श्रीमन्महाभाऱते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 137वें अध्याय के श्लोकों का क्रमबद्ध (सीरियल नंबर से) श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या प्रस्तुत है:

श्लोक 1 और 2

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। ततः क्षत्ता च भीष्मश्च व्यासो राजा च बन्धुभिः। ददुः श्राद्धं तदा पाण्डोः स्वधामृतमयं तदा।। (1-137-1) `पुरोहितसहायास्ते यथान्यायमकुर्वत।' कुरूंश्च विप्रमुख्यांश्च भोजयित्वा सहस्रशः। रत्नौघान्द्विजमुख्येभ्यो दत्त्वा ग्रामवरांस्तथा।। (1-137-2)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनंतर विदुर, भीष्म, व्यास जी और राजा धृतराष्ट्र ने अपने बान्धवों के साथ मिलकर राजा पाण्डु का अमृतमय श्राद्ध किया। पुरोहितों की सहायता से उन्होंने यथानियंत सब कार्य किया। हजारों कुरुवंशियों और श्रेष्ठ ब्राह्मणों को भोजन कराया तथा श्रेष्ठ ब्राह्मणों को रत्नों के ढेर और उत्तम गाँव दान में दिए।
  • व्याख्या: राजा पाण्डु की मृत्यु के उपरांत उनके निमित्त शास्त्रीय विधान के अनुसार भव्य श्राद्ध और तर्पण का अनुष्ठान किया गया, जिसमें ब्राह्मणों और गरीबों को मुक्तहस्त से दान दिया गया।

श्लोक 3 और 4

श्लोक:

कृतशौचांस्ततस्तांस्तु पाण्डवान्भरतर्षभान्। आदाय विविशुः सर्वे पुरं वारणसाह्वयम्।। (1-137-3) सततं स्मानुशोचन्तस्तमेव भरतर्षभम्। पौरजानपदाः सर्वे मृतं स्वमिव बान्धवम्।। (1-137-4)

  • हिंदी अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! इसके बाद शुचि (पवित्र) हुए उन पाण्डवों को साथ लेकर सब लोग हस्तिनापुर (वारणसाह्वय) नगर में प्रवेश कर गए। नगर और जनपद के सभी निवासी उस भरतश्रेष्ठ पाण्डु का इस प्रकार निरंतर शोक करते रहे, मानो वह उनका अपना कोई मृत बान्धव हो।
  • व्याख्या: श्राद्ध और शुद्धि के पश्चात पाण्डव परिवार हस्तिनापुर लौट आया, जहाँ प्रजा अपने प्रिय राजा पाण्डु की मृत्यु से अत्यंत दुखी थी और उन्हें अपने परिवार के सदस्य की तरह याद कर रही थी।

श्लोक 5, 6, 7 और 8

श्लोक:

श्राद्धावसाने तु तदा दृष्ट्वा तं दुःखितं जनम्। संमूढां दुःखशोकार्तां व्यासो मातरमब्रवीत्।। (1-137-5) अतिक्रान्तसुखाः कालाः पर्युपस्थितदारुणाः। श्वःश्वः पापिष्ठदिवसाः पृथिवी गतयौवना।। (1-137-6) बहुमायासमाकीर्णो नानादोषसमाकुलः। लुप्तधर्मक्रियाचारो घोरः कालो भविष्यति।। (1-137-7) कुरूणामनयाच्चापि पृथिवी न भविष्यति। गच्छ त्वं योगमास्थाय युक्ता वस तपोवने।। (1-137-8)

  • हिंदी अनुवाद: श्राद्ध की समाप्ति पर उस दुखी, संमूढ और दुःख-शोक से आर्त जनसमूह को देखकर व्यास जी ने माता (सत्यवती) से कहा—"सुख के दिन बीत चुके हैं, अब दारुण समय आ उपस्थित हुआ है। आने वाले दिन प्रतिदिन पापी और पृथ्वी यौवनहीन (तेजहीन) होती जाएगी। यह काल छल-कपट से भरा, अनेक दोषों से युक्त, धर्म और आचार से हीन तथा घोर होने वाला है। कौरवों की मूर्खता के कारण यह पृथ्वी सुरक्षित नहीं रहेगी। इसलिए तुम योग का आश्रय लेकर तपोवन में जाकर निवास करो।"
  • व्याख्या: महर्षि व्यास भविष्य की विभीषिका (महाभारत युद्ध और कुरुवंश के विनाश) को भांप चुके थे, इसलिए उन्होंने सत्यवती और अम्बिका-अम्बालिका को महलों का मोह छोड़कर वन में तपस्या करने की सलाह दी।

