ऋग्वेद मंडल 1 सुक्त 103 संस्कृत व्याकरण और हिन्दी भावार्थ



इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य के गुण हैं, उनकी उपमा अर्थात् अनुसार लेकर अपने गुणों से, सेवकादिकों से और पृथिवी आदि लोकों से उपकारों को ले और शत्रुओं को मारकर निरन्तर सुखी हों॥8॥



अथ त्र्युत्तरशततमस्याष्टर्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसः कुत्स ऋषिरिन्द्रो देवता। 1,3,5,6 निचृत्त्रिष्टुप्। 2,4 विराट् त्रिष्टुप्। 7,8 त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥ अथ परमेश्वरस्य कार्ये जगति कीदृशं प्रसिद्धं लिङ्गमस्तीत्युपदिश्यते॥

 अब एक सौ तीनवें सूक्त का प्रारम्भ है। उसके प्रथम मन्त्र में यह उपदेश है कि ईश्वर का कार्य्य जगत् में कैसा प्रसिद्ध चिह्न है॥

 तत्त॑ इन्द्रि॒यं प॑र॒मं प॑रा॒चैरधा॑रयन्त क॒वयः॑ पु॒रेदम्। क्ष॒मेदम॒न्यद्दि॒व्यन्यद॑स्य॒ समी॑ पृच्यते सम॒नेव॑ के॒तुः॥1॥ 

तत्। ते॒। इ॒न्द्रि॒यम्। प॒र॒मम्। प॒रा॒चैः। अधा॑रयन्त। क॒वयः॑। पु॒रा। इ॒दम्। क्ष॒मा। इ॒दम्। अ॒न्यत्। दि॒वि। अ॒न्यत्। अ॒स्य॒। सम्। ई॒म् इति॑। पृ॒च्य॒ते॒। स॒म॒नाऽइ॑व। के॒तुः॥1॥

 पदार्थः—(तत्) (ते) तव (इन्द्रियम्) इन्द्रस्य परमैश्वर्य्यवतस्तव जीवस्य च लिङ्गम् (परमम्) प्रकृष्टम् (पराचैः) बाह्यचिह्नैर्युक्तम् (अधारयन्त) धृतवन्तः (कवयः) मेधाविनो विद्वांसः (पुरा) पूर्वम् (इदम्) प्रत्यक्षाप्रत्यक्षं सामर्थ्यम् (क्षमा) सर्वसहनयुक्ता पृथिवी (इदम्) वर्त्तमानम् (अन्यत्) भिन्नम् (दिवि) प्रकाशवति सूर्य्यादौ (अन्यत्) विलक्षणम् (अस्य) संसारस्य मध्ये (सम्) (ई) ईमित्युदकनामसु पठितम्। (निघं॰1.12) छन्दसो वर्णलोपो वेति मलोपः। (पृच्यते) संयुज्यते (समनेव) यथा युद्धे प्रवृत्ता सेना तथा (केतुः) विज्ञापकः॥1॥

 अन्वयः—हे जगदीश्वर! यत्ते तव जीवस्य च सृष्टाविदं परममिन्द्रियं कवयः पराचैः पुरा धारयन्त क्षमा पृथिवीदं धृतवती यद्दिवीदं वर्त्तते यदन्यत्कारणेऽस्त्यस्य संसारस्य मध्ये ई-ईमुदकं धरति यदन्यददृष्टे कार्य्ये भवति तत्सर्वं समनेव केतुः सन् प्रकाशयति तच्चात्र सम्पृच्यते॥1॥

 भावार्थः—हे मनुष्या! यद्यदस्मिञ्जगति रचनाविशेषयुक्तं सुष्ठु वस्तु वर्त्तते तत्तत्सर्वं परमेश्वरस्य रचनेनैव प्रसिद्धमस्तीति विजानीत, नहीदृशं विचित्रं जगद्विधात्रा विना संभवितुमर्हति तस्मादस्ति खल्वस्य जगतो निर्मातेश्वरो जैवीं सृष्टिं कर्त्ता जीवश्चेति निश्चयः॥1॥

