माता भूमि पुत्रो अहं पृथव्या:अथर्ववेद

माता भूमि पुत्रो अहं पृथव्या:अथर्ववेद


  माता भूमि पुत्रो अहं पृथव्या:अथर्ववेद 
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   ये धरती हमारी माता है और हम इसके पुत्र है।धरती माता हमारे जीवन के अस्तित्व का एक प्रमुख आधार है, हमारा पोषण करती है। 

   इसलिए वेद आगे कहते है --- "उप सर्प मातरं भूमिम् " -- हे मनुष्यो मातृभूमि की सेवा करो और अपनी मातृभूमि के प्रति श्रद्धा व प्रेमभाव रखे।  ऐसे भाव केवल और केवल "सनातन वैदिक धर्म " ही प्रकट करता है। 

धरती को माता इस लिए कहा जाता है क्योकि सभी जीवों जलचरों और वनस्पतियों की प्रथम उतपति धरती से ही हुई है। ईशवर ने मनुष्य की उत्पति से पहले ही पेड़ पौधे आदि वनस्पतियाँ बनाऐ ताकि मनुष्य का पोष्ण हो सके।सृष्टी रचना के समय ईश्वर ने जिस तरह पेड़ों पक्षियो जानवरों जलचरों को उत्पन्न किया वैसे ही मनुष्यो की उतपति भी धरती से की। अब कुछ लोग के लिए यह सम्भव नही हो सकता है।उनको बताना चाहूँगा कि जैसे गर्भ रूपी अंडे से पक्षी निकलते है और बीज गर्भ रूपी धरती से पेड़ पौधे वनस्पतियाँ उगती है। वैसे ही मनुष्य को भी धरती के गर्भ से बनाया।गर्भ रूपी धरती की विशेष स्थिती में नर मादा मनुष्यों को हज़ारों की संख्या में पैदा किया।धरती अगर माता है तो पिता कौन ? पिता ईश्वर है जो बीज रूप जीवात्मा को भेजता है और धरती के गर्भ में डालकर पहले मनुष्यो की उत्पति करता है। जो ईश्वर सारी सृष्टी की रचना कर सकता है उसके लिए मनुष्य आदि जीव बनाने असम्भव नही है।जो लोग ऐडम ईव की कहानियाँ सुनाते है और आकाश से प्रथम स्त्री पुरूष के उतरने की बात करते है वे झूठ और अज्ञानता है। 

    जन्म के बाद माता की गोद से उत्तर कर हर मनुष्य धरती की गोद में ही सारा जीवन व्यतीत करता और उसका भोजन और पोष्ण धरती ही करती है।इस लिए जन्म देने वाली माता के साथ साथ धरती को भी माता का दर्जा दिया गया है। 

इस लिए जो पालन करे उसका माता के रूप में सत्कार करना चाहिए।पिता की देखभाल के  बिना भी बच्चा जन्म ले कर बड़ा हो सकता है लेकिन माता के बिना नही।पिता का कार्य गर्भ स्थापना पर पूर्ण हो जाता है लेकिन बच्चे का गर्भ से लेकर पालन तक माँ की ही भूमिका होती है।

    आज कुछ संगठनों ने भारत माता की मूर्ति बना कर बहुत बड़ी मूर्खता कर दी यह कुछ मूर्ति पूजको की मानसिकता है, जिन्होंने ईशवर की भी मूर्तियों बना कर  पूजना अरम्भ कर दिया।धरती का सत्कार छ: बाज़ू वाली माता का रूप बना कर पूजने से नही हो सकता बल्कि धरती को गंदगी और प्रदूष्ण से मुक्त करने से ही होगा। माता भावनात्मक शब्द है अगर हम भारत में जन्म लेकर रह रहे है तो भारत की धरती हमारी माता ही कहलायेगी। किसी अन्य देश में हम जा कर रह नही सकते न ही कोई देश हमें वहाँ घुसने देगा ,क्यो कि धरती का बँटवारा देशों सीमाओं से हो रखा है।अगर सारे विश्व की धरती को सभी देशो के लोग माता मान लें तो आपसी झगड़े ही समाप्त हो जायें और जन्नत के नाम पर धरती पर हिंसा भी बंद हो जाऐ।तभी वेद का व्यापक अादेश “माता भूमि पुत्रो अहं पृथव्या:”हक़ीक़त में दिखाई देगा और सभी मनुष्य पुकार उठेगें धरती हमारी माता है और हम इसके पुत्र है।

अगर इसके साथ  वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात सारा विश्व एक परिवार है ,की भावना भी जुड़ जाऐ और इन दोनों वाक्यों पर सारा संसार एक मत हो जाऐ तो देशो के सीमा विवाद समाप्त होकर धरती स्वर्ग बन जाऐ।

 क्षान्त्या शुद्धयन्ति विद्वांसो दानेनाकार्यकारिण: ।
प्रच्छन्नपापा जप्येन तमसा वेदवित्तमा: ।। ( मनुस्मृति )
   
अर्थ :- विद्वान सहनशीलता से शुद्ध होता है , बुरा काम करने वाला दान से , छुपकर पाप करने वाला पश्चाताप से और वेद को जानने वाला वेदानुकूल आचरण से शुद्ध होता है ।


🌷ओ३म् विश्वे यजत्रा  अधि वोचतोतये त्रायध्वं नो दुरेवाया अभिहुत:।सत्यया वो देवहूत्या हूवेम श्र्ण्वतो देवा अवसे स्वस्तये ( ऋग्वेद)

हे पूजनीय विद्वानों!आप हमारी रक्षा के लिए उपदेश कीजिए। कुटिलता युक्त दुर्गति से हमारी रक्षा कीजिए। हे विद्वान लोगों! हम देवों को योग्य होताओं के साथ जो वेद वाणी का उपदेश दिया था।, वह हे विद्वान पुरूषों! तुम भय रहित सुख को प्राप्त करो  और हमारे सुन्दर पथ को आनन्द के लिए सुगम करो ।

ओ३म् अपामीवामप विश्वामनाहुतिमपारातिं दुर्विदत्रामघायत: । आरे देवा द्वेषो अस्मधुयोतनोरू ण: शर्म यच्छता स्वस्तये। ।( ऋग्वेद)

हे परमेश! आप कृपा कर शरीर के बिगाड़ने वाले रोग के कीटाणुओं से हमारी रक्षा करे, सब प्रकार की नाशतिकता को , यज्ञ न करने की भावना को , दान न करने की प्रवृत्ति को, पाप करने वाली दुर्भावना को, दुर्बुद्धि को, परस्पर कलह करने वाली दुष्ट बुद्धि को हमसे दूर, बहुत दूर हटाओं। हे विद्वानों! आप हमें शुभ कर्म करने की प्ररेणा दो जिससे हम लोग विशाल सुख के साधनों को प्राप्त कर कल्याण के मार्ग पर चल सके ।

ओ३म्  सं त्वमग्ने सूर्यस्य वर्चसागथाः समृषीणास्तुतेन । सं प्रियेण धाम्ना समहमायुषा सं प्रजया सँ रायस्पोषेणम्मिषीय।।

 💐 अर्थ:-   इस मन्त्र में श्लेषालंकार है । मनुष्य लोग ईश्वर की आज्ञा का पालन, अपना पुरुषार्थ और अग्नि आदि पदार्थों के सम्प्रयोग से इन सब सुखों को प्राप्त होते हैं 

सत्य  सनातन वैदिक धर्म के १० सुत्र
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🌷१.प्रश्न  :-  तुम कोैन हो?  
              
💐 उत्तर  :-  भारतीय याने आर्य । 
🌷२. प्रश्न  :- तुम्हारा धर्म क्या है? 
              
 💐 उत्तर  :-  सत्य सनातन वैदिक धर्म  
🌷३. प्रश्न  :- तुम्हारे धर्म ग्रंथ क्या है? 
              
