सूतजी बोले —
ततः आहूय पुत्रं स्वं जरत्कारुर्भुजंगमा। वासुकेर्नागराजस्य वचनादिदमब्रवीत्।।
हिन्दी: तदनंतर भुजगराज वासुकि के वचन को स्मरण कर नागकन्या जरत्कारु ने अपने पुत्र आस्तीक को पास बुलाया और उनसे यह बात कही—
अहं तव पितुः पुत्र भ्रात्रा दत्ता निमित्ततः। कालः स चायं संप्राप्तस्तत्कुरुष्व यथातथम्।।
हिन्दी: "हे पुत्र! मैं तुम्हारे पिता को अपने भाई (वासुकि) द्वारा एक विशेष कारण से दी गई थी। अब वही समय आ गया है, अतः तुम उसे यथार्थ रूप से पूर्ण करो।"
आस्तीक उवाच — किंनिमित्तं मम पितुर्दत्ता त्वं मातुलेन मे। तन्ममाचक्ष्व तत्त्वेन श्रुत्वा कर्ताऽस्मि तत्तथा।।
हिन्दी: आस्तीक बोले — "हे माता! मेरे मामा ने तुम्हें मेरे पिता को किस कारण से दिया था? वह सब मुझे तत्त्व से कहो, जिसे सुनकर मैं वैसा ही करूँगा।"
सूतजी बोले — तत आचष्ट सा तस्मै बान्धवानां हितैषिणी। भगिनी नागराजस्य जरत्कारुरविक्लबा।।
हिन्दी: तब अपने बान्धवों की हित चाहने वाली नागराज की वे निर्भय बहन जरत्कारु ने अपने पुत्र से सब कुछ कह सुनाया—
जरत्कारुरुवाच — पन्नगानामशेषाणां माता कद्रूरिति श्रुता। तया शप्ता रुषितया सुता यस्मान्निबोध तत्।।
हिन्दी: जरत्कारु बोलीं — "समस्त पन्नगों की माता 'कद्रू' नाम से प्रसिद्ध हैं। कुपित होकर उन्होंने अपने पुत्रों को जो शाप दिया था, उसे सुनो।"
उच्चैः श्रवाः सोऽश्वराजो यन्मिथ्या न कृतो मम। विनतार्थाय पणिते दासभावाय पुत्रकाः।।
हिन्दी: "'उच्चैःश्रवा' अश्वराज के विषय में जो मेरी शर्त थी, उसे तुमने मिथ्या कर दिया (यानी कद्रू ने विनता से छल किया था)। हे पुत्रों! इसी कारण तुम सब विनता की दास्ताँ (दासभाव) प्राप्त करने के लिए पणिते (शर्तबद्ध) हो।"
जनमेजयस्य वो यज्ञे धक्ष्यत्यनिलसारथिः। तत्र पञ्चत्वमापन्नाः प्रेतलोकं गमिष्यथ।।
हिन्दी: "'राजा जनमेजय के उस यज्ञ में अनिलसारथि (अग्निदेव) तुम सबको जला देंगे। वहाँ तुम सब पञ्चत्व को प्राप्त होकर प्रेतलोक जाओगे।'"
तां च शप्तवतीं देवः साक्षाल्लोकपितामहः। एवमस्त्विति तद्वाक्यं प्रोवाचानु मुमोद च।।
हिन्दी: "उनके इस प्रकार शाप देने पर साक्षात् लोकपितामह ब्रह्मदेव ने 'ऐसा ही हो' कहकर उनके उस वचन का अनुमोदन किया और प्रसन्न हुए थे।"
वासुकिश्चापि तच्छ्रुत्वा पितामहवचस्तदा। अमृते मथिते तात देवाञ्छरणमीयिवान्।।
हिन्दी: "हे तात! अमृत मंथन के समय पितामह के उस वचन को सुनकर वासुकि ने देवताओं की शरण ली थी।"
सिद्धार्थाश्च सुराः सर्वे प्राप्यामृतमनुत्तमम्। भ्रातरं मे पुरस्कृत्य पितामहमुपागमन्।।
हिन्दी: "उत्तम अमृत प्राप्त करके अपने सभी कार्य सिद्ध करने वाले देवताओं ने मेरे भाई (वासुकि) को आगे करके पितामह ब्रह्मजी के पास जाकर प्रार्थना की।"
ते तं प्रसादयामासुः सुराः सर्वेऽब्जसंभवम्। राज्ञा वासुकिना सार्धं शापोऽसौन भवेदिति।।
हिन्दी: "राजा वासुकि के साथ उन सभी देवताओं ने अब्जसंभव (ब्रह्मजी) को प्रसन्न किया कि माता का वह शाप निष्फल हो जाए।"
देवा ऊचुः — वासुकिर्नागराजोऽयं दुःखितो ज्ञातिकारणात्। अभिशापः स मातुस्तु भगवन्न भवेत्कथम्।।
हिन्दी: देवता बोले — "हे भगवन्! यह नागराज वासुकि अपने ज्ञाति-कुटुंबियों के कारण बहुत दुःखी है। माता का वह अभिशाप किस प्रकार टल सकता है?"