 पदार्थः—हे जगदीश्वर! जो (ते) आप वा जीव की सृष्टि में (इदम्) यह प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष सामर्थ्य (परमम्) प्रबल अति उत्तम (इन्द्रियम्) परम ऐश्वर्य्ययुक्त आप और जीव का एक चिह्न जिसको (कवयः) बुद्धिमान् विद्वान् जन (पराचैः) ऊपर के चिह्नों से सहित (पुरा) प्रथम (अधारयन्त) धारण करते हुए (क्षमा) सबको सहनेवाली पृथिवी (इदम्) इस वर्त्तमान चिह्न को धारण करती जो (दिवि) प्रकाशमान सूर्य्य आदि लोक में वर्त्तमान वा जो (अन्यत्) उससे भिन्न कारण में वा (अस्य) इस संसार के बीच में है, इसको (ई) जल धारण करता वा जो (अन्यत्) और विलक्षण न देखे हुए कार्य्य में होता है (तत्) उस सबको (समनेव) जैसे युद्ध में सेना आ जुटे, ऐसे (केतुः) विज्ञान देनेवाले होते हुए आप वा जीव प्रकाशित करता,यह सब इस जगत् में (सम्पृच्यते) सम्बद्ध होता है॥1॥

 भावार्थः—हे मनुष्यो! इस जगत् में जो-जो रचना विशेष चतुराई के साथ अच्छी-अच्छी वस्तु वर्त्तमान है, वह-वह सब परमेश्वर की रचना से ही प्रसिद्ध है, यह तुम जानो, क्योंकि ऐसा विचित्र जगत् विधाता के विना कभी होने योग्य नहीं। इससे निश्चय है कि इस जगत् का रचनेवाला परमेश्वर है और जीव सम्बन्धी सृष्टि का रचनेवाला जीव है॥1॥

 अथैतस्मिञ्जगति तद्रचितोऽयं सूर्य्यः किं कर्माऽस्तीत्युपदिश्यते॥

 अब इस जगत् में परमेश्वर से बनाया हुआ यह सूर्य्य क्या काम करता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 स धा॑रयत् पृथि॒वीं प॒प्रथ॑च्च॒ वज्रे॑ण ह॒त्वा निर॒पः स॑सर्ज। अह॒न्नहि॒मभि॑नद्रौहि॒णं व्यह॒न् व्यं॑सं म॒घवा॒ शची॑भिः॥2॥ 

सः। धा॒र॒य॒त्। पृ॒थि॒वीम्। प॒प्रथ॑त्। च॒। वज्रे॑ण। ह॒त्वा। निः। अ॒पः। स॒स॒र्ज॒। अह॑न्। अहि॑म्। अभि॑नत्। रौ॒हि॒णम्। वि। अह॑न्। विऽअं॑सम्। म॒घऽवा॑। शची॑भिः॥2॥

 पदार्थः—(सः) (धारयत्) धरति (पृथिवीम्) भूमिम् (पप्रथत्) स्वतेजो विस्तार्य स्वेन तेजसा सर्वं जगत् प्रकाशयति (च) एवं विद्युदादीन् (वज्रेण) किरणसमूहेन (हत्वा) (निः) निरन्तरम् (अपः) जलानि (ससर्ज) सृजति (अहन्) हन्ति (अहिम्) मेघम् (अभिनत्) भिनत्ति (रौहिणम्) रोहिण्यां प्रादुर्भूतम् (वि) (अहन्) हन्ति (व्यंसम्) विगता अंसा यस्य तम् (मघवा) सूर्यः (शचीभिः) कर्मभिः॥2॥

 अन्वयः—हे मनुष्या! यो मघवा शचीभिः पृथिवीं धारयत्स्वतेजः पप्रथद्विद्युदादींश्च वज्रेण मेघं हत्वाऽपो निःससर्ज पुनरहिमहन् रौहिणमभिनत् न केवलं साधारणमेव हन्ति, किन्तुं व्यंसं यथा स्यात् तथा व्यहन् स ईश्वरेण रचितोऽस्तीति विजानीत॥2॥