💐 उत्तर  :-  चार वेद, चार उपवेद, चार ब्राह्मण ग्रंथ, छ: वेदांग, ग्यारह उपनिषद, छ: दर्शन शास्त्र, मनुस्मृति, बाल्मिक रामायण, व्यास कृत महाभारत, सत्यार्थ प्रकाश, ऋगवेदादिभाष्यभूमिका।

🌷४. प्रश्न  :- तुम्हारे धर्म का चिन्ह क्या है? 
      💐 उत्तर  :- चौटी और  जनेऊ। 

🌷५. प्रश्न  :- तुम्हारे धर्म की प्रथम आज्ञा क्या है? 
    💐 उत्तर  :- सत्यंमवद् धर्मचर । 

🌷६. प्रश्न  :-  तुम्हारे धर्म का मूलमंत्र क्या है? 
      💐 :-  वेदों मंत्र गायत्री । 

🌷७. प्रश्न  :- तुम्हारे धर्म का स्वभाव क्या है? 
    💐 उत्तर:-   अहिंसा । 

🌷८ :-  .तुम्हारे धर्म का कर्म क्या है? 
💐 उत्तर  :- धर्मो धना उपाजना दानं । 

🌷९. प्रश्न  :- तुम्हारे धर्म का सिद्धांत क्या है?
   💐 उत्तर  :- कृण्वन्तो विश्वमार्यम्, विश्व का कल्याण हो।

🌷१०. प्रश्न  :- तुम्हारे धर्म के  लक्षण क्या है? 
    💐 उत्तर  :- दस लक्षण निम्न हैं।

१.धीरज २.क्षमा ३.विश्वास। ४.चौरी न करना ५.शुद्धी ६.सदाचार ७.सुविचार ८.विद्या ९.सत्य १०.क्रोध न करना। 

घृति: क्षमा दमो्ऽस्तेयमं शौचमिन्द्रियनिग्रह:।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दसकं धर्म लक्षणम् ( मनुस्मृति ६|९२ ) 

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु ।
लक्ष्मी: समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम् ।।
अधैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा ।
न्याय्यात्पथ: प्रविचलन्ति पदं न धीरा: ।। ( भर्तृहरि )

💐अर्थ :- नीति को जानने वाले लोग चाहें निन्दा करें या प्रशंसा, धन आय या जाए, मृत्यु अभी आ जाए या चिरकाल के बाद आए प्रन्तु धैर्यवान् लोग न्याय के मार्ग से विचलित नही होते ।

 
🔥स्वाध्याय में प्रमाद न करें
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  ओ३म् मिमीहि श्लोकमास्ये पर्जन्य इव ततन: । गाय गायत्रमुक्थ्यम् ।। ―(ऋ० १/३८/१४)

  हे विद्वान् मनुष्य ! तू (आस्ये) अपने मुख में (श्लोकम्) वेद की शिक्षा से युक्त वाणी को (मिमीहि) निर्माण कर और उस वाणी को (पर्जन्य इव) जैसे मेघ वृष्टि करता है, वैसे (ततन:) फैला और (उक्थ्यम्) कहने योग्य (गायत्रम्) गायत्री छन्दवाले स्तोत्ररुप वैदिक सूक्तों को (गाय) पढ़ तथा पढ़ा।

   वेद मनुष्य को प्रेरणा दे रहा है कि तू वेदवाणी का स्वाध्याय कर। वेदवाणी के स्वाध्याय से जो ज्ञान तुझे प्राप्त हो, तू उसे ऐसे फैला जैसे बादल वर्षा फैलाता है।अर्थात् ज्ञान को अपने तक ही सीमित न रक्खें बल्कि उसको लोगों में फैलायें, प्रचार करें।

  स्वाध्याय और प्रवचन दोनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। स्वाध्याय शब्द के दो अर्थ हैं। स्वाध्याय का पहला अर्थ है वेद और वेदसम्बन्धी ग्रन्थों का अध्ययन। दूसरा अर्थ है स्व + अध्याय अर्थात् अपना अध्ययन। अपने अध्ययन से अभिप्राय है आत्म-निरीक्षण  स्वाध्याय का पहला अर्थ है सद्ग्रन्थों का पाठ। आध्यात्मिक उन्नति के तीन साधन हैं―ईश्वरभक्ति, सत्सङ्ग और स्वाध्याय। सदग्रन्थों का पाठ अमृतपान के समान होता है और असदग्रन्थों का पाठ विष-पान के समान। 

