श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सप्तषष्टितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सप्तषष्टितमोऽध्यायः


महाभारत आदिपर्व के सप्तषष्टितम (67वें) अध्याय के श्लोकों की हिन्दी व्याख्या:

श्लोक 1-3 (एकादश रुद्रों की उत्पत्ति): वैशंपायन उवाच। ब्रह्मणो मानसाः पुत्रा विदिताः षण्महर्षयः। एकादश सुताः स्थाणोः ख्याताः परमतेजसः।। मृगव्याधश्च सर्पश्च निर्ऋतिश्च महायशाः। अजैकपादहिर्बिध्न्यः पिनाकी च परन्तपः।। दहनोऽथेश्वरश्चैव कपाली च महाद्युतिः। स्थाणुर्भगश्च भगवान् रुद्रा एकादश स्मृताः।। 

व्याख्या: वैशंपायन जी कहते हैं कि ब्रह्मा जी के छह प्रसिद्ध मानस पुत्र महर्षि हैं। इसके अलावा स्थाणु (शिव) के परम तेजस्वी ग्यारह पुत्र कहे गए हैं, जो 'रुद्र' कहलाते हैं। उनके नाम हैं— 1. मृगव्याध, 2. सर्प, 3. महायशस्वी निर्ऋति, 4. अजैकपाद, 5. अहिर्बुध्न्य, 6. पिनाकी, 7. परन्तप, 8. दहन, 9. ईश्वर, 10. महाद्युति कपाली, और 11. भगवान स्थाणु भग।

श्लोक 4-9 (ब्रह्मर्षियों और उनके वंश की उत्पत्ति): मरीचिरङ्गिरा अत्रिः पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। षडेते ब्रह्मणः पुत्रा वीर्यवन्तो महर्षयः।। त्रयस्त्वङ्गिरसः पुत्रा लोके सर्वत्र विश्रुताः। बृहस्पतिरुतथ्यश्च संवर्तश्च धृतव्रताः।। अत्रेस्तु बहवः पुत्राः श्रूयन्ते मनुजाधिप। सर्वे वेदविदः सिद्धाः शान्तात्मानो महर्षयः।। राक्षसाश्च पुलस्त्यस्य वानराः किन्नरास्तथा। यक्षाश्च मनुजव्याघ्र पुत्रास्तस्य च धीमतः।। पुलहस्य सुता राजञ्शरभाश्च प्रकीर्तिताः। सिंहाः किपुरुषा व्याघ्रा ऋक्षा ईहामृगास्तथा।। क्रतोः क्रतुसमाः पुत्राः पतङ्गसहचारिणः। विश्रुतास्त्रिषु लोकेषु सत्यव्रतपरायणाः।। 

व्याख्या: मरीचि, अङ्ग्रिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह और क्रतु— ये छह ब्रह्मा जी के पराक्रमी मानस पुत्र महर्षि हैं। अङ्गिरा के तीन पुत्र लोक में सर्वत्र विख्यात हैं— बृहस्पति, उतथ्य और धृतव्रती संवर्त। हे मनुजाधिप! अत्रि के अनेक पुत्र सुने जाते हैं, जो सभी वेदों के ज्ञाता, सिद्ध, शांतचित्त और महर्षि हैं। हे मनुजव्याघ्र! बुद्धिमान पुलस्त्य के पुत्र राक्षस, वानर, किन्नर और यक्ष हुए। हे राजन्! पुलह के पुत्र शरभ, सिंह, किंपुरुष, व्याघ्र, रीछ और ईहामृग कहे गए हैं। क्रतु के पुत्र उनके समान ही यज्ञीय कर्मों में संलग्न रहने वाले, पतंगों (पक्षियों) के साथ विचरने वाले और तीनों लोकों में सत्यव्रतपरायण के रूप में प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 10-13 (दक्ष की उत्पत्ति और कन्याओं का विभाग): दक्षस्त्वजायताङ्गुष्ठाद्दक्षिणाdभगवानृषिः। ब्रह्मणः पृथिवीपाल शान्तात्मा सुमहातपाः।। वामादजायताङ्गुष्ठाद्भार्या तस्य महात्मनः। तस्यां पञ्चाशतं कन्याः स एवाजनयन्मुनिः।। ताः सर्वास्त्वनवद्याङ्ग्यः कन्याः कमललोचनाः। पुत्रिकाः स्थापयामास नष्टपुत्रः प्रजापतिः।। ददौ स दश धर्माय सप्तविंशतिमिन्दवे। दिव्येन विधिना राजन्कश्यपाय त्रयोदश।। 

