अथ द्व्यधिकशततमस्यैकादशर्चस्य सूक्तस्याङ्गिरसः कुत्स ऋषिः। इन्द्रो देवता। 1 जगती। 3,5-8 निचृज्जगती छन्दः। निषादः स्वरः। 2,4,9 स्वराड् त्रिष्टुप्। 10,11 निचृत् त्रिष्टुप् छन्दः। धैवतः स्वरः॥
अथ शालाद्यध्यक्षेण किं किं स्वीकृत्य कथं भवितव्यमित्युपदिश्यते॥
अब शाला आदि के अध्यक्ष को क्या-क्या स्वीकार कर कैसा होना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
इ॒मां ते॒ धियं॒ प्र भ॑रे म॒हो म॒हीम॒स्य स्तो॒त्रे धि॒षणा॒ यत्त॑ आन॒जे। तमु॑त्स॒वे च॑ प्रस॒वे च॑ सास॒हिमिन्द्रं॑ दे॒वासः॒ शव॑सामद॒न्ननु॑॥1॥
इ॒माम्। ते॒। धिय॑म्। प्र। भ॒रे॒। म॒हः। म॒हीम्। अ॒स्य। स्तो॒त्रे। धि॒षणा॑। यत्। ते॒। आ॒न॒जे। तम्। उ॒त्ऽस॒वे। च॒। प्र॒ऽस॒वे। च॒। स॒स॒हिम्। इन्द्र॑म्। दे॒वासः॑। शव॑सा। अ॒म॒द॒न्। अनु॑॥1॥
पदार्थः—(इमाम्) प्रत्यक्षाम् (ते) तव विद्याशालाधिपतेः (धियम्) प्रज्ञां कर्म वा (प्र) (भरे) धरे (महः) महतीम् (महीम्) पूज्यतमाम् (अस्य) (स्तोत्रे) स्तोतव्ये व्यवहारे (धिषणा) विद्यासुशिक्षिता वाक् (यत्) या यस्य वा (ते) तव (आनजे) सर्वैः काम्यते प्रकट्यते विज्ञायते। अत्राञ्जूधातोः कर्मणि लिट्। (तम्) (उत्सवे) हर्षनिमित्ते व्यवहारे (च) दुःखनिमित्ते वा (प्रसवे) उत्पत्तौ (च) मरणे वा (सासहिम्) अतिषोढारम् (इन्द्रम्) विद्यैश्वर्यप्रापकम् (देवासः) विद्वांसः (शवसा) बलेन (अमदन्) हृष्येयुर्हर्षयेयुर्वा (अनु)॥1॥
अन्वयः—हे सर्वविद्याप्रद शालाद्यधिपते! यद्या ते तवास्य धिषणा सर्वैरानजे तस्य ते तव यामिमां महो महीं धियमहं स्तोत्रे प्रभरे। उत्सवेऽनुत्सवे च प्रसवे मरणे च यं त्वां सासहिमिन्द्रं देवासः शवसाऽन्वमदन् तं त्वामहमप्यन्वमदेयम्॥1॥
भावार्थः—सर्वैर्मनुष्यैः सर्वेषां धार्मिकाणां विदुषां विद्यां प्रज्ञाः कर्माणि च धृत्वा स्तुत्या च व्यवहाराः सेवनीयाः। येभ्यो विद्यासुखे प्राप्येते ते सर्वान् सुखदुःखव्यवहारयोर्मध्ये सत्कृत्यैव सर्वदानन्दयेयुरिति॥1॥
पदार्थः—हे सर्व विद्या देनेवाले शाला आदि के अधिपति! (यत्) जो (ते) (अस्य) इन आपकी (धिषणा) विद्या और उत्तम शिक्षा की हुई वाणी (आनजे) सब लोगों ने चाही प्रकट की और समझी है, जिन (ते) आपके (इमाम्) इस (महः) बड़ी (महीम्) सत्कार करने योग्य (धियम्) बुद्धि को (स्तोत्रे) प्रशंसनीय व्यवहार में (प्रभरे) अतीव धरे अर्थात् स्वीकार करे वा (उत्सवे) उत्सव (च) और साधारण काम में वा (प्रसवे) पुत्र आदि के उत्पन्न होने और (च) गमी होने में जिन (सासहिम्) अति क्षमापन करने (इन्द्रम्) विद्या और ऐश्वर्य्य की प्राप्ति करानेवाले आपको (देवासः) विद्वान् जन (शवसा) बल से (अनु, अमदन्) आनन्द दिलाते वा आनन्दित होते हैं (तम्) उन आपको मैं भी अनुमोदित करूं॥1॥
भावार्थः—सब मनुष्यों को चाहिये कि सब धार्मिक विद्वानों की विद्या, बुद्धियों और कामों को धारण और उनकी स्तुति कर उत्तम-उत्तम व्यवहारों का सेवन करें, जिनसे विद्या और सुख मिलते हैं, वे विद्वान् जन सबको सुख और दुःख के व्यवहारों में सत्कारयुक्त करके ही सदा आनन्दित करावें॥1॥
अथेश्वराध्यापककर्मणा किं जायत इत्युपदिश्यते॥
अब ईश्वर और अध्यापक के काम से क्या होता है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
अ॒स्य श्रवो॑ न॒द्यः स॒प्त बि॑भ्रति॒ द्यावा॒क्षामा॑ पृथि॒वी द॑र्श॒तं वपुः॑। अ॒स्मे सू॑र्याचन्द्र॒मसाभि॒चक्षे॑ श्र॒द्धे कमि॑न्द्र चरतो वितर्तु॒रम्॥2॥
अ॒स्य। श्रवः॑। न॒द्यः॑। स॒प्त। बि॒भ्र॒ति॒। द्यावा॒क्षामा॑। पृ॒थि॒वी। द॒र्श॒तम्। वपुः॑। अ॒स्मे इति॑। सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसा॑। अ॒भि॒ऽचक्षे॑। श्र॒द्धे। कम्। इ॒न्द्र॒। च॒र॒तः॒। वि॒ऽत॒तुर्॒रम्॥2॥
