महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 141वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:
श्लोक 1, 2 और 3
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ततो द्रुपदमासाद्य भारद्वाजः प्रतापवान्। अब्रवीत्पार्थिवं राजन्सखायं विद्धि मामिह।। (1-141-1) इत्येवमुक्तः सख्या स प्रीतिर्पूर्वं जनेश्वरः। भारद्वाजेन पाञ्चाल्यो नामृष्यत वचोऽस्य तत्।। (1-141-2) स क्रोधामर्षजिह्मभ्रूः कषायीकृतलोचनः। ऐश्वर्यमदसंपन्नो द्रोणं राजाऽब्रवीदिदम्।। (1-141-3)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—इसके बाद प्रतापवान् भारद्वाज (द्रोण) पांचालराज द्रुपद के पास गए और उनसे प्रेमपूर्वक बोले—"राजन्! आप मुझे अपना मित्र जानिए।" द्रुपद ने भारद्वाज द्वारा कहे गए इस प्रीतिपूर्ण 'मित्र' शब्द को सहन नहीं किया (उन्हें यह बात बुरी लगी)। ऐश्वर्य के मद से उन्मत्त हुए उस पांचालराज की भौंहें क्रोध और रोष से टेढ़ी हो गईं, उनकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं और उन्होंने द्रोण से यह बात कही—
- व्याख्या: जब द्रोण दरिद्रता की स्थिति में अपने पुराने मित्र द्रुपद से मिलने राजा के रूप में मिले और उन्हें मित्र कहा, तो राजमद में चूर द्रुपद को यह अपमानजनक लगा और उन्होंने मित्रता के उस रिश्ते को ठुकरा दिया।
श्लोक 4, 5, 6 और 7
श्लोक:
द्रुपद उवाच। अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन्नातिसमञ्जसा। यन्मां व्रवीषि प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज।। (1-141-4) न हि राज्ञामुदीर्णानामेवंभूतैर्नरैः क्वचित्। सख्यं भवति मन्दात्मञ्श्रिया हीनैर्धनच्युतैः।। (1-141-5) सौहृदान्यपि जीर्यन्ते कालेन परिजीर्यतः। सौहृदं मे त्वया ह्यासीत्पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम्।। (1-141-6) न सख्यमजरं लोके हृदि तिष्ठति कस्यचित्। कामश्चैतन्नाशयति क्रोधो वैनं रहत्युत।। (1-141-7)
- हिंदी अनुवाद: द्रुपद ने कहा—"हे ब्राह्मण! तुम्हारी यह बुद्धि बिल्कुल ठीक (उचित) नहीं है, जो तुम जबरन मुझसे यह कह रहे हो कि मैं तुम्हारा मित्र हूँ। हे मन्दबुद्धे! ऐश्वर्यवान् राजाओं के साथ तुम जैसे श्रीहीन और धन से गिरे हुए मनुष्यों की मित्रता कभी नहीं हो सकती। समय बीतने के साथ पुराने प्रेम संबंध भी जीर्ण (शीर्ण) हो जाते हैं। पहले जो हमारा प्रेम था, वह अध्ययन काल के सामर्थ्य के कारण था। संसार में कोई भी मित्रता अमर होकर किसी के हृदय में सदा नहीं रहती; काम और क्रोध इसे नष्ट कर देते हैं।"
- व्याख्या: द्रुपद ने अहंकार में आकर कहा कि बचपन की विद्या अर्जन के समय की मित्रता और वर्तमान में राजा व एक साधारण ब्राह्मण के बीच की स्थिति में जमीन-आसमान का अंतर है, इसलिए अब मित्रता का कोई औचित्य नहीं है।
श्लोक 8, 9, 10 और 11
श्लोक:
मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवदुपाधिकृत्। आसीत्सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम्।। (1-141-8) न दरिद्रो वसुमतो नाविद्वान्विदुषः सखा। न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते।। (1-141-9) ययोरेव समं वित्तं ययोरेव समं श्रुतम्। तयोर्विवाहः सख्यं च न तु पुष्टविपुष्टयोः।। (1-141-10) नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा। नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते।। (1-141-11)
