सूक्त १७
०३।०१७।०१
सीरा॑ युञ्जन्ति क॒वयो॑ यु॒गा वि त॑न्वते॒ पृथ॑क्।
धीरा॑ दे॒वेषु॑ सुम्न॒यौ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (धीराः) धीर (कवयः) बुद्धिमान् [किसान] लोग (देवेषु) व्यवहारी पुरुषों पर [सुम्नयौ] सुख पाने [की आशा] में (सीरा=सीराणि) हलों को (युञ्जन्ति) जोड़ते हैं, और (युगा=युगानि) जुओं को (पृथक्) अलग-अलग करके [दोनों ओर] (वि तन्वते) फैलाते हैं ॥१॥
भावार्थः जैसे किसान लोग खेती करके अन्य पुरुषों को सुख पहुँचाते और आप सुखी रहते हैं, इसी प्रकार सब मनुष्यों को परस्पर उपकारी होकर सुख भोगना चाहिये ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः(कवयः) बुद्धिमान् (सीराः) हलों को (युञ्जन्ति) युक्त करते हैं, और (पृथक्) पृथक्-पृथक् बैलों में (युगा=युगानि) जुआओं का (वि तन्वन्ति) विस्तार करते हैं। (धीराः) बुद्धिमान् (देवेषु) देवकार्यों के निमित्त (सुम्नयौ) सुख प्राप्त करानेवाले दो बैलों को [हल में] युक्त करते हैं।
टिप्पणी:[हलों को युक्त करना, बैलों के साथ। तथा प्रत्येक बैल पर जुआ लगाना। देवकार्य हैं यज्ञादि; तथा अतिथिदेव आदि का सत्कार। कृषि से उत्पन्न अन्न द्वारा इनका सत्कार भी देवकार्य है। कृषिकर्म बुद्धिमानों का काम है, जोकि वंशपरम्परा में जारी रहता है। नौकरी तो कुछ काल के लिए होती है, और कृषिकर्म एक स्थिर कार्य है। कवयः=कविः मेधाविनाम (निघं० ३।१५)। धीरा:= धी+रा: (मत्वर्थीयः)। सुम्नयौ१=सुम्नं सुखनाम (निघं० ३।६)+या प्रापणे। हल के साथ दो बैलों को जोतना चाहिए, भूमिकर्षण में एक बैल का जोतना उसके लिए कष्टदायक होता है।] [१. सुमन्यौ बलीवर्दौ (सायण), याते: "आतो मनिन्" इति विच् (सायण)।]
०३।०१७।०२
यु॒नक्त॒ सीरा॒ वि यु॒गा त॑नोत कृ॒ते योनौ॑ वपते॒ह बीज॑म्। वि॒राजः॒ श्नुष्टिः॒ सभ॑रा असन्नो॒ नेदी॑य॒ इत्सृ॒ण्यः॑ प॒क्वमा य॑वन् ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (विराजः) हे शोभायमान [किसानो !] (सीरा=सीराणि) हलों को (युनक्त) जोड़ो, (युगा=युगानि) जूओं को (वितनोत) फैलाओ, और (कृते) बने हुए (योनौ) खेत में (इह) यहाँ पर (बीजम्) बीज (वपत) बोओ। (श्नुष्टिः) [तुम्हारी] अन्न की उपज (नः) हमारे लिये (सभराः) भरी पूरी (असत्) होवे, (सृण्यः) हंसुये वा दरांत (इत्) भी (पक्वम्) पके अन्न को (नेदीयः) अधिक निकट (आ यवन्) लावें ॥२
भावार्थःचतुर किसान यथाविधि खेत जोतकर उत्तम बीज आदि साधनों से उत्तम अन्न आदि पाते हैं, इसी सिद्धान्त पर विद्वान् बलवान् स्त्री पुरुष ब्रह्मचर्य सेवन से यथावत् क्रिया के साथ बलवान् बुद्धिमान् और आयुष्मान् सन्तान उत्पन्न करते हैं, देखो-श्रीमद्दयानन्दकृत संस्कारविधि गर्भाधान प्रकरण ॥२॥ यह मन्त्र कुछ पदभेद से ऋ० १०।१०१।३ और य० १२।६८ में है।
