाजो हविर्धाने चरन्पुरा।। (1-140-35) ददर्शाप्सरसं साक्षाद्धृताचीमाप्लुतामृषिः। रूपयौवनसंपन्नां मददृप्तां मदालसाम्।। (1-140-36) तस्या वायुर्नदीतीर वसनं पर्यवर्तत। व्यपकृष्टाम्बरां दृष्ट्वा तामृषिश्चकमे ततः।। (1-140-37)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—गंगाद्वार के पास हमेशा कठोर व्रतों का पालन करने वाले भगवान भरद्वाज नाम के एक महान ऋषि रहते थे। एक बार वे स्नान करने के लिए गंगा नदी के तट पर गए। वहाँ उन्होंने रूप और यौवन से संपन्न, गर्व से भरी हुई तथा मद से अलसायी हुई अप्सरा घृताची को जल से बाहर निकलते हुए देखा। नदी के तट पर बहने वाली वायु के कारण उस अप्सरा का वस्त्र उड़ गया। वस्त्र से रहित हुई उस अप्सरा को देखकर ऋषि भरद्वाज के मन में उसके प्रति काम-भाव (प्रेम) उत्पन्न हो गया।
  • व्याख्या: द्रोणाचार्य के पिता महर्षि भरद्वाज के जन्म-वृत्तांत का आरंभ यहाँ से होता है, जहाँ गंगा तट पर अप्सरा घृताची को देखकर उनके मन में विकार उत्पन्न हुआ था।

श्लोक 38 और 39

श्लोक:

तत्र संसक्तमनसो भरद्वाजस्य धीमतः। हष्टस्य रेतश्चस्कन्द तदृषिर्द्रोण आदधे।। (1-140-38) ततः समभवद्द्रोणः कलशे तस्य धीमतः। अध्यगीष्ट स वेदांश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः।। (1-140-39)

  • हिंदी अनुवाद: उस समय घृताची में आसक्त हुए बुद्धिमान् भरद्वाज ऋषि का हर्षित (काम-प्रेरित) वीर्य स्खलित हो गया, जिसे उन ऋषि ने एक 'द्रोण' (कलश/मिट्टी के बर्तन) में रख दिया। तदनंतर उस बुद्धिमान् ऋषि के उस कलश से 'द्रोण' का जन्म हुआ। उन्होंने (द्रोण ने) वेदों और सभी वेदांगों का अच्छी तरह अध्ययन किया।
  • व्याख्या: माता के गर्भ से न उत्पन्न होकर 'द्रोण' (कलश या कुंभ) में उत्पन्न होने के कारण उनका नाम द्रोण पड़ा और उन्होंने सभी शास्त्रों का अध्ययन कलश में रहते/पलते ही किया।

श्लोक 40, 41 और 42

श्लोक:

अग्नेरस्त्रमुपादाय यदृषिर्वेद काश्यपः। अध्यगच्छद्भरद्वाजस्तदस्त्रं देवकार्यतः।। (1-140-40) अग्निवेश्यं महाभागं भरद्वाजः प्रतापवान्। प्रत्यपादयदाग्नेयमस्त्रमस्त्रविदां वरः।। (1-140-41) `कनिष्ठजातं स मुनिर्भ्राता भ्रातरमन्तिके। अग्निवेश्यस्तथा द्रोणं तदा भरतसत्तम।' भारद्वाजं तदाग्नेयं महास्त्रं प्रत्यपादयत।। (1-140-42)

  • हिंदी अनुवाद: महर्षि काश्यप ने अग्निदेव से जो आग्नेय अस्त्र प्राप्त किया था, वही अस्त्र देव-कार्य के लिए भरद्वाज ऋषि ने भी अध्ययन करके प्राप्त किया था। अस्त्र-वेत्ताओं में श्रेष्ठ प्रतापी भरद्वाज ने महाभाग अग्निवेश्य को वह आग्नेय अस्त्र प्रदान किया था। हे भरतसत्तम! बाद में अग्निवेश्य ने अपने छोटे भाई के समान प्रिय शिष्य द्रोण को वह महान आग्नेय अस्त्र प्रदान किया।
  • व्याख्या: दिव्य आग्नेय अस्त्र की यह परंपरा महर्षि काश्यप से भरद्वाज और फिर अग्निवेश्य के माध्यम से द्रोणाचार्य तक पहुँची थी।

श्लोक 43, 44, 45 और 46

श्लोक:

भरद्वाजसखा चासीत्पृषतो नाम पार्थिवः। तस्यापि द्रुपदो नाम तथा समभवत्सुतः।। (1-140-43) स नित्यमाश्रमं गत्वा द्रोणेन सह पार्थिवः। चिक्रीडाध्ययनं चैव चकार क्षत्रियर्षभः।। (1-140-44) ततो व्यतीते पृषते स राजा द्रुपदोऽभवत्। पञ्चालेषु महाबाहुरुत्तरेषु नरेश्वरः।। (1-140-45) भरद्वाजोऽ भगवानारुरोह दिवं तदा। तत्रैव च वसन्द्रोणस्तपस्तेपे महातपाः।। (1-140-46)

  • हिंदी अनुवाद: भरद्वाज ऋषि के मित्र पृषत नाम के एक राजा थे। उनके द्रुपद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह क्षत्रियश्रेष्ठ राजकुमार नित्य भरद्वाज के आश्रम में जाकर द्रोण के साथ खेलता और अध्ययन करता था। तदनंतर राजा पृषत के देहांत के पश्चात वे द्रुपद उत्तर पांचाल देश के राजा बने। उधर भगवान भरद्वाज ऋषि स्वर्ग सिधार गए, और द्रोण वहीं रहकर महातपस्या करने लगे।
  • व्याख्या: बचपन में द्रोण और द्रुपद गहरे मित्र थे और एक साथ आश्रम में शिक्षा लेते थे। बाद में द्रुपद पांचाल के राजा बन गए और द्रोण आश्रम में ही तपस्या करने लगे।

श्लोक 47, 48 और 49

श्लोक:

वेदवेदाङ्गविद्वान्स तपसा दग्धकिल्बिषः। ततः पितृनियुक्तात्मा पुत्रलोभान्महायशाः।। (1-140-47) शारद्वतीं ततो भार्यां कृपीं द्रोणोऽन्वविन्दत। अग्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सतत रताम्।। (1-140-48) अलभद्गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमेव C च। स जातमात्रो व्यनदद्यथैवोच्चैःश्रवा हयः।। (1-140-49)

  • हिंदी अनुवाद: वेद-वेदांगों के ज्ञाता और तपस्या से पापों को भस्म करने वाले महायशस्वी द्रोण ने अपने पिता की आज़ादी और पुत्र की इच्छा से प्रेरित होकर, आचार्य कृप की बहन तथा शरद्वान् की पुत्री कृपी से विवाह किया, जो अग्निहोत्र, धर्म और संयम में हमेशा तत्पर रहती थीं। उन गौतमी (कृपी) से द्रोण को अश्वत्थामा नामक पुत्र प्राप्त हुआ। जन्म लेते ही उस बालक ने उच्चैःश्रवा घोड़े की तरह तेज आवाज (हिनहिनाहट) में चीख/आवाज की।
  • व्याख्या: द्रोण का विवाह कृपी से हुआ और उनके यहाँ अश्वत्थामा का जन्म हुआ, जिनके जन्म के समय घोड़े जैसी आवाज गूंजी थी।

श्लोक 50 और 51

श्लोक:

तच्छ्रुत्वान्तर्हितं भूतमन्तरिक्षस्थमब्रवीत्। अश्वस्येवास्य यत्स्थाम नदतः प्रदिशो गतम्।। (1-150-50 - (1-140-50)) अश्वत्थामैव बालोऽयं तस्मान्नाम्ना भविष्यति। सुतेन तेन सुप्रीतो भारद्वाजस्ततोऽभवत।। (1-140-51)

  • हिंदी अनुवाद: उस आवाज को सुनकर अंतरिक्ष में छिपे हुए किसी अदृश्य भूत (आकाशवाणी) ने कहा—"घोड़े के समान इसका पराक्रम और स्वर दिशाओं में गूंजा है, इसलिए यह बालक संसार में 'अश्वत्थामा' नाम से प्रसिद्ध होगा।" उस पुत्र से भारद्वाज (द्रोण) बहुत अधिक प्रसन्न हुए।
  • व्याख्या: जन्म के समय घोड़े जैसी आवाज निकालने के कारण आकाशवाणी द्वारा इस बालक का नाम 'अश्वत्थामा' रखा गया, जिससे द्रोण बेहद प्रसन्न हुए।

श्लोक 52, 53 और 54

श्लोक:

तत्रैव च वसन्धीमान्धनुर्वेदपरोऽभवत्। स शुश्राव महात्मानं जामदग्न्यं परंतपम्।। (1-140-52) सर्वज्ञानविदं विप्रं सर्वशस्त्रभृतां वरम्। ब्राह्मणैभ्यस्तदा राजन्दित्सन्तं वसु सर्वशः।। (1-140-53) स रामस्य धनुर्वेदं दिव्यान्यस्त्राणि चैव H। श्रउत्वा तेषु मनश्चक्रे नीतिशास्त्रे तथैव च।। (1-140-54)

