सूक्त ६
०३।००६।०१
पुमा॑न्पुं॒सः परि॑जातो ऽश्व॒त्थः ख॑दि॒रादधि॑ ।
स ह॑न्तु॒ शत्रू॑न्माम॒कान्यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥१॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (सः) वह (पुमान्) रक्षाशील (अश्वत्थः) अश्वत्थामा अर्थात् अश्वों, बलवानों में ठहरनेवाला पुरुष, अथवा वीरों के ठहरने का स्थान पीपल का वृक्ष, (पुंसः) रक्षाशील (खदिरात् अधि) स्थिर स्वभाववाले परमेश्वर से, अथवा खैर वृक्ष से (परिजातः) प्रकट होकर (मामकान् शत्रून्) मेरे उन शत्रुओं वा रोगों को (हन्तु) नाश करे (यान्) जिन्हें (अहम्) मैं (द्वेष्मि) वैरी जानता हूँ (च) और (ये) जो (माम्) मुझे [वैरी जानते हैं] ॥१॥
भावार्थः जो पुरुष सर्वरक्षक दृढ़ स्वभावादि गुणवाले परमेश्वर को विचार करके अपने को सुधारते हैं, वे शूरों में महाशूर होकर कुकर्मी शत्रुओं से बचाकर संसार में कीर्ति पाते हैं ॥१॥
२−अश्वत्थ, पीपल का वृक्ष, दूसरे वृक्षों के खोखले, घरों की भीतों और अन्य स्थानों में उगता है और बहुत गुणकारी है। खैर के वृक्ष पर उगने से अधिक गुणदायक हो जाता है। लोग बड़ा आदर करके पवित्र पीपल की चित्तप्रसादक छाया और वायु में सन्ध्या, हवन, व्यायाम आदि करते और इसके दूध, पत्ते, फल, लकड़ी से बहुत ओषधियाँ बनाते हैं। शब्दकल्पद्रुम कोष में इसको मधुर, कसैला, शीतल, कफ-पित्त विनाशी, रक्तदाहशान्तिकारक आदि और खदिर अर्थात् खैर को शीतल, तीखा, कसैला, दाँतों का हितकारी, कृमि, प्रमेह, ज्वर, फोड़े, कुष्ठ, शोथ, आम, पित्त, रुधिर पाण्डु और कफ का विनाशक आदि लिखा है ॥
पाद्मोत्तरखण्ड अध्याय १२६, १६०−१६१ में अश्वत्थ की कथा सविस्तार लिखी है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (पुंसः) अभिवर्धनशील पिता से (पुमान्) अभिवर्धनशीलपुत्र (परिजातः) पैदा होता है, जैसेकि (खदिरात् अधि) खैर से (अश्वत्थः१) पीपल। (सः) वह अभिवर्धनशील पुत्र (मामकान्) मेरे (शत्रून् हन्तु) शत्रुओं का हनन करे, (यान्) जिनके साथ (अहम्) मैं (द्वेष्मि) द्वेष करता हूँ, (च) और (ये) जो (माम्) मेरे साथ द्वेष करते हैं।
टिप्पणी: [मन्त्र के प्रारम्भ में "पुमान् पुंसः" का कथन हुआ है, अतः समग्र सूक्त में "पुमान् पुंसः" का भी वर्णन अभीष्ट प्रतीत होता है। "अश्वत्थः खदिरात्" तो दृष्टान्तरूप है। तथा देखो "संस्कारविधि: पुंसवन संस्कार।"
जैसे पुत्र पिता के शत्रुओं का हनन करता है, वैसे अश्वत्थ अर्थात् खदिर२ से उत्पन्न अश्वत्थ भी रोगों का हनन करता है। मन्त्र २ से ८ तक में अश्वत्थ पद पठित है, तो भी इस दष्टान्त पद द्वारा दाष्टन्ति या उपमेयरूप में पुमान्-पुरुष भी अभिप्रेत है।
[ १. अश्वत्थः -- Figtree (आप्टे)। Fig= सम्भवतः अञ्जीर।
२. खदिर के कोटर अर्थात् गड़हे से उत्पन्न अश्वत्थ में खदिर की भी रोग निवारण शक्ति होती है और निज की भी]
०३।००६।०२
तान॑श्वत्थ॒ निः शृ॑णीहि॒ शत्रू॑न्वैबाध॒दोध॑तः ।