व्याख्या: हे पृथिवीपाल! ब्रह्मा जी के दाहिने अंगूठे से शांतचित्त और महातपस्वी भगवान दक्ष ऋषि प्रकट हुए। उसी महात्मा की बाईं अंगूठे से उनकी पत्नी प्रकट हुईं, जिनसे उस मुनि ने पचास कन्याओं को उत्पन्न किया। वे सभी कमल जैसी नेत्रों वाली और निर्दोष अंगों वाली कन्याएँ थीं। पुत्रहीन होने के कारण प्रजापति दक्ष ने उन सभी को 'पुत्रिका' (वंश चलाने वाली) के रूप में स्थापित किया। हे राजन्! उन्होंने दिव्य विधि से उन कन्याओं में से 10 कन्याएँ धर्म को, 27 चंद्रमा को और 13 कश्यप ऋषि को ब्याह दीं।

श्लोक 14-16 (धर्म और चंद्रमा की पत्नियाँ): नामतो धर्मपत्न्यस्ताः कीर्त्यमाना निबोध मे। कीर्तिर्लक्ष्मीर्धृतिर्मेधा पुष्टिः श्रद्धा क्रिया तथा।। बुद्धिर्लज्जा मतिश्चैव पत्न्यो धर्मस्य ता दश। द्वाराण्येतानि धर्मस्य विहितानि स्वयंभुवा।। सप्तविंशतिः सोमस्य पत्न्यो लोकस्य विश्रुताः। कालस्य नयने युक्ताः सोमपत्न्याः शुचिव्रताः।। सर्वा नक्षत्रयोगिन्यो लोकयात्राविधानतः। 

व्याख्या: धर्म की जो दस पत्नियाँ थीं, उनके नाम मेरे द्वारा कहे जाने पर सुनो— कीर्ति, लक्ष्मी, धृति, मेधा, पुष्टि, श्रद्धा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा और मति। स्वयंभू ब्रह्मा जी ने इन्हें धर्म के मार्ग या द्वार के रूप में विख्यात किया है। लोक में प्रसिद्ध चंद्रमा (सोम) की सत्ताइस पत्नियाँ हैं, जो पवित्र व्रतों का पालन करने वाली और समय की गति को साधने वाली हैं। वे सभी नक्षत्रों से जुड़ी हुई हैं और लोक-यात्रा (संसार की व्यवस्था) के संचालन में सहायक हैं।

श्लोक 17-25 (अष्ट वसुओं और उनके वंश की विस्तृत सूची): पैतामहो मुनिर्देवस्तस्य पुत्रः प्रजापतिः। तस्याष्टौ वसवः पुत्रास्तेषां वक्ष्यामि विस्तरम्।। धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः।। धूम्रायास्तु धरः पुत्रो ब्रह्मविद्यो ध्रुवस्तथा। चन्द्रमास्तु मनस्विन्याः श्वासायाः श्वसनस्तथा।। रतायाश्चाप्यहः पुत्रः शाण्डिल्याश्च हुताशनः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च प्रभातायाः सुतौ स्मृतौ।। धरस्य पुत्रो द्रविणो हुतहव्यवहस्तथा। आपस्य पुत्रो वैतण्ड्यः श्रमः शान्तोमुनिस्तथा। ध्रुवस्य पुत्रो भगवान्कालो लोकप्रकालनः।। सोमस्य तु सुतो वर्चा वर्चस्वी येन जायते। मनोहरायाः शिशिरः प्राणोऽथ रमणस्तथा।। अह्नः सुतस्तथा ज्योतिः शमः शान्तस्तथा मुनिः। अग्नेः पुत्रः कुमारस्तु श्रीमाञ्छरवणालयः।। तस्य शाखो विशाखश्च नैगमेयश्च पृष्ठजः। कृत्तिकाभ्युपपत्तेश्च कार्तिकेय इति स्मृतः।। अनिलस्य शिवा भार्या तस्याः पुत्रो मनोजवः। अविज्ञातगतिश्चैव द्वौ पुत्रावनिलस्य तु।। 