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः[हे बुद्धिमानो!] (सीराः) हलों को (युनक्त) युगों के साथ संयुक्त करो, (युगा=युगानि) युगों को (वितनोत) बैलों के कन्धों पर विस्तारित करो। (कृते योनौ) तय्यार की गई (इह) इस भूमि में (बीजम्, आवपत) बीज बोओ। (विराज:) अन्न का (श्नुष्टि:) शीघ्र प्राप्त करानेवाला (सभरा:) अन्न से भरा हुआ सिट्टा अर्थात् गुच्छा (न:) हमारा (असत्) हो, तथा (पक्वम्) पका अन्न (सृण्यः) दात्री के (नेदीयः) समीप (आ यवन्) प्राप्त हो।
टिप्पणी: [आयवन्= एयात् (यजु० १२।६८), आ इयात्।]
०३।०१७।०३
लाङ्ग॑लं पवी॒रव॑त्सु॒शीमं॑ सोम॒सत्स॑रु।
उदिद्व॑पतु॒ गामविं॑ प्र॒स्थाव॑द्रथ॒वाह॑नं॒ पीब॑रीं च प्रफ॒र्व्य॑म् ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (पवीरवत्) अच्छे फालेवाला (सुशीमम्) बहुत सुख देनेवाला, और (सोमसत्सरु=सोमसत्+स्रु, यद्वा, स-ऊम, उभ वा+सत्सरु) ऐश्वर्ययुक्त व अमृतयुक्त मूठवाला, अथवा रस्सीवाला और मूठवाला (लाङ्गलम्) हल (इत्) ही (अविम्) रक्षा करनेवाली, और (पीबरीम्) वृद्धिवाली (गाम्) भूमि को (च) और (प्रस्थावत्) प्रस्थान वा चढ़ाई के योग्य और (प्रफर्व्यम्) शीघ्र गतिवाले (रथवाहनम्) रथयान [गाड़ी] को (उत्) उत्तमता से (वपतु) उत्पन्न करे ॥३॥
भावार्थःउत्तम साधनों से खेती में अधिक धान्य उत्पन्न होता है, उससे राज्य की और अश्व, बैल आदि की वृद्धि से राजा और प्रजा सुख भोगते हैं ॥३॥ यह मन्त्र कुछ शब्दभेद से यजुर्वेद १२।७१ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (लाङ्गलम्) हल (पवीरवत्) प्रशंसित फाल से युक्त, (सुशीमम्) सुन्दर-सुखदायक, तथा (सोमसत्सरु) जलवाली भूमि में सुगमता से सरण कर सकनेवाला हो। वह (उद् इत् वपतु) निश्चय से उद्वाप अर्थात् उत्पन्न करे (गाम्, अविम्) गौ और बकरी को, (प्रस्थावत्) प्रस्थान कर सकनेवाले (रथवाहनम्) रथ के वहन करने में समर्थ बैल को (च) और (प्रफर्व्यम्) फुरतीली (पीबरीम्) स्थूल, पुष्टाङ्गी गौ और अजा को१।
टिप्पणी: [सुशीमम्=सु+शम् (सुखनाम निघं० ३।६)। [सोमसत्सरु= पदपाठ में "सोमसत्ऽसरु" पाठ है, नकि "सोमसत्सरु"। अतः सोमसत् का अर्थ "जलवाली भूमि" किया है। अभिप्राय यह है कि हल जैसेकि गीली भूमि में सुगमता से चल सकता है वैसे वह सूखी भूमि में भी सुगमता से चल सकनेवाला होना चाहिए, ताकि भूमि के कर्षण में बैलों को कष्ट न हो। अत: हल का फाल, मुख में लगा लोहखण्ड, अति तीक्ष्ण होना चाहिए। "कर्षणेन धान्यादिसमृद्धौ सत्याम् एतद् गवादिसमृद्धिर्भवति" (सायण)। सोमः=water (आप्टे)। सुशीमम्२=कर्षकस्य सुखकरम् (सायण)।] [१. कौदृशीम् गामविं च, प्रफर्व्यम्, प्रकर्षेण फर्वति गच्छति, युवतित्वादतिवेगवतीम, पीवरीम् पुष्टाङ्गीम् (महीधर, यजु:० १२।७१)। २. सुशेवम्=(यजु० १२।७१)। अथवा "शीभम् क्षिप्रनाम" (निघं० २।१५)। लाङ्गलम् सुशीभम् सुक्षिप्रकारी (भूमिकर्षणे)।]
