श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि आस्तीकपर्वणि त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः


शौनकजी बोले —

सर्पसत्रे तदा राज्ञः पाण्डवेयस्य धीमतः। जनमेजयस्य के त्वासन्नृत्विजः परमर्षयः।। 

हिन्दी: बुद्धिमान पाण्डुवंश के राजा जनमेजय के उस सर्पसत्र में कौन-कौन परमर्षि ऋत्विज थे?—

के सदस्या बभूवुश्च सर्पसत्रे सुदारुणे। विषादजननेऽत्यर्थं पन्नगानां महाभय।। 

हिन्दी: और पन्नगों के लिए अत्यंत विषादजनक तथा महाभयकारी उस सुदारुण सर्पसत्र में कौन-कौन लोग सदस्य हुए थे?

सर्वं विस्तरशस्तात भवाञ्छंसितुमर्हति। सर्पसत्रविधानज्ञविज्ञेयाः के च सूतज।। 

हिन्दी: हे तात! आप सब कुछ विस्तारपूर्वक कहने की कृपा करें। सर्पसत्र की विधि को जानने वाले और समझने योग्य अन्य लोग कौन-कौन थे, हे सूतनन्दन! यह सब बताइए।

सूतजी बोले — हन्त ते कथयिष्यामि नामानीह मनीषिणाम्। ये ऋत्विजः सदस्याश्च तस्यासन्नृपतेस्तदा।। 

हिन्दी: अच्छा, मैं उन मनीषियों के नाम तुम्हें बताता हूँ, जो उस समय उस राजा के यज्ञ में ऋत्विज और सदस्य थे—

तत्र होता बभूवाथ ब्राह्मणश्चण्डभार्गवः। च्यवनस्यान्वये ख्यातो जातो वेदविदां वरः।। 

हिन्दी: वहाँ च्यवन के वंश में उत्पन्न, वेदवेत्तात्रयों में श्रेष्ठ और ख्यातिप्राप्त चण्डभार्गव नामक ब्राह्मण 'होता' हुए थे।

उद्गाता ब्राह्मणो वृद्धो विद्वान्कौत्सौऽथ जैमिनिः। ब्र्हमाऽभवच्छार्ङ्गरवोऽथाध्वर्युश्चापि पिङ्गलः।।

हिन्दी: वृद्ध ब्राह्मण कौत्स और विद्वान जैमिनि 'उद्गाता' हुए; शार्ङ्गरव 'ब्रह्मा' हुए और पिङ्गल 'अध्वर्यु' हुए थे।

सदस्यश्चाभवद्व्यासः पुत्रशिष्यसहायवान्। उद्दालकः प्रमतकः श्वेतकेतुश्च पिङ्गलः।। 

हिन्दी: व्यासजी अपने पुत्र और शिष्यों के साथ इस सत्र के 'सदस्य' हुए। इसके अतिरिक्त उद्दालक, प्रमतक, श्वेतकेतु, पिङ्गल—

असितो देवलश्चैव नारदः पर्वतस्तथा। आत्रेयः कुम्डजठरौ द्विजः कालघटस्तथा।। 

हिन्दी: असित, देवल, नारद, पर्वत, आत्रेय, कुण्डजठर तथा कालघट नामक द्विज—

वात्स्यः श्रुतश्रवा वृद्धो जपस्वाध्यायशीलवान्। कोहलो देवशर्मा च मौद्गल्यः समसौरभः।। 

हिन्दी: जप और स्वाध्याय में शीलवान वृद्ध वात्स्य श्रुतश्रवा, कोहल, देवशर्मा, मौद्गल्य और समसौरभ—

एते चान्ये च बहवो ब्राह्मणा वेदपारगाः। सदस्याश्चाभवंस्तत्र सत्रे पारिक्षितस्य ह।।

हिन्दी: ये तथा वेदों के पारगामी अन्य अनेक ब्राह्मण राजा परीक्षित के उस सत्र में सदस्य हुए थे।

जुह्वत्स्वृत्विक्ष्वथ तदा सर्पसत्रे महाक्रतौ। अहयः प्रापतंस्तत्र घोराः प्राणिभयावहाः।। 

हिन्दी: उस महायज्ञ रूपी सर्पसत्र में जब ऋत्विज लोग आहुति दे रहे थे, तब प्राणियों को भय देने वाले वे घोर सर्प वहाँ गिरने लगे।

वसामेदोवहाः कुल्या नागानां संप्रवर्तिताः। ववौ गन्धश्च तुमुलो दह्यतामनिशं तदा।। 

हिन्दी: निरंतर जलाए जाते हुए उन नागों की वसा और मेद (चर्बी) की नदियाँ बहने लगीं और वहाँ एक तुमुल (भयंकर) दुर्गंध फैल गई।

पततां चैव नागानां धिष्ठितानां तथाम्बरे। अश्रूयतानिशं शब्दः पच्यतां चाग्निना भृशम्।। 

हिन्दी: आकाश में स्थित होकर गिरते हुए नागों का अग्नि द्वारा बुरी तरह पकाए जाते समय का शब्द निरंतर सुनाई दे रहा था।