व्याख्या: ब्रह्मा के मानस पुत्र दक्ष के बाद उनके वंश में अष्ट वसुओं की उत्पत्ति हुई। उनके नाम हैं— धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास। धर की पत्नी धूम्रा से द्रविण और हुतहव्यवह नामक पुत्र हुए; ध्रुव की पत्नी ब्रह्मविद्या से ध्रुव का वंश चला (ध्रुव के पुत्र काल हुए); मनस्विनी से चंद्रमा (सोम) के पुत्र वर्चस्वी आदि हुए; श्वासा से श्वसन (अनिल) के पुत्र हुए; रता से अह के पुत्र ज्योति, शम, शांत और मुनि हुए; शांडिल्या से अग्नि (हुताशन) के पुत्र श्रीमान कार्तिकेय (कुमार) हुए, जिनका लालन-पालन सरवण (शरवन) में हुआ था। कार्तिकेय के भाई शाखा, विशाख और नैगमेय थे, और कृतिकाओं द्वारा पाले जाने के कारण वे कार्तिकेय कहलाए। अनिल (वायु) की पत्नी शिवा से मनोजव और अविज्ञातगति नामक दो पराक्रमी पुत्र हुए।

श्लोक 26-30 (देवल, विश्वकर्मा और धर्म के पुत्र): प्रत्यूषस्य विदुः पुत्रमृषिं नाम्नाऽथ देवलम्। द्वौ पुत्रौ देवलस्यापि क्षमावन्तौ मनीषिणौ। बृहस्पतेस्तु भगिनी वरस्त्री ब्रह्मवादिनी।। योगसिद्धा जगत्कृत्स्नमसक्ता विचचार ह। प्रभासस्य तु भार्या सा वसूनामष्टमस्य ह।। विश्वकर्मा महाभागो जज्ञे शिल्पप्रजापतिः।। कर्ता शिल्पसहस्राणां त्रिदशानां च वर्धकिः।। भूषणानां च सर्वेषां कर्ता शिल्पवतां वरः। यो दिव्यानि विमानानि त्रिदशानां चकार ह।। मनुष्याश्चोपजीवन्ति यस्य शिल्पं महात्मनः। पूजयन्ति च यं नित्यं विश्वकर्माणमव्ययम्।। 

व्याख्या: प्रत्यूष के पुत्र देवल ऋषि हुए, जिनके दो क्षमावान और विद्वान पुत्र थे। बृहस्पति की बहन एक ब्रह्मवादिनी और योगसिद्धा थीं, जो संसार में असक्त होकर विचरती थीं। वे ही वसुओं में आठवें 'प्रभास' की पत्नी बनीं। उन दोनों से महाभाग विश्वकर्मा (शिल्पप्रजापति) का जन्म हुआ। वे हजारों शिल्पों के रचयिता, देवताओं के बढ़ई और समस्त आभूषणों को बनाने वाले शिल्पी-श्रेष्ठा थे। उन्होंने ही देवताओं के लिए दिव्य विमानों का निर्माण किया था। आज भी मनुष्य उन्हीं महात्मा के शिल्प का आश्रय लेकर जीवन जीते हैं और उस अव्यय विश्वकर्मा की नित्य पूजा करते हैं।