- हिंदी अनुवाद: "इसलिए तुम इस पुरानी और अर्थहीन मित्रता को मत दुहराओ। हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरा वह सख्य संबंध केवल आवश्यकता (स्वार्थ/अध्ययन) के कारण था। न तो दरिद्र धनी का मित्र हो सकता है, न अज्ञानी विद्वान का, और न ही कायर शूरवीर का। मित्रता या विवाह तो उन्हीं लोगों में शोभा देता है, जिनका धन और ज्ञान समान हो; एक संपन्न और दूसरा विपन्न व्यक्ति मित्र नहीं हो सकते। न अश्रोट्रिय श्रोत्रिय का, न बिना रथ वाले रथ वाले का, और न साधारण राजा सम्राट का मित्र हो सकता है।"
- व्याख्या: द्रुपद ने धन, पद और सामाजिक स्तर की असमानता का हवाला देते हुए द्रोण के साथ मित्रता के अधिकार को पूरी तरह से नकार दिया और उनका अपमान किया।
श्लोक 12, 13, 14 और 15
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। द्रुपदेनैवमुक्तस्तु भारद्वाजः प्रतापवान्। मुहूर्तं चिन्तयित्वा तु मन्युनाऽभिपरिप्लुतः।। (1-141-12) स विनिश्चित्य मनसा पाञ्चाल्यं प्रतिबुद्धिमान्। जगाम कुरुमुख्यानां नागरं नागसाह्वयम्।। (1-141-14) स नागपुरमागम्य गौतमस्य निवेशने। भारद्वाजोऽवसत्तत्र प्रच्छन्नं द्विजसत्तमः।। (1-141-15)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—द्रुपद के द्वारा ऐसा कहे जाने पर प्रतापवान् भारद्वाज (द्रोण) क्रोध से भर गए और एक मुहूर्त तक विचार करते रहे। बुद्धिमान् द्रोण ने मन ही मन पांचालराज (द्रुपद) के प्रति एक निश्चित संकल्प (प्रतिज्ञा) किया और वे शिष्यों तथा पुत्र के साथ कुरुवंशियों की राजधानी हस्तिनापुर (नागसाह्वय) के लिए चल पड़े। हस्तिनापुर पहुँचकर द्विजसत्तम भारद्वाज आचार्य कृप के घर में छिपकर (गुप्त रूप से) रहने लगे।
- व्याख्या: द्रुपद द्वारा किए गए इस अपमान से द्रोण को गहरा आघात लगा और उन्होंने प्रतिज्ञाबद्ध होकर हस्तिनापुर में शरण ली, जहाँ वे कृप के घर में गुप्त रूप से रहने लगे।
श्लोक 16, 17, 18 और 19
श्लोक:
ततोऽस्य तनुजः पार्थान्कृपस्यानन्तरं प्रभुः। अस्त्राणि शिक्षयामास नाबुध्यन्त च तं जनाः।। (1-141-16) एवं स तत्र गूढात्मा कंचित्कालमुवास ह। कुमारास्त्वथ निष्क्रम्य समेता गजसाह्वयात्।। (1-141-17) क्रीडन्तो वीटया तत्र वीराः पर्यचरन्मुदा। पपात धर्मपुत्रस्य वीटा तत्रैव चापतत्। गर्तान्बुना प्रतिच्छन्नं तारारूपमिवाम्बरे।। (1-141-19)
- हिंदी अनुवाद: इसके बाद प्रभु द्रोण ने कृप के पढ़ाने के बाद पाण्डवों को छिपकर अस्त्र-विद्या की शिक्षा देना शुरू कर दिया, जिसे लोग जान नहीं पाए। इस प्रकार वे कुछ समय तक वहाँ गुप्त रूप से निवास करने लगे। एक दिन हस्तिनापुर के सभी वीर राजकुमार नगर से बाहर निकलकर गेंद-और-बल्ले (या कंचों/गेंद जैसी क्रीड़ा सामग्री 'वीटा') से आनंदपूर्वक खेल रहे थे। खेलते-खेलते युधिष्ठिर की 'वीटा' (गेंद जैसी वस्तु) घास या पानी से ढके हुए एक कुएं (गड्ढे) में ऐसे जा गिरी, जैसे आकाश में कोई तारा छिप जाता है।