पदार्थः—(अस्य) अखिलविद्यस्य जगदीश्वरस्य सर्वविद्याध्यापकस्य वा (श्रवः) सामर्थ्यमन्नं वा (नद्यः) सरितः (सप्त) सप्तविद्याः स्वादोदकाः (बिभ्रति) धरन्ति पोषयन्ति वा (द्यावाक्षामा) प्रकाशभूमी। अत्र दिवो द्यावा। (अष्टा॰6.3.29) अनेन दिव् शब्दस्य द्यावादेशः। (पृथिवी) अन्तरिक्षम् (दर्शतम्) द्रष्टव्यम् (वपुः) शरीरम् (अस्मे) अस्माकम् (सूर्याचन्द्रमसा) सूर्यचन्द्रादिलोकसमूहौ (अभिचक्षे) आभिमुख्येन दर्शनाय (श्रद्धे) श्रद्धारणाय (कम्) सुखकारकम् (इन्द्र) विद्यैश्वर्यप्रद (चरतः) प्राप्नुतः। (वितर्तुरम्) अतिशयेन विविधप्लवे तरणार्थम्। अत्र यङलुङन्तात्तृधातोरच् प्रत्ययो बहुलं छन्दसीत्युत्वम्॥2॥
अन्वयः—हे इन्द्रास्य तव श्रवः सप्त नद्यो दर्शतं वितर्त्तुरं कं वपुर्बिभ्रति द्यावाक्षामा पृथिवी सूर्य्याचन्द्रमसा च बिभ्रत्येते सर्व अस्मे अभिचक्षे श्रद्धे चरन्ति चरतः चरन्ति चरतो वा॥2॥
भावार्थः—अत्र श्लेषालङ्कारः। परमेश्वरस्य सर्जनेन पृथिव्यादयो लोकास्तत्रस्थाः पदार्थाश्च स्वं स्वं रूपं धृत्वा सर्वेषां प्राणिनां दर्शनाय श्रद्धायै च भूत्वा सुखं सम्पाद्य गमनागमनादिव्यवहारहेतवो भवन्ति। नहि कथंचिद् विद्यया विनैतेभ्यः सुखानि संजायन्ते तस्मादीश्वरस्योपासनेन विदुषां सङ्गेन च लोकविद्याः प्राप्य सर्वैः सदा सुखयितव्यम्॥2॥
पदार्थः—हे (इन्द्र) विद्या और ऐश्वर्य के देनेवाले! (अस्य) निःशेष विद्यायुक्त जगदीश्वर का वा समस्त विद्या पढ़ानेहारे आप लोगों का (श्रवः) सामर्थ्य वा अन्न और (सप्त) सात प्रकार की स्वादयुक्त जलवाली (नद्यः) नदी (दर्शतम्) देखने और (वितर्त्तुरम्) अनेक प्रकार के नौका आदि पदार्थों से तरने योग्य महानद में तरने के अर्थ (कम्) सुख करनेहारे (वपुः) रूप को (बिभ्रति) धारण करतीं वा पोषण करातीं तथा (द्यावाक्षामा) प्रकाश और भूमि मिल कर वा (पृथिवी) अन्तरिक्ष (सूर्याचन्द्रमसा) सूर्य और चन्द्रमा आदि लोक धरते पुष्ट कराते हैं, ये सब (अस्मे) हम लोगों के (अभिचक्षे) सुख के सम्मुख देखने (श्रद्धे) और श्रद्धा कराने के लिये प्रकाश और भूमि वा सूर्य-चन्द्रमा दो-दो (चरतः) प्राप्त होते तथा अन्तरिक्ष प्राप्त होता और भी उक्त पदार्थ प्राप्त होते हैं॥2॥
भावार्थः—इस मन्त्र में श्लेषालङ्कार है। परमेश्वर की रचना से पृथिवी आदि लोक और उनमें रहनेवाले पदार्थ अपने-अपने रूप को धारण करके सब प्राणियों के देखने और श्रद्धा के लिये हो और सुख को उत्पन्न कर चालचलन के निमित्त होते हैं, परन्तु किसी प्रकार विद्या के विना इन सांसारिक पदार्थों से सुख नहीं होता। इससे सबको चाहिये कि ईश्वर की उपासना और विद्वानों के संग से लोकसम्बन्धी विद्या को पाकर सदा सुखी होवें॥2॥
पुनः सेनाधिपतिः किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥
फिर सेना का अधिपति क्या करे, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
तं स्मा॒ रथं॑ मघव॒न्प्राव॑ सा॒तये॑ जैत्रं॒ यं ते॑ अनु॒मदा॑म संग॒मे। आ॒जा न॑ इन्द्र॒ मन॑सा पुरुष्टुत त्वा॒यद्भ्यो॑ मघव॒ञ्छर्म॑ यच्छ नः॥3॥
तम्। स्म॒। रथ॑म्। म॒घ॒ऽव॒न्। प्र। अ॒व॒। सा॒तये॑। जैत्र॑म्। यम्। ते। अ॒नु॒ऽमदा॑म। स॒म्ऽग॒मे। आ॒जा। नः॒। इ॒न्द्र॒। मन॑सा। पु॒रु॒ऽस्तु॒त॒। त्वा॒यत्ऽभ्यः॑। म॒घ॒ऽव॒न्। शर्म॑। य॒च्छ॒। नः॒॥3॥
पदार्थः—(तम्) (स्म) आश्चर्यगुणप्रकाशे। निपातस्य चेति दीर्घः। (रथम्) विमानादियानसमूहम् (मघवन्) प्रशस्तपूज्यधनयुक्त (प्र, अव) प्रापय (सातये) बहुधनप्राप्तये (जैत्रम्) जयन्ति येन तम्। अत्र जि धातोः सर्वधातुभ्यः ष्ट्रन्निति ष्ट्रन् प्रत्ययो बाहुलकाद् वृद्धिश्च। (यम्) (ते) तव (अनुमदाम) अनुहृष्येम। अत्र विकरणव्यत्ययेन शप्। (संगमे) संग्रामे। संगम इति संग्रामनामसु पठितम्। (निघं॰2.17) (आजा) अजन्ति सङ्गच्छन्ते वीराः शत्रुभिर्यस्मिन् (नः) अस्माकम् (इन्द्र) परमैश्वर्यप्रद (मनसा) विज्ञानेन (पुरुष्टुत) बहुभिः शूरैः प्रशंसित (त्वायद्भ्यः) आत्मनस्त्वामिच्छद्भ्यः (मघवन्) प्रशंसितधन (शर्म) सुखम् (यच्छ) देहि (नः) अस्मभ्यम्॥3॥
अन्वयः—हे मघवन्निन्द्र सेनाधिपते! त्वं नोऽस्माकं सातये तं जैत्रं स्म रथं योजयित्वाऽऽजा सङ्गमे प्राव तं कमित्यपेक्षायामाह यं ते तव रथं वयमनुमदाम। हे पुरुष्टुत मघवन्! त्वं मनसा त्वायद्भ्यो नोऽस्मभ्यं शर्म यच्छ॥3॥