श्लोक 31-33 (धर्म के मानस पुत्र और उनकी पत्नियाँ): स्तनं तु दक्षिणं भित्त्वा ब्रह्मणो नरविग्रहः। निःसृतो भगवान्धर्मः सर्वलोकसुखावहः।। त्रयस्तस्य वराः पुत्राः सर्वभूतमनोहराः। शमः कामश्च हर्षश्च तेजसा लोकधारिणः।। कामस्य तु रतिर्भार्या शमस्य प्राप्तिरङ्गना। नन्दा तु भार्या हर्षस्य यासु लोकाः प्रतिष्ठिताः।।

व्याख्या: ब्रह्मा जी के दाहिने स्तन को चीरकर समस्त लोकों को सुख देने वाले भगवान धर्म (नरविग्रह) प्रकट हुए। उनके तीन श्रेष्ठ और मनमोहक पुत्र हुए— शम, काम और हर्ष। काम की पत्नी रति, शम की पत्नी प्राप्ति और हर्ष की पत्नी नन्दा हुईं, जिनमें यह संपूर्ण संसार प्रतिष्ठित है।

श्लोक 34-40 (देवगणों, आदित्यों और अन्य गणों का परिचय): मरीचेः कश्यपः पुत्रः कश्यपस्य सुरासुराः। जज्ञिरे नृपशार्दूल लोकानां प्रभवस्तु सः।। त्वाष्ट्री तु सवितुर्भार्या वडवारूपधारिणी। असूयत महाभागा सान्तरिक्षेऽस्विनावुभौ।। द्वादशैवादितेः पुत्राः शक्रमुख्या नराधिप। तेषामवरजो विष्णुर्यत्र लोकाः प्रतिष्ठिताः।। त्रयस्त्रिंशत यत्येते देवास्तेषामहं तव। अन्वयं संप्रवक्ष्यामि पक्षैश्च कुलतो गणान्।। रुद्राणामपरः पक्षः साध्यानां मरुतां तथा। वसूनां भार्गवं विद्याद्विश्वेदेवांस्तथैव च।। वैनतेयस्तु गरुडो बलवानरुणस्तथा। बृहस्पतिश्च भगवानादित्येष्वेव गण्यते।। अश्विनौ गुह्यकान्विद्धि सर्वौषध्यस्तथा पशून्। एते देवगणा राजन्कीर्तितास्तेऽनुपूर्वशः।। 

व्याख्या: हे नृपशार्दूल! मरीचि के पुत्र कश्यप हुए और कश्यप से ही सुर और असुर उत्पन्न हुए, क्योंकि वे ही समस्त लोकों के प्रभव (उत्पत्ति के मूल) हैं। सूर्य (सविता) की पत्नी त्वाष्ट्री ने घोड़ी का रूप धारण करके अंतरिक्ष में दोनों अश्विनी कुमारों को जन्म दिया। हे नराधिप! अदिति के इन्द्र आदि बारह पुत्र हैं, जिनमें सबसे छोटे विष्णु हैं, जिनमें यह संपूर्ण जगत स्थित है। कुल तैंतीस मुख्य देवता हैं, जिनके वंश और गणों का वर्णन मैंने किया है— रुद्र, साध्य, मरुत, वसु, विश्वेदेव, गरुड़, अरुण और बृहस्पति (इनकी गणना आदित्यों में होती है)। अश्विनीकुमार, गुह्यक, समस्त औषधियाँ और पशु— इन सभी देवगणों का क्रम से मैंने वर्णन कर दिया है।

