जीवन के कल्याण के लिए यत्न करों ।
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संसार के लोग साधन को ही साध्य समझ बैठे हैं। संसार के पदार्थों में ही मस्त हो गये हैं। इन्हीं को ही साध्य समझ बैठे हैं। जड़ शरीर के पालन-पोषण पर ही ध्यान दे रहे हैं, इसे ही चेतन समझ बैठे हैं। आत्मा और परमात्मा को भूलते जा रहे हैं। भर्तृहरि जी महाराज ने उन पर दु:ख व्यक्त करते हुए कहा है―
व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्त
रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम् ।
आयु: परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो
लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम् ।।
―(भर्तृहरि वै० श० ९६)
भावार्थ―वृद्धावस्था भयंकर बाघिन के समान सामने खड़ी है, रोग शत्रुओं की तरह आक्रमण कर रहे हैं, आयु फूटे हुए घड़े से पानी की तरह निकली जा रही है। आश्चर्य की बात तो यह है कि फिर भी लोग वही काम करते हैं, जिससे उनका अनिष्ट हो।
आदित्यस्य गतागतैरहरह: संक्षीयते जीवितं,
व्यापारैर्बहुकार्यभारगुरुभि: कालो न विज्ञायते ।
दृष्ट्वा जन्मजराविपत्तिमरणं त्रासश्च नोत्पद्यते,
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ।।
―(भर्तृहरि वै० श० ७)
भावार्थ―सूर्य के उदय और अस्त के साथ मनुष्य का जीवन प्रतिदिन घटता जाता है। समय भागता जाता है, पर कारोबार में संलग्न रहने के कारण, यह भागता हुआ नहीं दीखता। लोगों को पैदा होते, बूढ़ा होते और मरते देखकर भी मन में भय नहीं होता। इससे ज्ञात होता है कि संसार मोहमयी प्रमादरुपी मदिरा के नशे में मतवाला हो रहा है।
वेद कहता है कि हे मनुष्य, तू भौतिकवाद के रास्ते पर मत चल। यह रास्ता भयंकर है। तुझे मैं अध्यात्मवाद के मार्ग से ले चलता हूं। वेद कहता है कि भौतिकवाद का मार्ग अन्धकार का मार्ग है, तू इस पर मत चल। भौतिकवाद की और भय है और अध्यात्मवाद की और अभय है।
ओ३म् स्वस्तये वायुमुप ब्रवामहै सोमं स्वस्ति भुवनस्य यस्यति:। बृहस्पतिं सर्वगणं स्वस्तये स्वस्तय आदित्यासो भवन्तु न:।(ऋग्वेद ५|५१|१२)
अर्थ :- वायु को गति तथा चन्द्रमा को सोमरस देने वाला सबसे महान् जगत् का स्वामी परमेश्वर हमारे लिए कल्याणकारी हो।सब समूह वाले बड़े- बड़े ब्रह्माण्डों व वेद ज्ञान के रक्षक परमात्मा की हम स्तुति करते हैं। हे प्रभु ! बड़े विद्वान भक्त, शूरवीर, आदित्य ब्रह्मचारी पुत्र हमारे कल्याण के लिए हो ।
ईश्वर प्राप्ति का साधन है समाधी, और इसके साधन अनेक हैं लेकिन सभी साधनों की अंतिम अवस्था समाधि ही होगी। किसी भी आध्यात्मिक साधन का बार-बार प्रयोग करने से व्यक्ति आगे बढ़ता जाता है और साधन का प्रयोग न करने से व्यक्ति अपनी प्रगति में खुद ही रुकावट बन जाता है।
हम संसार में अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का फल भोगने तथा जन्म-मरण के चक्र से छूटने वा दुःखों से मुक्त होने के लिये आये हैं। मनुष्य जो बोता है वही काटता है। यदि गेहूं बोया है तो गेहूं ही उत्पन्न होता है। हमने यदि शुभ कर्म किये हैं तो फल भी शुभ होगा और अशुभ कर्मों का फल अशुभ ही होगा। मनुष्य का शरीर अनेक ज्ञान व विज्ञान का समावेश करके परमात्मा ने बनाया है। मनुष्य अपने जैसा व अन्य प्राणियों के शरीर जैसी रचना नहीं कर सकता।