भावार्थः—यदा शूरवीरैर्भृत्यैः सेनाधिपतिना च संग्रामं कर्त्तुं गम्यते तदाऽन्योऽन्यमनुमोद्य संरक्ष्य शत्रुभिः संयोध्य तेषां पराजयं कृत्वा स्वकीयान् हर्षयित्वा शत्रूनपि संतोष्य सदा वर्त्तितव्यम्॥3॥
पदार्थः—हे (मघवन्) प्रशंसित और मान करने योग्य धनयुक्त (इन्द्र) परमैश्वर्य्य के देनेवाले सेना के अधिपति! आप (नः) हम लोगों के (सातये) बहुत से धन की प्राप्ति होने के लिये (जैत्रम्) जिससे संग्रामों में जीतें (तम्) उस (स्म) अद्भुत-अद्भुत गुणों को प्रकाशित करनेवाले (रथम्) विमान आदि रथसमूह को जुता के (आजा) जहाँ शत्रुओं से वीर जा-जा मिलें उस (संगमे) संग्राम में (प्र, अव) पहुंचाओ अर्थात् अपने रथ को वहाँ ले जाओ, कौन रथ को? कि (यम्) जिस (ते) आपके रथ को हम लोग (अनु, मदाम) पीछे से सराहें। हे (पुरुष्टुत) बहुत शूरवीर जनों से प्रशंसा को प्राप्त (मघवन्) प्रशंसित धनयुक्त! आप (मनसा) विशेष ज्ञान से (त्वायद्भ्यः) अपने को आप की चाहना करते हुए (नः) हम लोगों के लिये अद्भुत (शर्म) सुख को (यच्छ) देओ॥3॥
भावार्थः—जब शूरवीर सेवकों के साथ सेनापति को संग्राम करने को जाना होता है, तब परस्पर अर्थात् एक-दूसरे का उत्साह बढ़ा के अच्छे प्रकार रक्षा, शत्रुओं के साथ अच्छा युद्ध, उनकी हार और अपने जनों को आनन्द देकर शत्रुओं को भी किसी प्रकार सन्तोष देकर सदा अपना वर्त्ताव रखना चाहिये॥3॥
पुनस्तेन सह किं कर्तव्यमित्युपदिश्यते॥ फिर उसके साथ क्या करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
व॒यं ज॑येम॒ त्वया॑ यु॒जा वृत॑म॒स्माक॒मंश॒मुद॑वा॒ भरे॑भरे। अ॒स्मभ्य॑मिन्द्र॒ वरि॑वः सु॒गं कृ॑धि॒ प्र शत्रू॑णां मघव॒न् वृष्ण्या॑ रुज॥4॥
व॒यम्। ज॒ये॒म॒। त्वया॑। यु॒जा। वृत॑म्। अ॒स्माक॑म्। अंश॑म्। उत्। अ॒व॒। भरे॑ऽभरे। अ॒स्मभ्य॑म्। इ॒न्द्र॒। वरि॑वः। सु॒ऽगम्। कृ॒धि॒। प्र। शत्रू॑णा॒म्। म॒घ॒ऽव॒न्। वृष्ण्या॑। रु॒ज॒॥4॥
पदार्थः—(वयम्) योद्धारः (जयेम) शत्रून् विजयेमहि (त्वया) सेनाधिपतिना सह वर्त्तमानाः (युजा) युक्तेन (वृतम्) स्वीकर्तव्यम् (अस्माकम्) (अंशम्) सेवाविभागम्। भोजनाच्छादनधनयानशस्त्रकोशविभागं वा (उत्) उत्कृष्टे (अव) रक्षादिकं कुर्याः। अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (भरे-भरे) संग्रामे संग्रामे (अस्मभ्यम्) (इन्द्र) शत्रुदलविदारक (वरिवः) सेवनम् (सुगम्) सुष्ठु गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति यस्मिँस्तत्। (कृधि) कुरु (प्र) (शत्रूणाम्) वैरिणां सेनाः (मघवन्) प्रशस्तबल (वृष्ण्या) वृष्णां वर्षकाणां शस्त्रवृष्टये हितया सेनया (रुज) भङ्ग्धि॥4॥
अन्वयः—हे इन्द्र! त्वं भरे भरेऽस्माकं वृतमंशमवास्मभ्यं वरिवः सुगं कृधि। हे मघवंस्त्वं वृष्ण्या स्वसेनया शत्रूणां सेनाः प्ररुज। एवंभूतेन त्वया युजा सह वर्त्तमाना वयं शत्रून्नुज्जयेम॥4॥
भावार्थः—राजपुरुषा यदा यदा युद्धाऽनुष्ठानाय प्रवर्त्तेरन् तदा तदा धनशस्त्रकोशयानसेनासामग्रीः पूर्णाः कृत्वा प्रशस्तेन सेनापतिना रक्षिता भूत्वा प्रशस्तविचारेण युक्त्या च शत्रुभिः सह युद्ध्वा शत्रुपृतनाः सदा विजयेरन्। नैवं पुरुषार्थेन विना कस्यचित् खलु विजयो भवितुमर्हति तस्मादेतत्सदाऽनुतिष्ठेयुः॥4॥
पदार्थः—हे (इन्द्र) शत्रुओं के दल को विदीर्ण करनेवाले सेना आदि के अधीश! तुम (भरेभरे) प्रत्येक संग्राम में (अस्माकम्) हम लोगों के (वृतम्) स्वीकार करने योग्य (अंशम्) सेवाविभाग को (अव) रक्खो, चाहो, जानो, प्राप्त होओ, अपने में रमाओ, मांगो, प्रकाशित करो, उससे आनन्दित होने आदि क्रियाओं से स्वीकार करो वा भोजन, वस्त्र, धन, यान, कोश को बांट लेओ तथा (अस्मभ्यम्) हम लोगों के लिये (वरिवः) अपना सेवन (सुगम्) (कृधि) करो। हे (मघवन्) प्रशंसित बलवाले! तुम (वृष्ण्या) शस्त्र वर्षानेवालों की शस्त्रवृष्टि के लिये हितरूप अपनी सेना से (शत्रूणाम्) शत्रुओं की सेनाओं को (प्र, रुज) अच्छी प्रकार काटो और ऐसे साथी (त्वया, युजा) जो आप उनके साथ (वयम्) युद्ध करनेवाले हम लोग शत्रुओं के बलों को (उत् जयेम) उत्तम प्रकार से जीतें॥4॥