श्लोक 9, 10, 11 और 12

श्लोक:

माद्राक्षीस्त्वं कुलस्यास्य घोरं संक्षयमात्मनः। तथेति समनुज्ञाय सा प्रविश्याब्रवीत्स्नुषाम्।। (1-137-9) अम्बिक तव पौत्रस्य दुर्नयात्किल भारताः। सानुबन्धा विनङ्क्ष्यन्ति पौराश्चैवेति नः श्रुतम्।। (1-137-10) तत्कौसल्यामिमामार्तां पुत्रशोकाभिपीडिताम्। वनमादाय भद्रं ते गच्छावो यदि मन्यसे।। (1-137-11) तथेत्युक्ता त्वम्बिकया भीष्ममामन्त्र्य सुव्रता। वनं ययौ सत्यवती स्नुषाभ्यां सह भारत।। (1-137-12)

  • हिंदी अनुवाद: "तुम अपने इस कुल का यह घोर संहार अपनी आँखों से मत देखना।" 'बहुत अच्छा' कहकर सत्यवती ने आज्ञा स्वीकार की और भीतर जाकर अपनी बहुओं (अम्बिका और कौसल्या) से कहा—"हे अम्बिके! तुम्हारे पौत्र (धृतराष्ट्र/दुर्योधन) के दुराचरण के कारण ये सब कौरव अपने परिवार सहित नष्ट हो जाएंगे, ऐसा हमने सुना है। इसलिए पुत्र शोक से पीड़ित इस आर्त कौसल्या (कुंती की सास/अम्बालिका) को साथ लेकर, यदि तुम्हारी इच्छा हो, तो हम वन को चलें।" अम्बिका द्वारा 'तथास्तु' कहे जाने पर सुव्रता सत्यवती ने भीष्म से अनुमति लेकर दोनों बहुओं के साथ वन की यात्रा की।
  • व्याख्या: महर्षि व्यास के वचनानुसार सत्यवती, अम्बिका और अम्बालिका ने कुरुवंश के आसन्न विनाश को देखने से बचने के लिए हस्तिनापुर त्याग दिया और वन में जाकर तपस्या करने का मार्ग चुना।

श्लोक 13

श्लोक:

ताः सुघोरं तपस्तप्त्वा देव्यो भरतसत्तम।। देहं त्यक्त्वा महाराज गतिमिष्टां ययुस्तदा।। (1-137-13)

  • हिंदी अनुवाद: हे भरतसत्तम महाराज! उन देवियों (सत्यवती आदि ने) वन में अत्यंत घोर तपस्या करके अपने शरीर का त्याग किया और अपनी इच्छित (श्रेष्ठ) गति को प्राप्त हुईं।
  • व्याख्या: राजमहलों के सुखों को छोड़कर उन तीनों रानियों ने जंगलों में कठिन तप किया और अंततः ब्रह्मलोक/उत्तम लोकों को प्राप्त हुईं।

श्लोक 14 और 15

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। अथाप्तवन्तो वेदोक्तान्संस्कारान्पाण्डवास्तदा। संव्यवधन्त भोगांस्ते भुञ्जानाः पितृवेश्मनि।। (1-137-14) धार्तराष्ट्रैश्च सहिताः क्रीडन्तो मुदिताः सुखम्। बालक्रीडासु सर्वासु विशिष्टास्तेजसाऽभवन्।। (1-137-15)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तदनंतर वेदोंोक्त संस्कारों को प्राप्त करके पाण्डव पितृभवन (हस्तिनापुर) में सुखपूर्वक भोग भोगते हुए बड़े होने लगे। धृतराष्ट्र के पुत्रों (धार्तराष्ट्रों) के साथ खेलते हुए वे सब प्रसन्न रहते थे और बाल्यकाल की सभी क्रीड़ाओं में वे अपने तेज से सबसे विशिष्ट दिखाई देते थे।
  • व्याख्या: बचपन में पांडव और कौरव एक साथ हस्तिनापुर में पले-बढ़े और खेल-कूद में हिस्सा लेते थे, जहाँ पाण्डवों का विशेष तेज और बल दिखाई देता था।

