श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि ऊनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 139वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:

श्लोक 1 और 2

श्लोक:

दुर्योधनस्तु पापात्मा भीममाशीविषहदे। प्रक्षिप्य कृतकृत्यं स्वमात्मानं मन्यते तदा।। (1-139-1) प्रभातायां रजन्यां च प्रविवेश पुरं ततः। ब्रुवाणो भीमसेनस्तु यातो ह्यग्रत एव नः।। (1-139-2)

  • हिंदी अनुवाद: पापात्मा दुर्योधन भीम को विषैले सांपों के कुंड (गंगाजी के जल) में फेंककर उस समय अपने को कृतकृत्य (सफल मनोरथ) मान रहा था। रात बीतने पर प्रातःकाल वह नगर में प्रवेश कर गया और लोगों से यह झूठा प्रलाप करने लगा कि "भीमसेन तो हमसे भी आगे आगे (पहले ही) नगर के लिए रवाना हो गए थे।"
  • व्याख्या: दुर्योधन ने अपनी क्रूरता को छिपाने के लिए सुबह ऐसा नाटक किया मानो उसे कुछ पता ही न हो और वह यह साबित करने की कोशिश करने लगा कि भीम उससे पहले ही कहीं निकल गए थे।

श्लोक 3, 4, 5, 6, 7 और 8

श्लोक:

युधिष्ठिरस्तु धर्मात्मा ह्यविदन्पापमात्मनि। स्वेनानुमानेन परं साधुं समनुपश्यति।। (1-139-3) सोऽभ्युपेत्य तदा पार्थो मातरं भ्रातृवत्सलः। अभिवाद्याब्रवीत्कुन्तमम्ब भीम इहागतः।। (1-139-4) क्व गतो भविता मातर्नेह पश्यामि तं शुभे। उद्यानानि वनं चैव विचितानि समन्ततः।। (1-139-5) तदर्थं न च तं वीरं दृष्टवन्तो वृकोदरम्। मन्यमानास्ततः सर्वे यातो नः पूर्वमेव सः।। (1-139-6) आगताः स्म महाभागे व्याकुलेनान्तरात्मना। इहागम्य क्व नु गतस्त्वया वा प्रेषितः क्व नु।। (1-139-7) कथयस्व महाबाहुं भीमसेनं यशस्विनि। नहि मे शुध्यते भावस्तं वीरं प्रति शोभने।। (1-139-8) यतः प्रसुप्तं मन्येऽहं भीम् नेति हतस्तु सः। इत्युक्ता च ततः कुन्ती धर्मराजेन धीमता।। (1-139-9)

  • हिंदी अनुवाद: धर्मात्मा युधिष्ठिर दूसरों के मन के पाप को नहीं जानते थे, वे अपने ही जैसे सरल स्वभाव के अनुमान से हर व्यक्ति को सज्जन ही समझते थे। भ्रातृवत्सल युधिष्ठिर ने माता कुंती के पास जाकर उनका अभिवादन किया और कहा—"हे अम्बे! क्या भीम यहाँ आ गए हैं? हे शुभे! वह कहाँ चले गए होंगे? मैं उन्हें यहाँ नहीं देख रहा हूँ। हमने उद्यान और वन को सब ओर से खोज डाला, परंतु उस वीर वृकोदर को हमने कहीं नहीं पाया। हम सब यही मान रहे थे कि वे हमसे पहले ही घर लौट आए होंगे। हे महाभागे! हम व्याकुल अंतःकरण से यहाँ आए हैं। यहाँ आकर वे कहाँ चले गए या आपने उन्हें कहीं भेजा है? हे यशस्विनी! महाबाहु भीमसेन के संबंध में मुझे बताइए, उस वीर के विषय में मेरा मन शांत नहीं हो रहा है। मैं तो यह शंका कर रहा हूँ कि कहीं वे सोए हुए अवस्था में ही मार तो नहीं डाले गए?"
  • व्याख्या: जब भीम सुबह तक नहीं लौटे, तो युधिष्ठिर व्याकुल होकर माता कुंती के पास पहुँचे और अपनी गहरी आशंका व्यक्त की कि कहीं अनहोनी न हो गई हो।

श्लोक 10, 11, 12, 13 और 14

श्लोक:

हाहेति कृत्वा संभ्रान्ता प्रत्युवाच युधिष्ठिरम्। न पुत्र भीमं पश्यामि न मामभ्येत्यसाविति।। (1-139-10) शीघ्रमन्वेषणे यत्नं कुरु तस्यानुजैः सह। द्रुतं गत्वा पुरोद्यानं विचिन्वन्तिस्म पाण्डवाः।। (1-139-11) भीमभीमेति ते वाचा पाण्डवाः समुदैरयन्। विचिन्वन्तोऽथ ते सर्वे न स्म पश्यन्ति भ्रातरम्।। (1-139-12) आगताः स्वगृहं भूय इदमूचुः पृथां तदा। न दृश्यते महाबाहुरम्ब भीमो वने चितः।। (1-139-13) विचितानि च सर्वाणि ह्युद्यानानि नदीस्तथा। (1-139-14)

  • हिंदी अनुवाद: युधिष्ठिर की बात सुनकर कुंती घबरा गईं और "हा! हा!" कहकर विलाप करती हुई बोलीं—"पुत्र! मैंने भीम को नहीं देखा है, वह मेरे पास नहीं आए हैं। तुम अपने भाइयों के साथ मिलकर शीघ्र ही उनके अन्वेषण (खोज) का प्रयत्न करो।" तब पाण्डव तुरंत राजमहल के उद्यान में गए और "हे भीम! हे भीम!" पुकारते हुए उन्हें खोजने लगे। सब जगह खोजने पर भी जब भाई नहीं मिला, तब वे पुनः अपने घर लौटे और कुंती से बोले—"हे अम्बे! वनों, सभी उद्यानों और नदियों को अच्छी तरह से खोज लिया है, किंतु महाबाहु भीम कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं।"
  • व्याख्या: कुंती और पाण्डव परिवार भीम के गायब होने पर अत्यंत चिंतित हो गए और पूरे वन-उद्यान में उनकी तलाश शुरू कर दी।

श्लोक 15, 16, 17 और 18

श्लोक:

ततो विदुरमानाय्य कुन्ती सा स्वं निवेशनम्।। (1-139-14) उवाच बलवान्क्षत्तर्भीमसेनो न दृश्यते।। (1-139-15) उद्यानान्निर्गताः सर्वे भ्रातरो भ्रातृभिः सह। तत्रैकस्तु महाबाहुर्भीमो नाभ्येति मामिह।। (1-139-16) न च प्रीणयते चक्षुः सदा दुर्योधनस्य सः। क्रूरोऽसौ दुर्मतिः क्षुद्रो राज्यलुब्धोऽनपत्रपः।। (1-139-17) निहन्यादपि तं वीरं जातमन्युः सुयोधनः। तेन मे व्याकुलं चित्तं हृदयं दह्यतीव च।। (1-139-18)

  • हिंदी अनुवाद: तब माता कुंती ने विदुर जी को अपने घर बुलवाकर कहा—"हे क्षत्तः! बलवान भीमसेन कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं। सभी भाई कौरवों के साथ उद्यान में गए थे, किंतु उनमें से अकेले महाबाहु भीम मेरे पास नहीं लौटे हैं। दुर्योधन को भीम का रूप कभी सुहाता नहीं है। वह क्रूर, दुर्मति, क्षुद्र, राज्य का लोभी और निर्लज्ज है। क्रोध से भरा हुआ वह दुर्योधन उस वीर (भीम) की हत्या भी कर सकता है। इसी कारण मेरा चित्त व्याकुल है और मेरा हृदय जल रहा है।"
  • व्याख्या: कुंती ने अपनी शंका सीधे विदुर जी के सामने रखी और दुर्योधन की दुष्टता व राज्यलोभ का हवाला देते हुए डर व्यक्त किया कि दुर्योधन ने भीम का अंत कर दिया होगा।

श्लोक 19 और 20

श्लोक:

विदुर उवाच। मैवं वदस्व कल्याणि शेषसंरक्षणं कुरु। प्रत्यादिष्टो हि दुष्टात्मा शेषेऽपि प्रहरेत्तव।। (1-139-19) दीर्घायुषस्तव सुता यथोवाच महामुनिः। आगमिष्यति ते पुत्रः प्रीतिं चोत्पादयिष्यति।। (1-139-20)