- व्याख्या: द्रोण हस्तिनापुर में रहकर गुप्त रूप से राजकुमारों को अस्त्र सिखाने लगे। एक दिन राजकुमारों का खेलकूद के दौरान एक उपकरण (वीटा) एक गुप्त कुएं में जा गिरा।
श्लोक 20, 21, 22 और 23
श्लोक:
ततस्ते यत्नमातिष्ठन्वीटामुद्धर्तुमादृताः। न च ते प्रत्ययद्यन्त कर्म वीटोपलब्धये।। (1-141-20) ततोऽन्योन्यमवैक्षन्त व्रीडयावनताननाः। तस्या योगमविदन्तो भृशं चोत्कण्ठिताभवन्।। (1-141-21) तेऽपश्यन्ब्राह्मणं श्याममापन्नं पलितं कृशम्। कृत्यवन्तमदूरस्थमग्निहोत्रपुरस्कृतम्।। (1-141-22) ते तं दृष्ट्वा महातमानमुपगम्य कुमारकाः। भग्नोत्साहक्रियात्मानो ब्राह्मणं पर्यवारयन्।। (1-141-23)
- हिंदी अनुवाद: तब उन राजकुमारों ने उस वीटा को बाहर निकालने का बहुत यत्न किया, परंतु वे उसे पाने में सफल नहीं हो सके। तब वे लज्जित होकर नीचे सिर झुकाकर एक-दूसरे का मुख देखने लगे और उसे निकालने का उपाय न पाकर बहुत उत्कंठित व निराश हो गए। उसी समय उन्होंने देखा कि पास ही एक साँवले रंग के, दुबले-पतले, वृद्ध और अग्निहोत्र कर्म में संलग्न एक ब्राह्मण (द्रोण) बैठे हैं। अपने उत्साह से हाथ धो चुके वे बालक उन महात्मा ब्राह्मण के पास गए और उन्हें घेरकर खड़े हो गए।
- व्याख्या: जब राजकुमार कुएं में गिरी वीटा को निकालने में असफल रहे और निराश हो गए, तब उनकी नजर पास ही बैठे द्रोणाचार्य पर पड़ी और वे सहायता के लिए उनके पास पहुंचे।
श्लोक 24, 25 और 26
श्लोक:
अथ द्रोणः कुमारांस्तान्दृष्ट्वा कत्यवशस्तदा। प्रहस्य मन्दं पैशल्यादभ्यभाषत वीर्यवान्।। (1-141-24) अहो वो धिग्बलं क्षात्रं धिगेतां वः कृतास्त्रताम्। भरतस्यान्वये जाता ये वीटां नाधिगच्छत।। (1-141-25) वीटां च मुद्रिकां चैव ह्यहमेतदपि द्वयम्। उद्धरेयमिषीकाभिर्भोजनं मे प्रदीयताम्।। (1-141-26)
- हिंदी अनुवाद: तब वीर्यवान् द्रोण उन बालकों को देखकर थोड़ा मुस्कुराए और कौतुकवश बोले—"अहो! तुम्हारे क्षत्रिय बल को धिक्कार है और तुम्हारी इस अस्त्र-विद्या को भी धिक्कार है, जो तुम भरतवंश में उत्पन्न होकर इस वीटा (गेंद) को भी बाहर नहीं निकाल पा रहे हो? यदि तुम मुझे भर पेट भोजन दो, तो मैं इस वीटा को और साथ ही युधिष्ठिर की उस अंगूठी (मुद्रिका) को भी इन सरकंडों (इषीका) के माध्यम से बाहर निकाल सकता हूँ।"
- व्याख्या: द्रोण ने बालकों की परीक्षा लेते हुए ताना मारा और कहा कि यदि वे उन्हें भोजन का प्रबंध करा दें, तो वे सरकंडों के बाण बनाकर कुएं से वीटा और अंगूठी दोनों बाहर निकाल देंगे।
श्लोक 27, 28, 29 और 30
श्लोक:
ततोऽब्रवीत्तदा द्रोणं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः। कृपस्यानुमते ब्रह्मन्भिक्षामाप्नुहि शाश्वतीम्।। (1-141-27) द्रोण उवाच। एषा मुष्टिरिषीकाणां मयाऽस्त्रेणाभिमन्त्रिता।। (1-141-28) अस्या वीर्यं निरीक्षध्वं यदन्येषु न विद्यते। वेत्स्यामीषिकया वीटां तामिषीकां तथाऽन्यया।। (1-141-29) वैशंपायन उवाच। ततो यथोक्तं द्रोणेन तत्सर्वं कृतमञ्जसा।। (1-141-30)