श्लोक 16, 17 और 18

श्लोक:

जवे लक्ष्याभिहरणे भोज्ये पांसुविकर्षणे। धार्तराष्ट्रान्भीमसेनः सर्वान्स परिमर्दति।। (1-137-16) हर्षात्प्रक्रीडमानांस्तान् गृह्य राजन्निलीयते। शिरःसु विनिगृह्यैतान्योजयामास पाण्डवैः।। (1-137-17) शतमेकोत्तरं तेषां कुमाराणां महौजसाम्। एक एव निगृह्णाति नातिकृच्छ्राद्वृकोदरः।। (1-137-18) कचेषु च निगृह्यैनान्विनिहत्य बलाद्बली। चकर्ष क्रोशतो भूमौ घृष्टजानुशिरोंसकान्।। (1-137-19) दश बालाञ्जले क्रीडन्भुजाभ्यां परिगृह्य सः। आस्ते स्म सलिले मग्नो मृतकल्पान्विमुञ्चति।। (1-137-19, 20)

  • हिंदी अनुवाद: दौड़ने में, लक्ष्य को भेदने में, भोजन में और धूल में खींचने-कूदने की क्रीड़ाओं में भीमसेन धृतराष्ट्र के सभी पुत्रों को रौंद डालते थे (पराजित कर देते थे)। हे राजन्! वे प्रसन्नता से खेलते हुए उन कुमारों को पकड़कर पानी में डुबो देते थे या उनके सिर पकड़कर उन्हें आपस में भिड़ा देते थे। उन सौ और एक (101) महौजस कुमारों को भीमसेन अकेले ही बिना किसी अधिक कठिनाई के काबू में कर लेते थे। उनके बालों को पकड़कर, बलपूर्वक पीटते हुए, घुटने, सिर और कंधे जमीन पर घिसटते हुए वे उन्हें खींचते थे। जल में खेलते हुए दस बालकों को अपनी दोनों भुजाओं में जकड़कर वे जल के भीतर बैठ जाते थे और जब वे मृतप्राय (बेहोश) हो जाते थे, तब उन्हें छोड़ते थे।
  • व्याख्या: भीमसेन बचपन से ही अत्यंत शक्तिशाली थे। वे खेल-खेल में सौ कौरवों और उनके भाइयों को भारी शारीरिक चुनौती देते थे और उन्हें आसानी से हरा देते थे, जिससे दुर्योधन के मन में उनके प्रति द्वेष बढ़ने लगा था।

श्लोक 21, 22 और 23

श्लोक:

फलानि वृक्षमारुह्य विचिन्वन्ति च ये तदा। तदा पादप्रहारेण भीमः कम्पयते द्रुमान्।। (1-137-21) प्रहारवेगाभिहता द्रुमा व्याघूर्णितास्ततः। सफलाः प्रपतन्ति स्म द्रुमात्स्रस्ताः कुमारकाः।। (1-137-22) `केचिद्भग्नशिरोरस्काः केचिद्भग्नकटीमुखाः। निपेतुर्भ्रातरः सर्वे भीमसेनभुजार्दिताः।।' (1-137-23)

  • हिंदी अनुवाद: जो कौरव राजकुमार वृक्षों पर चढ़कर फल तोड़ते थे, भीम पेड़ों पर अपनी लात (पाद प्रहार) का प्रहार करके उन्हें हिला देते थे। उस प्रहार के वेग से पेड़ चकरा जाते थे और फलों के साथ-साथ राजकुमार भी पेड़ों से नीचे गिर जाते थे। भीमसेन की भुजाओं से प्रताड़ित होकर वे सभी भाई ऐसे गिरते थे कि किसी का सिर या छाती टूट जाती थी और किसी की कमर या मुँह चोटिल हो जाता था।
  • व्याख्या: भीम की बाल्यकालीन ताकत का यह एक और पराक्रमी रूप था, जहाँ वे पेड़ों को लात मारकर कौरवों को फल तोड़ने के दौरान गिरा देते थे, जिससे उन्हें चोटें आती थीं।