भावार्थः—राजपुरुष जब-जब युद्ध करने को प्रवृत्त होवें तब-तब धन, शस्त्र, यान, कोश, सेना आदि सामग्री को पूरी कर और प्रशंसित सेना के अधीश से रक्षा को प्राप्त होकर, प्रशंसित विचार और युक्ति से शत्रुओं के साथ युद्ध कर, उनकी सेनाओं को सदा जीतें। ऐसे पुरुषार्थ के विना किये किसी को जीत होने योग्य नहीं, इससे इस वर्त्ताव को सदा वर्त्तें॥4॥
पुनस्तैः परस्परं तत्र कथं वर्त्तितव्यमित्युपदिश्यते॥
फिर उनको परस्पर युद्ध में कैसे वर्त्तना चाहिये, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
नाना॒ हि त्वा॒ हव॑माना॒ जना॑ इ॒मे धना॑नां धर्त॒रव॑सा विप॒न्यवः॑। अ॒स्माकं॑ स्मा रथ॒मा ति॑ष्ठ सा॒तये॒ जैत्रं॒ ही॑न्द्र॒ निभृ॑तं॒ मन॒स्तव॑॥5॥14॥
नाना॑। हि। त्वा॒। हव॑मानाः। जनाः॑। इ॒मे। धना॑नाम्। ध॒र्त्तः॒। अव॑सा। वि॒प॒न्यवः॑। अ॒स्माक॑म्। स्म॒। रथ॑म्। आ। ति॒ष्ठ॒। सा॒तये॑। जैत्र॑म्। हि। इ॒न्द्र॒। निऽभृ॑तम्। मनः॑। तव॑॥5॥
पदार्थः—(नाना) अनेकप्रकाराः (हि) खलु (त्वा) त्वाम् (हवमानाः) स्पर्द्धमानाः (जनाः) शौर्य्यधनुर्वेदकुशला अतिरथा मनुष्याः (इमे) प्रत्यक्षतया सुपरीक्षिताः (धनानाम्) राज्यविभूतीनाम् (धर्त्तः) धारक (अवसा) रक्षणादिना सह वर्त्तमानाः (विपन्यवः) विविधव्यवहारकुशला मेधाविनः (अस्माकम्) (स्म) हर्षे। पूर्ववदत्र दीर्घः। (रथम्) विजयहेतुं विमानादियानम् (आ) (तिष्ठ) (सातये) संविभागाय (जैत्रम्) दृढं वैयाघ्रं विजयनिमित्तम् (हि) प्रसिद्धम् (इन्द्र) यथावद्वीराणां रक्षक (निभृतम्) नितरां धृतम् (मनः) मननशीलान्तःकरणवृत्तिः (तव)॥5॥
अन्वयः—हे इन्द्र! त्वं धनानां सातये स्म यत्र तव मनो निभृतं तमस्माकं जैत्रं रथं ह्यातिष्ठ। हे धर्त्तस्तवाज्ञायां स्थिता अवसा सह वर्त्तमाना नाना हवमाना विपन्यवो जना इमे वयं त्वानुकूलं हि वर्तेमहि॥5॥
भावार्थः—यदा मनुष्या युद्धादिव्यवहारे प्रवर्तेरंस्तदा विरोधेर्ष्याभयालस्यं विहाय परस्पररक्षायां तत्परा भूत्वा शत्रून् विजित्य विजितधनानां विभागान् कृत्वा सेनापत्यादयो यथायोग्यं योद्धृभ्यः सत्कारायैतानि दद्युर्यतोऽग्रेऽप्युत्साहो वर्धेत। सर्वथाऽऽदानमप्रियकरं दानञ्च प्रियकारकमिति बुद्ध्वैतत्सदाऽनुतिष्ठेयुः॥5॥
पदार्थः—हे (इन्द्र) यथायोग्य वीरों के रखनेवाले! तुम (धनानाम्) राज्य की विभूतियों के (सातये) अलग-अलग बांटने के लिये (स्म) आनन्द ही के साथ जिसमें (तव) तुम्हारी (मनः) विचार करनेवाली चित्त की वृत्ति (निभृतम्) निरन्तर धरी हो, उस (अस्माकम्) हमारे (जैत्रम्) जो बड़ा दृढ़ जिससे शत्रु जीते जायें, (रथम्) ऐसे विजय करानेवाले विमानादि यान (हि) ही को (आ तिष्ठ) अच्छे प्रकार स्वीकार कर स्थित हो। हे (धर्त्तः) धारण करनेवाले! तुम्हारी आज्ञा में अपना वर्त्ताव रखते हुए (अवसा) रक्षा आदि आपके गुणों के साथ वर्त्तमान (नाना) अनेक प्रकार (हवमानाः) चाहे हुए (विपन्यवः) विविध व्यवहारों में चतुर बुद्धिमान् (जनाः) जन (इमे) ये प्रत्यक्षता से परीक्षा किये हम लोग (त्वाम्) तुम्हारे अनुकूल (हि) ही वर्त्ताव रक्खें॥5॥
भावार्थः—जब मनुष्य युद्ध आदि व्यवहारों में प्रवृत्त होवें तब विरोध, ईर्ष्या, डर और आलस्य को छोड़ एक-दूसरे की रक्षा में तत्पर हो शत्रुओं को जीत और जीते हुए धनों को बांट कर सेनापति आदि लड़नेवालों की योग्यता के अनुकूल उनके सत्कार के लिये देवें कि जिससे लड़ने का उत्साह आगे को बढ़े। सब प्रकार से ले लेना प्रीति करनेवाला नहीं और देना प्रसन्नता करनेवाला होता है, यह विचार कर सदा उक्त व्यवहार को वर्त्तें॥5॥
पुनः स सेनापतिः कीदृश इत्युपदिश्यते॥
फिर वह सेनापति कैसा हो, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
गो॒जिता॑ बा॒हू अमि॑तक्रतुः सि॒मः कर्म॑न्कर्मञ्छ॒तमू॑तिः खजंक॒रः। अ॒क॒ल्प इन्द्रः॑ प्रति॒मान॒मोज॒साथा॒ जना॒ वि ह्व॑यन्ते सिषा॒सवः॑॥6॥