श्लोक 41-49 (भृगु और जमदग्नि वंश का विस्तार): यान्कीर्तयित्वा मनुजः सर्वपापैः प्रमुच्यते। ब्रह्मणो हृदयं भित्त्वा निःसृतो भगवान्भृगुः।। भृगोः पुत्रः कविर्विद्वाञ्छुक्रः कविसुतो ग्रहः। त्रैलोक्यप्राणयात्रार्थं वर्षावर्षे भयाभये। स्वयंभुवा नियुक्तः सन्भुवनं परिधावति।। योगाचार्यो महाबुद्धिर्दैत्यानामभवद्गुरुः। सुराणां चापि मेधावी ब्रह्मचारी यतव्रतः।। तस्मिन्नियुक्ते विधिना योगक्षेमाय भार्गवे। अन्यमुत्पादयामास पुत्रं भृगुरनिन्दितम्।। च्यवनं दीप्ततपसं धर्मात्मानं यशस्विनम्। यः स रोषाच्च्युतो गर्भान्मातुर्मोक्षाय भारत।। आरुषी तु मनोः कन्या तस्य पत्नी मनीषिणः। और्वस्तस्यां समभवदूरुं भित्त्वा महायशाः।। महातेजा महावीर्यो बाल एव गुणैर्युतः। ऋचीकस्तस्य पुत्रस्तु जमदग्निस्ततोऽभवत्।। जमदग्नेस्तु चत्वार आसन्पुत्रा महात्मनः। रामस्तेषां जघन्योऽभूदजघन्यैर्गुणैर्युतः। सर्वशस्त्रेषु कुशलः क्षत्रियान्तकरो वशी।। और्वस्यासीत्पुत्रशतं जमदग्निपुरोगमम्। तेषां पुत्रसहस्राणि बभूवुर्भुवि विस्तरः।।

  व्याख्या: ब्रह्मा जी के हृदय को चीरकर भगवान भृगु प्रकट हुए। भृगु के विद्वान पुत्र कवि हुए, और कवि के पुत्र शुक्र (ग्रह) हुए, जिन्हें तीनों लोकों के प्राण की रक्षा और कालचक्र के संचालन के लिए स्वयंभू ब्रह्मा जी ने नियुक्त किया है। वे महाबुद्धिमान योगचार्य दैत्यों के गुरु और देवताओं के भी हितैषी बने। भृगु ने अपने दूसरे पुत्र के रूप में तेजस्वी, धर्मी और यशस्वी च्यवन को उत्पन्न किया। च्यवन के बाद मनु की कन्या आरुषी से और्व ऋषि उत्पन्न हुए, जिन्होंने जांघ (ऊरु) को चीरकर जन्म लिया था। और्व के पुत्र ऋचीक और ऋचीक के पुत्र जमदग्नि हुए। जमदग्नि के चार पुत्र हुए, जिनमें सबसे छोटे भगवान परशुराम (राम) थे, जो सभी शस्त्रों में निपुण, क्षत्रियों का नाश करने वाले और जितेंद्रिय थे। और्व के सौ पुत्र थे (जिनमें जमदग्नि सबसे आगे थे), और आगे चलकर पृथ्वी पर उनकी हजारों-लाखों संताने हुईं।

श्लोक 50-51: द्वौ पुत्रो ब्रह्मणस्त्वन्यौ ययोस्तिष्ठति लक्षणम्। लोके धाता विधाता च यौ स्थितौ मनुना सह।। तयोरेव स्वसा देवी लक्ष्मीः पद्मगृहा शुभा। तस्यास्तु मानसाः पुत्रास्तुरगा व्योमचारिणः।।

  • हिन्दी अनुवाद: ब्रह्मा जी के दो अन्य पुत्र और हैं, जिनके लक्षण लोक में प्रसिद्ध हैं— वे धाता और विधाता हैं, जो मनु के साथ स्थित रहते हैं। उन्हीं दोनों की बहन कमल के आसन पर रहने वाली शुभ देवी लक्ष्मी हैं। उन लक्ष्मी जी के मानस पुत्र आकाश में विचरने वाले घोड़े (तुरग) हुए।
  • व्याख्या: यहाँ ब्रह्मा जी की अन्य संतानों (धाता, विधाता और लक्ष्मी) का उल्लेख है। देवी लक्ष्मी के मानस पुत्रों के रूप में दिव्य और वेगवान घोड़ों को बताया गया है जो अंतरिक्ष में गमन करते हैं।