  • हिंदी अनुवाद: वहीं निवास करते हुए बुद्धिमान् द्रोण धनुर्वेद के अध्ययन में तल्लीन हो गए। उन्होंने परंतप, सर्वज्ञान संपन्न, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ और ब्राह्मणों को अपनी सारी संपत्ति दान करने वाले महात्मा परशुराम (जामदग्न्य) के बारे में सुना। परशुराम जी द्वारा धनुर्वेद और दिव्य अस्त्रों का दान किए जाने की बात सुनकर द्रोण का मन उनके पास जाने के लिए हुआ।
  • व्याख्या: जब द्रोण को पता चला कि परशुराम जी अपनी सारी संपत्ति और अस्त्र-विद्या ब्राह्मणों को दान कर रहे हैं, तो उन्होंने परशुराम से अस्त्र-विद्या सीखने का निर्णय लिया।

श्लोक 55, 56, 57 और 58

श्लोक:

ततः स व्रतिभिः शिष्यैस्तपोयुक्तैर्महातपाः। वृतः प्रायान्महावाहुर्महेन्द्रं पर्वतोत्तमम्।। (1-140-55) ततो महेन्द्रमासाद्य भारद्वाजो महातपाः। क्षत्रघ्नं तममित्रघ्नमपश्यद्भृगुनन्दनम्।। (1-140-56) ततो द्रोणो वृतः शिष्यैरुपगम्य भृगूद्वहम्। आचख्यावात्मनो नाम जन्म चाङ्गिरसः कुलै।। (1-140-57) निवेद्य शिरसा भूमौ पादौ चैवाभ्यवादयत। ततस्तं सर्वमुत्सृज्य वनं जिगमिषुं तदा।। (1-140-58)

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद महातपस्वी महाबाहु द्रोण व्रतधारी और तपस्वी शिष्यों से घिरे हुए पर्वतों में श्रेष्ठ 'महेन्द्र पर्वत' की ओर चल पड़े। महेन्द्र पर्वत पर पहुँचकर महातपस्वी भारद्वाज (द्रोण) ने क्षत्रियों का संहार करने वाले, शत्रुओं के नाशक भृगुनन्दन परशुराम के दर्शन किए। तब शिष्यों से घिरे हुए द्रोण ने भृगूद्वह (परशुराम) के पास जाकर अपना नाम और अंगिरस कुल में अपना जन्म बताया। उन्होंने सिर को जमीन पर झुकाकर उनके चरणों में प्रणाम किया। उस समय परशुराम जी सब कुछ (अपनी संपत्ति) दान कर चुके थे और वन में जाने की तैयारी कर रहे थे।
  • व्याख्या: द्रोण अपने शिष्यों के साथ महेंद्र पर्वत पर परशुराम के पास पहुँचे, ठीक उसी समय जब परशुराम अपनी सारी संपत्ति दान करके वन प्रस्थान करने वाले थे।

श्लोक 59, 60 और 61

श्लोक:

जामदग्न्यं महात्मानं भारद्वाजोऽब्रवीदिदम्। भरद्वाजात्समुत्पन्नं तथा त्वं मामयोनिजम्।। (1-140-59) आगतं वित्तकामं मां विद्धि द्रोणं द्विजोत्तम। तमब्रवीन्महात्मा स सर्वक्षत्रियमर्दनः।। (1-140-60) स्वागतं ते द्विजश्रेष्ठ यदिच्छसि वदस्व मे। एवमुक्तस्तु रामेण भारद्वाजोऽब्रवीद्वचः।। (1-140-61)

  • हिंदी अनुवाद: तब भारद्वाज (द्रोण) ने महात्मा जामदग्न्य (परशुराम) से कहा—"हे द्विजोत्तम! आप मुझे भरद्वाज ऋषि से उत्पन्न और अयोनिज (कलश से उत्पन्न) द्रोण जानिए। मैं धन की इच्छा से आपके पास आया हूँ।" तब सभी क्षत्रियों का मर्दन करने वाले उन महात्मा परशुराम ने कहा—"हे द्विजश्रेष्ठ! आपका स्वागत है। आप जो कुछ भी चाहते हैं, मुझसे कहिए।" राम (परशुराम) द्वारा ऐसा कहे जाने पर भारद्वाज (द्रोण) ने अपना निवेदन रखा।
  • व्याख्या: द्रोण ने परशुराम को अपना परिचय दिया और स्पष्ट किया कि वे ज्ञान और धन (अस्त्र-विद्या रूपी धन) की कामना से उनके पास आए हैं, जिस पर परशुराम ने उनका स्वागत किया।