श्लोक 24 और 25

श्लोक:

न ते नियुद्धे न जवे न योग्यासु कदाचन। कुमारा उत्तरं चक्रुः स्पर्धमाना वृकोदरम्।। (1-137-24) एवं स धार्तराष्ट्रांश्च स्पर्धमानो वृकोदरः। अप्रियेऽतिष्ठदत्यन्तं बाल्यान्न द्रोहचेतसा।। (1-137-25)

  • हिंदी अनुवाद: युद्ध में, दौड़ने में या किसी भी अभ्यास में वे कुमार कभी भी भीमसेन का मुकाबला नहीं कर पाए और प्रतियोगिता में हमेशा पीछे रह गए। इस प्रकार धृतराष्ट्र के पुत्रों के साथ स्पर्धा करने वाले भीमसेन बचपन के स्वभाव के कारण उनके अप्रिय बने रहते थे, हालांकि उनके मन में कोई द्रोह (शत्रुता की दुर्भावना) नहीं थी, वे केवल बालहर्ष के कारण ऐसा करते थे।
  • व्याख्या: भीम बच्चों की स्वाभाविक मस्ती और ताकत के प्रदर्शन में कौरवों को हराते थे। हालांकि भीम के मन में कोई दुर्भावना नहीं थी, लेकिन उनकी अपार शक्ति के कारण कौरव उन्हें अपना शत्रु मानने लगे थे।

श्लोक 26, 27, 28 और 29

श्लोक:

ततो बलमतिख्यातं धार्तराष्ट्रः प्रतापवान्। भीमसेनस्य तज्ज्ञात्वा दुष्टभावमदर्शयत्।। (1-137-26) तस्य धर्मादपेतस्य पापानि परिपश्यतः। मोहादैश्वर्यलोभाच्च पापा मतिरजायत।। (1-137-27) अयं बलवतां श्रेष्ठः कुन्तीपुत्रो वृकोदरः। मध्यमः कुन्तिपुत्राणां निकृत्या सन्निगृह्यतां।। (1-137-28) प्राणवान्विक्रमी चैव शौर्येण महताऽन्वितः। स्पर्धते चापि सहितानस्मानेको वृकोदरः।। (1-137-29)

  • हिंदी अनुवाद: तब प्रतापवान दुर्योधन (धार्तराष्ट्र) ने भीमसेन के उस प्रसिद्ध बल को जानकर अपने दुष्ट भाव को प्रकट करना शुरू किया। धर्म से च्युत हुए और पापों का विचार करने वाले दुर्योधन के मन में मोह और ऐश्वर्य के लोभ से पापी बुद्धि उत्पन्न हुई—"यह बलवानों में श्रेष्ठ, कुंती का मंझला पुत्र वृकोदर (भीम) है। छल (निकृति) से इसे काबू में करना चाहिए। यह प्राणवान, पराक्रमी और महान शौर्य से युक्त है तथा अकेला ही हम सबको टक्कर देता है।"
  • व्याख्या: दुर्योधन भीम की इस अपार शक्ति से ईर्ष्या करने लगा और उसे अपने भविष्य के राज्य के लिए सबसे बड़ा खतरा मानकर छल से रास्ते से हटाने की साजिशें सोचने लगा।

श्लोक 30 और 31

श्लोक:

तं तु सुप्तं पुरोद्याने गङ्गायां प्रक्षिपामहे। अथ तस्मादवरजं श्रेष्ठं चैव युधिष्ठिरम्।। (1-137-30) प्रसह्य बन्धने बद्ध्वा प्रशासिष्ये वसुन्धराम्। एवं स निश्चयं पापः कृत्वा दुर्योधनस्तदा। नित्यमेवान्तरप्रेक्षी भीमस्यासीन्महात्मनः।। (1-137-31)