   वैदिक साहित्य में स्वाध्याय की बहुत महिमा गाई गई है। 

स्वाध्यायान्मा प्रमद: ।

–(तैत्तिरीयोपनिषद् १/११)

'स्वाध्याय करने में प्रमाद न करना।'

   योगदर्शन में स्वाध्याय की महिमा का वर्णन करते हुए महर्षि पतञ्जलि ने लिखा है―

   तप: स्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोग: ।
―(योग० २/१)

तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान इनको क्रियायोग कहते हैं। 

   क्रियायोग का अर्थ है योग के साधन। इनके करने से अस्थिर चित्तवाला भी योग को प्राप्त हो जाता है। इन तीनों में एक 'स्वाध्याय' है
आगे कहा है―

   समाधिभावनार्थ: क्लेशतनूकरणार्थश्च ।
―(योग० २/२)

उक्त क्रियायोग समाधि को सिद्ध करता है और अविद्यादि क्लेशों को शिथिल करता है।

  कहने का आशय यह है कि समाधि को सिद्ध करने और क्लेशों को शिथिल करने का एक साधन स्वाध्याय भी है।

  मनुमहाराज ने मनुस्मृति में स्वाध्याय पर बहुत बल दिया है। गृहस्थ के लिए मनु महाराज ने पाँच यज्ञों का विधान किया है। उन पाँच में से पहला यज्ञ ब्रह्मयज्ञ है―
  
 अध्यापनं ब्रह्मयज्ञ: ।

―(मनु० ३/७०)
अर्थात् स्वाध्याय, सन्ध्या और योगाभ्यास ब्रह्मयज्ञ कहलाते हैं। ब्रह्मयज्ञ का अर्थ है―ईश्वरभक्ति और स्वाध्याय।
आगे कहा है―

   स्वाध्यायेनार्चयेतर्षिन्।
–(मनु० ३/८१)

स्वाध्याय से ऋषियों की पूजा करे अर्थात् ऋषियों की पूजा स्वाध्याय से होती है।

   मनु महाराज ने नित्य कर्मों और स्वाध्याय में किसी प्रकार की छुट्टी नहीं मानी है―

    नैत्यके नास्त्यनध्यायो ब्रह्मसत्रं हि तत्स्मृतम् ।
ब्रह्माहुतिहुतं पुण्यमनध्यायवषट्कृतम् ।।
―(मनु० २/१०६)

भावार्थ―*नित्य कर्मों में कभी छुट्टी नहीं हुआ करती। यह तो निश्चय से ब्रह्म-सत्र ही होता है। यज्ञ, सन्ध्या, स्वाध्याय पुण्य के कारण होते हैं। अनध्याय तो निन्दित कर्मों में होना चाहिए।

चाणक्य जी ने भी स्वाध्याय के सन्दर्भ में कहा है―

श्लोकेन वा तदर्धेन पादेनैकाक्षरेण वा ।
अवन्ध्यं दिवसं कुर्याद् दानाध्ययनकर्मभि: ।।
―(चा० नी० २/१३)

भावार्थ―मनुष्य को चाहिए कि प्रतिदिन एक श्लोक, आधा श्लोक, एक पाद अथवा एक अक्षर का स्वाध्याय करे और दान-अध्ययन करता हुआ ही दिन को सार्थक करे।

ओ३म्  इन्द्रं दैवीर्विशो मरुतोऽनुवर्त्मानोऽभवन् यथेन्द्रं दैवीर्विशो मरुतोऽनुवर्त्मानोऽभवन्। एवमिमं यजमानं दैवीश्च विशो मानुषीश्चानुवर्त्मानो भवन्तु॥ यजुर्वेद १७-८६॥

 💐अर्थ:-  शासक का आचरण इतना उत्तम होना चाहिए कि प्रजाजन उसका अनुसरण कर सकें। जिस प्रकार बुद्धिमान और तेजस्वी विद्वान ईश्वर का अनुसरण करते हैं। उसी प्रकार प्रजाजन ऐसे महान शासक का अनुसरण करें। 



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