 भावार्थः—मनुष्यैरिदं द्रष्टव्यं प्रसिद्धो यः सूर्य्यलोकोऽस्ति, स विदारणाकर्षणप्रकाशनादिकर्मभिर्वृष्टिं कृत्वा पृथिवीं धृत्वाऽव्यक्तपदार्थान् प्रकाश्य सर्वान् प्राणिनो व्यवहारयति, स परमात्मनो रचनेन विना कदाचिदपि संभवितुं नार्हति॥2॥

 पदार्थः—हे मनुष्यो! जो (मघवा) सूर्य्यलोक (शचीभिः) कामों से (पृथिवीम्) पृथिवी को (धारयत्) धारण करता अपने तेज (च) और बिजुली आदि को (पप्रथत्) फैलाता उस अपने तेज से सब जगत् को प्रकाशित करता (वज्रेण) अपने किरणसमूह से मेघ को (हत्वा) मार के (अपः) जलों को (निः) (ससर्ज) निरन्तर उत्पन्न करता, फिर (अहिम्) मेघ को (अहन्) हनता (रौहिणम्) रोहिणी नक्षत्र में उत्पन्न हुए मेघ को (अभिनत्) विदारण करता (व्यंसम्) (वि, अहन्) केवल साधारण ही विदारता हो सो नहीं, किन्तु कटि जाय भुजा आदि जिसकी ऐसे रुण्ड, मुण्ड, मुचण्ड, उद्दण्ड, वीर के समान विशेष करके मेघों को हनता है (सः) वह सूर्य्यलोक ईश्वर ने रचा है, यह जानो॥2॥

 भावार्थः—मनुष्यों को यह देखना चाहिये कि प्रसिद्ध जो सूर्यलोक है, वह मेघों के विदारण, लोकों के खीचनें और प्रकाश आदि कामों से जल, वर्षा, पृथिवी को धारण और अप्रकट अर्थात् अन्धकार से ढंपे हुए जो पदार्थ हैं, उनको प्रकाशित कर सब प्राणियों को व्यवहार में चलाता है, वह परमात्मा के बनाने के विना उत्पन्न नहीं हो सकता॥2॥

 अथ सेनाद्यध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते॥

 अब सेना आदि का अध्यक्ष कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 स जा॒तूभ॑र्मा श्र॒द्दधा॑न॒ ओजः॒ पुरो॑ विभि॒न्दन्न॑चर॒द्वि दासीः॑। वि॒द्वान् व॑ज्रि॒न् दस्य॑वे हे॒तिम॒स्यार्यं॒ सहो॑ वर्धया द्यु॒म्नमि॑न्द्र॥3॥

 सः। जा॒तूऽभ॑र्मा। श्र॒त्ऽदधा॑नः। ओजः॑। पुरः॑। वि॒ऽभि॒न्दन्। अ॒च॒र॒त्। वि। दासीः॑। वि॒द्वान्। व॒ज्रि॒न्। दस्य॑वे। हे॒तिम्। अ॒स्य॒। आर्य॑म्। सहः॑। व॒र्ध॒य॒। द्यु॒म्नम्। इ॒न्द्र॒॥3॥

 पदार्थः—(सः) (जातूभर्मा) यो जातान् जन्तून् बिभर्ति सः। अत्र जनीधातोस्तुः प्रत्ययो नकारस्याकारादेशोऽन्येषामपीति दीर्घः। (श्रद्दधानः) सत्कर्मसु प्रीतियुक्तः (ओजः) पराक्रमम् (पुरः) नगरी (विभिन्दन्) विदारयन् सन् (अचरत्) चरति (वि) (दासीः) दासीशीला नगरीः। अत्र दंसेष्टटनौ न आ च। (उणा॰5.10) (विद्वान्) (वज्रिन्) प्रशस्तशस्त्रसमूहयुक्त (दस्यवे) दुष्टकर्मकर्त्रे (हेतिम्) सुखवर्धकं वज्रम् (अस्य) दुष्टस्य (आर्य्यम्) आर्य्याणामर्याणां वा इदम् (सहः) बलम् (वर्धय) अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (द्युम्नम्) धनम् (इन्द्र) प्रकृष्टपदार्थप्रद॥3॥