  • हिंदी अनुवाद: "हम इसे राजमहल के उद्यान में सोते समय गंगा नदी में फेंक देंगे। इसके बाद इसके बड़े भाई युधिष्ठिर को जबरन बंधक बनाकर मैं इस पूरी पृथ्वी पर शासन करूँगा।" ऐसा पापी निश्चय करके वह दुर्योधन सदा ही महात्मा भीम के अवसर की तलाश करने लगा।
  • व्याख्या: दुर्योधन ने पाण्डवों को समाप्त करने की अपनी पहली दुर्नीति बनाई कि पहले भीम को सोते समय गंगा में डुबो दिया जाए और फिर युधिष्ठिर को बंदी बनाकर अकेले हस्तिनापुर का राजा बना जाए।

श्लोक 32, 33 और 34

श्लोक:

ततो जलविहारार्थं कारयामास भारत। चैलकम्बलवेश्मानि विचित्राणि महान्ति च।। (1-137-32) सर्वकामनैः सुपूर्णानि पताकोच्छ्रायवन्ति च। तत्र संजनयामास नानागाराण्यनेकशः।। (1-137-33) उदकक्रीडनं नाम कारयामास भारत। प्रमाणकोट्यां तं देशं स्थलं किंचिदुपेत्यह।। (1-137-34)

  • हिंदी अनुवाद: हे भारत! इसके बाद दुर्योधन ने जल-विहार (तैरने और खेलने) के लिए वस्त्रों और कमलों से युक्त, भाँति-भांति के विशाल और सुंदर कक्ष बनवाए। वे सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं से पूर्ण थे और उन पर झंडे फहरा रहे थे। उसने वहाँ अनेक प्रकार के घर बनवाए। हे भारत! उसने 'प्रमाणकोटि' नामक स्थान के पास गंगा तट पर 'उदकक्रीडन' (जलक्रीडा का स्थल) तैयार करवाया।
  • व्याख्या: दुर्योधन ने पांडवों और कौरवों के जलक्रीडा (वाटर स्पोर्ट्स) के लिए प्रमाणकोटि नामक स्थान पर एक भव्य और सुंदर परिसर का निर्माण करवाया ताकि वह अपनी साजिश को अंजाम दे सके।

श्लोक 35, 36, 37 और 38

श्लोक:

`क्रीडावसाने ते सर्वे शुचिवस्त्राः स्वलङ्कृताः। सर्वकामसमृद्धं तदन्नं बुभुजिरे शनैः।। (1-137-35) दिवसान्ते परिश्रान्ता विहृत्य च कुरूद्वहाः। विहारावसथेष्वेव वीरा वासमरोचयन्।। (1-137-36) खिन्नस्तु बलवान्भीमो व्यायामाभ्यधिकस्तदा। वाहयित्वा कुमारांस्ताञ्जलक्रीडागतान्विभुः।। (1-137-37) प्रमाणकोट्यां वासार्थं सुष्वापारुह्य तत्स्थलम्। शीततं वासं समासाध्य शान्तो मदविमोहितः।। (1-137-38)

  • हिंदी अनुवाद: क्रीडा समाप्त होने पर वे सभी राजकुमार शुद्ध वस्त्र पहनकर और सज-धजकर सभी प्रकार की सामग्रियों से युक्त उत्तम भोजन धीरे-धीरे खाने लगे। दिन के अंत में जलविहार से थके हुए वे कुरुश्रेष्ठ वीर वहीं विहार-भवनों में विश्राम करने लगे। उस समय बलवान भीमसेन व्यायाम और खेल-कूद से अत्यधिक थक चुके थे। राजकुमारों को जलक्रीडा कराने के बाद वे प्रमाणकोटि के एक ठंडे और सुंदर स्थान पर सोने के लिए चले गए। थकान और मदिरा/मद के कारण वे वहीं शांत होकर लेट गए।
  • व्याख्या: जलक्रीडा और कुश्ती के लंबे दौर के बाद भीमसेन अत्यंत थक गए और प्रमाणकोटि के तट पर एक सुनसान और ठंडी जगह पर गहरी नींद में सो गए।

