महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 138वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:
श्लोक 1 और 2
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। ततस्ते मन्त्रयामासुर्दुर्योधनपुरोगमाः। प्राणवान्विक्रमी चापि शौर्ये च महति स्थितः।। (1-138-1) स्पर्धते चापि सततमस्मानेव वृकोदरः। तं तु सुप्तं पुरोद्याने जले शूले क्षिपामहे।। (1-138-2)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनंतर दुर्योधन आदि ने आपस में मंत्रणा की कि यह प्राणवान, पराक्रमी और महान शौर्य से संपन्न वृकोदर (भीम) सदा हम से ही स्पर्धा करता है। अतः इसे उद्यान में सोते समय जल में शूल (भाले/नुकीले कांटे) के ऊपर फेंक देते हैं।
- व्याख्या: दुर्योधन और उसके साथियों ने भीम को रास्ते से हटाने के लिए एक बार फिर षड्यंत्र रचा और योजना बनाई कि इस बार भीम को जल में नुकीले शूलों के ऊपर फेंका जाए ताकि वे गंभीर रूप से घायल हो जाएं।
श्लोक 3, 4 और 5
श्लोक:
ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत। प्रमाणकोट्यामुद्देशे स्थलं किंचिदुपेत्य ह।। (1-138-3) भक्ष्यं भोज्यं च पेयं च चोष्यं लेह्यमथापि च। उपपादितं नरैस्तत्र कुशलैः सूदकर्मणि।। (1-138-4) न्यवेदयंस्तत्पुरुषा धार्तराष्ट्राय वै तदा। ततो दुर्योधनस्तत्र पाण्डवानाह दुर्मतिः।। (1-138-5)
- हिंदी अनुवाद: हे भारत! इसके बाद दुर्योधन ने प्रमाणकोटि नामक स्थान के पास जल-विहार के लिए स्थान बनवाया। वहाँ रसोई के काम में कुशल लोगों द्वारा भक्ष्य, भोज्य, पेय, चोष्य और लेह्य (सभी प्रकार के स्वादिष्ट खाद्य पदार्थ) तैयार करवाए गए। उसके सेवकों ने आकर धृतराष्ट्र के पुत्र दुर्योधन को इसकी सूचना दी। तब उस दुर्मति दुर्योधन ने पाण्डवों से कहा—
- व्याख्या: दुर्योधन ने पांडवों को लुभाने के लिए प्रमाणकोटि के पास एक भव्य जलविहार और लजीज भोजन का आयोजन किया, ताकि वे आसानी से उसकी चाल में फंस जाएं।
श्लोक 6, 7 और 8
श्लोक:
गङ्गां चैवानुयास्याम उद्यानवनशोभिताम्। सहिता भ्रातरः सर्वे जलक्रीडामवाप्नुमः।। (1-138-6) एवमस्त्विति तं चापि प्रत्युवाच युधिष्ठिरः। ते रथैर्नगराकारैर्देशजैश्च गजोत्तमैः।। (1-138-7) निर्ययुर्नगराच्छूराः कौरवाः पाण्डवैः सह। उद्यानवनमासाद्य विसृज्य च महाजनम्।। (1-138-8)
- हिंदी अनुवाद: "हम सब भाई मिलकर उद्यान और वनों से सुशोभित गंगा के तट पर चलें और वहाँ जलक्रीडा का आनंद लें।" युधिष्ठिर ने उससे कहा—"बहुत अच्छा।" इसके बाद नगर के सुंदर रथों और उत्तम हाथियों पर सवार होकर वे सभी शूरवीर कौरव और पाण्डव नगर से बाहर निकल पड़े। उद्यान-वन में पहुँचकर और महाजन (भीड़) को विदा करके...