जो विद्वान सत्य आध्यात्मिक ज्ञान से युक्त होते हैं वह ईश्वर व जीवात्मा के अस्तित्व, स्वरूप तथा इनके गुण, कर्म तथा स्वभाव को जानते हैं। जो भौतिक विषयों का ज्ञान प्राप्त करते अथवा अल्पशिक्षित होते हैं वह बिना स्वाध्याय, विद्वानों के उपदेशों के श्रवण वा सत्संग के ईश्वर व जीवात्मा को यथार्थ रूप में नहीं जानते। मत-मतान्तरों के ग्रन्थ अविद्या से युक्त होने के कारण उनमें ईश्वर का सत्य ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। इस कारण उनके अनुयायी ईश्वर व जीवात्मा के सत्य ज्ञान से वंचित हैं और परिणामस्वरूप वह ईश्वर का ज्ञान न होने के कारण ईश्वर का साक्षात्कार नहीं कर सकते।
ईश्वर की प्राप्ति के लिये मनुष्य को वैदिक साहित्य का अध्ययन करना होता है जिसमें वेद व इसके भाष्य सहित उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, सत्यार्थप्रकाश, तथा ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका आदि ग्रन्थों का सर्वोपरि स्थान है। इन ग्रन्थों के अध्ययन से ईश्वर को जाना जाता है और योग साधना के द्वारा मनुष्य ध्यान-समाधि अवस्था को प्राप्त कर ईश्वर का ज्ञान, प्रत्यक्ष वा साक्षात्कार करता है। आर्यसमाज के दूसरे नियम में ऋषि दयानन्द ने ईश्वर के सत्यस्वरूप सहित उसके गुण, कर्म व स्वभावों का वर्णन किया है। इस नियम को कण्ठ वा स्मरण कर इसका चिन्तन करते रहने पर मनुष्य ईश्वर के सत्यस्वरूप को जान लेता है।
ईश्वर का मुख्य व निज नाम ओ३म् है। ओ३म् के जप तथा गायत्री मन्त्र के अर्थ सहित जप से भी मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर अपने जीवन को दुःखों से मुक्त एवं सुखों से युक्त कर सकते हैं। मनुष्य का जन्म ईश्वर व जीवात्मा को जानकर ईश्वर की उपासना करने सहित दुःखों को दूर करने तथा सुखों की प्राप्ति के लिये ही हुआ है। इसी आवश्यकता की पूर्ति व मनुष्यों को ईश्वर के स्वरूप व उपासना के महत्व सहित उपासना की विधि का ज्ञान कराने के लिये हमारे वैदिक ऋषियों ने अनेक शास्त्रों व ग्रन्थों की रचना की है। ईश्वर व आत्मा को जानने सहित ईश्वर के कर्म-फल विधान को जान लेने पर मनुष्य दुःखों के कारण अशुभ कर्मों का त्याग कर दुःखों से मुक्त हो जाता है और शुभ कर्मों को करके इससे मिलने वाले सुखों को प्राप्त कर जन्म - जन्मान्तरों में सुखों को प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक पथ पर चलने में कभी सफलता तो कभी असफलता मिलती रहती है। उचित साधनों का प्रयोग करने से सफलता और अनुचित साधनों का प्रयोग करने से विफलता मिलती है।
ध्यान रहे कि जब कभी भी विफलता मिले तो व्यक्ति निराश ना हो क्योंकि निराशावादी बनने से अधिक हानि होती है, आशावादी व्यक्ति कभी न कभी अपने लक्ष्य को प्राप्त कर ही लेता है। जब कभी भी भूल हो जाए तो उसका प्रायश्चित(पश्चाताप) करके अर्थात कोई उचित दंड देकर फिर से उस कार्य को संपन्न करें। पश्चाताप करने का लाभ यह है कि उस गलती के करने की वृत्ति समाप्त हो जाती है तथा व्यक्ति सावधान हो जाता है।
ओ३म् शि॒वो भू॒त्वा मह्य॑मग्ने॒ऽअथो॑ सीद शि॒वस्त्वम्। शि॒वाः कृ॒त्वा दिशः॒ सर्वाः॒ स्वं योनि॑मि॒हास॑दः॥१७॥
भावार्थ - राजा को चाहिये कि आप धर्मात्मा होके प्रजा के मनुष्यों को धार्मिक कर और न्याय की गद्दी पर बैठ के निरन्तर न्याय किया करे॥१७॥
वैदिक सन्ध्या ऋषि दयानंद की मानव मात्र को अनुपम भेट।
