आत्मा के दर्शन के उपाय इन्द्रस्य युज्य: सखा

 

आत्मा के दर्शन के उपाय इन्द्रस्य युज्य: सखा

🚩‼️ओ३म् आपको सादर नमस्ते ‼️🚩

🔥आत्मा के दर्शन के उपाय

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  संसार में यदि कोई दर्शन के योग्य वस्तु है,तो वह केवल आत्मा है।याज्ञवल्क्य ने इसके तीन उपाय बताए हैं जो इस प्रकार हैं-(१)श्रवण,(२)मनन,और(३)निदिध्यासन।

  १.श्रवण

    ब्रह्मविद्या को क्रियात्मक रूप से जानने वाले किसी विद्वान गुरु से या किसी मोक्ष-शास्त्र से उपदेश लेना 'श्रवण' कहलाता है।सच्चे गुरु के बिना और सत्य-शास्त्र के बिना सन्मार्ग का मिलना कठिन है।कठोपनिषद् में कहा है-

*उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान् निबोधत !*

"उठो,जागो!चुने हुए आचार्यों के पास जाओ और समझो!"

यही कारण है कि आर्य-हिन्दुओं में यह कहा जाता है कि "गुरु बिना गति नहीं।" इसीलिए गुरु धारण करने की प्रथा अब तक चली आती है;परन्तु जिस प्रकार संसार के दूसरे क्षेत्रों में त्रुटियाँ आ गई हैं,इस क्षेत्र में भी ढोंग अधिक हो गया है।अतएव बड़ी सावधानी से गुरु को चुनना चाहिए।सच्चे अनुभवी और पहुंचे हुए गुरुओं का अभाव नहीं है।ऐसे महानुभावों के पास पहुँचकर सबसे पहला प्रभाव यह होता है कि हृदय को शान्ति-सी मिलती है।ऐसे ही गुरु आत्मा के दर्शन का मार्ग बतला सकते हैं।जिसने यह मार्ग स्वयं नहीं देखा,वह दूसरों को कैसे मार्ग दिखला सकता है?

पानी मिले न आपको,औरों बख्शत खीर।

आपन मत निश्चल नहीं,और बँधावत धीर।।

जो स्वयं दर्शन पा चुके हैं,जिन्होंने अपना जीवन सफल बना लिया है,जो काम-क्रोध आदि पर विजय प्राप्त करके आत्मा के निकटवासी बन चुके हैं,उनकी तलाश तो कबीर भी करते रहे।ऐसे ही साधुओं और गुरुओं के सम्बन्ध में कबीर कहते हैं-

*सुख देवें,दुख को हरें, दूर करें अपराध।

*कहें कबीर ये कब मिलें, परम सनेही साध।।

  २.मनन

    सत्य गुरु को पाकर,उनसे आत्मा के दर्शन का मार्ग जानकर अब साधक को स्वयं प्रयत्न और पुरुषार्थ करना होता है।जो उपदेश लिया है,उस पर दत्तचित्त होकर मनन करना,उसे युक्तियों से परखना और अनुभव से जानना,मनन कहलाता है।

३.निदिध्यासन

       निरन्तर उसी पर ध्यान जमाना,उसी का चलते-फिरते,उठते-बैठते-जागते अपितु सोते भी ध्यान रखना,इसे निदिध्यासन कहते हैं।जब निरन्तर एक ही ध्येय पर ध्यान लगाया जाएगा तो उसका साक्षात्कार हो जाएगा।बस,इससे परे और क्या है?

कठोपनिषद् का ऋषि कहता है-

*"इंद्रियों के परे(सूक्ष्म)अर्थ(सूक्ष्म-तन्मात्र-शब्द-तन्मात्र,स्पर्श-तन्मात्र,रूप-तन्मात्र,रस-तन्मात्र व गन्ध-तन्मात्र)है।"*

                               कठ० ६।७।।

अर्थों से परे मन है।

मन से परे बुद्धि है।

बुद्धि से परे महान् आत्मा(महत्तत्त्व)है।

महत् से परे अव्यक्त(प्रकृति)है।

प्रकृति से परे पुरुष(परमात्मा)है।

पुरुष से परे कुछ नहीं है।

बस,यह सीमा(पराकाष्ठा)है।इसलिए कहा जाता है कि आत्मा को जान लेने पर फिर कुछ जानने योग्य नहीं रहता।

 *🕉️🚩आज का वेद मन्त्र🚩🕉️*

🌷ओ३म् विष्णो: कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्य: सखा॥ यजुर्वेद १३

  💐हे मनुष्य, तुम उस सर्वव्यापी ईश्वर को समझो। वो सृष्टि की रचना, पालन और प्रलय करने वाला है। वो गुणों से परिपूर्ण है। तुम उस परमात्मा के गुण, कर्म और स्वभाव के अनुकूल आचरण करो। वह जीवात्माओं का मित्र है।

आत्मा दर्शन के उपाय | यजुर्वेद मंत्र आधारित आध्यात्मिक लेख

आत्मा दर्शन के उपाय

ओ३म् विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे। इन्द्रस्य युज्यः सखा॥ (यजुर्वेद 13)

मंत्र का भावार्थ

हे मनुष्यों! उस सर्वव्यापक परमात्मा (विष्णु) के कर्मों को देखो, जिसके नियमों से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड संचालित हो रहा है। वही परमेश्वर समस्त शक्तियों का आधार है और जीवात्मा का परम मित्र है।

यह मंत्र मनुष्य को बाहरी संसार से भीतर की यात्रा करने का मार्ग दिखाता है। जब मनुष्य सृष्टि में व्याप्त परमात्मा की व्यवस्था को समझने लगता है, तब वह स्वयं के वास्तविक स्वरूप अर्थात आत्मा को जानने की दिशा में आगे बढ़ता है।

आत्मा दर्शन क्या है?