इन्द्रः सीतां नि गृह्णातु तां पूषाभि रक्षतु ।
सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥४॥
सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम् ॥४॥
०३।०१७।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (इन्द्रः) भूमि जोतनेवाला (सीताम्) हल की रेखा [जुती धरती] को (नि) नीचे (गृह्णातु) दबावे, (पूषा) पोषण करनेवाला [किसान] (ताम्) उस [जुती धरती] की (अभिरक्षतु) सब ओर से रखवाली करे। (सा) वह (पयस्वती) पानी से भरी [जुती धरती] (नः) हमको (उत्तराम्-उत्तराम्) उत्तम-उत्तम (समाम्) अनुकूल क्रिया से (दुहाम्) भरती रहे ॥४॥
भावार्थः किसान बीज बोने के पीछे जुती धरती को पटेले से चौरस करके रक्षा करे और यथासमय पानी देता रहे जिससे खेतों में ठीक-ठीक उपज होवे ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० ४।५७।७ में है और इसका उत्तरार्ध अ० ३।१०।१। में आ चुका है ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इन्द्रः) सम्राट् (सीताम्) कृष्टभूमि में हल की लकीर का (निगृह्णातु) निग्रह करे, नियन्त्रण करे, (पूषा) पोषण का अधिकार (ताम्) उस सीता की (अभी रक्षतु) सर्वतः रक्षा करे। (सा) वह कृष्टभूमि अर्थात् हल की पद्धतिवाली भूमि (उत्तराम्, उत्तराम्) उत्तरोत्तर (समाम्) वर्षों में (पयस्वती) दुग्ध तथा जलवाली हुई (नः) हमें (दुहाम्) दुग्धादि देती रहे।
टिप्पणी: [इन्द्र: अर्थात् सम्राट्, निज साम्राज्य में, नियम निर्माण करे कि जिसकी भूमि है, और जिसने उसमें बीजावाप किया है, उसपर अधिकार उसी का रहे यह है "नि गृह्णातु"। पूषा है सीता से प्राप्त पुष्टान्न का अधिकारी, वह उस भूमि की रक्षा करता रहे। पयः के दो अर्थ हैं जल तथा दुग्ध। कृष्टभूमि में बीजवाप हो जाने पर उसके सींचने का भी अधिकारी पूषा है। वह जलप्रबन्ध कर अन्नवती भूमि में जलसेचन का भी प्रबन्ध करे। "उत्तराम् उत्तराम् समाम्" उत्तरोत्तर वर्षों में भी भूमि के पूर्व स्वामी का स्थायित्व बना रहना चाहिए।]
शुनं सुफाला वि तुदन्तु भूमिं शुनं कीनाशा अनु यन्तु वाहान् । शुनासीरा हविषा तोशमाना सुपिप्पला ओषधीः कर्तमस्मै ॥५॥
०३।०१७।०५
०३।०१७।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (सुफालाः) सुन्दर फाले (शुनम्) सुख से (भूमिम्) भूमि को (वि तुदन्तु) जोतें। (कीनाशाः) क्लेश सहनेवाले किसान (वाहान् अनु) बैलादि वाहनों के पीछे-पीछे (शुनम्) सुख से (यन्तु) चलें। (हविषा) जल से (तोशमाना=तोषमानौ) सन्तुष्ट करनेवाले (शुनासीरा=०-रौ) हे पवन और सूर्य तुम दोनों ! (अस्मै) इस पुरुष के लिए (सुपिप्पलाः) सुन्दर फलवाली (ओषधीः) जौ, चावल आदि औषधियाँ (कर्तम्) करो ॥५॥