- हिंदी अनुवाद: तब कुंतीपुत्र युधिष्ठिर ने द्रोण से कहा—"हे ब्रह्मन्! आचार्य कृप की अनुमति से आप सदा के लिए हमारी ओर से भिक्षा (भोजन) प्राप्त कीजिए।" द्रोण ने कहा—"सरकंडों (इषीका) की यह मुट्ठी मेरे द्वारा अस्त्र-मंत्रित की गई है। इसका पराक्रम देखो, जो दूसरों में नहीं है। मैं इस इषीका (सरकंडे) से उस वीटा को दूसरी इषीका से जोड़कर बाहर निकालूँगा।" वैशंपायन जी कहते हैं—तब द्रोण ने जैसा कहा था, वैसा ही तुरंत करके दिखा दिया।
- व्याख्या: युधिष्ठिर के वचन और स्वीकृति मिलने पर द्रोण ने अपनी अस्त्र-विद्या का चमत्कार दिखाते हुए सरकंडों के सहारे कुएं से वह वस्तु बाहर निकाल दी।
श्लोक 31, 32, 33 और 34
श्लोक:
तदवेक्ष्य कुमारास्ते विस्मयोत्फुल्ललोचनाः। आश्चर्यमिदमत्यन्तमिति मत्वा वचोऽब्रुवन्।। (1-141-31) मुद्रिकामणि विप्रर्षे शीध्रमेतां समुद्धरथ।। (1-141-32) ततः शरं समादाय धनुश्चापि महायशाः। शरेण विद्ध्वा मुद्रां तामूर्ध्वमावाहयत्प्रभुः।। (1-141-33) ददौ ततः कुमाराणां विस्मितानामविस्मितः। मुद्रिकामुद्धृतां दृष्ट्वा तमाहुस्ते कुमारकाः।। (1-141-34)
- हिंदी अनुवाद: उस चमत्कार को देखकर उन राजकुमारों की आँखें आश्चर्य से खिल गईं और उन्होंने कहा—"यह तो अत्यंत ही आश्चर्य की बात है! हे विप्रर्षे! अब हमारी इस मुद्रिका (अंगूठी) को भी शीघ्र बाहर निकाल दीजिए।" तब महायशस्वी प्रभु द्रोण ने धनुष और बाण उठाया तथा अपने बाण से उस अंगूठी को भेदकर ऊपर खींच लिया। तदनंतर अविस्मित (शांतचित्त) द्रोण ने उस निकाली हुई अंगूठी को विस्मित हुए राजकुमारों को सौंप दिया। अंगूठी को बाहर आई देख राजकुमारों ने कहा—
- व्याख्या: जब द्रोण ने सरकंडे के बाद अपने सटीक बाण संधान से कुएं में गिरी अंगूठी को भी बाहर निकाल कर बालकों को सौंप दिया, तो सभी राजकुमार हक्के-बक्के रह गए।
श्लोक 35, 36, 37 और 38
श्लोक:
अभिवन्दामहे ब्रह्मन्नैतदन्येषु विद्यते। कोऽसि कस्यासि जानीमो वयं किं करवामहे।। (1-141-35) वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्ततो द्रोणः प्रत्युवाच कुमारकान्। आचक्षध्वं च भीष्माय रूपेण च गुणैश्च माम्।। (1-141-36) तथेत्युक्त्वा च गत्वा च भीष्ममूचुः कुमारकाः। ब्राह्मणस्य वचः कृत्स्नं तच्च कर्म तथाविधम्।। (1-141-38)
- हिंदी अनुवाद: "हे ब्रह्मन्! हम आपको प्रणाम करते हैं। ऐसा कौशल दूसरों में नहीं है। आप कौन हैं? किसके पुत्र हैं? हम आपको कैसे जान सकते हैं और हम आपके लिए क्या सेवा कर सकते हैं?" वैशंपायन जी कहते हैं—बालकों के ऐसा कहने पर द्रोण ने उनसे कहा—"तुम लोग भीष्म जी के पास जाकर मेरा रूप और मेरे ये गुण उन्हें बता दो। वही महातेजा इस समय सब समझ जाएंगे।" राजकुमारों ने "बहुत अच्छा" कहा और तुरंत भीष्म जी के पास जाकर उस ब्राह्मण की सारी बातें और उनका वह अद्भुत कर्म कह सुनाया।
- व्याख्या: राजकुमारों के यह पूछने पर कि आप कौन हैं, द्रोण ने उन्हें भीष्म के पास जाकर अपना वर्णन करने को कहा, क्योंकि वे द्रोण को भली-भांति जानते थे।
श्लोक 39, 40 और 41
श्लोक:
भीष्मः श्रुत्वा कुमाराणां द्रोणं तं प्रत्यजानत। युक्तरूपः स हि गुरुरित्येवमनुचिन्त्य च।। (1-141-39) अथैनमानीय तदा स्वयमेव सुसत्कृतम्। परिपप्रच्छ निपुणं भीष्मः शस्त्रभृतां वरः।। (1-141-40) द्रोण उवाच। महर्षेरग्निवेश्यस्य सकाशमहमच्युत। अस्त्रार्थमगमं पूर्वं धनुर्वेदजिघृक्षया।। (1-141-41)