श्लोक 39, 40 और 41

श्लोक:

निश्चेष्टः पाण्डवो राजन्सुष्वाप मृतवत्क्षितौ। ततो बद्ध्वा लतापाशैर्भीमं दुर्योधनः शनैः।। (1-137-39) प्रमाणकोट्यां संसुप्तं गङ्गायां प्राक्षिपज्जले। ततः प्रबुद्धः कौन्तेयः सर्वान्संछिद्य बन्धनान्।। (1-137-40) उदतिष्ठद्बलाद्भूयो भीमः प्रहरطاं वरः। स विमुक्तो महातेजा नाज्ञासीत्तेन तत्कृतम्।। (1-137-41)

  • हिंदी अनुवाद: हे राजन्! पाण्डुपुत्र भीमसेन चेतनाहीन होकर मृतवत् पृथ्वी पर सो गए। तब दुर्योधन ने धीरे से आकर लता के पासों (लताओं की रस्सियों) से प्रमाणकोटि में सोए हुए भीम को बाँध दिया और गंगा के गहरे जल में फेंक दिया। इसके बाद कुंतीपुत्र भीम जब जागे, तब उन्होंने अपने सारे बंधन तोड़ डाले। प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ वे महातेजस्वी भीम बलपूर्वक जल से ऊपर उठ आए। उस समय वे बंधन मुक्त तो हो गए, लेकिन यह नहीं जान पाए कि यह करतूत किसकी थी।
  • व्याख्या: दुर्योधन ने सोते हुए भीम को लताओं से बांधकर गंगा में फेंक दिया, लेकिन भीम की अपार शक्ति के कारण वे पानी के भीतर ही बंधन तोड़कर जाग गए और सुरक्षित बाहर आ गए, हालांकि उस समय उन्हें यह पता नहीं चला कि यह षड्यंत्र किसने किया था।

श्लोक 42, 43, 44 और 45

श्लोक:

पुनर्निद्रावशं प्राप्तस्तत्रैव प्रास्वपद्बली। अर्धरात्र्यां व्यतीतायामुत्तस्थुः कुरुपाण्डवाः। दुर्योधनस्तु कौन्तेयं दृष्ट्वा निर्वेदमभ्यगात्।। (1-137-42) सुप्तं चापि पुनः सर्पैस्तीक्ष्णदंष्ट्रैर्महाविषैः। कुपितैर्दंशयामास सर्वेष्वेवाङ्गसन्धिषु।। (1-137-43) दंष्ट्राश्च दंष्ट्रिणां मर्मस्वपि तेन निपातिताः। त्वचं न चास्य बिभिदुः सारत्वात्पृथुपक्षसः।। (1-137-44) प्रबुद्धो भीसेनस्तान्सर्वान्सर्पानपोथयत्। सारथिं चास्य दयितमपहस्तेन जघ्निवान्।। (1-137-45)

  • हिंदी अनुवाद: वे बलवान भीम पुनः निद्रा के वश में होकर वहीं सो गए। आधी रात बीतने पर जब कुरु-पाण्डव जागे (और दुर्योधन ने देखा कि भीम जीवित है), तो दुर्योधन को बहुत निराशा और आश्चर्य हुआ। इसके बाद उसने तीखे दांतों वाले महाविषैले और कुपित सांपों से सोते हुए भीम के शरीर के सभी अंगों और संधियों पर डंसवाया। उन विषधरों ने भीम के मर्मस्थलों पर भी अपने दांत गड़ाए, किंतु भीम की चौड़ी छाती और शरीर की कठोरता (सारता) के कारण सांप उनकी त्वचा को भेद नहीं सके। जब भीम जागे तो उन्होंने उन सभी सर्पों को कुचलकर मार डाला और उनके प्रिय सारथि को भी अपने एक थप्पड़ से मार गिराया।
  • व्याख्या: जब गंगा में फेंकने से भी भीम नहीं मरे, तो दुर्योधन ने रात में उन्हें जहरीले सांपों से कटवाया, लेकिन भीम के शरीर की दृढ़ता के आगे सांपों के विष और दांत बेअसर साबित हुए और भीम ने जागकर उन सांपों को ही नष्ट कर दिया।