तक्षकस्तु स नागेन्द्रः पुरंदरनिवेशनम्। गतः श्रुत्वैव राजानं दीक्षितं जनमेजयम्।। 

हिन्दी: इधर नागराज तक्षक राजा जनमेजय को दीक्षित हुआ सुनते ही इंद्र के भवन (स्वर्ग) में चले गए।

ततः सर्वं यथावृत्तमाख्याय भुजगोत्तमः। अगच्छच्छरणं भीत आगस्कृत्वा पुरंदरम्।। 

हिन्दी: तब भुजगोत्तम तक्षक ने वहाँ जाकर सारी यथावृत्त घटना सुनाई और अपराध करके भयभीत हुए उन्होंने पुरंदर (इंद्र) की शरण ली।

तमिन्द्रः प्राह सुप्रीतो न तवास्तीह तक्षक। भयं नागेन्द्र तस्माद्वै सर्पसत्रात्कदाचन।। 

हिन्दी: सुप्रसन्न होकर इंद्र ने उनसे कहा — "हे नागराज तक्षक! तुम्हें इस सर्पसत्र से कभी कोई भय नहीं है।"

प्रसादितो मया पूर्वं तवार्थाय पितामहः। तस्मात्तव भयं नास्ति व्येतु तेनसो ज्वरः।। 

हिन्दी: "मैंने तुम्हारे हित के लिए पहले ही पितामह (ब्रह्मजी) को प्रसन्न कर लिया था, इसलिए तुम्हें कोई भय नहीं है। तुम्हारे मन का यह ज्वर (संतताप) दूर हो।"

सूतजी बोले — एवमाश्वासितस्तेन ततः स भुजगोत्तमः। उवास भवने तस्मिञ्शक्रस्य मुदितः सुखी।।

हिन्दी: इंद्र द्वारा इस प्रकार आश्वस्त किए जाने पर वे भुजगोत्तम तक्षक प्रसन्न और सुखी होकर इंद्र के उसी भवन में निवास करने लगे।

अजस्रं निपतत्स्वग्नौ नागेषु भृशदुःखितः। अल्पशेषपरीवारो वासुकिः पर्यतप्यत।। 

हिन्दी: उधर अग्नि में निरंतर गिरते हुए नागों को देखकर परिवार में थोड़े ही शेष बचे हुए वासुकि अत्यंत दुःखी और संतप्त हो रहे थे।

कश्मलं चाविशद्धोरं वासुकिं पन्नगोत्तमम्। स घूर्णमानहृदयो भगिनीमिदमब्रवीत।। 

हिन्दी: पन्नगोत्तम वासुकि को एक घोर मूर्च्छा (कश्मल) ने आ घेर लिया। उनका हृदय घूमने लगा और उन्होंने अपनी बहन (जरत्कारु) से यह बात कही—

दह्यन्तेऽङ्गानि मे भद्रे न दिशः प्रतिभान्ति माम्। सीदामीव च संमोहाद्धूर्णतीव च मे मनः।। 

हिन्दी: "हे भद्रे! मेरे अंग जल रहे हैं, मुझे दिशाएँ नहीं सूझ रही हैं। मोह के कारण मैं डूब सा रहा हूँ और मेरा मन चकरा रहा है।"

दृष्टिर्भ्राम्यति मेऽतीव हृदयं दीर्यतीव च। पतिष्याम्यवशोऽद्याहं तस्मिन्दीप्ते विभावसौ।।

हिन्दी: "मेरी दृष्टि अत्यधिक भ्रमित हो रही है और हृदय फटा जा रहा है। आज मैं विवश होकर उस प्रज्वलित अग्नि में जा गिरूँगा।"

पारिक्षितस्य यज्ञोऽसौ वर्ततेऽस्मज्जिघांसया। व्यक्तं मयाऽभिगन्तव्यं प्रेतराजनिवेशनम्।। 

हिन्दी: "परीक्षित का यह यज्ञ हमारा नाश करने की इच्छा से ही चल रहा है। अब मुझे निश्चय ही प्रेतराज (यमराज) के भवन में जाना होगा।"

अयं स कालः संप्राप्तो यदर्थमसि मे स्वसः। जरत्कारौ मया दत्ता त्रायस्वास्मान्सबान्धवान्।। 

हिन्दी: "हे बहन! जिसके लिए मैंने तुम्हें जरत्कारु को (पति के रूप में) दिया था, वही समय आ गया है। सपरिवार हम सबकी रक्षा करो।"

आस्तीकः किल यज्ञं तं वर्तन्तं भुजगोत्तमे। प्रतिषेत्स्यति मां पूर्वं स्वयमाह पितामहः।। 

हिन्दी: "पितामह (ब्रह्मजी) ने पहले ही स्वयं कहा था कि भुजगोत्तमों के उस चलते हुए यज्ञ को आस्तीक रोक देगा।"

तद्वत्से ब्रूहि वत्सं स्वं कुमारं वृद्धसंमतम्। ममाद्य त्वं सभृत्यस्य मोक्षार्थं वेदवित्तमम्।। 

हिन्दी: "अतः हे वत्से! वेदवेत्ता तथा वृद्धों द्वारा सम्मानित अपने उस पुत्र कुमार को आज हम सब सेवकों (सपरिवार) की मुक्ति के लिए समझाओ।"

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
आस्तीकपर्वणि त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।। 53 ।।
आस्तीकपर्वणि द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः