महाभारत आदिपर्व के षट्षष्टितम (66वें) अध्याय के श्लोकों का हिन्दी अनुवाद:
श्लोक 1-3: वैशंपायन उवाच। अथ नारायणेनेन्द्रश्चकार सह संविदम्। अवतर्तुं महीं स्वर्गादंशतः महितः सुरैः।। आदिश्य च स्वयं शक्रः सर्वानेव दिवौकसः। निर्जगाम पुनस्तस्मात्क्षयान्नारायणस्य ह।। तेऽमरारिविनाशाय सर्वलोकहिताय च। अवतेरुः क्रमेणैव महीं स्वर्गाद्दिवौकसः।।
हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— इसके पश्चात देवताओं द्वारा पूजित भगवान नारायण ने इन्द्र के साथ यह समझौता किया कि वे सब अपने अंशों के साथ स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतार लें। तदनन्तर स्वयं इन्द्र ने समस्त देवताओं को आदेश दिया और फिर वे नारायण के निवास-स्थान से बाहर आए। वे देवता अमर (असुर) शत्रुओं के नाश के लिए तथा समस्त लोकों के हित के लिए क्रमशः स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतरित हुए।
श्लोक 4-6: ततो ब्रह्मर्षिवंशेषु पार्थिवर्षिकुलेषु च। जज्ञिरे राजशार्दूल यथाकामं दिवौकसः।। दानवान्राक्षसांश्चैव गन्धर्वान्पन्नगांस्तथा। पुरुषादानि चान्यानि जघ्नुः सत्वान्यनेकशः।। दानवा राक्षसाश्चैव गन्धर्वाः पन्नगास्तथा। न तान्बलस्थान्बाल्येऽपि जघ्नुर्भरतसत्तम।।
हिन्दी अनुवाद: हे राजशार्दूल! तदनन्तर देवता ब्रह्मर्षियों के वंशों में और श्रेष्ठ राजर्षियों के कुलों में अपनी इच्छा के अनुसार जन्म लेने लगे। उन्होंने दानवों, राक्षसों, गंधर्पों, नागों और अन्य नरभक्षी जीवों का अनेक प्रकार से वध किया। हे भरतसत्तम! वे दानव, राक्षस, गंधर्व और नाग अत्यंत शक्तिशाली थे, इसलिए बाल्यावस्था में भी कोई उन्हें आसानी से नहीं मार पाता था।
श्लोक 7-8: जनमेजय उवाच। देवदानवसङ्घानां गन्धर्वाप्सरसां तथा। मानवानां च सर्वेषां तथा वै यक्षरक्षसाम्।। श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन संभवं कृत्स्नमादितः। प्राणिनां चैव सर्वेषां संभवं वक्तुमर्हसि।।
हिन्दी अनुवाद: जनमेजय जी बोले— हे ब्रह्मन्! मैं देवता और दानवों के समूहों, गंधर्वों, अप्सराओं, समस्त मनुष्यों तथा यक्ष और राक्षसों की उत्पत्ति के विषय में यथार्थ रूप से आदि से अंत तक सुनना चाहता हूँ। आप समस्त प्राणियों की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन करने की कृपा करें।
श्लोक 9-10: वैशम्पायन उवाच। हन्त ते कथयिष्यामि नमस्कृत्य स्वयंभुवे। सुरादीनामहं सम्यग्लोकानां प्रभवाप्ययम्।। ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः। मरीचिरत्र्यह्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः।।
हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— स्वयंभू ब्रह्मा जी को नमस्कार करके मैं तुम्हें देवताओं सहित समस्त लोकों की उत्पत्ति और प्रलय का पूर्ण वृत्तांत कहता हूँ। ब्रह्मा जी के छह प्रसिद्ध मानस पुत्र महर्षि हैं— मरीचि, अत्रि, अङ्गिरा, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु।
श्लोक 11-13: मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपात्तु इमाः प्रजाः। प्रजज्ञिरे महाभागा दक्षकन्यास्त्रयोदश।। अदितिर्दितिर्दनुः काला दनायुः सिंहिका तथा। क्रोधा प्राधा च विश्वा च विनता कपिला मुनिः।। कद्रूश्च मनुजव्याघ्र दक्षकन्यैव भारत। एतासां वीर्यसंपन्नं पुत्रपौत्रमनन्तकम्।।
हिन्दी अनुवाद: मरीचि के पुत्र कश्यप हुए और कश्यप से महाभागा दक्ष प्रजापति की तेरह कन्याओं ने इन प्रजाओं को उत्पन्न किया। हे मनुजव्याघ्र! वे तेरह कन्याएँ थीं— अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि और कद्रू। इन सबकी शक्तिसंपन्न संतति (पुत्र और पौत्र) अनंत है।
लोक 14-16: अदित्यां द्वादशादित्याः संभूता भुवनेश्वराः। ये राजन्नामतस्तांस्ते कीर्तयिष्यामि भारत।। धाता मित्रोऽर्यमा शक्रो वरुणस्त्वंश एव च। भगो विवस्वान्पूषा च सविता दशमस्तथा।। एकादशस्तथा त्वष्टा द्वादशो विष्णुरुच्यते। जघन्यजस्तु सर्वेषामादित्यानां गुणाधिकः।।
हिन्दी अनुवाद: हे भारत! अदिति के गर्भ से बारह भुवनेश्वर आदित्य (सूर्य) उत्पन्न हुए, जिनके नाम हे राजन्! मैं तुम्हें बताता हूँ— धाता, मित्र, अर्यमा, शक्र (इन्द्र), वरुण, अंश, भग, विवस्वान्, पूषा, दसवें सविता, ग्यारहवें त्वष्टा और बारहवें विष्णु कहे जाते हैं। इन सभी आदित्यों में सबसे छोटे (बाद में उत्पन्न हुए) विष्णु जी गुणों में सबसे श्रेष्ठ हैं।
श्लोक 17-20: एक एव दितेः पुत्रो हिरण्यकशिपुः स्मृतः। नाम्ना ख्यातास्तु तस्येमे पञ्च पुत्रा महात्मनः।। प्रह्लादः पूर्वजस्तेषां संह्लादस्तदनन्तरम्। अनुह्लादस्तृतीयोऽभूत्तस्माच्च शिबिबाष्कलौ।। प्रह्लादस्य त्रयः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत। विरोचनश्च कुम्भश्च निकुम्भश्चेति भारत।। विरोचनस्य पुत्रोऽभूद्बलिरेकः प्रतापवान्। बलेश्च प्रथितः पुत्रो बाणो नाम महासुरः।।
हिन्दी अनुवाद: दिति का एकमात्र पुत्र हिरण्यकशिपु था, और उसके पाँच महात्मा पुत्र नाम से विख्यात हुए— प्रह्लाद (उनमें सबसे बड़े), उनके बाद संह्लाद, तीसरे अनुह्लाद, तथा उनके पश्चात शिबि और बाष्कल। हे भारत! प्रह्लाद के तीनों पुत्र सर्वत्र विख्यात हुए— विरोचन, कुम्भ और निकुम्भ। विरोचन के पुत्र एकमात्र प्रतापवान बलि हुए, और बलि के प्रसिद्ध पुत्र बाण नाम के महासुर हुए।