श्लोक 46, 47 और 48

श्लोक:

तथान्यदिवसे राजन्हन्तुकामोऽत्यमर्षणः। वलनेन सहामन्त्र्य सौबलस्य मते स्थितः।। (1-137-46) भोजने भीमसेनस्य ततः प्राक्षेपयद्विषम्। कालकूटं विषं तीक्ष्णं संभृतं रोमहर्षणम्।। (1-137-47) तच्चापि भुक्त्वाऽजरदॉयदविकारो वृकोदरः। विकारं नाभ्यजनयत्सुतीक्ष्णमपि तद्विषम्।। (1-137-48)

  • हिंदी अनुवाद: हे राजन्! इसके बाद दूसरे दिन अत्यंत अमर्षी (क्रोधित) दुर्योधन ने शकुनि (सौबल) की सलाह मानकर भीम को मारने की इच्छा से उनके भोजन में संसार का सबसे भयानक और तीक्ष्ण 'कालकूट' विष मिलवा दिया। किंतु वृकोदर भीम ने उस विषयुक्त भोजन को खाकर भी उसे आसानी से पचा लिया। इतने सुतीक्ष्ण विष ने भी उनके शरीर में कोई विकार या प्रभाव उत्पन्न नहीं किया।
  • व्याख्या: दुर्योधन और शकुनि ने हार नहीं मानी और अगले दिन भीम के भोजन में कालकूट विष मिला दिया, जिसे भीम ने बिना किसी नुकसान के पूरी तरह पचा लिया।

श्लोक 49, 50, 51 और 52

श्लोक:

भीमसंहननो भीमस्त्समादजरयद्विषम्। ततोऽन्यदिवसे राजन्हन्तुकामो वृकोदरम्।। (1-137-49) सौबलेन सहायेन धार्तराष्ट्रोऽभ्यचिन्तयत्। चिन्तयन्नालभन्निद्रां दिवारात्रमतन्द्रितः।। (1-137-50) एवं दुर्योधनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः। अनेकैरप्युपायैस्ताञ्जिघांसन्ति स्म पाण्डवान्।। (1-137-51) वैश्या पुत्रस्तदाचष्ट पार्थानां हितकाम्यया। पाण्डवा ह्यपि तत्सर्वं प्रत्यजानन्नरिन्दमाः। उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः।। (1-137-52)

  • हिंदी अनुवाद: भीम का शरीर वज्र के समान दृढ़ था, इसलिए उन्होंने उस विष को भी पचा लिया। हे राजन्! इसके बाद दूसरे दिन भी भीम को मारने के लिए दुर्योधन ने मामा शकुनि के साथ मिलकर नए उपाय सोचे और वे दिन-रात बिना आलस्य के चिंता करते हुए नींद भी नहीं ले पाते थे। इस प्रकार दुर्योधन, कर्ण और शकुनि अनेक उपायों से पाण्डवों को मार डालने का षड्यंत्र रचते रहे। तब एक वैश्य पुत्र (युयुत्सु या विदुर द्वारा नियुक्त कोई हितैषी) ने पांडवों की भलाई की कामना से यह सारी बात उन्हें बता दी। शत्रुओं का दमन करने वाले पाण्डवों ने भी वह सब जान लिया, किंतु विदुर जी की सलाह पर उन्होंने इस बात का कोई खुलकर विरोध या हंगामा नहीं किया और चुपचाप सब सहन करते रहे।
  • व्याख्या: भीम के शरीर की ताकत के आगे दुर्योधन के सारे विष और षड्यंत्र फेल हो रहे थे। दुर्योधन, कर्ण और शकुनि लगातार पांडवों को मारने के रास्ते ढूंढ रहे थे। इस बात की भनक पांडवों को लग चुकी थी, लेकिन विदुर जी के समझाने पर उन्होंने समझदारी दिखाते हुए इस बात को सार्वजनिक नहीं किया और उचित समय का इंतजार किया।
।। इति श्रीमन्महाभाऱते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः।। 137 ।।

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