 अन्वयः—हे वज्रिन्निन्द्र! यो जातूभर्मा श्रद्दधानो विद्वान् भवानस्य दुष्टस्य दासीः पुरो दस्यवे विभिन्दन् सन् व्यचरत् स त्वं श्रेष्ठेभ्यो हेतिमार्य्यं सहो द्युम्नमोजश्च वर्धय॥3॥

 भावार्थः—यो मनुष्यो दस्यून् विनाश्य श्रेष्ठान् संहर्ष्य शरीरात्मबलं सम्पाद्य धनादिभिः सुखानि वर्धयति, स एव सर्वैः श्रद्धेयः॥3॥

 पदार्थः—हे (वज्रिन्) प्रशंसित शस्त्रसमूहयुक्त (इन्द्र) अच्छे-अच्छे पदार्थोंर् के देनेवाले सेना आदि के स्वामी! जो (जातूभर्मा) उत्पन्न हुए सांसारिक पदार्थों को धारण (श्रद्दधानः) और अच्छे कामों में प्रीति करनेवाले (विद्वान्) विद्वान् आप (अस्य) इस दुष्ट जन की (दासीः) नष्ट होनेहारीसी दासी प्रधान (पुरः) नगरियों को (दस्यवे) दुष्ट काम करते हुए जन के लिये (विभिन्दन्) विनाश करते हुए (व्यचरत्) विचरते हो (सः) वह आप श्रेष्ठ सज्जनों के लिये (हेतिम्) सुख के बढ़ानेवाले वज्र को (आर्य्यम्) श्रेष्ठ वा अति श्रेष्ठों के इस (सहः) बल (द्युम्नम्) धन वा (ओजः) और पराक्रम को (वर्धय) बढ़ाया करो॥3॥

 भावार्थः—जो मनुष्य समस्त डाकू, चोर, लवाड़, लम्पट, लड़ाई करनेवालों का विनाश और श्रेष्ठों को हर्षित कर शारीरिक और आत्मिक बल का सम्पादन कर, धन आदि पदार्थों से सुख को बढ़ाता है, वही सबको श्रद्धा करने योग्य है॥3॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

 फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 तदू॒चुषे॒ मानु॑षे॒मा यु॒गानि॑ की॒र्तेन्यं॑ म॒घवा॒ नाम॒ बिभ्र॑त्। उ॒प॒प्र॒यन् द॑स्यु॒हत्या॑य व॒ज्री यद्ध॑ सू॒नुः श्रव॑से॒ नाम॑ द॒धे॥4॥

 तत्। ऊ॒चुषे॑। मानु॑षा। इ॒मा। यु॒गानि॑। की॒र्तेन्य॑म्। म॒घऽवा॑। नाम॑। बिभ्र॑त्। उ॒प॒ऽप्र॒यन्। द॒स्यु॒ऽहत्या॑य। व॒ज्री। यत्। ह॒। सू॒नुः। श्रव॑से। नाम॑। द॒धे॥4॥

 पदार्थः—(तत्) (ऊचुषे) वक्तुमर्हाय (मानुषा) मानुषेषु भवानि (इमा) इमानि (युगानि) वर्षाणि (कीर्तेन्यम्) कीर्तनीयम् (मघवा) भूयांसि मघानि धनानि विद्यन्ते यस्य सः (नाम) प्रसिद्धिं जलं वा (बिभ्रत्) धारयन् (उपप्रयन्) साधुसामीप्यङ्गच्छन् (दस्युहत्याय) दस्यूनां हत्या यस्मै तस्मै (वज्री) प्रशस्तशस्त्रसमूहयुक्तः सेनाधिपतिः (यत्) (ह) खलु (सूनुः) वीरपुत्रः (श्रवसे) धनाय (नाम) प्रसिद्धं कर्म (दधे) दधाति॥4॥