  • हिंदी अनुवाद: विदुर जी ने कहा—"हे कल्याणि! ऐसा मत कहो। अपनी बात को गुप्त रखो (गोपनीयता बनाए रखो)। यदि दुष्टात्मा दुर्योधन को पता चल गया कि हम उस पर संदेह कर रहे हैं, तो वह तुम्हारे बाकी पुत्रों पर भी प्रहार कर सकता है। महामुनि व्यास ने जैसा कहा था, तुम्हारे सभी पुत्र दीर्घायु हैं। तुम्हारा वह पुत्र अवश्य वापस आएगा और तुम्हारे मन में आनंद उत्पन्न करेगा।"
  • व्याख्या: विदुर जी ने कूटनीति और सावधानी बरतने की सलाह दी ताकि दुर्योधन को यह भनक न लगे कि वे उसकी साजिश समझ चुके हैं, और उन्होंने कुंती को ढांढस बंधाया कि भीम सुरक्षित लौटेंगे।

श्लोक 21, 22 और 23

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा ययौ विद्वान्विदुरः स्वं निवेशनम्। कुन्ती चिन्तापरा भूत्वा सहासीना सुतैर्गृहे।। (1-139-21) ततोऽष्टमे तु दिवसे प्रत्यबुध्यत पाण्डवः। तस्मिंस्तदा रसे जीर्णे सोऽप्रमेयबलो बली।। (1-139-22) तं दृष्ट्वा प्रतिबुध्यन्तं पाण्डवं ते भुजङ्गमाः। सान्त्वयामासुरव्यग्रा वचनं चेदमब्रुवन्।। (1-139-23)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—विद्वान् विदुर ऐसा कहकर अपने घर चले गए। इधर कुंती अपने पुत्रों के साथ घर में चिंतायुक्त बैठी रहीं। उधर नागलोक में आठवें दिन जब वह दिव्य रस पच गया, तब अप्रमेय बल वाले महाबली पाण्डव (भीम) जागे। जागते हुए उन पाण्डव को देखकर वे नाग प्रसन्न होकर सांत्वना देने लगे और ये वचन बोले—
  • व्याख्या: सात दिन तक नागलोक में अष्ट कुंड दिव्य रस का पान करने के बाद आठवें दिन भीम की मूर्छा टूटी और वे सहज अवस्था में जागे, जहाँ नागों ने उनका स्वागत किया।

श्लोक 24 और 25

श्लोक:

यत्ते पीतो महाबाहो रसोऽयं वीर्यसंभृतः। तस्मान्नागायुतबलो रणेऽधृष्यो भविष्यसि।। (1-139-24) गच्छाद्य त्वं च स्वगृहं स्नातो दिव्यैरिमैर्जलैः। भ्रातरस्तेऽनुतप्यन्ति त्वां विना कुरुपुङ्गव।। (1-139-25)

  • हिंदी अनुवाद: "हे महाबाहो! आपने यह जो वीर्य (बल) से भरपूर रस पिया है, इसके प्रभाव से आप दस हजार हाथियों के बल से युक्त हो जाएंगे और युद्ध में कोई भी आपको परास्त नहीं कर सकेगा। हे कुरुपुङ्गव! आज आप इन दिव्य जल से स्नान करके अपने घर जाइए, क्योंकि आपके बिना आपके भाई बहुत दुखी हो रहे हैं।"
  • व्याख्या: नागों ने भीम को बताया कि उस रस के प्रभाव से उनके भीतर असीम शक्ति (दस हजार हाथियों का बल) आ गई है और अब उन्हें हस्तिनापुर लौट जाना चाहिए।

श्लोक 26, 27, 28 और 29

श्लोक:

ततः स्नातो महाबाहुः शुचिशुक्लाम्बरस्रजः। ततो नागस्य भवने कृतकौतुकमङ्गलः।। (1-139-26) ओषधीभिर्विषघ्नीभिः सुरभीभिर्विशेषतः। भुक्तवान्परमान्नं च नागैर्दत्तं महाबलः।। (1-139-27) पूजितो भुजगैर्वीर आशीर्भिश्चाभिनन्दितः। दिव्याभरणसंछन्नो नागानामन्त्र्य पाण्डवाः।। (1-139-28) उदतिष्ठत्प्रहृष्टात्मा नागलोकादरिन्दमः। उत्क्षिप्य च तदा नागैर्जलाज्जलरुहेक्षणः।। (1-139-29)