गो॒ऽजिता॑। बा॒हू इति॑। अमि॑तऽक्रतुः। सि॒मः। कर्म॑न्ऽकर्मन्। श॒तम्ऽऊ॑तिः। ख॒ज॒म्ऽक॒रः। अ॒क॒ल्पः। इन्द्रः॑। प्र॒ति॒ऽमान॑म्। ओज॑सा। अथ॑। जनाः॑। वि। ह्व॒य॒न्ते॒। सि॒सा॒सवः॑॥6॥ पदार्थः—(गोजिता) गाः पृथिवीर्जयति याभ्यां तौ। अत्र कृतो बहुलमिति करणे क्विप्। सुपां सुलुगिति विभक्तेराकारादेशश्च। (बाहू) अतिबलपराक्रमयुक्तौ भुजौ (अमितक्रतुः) अमिताः क्रतवः प्रजा यस्यः सः (सिमः) व्यवस्थया शत्रूणां बन्धकः (कर्म्मन्कर्म्मन्) कर्मणि कर्मणि (शतमूतिः) शतमसंख्याता ऊतयो रक्षणादिका क्रिया यस्य सः। अत्र वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति सुपो लुगभावः। (खजङ्करः) यः संग्रामं करोति सः। अत्र खज मन्थने इति धातोः कर्मण्यण् (अष्टा॰3.2.1) इत्यण्। वाच्छन्दसि सर्वे विधयो भवन्तीति वृद्ध्यभावः। सुपो लुगभावश्च। (अकल्पः) कल्पैरन्यैः समर्थैरसदृशोऽन्येभ्योऽधिक इति (इन्द्रः) अनेकैश्वर्य्यः (प्रतिमानम्) अतिसमर्थानामुपमा (ओजसा) बलेन (अथ) आनन्तर्ये। अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (जनाः) विद्वांसः (वि) (ह्वयन्ते) स्पर्द्धन्ते (सिषासवः) सनितुं संभजितुमिच्छवः॥6॥
अन्वयः—हे सभापते! यस्य ते गोजिता बाहू यो भवानिन्द्र ओजसा कर्मन्कर्मनमितक्रतुरकल्पः सिमः खजङ्करः शतमूतिः प्रतिमानं वर्त्ततेऽथ तं त्वां सिषासवो जनाः विह्वयन्ते॥6॥
भावार्थः—मनुष्यैर्यः सर्वथा समर्थः प्रतिकर्मकर्त्तुं वेत्ताऽन्यैरजेयः सर्वेषां जेता सर्वैः स्पृहणीयोऽनुपमो मनुष्यो वर्त्तते, तं सेनाधिपतिं कृत्वा विजयादीनि कार्य्याणि साधनीयानि॥6॥
पदार्थः—हे सभापति! जिन आपकी (गोजिता) पृथिवी की जितानेवाली (बाहू) अत्यन्त बल पराक्रमयुक्त भुजा (अथ) इसके अनन्तर जो आप (इन्द्रः) अनेक ऐश्वर्य्ययुक्त (ओजसा) बल से (कर्मन्कर्मन्) प्रत्येक को काम में (अमितक्रतुः) अतुल बुद्धिवाले (अकल्पः) और बड़े-बड़े समर्थ जनों से अधिक (सिमः) व्यवस्था से शत्रुओं के बांधने और (खजङ्करः) संग्राम करने वाले (शतमूतिः) जिनकी सैकड़ों रक्षा आदि क्रिया हैं। (प्रतिमानम्) जिनको अत्यन्त सामर्थ्यवालों की उपमा दी जाती है, उन आपको (सिषासवः) सेवन करने की इच्छा करनेवाले (जनाः) विद्वान् जन (वि, ह्वयन्ते) चाहते हैं॥6॥
भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जो सर्वथा समर्थ, प्रत्येक काम के करने को जानता, औरों से न जीतने योग्य, आप सबको जीतनेवाला, सबके हित चाहने योग्य और अनुपम मनुष्य हो, उसको सेनाधिपति करके विजय आदि कामों को साधें॥6॥
पुनः स कीदृशः किं करोतीत्युपदिश्यते॥
फिर वह कैसा और क्या करता है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
उत्ते॑ श॒तान्म॑घव॒न्नुच्च॒ भूय॑स॒ उत्स॒हस्रा॑द्रिरिचे कृ॒ष्टिषु॒ श्रवः॑। अ॒मा॒त्रं त्वा॑ धि॒षणा॑ तित्विषे म॒ह्यधा॑ वृ॒त्राणि॑ जिघ्नसे पुरंदर॥7॥
उत्। ते॒। श॒तात्। म॒घ॒ऽव॒न्। उत्। च॒। भूय॑सः। उत्। स॒हस्रा॑त्। रि॒रि॒चे॒। कृ॒ष्टिषु॑। श्रवः॑। अ॒मा॒त्रम्। त्वा॒। धि॒षणा॑। ति॒त्वि॒षे॒। म॒ही। अध॑। वृ॒त्राणि॑। जि॒घ्न॒से॒। पु॒र॒म्ऽद॒र॒॥7॥
पदार्थः—(उत्) उत्कृष्टे (ते) तव (शतात्) असंख्यात् (मघवन्) असंख्यातैश्वर्य्य (उत्) (च) (भूयसः) अधिकात् (उत्) (सहस्रात्) असंख्येयात् (रिरिचे) अतिरिच्यते (कृष्टिषु) मनुष्येषु (श्रवः) कीर्तनं श्रवणं धनं वा (अमात्रम्) अपरिमितम् (त्वा) त्वाम् (धिषणा) विद्यासुशिक्षिता वाक् प्रज्ञा वा (तित्विषे) त्वेषति प्रदीप्यते (मही) महागुणविशिष्टा (अध) आनन्तर्ये। निपातस्य चेति दीर्घः। (वृत्राणि) यथा मेघावयवान् सूर्य्यस्तथा शत्रून् (जिघ्नसे) हन्याः। अत्र हनधातोर्लेटि शपः स्थाने श्लुः। व्यत्येनात्मनेपदं च। (पुरन्दर) यः शत्रूणां पुरो दृणाति तत्सम्बुद्धौ॥7॥
अन्वयः—हे मघवन्निन्द्र! ते कृष्टिषु श्रवः शतादुद्रिरिचे सहस्रादुद्रिरिचे भूयसश्चोद्रिरिचेऽधाऽमात्रं त्वा मही धिषणा तित्विषे। हे पुरन्दर! वृत्राणि सूर्य्य इव त्वं शत्रून् जिघ्नसे॥7॥
भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्यथा सूर्योऽन्धकारमेघादिकं हत्वाऽपरिमितं स्वकीयं तेजः प्रकाश्य सर्वेषु तेजस्विष्वधिको वर्त्तते, तथाभूतं विद्वांसं सभापतिं मत्वा शत्रवः पराजेयाः॥7॥
पदार्थः—हे (मघवन्) असंख्यात ऐश्वर्य्य से युक्त सेनापति! (ते) आपका (कृष्टिषु) मनुष्यों में (श्रवः) कीर्त्तन, श्रवण वा धन (शतात्) सैकड़ों से (उत्) ऊपर (रिरिचे) निकल गया (सहस्रात्) हजारों से (उत) ऊपर (च) और (भूयसः) अधिक से भी (उत्) ऊपर अर्थात् अधिक निकल गया। (अध) इसके अनन्तर (अमात्रम्) परिमाणरहित (त्वा) आपकी (मही) महागुणयुक्त (धिषणा) विद्या और अच्छी शिक्षा को पाये हुई वाणी वा बुद्धि (तित्विषे) प्रकाशित करती है। हे (पुरन्दर) शत्रुओं के पुरों के विदारनेवाले! (वृत्राणि) जैसे मेघ के अङ्ग अर्थात् बद्दलों को सूर्य्य हनन करता है, वैसे आप शत्रुओं को (जिघ्नसे) मारते हो॥7॥
भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जैसे सूर्य्य अन्धकार और मेघ आदि का हनन करके अपरिमित अर्थात् जिसका परिमाण न हो सके उस अपने तेज को प्रकाशित करके, सब तेजवाले पदार्थों में बढ़ के वर्त्तमान है, वैसे विद्वान् को सभा का अधीश मान के शत्रुओं को जीतें॥7॥
अथेश्वरः सभापतिश्च कीदृश इत्युपदिश्यते॥
अब ईश्वर और सभापति कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
त्रि॒वि॒ष्टि॒धातु॑ प्रति॒मान॒मोज॑सस्ति॒स्रो भूमी॑र्नृपते॒ त्रीणि॑ रोच॒ना। अती॒दं विश्वं॒ भुव॑नं ववक्षिथाश॒त्रुरि॑न्द्र ज॒नुषा॑ स॒नाद॑सि॥8॥
त्रि॒वि॒ष्टि॒ऽधातु॑। प्र॒ति॒ऽमान॑म्। ओज॑सः। ति॒स्रः। भूमीः॑। नृ॒ऽप॒ते॒। त्रीणि॑। रो॒च॒ना। अति॑। इ॒दम्। विश्व॑म्। भुव॑नम्। व॒व॒क्षि॒थ॒। अ॒श॒त्रुः। इ॒न्द्र॒। ज॒नुषा॑। स॒नात्। अ॒सि॒॥8॥
पदार्थः—(त्रिविष्टिधातु) त्रिधोत्तममध्यमनिकृष्टा विष्टयो व्याप्तयो धातूनां पृथिव्यादीनां यस्मिँस्तत् (प्रतिमानम्) प्रतिमीयते यत् (ओजसः) बलात् (तिस्रः) त्रिविधाः (भूमीः) अधऊर्ध्वमध्यस्था उत्तमाधममध्यमाः क्षितीः (नृपते) नृणां स्वामिन्नीश्वर नृप वा (त्रीणि) त्रिविधानि (रोचना) रोचनानि विद्याशब्दसूर्य्यादीनि न्यायबलराज्यपालनादीनि च (अति) (इदम्) प्रत्यक्षम् (विश्वम्) समग्रम् (भुवनम्) भवन्ति भूतानि यस्मिञ्जगति तत् (ववक्षिथ) वोढुमिच्छसि। अत्र लडर्थे लिट्। सन्नन्तस्य वहधातोरयं प्रयोगः। बहुलं छन्दसीत्यनेनाभ्यासस्येत्वाभावः। (अशत्रुः) न सन्ति शत्रवो यस्य सः (इन्द्र) बह्वैश्वर्य्ययुक्त (जनुषा) प्रादुर्भूतेन कर्मणा (सनात्) सनातनात् कारणात् (असि) भवसि॥8॥
अन्वयः—हे नृपत इन्द्र! बह्वैश्वर्यवतोऽशत्रुस्त्वं त्रिविष्टिधातु प्रतिमानं सनादोजसो जनुषा तिस्रो भूमिस्त्रीणि रोचना निर्वहन्नसि त्रिविष्टिधातु प्रतिमानमिदं विश्वं भुवनमतिववक्षिथ तस्मात्सत्कर्त्तव्योऽसि॥8॥
भावार्थः—अत्र वाचकलुप्तोपमालङ्कारः। मनुष्यैर्येनाप्रतिमेश्वरेण कारणात्सर्वं कार्यं जगन्निर्माय संरक्ष्य संह्रियते स एवेष्टो माननीयस्तथा योऽतुलसामर्थ्यो सभाधिपतिः प्रसिद्धैर्न्यायादिगुणैः सर्वं राज्यं संतोषयति, स च सत्कर्त्तव्यः॥8॥
पदार्थः—हे (नृपते) मनुष्यों के स्वामी ईश्वर वा राजन्! (इन्द्र) बहुत ऐश्वर्य से युक्त (अशत्रुः) शत्रुरहित आप (त्रिविष्टिधातु) जिसमें तीन प्रकार की पृथिवी, जल, तेज, पवन, आकाश की व्याप्ति अर्थात् परिपूर्णता है, उस संसार की (प्रतिमानम्) परिमाण वा उपमान जैसे हो वैसे (सनात्) सनातन कारण वा (ओजसः) बल वा (जनुषा) उत्पन्न किये हुए काम से (तिस्रः) तीन प्रकार (भूमीः) अर्थात् नीचली, ऊपरली, और बीचली उत्तम, अधम और मध्यम भूमि तथा (त्रीणि) तीन प्रकार के (रोचना) प्रकाशयुक्त विद्या, शब्द और सूर्य्य और न्याय करने, बल और राज्यपालन आदि काम के तुम दोनों यथायोग्य निर्वाह करनेवाले (असि) हो और उक्त पञ्चभूतमय (इदम्) इस (विश्वम्) समस्त (भुवनम्) जिसमें कि प्राणी होते हैं, उस जगत् के (अति, ववक्षिथ) अतीव निर्वाह करने की इच्छा करते हो, इससे ईश्वर उपासना करने योग्य और विद्वान् आप सत्कार करने योग्य हो॥8॥