इन्द्रे॑ण वृत्र॒घ्ना मे॒दी मि॒त्रेण॒ वरु॑णेन च ॥२॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे बलवानों में ठहरनेवाले शूर [वा पीपलवृक्ष !] (वृत्रघ्ना) अन्धकार मिटानेवाले (इन्द्रेण) सूर्य से, (मित्रेण) प्रेरणा करनेवाले वायु से (च) और (वरुणेन) स्वीकार करने योग्य जल से (मेदी+सन्) स्नेही होकर (तान्) उन (वैबाधदोधतः) विविध बाधा डालनेवाले क्रोधशील (शत्रून्) शत्रुओं वा रोगों को (निः) सर्वथा (शृणीहि) मार डाल ॥२॥
भावार्थः राजा सूर्यादि के समान गुणयुक्त होकर भीतरी और बाहरी वैरियों का और सद्वैद्य पीपल के प्रयोग से रोगों का नाश करके प्रजा में शान्ति रक्खे ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे अश्वत्थ ! (वैबाधदोधतः) बाधा डालनेवाले और कंपा देनेवाले (तान् शत्रून्) उन शत्रुओं का (निशृणीहि) निःशेषेण विनाश कर; (वृत्रघ्ना इन्द्रेण मेदी) वृत्रघाती इन्द्र के साथ, (मित्रेण) मित्र के साथ, (च) और (वरुणेन) वरुण के साथ स्नेही तू।
टिप्पणी: [मन्त्र में उपमान-अश्वत्थ और उपमेय-पुमान् दोनों का वर्णन है। अश्वत्थ रोग-शत्रुओं का विनाशक है। इस अर्थ में इन्द्र है विद्युत्, मित्र है सूर्य, बरुण है मेघ। इन तीन की सहायता द्वारा अश्वत्थ बढ़ता है, अतः वह इनके साथ स्नेह करता है। उपमेय-पुमान् राष्ट्रिय शत्रुओं का विनाश करता है। इस अर्थ में इन्द्र है सम्राट्, मित्र है मित्र राजा, तथा वरुण है माण्डलिक राजा। "इन्द्रश्च सम्राड् बरुणश्च राजा" (यजु० ८।३७)। वैवाधदोधत:- विबाध+अण (स्वार्थे) +धूञ् कम्पने [यङ् लुक्+ शातृ प्रत्यय+ द्वितीया विभक्ति।]
०३।००६।०३
यथा॑श्वत्थ नि॒रभ॑नो॒ ऽन्तर्म॑ह॒त्य॑र्ण॒वे ।
ए॒वा तान्त्सर्वा॒न्निर्भ॑ङ्ग्धि॒ यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ॥३॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे वीरों में ठहरनेवाले राजन् ! [वा पीपलवृक्ष !] (यथा) जैसे (महति) बड़े (अर्णवे अन्तः) समुद्र के बीच में (निरभनः) निश्चय करके तू भद्र करनेवाला हुआ है। (एव) वैसे ही (तान् सर्वान्) उन सबको (निर्) निरन्तर (भङ्ग्धि) नष्ट कर दे, (यान्) जिन्हें (अहम्) मैं (द्वेष्मि) वैरी जानता हूँ, (च) और (ये) जो (माम्) मुझे [वैरी जानते हैं] ॥३॥
भावार्थः मनुष्यों को शूरवीर और सद्वैद्य होकर दुःखसागर में डूबे हुए प्रजागणों के उभारने में प्रयत्न करना चाहिये ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे अश्वत्थ ! (महति अर्णवे अन्तः) महान-समुद्र अर्थात् वायुमण्डल में (यथा) जिस प्रकार तू (निरभनः) नितरां शक्तिपूर्वक बढ़ा है, (एवा) इस प्रकार की शक्ति से (तान् सर्वान्) उन सबको (निर्भङ्गधि) निःशेषेण भग्न कर (ये माम्) जोकि मेरे साथ द्वेष करते हैं, (च) और (यान्) जिनके साथ मैं द्वेष करता हूँ।