- हिंदी अनुवाद: राजकुमारों की बात सुनकर भीष्म जी तुरंत समझ गए कि वे द्रोण ही हैं। उन्होंने विचार किया कि "यही हमारे राजकुमारों के लिए सबसे उपयुक्त गुरु हो सकते हैं।" यह सोचकर शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ भीष्म जी स्वयं गए और बड़े आदर-सत्कार के साथ द्रोण को अपने यहाँ ले आए। उन्होंने बड़ी निपुणता से उनके आगमन का हेतु पूछा, तब द्रोण ने सब कुछ विस्तार से बता दिया। द्रोण ने कहा—"हे अच्युत! मैं पहले धनुर्वेद सीखने के लिए महर्षि अग्निवेश्य के पास गया था।"
- व्याख्या: भीष्म ने बालकों के वर्णन से पहचान लिया कि वह महान ब्राह्मण द्रोणाचार्य ही हैं। उन्होंने ससम्मान द्रोण को अपने यहाँ आमंत्रित किया और उनके आने का कारण पूछा।
श्लोक 42, 43, 44 और 45
श्लोक:
ब्रह्मचारी विनीतात्मा जटिलो बहुलाः समाः। अवसं सुचिरं तत्र गुरुशुश्रूषणे रतः।। (1-141-42) पाञ्चाल्यो राजपुत्रश्च यज्ञसेनो महाबलः। इष्वस्त्रहेतोर्न्यवसत्तस्मिन्नेव गुरौ प्रभुः।। (1-141-43) स मे तत्र सखा चासीदुपकारी प्रियश्च मे। तेनाहं सह संगम्य वर्तयन्सुचिरं प्रभो।। (1-141-44) बाल्यात्प्रभृति कौरव्य सहाध्ययनमेव च। स मे सखा सदा तत्र प्रियवादी प्रियंकरः।। (1-141-45)
- हिंदी अनुवाद: "वहाँ मैंने विनीत आत्मा होकर, जटा धारण कर ब्रह्मचारी के रूप में बहुत वर्षों तक गुरु की सेवा में रहकर निवास किया। उसी गुरु के पास पांचालराज का महाबली पुत्र यज्ञसेन (द्रुपद) भी अस्त्र-विद्या के लिए रहता था। वह वहाँ मेरा उपकारी और प्रिय मित्र बन गया था। हे प्रभो! हम दोनों ने वहाँ बहुत समय तक साथ रहकर अध्ययन किया था। हे कौरव्य! बचपन से ही हम दोनों का साथ पढ़ना हुआ था और वह मेरा हमेशा प्रिय बोलने वाला तथा प्रिय करने वाला मित्र था।"
- व्याख्या: द्रोण ने भीष्म को अपनी और द्रुपद की पुरानी मित्रता तथा अग्निवेश्य के आश्रम में साथ बिताए दिनों की पूरी पृष्ठभूमि समझाई।
श्लोक 46, 47 और 48
श्लोक:
अब्रवीदिति मां भीष्म वचनं प्रीतिवर्धनम्। अहं प्रियतमः पुत्रः पितुर्द्रोण महात्मनः।। (1-141-46) अभिषेक्ष्यति मां राज्ये स पाञ्चाल्यो यदा तदा। तद्भोज्यं भवता राज्यमर्धं सत्येन ते शपे।। (1-141-47) मम भोगाश्च वित्तं च त्वदधीनं सुखानि च। एवमुक्त्वाऽथ वव्राज कृतास्त्रः पूजितो मया।। (1-141-48)
- हिंदी अनुवाद: "हे भीष्म! उसने मुझसे यह प्रेमवर्धक वचन कहा था—'जब मेरे पिता मुझे राज्य पर अभिषेक करेंगे, तब मैं सत्य की शपथ लेकर कहता हूँ कि यह राज्य तुम्हारे साथ आधा बाँटकर भोगने योग्य होगा। मेरे सभी भोग, धन और सुख तुम्हारे आधीन होंगे।' ऐसा कहकर और मेरे द्वारा पूजित होकर वह अस्त्र-विद्या सीखकर चला गया था।"
- व्याख्या: द्रोण ने बताया कि द्रुपद ने अध्ययन काल में वादा किया था कि राजा बनने पर वह अपना आधा राज्य द्रोण को देगा, जिसके भरोसे द्रोण बाद में उसके पास गए थे।
श्लोक 49, 50 और 51
श्लोक:
तच्च वाक्यमहं नित्यं मनसा धारयंस्तदा। सोऽहं पितृनियोगेन पुत्रलोभाद्यशस्विनीम्।। (1-141-49) शारद्वतीं महाप्रज्ञामुपयेमे महाव्रताम्। अग्निहोत्रे च सत्रे च दमे च सततं रताम्।। (1-141-50) लेभे च गौतमी पुत्रमश्वत्थामानमौरसम्। भीमविक्रमकर्माणमादित्यसमतेजसम्।। (1-141-51)