भावार्थः—इस मन्त्र में वाचकलुप्तोपमालङ्कार है। मनुष्यों को चाहिये कि जिसकी उपमा नहीं है, उस ईश्वर ने कारण से सब कार्य्यरूप जगत् को रच और उसकी रक्षा कर उसका संहार किया है, वही इष्टदेव मानने योग्य है तथा जो अतुल सामर्थ्ययुक्त सभापति प्रसिद्ध न्याय आदि गुणों से समस्त राज्य को सन्तोषित करता है, सो भी सदा सत्कार करने योग्य है॥8॥
अथ सेनाध्यक्षः कीदृश इत्युपदिश्यते॥
अब सेना का अध्यक्ष कैसा है, इस विषय को अगले मन्त्र में कहा है॥
त्वां दे॒वेषु॑ प्रथ॒मं ह॑वामहे॒ त्वं ब॑भूथ॒ पृत॑नासु सास॒हिः। सेमं नः॑ का॒रुमु॑पम॒न्युमु॒द्भिद॒मिन्द्रः॑ कृणोतु प्रस॒वे रथं॑ पु॒रः॥9॥
त्वाम्। दे॒वेषु॑। प्र॒थ॒मम्। ह॒वा॒म॒हे॒। त्वम्। ब॒भू॒थ॒। पृत॑नासु। स॒स॒हिः। सः। इ॒मम्। नः॒। का॒रुम्। उ॒प॒ऽम॒न्युम्। उ॒त्ऽभिद॑म्। इन्द्रः॑। कृ॒णो॒तु॒। प्र॒ऽस॒वे। रथ॑म्। पु॒रः॥9॥
पदार्थः—(त्वाम्) सर्वसेनाधिपतिम् (देवेषु) विद्वत्सु (प्रथमम्) आदिमम् (हवामहे) स्वीकुर्महे (त्वम्) (बभूथ) भवसि। बभूथाततन्थ॰ इतीडभावो निपातनात्। (पृतनासु) स्वेषां शत्रूणां वा सेनासु (सासहिः) अतिशयेन षोढा (सः) सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणमिति सुलोपः। (इमम्) प्रत्यक्षम् (नः) अस्मभ्यम् (कारुम्) शिल्पकार्यकर्त्तारम् (उपमन्युम्) उपसमीपे मन्तुं योग्यम् (उद्भिदम्) पृथिवीं भित्वा जातेन काष्ठेन निर्मितम् (इन्द्रः) अखिलैश्वर्यकारकः (कृणोतु) (प्रसवे) प्रकृष्टतया सुवन्ति प्रेरयन्ति वीरान् यस्मिन् राज्ये तस्मिन् (रथम्) विमानादियानम् (पुरः) पुरःसरम्॥9॥
अन्वयः—हे सेनापते! यतस्त्वं पृतनासु सासहिर्बभूथ तस्माद् देवेषु प्रथमं त्वां वयं हवामहे। स इन्द्रो भवान् प्रसव उद्भिदं रथं पुरः करोति स नोऽस्मभ्यमिममुपमन्युं कारुं कृणोतु॥9॥
भावार्थः—मनुष्यैर्य उत्तमो विद्वान् स्वसेनापालने शत्रुबलविदारणे चतुरः शिल्पवित् प्रियो युद्धे पुरःसरणादतियोद्धा वर्तते, स एव सेनापतिः कर्त्तव्यः॥9॥ पदार्थः—हे सेनापते! जिस कारण (त्वम्) आप (पृतनासु) अपनी वा शत्रुओं की सेनाओं में (सासहिः) अतीव सहनशील (बभूथ) होते हैं, इससे (देवेषु) विद्वानों में (प्रथमम्) पहिले (त्वाम्) समग्र सेना के अधिपति तुमको (हवामहे) हम लोग स्वीकार करते हैं, जो (इन्द्रः) समस्त ऐश्वर्य के प्रकट करनेहारे आप (प्रसवे) जिसमें वीरजन चिताये जाते हैं, उस राज्य में (उद्भिदम्) पृथिवी का विदारण करके उत्पन्न होनेवाले काष्ठ विशेष से बनाये हुए (रथम्) विमान आदि रथ को (पुरः) आगे करते हैं (सः) वह आप (नः) हम लोगों के लिये (इमम्) इस (उपमन्युम्) समीप में मानने योग्य (कारुम्) क्रिया कौशल काम के करनेवाले जन को (कृणोतु) प्रसिद्ध करें॥9॥
भावार्थः—मनुष्यों को चाहिये कि जो उत्तम विद्वान्, अपनी सेना को पालन और शत्रुओं के बल को विदारने में चतुर, शिल्पकार्य्यों को जाननेवाला, प्रेमी, युद्ध में आगे होने से अत्यन्त युद्ध करता है, उसी को सेना का अधीश करें॥9॥
पुनः स किं कुर्यादित्युपदिश्यते॥
फिर वह क्या करे, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
त्वं जि॑गेथ॒ न धना॑ रुरोधि॒थार्भे॑ष्वा॒जा म॑घवन्म॒हत्सु॑ च। त्वामु॒ग्रमव॑से॒ सं शि॑शीम॒स्यथा॑ न इन्द्र॒ हव॑नेषु चोदय॥10
॥ त्वम्। जि॒गे॒थ॒। न। धना॑। रु॒रो॒धि॒थ॒। अर्भे॑षु। आ॒जा। म॒घ॒ऽव॒न्। म॒हत्ऽसु॑। च॒। त्वाम्। उ॒ग्रम्। अव॑से। सम्। शि॒शी॒म॒सि॒। अथ॑। नः॒। इ॒न्द्र॒। हव॑नेषु। चो॒द॒य॒॥10॥
पदार्थः—(त्वम्) चतुरङ्गसेनायुक्तः (जिगेथ) जितवानसि (न) निषेधे (धना) धनानि (रुरोधिथ) रुद्धवानसि (अर्भेषु) अल्पेषु (आजा) आजिषु संग्रामेषु (मघवन्) परमपूज्यधनादिसामग्रीयुक्त (महत्सु) (च) मध्यस्थेषु (त्वाम्) (उग्रम्) शत्रुबलविदारणक्षमम् (अवसे) रक्षणाद्याय (सम्) (शिशीमसि) शत्रून् सूक्ष्मान् जीर्णान् कुर्मः। अत्र शो तनूकरण इत्यस्माल्लटि श्यनः स्थाने व्यत्ययेन श्लुः। छन्दस्युभयथेति श्लोरार्द्धधातुकत्वादाकारादेशः। (अथ) अत्र निपातस्य चेति दीर्घः। (नः) अस्माकमस्मान् वा (इन्द्र) शत्रूणां विदारक (हवनेषु) आदानयोग्येषु कर्मसु (चोदय)॥10॥