टिप्पणी: [निरभनः=नि+रभ् राभस्ये (भ्वादिः), रभस् पूर्वक बढ़ना। अश्वत्थ, रोग निवारणार्थ, मानो वायुमण्डल में शक्तिपूर्वक बढ़ा है। वायु मंडल में रोग पैदा होते हैं, उनके निवारण के लिए। अन्तरिक्ष महार्णव है, महासमुद्र है। यथा "उत्तरस्मादधरं समुद्रम्" (ऋ० १०।९८।५) में उत्तर समुद्र द्वारा अंतरिक्ष समुद्र अभिप्रेत है, (निरुक्त २।३।१०, ११)। मन्त्र में अश्वत्थ को सम्बोधित किया है ओकि सूक्त में उपमानरूप है। इस द्वारा उपमेय भी अभिप्रेत है "पुमान् पुरुष" [मन्त्र १] वह निज राष्ट्रपति के शत्रुओं का भग्न करता है, जोकि अंतरिक्ष से वायुयानों द्वारा आक्रमण करते हैं। ऐसा आदेश राष्ट्रपति ने "पुमान्-पुरुष" को दिया है। निरभनः= नि+रभ्+ युच् (औणादिक २।७५) नकारस्य णकाराभावः छान्दसः।]
०३।००६।०४
यः सह॑मान॒श्चर॑सि सासहा॒न इ॑व ऋष॒भः ।
तेना॑श्वत्थ॒ त्वया॑ व॒यं स॒पत्ना॑न्त्सहिषीमहि ॥४॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे शूरों में ठहरनेवाले राजन् ! [वा पीपलवृक्ष] ! (यः) जो तू (सहमानः) [वैरियों को] दबाता हुआ, (सासहानः) महाबली (ऋषभः इव) श्रेष्ठ पुरुष वा बलीवर्द वा ऋषभ औषध के समान (चरसि) विचरता है। (तेन त्वया) उस तेरे साथ (वयम्) हम (सपत्नान्) वैरियों को (सहिषीमहि) हरा देवें ॥४॥
भावार्थः प्रजागण शूरवीर नीतिनिपुण राजा और सद्वैद्य के सहाय से शत्रुओं को वश में करते रहें। ऋषभ औषध विशेष है। इसको शब्दकल्पद्रुम कोष में मीठा, शीतल, रक्त-पित्त विरेक नाशक, वीर्य-श्लेष्मकारी और दाहक्षय ज्वरहारी आदि लिखा है ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे अश्वत्थ सदृश [पुमान्-पुरुष!] (सहमानः य:) शत्रुओं का पराभव करनेवाला जो तु, (सासहानः) पराभव करनेवाले (ऋषभः इव) ऋषभ या पुरुषर्षभ की तरह (चरसि) विचरता है, (तेन त्वया) उस तुझ द्वारा (वयम्) हम (सपत्नान्) शत्रुओं का (सहीषीमहि) पराभव करें।
टिप्पणी: [मन्त्र में अश्वत्थ पद निज अर्थ में प्रयुक्त नहीं हुआ, अपितु वह निज उपमेय "पुमान्-पुरुष" का द्योतक है । इसीलिए इसे ऋषभ के सदृश स्वच्छन्द विचरनेवाला कहा है, तथा शत्रुओं का पराभव करनेवाला कहा है। सासहान:= सह यङ्लुक्+ शानच्; सह = षह मर्षणे (चुरादिः)।
०३।००६।०५
सि॒नात्वे॑ना॒न्निरृ॑तिर्मृ॒त्योः पाशै॑रमो॒क्यैः ।
अश्व॑त्थ॒ शत्रू॑न्माम॒कान्यान॒हं द्वेष्मि॒ ये च॒ माम् ।।५ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे शूरों में ठहरनेवाले राजन् ! [वा पीपल वृक्ष !] (निर्ऋति) अलक्ष्मी (मृत्योः) मृत्यु के (अमोक्यैः) न खुल सकनेवाले (पाशैः) पाशों से (एनान्) इन (मामकान् शत्रून्) मेरे शत्रुओं को (सिनातु) बाँध लेवे, (यान्) जिन्हें (अहम्) मैं (द्वेष्मि) वैरी जानता हूँ, (च) और (ये) जो (माम्) मुझे [वैरी जानते हैं] ॥५॥