ब्रह्मोवाच — जरत्कारुर्जरत्कारुं यां भार्यां समवाप्स्यति। तत्र जातो द्विजः शापान्मोक्षयिष्यति पन्नगान्।।
हिन्दी: ब्रह्माजी ने कहा — "जरत्कारु नाम के जो मुनि जरत्कारु नामक स्त्री को अपनी पत्नी के रूप में प्राप्त करेंगे, उनसे वहाँ उत्पन्न हुआ द्विज (पुत्र) पन्नगों को उस शाप से मुक्त करा देगा।"
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं वासुकिः पन्नगोत्तमः। प्रादान्माममरप्रख्य तव पित्रे महात्मने।।
हिन्दी: "अमरप्रभ! पन्नगोत्तम वासुकि ने यह वचन सुनकर मुझे तुम्हारे महात्मा पिता को सौंप दिया था।"
प्रागेवानागते काले तस्मात्त्व मय्यजायथाः। अयं स कालः संप्राप्तो भयान्नस्त्रातुमर्हसि।।
हिन्दी: "समय आने से पूर्व ही तुम मुझसे उत्पन्न हुए। अब वही समय आ गया है, अतः तुम इस महान भय से हमारी रक्षा करो।"
भ्रातरं चापि मे तस्मात्त्रातुमर्हसि पावकात्। न मोघं तु कृतं तत्स्याद्यदहं तव धीमते। पित्रे दत्ता विमोक्षार्थं कथं वा पुत्र मन्यसे।।
हिन्दी: "इसलिए तुम मेरे भाई (वासुकि) तथा अन्य नागों को इस पावक (अग्नि) से बचाओ। मैंने जो अपने धीमान पिता को तुम्हारी मुक्ति के लिए दिया था, वह निष्फल न हो, हे पुत्र! तुम इस पर क्या सोचते हो?"
सूतजी बोले — एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वा सास्तीको मातरं तदा। अब्रवीद्दुःखसंतप्तं वासुकिं जीवयन्निव।।
हिन्दी: माता द्वारा ऐसा कहे जाने पर आस्तीक ने 'बहुत अच्छा' कहकर, दुःख से संतप्त नागराज वासुकि को मानो जीवनदान देते हुए कहा—
अहं त्वां मोक्षयिष्यामि वासुके पन्नगोत्तम। तस्माच्छापान्महासत्त्व सत्यमेतद्ब्रवीमि ते।।
हिन्दी: "हे पन्नगोत्तम महासत्त्व वासुकि! मैं तुम्हें उस शाप से अवश्य मुक्त करूँगा। मैं तुमसे यह सत्य कह रहा हूँ।"
भव स्वस्थमना नाग न हि ते विद्यते भयम्। प्रयतिष्ये तथा राजन्यथा श्रेयो भविष्यति।।
हिन्दी: "हे नाग! तुम स्वस्थ मन वाले हो जाओ, अब तुम्हें कोई भय नहीं है। हे राजन्! मैं ऐसा प्रयत्न करूँगा जिससे सबका कल्याण हो।"
न मे वागनृतं प्राह स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा। तं वै नृपवरं गत्वा दीक्षितं जनमेजयम्।।
हिन्दी: "मेरी वाणी साधारण बातचीत में भी कभी असत्य नहीं होती, फिर ऐसी बात में तो सवाल ही नहीं उठता। अब मैं राजा जनमेजय के पास जाकर—"
वाग्भिर्मङ्गलयुक्ताभिस्तोषयिष्येऽद्य मातुल। यथा स यज्ञो नृपतेर्निवत्रिष्यति सत्तम।।
हिन्दी: "हे मामा! आज मंगलमयी वाणी से उन्हें संतुष्ट करूँगा, जिससे हे नृपसत्तम! वह यज्ञ निवृत्त (समाप्त) हो जाएगा।"