अन्वयः—हे मघवन्निन्द्र! यस्त्वमर्भेषु महत्सु मध्यस्थेषु चाजा शत्रून् जिगेथ धना न रुरोधिथ तमुग्रं त्वामवसे स्वीकृत्य शत्रून् संशिशीमसि। अथ हवनेषु नोऽस्मान् चोदय॥10॥
भावार्थः—यो मनुष्यः शत्रूणां समयं प्राप्य धनानां च विजेता सत्कर्मसु प्रेरको दुष्टानां छेत्तास्ति, स एव सर्वैः सेनापतिर्मन्तव्यः॥10॥
पदार्थः—हे (मघवन्) परम सराहने योग्य धन आदि सामग्री लिये हुए (इन्द्र) शत्रुओं के विदारनेवाले सेनापति! जो (त्वम्) आप चतुरङ्ग अर्थात् चौतरफी नाकेबन्दी की सेना सहित (अर्भेषु) थोड़े (महत्सु) बड़े (च) और मध्यम (आजा) संग्रामों में शत्रुओं को (जिगेथ) जीते हुए हो और उक्त संग्रामों में (धना) धन आदि पदार्थों को (न) न (रुरोधिथ) रोकते हो, उन (उग्रम्) शत्रुओं के बल को विदीर्ण करने में अत्यन्त बली (त्वाम्) आपको (अवसे) रक्षा आदि के लिये स्वीकार करके हम लोग शत्रुओं को (संशिशीमसि) अच्छे प्रकार निर्मूल नष्ट करते हैं, (अथ) इसके अनन्तर आप भी ऐसा कीजिये की (हवनेषु) ग्रहण करने योग्य कामों में (नः) हम लोगों को (चोदय) प्रवृत्त कराइये॥10॥
भावार्थः—जो मनुष्य शत्रुओं और समय को पाकर धनों को जीतने, श्रेष्ठ कामों में सबको लगाने और दुष्टों को छिन्न-भिन्न करनेवाला हो, वही सबको सेनाओं का अधीश मानना चाहिये॥10॥
पुनः स कीदृश इत्युपदिश्यते॥
फिर वह कैसा है, यह विषय अगले मन्त्र में कहा है॥
वि॒श्वाहेन्द्रो॑ अधिव॒क्ता नो॑ अ॒स्त्वप॑रिह्वृताः सनुयाम॒ वाज॑म्। तन्नो॑ मि॒त्रो वरु॑णो मामहन्ता॒मदि॑तिः॒ सिन्धुः॑ पृथि॒वी उ॒त द्यौः॥11॥15॥
वि॒श्वाहा॑। इन्द्रः॑। अ॒धि॒ऽव॒क्ता। नः॒। अ॒स्तु॒। अप॑रिऽह्वृताः। स॒नु॒या॒म॒। वाज॑म्। तत्। नः॒। मि॒त्रः। वरु॑णः। म॒म॒ह॒न्ता॒म्। अदि॑तिः। सिन्धुः॑। पृ॒थि॒वी। उ॒त। द्यौः॥11॥
पदार्थः—(विश्वाहा) विश्वान् सर्वान् हन्ति सः (इन्द्रः) परमैश्वर्यः सभाध्यक्षः (अधिवक्ता) यथावदनुशासिता (नः) अस्माकम् (अस्तु) भवतु (अपरिह्वृताः) अपरिवर्जिताः (सनुयाम) दद्याम (वाजम्) सुसंस्कृतमन्नम् (तत्) (नः) अस्माकम् (मित्रः) इति पूर्ववत्॥11॥
अन्वयः—अपरिह्वृताः वयं यो विश्वाहेन्द्रो नोऽअस्माकमधिवक्ताऽस्तु तस्मै वाजं सनुयाम येन तन्मित्रो वरुणोऽदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौर्नोऽस्मान् मामहन्ताम्॥11॥
भावार्थः—सर्वेषां भृत्यानामियं रीतिः स्याद् यदा यादृशीमाज्ञां स्वस्वामी कुर्यात्तदैव साऽनुष्ठातव्या, योऽखिलविद्यस्तस्मादेवोपदेशाः श्रोतव्या इति ॥11॥
अत्र शालाद्यध्यक्षेश्वराध्यापकसेनाधिपतीनां गुणवर्णनादेतदर्थस्य पूर्वसूक्तार्थेन सह सङ्गतिरस्तीति बोद्धव्यम्॥ इति द्व्युत्तरशततमं 102 सूक्तं पञ्चदशो 15 वर्गश्च समाप्तः॥
पदार्थः—(अपरिह्वृताः) आज्ञा को पाये हुए हम लोग जो (विश्वाहा) सब शत्रुओं को मारनेवाला (इन्द्रः) परमैश्वर्य्ययुक्त सभाध्यक्ष (नः) हम लोगों को (अधिवक्ता) यथावत् शिक्षा देनेवाला (अस्तु) हो, उसके लिये (वाजम्) अच्छे संस्कार किये हुए अन्न को (सनुयाम) देवें, जिससे (तत्) उसको (नः) हम लोगों के (मित्रः) मित्रजन (वरुणः) उत्तम गुणयुक्त (अदितिः) समस्त विद्वान् अन्तरिक्ष (सिन्धुः) समुद्र (पृथिवी) पृथिवी (उत) और (द्यौः) सूर्य्यलोक (मामहन्ताम्) बढ़ावें॥11॥ भावार्थः—सब सेवकों की यह रीति हो कि जब अपना स्वामी जैसे आज्ञा करे, उसी समय उसको वैसे ही करें और जो समग्र विद्या पढ़ा हो उसी से उपदेश सुनने चाहिए॥11॥
इस सूत्र में शाला आदि के अधिपति ईश्वर, पढ़ानेवाले और सेनापति के गुणों के वर्णन से इस सूक्त के अर्थ की पूर्व सूक्त के अर्थ से एकता है, यह जानना चाहिये॥ यह एक सौ दो वां 102 सूक्त और पन्द्रहवां 15 वर्ग समाप्त हुआ॥

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