भावार्थः राजा सत्पुरुषों के विरोधी दुराचारियों को दृढ़ बन्धनों में डालकर निर्धन और नष्ट कर दे ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (निर्ऋतिः) कृच्छ्रापति (अमोक्यैः) न मोचन कर सकने योग्य (मृत्योः पाशै:) मृत्यु के फन्दों द्वारा (एतान् मामकान) इन मेरे शरओं को (सिनातु) बांधे, (अश्वत्थ) हे उपमेय "पुमान्-पुरुष"! (यान अहं द्वेष्मि) जिनके साथ में द्वेष करता हूँ (च) और (ये) जो (माम्) मेरे साथ द्वेष करते हैं।
टिप्पणी: [मनुष्य में अश्वत्थ पद निज उपमेय "पुमान्-पुरुष" का द्योतक है। अथवा "जहत् लक्षणा वत्ति" द्वारा अश्वत्थ निज अर्थ का परित्याग कर "पुमान-पुरुष" का कथन करता है, जैसेकि "गङ्गायां घोषाः" में गङ्गा पद निज अर्थ का परित्याग कर गङ्गा-तट का कथन करता है।]
०३।००६।०६
यथा॑श्वत्थ वानस्प॒त्याना॒रोह॑न्कृणु॒षे ऽध॑रान् ।
ए॒वा मे॒ शत्रो॑र्मू॒र्धानं॒ विष्व॑ग्भिन्द्धि॒ सह॑स्व च ॥६॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (यथा) जिस प्रकार से (अश्वत्थ) हे शूरों में ठहरनेवाले अश्वत्थामा राजन् ! [वा पीपलवृक्ष !] (वानस्पत्यान्) सेवकों वा सेवनीय गणों के रक्षक [आप] से सम्बन्धवाले पुरुषों [वा वृक्ष समूहों] पर (आरोहन्) ऊँचा होकर (अधरान्) नीचे (कृणुवे) तू करता है (एव) वैसे ही (मे शत्रोः) मेरे शत्रु के (मूर्धानम्) मस्तक को (विष्वक्) सब विधि से (भिन्धि) तोड़ दे (च) और (सहस्व) जीत ले ॥६॥
भावार्थः समस्त और प्रत्येक प्रजागण समर्थ शूरवीर पुरुष वा सद्वैद्य को नायक बनाकर शत्रुओं और रोगों से अपने को बचावें ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (अश्वत्थ) हे अश्वत्थ ! (वनस्पत्यान्) वनस्पतियों के समूहों पर (आरोहन्) आरोहण करता हुआ तू (यथा) जिस प्रकार उन्हें (अधरान् कृणुषे) नीचा करता है, (एवा=एवम्) इसी तरह (मे शत्रोः मुर्धानम्) मेरे शत्रु के मुखिया को (विष्वक्) सब प्रकार से (भिन्द्धि) छिन्न-भिन्न कर (च) और (सहस्व) पराभूत कर।
टिप्पणी: [अश्वत्थ, खदिर आदि के कोटर से उत्पन्न होकर [मन्त्र १] उन्हें अपने से नीचे कर देता है, और उन पर आरोहण कर उनसे ऊंचा हो जाता है, इसी प्रकार उपमान-अस्वस्थ द्वारा अभिप्रेत उपमेय "पुमान्-पुरुष" के प्रति कहा है कि तू मेरे शत्रु का भेदन आदि कर, (निज शक्ति द्वारा शत्रु से ऊँचा होकर, उत्कृष्ट होकर)। वनस्पत्यान्=समूहार्थे, ण्यः (सायण)। मुर्धानम्=अथवा शिरः।]
०३।००६।०७
ते ऽध॒राञ्चः॒ प्र प्ल॑वन्तां छि॒न्ना नौरि॑व॒ बन्ध॑नात् ।
न वै॑बा॒धप्र॑णुत्तानां॒ पुन॑रस्ति नि॒वर्त॑नम् ॥७॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (ते) वे (अधराञ्चः) अधोगतिवाले लोग वा रोग (बन्धनात्) बन्धन से (छिन्ना) छूटी हुई (नौः इव) नाव के समान (प्र प्लवन्ताम्) बहते चले जावें जिससे (वैबाधप्रणुतानाम्) विविध बाधा डालनेवालों में पड़े हुए लोगों का (पुनः) फिर (निवर्तनम्) लौटना (न) नहीं (अस्ति) हो ॥७॥