- व्याख्या: दुर्योधन के निमंत्रण को युधिष्ठिर ने सहज भाव से स्वीकार किया और सभी भाई कौरवों के साथ आनंदपूर्वक गंगा तट के उद्यान की ओर روانة हुए।
श्लोक 9, 10, 11 और 12
श्लोक:
विशन्ति स्म तदा वीराः सिंहा इव गिरेर्गुहाम्। उद्यानमानभिपश्यन्तो भ्रातरः सर्व एव ते।। (1-138-9) उपस्थानगृहैः शुभ्रैर्वलभीभिश्च शोभितम्। गवाक्षकैस्तथा जालैर्यन्त्रैः सांचारिकैरपि।। (1-138-10) संमार्जितं सौधकारैश्चित्रकारैश्च चित्रितम्। दीर्घिकाभिश्च पूर्णाभिस्तथा पुष्करिणीषु च।। (1-138-11) जलं तच्छुशुभे च्छन्नं फुल्लैर्जलरुहैस्तथा। उपच्छन्ना वसुमती तथा पुष्पैर्यथर्तुकैः।। (1-138-12)
- हिंदी अनुवाद: वे सभी वीर भाई पर्वत की गुफा में सिंहों की तरह उस उद्यान में प्रवेश करने लगे। वे उस उद्यान को देख रहे थे जो श्वेत उपस्थानगृहों, बल्लियों (छतों), गवाक्षों (खिड़कियों), जालों और घूमने वाले यंत्रों से सुशोभित था। कारीगरों द्वारा साफ किया गया और चित्रकारों द्वारा चित्रित वह स्थान भरी हुई दीर्घिकाओं (बावड़ियों) और पोखरों (कमल के तालाबों) से युक्त था। खिले हुए जलीय फूलों (कमलों) से वह जल इस प्रकार सुशोभित हो रहा था और पृथ्वी ऋतु के फूलों से ढकी हुई थी।
- व्याख्या: उस क्रीडा स्थल की सुंदरता, भव्यता और वास्तुकला का बहुत ही मनमोहक वर्णन यहाँ किया गया है जहाँ सभी राजकुमार पहुँचे थे।
श्लोक 13, 14 और 15
श्लोक:
तत्रोपविष्टास्ते सर्वे पाण्डवाः कौरवाश्च ह। उपच्छन्नान्बहून्कामांस्ते भुञ्जन्ति ततस्ततः।। (1-138-13) अथोद्यानवरे तस्मिंस्तथा क्रीडागताश्चते। परस्परस्य वक्त्रेषु ददुर्भक्ष्यांस्ततस्ततः।। (1-138-14) ततो दुर्योधनः पापस्तद्भक्ष्ये कालकूटकम्। विषं प्रक्षेपयामास भीमसेनजिघांसया।। (1-138-15)
- हिंदी अनुवाद: वहाँ बैठे हुए सभी पाण्डव और कौरव अपनी इच्छा के अनुसार विभिन्न प्रकार के पदार्थों का उपभोग करने लगे। उस श्रेष्ठ उद्यान में खेल-क्रीड़ा करते हुए वे आपस में एक-दूसरे के मुख में मिठाइयाँ व खाद्य पदार्थ दे रहे थे। तभी उस पापी दुर्योधन ने भीमसेन को मारने की इच्छा से उनके भक्ष्य (खाने की वस्तु) में कालकूट नामक भयंकर विष मिलवा दिया।
- व्याख्या: खेल-कूद और खान-पान के माहौल के बीच दुर्योधन ने बहुत ही चालाकी से भीम के हिस्से के भोजन में सबसे जहरीला कालकूट विष मिलवा दिया।
श्लोक 16, 17 और 18
श्लोक:
स्वयमुत्थाय चैवाथ हृदयेन क्षुरोपमः। स वाचाऽमृतकल्पश्च भ्रातृवच्च सुहृद्यथा।। (1-138-16) स्वयं प्रक्षिपते भक्ष्यं बहु भीमस्य पाकृत्। प्रभक्षितं च भीमेन तं वै दोषमजानता।। (1-138-17) ततो दुर्योधनस्तत्र हृदयेन हसन्निव। कृतकृत्यमीवात्मानं मन्यते पुरुषाधमः।। (1-138-18)
- हिंदी अनुवाद: जिसका हृदय छुरे के समान क्रूर था, वह दुर्योधन स्वयं उठकर अमृत के समान मीठी और भाई जैसी स्नेहपूर्ण वाणी बोलते हुए भीम के सामने आया। उस पापी ने अपने हाथों से भीम को बहुत सा भक्ष्य पदार्थ खाने को दिया। उस दोष को न जानने वाले भीम ने उसे खा लिया। इसके बाद वह पुरुषाधम दुर्योधन अपने मन में हंसते हुए खुद को कृतकृत्य (सफल) मानने लगा।