आत्मा दर्शन का अर्थ किसी चमत्कारी दृश्य को देख लेना नहीं है। आत्मा दर्शन का वास्तविक अर्थ है स्वयं को शरीर, मन, बुद्धि और इन्द्रियों से अलग पहचानना। जब मनुष्य यह अनुभव करता है कि वह नश्वर शरीर नहीं बल्कि चेतन, अविनाशी और ज्ञानस्वरूप सत्ता है, तब आत्मदर्शन प्रारम्भ होता है।

वेदों के अनुसार आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। शरीर बदलता है, परन्तु आत्मा शाश्वत रहती है। इस सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव ही आत्मा दर्शन कहलाता है।

मंत्र से प्राप्त आत्मा दर्शन का प्रथम उपाय — सृष्टि का निरीक्षण

मंत्र कहता है — "विष्णोः कर्माणि पश्यत" अर्थात परमात्मा के कर्मों को देखो।

जब हम सूर्य के उदय-अस्त, ऋतुओं के परिवर्तन, ग्रहों की गति, प्रकृति के नियमों और जीवन की अद्भुत संरचना को देखते हैं, तब हमें अनुभव होता है कि इस व्यवस्था के पीछे कोई महान बुद्धिमान शक्ति कार्य कर रही है।

सृष्टि का गहन अध्ययन मनुष्य को ईश्वर और आत्मा दोनों के ज्ञान की ओर ले जाता है।

दूसरा उपाय — सत्य का पालन

मंत्र में कहा गया है कि परमात्मा के नियम सम्पूर्ण जगत को धारण करते हैं। जो मनुष्य सत्य, न्याय, करुणा और धर्म का पालन करता है, उसका अन्तःकरण शुद्ध होने लगता है।

अशुद्ध मन आत्मा का अनुभव नहीं कर सकता। जैसे धूल से ढका हुआ दर्पण चेहरा नहीं दिखा सकता, वैसे ही विकारों से भरा मन आत्मा का प्रकाश नहीं देख सकता।

तीसरा उपाय — ध्यान और आत्मचिन्तन

प्रतिदिन कुछ समय एकान्त में बैठकर अपने विचारों का निरीक्षण करें।

अपने आप से पूछें—

  • मैं कौन हूँ?
  • क्या मैं केवल शरीर हूँ?
  • क्या मेरे विचार ही मेरा वास्तविक स्वरूप हैं?
  • जो इन विचारों को देख रहा है वह कौन है?

जब यह प्रश्न गहराई से पूछे जाते हैं, तब साधक धीरे-धीरे आत्मा के निकट पहुँचने लगता है।

चौथा उपाय — इन्द्रिय संयम

आत्मा का प्रकाश भीतर है, किन्तु मनुष्य की इन्द्रियाँ बाहर की ओर भागती रहती हैं।

अत्यधिक भोग, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अहंकार आत्मज्ञान के मार्ग में सबसे बड़े अवरोध हैं। इसलिए संयम, ब्रह्मचर्य, सदाचार और संतुलित जीवन आत्मदर्शन के लिए आवश्यक हैं।

पाँचवाँ उपाय — ईश्वर से मित्रता

मंत्र का अंतिम भाग कहता है — "इन्द्रस्य युज्यः सखा" अर्थात परमात्मा जीवात्मा का श्रेष्ठ मित्र है।

जब साधक ईश्वर को भय का विषय न मानकर अपना हितैषी मित्र समझता है, तब उसके भीतर श्रद्धा और प्रेम उत्पन्न होता है। यही प्रेम आगे चलकर ध्यान, भक्ति और आत्मसाक्षात्कार का आधार बनता है।

आत्मदर्शन के पाँच मुख्य साधन

  1. सृष्टि में परमात्मा के कर्मों का निरीक्षण।
  2. सत्य और धर्म का पालन।
  3. नियमित ध्यान एवं आत्मचिन्तन।
  4. इन्द्रिय संयम और सदाचार।
  5. ईश्वर को अपना परम मित्र मानकर उपासना।

निष्कर्ष

यजुर्वेद का यह दिव्य मंत्र हमें बताता है कि आत्मा दर्शन किसी रहस्यमयी घटना का नाम नहीं, बल्कि सत्य को देखने की प्रक्रिया है। जो व्यक्ति परमात्मा के नियमों को समझता है, अपने जीवन को शुद्ध बनाता है, ध्यान करता है और ईश्वर से मैत्री स्थापित करता है, वह धीरे-धीरे आत्मा के प्रकाश का अनुभव करने लगता है।

जब मन शांत हो जाता है और अहंकार मिट जाता है, तब आत्मा स्वयं प्रकट हो जाती है। आत्मा को बाहर खोजने की आवश्यकता नहीं है; वह हमारे भीतर ही सदैव विद्यमान है।

© वैदिक ज्ञान श्रृंखला | आत्मा दर्शन के उपाय | यजुर्वेद आधारित आध्यात्मिक लेख

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