 अन्वयः—मघवा सूनुर्वज्री सेनापतिर्यथा सूर्यस्तथोचुषे दस्युहत्याय श्रवसे इमा मानुषा युगानि कीर्त्तेन्यं नाम बिभ्रदुपप्रयन् यन्नाम दधे तद्ध खलु वयमपि दधीमहि॥4॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। यथा सूर्यः कालावयवान् जलं च धृत्वा सर्वप्राणिसुखायान्धकारं हत्वा सर्वान् सुखयति, तथैव सेनाधिपतिः सुखपूर्वकं संवत्सरान् कीर्तिं च धृत्वा शत्रुहननेन सर्वसुखाय धनं जनयेत्॥4॥

 पदार्थः—जो (मघवा) बहुत धनोंवाला (सूनुः) वीर का पुत्र (वज्री) प्रशंसित शस्त्र-अस्त्र बांधे हुए सेनापति जैसे सूर्य प्रकाशयुक्त है, वैसे प्रकाशित होकर (ऊचुषे) कहने की योग्यता के लिये वा (दस्युहत्याय) जिसके लिये डाकुओं को हनन किया जाये, उस (श्रवसे) धन के लिये (इमा) इन (मानुषा) मनुष्यों में होनेवाले (युगानि) वर्षों को तथा (कीर्तेन्यम्) कीर्त्तनीय (नाम) प्रसिद्ध और जल को (बिभ्रत्) धारण करता हुआ (उपप्रयन्) उत्तम महात्मा के समीप जाता हुआ (यत्) जिस (नाम) प्रसिद्ध काम को (दधे) धारण करता है, (तत्) उस उत्तम काम को (ह) निश्चय से हम लोग भी धारण करें॥4॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। जैसे सूर्य-काल के अवयव अर्थात् संवत्सर, महीना, दिन, घड़ी आदि और जल को धारण कर सब प्राणियों के सुख के लिये अन्धकार का विनाश करके सबको सुख देता है, वैसे ही सेनापति सुखपूर्वक संवत्सर और कीर्त्ति को धारण करके शत्रुओं के मारने से सबके सुख के लिये धन को उत्पन्न करे॥4॥

 मनुष्यैस्तस्मात् किं किं कर्म धार्यमित्युपदिश्यते॥

 मनुष्यों को उससे कौन-कौन काम धारण करना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 तद॑स्ये॒दं प॑श्यता॒ भूरि॑ पु॒ष्टं श्रदिन्द्र॑स्य धत्तन वी॒र्या॑य। स गा अ॑विन्द॒त् सो अ॑विन्द॒दश्वा॒न्त्स ओष॑धीः॒ सो अ॒पः स वना॑नि॥5॥16॥

 तत्। अ॒स्य॒। इ॒दम्। प॒श्य॒त॒। भूरि॑। पु॒ष्टम्। श्रत्। इन्द्र॑स्य। ध॒त्त॒न॒। वी॒र्या॑य। सः। गाः। अ॒वि॒न्द॒त्। सः। अ॒वि॒न्द॒त्। अश्वा॑न्। सः। ओष॑धीः। सः। अ॒प। सः। वना॑नि॥5॥

 पदार्थः—(तत्) कर्म (अस्य) सेनापतेः (इदम्) प्रत्यक्षम् (पश्यत) अत्रान्येषामपीति दीर्घः। (भूरि) बहु (पुष्टम्) दृढम् (श्रत्) सत्याचरणम्। श्रदिति सत्यनामसु पठितम्। (निघं॰3.10) (इन्द्रस्य) सेनाबलयुक्तस्य (धत्तन) धरत (वीर्याय) बलाय (सः) सूर्य इव (गाः) पृथिवीः (अविन्दत्) लभते (सः) (अविन्दत्) लभते (अश्वान्) महतः पदार्थान्। अश्व इति महन्नामसु पठितम्। (निघं॰3.3) (सः) (ओषधीः) गोधूमाद्या ओषधीः (सः) (अपः) कर्माणि जलानि वा (सः) (वनानि) जङ्गलान् किरणान् वा॥5॥