श्लोक 52-53: वरुणस्य भार्या या ज्येष्ठा शुक्राद्देवी व्यजायत। तस्याः पुत्रं बलं विद्धि सुरां च सुरनन्दिनीम्।। प्रजानामन्नकामानामन्योन्यपरिभक्षणात्। अधर्मस्तत्र संजातः सर्वभूतविनाशकः।।

  • हिन्दी अनुवाद: वरुण की जो ज्येष्ठा (बड़ी) पत्नी थीं, उन्हें शुक्र (या असुरों के गुरु) की पुत्री देवी ने उत्पन्न किया था। उनके पुत्र 'बल' और देवताओं को आनंद देने वाली 'सुरा' (मदिरा) को जानिए। जब अन्न की कामना करने वाली प्रजा एक-दूसरे का भक्षण करने लगी, तब वहाँ समस्त जीवों का नाश करने वाला 'अधर्म' उत्पन्न हुआ।
  • व्याख्या: इस प्रसंग में वरुण की पत्नी और मदिरा (सुरा) तथा बल की उत्पत्ति का वर्णन है। आगे सृष्टि के प्रारंभिक काल में जीवों द्वारा एक-दूसरे को खाने की प्रवृत्ति के कारण विनाशकारी 'अधर्म' के जन्म लेने की बात कही गई है।

श्लोक 54-55: तस्यापि निर्ऋतिर्भार्या नैर्ऋता येन राक्षसाः। घोरास्तस्यास्त्रयः पुत्राः पापकर्मरताः सदा।। भयो महाभयश्चैव मृत्युर्भूतान्तकस्तथा। न तस्य भार्या पुत्रो वा कश्चिदस्त्यन्तको हि सः।।

  • हिन्दी अनुवाद: उस अधर्म की पत्नी 'निर्ऋति' हुई, जिनसे नैर्ऋत राक्षस उत्पन्न हुए। उस निर्ऋति के तीन भयानक और सदा पापकर्मों में लगे रहने वाले पुत्र हुए— भय, महाभय और समस्त जीवों का अंत करने वाला मृत्यु। उस अंतक (मृत्यु) की न तो कोई पत्नी है और न ही पुत्र, क्योंकि वह स्वयं सबका संहारक है।
  • व्याख्या: अधर्म और निर्ऋति के संयोग से भयानक राक्षसों और भय-मृत्यु जैसी मानवीय आपदाओं व प्रवृत्तियों की उत्पत्ति का प्रतीकात्मक रूप से वर्णन किया गया है।

श्लोक 56-59: काकीं श्येनीं तथा भासीं धृतराष्ट्रीं तथा शुकीम्। ताम्रा तु सुषुवे देवी पञ्चैता लोकविश्रुताः।। उलूकान्सुषुवे काकी श्येनी श्येनान्व्यजायत। भासी भासानजनयद्गृध्रांश्चैव जनाधिप।। धृतराष्ट्री तु हंसांश्च कलहंसांश्च सर्वशः। चक्रवाकांश्च भद्रा तु जनयामास सैव तु।। शुकी च जनयामास शुकानेव यशस्विनी। कल्याणगुणसंपन्ना सर्वलक्षणपूजिता।।

  • हिन्दी अनुवाद: ताम्रा देवी ने पाँच लोक-विख्यात कन्याओं को जन्म दिया— काकी, श्येनी, भासी, धृतराष्ट्री और शुकी। उनमें से काकी ने उल्लुओं को, श्येनी ने बाजों को, भासी ने भासों और गिद्धों को जन्म दिया। हे जनाधिप! धृतराष्ट्री (या भद्रा) ने सभी प्रकार के हंसों, कलहंसों और चक्रवाकों को उत्पन्न किया। यशस्विनी और कल्याणकारी गुणों से संपन्न शुकी ने केवल शुक (तोतों) को जन्म दिया।
  • व्याख्या: महर्षि कश्यप की पत्नी ताम्रा के वंश से पक्षियों की विभिन्न जातियों (उल्लू, बाज, गिद्ध, हंस, तोते आदि) की उत्पत्ति का विस्तार से वर्णन किया गया है।