  • हिंदी अनुवाद: इसके बाद महाबाहु भीम ने दिव्य जल से स्नान किया, पवित्र एवं श्वेत वस्त्र तथा मालाएँ धारण कीं। नागभवन में उनके लिए सभी मंगल अनुष्ठान किए गए। विषनाशक और सुगंधित औषधियों के लेप के साथ महाबली भीम ने नागों द्वारा दिया गया उत्तम भोजन (परमान्न) ग्रहण किया। सर्पों द्वारा पूजित, आशीर्वाद प्राप्त, दिव्य आभूषणों से सुसज्जित और शत्रुओं का दमन करने वाले वे पाण्डव नागों से विदा लेकर प्रफुल्लित मन से नागलोक से ऊपर उठे। कमल के समान नेत्रों वाले उन भीम को नागों ने जल से बाहर पहुँचा दिया।
  • व्याख्या: नागलोक में पूर्ण आदर-सत्कार, मंगल स्नान और उत्तम भोजन प्राप्त करने के पश्चात भीम पूरी तरह तरोताजा होकर वापस भूलोक के लिए रवाना हुए।

श्लोक 30, 31, 32 और 33

श्लोक:

तस्मिन्नेव वनोद्देशे स्थापितः कुरुनन्दनः। ते चान्तर्दधिरे नागाः पाण्डवस्यैव पश्यतः।। (1-139-30) तत उत्थाय कौन्तेयो भीमसेनो महाबलः। आजगाम महाबाहुर्मातुरन्तिकमञ्जसा।। (1-139-31) ततोऽभिवाद्य जननीं ज्येष्ठं भ्रातरमेव च। कनीयसः समाघ्राय शिरस्स्वरिविमर्दनः।। (1-139-32) तैश्चापि संपरिष्वक्तः सह मात्रा नरर्षभैः। अन्योन्यगतसौहार्दाद्दिष्ट्या दिष्ट्येति चाब्रुवन्।। (1-139-33)

  • हिंदी अनुवाद: कुरुनन्दन भीम को उसी वन-प्रदेश में स्थापित करके वे सभी नाग पाण्डव के देखते-देखते अंतर्ध्यान हो गए। तदनंतर महाबली कौन्तेय भीमसेन वहाँ से उठकर सीधे अपनी माता के समीप आ पहुँचे। उन्होंने माता कुंती और अपने बड़े भाई युधिष्ठिर को प्रणाम किया तथा छोटे भाइयों के सिर सूंघे (प्यार किया)। शत्रुओं का मर्दन करने वाले उन भीम को माता और भाइयों ने अपने गले से लगा लिया। आपसी प्रेम के कारण सबने "दिष्ट्या! दिष्ट्या!" (भाग्य से आप सकुशल हैं!) कहकर प्रसन्नता व्यक्त की।
  • व्याख्या: आठ दिन बाद जब भीम सकुशल लौटकर हस्तिनापुर पहुंचे और अपनी माता व भाइयों से मिले, तो पूरा परिवार खुशी से झूम उठा।

श्लोक 34 और 35

श्लोक:

ततस्तत्सर्वमाचष्ट दुर्योधनविचेष्टितम्। भ्रातॄणां भीमसेनश्च महाबलपराक्रमः।। (1-139-34) नागलोके च यद्वृत्तं गुणदोषमशेषतः। तच्च सर्वमशेषेण कथयामास पाण्डवः।। (1-139-35)

  • हिंदी अनुवाद: महाबल-पराक्रमी भीमसेन ने अपने भाइयों को दुर्योधन द्वारा किए गए सभी कुकृत्यों और षड्यंत्रों के बारे में विस्तार से बताया। साथ ही नागलोक में जो कुछ भी घटना घटी थी, उसके गुण और दोष (सभी प्रसंग) को पूरी तरह से पाण्डवों के सामने कह सुनाया।
  • व्याख्या: भीम ने हस्तिनापुर पहुंचते ही दुर्योधन की सारी करतूतों (विष देना, गंगा में फेंकना, नागलोक जाना और वहां बल प्राप्त करना) का सच अपने परिवार के सामने खोल दिया।