 अन्वयः—हे मनुष्या! यः स सेनाधिपतिः सूर्य इव गा अविन्दत् सोऽश्वानविन्दत् स ओषधीरविन्दत् स अपोऽविन्दत् स वनान्यविन्दत्तदस्येन्द्रस्येदं भूरि पुष्टं श्रत् सत्याचरणं यूयं पश्यत वीर्याय धत्तन॥5॥ 

भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्योत्तमेन सत्याचरणेन प्राप्तिः सैव धार्या नैतया विना सत्यः पराक्रमः सर्वपदार्थलाभश्च जायते॥5॥

 पदार्थः—हे मनुष्यो! जो (सः) वह सेनापति सूर्य के तुल्य (गाः) भूमियों को (अविन्दत्) प्राप्त होता (सः) वह (अश्वान्) बड़े पदार्थों को (अविन्दत्) प्राप्त होता (सः) वह (ओषधीः) ओषधियों अर्थात् गेहूं, उड़द, मूँग, चना आदि को प्राप्त होता (सः) वह (अपः) सूर्य्य जलों को जैसे वैसे कर्मों को प्राप्त होता (सः) तथा वह सूर्य (वनानि) किरणों को जैसे वैसे जङ्गलों को प्राप्त होता है, (अस्य) इस (इन्द्रस्य) सेना बलयुक्त सेनापति के (तत्) उस कर्म को वा (इदम्) इस (भूरि) बहुत (पुष्टम्) दृढ़ (श्रत्) सत्य के आचरण को तुम (पश्यत) देखो और (वीर्य्याय) बल होने के लिये (धत्तन) धारण करो॥5॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो श्रेष्ठ जनों के सत्य आचरण से प्राप्ति है, उसी को धारण करें। उसके विना सत्य पराक्रम और सब पदार्थों का लाभ नहीं होता॥5॥ 

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

 फिर वह कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 भूरि॑कर्मणे वृष॒भाय॒ वृष्णे॑ स॒त्यशु॑ष्माय सुनवाम॒ सोम॑म्। य आ॒दृत्या॑ परिप॒न्थीव॒ शूरोऽय॑ज्वनो वि॒भज॒न्नेति॒ वेदः॑॥6॥

 भूरि॑ऽकर्मणे। वृ॒ष॒ऽभाय॑। वृष्णे॑। स॒त्यऽशु॑ष्माय। सु॒न॒वा॒म॒। सोम॑म्। यः। आ॒ऽदृत्य॑। प॒रि॒प॒न्थीऽइ॑व। शूरः॑। अय॑ज्वनः। वि॒ऽभज॑न्। एति॑। वेदः॑॥6॥

 पदार्थः—(भूरिकर्मणे) बहुकर्मकारिणे (वृषभाय) श्रेष्ठाय (वृष्णे) सुखप्रापकाय (सत्यशुष्माय) नित्यबलाय (सुनवाम) निष्पादयेम (सोमम्) ऐश्वर्य्यसमूहम् (यः) (आदृत्य) आदरं कृत्वा (परिपन्थीव) यथा दस्युस्तथा चौराणां प्राणपदार्थहर्त्ता (शूरः) निर्भयः (अयज्वनः) यज्ञविरोधिनः (विभजन्) विभागं कुर्वन् (एति) प्राप्नोति (वेदः) धनम्॥6॥

 अन्वयः—वयं यः शूर आदृत्य परिपन्थीव विभजन्नयज्वनो वेद एति तस्मै भूरिकर्मणे वृषभाय वृष्णे सत्यशुष्मायेन्द्राय सेनापतये यथा सोमं सुनवाम तथा यूयमपि सुनुत॥6॥

 भावार्थः—अत्रोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यो दस्युवत् प्रगल्भः साहसी सन् चौराणां सर्वस्वं हृत्वा सत्कर्मणामादरं विधाय पुरुषार्थी बलवानुत्तमो वर्त्तते, स एव सेनापतिः कार्य्यः॥6॥