- हिंदी अनुवाद: "उसके उस वचन को मैं हमेशा अपने मन में धारण किए रहा। तदनंतर मैंने पिता की आज्ञा और पुत्र की इच्छा से महाप्रज्ञा, महाव्रता, अग्निहोत्र और संयम में सदा तत्पर रहने वाली यशस्विनी शारद्वती (कृपी) से विवाह किया। उस गौतमी (कृपी) से मुझे भीम पराक्रमी तथा सूर्य के समान तेजस्वी और औरस पुत्र अश्वत्थामा प्राप्त हुआ।"
- व्याख्या: द्रोण ने अपने गृहस्थ जीवन और पुत्र अश्वत्थामा के जन्म का प्रसंग भीष्म के सामने रखा।
श्लोक 52, 53 और 54
श्लोक:
पुत्रेण तेन प्रीतोऽहं भारद्वाज मया यथा। गोक्षीरं पिबतो दृष्ट्वा धनिनस्तत्र पुत्रकान्। अश्वत्थामारुदद्बालस्तन्मे संदेहयद्दिशः।। (1-141-52) न स्नातकोऽवसीदेत वर्तमानः स्वकर्मसु। इति संचिन्त्य मनसा तं देशं बहुशो भ्रमन्।। (1-141-53) विशुद्धणिच्छन्गाङ्गेय धर्मोपेतं प्रतिग्रहम्। अन्तादन्तं परिक्रम्य नाध्यगच्छं पयस्विनीम्।। (1-141-54)
- हिंदी अनुवाद: "अपने उस पुत्र से मैं बहुत प्रेम करता था। एक दिन अन्य धनवान बालकों को गाय का दूध पीते देखकर मेरा बालक अश्वत्थामा रोने लगा, जिससे मेरा मन व्याकुल हो गया। मैंने सोचा कि स्नातक (विद्याध्ययन समाप्त करने वाला व्यक्ति) को अपने कर्मों में रहते हुए कभी दीन नहीं होना चाहिए। हे गांगेय! धर्मयुक्त प्रतिग्रह (दान) की इच्छा से मैं देश-विदेश में भटका, किंतु मुझे कोई ऐसा गोधन देने वाला नहीं मिला।"
- व्याख्या: द्रोण ने गरीबी के कारण अपने छोटे बच्चे अश्वत्थामा को दूध न मिलने पर हुई अपनी मानसिक पीड़ा और धन की आवश्यकता का कारण स्पष्ट किया।
श्लोक 55, 56, 57 और 58
श्लोक:
यवपिष्टोदकेनैनं लोभयेयं कुमारकम्। पीत्वा पिष्टरसं बालः क्षीरं पीतं मयाऽपि च।। (1-141-55) ननर्तोत्थाय कौरव्य हृष्टो बाल्याद्चिमोहितः। ततं दृष्ट्वा नृत्यमानं तु बालैः परिवृतं सुतम्।। (1-141-56) हास्यतामुपसंप्राप्तं कश्मलं तत्र मेऽभवत्। द्रोणं धिगस्त्वधनिनं यो धनं नाधिगच्छति।। (1-141-57) पिष्टोदकं सुतो यस्य पीत्वा क्षीरस्य तृष्णया। नृत्यतिस्म मुदाविष्टः क्षीरं पीतं मयाऽप्युत।। (1-141-58)
- हिंदी अनुवाद: "तब मैंने यव (जौ) के आटे को पानी में घोलकर उसे पिला दिया ताकि बालक दूध समझकर भ्रमित हो जाए। उस आटे का घोल पीकर बालक दूध समझकर खुशी से नाचने लगा। बालकों से घिरे हुए अपने उस पुत्र को नाचते देखकर मुझे अत्यंत मोह और लज्जा हुई। मैंने खुद को कोसा कि उस निर्धन द्रोण को धिक्कार है, जिसके पास धन नहीं है! जिसके पुत्र ने दूध की तृष्णा में केवल आटे का घोल पीकर ही आनंदित होकर नृत्य किया हो, और वह समझ रहा हो कि उसने दूध पिया है।"
- व्याख्या: द्रोण ने वह मर्मस्पर्शी प्रसंग सुनाया जब उन्होंने अपने भूखे बच्चे को बहलाने के लिए आटे का पानी पिलाया था, जिससे उनका हृदय विचलित हो उठा था।
श्लोक 59, 60, 61 और 62
श्लोक:
इति संभाषतां वाचं श्रुत्वा मे बुद्धिरच्यवत्। आत्मानं चात्मना गर्हन्मनसेदं व्यचिन्तयम्।। (1-141-59) अपि चाहं पुरा विप्रैर्वर्जितो गर्हितो वसे। परोपसेवां पापिष्ठां न कुर्यां धनेप्सया।। (1-141-60) इति मत्वा प्रियं पुत्रं भीष्मादाय ततो ह्यहम्। पूर्वस्नेहानुरागित्वात्सदारः सौमकिं गतः।। (1-141-61) अभिषिक्तं तु श्रुत्वैव कृतार्थोऽस्मीति चिन्तयन्। प्रियं सखायं सुप्रीतो राज्यस्थं समुपागमम्।। (1-141-62)