योग के क्षेत्र में स्वामी दयानन्द जी की एक प्रमुख देन हमें उनकी सन्ध्या पद्धति प्रतीत होती हैं। सन्ध्या भी ध्यान व समाधि प्राप्त ़कराने में साधन रूप एक प्रकार का योग का ही ग्रन्थ है। सन्ध्या के सफल होने पर साधक ईश्वर का साक्षात्कार कर सकता है। यदि ईश्वर साक्षात्कार न भी हो तब भी योग के सात संगों को तो वह प्राप्त करता ही है। सन्ध्या का प्रयोगकर्ता वा साधक सन्ध्या से समाधि को या तो प्राप्त कर लेता है या कुछ दूरी पर रहता है। ऋषि दयानन्द की प्रेरणा व आन्दोलन के फलस्वरूप आज विश्व के करोड़ों लोग उनकी लिखी विधि से प्रातः व सायं सन्ध्या वा सम्यक् ध्यान करते हैं। सन्ध्या में अघमर्षण, मनसा-परिक्रमा, उपस्थान, समर्पण आदि मन्त्रों का विशेष महत्व प्रतीत होता है। अघमर्षण के मन्त्रों से पाप न करने वा पाप छोड़ने की प्रेरणा सन्ध्या करने वाले साधक को मिलती है। मनसापरिक्रमा के मन्त्रों से भक्त व साधक ईश्वर को सभी दिशाओं में विद्यमान वा उपस्थित पाता है जो उसे हर क्षण हर पल देख रहा है। ईश्वर की दृष्टि हम पर हर पल व हर क्षण २३×७ रहती है। हम ऐसा कोई कार्य कर नहीं सकते जो ईश्वर की दृष्टि में आये।
अतः हमेंं अपने शुभ व अशुभ सभी कर्मों के फल अवश्यमेव भोगने होते हैं। अशुभ कर्मों का फल दुःख होता है। यह हमें कर्म के परिमाण के अनुसार ही मिलता है। जैसा व जितना शुभ व अशुभ कर्म होगा उसका वैसा व उतना ही सुख व दुःख रूपी परिणाम व परिमाण होगा। अतः सन्ध्या का साधक पाप करना छोड़ देता है। यह भी सन्ध्या की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जबकि अन्य मतों में प्रायः ऐसा नहीं होता। उपस्थान मन्त्र में हम ईश्वर को अपने समीप व आत्मा के भीतर अनुभव करने का प्रयास करते हैं और विचार करने पर यह सत्य सिद्ध होता है कि ईश्वर सर्वव्यापक होने से हमारे बाहर व भीतर दोनों स्थानों पर है। इसमें हम ईश्वर के गुणों का वर्णन करते हैं और उससे स्वस्थ शरीर, बलवान इन्द्रिय शक्ति और सौ व अधिक वर्षों की आयु मांगते हैं। गायत्री मन्त्र बोल कर हम ईश्वर से बुद्धि की पवित्रता व उसे सन्मार्ग में चलने की प्रेरणा करने की प्रार्थना करते हैं। समर्पण मन्त्र बोलकर हम ईश्वर से धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को आज व अभी प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। ईश्वर को नमन के साथ हमारी सन्ध्या समाप्त होती है। वेदों का स्वाध्याय भी सन्ध्या का अनिवार्य अंग है। सभी वैदिक धर्मी अनुयायी वेदों का स्वाध्याय करते हैं जिससे वह अन्धविश्वास, मिथ्या ज्ञान व दुर्गुणों से बचते हैं। वैदिक सन्ध्या भी ऋषि दयानन्द की मानव मात्र को बहुत बड़ी देन है। यह बात अलग है कि कोई मनुष्य मत-मतान्तरों की अविद्या के कारण उसे ग्रहण करे या न करे। जो करता है वह अपना लाभ करता है और जो नहीं करता वह अपनी हानि करता है।
ओ३म् मर्माणि ते वर्मणा छादयामि सोमस्त्वा राजामृतेनानु वस्ताम्। उरोर्वरीयो वरुणस्ते कृणोतु जयन्तं त्वानु देवा मदन्तु॥ यजुर्वेद १७-४९॥
हे विद्वान योद्धा, विलासितापूर्ण इच्छाओं के साथ संग्राम में जहां सभी दिशाओं से आप के ऊपर आक्रमण किए जा रहे हो। तुम्हारा ज्ञान तुम्हारा कवच बना रहे और तुम्हारा ज्ञान और अधिक शक्तिशाली बने। ईश्वर तुम्हें सदैव शांति दे और विजयी बनाए।

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