 पदार्थः—हम लोग (यः) जो (शूरः) निडर, शूरवीर पुरुष (आदृत्य) आदर सत्कार कर (परिपन्थीव) जैसे सब प्रकार से मार्ग में चले हुए डाकू दूसरे का धन आदि सर्वस्व हर लेते हैं, वैसे चोरों के प्राण और उनके पदार्थों को छीन-छान हर लेवे वह (विभजन्) विभाग अर्थात् श्रेष्ठ और दुष्ट पुरुषों को अलग-अलग करता हुआ उनमें से (अयज्वनः) जो यज्ञ नहीं करते उनके (वेदः) धन को (एति) छीन लेता, उस (भूरिकर्मणे) भारी काम के करनेवाले (वृषभाय) श्रेष्ठ (वृष्णे) सुख पहुंचानेवाले (सत्यशुष्माय) नित्य बली सेनापति के लिये जैसे (सोमम्) ऐश्वर्य्य समूह को (सुनवाम) उत्पन्न करें, वैसे तुम भी करो॥6॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जो ऐसा ढीठ है कि जैसे डाकू आदि होते हैं और साहस करता हुआ चोरों के धन आदि पदार्थों को हर सज्जनों का आदर कर पुरुषार्थी बलवान् उत्तम से उत्तम हो, उसी को सेनापति करें॥6॥

 पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

 फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥

 तदि॑न्द्र॒ प्रेव॑ वी॒र्यं॑ चकर्थ॒ यत्स॒सन्तं॒ वज्रे॑णाबो॑ध॒योऽहि॑म्। अनु॑ त्वा॒ पत्नी॑र्हृषि॒तं वय॑श्च॒ विश्वे॑ दे॒वासो॑ अमद॒न्ननु॑ त्वा॥7॥

 तत्। इ॒न्द्र॒। प्रऽइ॑व। वी॒र्य॑म्। च॒क॒र्थ॒। यत्। स॒सन्त॑म्। वज्रे॑ण। अबो॑धयः। अहि॑म्। अनु॑। त्वा॒। पत्नीः॑। हृ॒षि॒तम्। वयः॑। च॒। विश्वे॑। दे॒वासः॑। अ॒म॒द॒न्। अनु॑। त्वा॒॥7॥

 पदार्थः—(तत्) (इन्द्र) सेनाध्यक्ष (प्रेव) प्रकटं यथा स्यात्तथा (वीर्य्यम्) स्वकीयं बलम् (चकर्थ) करोषि (यत्) (ससन्तम्) स्वपन्तं चिन्तारहितं वा (वज्रेण) तीक्ष्णशस्त्रेण (अबोधयः) बोधयसि (अहिम्) सर्प्पं शत्रुं वा (अनु) (त्वा) त्वाम् (पत्नीः) पत्न्यः (हृषितम्) जातहर्षम् (वयः) ज्ञानिनः (च) (विश्वे) अखिलाः (देवासः) विद्वांसः (अमदन्) हर्षयन्ति (अनु) (त्वा) त्वाम्॥7॥

 अन्वयः—हे इन्द्र! ससन्तमहिं यद् वज्रेणाबोधयस्तद्वीर्यं प्रेव चकर्थानुहृषितं पत्नीर्वयो विश्वेदेवासश्चाऽन्वमदन्॥7॥

 भावार्थः—अत्रोपमालङ्कारः। बलवता सेनापतिना दुष्टप्राणिनो दुष्टशत्रवश्च यथाविधि हन्यन्ते॥7॥