भावार्थः महादुष्ट रोग वा दुराचारियों के हटाने के लिए कठिन उपाय करने चाहियें, क्योंकि कोमलता से उनका सुधार नहीं हो सकता ॥७॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (ते) वे शत्रु (अधराञ्चः) नीचे की ओर (प्र प्लवन्ताम्) शीघ्रता से प्रवाहित हो जाएं, (इव) जैसे (बन्धनात्) वन्धन से (छिन्ना) कटी (नौः) नौका [शीघ्रगामिनी नदी में शीघ्रता से प्रवाहित हो जाती है]। वैवाध=वैबाध, प्रणुत्तानाम्) विविध बाधनाओं से धकेले गयों का (पुनः) फिर (निवर्तनम्) लौट आना (न अस्ति) नहीं होता है।
टिप्पणी: [प्रजा के शत्रु, जो कि विविध बाधाओं१ के कारण स्वराष्ट्र से प्रजा द्वारा धकेल दिये जाते हैं, उनका राष्ट्र में पुनरागमन नहीं होता, क्योंकि वे अधरगतिवाले होते हैं। अधराञ्चः पद द्विविधार्थक हैं। सायणाचार्य ने "वैबाध" का अर्थ खदिरोत्पन्न "अश्वत्थ" किया है, जोकि अविश्वसनीय है ।]
[१. जो शासक प्रजा के कार्यों में बाधाएं उपस्थित करते हैं, वे प्रजा के शत्रु हैं, अतः प्रजा द्वारा निज राष्ट्र से धकेल दिये जाते हैं।]
०३।००६।०८
प्रैणा॑न्नुदे॒ मन॑सा॒ प्र चि॒त्तेनो॒त ब्रह्म॑णा ।
प्रैणा॑न्वृ॒क्षस्य॒ शाख॑याश्व॒त्थस्य॑ नुदामहे ॥८।।
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (एनान्) इन [शत्रुओं] को (मनसा) मननशक्ति से, (चित्तेन) ज्ञानशक्ति से (उत) और (ब्रह्मणा) वेदशक्ति से (प्र प्र) सर्वथा (नुदे) मैं हटाता हूँ। (एनान्) इनको (वृक्षस्य) स्वीकार करने योग्य (अश्वत्थस्य) बलवानों में ठहरनेवाले शूर [वा पीपल] की (शाखया) व्याप्ति [वा शाखा] से (प्र, नुदामहे) हम निकाले देते हैं ॥८॥
भावार्थः प्रत्येक व्यक्ति और सब लोग मिलकर शूरवीर वा पीपल के प्रभाव से आगा-पीछा विचारकर शत्रुओं को नष्ट कर देते हैं ॥८॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (एनान्) इन शत्रुओं को (मनसा) संकल्प द्वारा (प्र नुदे) में धकेलता हूँ, (चित्तेन) सम्यक्-ज्ञान द्वारा (प्रणुदे) मैं धकेलता हूँ, (उत) तथा (ब्रह्मणा) ब्रह्म की कृपा द्वारा (प्रणुदे) मैं धकेलता हूँ; (एनान्) इन शत्रुओं को (अश्वत्थस्य वृक्षस्य शाखया) अश्वत्थ वृक्ष की शाखा द्वारा (प्र णुदामदे) हम धकेलते हैं।
टिप्पणी: [शत्रु रोगरूपी नहीं प्रतीत होते, अपितु ये राष्ट्रिय शत्रु हैं मातुष। इन्हें दृढ़ संकल्पों, सम्पर्क-ज्ञानों तथा ब्रह्म से शक्ति पाकर धकेला गया है। अश्वत्थ प्रकरण द्वारा वृक्ष ही है, शाखया पद द्वारा और भी निश्चय हो जाता है कि यह वृक्ष ही है। अतः वृक्षस्थ पद विकल्प के लिए है, अश्वत्थ की या किसी भी वृक्ष की शाखा द्वारा। "नुदामहे" द्वारा ज्ञात होता है कि शुत्रुओं को धकेलनेवाले बहुत हैं। ये प्रजाएँ हैं। जब समग्र प्रजा मिलकर "राष्ट्रिय शत्रु-स्वकीय राजा" को राष्ट्र से धकेलने के लिए तत्पर हो जाए तो वह वृक्षों की शाखाओं के प्रहारों द्वारा ही शत्रु-राजा को अपने राष्ट्र से धकेल सकती है, किसी उग्र शस्त्रास्त्र की आवश्यकता नहीं होती, इसे मन्त्र में दर्शाया है।]

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