श्लोक 21-26: रुद्रस्यानुचरः श्रीमान्महाकालेति यं विदुः। चत्वारिंशद्दनोः पुत्राः ख्याताः सर्वत्र भारत।। तेषां प्रथमजो राजा विप्रचित्तिर्महायशाः। शम्बरो नमुचिश्चैव पुलोमा चेति विश्रुतः।। असिलोमा च केशी च दुर्जयश्चैव दानवः। अयःशिरा अश्वशिरा अश्वशह्कुश्च वीर्यवान्।। तथा गगनमूर्धा च वेगवान्केतुमांश्च सः। स्वर्भानुरश्वोऽश्वपतिर्वृषपर्वाऽजकस्तथा।। अश्वग्रीवश्च सूक्ष्मश्च तुहुण्डश्च महाबलः। इषुपादेकचक्रश्च विरूपाक्षहराहरौ।। निचन्द्रश्च निकुम्भश्च कुपटः कपटस्तथा। शरभः शलभश्चैव सूर्याचन्द्रमसौ तथा। एते ख्याता दनोर्वंशे दानवाः परिकीर्तिताः।।
हिन्दी अनुवाद: जो भगवान रुद्र के अनुचर और श्रीमान महाकाल के नाम से जाने जाते हैं। हे भारत! दनु के चालीस पुत्र सर्वत्र प्रसिद्ध हैं। उनमें सबसे बड़े महायशस्वी राजा विप्रचित्ति थे; तथा शम्बर, नमुचि, पुलोमा, असिलोमा, केशी, दुर्जय दानव, अयःशिरा, अश्वशिरा, वीर अश्वशङ्कु, गगनमूर्धा, वेगवान्, केतुमान्, स्वर्भानु, अश्व, अश्वपति, वृषपर्वा, अजक, अश्वग्रीव, सूक्ष्म, महाबली तुहुण्ड, इषुपाद, एकचक्र, विरूपाक्ष, हराहर, निचन्द्र, निकुम्भ, कुपट, कपट, शरभ, शलभ तथा सूर्य और चंद्रमा— ये सभी दनु के वंश में उत्पन्न प्रसिद्ध दानव कहे गए हैं।
श्लोक 27-30: अन्यौ तु खलु देवानां सूर्याचन्द्रमसौ स्मृतौ। अन्यौ दानवमुख्यानां सूर्याचन्द्रमसौ तथा।। इमे च वंशाः प्रथिताः सत्ववन्तो महाबलाः। दनुपुत्रा महाराज दश दानववंशजाः।। एकाक्षो मृतपो वीरः प्रलम्बनरकावपि। वातापिः शत्रुतपनः शठश्चैव महासुरः।। गविष्ठश्च वनायुश्च दीर्घजिह्वश्च दानवः। असङ्ख्येयाः स्मृतास्तेषां पुत्राः पौत्राश्च भारत।।
हिन्दी अनुवाद: (यहाँ दो प्रकार के सूर्य-चंद्रमा हैं—) एक सूर्य और चंद्रमा देवताओं के हैं, तथा दूसरे दानवमुख्यों के सूर्य और चंद्रमा हैं। हे महाराज! दनु के पुत्र दस दानववंशज महाबली और सत्त्वशाली वंश प्रसिद्ध हैं— एकाक्ष, वीर मृतप, प्रलम्ब, नरक, वातापि, शत्रुतपन, महासुर शठ, गविष्ठ, वनायु और दीर्घजिह्व दानव। हे भारत! इनके पुत्र और पौत्र असंख्येय कहे गए हैं।
श्लोक 31-35: सिंहिका सुषुवे पुत्रं राहुं चन्द्रार्कमर्दनम्। सुचन्द्रं चन्द्रहर्तारं तथा चन्द्रप्रमर्दनम्।। क्रूरस्वभावं क्रूरायाः पुत्रपौत्रमनन्तकम्। गणः क्रोधवशो नाम क्रूरकर्माऽरिमर्दनः।। दनायुषः पुनः पुत्राश्चत्वारोऽसुरपुंगवाः। विक्षरो बलवीरौ च वृत्रश्चैव महासुरः।। कालायाः प्रथिताः पुत्राः कालकल्पाः प्रहारिणः। प्रविख्याता महावीर्या दानवेषु परन्तपाः।। विनाशनश्च क्रोधश्च क्रोधहन्ता तथैव च। क्रोधशत्रुस्तथैवान्ये कालकेया इति श्रुताः।।