श्लोक 36, 37, 38 और 39

श्लोक:

ततो युधिष्ठिरो राजा भीममाह वचोऽर्थवत्। तूष्णीं भव न ते जल्प्यमिदं कार्यं कथंचन।। (1-139-36) इतःप्रभृति कौन्तेयं रक्षतान्योन्यमादृताः। एवमुक्त्वा महाबाहुर्धर्मराजो युधिष्ठिरः।। (1-139-37) भ्रातृभिः सहितः सर्वैरप्रमत्तोऽभवत्तदा। यदा त्ववगतास्ते वै पाण्डवास्तस्य कर्म तत्।। (1-139-38) नत्वेव बहुलं चक्रुः प्रयता मन्त्ररक्षणे। धर्मात्मा विदुरस्तेषां प्रददौ मतिमान्मतिम्।। (1-139-39)

  • हिंदी अनुवाद: तब राजा युधिष्ठिर ने भीम से अर्थपूर्ण वचन में कहा—"तुम चुप रहो। इस बात की चर्चा किसी भी हाल में कहीं नहीं करनी चाहिए। आज से तुम सब लोग सावधान रहकर एक-दूसरे की रक्षा करो।" ऐसा कहकर महाबाहु धर्मराज युधिष्ठिर अपने सभी भाइयों के साथ अत्यंत सतर्क हो गए। जब पाण्डवों को दुर्योधन की इस नीचता का पूरा ज्ञान हो गया, तब उन्होंने विदुर जी की बुद्धिमत्तापूर्ण सलाह के अनुसार अपनी मंत्रणा (गोपनीयता) की रक्षा की और इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटा।
  • व्याख्या: युधिष्ठिर ने परिपक्वता दिखाते हुए भीम को चुप रहने और भविष्य के लिए अत्यंत सतर्क रहने का निर्देश दिया, ताकि कौरवों को यह न पता चले कि उनकी साजिश का पर्दाफाश हो चुका है।

श्लोक 40, 41 और 42

श्लोक:

दुर्योधनोऽपि तं दृष्ट्वा पाण्डवं पुनरागतम्। निश्वसंश्चिन्तयंश्चैवमहन्यहनि तप्यते।। (1-139-40) कुमारान्क्रीडमानांस्तान्दृष्ट्वा राजातिदुर्मदान्। गुरुं शिक्षार्थमन्विष्य गौतमं तान्न्यवेदयत्।। (1-139-41) शरस्तम्बे समुद्भूतं वेदशास्त्रार्थपारगम्। `राज्ञा निवेदितास्तस्मै ते च सर्वे च निष्ठिताः।' अधिजग्मुश्च कुरवो धनुर्वेदं कृपात्तु ते।। (1-139-42)

  • हिंदी अनुवाद: इधर दुर्योधन भी भीम को जीवित और पुनः वापस आया हुआ देखकर रोज ठंडी सांसें भरता और चिंता करते हुए जलता (कुढ़ता) रहता था। उन अति दुर्मद क्रीड़ा करने वाले कुमारों को देखकर राजा (धृतराष्ट्र) ने शिक्षा प्राप्त करने के लिए गुरु की खोज की और कृर्पाचार्य (गौतम) को उनके पास नियुक्त कर दिया। शर-स्तम्ब (सरकंडे के झुंड) से उत्पन्न, वेद-शास्त्रों के मर्मज्ञ तथा सभी शास्त्रों में पारंगत कृर्पाचार्य को राजा द्वारा वे कुमार सौंप दिए गए। तब उन कौरवों और पाण्डवों ने कृपाचार्य जी से धनुर्वेद (शस्त्रविद्या) की शिक्षा ग्रहण की।
  • व्याख्या: भीम के जीवित लौटने से दुर्योधन अंदर ही अंदर घुटने लगा। इसके बाद धृतराष्ट्र ने राजकुमारों को युद्धकला सिखाने के लिए कृपाचार्य को नियुक्त किया, जहाँ कौरवों और पाण्डवों ने एक साथ अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा लेनी शुरू की।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि ऊनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 139 ।।

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