भावार्थः चतुर किसान लोग उत्तम कृषिशस्त्रों, उत्तम बैल आदिकों और पानी आदि की सुधि रखने से उत्तम अन्नादि पदार्थ उत्पन्न करते हैं, इसी प्रकार विद्वान् लोग विद्याबल से अनेक शिल्पों का आविष्कार करके संसार को सुख पहुँचाते और आप सुख भोगते हैं ॥५॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋ० ४।५७।८ और य० १२।६९ में है ॥ यजुर्वेद अ० २२ म० २२ में वर्णन है−निका॒मे निका॑मे नः प॒र्जन्यो वर्षतु॒ फल॑वत्यो न॒ ओषधयः पच्यन्ताम् ॥ कामना के अनुसार ही हमारे लिए मेह बरसे, हमारे लिए उत्तम फलवाली जो आदि ओषधियाँ पकें ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (सुफाला:) शोभन फालोंवाले हल (शुनम्) सुखपूर्वक (भूमिम्) भूमि को (वितुदन्तु) काटें, (कीनाशाः) किसान (शुनम्) सुखपूर्वक (वाहान्) बैलों के (अनु) पीछे पीछे (यन्तु) चलें। (शुनासीरौ) वायु और आदित्य (हविषा) जल द्वारा (तोशमानौ) किसानों को सन्तुष्ट (कर्तम्) करें और (अस्मै) इसके लिए (औषधि:) औषधि रूप व्रीहि-यव आदि को (सुपिप्पलाः) उत्तम फलों से युक्त (कर्तम्) करें। "कर्तम्" का अन्वय दो बार हुआ है।
टिप्पणी: [हविषा=हविः उदकनाम (निघं० १।१२)। शुनासीरा=शुनो वायुः सीर आदित्यः (निरुक्त ९।४।४०; पदसंख्या ३४), मेघ वायु में भरे हुए, वर्षा करते हैं; आदित्य तीक्ष्ण रश्मियों द्वारा भूमिष्ठ उदक को वाष्पीभूत कर वायु में मेघ को स्थापित करता है। तुदन्तु=तुद व्यथने (तुदादिः) व्यथा है, काटना, भूमि को।]
शुनं वाहाः शुनं नरः शुनं कृषतु लाङ्गलम् ।
शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय ॥६॥
०३।०१७।०६
शुनं वरत्रा बध्यन्तां शुनमष्ट्रामुदिङ्गय ॥६॥
०३।०१७।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (वाहाः) बैल आदि पशु (शुनम्) सुख से रहें। (नरः) हाँकनेवाले किसान (शुनम्) सुख से रहें। (लाङ्गलम्) हल (शुनम्) सुख से (कृषतु) जोते। (वरत्राः) हल की रस्सियाँ (शुनम्) सुख से (बध्यन्ताम्) बाँधी जावें। (अष्ट्राम्) पैना [आर वा काँटे] को (शुनम्) सुख से (उत् इङ्गय) ऊपर चला ॥६॥
भावार्थः किसान लोग सब सामग्री उत्तम रीति से बनाकर रखने से अपने सब काम सुख से चलावें ॥६॥ यह मन्त्र ६-८ कुछ भेद से ऋ० ४।५७।४-६ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (वाहाः) बैल (शुनम्) सुखी हों, (नरः) नर-नारियां (शुनम्) सुखी हों, (लाङ्गलम) हल (शुनम्) सुखकारी हुआ (कृषतु) भूमि का कर्षण करे। (वरत्रा:) रस्सियाँ (शुनम्) सुखपूर्वक (बध्यन्ताम्) बैलों पर बाँधी जाएँ, (अष्ट्राम्) भयदायक कशा को (उदिङ्गय) तू ऊपर उठा, प्रेरित कर।