श्लोक 62, 63, 64, 65 और 66

श्लोक:

रामं प्रहरतां श्रेष्ठं दित्सन्तं विविधं वसु। अहं धनमनन्तं हि प्रार्थये विपुलव्रत।। (1-140-62) राम उवाच। हिरण्यं मम Yच्चान्यद्वसु किंचिदिह स्थितम्। ब्राह्मणैभ्यो मया दत्तं सर्वमेतत्तपोधन।। (1-140-63) तथैवेयं धरा देवी सागरान्ता सपत्तना। कश्यपाय मया दत्ता कृत्स्ना नगरमालिनी।। (1-140-64) शरीरमात्रमेवाद्य ममेदमवशेषितम्। अस्त्राणि च महार्हाणि शस्त्राणि विविधानि च।। (1-140-65) अस्त्राणि वा शरीरं वा ब्रह्मञ्शस्त्राणि वा पुनः। वृणीष्व किं प्रयच्छामि तुभ्यं द्रोण वदाशु तत्।। (1-140-66)

  • हिंदी अनुवाद: प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ, तरह-तरह का धन दान करने वाले परशुराम से द्रोण ने कहा—"हे विपुलव्रत! मैं अनंत धन की प्रार्थना करता हूँ।" परशुराम जी ने कहा—"हे तपोधन! मेरा जितना भी सोना या अन्य धन था, वह सब मैंने ब्राह्मणों को दान कर दिया है। इसी प्रकार यह समुद्रपर्यंत तथा नगरों-मालामों से सुशोभित संपूर्ण पृथ्वी भी मैंने महर्षि कश्यप को दान कर दी है। आज इस समय केवल मेरा शरीर ही शेष बचा है और साथ में मेरे पास महार्ह (कीमती) अस्त्र और विभिन्न प्रकार के शस्त्र हैं। हे ब्रह्मन्! आप अस्त्र, मेरा शरीर या शस्त्र—इनमें से क्या चाहते हैं? आप जो मांगेंगे, मैं वही द्रोण को दूंगा, शीघ्र बताइए।"
  • व्याख्या: जब परशुराम ने बताया कि वे अपना सारा धन और पृथ्वी दान कर चुके हैं और अब केवल उनके पास अस्त्र-विद्या बची है, तो उन्होंने द्रोण को अस्त्र या अपने शरीर (सेवा) में से कुछ भी चुनने को कहा।

श्लोक 67, 68 और 69

श्लोक:

द्रोण उवाच। अस्त्राणि मे समग्राणि ससंहाराणि भार्गव। स प्रयोगरहस्यानि दातुमर्हस्यशेषतः।। (1-140-67) `एतद्वसु वसूनां हि सर्वेषां विप्रसत्तम।' तथेत्युक्त्वा ततस्तस्मै प्रादादस्त्राणि भार्गवः। सरहस्यव्रतं चैव धनुर्वेदमशेषतः।। (1-140-68) प्रतिगृह्य तु तत्सर्वं कृतास्त्रे द्विजसत्तमः। प्रियं सखायं सुप्रीतो जगाम द्रुपदं प्रति।। (1-140-69)

  • हिंदी अनुवाद: द्रोण ने कहा—"हे भार्गव! आप मुझे संघार (उपसंहार) के सहित संपूर्ण अस्त्र, उनके प्रयोग और रहस्यों के साथ पूरी तरह से प्रदान करें।" (परशुराम ने कहा—"हे विप्रसत्तम! यही मेरा सबसे बड़ा धन है।") 'तथास्तु' कहकर भृगुनन्दन परशुराम ने उन्हें समस्त अस्त्र, उनके रहस्य, व्रत और संपूर्ण धनुर्वेद का पूर्ण ज्ञान दे दिया। उस समस्त अस्त्र-विद्या को प्राप्त करके और उसमें पूर्ण कृतास्त्र (पारंगत) होकर वे द्विजसत्तम द्रोण बहुत प्रसन्न हुए और अपने प्रिय मित्र द्रुपद के पास गए।
  • व्याख्या: परशुराम ने द्रोण को समस्त दिव्य अस्त्रों और उनके उपसंहार का संपूर्ण रहस्य सिखा दिया। अस्त्र-विद्या में पूर्ण रूप से निपुण होने के बाद द्रोण अपने मित्र द्रुपद से मिलने के लिए रवाना हुए।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि
चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 140 ।।

Previous                Index                     Next