श्लोक 60-62: नव क्रोधवशा नारीः प्रजज्ञे क्रोधसंभवाः। मृगी च मृगमन्दा च हरी भद्रमना अपि।। मातङ्गी त्वथ शार्दूली श्वेता सुरभिरेव च। सर्वलक्षणसंपन्ना सुरसा चैव भामिनी।। अपत्यं तु मृगाः सर्वे मृग्या नरवरोत्तम। ऋक्षाश्च मृगमन्दायाः सृमराश्च परंतप।।

  • हिन्दी अनुवाद: क्रोध से उत्पन्न होने वाली 'क्रोधवश' नामक नौ नारियाँ (प्राणिनियाँ) थीं— मृगी, मृगमन्दा, हरी, भद्रमना, मातङ्गी, शार्दूली, श्वेता, सुरभि और सुंदर अंगों वाली सुरसा। हे नरवरोत्तम! मृगी से समस्त मृग (हिरण) उत्पन्न हुए, और मृगमन्दा से रीछ तथा सृमर (जंगली जीव) उत्पन्न हुए।
  • व्याख्या: क्रोधवश के अंतर्गत आने वाली इन नौ देवियों/योनियों से पृथ्वी पर विभिन्न प्रकार के वन्य जीवों और पशुओं के वंशों की शुरुआत हुई है।

श्लोक 63-66: ततस्त्वैरावतं नागं जज्ञे भद्रमनाः सुतम्। ऐरावतः सुतस्तस्या देवनागो महागजः।। हर्याश्च हरयोऽपत्यं वानराश्च तरस्विनः। गोलाङ्गूलांश्च भद्रं ते हर्याः पुत्रान्प्रचक्षते।। प्रजज्ञे त्वथ शार्दूली सिंहान्व्याग्राननेकशः। द्वीपिनश्च महासत्वान्सर्वानेव न सशंयः।। मातङ्ग्यपि च मातङ्गानपत्यानि नराधिप। दिशां गजं तु श्वेताख्यं श्वेताऽजनयदाशुगम्।।

  • हिन्दी अनुवाद: भद्रमना के पुत्र ऐरावत नाग हुए, और ऐरावत के पुत्र देवनाग महागज (हाथी) हुए। हरी के पुत्र तेजस्वी बंदर, वानर और गोलाङ्गूल (लंगूर) हुए— ऐसा कहा जाता है। शार्दूली ने अनेक सिंह, व्याघ्र और महाबली चीतों को बिना किसी संदेह के उत्पन्न किया। हे नराधिप! मातंगी ने हाथियों को और श्वेता ने दिशाओं के गतिमान श्वेत हाथियों को जन्म दिया।
  • व्याख्या: इस श्लोक समूह में हाथियों के राजा ऐरावत, बंदरों, लंगूरों, सिंहों, बाघों और तेंदुओं की उत्पत्ति का सुंदर विवरण दिया गया है।

श्लोक 67-68: तथा दुहितरौ राजन्सुरभिर्वै व्यजायत। रोहिणी चैव भद्रं ते गन्धर्वी तु यशस्विनी।। विमलामपि भद्रं ते अनलामपि भारत। रोहिण्यां जज्ञिरे गावो गन्धर्व्यां वाजिनः सुताः।।

  • हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! सुरभि ने रोहिणी, यशस्विनी गंधर्वी, विमला और अनला नामक कन्याओं को जन्म दिया। रोहिणी के गर्भ से गायें उत्पन्न हुईं और गंधर्वी के गर्भ से घोड़े (वाजि) उत्पन्न हुए।
  • व्याख्या: सुरभि की संतानों के माध्यम से संसार में उपयोगी पशुओं जैसे गौवंश और घोड़ों के वंश का विस्तार हुआ।