हिन्दी अनुवाद: सिंहिका ने चंद्रमा और सूर्य को मथने (पीड़ित करने) वाले राहु, सुचंद्र, चंद्रमा को चुराने वाले तथा चंद्रमा का दमन करने वाले पुत्रों को जन्म दिया। क्रूरा (क्रोधा) के क्रूर स्वभाव वाले पुत्र और पौत्र अनंत हैं। क्रूर कर्म करने वाला और शत्रुओं का मर्दन करने वाला 'क्रोधवश' नामक गण है। दनायु के चार श्रेष्ठ असुर पुत्र हुए— विक्षर, बलवीर, वृत्र और महासुर वृत्र। काला के प्रसिद्ध पुत्र काल के समान प्रहार करने वाले, महावीर्यवान और दानवों में शत्रुओं को तपाने वाले थे— विनाशन, क्रोध, क्रोधहन्ता, क्रोधशत्रु तथा अन्य जो 'कालकेय' नाम से श्रुत हैं।
श्लोक 36-39: असुराणामुपाध्यायः शक्रस्त्वषिसुतोऽभवत्। ख्याताश्चोशनसः पुत्राश्चत्वारोऽसुरयाजकाः।। त्वष्टा धरस्तथात्रिश्च द्वावन्यौ रौद्रकर्मिणौ। तेजसा सूर्यसंकाशा ब्रह्मलोकपरायणाः।। इत्येष वंशप्रभवः कथितस्ते तरस्विनाम्। असुराणां सुराणां च पुराणे संश्रुतो मया।। एतेषां यदपत्यं तु न शक्यं तदशेषतः।। प्रसंख्यातुं महीपाल गुणभूतमनन्तकम्।।
हिन्दी अनुवाद: महर्षि के पुत्र शक्र (शुक्रचार्य) असुरों के उपाध्याय (गुरु) हुए। उशना (शुक्र) के चार प्रसिद्ध पुत्र असुरों के पुरोहित थे— त्वष्टा, धर तथा अन्य दो रौद्र कर्म वाले अत्रि; वे तेज में सूर्य के समान और ब्रह्मलोकपरायण थे। हे महीपाल! मैंने पुराणों से सुनकर बलवान असुरों और देवताओं की यह वंशोत्पत्ति तुमसे कही है। हे महीपाल! इनकी संतति इतनी अनंत और गुण-प्रधान है कि उसे पूरी तरह से गिना नहीं जा सकता।
श्लोक 40-44: तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च तथैव गरुडारुणौ। आरुणिर्वारुणिश्चैव वैनतेयाः प्रकीर्तिताः।। शेषोऽनन्तो वासुकिश्च तक्षकश्च भुजङ्गमः। कूर्मश्च कुलिकश्चैव काद्रवेयाः प्रकीर्तिताः।। भीमसेनोग्रसेनौ च सुपर्णो वरुणस्तथा। गोपतिर्धृतराष्ट्रश्च सूर्यवर्चाश्च सप्तमः।। सत्यवागर्कपर्णश्च प्रयुतश्चापि विश्रुतः। भीमश्चित्ररथश्चैव विख्यातः सर्वविद्वशी।। तथा शालिशिरा राजन्पर्जन्यश्च चतुर्दशः। कलिः पञ्चदशस्तेषां नारदश्चैव षोडशः।। इत्येते देवगन्धर्वा मौनेयाः परिकीर्तिताः।।
हिन्दी अनुवाद: तार्क्ष्य (कश्यप), अरिष्टनेमि, गरुड, अरुण, आरुणि और वारुणि— ये विनता के पुत्र (वैनतेय) कहे गए हैं। शेष (अनंत), वासुकि, तक्षक भुजंग, कूर्म और कुलक— ये कद्रू के पुत्र (काद्रवेय) कहे गए हैं। भीमसेन, उग्रसेन, सुपर्ण, वरुण, गोपति, धृतराष्ट्र, सातवें सूर्यवर्चा, सत्यवाक्, अर्कपर्ण, प्रसिद्ध प्रयुत, भीम, सर्वज्ञ और वशी चित्ररथ, हे राजन्! शालिशिरा, चौदहवें पर्जन्य, पन्द्रहवें कलि और सोलहवें नारद— ये सभी 'मौनेय' देवगंधर्व कहे गए हैं।
श्लोक 45-48: अथ प्रभूतान्यन्यानि कीर्तयिष्यामि भारत। अनवद्यां मनुं वंशामसुरां मार्गणप्रियाम्।। अरूपां सुभगां भासीमिति प्राधा व्यजायत। सिद्धः पूर्णश्च बर्हिश्च पूर्णायुश्च महायशाः।। ब्रह्मचारी रतिगुणः सुपर्णश्चैव सप्तमः। विश्वावसुश्च भानुश्च सुचन्द्रो दशमस्तथा।। इत्येते देवगन्धर्वाः प्राधेयाः परिकीर्तिताः। इमं त्वप्सरसां वंशं विदितं पुण्यलक्षणम्।।