- हिंदी अनुवाद: "ऐसी बातें सुनकर मेरी बुद्धि विचलित हो गई और मैं मन ही मन स्वयं की निंदा करने लगा। मैंने सोचा कि धन की इच्छा से पापिनी परसेवा (दूसरे की चाकरी) करने से अच्छा है कि मैं ब्राह्मणों द्वारा निन्दित या वर्जित कार्य न करूँ। ऐसा सोचकर, हे भीष्म! मैं अपने प्रिय पुत्र और पत्नी को साथ लेकर, पूर्वकाल के स्नेह के कारण सौमकि (द्रुपद) के पास गया। यह सुनकर कि वह राजा बन गया है, मैंने सोचा कि अब मेरा कार्य सिद्ध हो गया है और मैं अति प्रसन्न होकर अपने राज्यस्थ प्रिय मित्र के पास गया।"
- व्याख्या: अपनी गरीबी से दुखी होकर और द्रुपद के पुराने वादे का स्मरण करके द्रोण अपनी पत्नी और पुत्र को साथ लेकर सहायता पाने की उम्मीद में द्रुपद के पास पहुंचे थे।
श्लोक 63, 64, 65 और 66
श्लोक:
संस्मरन्सङ्गमं चैव वचनं चैव तस्य तत्। ततो द्रुपदमागम्य सखइपूर्वमहं प्रभो।। (1-141-63) अब्रुवं पुरुषव्याघ्र सखायं विद्धि मामिति। उपस्थितस्तु द्रुपदं सखिवच्चास्मि सङ्गतः।। (1-141-64) स मां निराकारमिव प्रहसन्निदमब्रवीत्। अकृतेयं तव प्रज्ञा ब्रह्मन्नातिसमञ्जसा।। (1-141-65) यदात्थ मां त्वं प्रसभं सखा तेऽहमिति द्विज। संगतनीह जीर्यन्ति कालेन परिजीर्यतः।। (1-141-66)
- हिंदी अनुवाद: "हे प्रभो! उसके साथ के संगम और उसके उन वचनों को स्मरण करते हुए मैंने द्रुपद के पास जाकर उसे 'मित्र' कहकर संबोधित किया और कहा कि आप मुझे अपना सखा जानिए। जब मैं मित्र भाव से द्रुपद के पास उपस्थित हुआ, तो उसने मेरा तिरस्कार करते हुए हंसते हुए मुझसे कहा—'हे ब्राह्मण! तुम्हारी यह बुद्धि बिल्कुल ठीक नहीं है, जो तुम मुझे जबरन अपना मित्र कह रहे हो। समय बीतने के साथ पुराने संबंध जीर्ण हो जाते हैं...'"
- व्याख्या: द्रोण ने भीष्म को बताया कि कैसे उन्होंने प्रेम और पुराने वादे के तहत द्रुपद को मित्र माना, किंतु द्रुपद ने अहंकार में उनके उस प्रेम का मज़ाक उड़ाया।
श्लोक 67, 68, 69 और 70
श्लोक:
सौहृदं मे त्वया ह्यासीत्पूर्वं सामर्थ्यबन्धनम्। नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा।। (1-141-67) साम्याद्धि सख्यं भवति वैषम्यान्नोपपद्यते। न सख्यमजरं लोके विद्यते जातु कस्यचित्।। (1-141-68) कामो वैनं विहरति क्रोधो वैनं रहत्युत। मैवं जीर्णमुपास्स्व त्वं सख्यं भवदुपाधिकृत्।। (1-141-69) आसीत्सख्यं द्विजश्रेष्ठ त्वया मेऽर्थनिबन्धनम्। नह्यनाढ्यः सखाऽऽढ्यस्य नाविद्वान्विदुषः सखा।। (1-141-70)
- हिंदी अनुवाद: "उसने मुझसे कहा—'मेरा और तुम्हारा वह सौहृद पहले केवल सामर्थ्य के कारण था। मित्रता हमेशा समानता वालों में होती है, असमानता में नहीं। इस संसार में कोई भी मित्रता अमर नहीं होती; काम और क्रोध इसे नष्ट कर देते हैं। इसलिए तुम इस पुरानी, उपाधि-युक्त मित्रता को मत दुहराओ। हे द्विजश्रेष्ठ! तुम्हारे साथ मेरा संबंध केवल अर्थ (स्वार्थ/पढ़ाई) के कारण था। न धनहीन धनवान का मित्र हो सकता है, और न अज्ञानी विद्वान का...'"