टिप्पणी: [हल द्वारा जब कृषि-भूमि में कर्षण हो जाय तब बैल आदि पशु और नर-नारियाँ सुखी हो जाती हैं, क्योंकि कर्षण द्वारा प्रभूत अन्न पैदा हो जायेगा। अष्ट्रा का अर्थ है कशा अर्थात् चाबुक, बैलों में त्रास पैदा करने के लिए। अष्ट्रा=अस गतिदीप्त्यादानेषु; अष इत्येके (भ्वादिः), अर्थात् "अष+ त्रस्" (उद्वेगे, दिवादिः), त्रास पैदा करनेवाली, बैलों में भय पैदा करनेवाली कशा अर्थात् चाबुक। उदिङ्गय="उद्" ऊपर, इगि गतौ (भ्वादिः), उद्गत कर, ऊपर उठा।]
शुनासीरेह स्म मे जुषेथाम् ।
यद्दिवि चक्रथुः पयस्तेनेमामुप सिञ्चतम् ॥७॥
०३।०१७।०७
यद्दिवि चक्रथुः पयस्तेनेमामुप सिञ्चतम् ॥७॥
०३।०१७।०७
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (शुनासीरा=०-रौ) हे वायु और सूर्य तुम दोनों ! (इह स्म) यहाँ पर ही (मे) मेरी [विनय] (जुषेथाम्) स्वीकार करो, (यत् पयः) जो जल (दिवि) आकाश मे (चक्रथुः) तुम दोनों ने बनाया है, (तेन) उससे (इमाम्) इस [भूमि] को (उप सिञ्चतम्) सींचते रहो ॥७॥
भावार्थः पवन और सूर्य के द्वारा पृथिवी का जल आकाश में जाकर फिर पृथिवी पर बरसता है, वह खेती के लिए बहुत उपयोगी होता है ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से निरु० ९।४१ में भी है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इह स्म) हम इस कृष्ट क्षेत्र में विद्यमान हैं। (मे) मुझ प्रत्येक द्वारा दी गई आहुति का (जुषेथाम्) सेवन करो (शुनासीरा) हे वायु और आदित्य तुम दोनों। (दिवि) द्योतनशील अन्तरिक्ष में (यत्) जो (पयः) जल (चक्रथुः) तुम दोनों ने पैदा किया है, (तेन) उस द्वारा (इमाम्) इस कृष्टभूमि को (उप सिञ्चतम्) सींचो।
टिप्पणी: [ग्रामनिवासी कृष्टभूमि में उपस्थित होकर वर्षा निमित्त आहुतियाँ देते हैं और प्रत्येक ग्रामवासी अपने अपने हाथ से आहुतियाँ देता है। यह वर्षयज्ञ है।]
सीते वन्दामहे त्वार्वाची सुभगे भव ।
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥८॥
०३।०१७।०८
यथा नः सुमना असो यथा नः सुफला भुवः ॥८॥
०३।०१७।०८
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (सीते) हे जुती धरती ! [लक्ष्मी, खेती] (त्वा) तेरी (वन्दामहे) हम वन्दना करते हैं, (सुभगे) हे सौभाग्यवती [बड़े ऐश्वर्यवाली] (अर्वाची) हमारे सन्मुख (भव) रह, (यथा) जिससे तू (नः) हमारे लिए (सुमनाः) प्रसन्न मनवाली (असः) होवे, और (यथा) जिससे (नः) हमारे लिए (सुफला) सुन्दर फलवाली (भुवः) होवे ॥८॥