 पदार्थः—हे (इन्द्र) सेनाध्यक्ष! आप (ससन्तम्) सोते हुए वा चिन्तारहित (अहिम्) सर्प्प वा शत्रु को (यत्) जो (वज्रेण) तीक्ष्ण शस्त्र से (अबोधयः) सचेत कराते हो (तत्) सो (वीर्य्यम्) अपने बल को (प्रेव) प्रकट सा (चकर्थ) करते हो (अनु) उसके पीछे (हृषितम्) उत्पन्न हुआ है आनन्द जिनको उन (त्वा) आपको (पत्नीः) आपके स्त्री जन और (वयः) ज्ञानवान् (विश्वे) समस्त (देवासश्च) विद्वान् जन भी (त्वा) आपको (अन्वमदन्) अनुकूलता से प्रसन्न करते हैं॥7॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में उपमालङ्कार है। बलवान सेनापति से दुष्ट जीव तथा दुष्ट शत्रुजन मारे जाते हैं॥7॥ 

पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥

 फिर वह कैसा है, इस विषय का उपदेश अगले मन्त्र में किया है॥

 शुष्णं॒ पिप्रुं॒ कुय॑वं वृ॒त्रमि॑न्द्र य॒दाव॑धी॒र्वि पुरः॒ शम्ब॑रस्य। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥8॥17॥

 शुष्ण॑म्। पिप्रु॑म्। कुय॑वम्। वृ॒त्रम्। इ॒न्द्र॒। य॒दा। अव॑धीः। वि। पुरः॑। शम्ब॑रस्य। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥8॥

 पदार्थः—(शुष्णम्) बलवन्तम् (पिप्रुम्) प्रपूरकम्। अत्र पॄधातोर्बाहुलकादौणादिकः कुः प्रत्ययः। (कुयवम्) कौ पृथिव्यां यवा यस्मात् तम् (वृत्रम्) मेघं शत्रुं वा (इन्द्र) (यदा) (अवधीः) हंसि (वि) (पुरः) पुराणि (शम्बरस्य) मेघस्य बलवतः शत्रोर्वा। शम्बर इति मेघनामसु पठितम्। (निघं॰1.10) बलनामसु च। (निघं॰2.9) (तन्नो॰ मित्रो॰) इति पूर्ववत्॥8॥

 अन्वयः—हे इन्द्र! यदा त्वं यथा सूर्यः शुष्णं कुवयं पिप्रुं वृत्रं शम्बरस्य पुरश्च व्यवधीस्तन् मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्नोऽस्मान् मामहन्ताम्, सत्कारहेतवो भवेयुः॥8॥

 भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्यगुणास्तानुपमीकृत्य स्वैगुणर्भृत्यादिभ्यः पृथिव्यादिभ्यश्चोपकारान् सङ्गृह्य शत्रून् हत्वा सततं सुखयितव्यम्॥8॥

 अत्रेश्वरसूर्य्यसेनाधिपतीनां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति बोध्यम्॥ इति त्र्युत्तरमेकशततमं 103 सूक्तं सप्तदशो वर्गश्च 17 समाप्तः॥ पदार्थः—हे (इन्द्र) सेनापति (यदा) जब सूर्य (शुष्णम्) बलवान् (कुवयम्) जिससे कि यवादि होते और (पिप्रुम्) जल आदि पदार्थों को परिपूर्ण करता उस (वृत्रम्) मेघ वा (शम्बरस्य) अत्यन्त वर्षनेवाले बलवान् मेघ की (पुरः) पूरी-पूरी घटा और घुमड़ी हुई मण्डलियों को हनता है, वैसे शत्रुओं की नगरियों को (वि, अवधीः) मारते हो (तत्) तब (मित्रः) मित्र (वरुणः) उत्तम गुणयुक्त (अदितिः) अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्यलोक (नः) हम लोगों के (मामहन्ताम्) सत्कार कराने के हेतु होते हैं॥8॥

 भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य के गुण हैं, उनकी उपमा अर्थात् अनुसार लेकर अपने गुणों से, सेवकादिकों से और पृथिवी आदि लोकों से उपकारों को ले और शत्रुओं को मारकर निरन्तर सुखी हों॥8॥

 इस सूक्त में ईश्वर, सूर्य और सेनाधिपति के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ के साथ संगति जाननी चाहिये॥ यह एकसौ तीनवाँ 103 सूक्त और सत्रहवाँ 17 वर्ग समाप्त हुआ॥


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