- व्याख्या: द्रोण ने द्रुपद द्वारा कहे गए अपमानजनक शब्दों को शब्दशः भीष्म के सामने दोहराया, जिसमें द्रुपद ने अपनी उच्च स्थिति और द्रोण की दरिद्रता का अंतर जताया था।
श्लोक 71, 72, 73, 74 और 75
श्लोक:
न शूरस्य सखा क्लीबः सखिपूर्वं किमिष्यते। न हि राज्ञामुदीर्णानामेवं भूतैर्नरैः क्वचित्।। (1-141-71) सख्यं भवति मन्दात्मञ्छ्रिया हीनैर्धनच्युतैः। नाश्रोत्रियः श्रोत्रियस्य नारथी रथिनः सखा।। (1-141-72) नाराजा पार्थिवस्यापि सखिपूर्वं किमिष्यते। अहं त्वया न जानामि राज्यार्थे संविदं कृताम्।। (1-141-73) एकरात्रं तु ते ब्रह्मन्कामं दास्यामि भोजनम्। एवमुक्तस्त्वहं तेन सदारः प्रस्थितस्तदा।। (1-141-74) तां प्रतिज्ञां प्रतिज्ञाय यां कर्ताऽस्म्यचिरादिव। द्रुपदेनैवमुक्तोऽहं मन्युनाऽभिपरिप्लुतः।। (1-141-75)
- हिंदी अनुवाद: "उसने यह भी कहा कि न कायर शूरवीर का मित्र हो सकता है और न ही श्रीहीन व धनहीन व्यक्ति उदीर्ण राजाओं के मित्र हो सकते हैं। उसने कहा कि मैं नहीं जानता कि तुमने राज्य के संबंध में कोई समझौता किया था। हाँ, हे ब्रह्मन्! मैं तुम्हें केवल एक रात का भोजन दे सकता हूँ।' उसके ऐसा कहने पर मैं अपनी पत्नी के साथ वहाँ से लौट आया और मैंने मन में वह प्रतिज्ञा कर ली जिसे मैं शीघ्र ही पूरा करने वाला हूँ। द्रुपद के ऐसे वचनों से मेरा मन क्रोध से भर गया।"
- व्याख्या: द्रोण ने बताया कि कैसे द्रुपद ने उन्हें एक साधारण भिखारी की तरह एक रात के भोजन का ताना देकर अपमानित किया, जिसके बाद उन्होंने द्रुपद को सबक सिखाने की प्रतिज्ञा की थी।
श्लोक 76, 77, 78, 79 और 80
श्लोक:
अभ्यागच्छं कुरून्भीष्म शिष्यैरर्थी गुणान्वितैः। ततोऽहं भवतः कामं संवर्धयितुमागतः।। (1-141-76) इदं नागपुरं रम्यं ब्रूहि किं करवाणि ते। वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्तदा भीष्मो भारद्वाजमभाषत।। (1-141-77) भीष्म उवाच। अपज्यं क्रियतां चापं साध्वस्त्रं प्रतिपादय। भुङ्क्ष भोगान्भृशं प्रीतः पूज्यमानः कुरुक्षये।। (1-141-78) कुरूणामस्ति Yद्वित्तं राज्यं चेदं सराष्ट्रकम्। त्वमेव परमो राजा सर्वे वाक्यकरास्तव।। (1-141-79) Yच्च ते प्रार्थितं ब्रह्मन्कृतं तदिति चिन्त्यताम्। दिष्ट्या प्राप्तोऽसि विप्रर्षे महान्मेऽनुग्रहः कृतः।। (1-141-80)
- हिंदी अनुवाद: "हे भीष्म! मैं गुणवान शिष्यों की इच्छा रखता हुआ आपके पास कुरुवंश में आया हूँ और इस समय मैं आपकी इस सुंदर नागपुर (हस्तिनापुर) नगरी में आपके राजकुमारों को शिक्षित करने के लिए आया हूँ। अब आप बताइए, मैं आपके लिए क्या करूँ?" वैशंपायन जी कहते हैं—द्रोण के ऐसा कहने पर भीष्म जी ने उनसे कहा—"आप बेझिझक अपना धनुष और अस्त्र-विद्या का प्रसार करें। कुरुवंश में पूर्ण प्रसन्नता के साथ आदर-सत्कार प्राप्त करते हुए समस्त भोगों का उपभोग करें। कौरवों का जितना भी धन और राष्ट्र सहित राज्य है, उसके आप ही परम स्वामी (राजा) हैं और सभी लोग आपकी आज्ञा का पालन करेंगे। हे ब्रह्मन्! आपने जो भी प्रार्थना की है, समझ लीजिए वह पूरी हो गई है। हे विप्रर्षे! बड़े सौभाग्य से आप यहाँ पधारे हैं और आपने मुझ पर बहुत बड़ा अनुग्रह किया है।"
- व्याख्या: भीष्म ने द्रोणाचार्य को ससम्मान कुरुवंश के गुरु के रूप में स्वीकार किया और उन्हें हस्तिनापुर के समस्त अधिकार व सम्मान प्रदान करते हुए उनका स्वागत किया।