भावार्थः मनुष्य खेती को मन लगा करके चौकसी रक्खे, जिससे अन्नवान् और धनवान् होकर सदा आनन्द भोगे ॥८॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (सीते) हल द्वारा कृष्ट हे भूभाग! (त्वा वन्दामहे) तेरी हम स्तुति करते हैं, तेरे गुणों का कथन करते हैं, (सुभगे) हे उत्तम ऐश्वर्य देनेवाली भूमि! (अर्वाची भव) हमारे अभिमुखी तू हो। (यथा) जिस प्रकार कि (न:) हमारे (सुमनाः) मनों को प्रसन्न करनेवाली (असः) तू हो, (यथा) जिस प्रकार कि (न:) हमें (सुफला) उत्तम फल देनेवाली (भुवः) तू हो।
टिप्पणी: [वन्दामहे=वदि अभिवादनस्तुत्योः (भ्वादिः), स्तुति अर्थ अभिप्रेत है। सीता अन्नोत्पादन द्वारा सब प्राणियों का पालन करती है—यह उसकी स्तुति है, गुणों का कथन है। अर्वाची का अभिप्राय है हमारे प्रति फलोन्मुखी होना। उत्तम-ऐश्वर्य है अन्न और तदद्वारा प्राप्त अन्य पदार्थ। उत्तम फल है कृषिजन्य अन्न।]
घृतेन सीता मधुना समक्ता विश्वैर्देवैरनुमता मरुद्भिः ।
सा नः सीते पयसाभ्याववृत्स्वोर्जस्वती घृतवत्पिन्वमाना ॥९॥
०३।०१७।०९
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (घृतेन) घी से और (मधुना) मधु [शहद] से (समक्ता) यथाविधि सानी हुई (सीता) जुती धरती (विश्वैः) सब (देवैः) व्यवहारकुशल (मरुद्भिः) विद्वान् देवताओं करके (अनुमता) अङ्गीकृत है। (सीते) हे जुती धरती ! (सा) सो (ऊर्जस्वती) बलवती और (घृतवत्) घृतयुक्त [अन्न आदि] से (पिन्वमाना) सींचती हुई तू (पयसा) दूध के साथ (नः) हमारे (अभ्याववृत्स्व) सब ओर से सन्मुख वर्तमान हो ॥९॥
भावार्थः चतुर किसान युक्ति से बीज में वा धरती में घी और मधु आदि मिलाकर धान्य आदि को पुष्ट और मधुर बनावें, जैसे क्रिया विशेष से, माली लोग आम, दाख, केसर, फूल आदि को उत्तम बनाते और मनुष्य उत्तम सन्तान उत्पन्न करते हैं ॥९॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद अ० १२ म० ७० में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (मधुना घृतेन) मधुर जल द्वारा (सम् अक्ता) सम्यक् अभिव्यक्त हुई (सीता) कृष्टभूमि, (विश्वैः देवैः) सब देवों द्वारा, (मरुद्भिः) और मानसून वायुओं द्वारा (अनुमता) अनुकूलरूप में स्वीकृत हुई (सा) वह (सीते) हे कृष्टभूमि ! (न: अभि) हमारे अभिमुख, (पयसा) दुग्ध के साथ (आववृत्स्व) तू आ, (ऊर्जस्वती) अन्नवाली तथा (घृतवत्) घृतवाले दुग्ध को (पिन्वमाना) सींचती हुई।
टिप्पणी: [घृतम् उदकनाम (निघं० १।१२)। अक्ता=अञ्जू व्यक्तिम्रक्षणकान्तिगतिषु (रुधादिः), व्यक्ति=अभिव्यक्ति। विश्वैः देवैः=वायु, आदित्य आदि देव। मरुद्भिः= मानसून वायुएँ, जोकि जल से भरपूर होती हैं (अथर्व० ४।२७।४, ५)। घृतवत्= कृष्टभूमि से अन्न पैदा हुआ और उस अन्न के खिलाने से गौओं से घृतमिश्रित दुग्ध प्राप्त हुआ। (पिन्वमाना=पिवि सेवने, "सेचने चेत्येके"(भ्यादिः)]

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