हिन्दी अनुवाद: हे भारत! अब मैं अन्य बहुत से वंशों का वर्णन करता हूँ, जो अनवद्या, मनु वंश तथा बाण (मार्गणा) के प्रिय असुरों से संबंधित हैं। प्राधा ने अनवद्या, मनु, सुभगा और भासी इन चार कन्याओं को जन्म दिया। सिद्ध, पूर्ण, बर्हि, महायशस्वी पूर्णायु, ब्रह्मचारी, रतिगुण, सातवें सुपर्ण, विश्वावसु, भानु और दसवें सुचंद्र— ये सभी प्राधा के पुत्र देवगंधर्व कहे गए हैं। अब इस पुण्य लक्षणों से युक्त अप्सराओं के प्रसिद्ध वंश को सुनो।
श्लोक 49-52: अरिष्टाऽसूत सुभगा देवी देवर्षितः पुरा। अलम्बुषा मिश्रकेशी विद्युत्पर्णा तिलोत्तमा।। अरुणा रक्षिता चैव रम्भा तद्वन्मनोरमा। केशिनी च सुबाहुश्च सुरता सुरजा तथा।। सुप्रिया चातिबाहुश्च विख्यातौ च हाहा हूहूः। तुम्बुरुश्चेति चत्वारः स्मृता गन्धर्वसत्तमाः।। अमृतं ब्राह्मणा गावो गन्धर्वाप्सरसस्तथा। अपत्यं कपिलायास्तु पुराणे परिकीर्तितम्।।
हिन्दी अनुवाद: पूर्वकाल में सुभगा देवी अरिष्टा ने देवर्षियों से अलम्बुषा, मिश्रकेशी, विद्युत्पर्णा, तिलोत्तमा, अरुणा, रक्षिता, रम्भा, मनोरमा, केशिनी, सुबाहु, सुरता, सुरजा, सुप्रिया और अतिबाहु को उत्पन्न किया। हाहा, हूहू, तुम्बुरु और चौथे विश्वावसु— ये चार गंधर्वश्रेष्ठ कहे गए हैं। पुराणों में अमृत, ब्राह्मण, गायें, गंधर्व और अप्सराओं को कपिला की संतति कहा गया है।
श्लोक 53-56: इति ते सर्वभूतानां संभवः कथितो मया। यथावत्संपरिख्यातो गन्धर्वाप्सरसां तथा।। भुजंगानां सुपर्णानां रुद्राणां मरुतां तथा। गवां च ब्राह्मणानां च श्रीमतां पुण्यकर्मणाम्।। आयुष्यश्चैव पुण्यश्च धन्यः श्रुतिसुखावहः। श्रोतव्यश्चैव सततं श्राव्यश्चैवानसूयता।। इमं तु वंशं नियमेन य: पठे- न्महात्मनां ब्राह्मणदेवसन्निधौ। अपत्यलाभं लभते स पुष्कलं श्रियं यशः प्रेत्य च शोभनां गतिम्।।
हिन्दी अनुवाद: इस प्रकार मैंने तुमसे समस्त प्राणियों की, गंधर्वों, अप्सराओं, नागों, सुपर्णों (पक्षियों), रुद्राओं, मरुतों, गायों, ब्राह्मणों तथा श्रीमान् एवं पुण्यकर्मी पुरुषों की उत्पत्ति का यथार्थ वर्णन किया है। यह वंश-कथन आयु बढ़ाने वाला, पवित्र, धन्य, कानों को सुख देने वाला तथा सदा दोष-दृष्टि रहित होकर सुनने और सुनाने योग्य है। जो मनुष्य महात्माओं, ब्राह्मणों और देवताओं के सानिध्य में नियमपूर्वक इस वंश का पाठ करता है, वह प्रचुर संतान लाभ, लक्ष्मी, यश तथा परलोक में उत्तम गति प्राप्त करता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि षट्षष्टितमोऽध्यायः।। 66 ।।