- व्याख्या: दुर्योधन ने ऊपर से बहुत प्रेम और मिठास दिखाकर भीम को जहरीला भोजन खिला दिया और अंदर ही अंदर अपनी साजिश के सफल होने पर खुश होने लगा।
श्लोक 19, 20, 21 और 22
श्लोक:
ततस्ते सहिताः सर्वे जलक्रीडामकुर्वत। पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च तदा मुदितमानसाः।। (1-138-19) विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन्। भीमस्तु बलवान्भुक्त्वा व्यायामाभ्यधिकं जले।। (1-138-20) वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतांस्तदा। प्रमाणकोट्यां वासार्थी सुष्वापावाप्य तत्स्थलम्।। (1-138-21) शीततं वातं समासाद्य श्रान्तो मदविमोहितः। विषेण च परीताङ्गो निश्चेष्टः पाण्डुनन्दनः।। (1-138-22)
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर प्रसन्न मन वाले सभी पाण्डव और कौरवों ने मिलकर जलक्रीडा की। इसके बाद वीर लोग विहार-भवनों में ही विश्राम करने लगे। बलवान भीम ने जल में अत्यधिक व्यायाम और खेल-कूद करने के बाद भोजन किया। राजकुमारों को जलक्रीडा कराने के बाद वे सोने की इच्छा से प्रमाणकोटि के उस स्थान पर गए। ठंडी हवा के स्पर्श से, थकान से, मदिरा/मद के प्रभाव से और विष से आक्रांत होकर पाण्डुनन्दन भीम चेतनाहीन होकर लेट गए।
- व्याख्या: जलक्रीडा के पश्चात जब भीम अत्यधिक थक गए और भोजन में मिला विष उनके शरीर में असर करने लगा, तो वे एक सुनसान जगह पर गहरी अचेत अवस्था में सो गए।
श्लोक 23, 24 और 25
श्लोक:
ततो बद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः स्वयम्। `शूलान्यप्सु निखायाशु प्रादेशाभ्यन्तराणि च।। (1-138-23) लतापाशैर्दृढं बद्धं स्थलाज्जलमपातयत्। सशेषत्वान्न संप्राप्तो जले शूलिनि पाण्डवः।। (1-138-24) पपात यत्र तत्रास्य शूलं नासीydदृच्छया।' स निःसंज्ञो जलस्यान्तमवाग्वै पाण्डवोऽविशत्। आक्रामन्नागभवने तदा नागकुमारकान्।। (1-138-25)
- हिंदी अनुवाद: तब दुर्योधन ने स्वयं आकर लता के पासों से भीम को बाँध दिया। पानी के भीतर एक बालिश्त के अंतर पर नुकीले शूल (भाले) गाड़ दिए गए थे। लताओं से दृढ़तापूर्वक बांधकर उसने भीम को स्थल से जल में गिरा दिया। किंतु प्रारब्ध शेष होने के कारण पाण्डव उस शूल वाले जल में सीधे शूलों पर नहीं गिरे। वे जहाँ गिरे, दैवयोग से वहाँ शूल नहीं थे। संज्ञाहीन वे पाण्डव जल की गहराई में नीचे उतरते चले गए और नागलोक (नागों के भवन) में पहुँचकर वहाँ के नागकुमारों को रौंदने लगे।
- व्याख्या: दुर्योधन ने भीम को लताओं से बांधकर पानी में गड़े नुकीले शूलों पर फेंका, लेकिन भाग्यवश वे शूलों पर न गिरकर सीधे पानी की गहराइयों में यानी नागलोक में जा गिरे।
श्लोक 26, 27 और 28
श्लोक:
ततः समेत्य बहुभिस्तदा नागैर्महाविषैः। अदश्यत भृशं भीमो महादंष्ट्रैर्विपोल्बणैः।। (1-138-26) ततोऽस्य दश्यमानस्य तद्विषं कालकूटकम्। हतं सर्पविषेणैव स्थावरं जङ्गमेन तु।। (1-138-27) दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां तेषां मर्मस्वपि निपातिताः। त्वचं नैवास्य बिभिदुः सारत्वात्पृथुवक्षसः।। (1-138-28)
- हिंदी अनुवाद: इसके बाद वहाँ एकत्र हुए अनेक महाविषैले और बड़े-बड़े दांतों वाले भयंकर नागों ने भीम को बुरी तरह डसना शुरू कर दिया। जब वे नाग उन्हें डंस रहे थे, तब उनके काटने से (नागों के विष के प्रभाव से) भीम के शरीर में पहले से गया हुआ वह स्थावर कालकूट विष नष्ट हो गया (दोनों विषों ने आपस में मिलकर एक-दूसरे के प्रभाव को काट दिया)। उन सांपों ने भीम के मर्मस्थलों पर भी अपने दांत गड़ाए, किंतु उनकी चौड़ी छाती की कठोरता के कारण सांप उनकी त्वचा को भेद नहीं सके।
- व्याख्या: नागलोक के सर्पों के काटने से एक चमत्कार हुआ—सांपों के विष (जंगम विष) ने भोजन के साथ गए कालकूट विष (स्थावर विष) के प्रभाव को neutralizing कर दिया, और भीम की मजबूत देह पर सांपों के दांत भी असर नहीं कर पाए।
श्लोक 29 और 30
श्लोक:
ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्वं संछिद्य बन्धनम्। पोथयामास तान्सर्पान्केचिद्भीताः प्रदुद्रुवुः।। (1-138-29) हतावशेषा भीमेन सर्वे वासुकिमभ्ययुः। ऊचुश्च सर्पराजानं वासुकिं वासवोपमम्।। (1-138-30)
- हिंदी अनुवाद: इसके बाद जब कुंतीपुत्र भीम जागे, तो उन्होंने अपने सारे बंधन तोड़ डाले और उन सांपों को कुचलकर मार डालना शुरू किया। डरकर कुछ सांप वहाँ से भाग खड़े हुए। जो सांप भीम के प्रहारों से बच गए थे, वे सभी नागराज वासुकि के पास गए और इंद्र के समान तेजस्वी सर्पराज वासुकि से बोले—
- व्याख्या: नींद से जागने के बाद भीम ने अपनी शक्ति दिखाते हुए नागों को पछाड़ना शुरू किया, जिससे घबराकर बचे हुए नाग अपने राजा वासुकि के पास न्याय और रक्षा के लिए पहुँचे।
श्लोक 31, 32 और 33
श्लोक:
अयं नरो वै नागरेन्द्र ह्यप्सु बद्ध्वा प्रवेशितः। यथा च नो मतिर्वीर विषपीतो भविष्यति।। (1-138-31) निश्चेष्टोऽस्माननुप्राप्तः स च दष्टोऽन्वबुध्यत। ससंज्ञश्चापि संवृत्तश्छित्त्वा बन्धनमाशु नः।। (1-138-32) पोथयन्तं महाबाहुं त्वं वै तं ज्ञातुमर्हसि। ततो वासुकिरभ्येत्य नागैनुगतस्तदा।। (1-138-33)
- हिंदी अनुवाद: "हे नागराज! जल में बांधकर एक मनुष्य को भीतर प्रवेश कराया गया है। हे वीर! हमारी बुद्धि कहती है कि इसने कोई विष पी रखा है। यह निश्चेष्ट अवस्था में हमारे पास आया था और डंसे जाने पर जाग उठा। होश में आते ही इसने हमारे बंधनों को तुरंत काट डाला (तोड़ डाला) और हमीं को कुचल रहा है। आप इस महाबाहु को जानने की कृपा करें।" तब नागराज वासुकि नागों के साथ स्वयं वहाँ आए।
- व्याख्या: नागों ने वासुकि को बताया कि पानी में गिराया गया यह मनुष्य कोई साधारण इंसान नहीं है, यह विष पचा चुका है और अचेत अवस्था से जागकर हम पर भारी पड़ रहा है।
श्लोक 34, 35 और 36
श्लोक:
पश्यति स्म महाबाहुं भीमं भीमपराक्रमम्। आर्यकेण च दृष्टः स पृथाया आर्यकेण च।। (1-138-34) तदा दौहित्रदौहित्रः परिष्वक्तः सुपीडितम्। सुप्रीश्चाभवत्तस्य वासुकिः स महायशाः।। (1-138-35) अब्रवीत्तं च नागेन्द्रः किमस्य क्रियतां प्रियम्। धनौघो रत्ननिचयो वसु चास्य प्रदीयताम्।। (1-138-36)
- हिंदी अनुवाद: उन्होंने महाबाहु और भयंकर पराक्रमी भीम को देखा। कुंती के नाना (आर्यक नाग) ने भी उसे पहचान लिया। तब पृथा (कुंती) के नाना (आर्यक) के वे दौहित्र के दौहित्र (परनाती) निकले, जिन्हें वासुकि ने प्रेम से कसकर गले लगा लिया और महायशस्वी वासुकि बहुत प्रसन्न हुए। तब नागराज वासुकि ने कहा—"इनका क्या प्रिय किया जाए? इन्हें बहुत सा धन और रत्नों का समूह प्रदान किया जाए।"
- व्याख्या: वासुकि ने पाया कि भीम कोई और नहीं बल्कि कुंती के वंश (नाग राज आर्यक के परिवार) से ही संबंधित हैं (वे उनके परनाती हैं)। इस रिश्ते के सामने आने पर वासुकि बहुत प्रसन्न हुए और उन्हें धन-दौलत देने की पेशकश की।
श्लोक 37, 38 और 39
श्लोक:
एवमुक्तस्तदा नागो वासुकिं प्रत्यभाषत। यदि नागेन्द्र तुष्टोऽसि किमस्य धनसंचयैः।। (1-138-37) रसं पिबेत्कुमारोऽयं त्वयि प्रीते महाबलः। बलं नागसहस्रस्य यस्मिन्कुण्डे प्रतिष्ठितम्।। (1-138-38) यावत्पिबति बालोऽयं तावदस्मै प्रदीयताम्। एवमस्त्विति तं नागं वासुकिः प्रत्यभाषत।। (1-138-39)
- हिंदी अनुवाद: ऐसा कहे जाने पर दूसरे नाग ने वासुकि से कहा—"हे नागराज! यदि आप इनसे संतुष्ट हैं, तो धन-संचय से क्या लाभ? यदि आप इस महाबलवान कुमार पर प्रसन्न हैं, तो इन्हें वह रस पीने के लिए दिया जाए जिस कुंड में एक हजार हाथियों का बल प्रतिष्ठित है। यह बालक जितना चाहे, उतना वह रस पिए।" वासुकि ने 'तथास्तु' कहकर उस नाग की बात स्वीकार कर ली।
- व्याख्या: नागों में से एक ने सुझाव दिया कि धन देने के बजाय भीम को उस दिव्य बल-वर्धक रस का पान कराया जाए जिसमें हजारों हाथियों का बल होता है, जिसे वासुकि ने मान लिया।
श्लोक 40, 41 और 42
श्लोक:
ततो भीमस्तदा नागैः कृतस्वस्त्ययनः शुचिः। प्राङ्मुखश्चोपविष्टश्च रसं पिबति पाण्डवः।। (1-138-40) एकोच्छ्वासात्ततः कुण्डं पिबति स्म महाबलः। एवमष्टौ स कुण्डानि ह्यपिबत्पाण्डुनन्दनः।। (1-138-41) ततस्तु शयने दिव्ये नागदत्ते महाभुजः। अशेत भीमसेनस्तु यथासुखमरिंदमः।। (1-138-42)
- हिंदी अनुवाद: तदनंतर नागों द्वारा स्वस्तिवाचन (मंगल कामना) किए जाने पर, पवित्र हुए और पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे हुए पाण्डव भीम ने उस रस का पान किया। महाबली पाण्डुनन्दन ने एक ही साँस में एक कुंड (भरकर) रस पी लिया। इस प्रकार उस पाण्डुनन्दन ने कुल आठ कुंड रस का पान किया। इसके बाद शत्रुओं का दमन करने वाले महाबाहु भीमसेन नागों द्वारा दी गई दिव्य शय्या पर सुखपूर्वक सो गए।
- व्याख्या: भीम ने नागलोक में जाकर एक हजार हाथियों के बल वाले उस अद्भुत दिव्य रस के आठ कुंड पी लिए, जिससे उनकी शक्ति में अपार वृद्धि हो गई और वे तृप्त होकर दिव्य शय्या पर विश्राम करने लगे।