श्लोक 69-72: इरायाः कन्यका जातास्तिस्रः कमललोचनाः। वनस्पतीनां वृक्षाणां वीरुधां चैव मातरः।। लतारुहे च द्वे प्रोक्ते वीरुधां चैव ताः स्मृताः। गृह्णन्ति ये विना पुष्पं फलानि तरवः पृथक्।। लतासुतास्ते विज्ञेयास्तानेवाहुर्वनस्पतीन्। पुष्पैः फलग्रहान्वृक्षान्रुहायाः प्रसवं विदुः।। लतागुल्मानि वृक्षाश्च त्वक्सारतृणजन्तवः। वीरुधो याः प्रजास्तस्यास्तत्र वंशः समाप्यते।।

  • हिन्दी अनुवाद: इरा की कमल जैसी नेत्रों वाली तीन कन्याएँ हुईं, जो वनस्पतियों, वृक्षों और वीरुधों (बेल-झाड़ियों) की माताएँ हैं। जो वृक्ष बिना फूल दिए सीधे फल देते हैं, वे लता के पुत्र 'वनस्पति' कहलाते हैं। जो वृक्ष फूल आने के बाद फल धारण करते हैं, उन्हें 'रुहा' की संतान जानते हैं। लता, गुल्म, वृक्ष, त्वक्सार (बांस आदि), तृण और अन्य तिनके— ये सभी उसी की प्रजा हैं, जिन पर यह वंश समाप्त होता है।
  • व्याख्या: यहाँ वनस्पति जगत (पेड़-पौधे, लताएँ, घास-फुस और फल-फूल वाले वृक्षों) की वैज्ञानिक एवं पौराणिक उत्पत्ति का वर्गीकरण किया गया है।

श्लोक 73-76: सप्तपिम्डफलान्वृक्षाननलापि व्यजायत।। अनलायाः शुकी पुत्री कंकस्तु सुरसासुतः। अरुणस्य भार्या श्येनी तु वीर्यवन्तौ महाबलौ।। संपातिं जनयामास वीर्यवन्तं जटायुषम्। सुरसाऽजनयन्नागान्कद्रूः पुत्रांस्तु पन्नगान्।। द्वौ पुत्रौ विनतायास्तु विख्यातौ गरुडारुणौ। इत्येष सर्वभूतानां महतां मनुजाधिप। प्रभवः कीर्तितः सम्यङ्मया मतिमतां वर।।

  • हिन्दी अनुवाद: अनला ने सात पिंड फल वाले वृक्षों को जन्म दिया। अनला की पुत्री शुकी हुईं, और सुरसा के पुत्र कंक हुए। अरुण की पत्नी श्येनी ने दो महाबली और पराक्रमी पुत्रों— संपाति और जटायु को जन्म दिया। सुरसा ने नागों को और कद्रू ने पन्नगों (साँपों) को उत्पन्न किया। विनता के दो प्रसिद्ध पुत्र गरुड़ और अरुण हुए। हे मतिमतां वर मनुजाधिप! इस प्रकार मैंने समस्त महान प्राणियों की उत्पत्ति का यह पूर्ण और यथार्थ वर्णन किया है।
  • व्याख्या: यह अध्याय वनस्पति जगत के शेष भाग और पक्षीराज जटायु-संपाति तथा नाग-पन्नग और गरुड़ की उत्पत्ति के साथ संपन्न होता है, जो पूरी सृष्टि के विस्तार का मूलाधार है।

श्लोक 77: यं श्रुत्वा पुरुषः सम्यङ्मुक्तो भवति पाप्मनः। सर्वज्ञतां च लभते रतिमग्र्यां च विन्दति।।

  • हिन्दी अनुवाद: इस वंश-कथन को जो मनुष्य भली-भांति सुनता है, वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है; वह सर्वज्ञता प्राप्त करता है और उत्तम सुख (रति) को प्राप्त होता है।
  • व्याख्या: संपूर्ण सृष्टि की इस आख्यान-कथा को सुनने के धार्मिक और आध्यात्मिक फल का वर्णन करते हुए अध्याय को विराम दिया गया है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि सप्तषष्टितमोऽध्यायः।। 67 ।।