स संभावय नागेन्द्र मयि सर्वं महामते। न ते मयि मनो जातु मिथ्या भवितुमर्हति।।
हिन्दी: "हे महामते नागेन्द्र! मुझ पर विश्वास करो, सब कुछ मुझ पर छोड़ दो। मुझ पर तुम्हारा विश्वास कभी मिथ्या नहीं हो सकता।"
वासुकिरुवाच — आस्तीक परिघूर्णामि हृदयं मे विदीर्यते। दिशो न प्रतिजानामि ब्रह्मदण्डनिपीडितः।।
हिन्दी: वासुकि बोले — "हे आस्तीक! मेरा सिर चकरा रहा है, हृदय फटा जा रहा है। ब्रह्मदण्ड से पीड़ित होने के कारण मुझे दिशाएँ नहीं सूझ रही हैं।"
आस्तीक उवाच — न सन्तापस्त्वया कार्यः कथंचित्पन्नगोत्तम। प्रदीप्ताग्नेः समुत्पन्नं नाशयिष्यामि ते भयम्।।
हिन्दी: आस्तीक ने कहा — "हे पन्नगोत्तम! तुम्हें किसी प्रकार का संताप नहीं करना चाहिए। प्रज्वलित अग्नि से उत्पन्न तुम्हारे इस भय का मैं नाश करूँगा।"
ब्रह्मदण्डं महाघोरं कालाग्निसमतेजसम्। नाशयिष्यामि माऽत्र त्वं भयंकार्षीः कथंचन।।
हिन्दी: "कालाग्नि के समान तेज वाले इस महाघोर ब्रह्मदण्ड को मैं समाप्त करूँगा, तुम यहाँ किसी भी प्रकार का भय मत करो।"
सूतजी बोले — ततः स वासुकेर्घोरमपनीय मनोज्वरम्। आधाय चात्मनोऽङ्गेषु जगाम त्वरितो भृशम्।।
हिन्दी: तब वासुकि के उस घोर मानसिक ज्वर को दूर करके और उन्हें अपने अंगों (आश્વાસन) से तृप्त कर आस्तीक अत्यधिक वेग से चल पड़े।
जनमेजयस्य तं यज्ञं सर्वैः समुदितं गुणैः। मोक्षाय भुजगेन्द्राणामास्तीको द्विजसत्तमः।।
हिन्दी: भुजगेन्द्रों की मुक्ति के लिए द्विजसत्तम आस्तीक जनमेजय के उस समस्त गुणों से युक्त यज्ञ की ओर चल दिए।
स गत्वाऽपश्यदास्तीको यज्ञायतनमुत्तमम्। वृतं सदस्यैर्बहुभिः सूर्यवह्निसमप्रभैः।।
हिन्दी: वहाँ पहुँचकर आस्तीक ने सूर्य और अग्नि के समान कांति वाले अनेक सदस्यों से घिरे हुए उस उत्तम यज्ञायतन (यज्ञशाला) को देखा।
स तत्र वारितो द्वास्थैः प्रविशन्द्विजसत्तमः। अभितुष्टाव तं यज्ञं प्रवेशार्थी परंतपः।।
हिन्दी: द्वारपालों द्वारा रोके जाने पर भी प्रवेश की इच्छा रखने वाले उन परंतप द्विजसत्तम ने यज्ञशाला में प्रवेश करते हुए उस यज्ञ की स्तुति की।
स प्राप्य यज्ञायतनं वरिष्ठं द्विजोत्तमः पुण्यकृतां वरिष्ठः। तुष्टाव राजानमनन्तकीर्ति- मृत्विक्सदस्यांश्च तथैव चाग्निम्।।
हिन्दी: पुण्यवानों में श्रेष्ठ और द्विजोत्तम आस्तीक ने उस वरिष्ठ यज्ञायतन को प्राप्त करके, अनंत कीर्ति वाले राजा, ऋत्विजों, सदस्यों तथा अग्निदेव की स्तुति की।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
आस्तीकपर्वणि चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः।। 54 ।।
