श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः

मूल एवं संदर्भ

उपर्युक्त श्लोक महाभारत के आदिपर्व के अन्तर्गत चतुःषष्टितम (64वें) अध्याय से लिए गए हैं। इसे 'उपरिचरराजोपाख्यानम्' या 'संभवपर्व' का अंश माना जाता है, जिसमें चेदिराज वसु (उपरिचर वसु) के उपाख्यान, इन्द्रध्वजोत्सव, सत्यवती और पराशर के मिलन से वेदव्यास के जन्म तथा कुरुवंश के प्रमुख पात्रों के जन्म का विस्तृत वर्णन किया गया है।

अध्याय के मुख्य प्रसंग एवं कथासार

  • उपरिचर वसु का चेदि राज्य ग्रहण: इन्द्र के उपदेश से राजा वसु ने धर्मपूर्वक चेदि देश का शासन संभाला। आकाश में विचरने वाले स्फटिक विमान और 'वैजयन्ती माला' तथा 'वैणवी यष्टि' (इन्द्रध्वज) उपहारस्वरूप प्राप्त की।
  • इन्द्रध्वजोत्सव का प्रारंभ: राजा वसु द्वारा इन्द्र की पूजा और प्रसन्नता हेतु भूमि पर ध्वजोत्सव (इन्द्रोत्सव) का आरंभ किया गया, जिसकी परंपरा आज भी राजाओं द्वारा पालिता है।
  • गिरिका के साथ विवाह एवं यमुना नदी का प्रसंग: राजा वसु की पत्नी गिरिका के ऋतुकाल के समय मृगया (शिकार) के दौरान राजा का वीर्यस्खलन हो जाने पर, उन्होंने श्येन पक्षी के माध्यम से उसे रानी के पास भिजवाया। रास्ते में दूसरे श्येन से युद्ध होने के कारण वीर्य यमुना नदी में गिर गया।
  • मत्स्यगंधा (सत्यवती) और वेदव्यास का जन्म: यमुना में गिरे वीर्य को ब्रह्मशापवश मत्स्य रूप में रह रही अप्सरा 'अद्रिका' ने ग्रहण किया। दसवें महीने में मछुआरों द्वारा पकड़ी गई उस मछली के पेट से एक स्त्री (सत्यवती) और एक पुरुष (मत्स्यराज) उत्पन्न हुए। कन्या को दाशराज (मछुआरों के राजा) ने पाला, जो बाद में 'मत्स्यगंधा' और योजनागंधा कहलाई। ऋषि पराशर के साथ उनके संयोग से यमुना द्वीप पर वेदव्यास (द्वैपायन) का जन्म हुआ।
  • भीष्मादीनां जन्मवृत्तान्त: अध्याय के अंत में भीष्म, विदुर (धर्म के अंश से), कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, धृतराष्ट्र, पाण्डु, पाण्डव (युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव) तथा कौरवों के जन्म का संक्षिप्त परिचय दिया गया है।

राजोपरिचरोपाख्यानम् (महाभारत आदिपर्व, अध्याय 64)

वैशंपायन उवाच। वैशंपायनजी ने कहा— राजोपरिचरो नाम धर्मनित्यो महीपतिः। बभूव मृगयाशीलः शश्वत्स्वाध्यायवाञ्छुचिः।। (1-64-1) धर्मनिष्ठ, सदा स्वाध्याय करने वाले और पवित्र राजा उपरिचर (वसु) आखेट (शिकार) खेलने के शौकीन थे।

स चेदिविषयं रम्यं वसुः पौरवनन्दनः। इन्द्रोपदेशाज्जग्राह रमणीयं महीपतिः।। (1-64-2) कुरुवंशी राजा वसु, इन्द्र के उपदेश से उस रमणीय चेदि देश को अपनी राजधानी बनाकर वहाँ राज्य करने लगे।

तमाश्रमे न्यस्तशस्त्रं निवसन्तं तपोनिधिम्। देवाः शक्रपुरोगा वै राजानमुपतस्थिरे।। (1-64-3) तदनन्तर, आश्रम में अस्त्र-शस्त्र त्यागकर तपस्या में लीन बैठे हुए उन तपोनिधि राजा के पास इन्द्र को आगे करके सभी देवता उपस्थित हुए।

इन्द्रत्वमर्हो राजायं तपसेत्यनुचिन्त्य वै। तं सान्त्वेन नृपं साक्षात्तपसः संन्यवर्तयन्।। (1-64-4) देवताओं ने विचार किया कि 'यह राजा तपस्या के कारण इन्द्र पद के योग्य हो रहा है', इसलिए उन्होंने सांत्वना देकर उन राजा को तपस्या से निवृत्त किया।

देवा ऊचुः। देवताओं ने कहा— न संकीर्येत धर्मोऽयं पृथिव्यां पृथिवीपते। त्वया हि धर्मो विधृतः कृत्स्नं धारयते जगत्।। (1-64-5) हे पृथिवीनाथ! पृथ्वी पर यह धर्म नष्ट न होने पावे। आपने ही धर्म को धारण कर रखा है और यही धर्म समस्त जगत् का पोषण करता है।

इन्द्र उवाच। इन्द्र ने कहा— `देवानहं पालयिता पालय त्वं हि मानुषान्।' लोके धर्मं पालय त्वं नित्ययुक्तः समाहितः। धर्मयुक्तस्ततो लोकान्पुण्यान्प्राप्स्यसि शाश्वतान्।। (1-64-6) 'मैं देवताओं का पालन करने वाला हूँ, तुम मनुष्यों का पालन करो।' लोक में सदा सावधान और युक्त होकर धर्म का पालन करो। धर्मयुक्त होकर तुम सनातन पुण्य लोकों को प्राप्त करोगे।

दिविष्ठस्य भुविष्ठस्त्वं सखाभूतो मम प्रियः। ऊधः पृथिव्या यो देशस्तमावस नराधिप।। (1-64-7) स्वर्ग में रहने वाले मेरे तुम पृथ्वी पर रहने वाले प्रिय सखा हो। हे नराधिप! पृथ्वी का जो ऊर्ध्व भाग (श्रेष्ठ देश) है, उस पर निवास करो।

पशव्यश्चैव पुण्यश्च प्रभूतधनधान्यवान्। स्वारक्ष्यश्चैव सौम्यश्च भोग्यैर्भूमिगुणैर्युतः।। (1-64-8) वह देश पशुओं से युक्त, पवित्र, प्रचुर धन-धान्य से सम्पन्न, आसानी से रक्षित होने वाला, सौम्य और भूमि के सभी भोग्य गुणों से युक्त है।

अर्थवानेष देशो हि धनरत्नादिभिर्युतः। वसुपूर्णा च वसुधा वस चेदिषु चेदिप।। (1-64-9) वह देश धन, रत्नों और वसु (धन) से पूर्ण है। हे चेदिराज! इसलिए तुम चेदि देश में निवास करो।

धर्मशीला जनपदाः सुसंतोषाश्च साधवः। न च मिथ्या प्रलापोऽत्र स्वैरेष्वपि कुतोऽन्यथा।। (1-64-10) वहाँ के लोग धर्मशील, अत्यधिक संतुष्ट और साधुस्वभाव के हैं। वहाँ स्वप्न में भी कोई झूठी बात नहीं बोलता, फिर जागने में तो बात ही क्या है!

न च पित्रा विभज्यन्ते पुत्रा गुरुहिते रताः। युञ्जते धुरि नो गाश्च कृशान्संधुक्षयन्ति च।। (1-64-11) वहाँ गुरुओं के हित में तत्पर रहने वाले पुत्र पिता से अपनी संपत्ति का बँटवारा नहीं चाहते। वे बैलों को जुए में जोतते हैं और कृश (कमजोर) अग्नि को प्रदीप्त करते हैं।

सर्वे वर्णाः स्वधर्मस्थाः सदा चेदिषु मानद। न तेऽस्त्यविदितं किंचित्त्रिषु लोकेषु यद्भवेत्।। (1-64-12) हे मान देने वाले! चेदि देश में सभी वर्ण सदा अपने-अपने धर्म में तत्पर रहते हैं। तीनों लोकों में ऐसा कुछ भी नहीं है जो तुम्हारे लिए अज्ञात हो।

दैवोपभोग्यं दिव्यं त्वामाकाशे स्फाटिकं महत्। आकाशगं त्वां मद्दत्तं विमानमुपपत्स्यते।। (1-64-13) देवताओं द्वारा उपभोग करने योग्य, आकाश में चलने वाला, स्फटिक (मणि) का बना हुआ मेरा यह महान् दिव्य विमान तुम्हें प्राप्त होगा।

त्वमेकः सर्वमर्त्येषु विमानवरमास्थितः। चरिष्यस्युपरिस्थो हि देवो विग्रहवानिव।। (1-64-14) तुम समस्त मनुष्यों में अकेले ऐसे होगे जो श्रेष्ठ विमान पर बैठकर किसी विग्रहवान् (साक्षात्) देवता की भाँति आकाश में ऊपर विचरण करोगे।

ददामि ते वैजयन्तीं मालामम्लानपङ्कजाम्। धारयिष्यति सङ्ग्रामे या त्वां शस्त्रैरविक्षतम्।। (1-64-15) मैं तुम्हें कभी न कुम्हलाने वाले कमलों की बनी वैजयन्ती माला देता हूँ, जो युद्ध में अस्त्र-शस्त्रों से तुम्हारी रक्षा करेगी और तुम पर कोई घाव नहीं होने देगी।

लक्षणं चैतदेवेह भविता ते नराधिप। इन्द्रमालेति विख्यातं धन्यमप्रतिमं महत्।। (1-64-16) हे नराधिप! यह इन्द्रमाला के नाम से विख्यात, धन्य, अप्रतिम और महान् लक्षण तुम्हारे लिए होगा।

यष्टिं च वैणवीं तस्मै ददौ वृत्रनिषूदनः। इष्टप्रदानमुद्दिश्य शिष्टानां प्रतिपालिनीम्।। (1-64-17) वृत्रासुर का नाश करने वाले इन्द्र ने कामनाओं को पूर्ण करने वाली और शिष्ट जनों का पालन करने वाली एक बाँस की यष्टि (ध्वजादण्ड) भी उन्हें दी।

`एवं संसान्त्व्य नृपतिं तपसः संन्यवर्तयत्। प्रययौ दैवतैः सार्धं कृत्वा कार्यं दिवौकसाम्।। (1-64-18) इस प्रकार राजा को समझा-बुझाकर और तपस्या से निवृत्त करके, देवताओं का कार्य पूरा कर इन्द्र देवताओं के साथ प्रस्थान कर गए।

ततस्तु राजा चेदीनामिन्द्राभरणभूषितः। इन्द्रदत्तं विमानं तदास्थाय प्रययौ पुरीम्।।' (1-64-19) तदनन्तर इन्द्र के आभूषणों से भूषित चेदिराज वसु इन्द्र के दिए हुए विमान पर सवार होकर अपनी पुरी की ओर चल पड़े।

तस्याः शक्रस्य पूजार्थं भूमौ भूमिपतिस्तदा। प्रवेशं कारयामास सर्वोत्सववरं तदा।। (1-64-20) तब उस भूमिपति ने पृथ्वी पर इन्द्र की पूजा के लिए उस समय समस्त उत्सवों में श्रेष्ठ एक महान् प्रवेशोत्सव (ध्वजारोहण उत्सव) का आयोजन कराया।

`मार्गशीर्षे महाराज पूर्वपक्षे महामखम्। ततःप्रभृति चाद्यापि यष्टेः क्षितिपसत्तमैः।।' (1-64-21) हे महाराज! क्षत्रियश्रेष्ठों द्वारा तब से लेकर आज तक मार्गशीर्ष (अगहन) मास के शुक्ल पक्ष में उस यष्टि (इन्द्रध्वज) की स्थापना की जाती है।

प्रवेशः क्रियते राजन्यथा तेन प्रवर्तितः। अपरेद्युस्ततस्तस्याः क्रियतेऽत्युच्छ्रयो नृपैः।। (1-64-22) हे राजन्! उनके द्वारा जिस प्रकार प्रारंभ किया गया था, उसी प्रकार आज भी उत्सव का प्रवेश कराया जाता है। इसके दूसरे दिन राजाओं द्वारा उस यष्टि को अत्यंत ऊँचा उठाया जाता है।

अलङ्कृताया पिटकैर्गन्धमाल्यैश्च भूषणैः। `माल्यदामपरिक्षिप्तां द्वात्रिंशत्किष्कुसंमिताम्।। (1-64-23) गंध, मालाओं, आभूषणों और पिटकों (टोकरियों) से अलंकृत तथा मालाओं के दाम से घिरी हुई बत्तीस हाथ लंबी...

उद्धृत्य पिटके चापि द्वादशारत्निकोच्छ्रये। महारजनवासांसि परिक्षिप्य ध्वजोत्तमम्।। (1-64-24) टोकरी में रखकर तथा बारह हाथ ऊँचे स्थान पर खड़े करके, उस सर्वोत्तम ध्वज के चारों ओर पीले रंग के वस्त्र लपेटे जाते हैं।

वासोभिरन्नपानैश्च पूजितैर्ब्राह्मणर्षभैः। पुण्याहं वाचयित्वाथ ध्वज उच्छ्रियते तदा।। (1-64-25) वस्त्रों, अन्न और जल से पूजित श्रेष्ठ ब्राह्मणों द्वारा पुण्याहवाचन कराकर उस समय ध्वज को ऊपर उठाया जाता है।

शङ्खभेरीमृदङ्गैश्च संनादः क्रियते तदा'। भगवान्पूज्यते चात्र यष्टिरूपेण वासवः।। (1-64-26) उस समय शंख, भेरी और मृदंगों की गूँज की जाती है। यहाँ यष्टिके रूप में भगवान् वासव (इन्द्र) की पूजा की जाती है।

स्वयमेव गृहीतेन वसोः प्रीत्या महात्मनः। `माणिभद्रादयो यक्षाः पूज्यन्ते दैवतैः सह।। (1-64-27) महात्मा वसु के प्रेमपूर्वक स्वयं ग्रहण किए जाने पर देवताओं के साथ मणिभद्र आदि यक्षों की भी पूजा की जाती है।

नानाविधानि दानानि दत्त्वार्थिभ्यः सुहृज्जनैः। अलङ्कृत्वा माल्यदामैर्वस्त्रैर्नानाविधैस्तथा।। (1-64-28) सुह्वृजनों के साथ याचियों को नाना प्रकार के दान देकर, मालाओं, विभिन्न प्रकार के वस्त्रों और आभूषणों से सजाकर...

दृतिभिः सजलैः सर्वैः क्रीडित्वा नृपशासनात्। सभाजयित्वा राजानं कृत्वा नर्माश्रयाः कथाः।। (1-64-29) राजा की आज्ञा से जल से भरे हुए चर्मपात्रों (मशकों) के साथ क्रीड़ा करके, राजा का अभिनंदन करके और हँसी-मज़ाक की कथाएँ करके...

रमन्ते नागराः सर्वे तथा जानपदैः सह। सूताश्च मागधाश्चैव रमन्ते नटनर्तकाः।। (1-64-30) नगर के सभी लोग तथा जनपदवासी (गाँव के लोग) आनंद मनाते हैं। सूत, मागध, नट और नर्तक भी खूब आनंद लेते हैं।

प्रीत्या तु नृपशार्दूल सर्वे चक्रुर्महोत्सवम्। सान्तःपुरः सहामात्यः सर्वाभरणभूषितः।। (1-64-31) नृपशार्दूल! प्रेमवश सभी ने अंतःपुर और मंत्रियों के साथ, समस्त आभूषणों से सजकर महान् उत्सव मनाया।

महारजनवासांसि वसित्वा चेदिराट् तदा। जातिहिङ्गुलकेनाक्तः सदारो मुमुदे तदा।। (1-64-32) पीले रंग के वस्त्र पहनकर, शरीर पर लाल रंग (हिङ्गुल) का लेप करके चेदिराज ने उस समय अपनी पत्नी के साथ आनंद मनाया।

एवं जानपदाः सर्वे चक्रुरिन्द्रमहं वसुः।।' यथा चेदिपतिः प्रीतश्चकारेन्द्रमहं वसुः।।' (1-64-33) इस प्रकार सभी जनपदवासियों ने इन्द्र का महान् उत्सव किया, जैसे चेदिपति वसु ने प्रेमपूर्वक इन्द्रोत्सव मनाया था।

एतां पूजां महेन्द्रस्तु दृष्ट्वा वसुकृतां शुभाम्। `हरिभिर्वाजिभिर्युक्तमन्तरिक्षगतं रथम्।। (1-64-34) वसु द्वारा की गई इस शुभ इन्द्रपूजा को देखकर महेन्द्र (इन्द्र) ने...

आस्थाय सह शच्या च वृतो ह्यप्सरसां गणैः।' वसुना राजमुख्येन समागम्याब्रवीद्वचः।। (1-64-35) घोड़ों से युक्त और आकाश में चलने वाले अपने रथ पर शची और अप्सराओं के गणों से घिरे हुए सवार होकर, श्रेष्ठ राजा वसु के पास आकर ये वचन कहे—

ये पूजयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिर्नृपः। कारयिष्यन्ति च मुदा यथा चेदिपतिर्नृपः।। (1-64-36) जो लोग चेदिपति राजा की तरह प्रसन्नतापूर्वक इस उत्सव की पूजा करेंगे और इसे आयोजित करेंगे...

तेषां श्रीर्विजयश्चैव सराष्ट्राणां भविष्यति। तथा स्फीतो जनपदो मुदितश्च भविष्यति।। (1-64-37) उनको तथा उनके राष्ट्र को श्री (समृद्धि) और विजय प्राप्त होगी। इसी प्रकार उनका जनपद भी समृद्ध और प्रसन्न रहेगा।

`निरीतिकानि सस्यानि भवन्ति बहुधा नृप। राक्षसाश्च पिशाचाश्च न लुम्पन्ते कथंचन।। (1-64-38) हे नृप! (इस उत्सव के प्रभाव से) फसलें उपद्रवरहित और प्रचुर मात्रा में उत्पन्न होती हैं। राक्षस और पिशाच किसी भी प्रकार से उपद्रव नहीं कर पाते।

वैशंपायन उवाच। वैशंपायनजी ने कहा— एवं महात्मना तेन महेन्द्रेण नराधिप। वसुः प्रीत्या मघवता महाराजोऽभिसत्कृतः। एवं कृत्वा महेन्द्रस्तु जगाम स्वं निवेशनम्।। (1-64-39) हे नराधिप! इस प्रकार महात्मा मघवा (इन्द्र) ने प्रेमपूर्वक उन महाराज वसु का सत्कार किया। ऐसा करके महेन्द्र अपने निवासस्थान को चले गए।

उत्सवं कारयिष्यन्ति सदा शक्रस्य ये नराः। भूमिरत्नादिभिर्दानैस्तथा पूज्या भवन्ति ते। वरदानमहायज्ञैस्तथा शक्रोत्सवेन च।। (1-64-40) जो मनुष्य सदा इन्द्र के इस उत्सव को करवाएंगे, वे भूमि, रत्न आदि के दान से तथा वरदान, महायज्ञ और इन्द्रोत्सव के द्वारा पूजनीय होते हैं।

संपूजितो मघवता वसुश्चेदीश्वरो नृपः। पालयामास धर्मेण चेदिस्थः पृथिवीमिमाम्।। (1-64-41) इन्द्र द्वारा सम्मानित चेदीश्वर राजा वसु चेदि देश में रहकर धर्मपूर्वक इस पृथ्वी का पालन करने लगे।

इन्द्रपीत्या चेदिपतिश्चकारेन्द्रमहं वसुः। पुत्राश्चास्य महावीर्याः पञ्चासन्नमितौजसः।। (1-64-42) इन्द्र की प्रीति के लिए चेदिपति वसु ने इन्द्रोत्सव किया था। उनके महाबली और अपरिमित ओजस्वी पाँच पुत्र हुए।

नानाराज्येषु च सुतान्स सम्राडभ्यषेचयत्। महारथो मागधानां विश्रुतो यो बृहद्रथः।। (1-64-43) सम्राट् वसु ने अपने उन पुत्रों का अलग-अलग राज्यों में अभिषेक किया। उनमें मागध देश के महारथी और प्रसिद्ध पुत्र बृहद्रथ थे।

प्रत्यग्रहः कुशाम्बश्च यमाहुर्मणिवाहनम्। मत्सिल्लश्च यदुश्चैव राजन्यश्चापराजितः।। (1-64-44) दूसरे प्रत्यग्रह, तीसरे कुशाम्ब जिन्हें मणिवाहन कहा जाता है, चौथे मत्सिल्ल, पाँचवें यदु और अपराजित राजन्य थे।

एते तस्य सुता राजन्राजर्षेर्भूरितेजसः। न्यवेशयन्नामभिः स्वैस्ते देशांश्च पुराणि च।। (1-64-45) हे राजन्! राजर्षि वसु के ये अत्यधिक तेजस्वी पुत्र हुए। उन सबने अपने-अपने नाम से देशों और नगरों की स्थापना की।

वासवाः पञ्च राजानः पृथग्वंशाश्च शास्वताः। वसन्तमिन्द्रप्रासादे आकाशे स्फाटिके च तम्।। (1-64-46) वे पाँचों राजा वासव (इन्द्र) के वंशज कहलाए और उनके अलग-अलग शाश्वत वंश चले। आकाश में स्फटिक के बने इन्द्र के महल में निवास करते हुए...

उपतस्थुर्महात्मानं गन्धर्वाप्सरसो नृपम्। राजोपरिचरेत्येवं नाम तस्याथ विश्रुतम्।। (1-64-47) गन्धर्व और अप्सराएँ उस महाआत्मा राजा की सेवा करती थीं। इसीलिए उनका नाम 'राजोपरिचर' इस प्रकार विख्यात हुआ।

पुरोपवाहिनीं तस्य नदीं शुक्तमतीं गिरिः। अरौत्सीच्चेतनायुक्तः कामात्कोलाहलः किल।। (1-64-48) कहा जाता है कि उनकी राजधानी के पास बहने वाली शुक्तिमती नदी को कोलाहल नामक पर्वत ने सचेतन होकर कामवश रोक लिया था (उसका मार्ग अवरुद्ध कर दिया था)।

गिरिं कोलाहलं तं तु पदा वसुरताडयत्। निश्चक्राम ततस्तेन प्रहारविवरेण सा।। (1-64-49) तब राजा वसु ने अपने पैरों से उस कोलाहल पर्वत पर प्रहार किया। उस प्रहार से बने छिद्र (मार्ग) से वह नदी बाहर निकल आई।

तस्यां नद्यां स जनयन्मिथुनं पर्वतः स्वयम्। तस्माद्विमोक्षणात्प्रीता नदी राज्ञे न्यवेदयत्।। (1-64-50) उस पर्वत ने उस नदी में एक मिथुन (जुड़वाँ भाई-बहन) को उत्पन्न किया। कोलाहल के बंधन से मुक्त होने पर प्रसन्न हुई उस नदी ने राजा से निवेदन किया—

`महिषी भविता कन्या पुमान्सेनापतिर्भवेत्। शुक्तिमत्या वचःश्रुत्वा दृष्ट्वा तौ राजसत्तमः'।। (1-64-51) "कन्या आपकी महिषी (रानी) होगी और पुत्र सेनापति होगा।" शुक्तिमती नदी के ये वचन सुनकर और उन दोनों बालकों को देखकर राजसत्तम वसु ने...

यः पुमानभवत्तत्र तं स राजर्षिसत्तमः। वसुर्वसुप्रदश्चक्रे सेनापतिमरिन्दमः।। (1-64-52) वहाँ जो पुत्र हुआ था, उन अरिन्दम राजर्षिसत्तम वसु (जो धन देने वाले थे) ने उसे अपना सेनापति बना लिया।

चकार पत्नीं कन्यां तु तथा तां गिरिकां नृपः। वसोः पत्नी तु गिरिका कामकालं न्यवेदयत्।। (1-64-53) और उस कन्या गिरिका को राजा ने अपनी पत्नी बना लिया। राजा वसु की पत्नी गिरिका ने (एक दिन) अपने ऋतुकाल (संगम का समय) की सूचना दी।

ऋतुकालमनुप्राप्ता स्नाता पुंसवने शुचिः। तदहः पितरश्चैनपूचुर्जहि मृगानिति।। (1-64-54) ऋतुकाल को प्राप्त हुई, स्नान करके पुंसवन संस्कार से पवित्र हुई गिरिका के पास जाने के लिए जब राजा उद्यत हुए, उसी दिन उनके पितरों ने उनसे कहा—"जाओ, जाकर मृगों (शिकार) का वध करो।"

तं राजसत्तमं प्रीतास्तदा मतिमतां वरः। स पितॄणां नियोगेन तामतिक्रम्य पार्थिवः।। (1-64-55) बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उन राजसत्तम राजा से पितरों ने प्रेमपूर्वक ऐसा कहा था। इसलिए पितरों की आज्ञा का पालन करने के लिए वे पार्थिव (राजा) अपनी पत्नी (गिरिका के पास जाने) के नियम को लाँघकर...

चकार मृगयां कामी गिरिकामेव संस्मरन्। अतीव रूपसंपन्नां साक्षाच्छ्रियमिवापराम्।। (1-64-56) अतिशय रूपसंपन्न और साक्षात् दूसरी लक्ष्मी जैसी प्रतीत होने वाली गिरिका का ही स्मरण करते हुए कामतुर राजा शिकार खेलने लगे।

अशोकैश्चम्पकैश्चूतैरनेकैरतिमुक्तकैः। पुन्नागैः कर्णिकारैश्च बकुलैर्दिव्यपाटलैः।। (1-64-57) अशोक, चंपा, अनेक आम के वृक्षों, माधवी लता, पुन्नाग, कर्णिकार, बकुल और दिव्य पाटला (पाटल के फूलों)...

पनसैर्नारिकेलैश्च चन्दनैश्चार्जुनैस्तथा। एतै रम्यैर्महावृक्षैः पुण्यैः स्वादुफलैर्युतम्।। (1-64-58) कटहल, नारियल, चंदन और अर्जुन आदि सुंदर, पवित्र तथा स्वादिष्ट फलों वाले महावृक्षों से सुयुक्त...

कोकिलाकुलसन्नादं मत्तभ्रमरनादितम्। वसन्तकाले तत्पश्यन्वनं चैत्ररथोपमम्।। (1-64-59) कोकिलों के समूहों की गूँज और मतवाले भंवरों के गुंजार से युक्त, चैत्ररथ (कुबेर के उद्यान) के समान उस वन को वसंत काल में देखते हुए...

मन्मथाभिपरीतात्मा नापश्यद्गिरिकां तदा। अपश्यन्कामसंतप्तश्चरमाणो यदृच्छया।। (1-64-60) कामदेव से पीड़ित हृदय वाले राजा को उस समय गिरिका दिखाई नहीं दी। काम से संतप्त होकर यदृच्छया (स्वेच्छा से) घूमते हुए उन्होंने...

पुष्पसंछन्नशाखाग्रं पल्लवैरुपशोभितम्। अशोकस्तबकैश्छन्नं रमणीयमपश्यत।। (1-64-61) फूलों से ढके हुए शाखाओं के अग्रभाग और नए पल्लवों से सुशोभित तथा अशोक के गुच्छों से आच्छादित एक अत्यंत रमणीय स्थान देखा।

अधस्यात्तस्य छायायां सुखासीनो नराधिपः। मधुगन्धैश्च संयुक्तं पुष्पगन्धमनोहरम्।। (1-64-62) उस वृक्ष की छाया के नीचे नराधिप सुखपूर्वक बैठ गए। वह स्थान मधु (मकरंद) की सुगंध और फूलों की सुगंध से मनोहर था।

वायुना प्रेर्यमाणस्तु धूम्राय मुदमन्वगात्। `भार्यां चिन्तयमानस्य मन्मथाग्निरवर्धत।' तस्य रेतः प्रचस्कन्द चरतो गहने वने।। (1-64-63) वायु द्वारा प्रेरित होकर वह काम-आनंद का अनुभव करने लगे। अपनी पत्नी का चिंतन करते हुए उनके मन में काम-अग्नि और बढ़ गई। उस सघन वन में विचरण करते हुए उनका वीर्यपात हो गया।

स्कन्नमात्रं च तद्रेतो वृक्षपत्रेण भूमिपः। प्रतिजग्राह मिथ्या मे न पतेद्रेत इत्युत।। (1-64-64) गिरते ही भूमिप (राजा) ने यह सोचकर कि "मेरा यह वीर्य व्यर्थ न गिरे", उसे एक वृक्ष के पत्ते पर तुरंत थाम लिया।

`अङ्गुलीयेन शुक्लस्य रक्षां च विदधे नृपः। अशोकस्तबकै रक्तैः पल्लवैश्चाप्यबन्धयत्।।' (1-64-65) राजा ने अपनी अंगूठी से उस श्वेत वीर्य (शुक्र) की रक्षा की व्यवस्था की और लाल अशोक के गुच्छों तथा पल्लवों से उसे बाँध दिया।

इदं मिथ्या परिस्कन्नं रेतो मे न भवेदिति। ऋतुश्च तस्याः पत्न्या मे न मोघः स्यादिति प्रभुः।। (1-64-66) प्रभु (राजा) ने बार-बार यह विचार किया कि "मेरा यह वीर्य इस प्रकार व्यर्थ न जाए और मेरी पत्नी का यह ऋतुकाल व्यर्थ न हो।"

संचिन्त्यैवं तदा राजा विचार्य च पुनःपुनः। अमोघत्वं च विज्ञाय रेतसो राजसत्तमः।। (1-64-67) इस प्रकार भली-भांति सोच-विचार कर और अपने वीर्य की अमोघ शक्ति (व्यर्थ न जाने की क्षमता) को जानकर राजसत्तम ने...

शुक्रप्रस्थापने कालं महिष्या प्रसमीक्ष्य वै। अभिमन्त्र्याथ तच्छुक्रमारात्तिष्ठन्तमाशुगम्।। (1-64-68) अपनी पटरानी के पास वीर्य भेजने का समय उचित समझकर, उस शुक्र को अभिमंत्रित करके, निकट ही बैठे हुए एक वेगवान्...

सूक्ष्मधर्मार्थतत्त्वज्ञो गत्वा श्येनं ततोऽब्रवीत्। मत्प्रियार्थमिदं सौम्य शुक्रं मम गृहं नय।। (1-64-69) सूक्ष्म धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले राजा ने एक बाज (श्येन पक्षी) के पास जाकर कहा—"हे सौम्य! मेरी प्रियतमा (गिरिका) को प्रसन्न करने के लिए इस मेरे वीर्य को शीघ्र मेरे घर ले जाओ।"

गिरिकायाः प्रयच्छाशु तस्या ह्यार्तवमद्य वै। और आज ही उसे गिरिका के ऋतुकाल (संगम के समय) में उसे प्रदान कर दो।

वैशंपायन उवाच। वैशंपायनजी ने कहा— गृहीत्वा तत्तदा श्येनस्तूर्णमुत्पत्य वेगवान्।। जवं परममास्थाय प्रदुद्राव विहंगमः। तमपश्यदथायान्तं श्येनं श्येनस्तथाऽपरः।। (1-64-70, 71) वह वेगवान् बाज उस वीर्य को लेकर तुरंत ऊपर उड़ गया और परम वेग धारण करके तेजी से भागा। उसे आते हुए देखकर दूसरा बाज भी...

अभ्यद्रवच्च तं सद्यो दृष्ट्वैवामिषशङ्कया। तुण्डयुद्धमथाकाशे तावुभौ संप्रचक्रतुः।। (1-64-72) मांस का टुकड़ा (शिकार) होने की आशंका से तुरंत उसकी ओर झपटा और आकाश में उन दोनों ने चोंचों से आपस में युद्ध करना शुरू कर दिया।

युद्ध्यतोरपतद्रेतस्तच्चापि यमुनाम्भसि। तत्राद्रिकेति विख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सरा।। (1-64-73) युद्ध करते हुए उन दोनों का वह वीर्य यमुना के जल में गिर गया। वहाँ ब्रह्मशॉप के कारण श्रेष्ठ अप्सरा 'अद्रिका' विख्यात...

मीनभावमनुप्राप्ता बभूव यमुनाचरी। श्येनपादपरिभ्रष्टं तद्वीर्यमथ वासवम्।। (1-64-74) मछली का रूप प्राप्त करके यमुना में निवास करती थी। बाज के पैरों से छूकर गिरे हुए उस इन्द्र-संबंधी (राजकीय) वीर्य को...

जग्राह तरसोपेत्य साऽद्रिका मत्स्यरूपिणी। कदाचिदपि मत्सीं तां बबन्धुर्मत्स्यजीविनः।। (1-64-75) मछली का रूप धारण करने वाली उस अद्रिका ने वेग से पास जाकर ग्रहण कर लिया। कभी उन मछली पकड़ने वालों ने उस मछली को पकड़ लिया।

मासे च दशमे प्राप्ते तदा भरतसत्तम।। उज्जह्रुरुदरात्तस्याः स्त्रीं पुमांसं च मानुषौ।। (1-64-76) हे भरतश्रेष्ठ! दस महीने पूरे होने पर उन्होंने उसके पेट से एक स्त्री और एक पुरुष—दो मनुष्य रूपी बालकों को बाहर निकाला।

आश्चर्यभूतं तद्गत्वा राज्ञेऽथ प्रत्यवेदयन्। काये मत्स्या इमौ राजन्संभूतौ मानुषाविति।। (1-64-77) आश्चर्यचकित होकर उन्होंने राजा के पास जाकर निवेदन किया—"हे राजन्! मछली के शरीर में ये दोनों मनुष्य रूपी बालक उत्पन्न हुए हैं।"

तयोः पुमांसं जग्राह राजोपरिचरस्तदा। स मत्स्यो नाम राजासीद्धार्मिकः सत्यसङ्गरः।। (1-64-78) तब राजोपरिचर वसु ने उनमें से पुत्र (बालक) को ले लिया। वे ही धार्मिक और सत्यप्रतिज्ञ 'मत्स्य' नामक राजा हुए।

साऽप्सरा मुक्तशापा च क्षणेन समपद्यत। या पुरोक्ता भगवता तिर्यग्योनिगता शुभा।। (1-64-79) वह अप्सरा शाप से मुक्त होकर एक ही क्षण में अपनी दिव्य योनि को प्राप्त हो गई, जिसके विषय में भगवान (ब्रह्माजी) ने पहले कहा था कि पशु-योनि में गई हुई वह शुभ...

मानुषौ जनयित्वा त्वं शापमोक्षमवाप्स्यसि। ततः साजनयित्वा तौ विशस्ता मत्स्यघातिभिः।। (1-64-80) "मनुष्यों को जन्म देकर तुम शाप से मुक्त हो जाओगी।" त्रेता आदि में उन दोनों को जन्म देकर, मछुओं द्वारा काटे जाने पर...

संत्यज्य मत्स्यरूपं सा दिव्यं रूपमवाप्य च। सिद्धर्षिचारणपथं जगामाथ वराप्सराः।। (1-64-81) वह श्रेष्ठ अप्सरा मछली का रूप त्यागकर और दिव्य रूप प्राप्त करके सिद्धों, ऋषियों तथा चारणों के मार्ग से स्वर्ग को चली गई।

सा कन्या दुहिता तस्या मत्स्या मत्स्यसगन्धिनी। राज्ञा दत्ता च दाशाय कन्येयं ते भवत्विति।। (1-64-82) मछली के पेट से उत्पन्न हुई वह कन्या उस मत्स्यराज की पुत्री थी, जिसके शरीर से मछली जैसी गंध आती थी। राजा ने उसे दाशराज (मछुओं के सरदार) को यह कहकर दे दिया कि "यह कन्या तुम्हारी पुत्री हो।"

रूपसत्वसमायुक्ता सर्वैः समुदिता गुणैः। सा तु सत्यवती नाम मत्स्यघात्यभिसंश्रयात्।। (1-64-83) रूप और सत्त्व से युक्त तथा सभी गुणों से संपन्न होने के कारण, मछुओं के यहाँ रहने से उसका नाम 'सत्यवती' हुआ।

आसीत्सा मत्स्यगन्धैव कंचित्कालं शुचिस्मिता। शुश्रूषार्थं पितुर्नावं वाहयन्तीं जले च ताम्।। (1-64-84) वह सुंदर मुस्कान वाली सत्यवती कुछ समय तक 'मत्स्यगंधा' ही रही। पिता की सेवा के लिए वह जल में नाव चला रही थी।

तीर्थयात्रां परिक्रामन्नपश्यद्वै पराशरः। अतीव रूपसंपन्नां सिद्धानामपि काङ्क्षिताम्।। (1-64-85) तीर्थयात्रा करते हुए घूम रहे मुनि पराशर ने उसे देखा, जो अतिशय रूपसंपन्न और सिद्धों द्वारा भी वांछित थी।

दृष्ट्वैव स च तां धीमांश्चकमे चारुहासिनीम्। दिव्यां तां वासवीं कन्यां रम्भोरूं मुनिपुङ्गवः।। (1-64-86) सुंदर हँसी वाली, रंभा जैसी सुंदर जंघाओं वाली, इन्द्र-संबंधी (वसु-संबंधी) उस दिव्य कन्या को देखते ही बुद्धिमान् मुनिपुंगव पराशर उस पर आसक्त हो गए।

संभवं चिन्तयित्वा तां ज्ञात्वा प्रोवाच शक्तिजः। क्व कर्णधारो नौर्येन नीयते ब्रूहि भामिनि।। (1-64-87) शक्तिपुत्र (पराशर) ने उसकी उत्पत्ति का विचार करके और उसे जानकर कहा—"हे भामिनि! बताओ, नाविक कहाँ है, जिसके द्वारा यह नाव चलाई जा रही है?"

मत्स्यगन्धोवाच। मत्स्यगंधा ने कहा— अनपत्यस्य दाशस्य सुता तत्प्रियकाम्यया। सहस्रजनसंपन्ना नौर्मया वाह्यते द्विज।। (1-64-88) "हे द्विज! संतानहीन दाश (मछुआरे) की पुत्री हूँ और उसकी प्रिय कामना के लिए, एक हजार लोगों से भरी हुई इस नाव को मैं चला रही हूँ।"

पराशर उवाच। पराशर ने कहा— शोभनं वासवि शुभे किं चिरायसि वाह्यताम्। कलशं भविता भद्रे सहस्रार्धेन संमितम्।। (1-64-89) "हे शुभे वासवि! बहुत सुंदर, तुम देर क्यों कर रही हो, नाव चलाओ। हे भद्रे! यह नाव आधे हजार (पाँच सौ) लोगों से भरी हुई होगी..."

अहं शेषो भिविष्यामि नीयतामचिरेण वै। (और आगे की यात्रा में) मैं शेष यात्रियों का भार उठा लूँगा, इसलिए इसे शीघ्र ले चलो।

वैशंपायन उवाच। वैशंपायनजी ने कहा— मत्स्यगन्धा तथेत्युक्त्वा नावं वाहयतां जले।। (1-64-90) मत्स्यगंधा ने 'बहुत अच्छा' कहकर जल में नाव बढ़ानी शुरू कर दी।

वीक्षमाणं मुनिं दृष्ट्वा प्रोवाचेदं वचस्तदा। मत्स्यगन्धेति मामाहुर्दाशराजसुतां जनाः।। (1-64-91) अपनी ओर ताकते हुए मुनि को देखकर उसने यह वचन कहा—"लोग मुझे दाशराज की पुत्री और 'मत्स्यगंधा' कहते हैं।"

जन्म शोकाभितप्तायाः कथं ज्ञास्यसि कथ्यताम्। (1-64-92) शोक से संतप्त मेरे जन्म का रहस्य आप कैसे जानेंगे, मुझे बताइए।

पराशर उवाच। पराशर ने कहा— दिव्यज्ञानेन दृष्टं हि दृष्टमात्रेण ते वपुः।। (1-64-92) तुम्हारे शरीर को देखते ही मैंने अपने दिव्य ज्ञान से सब कुछ देख लिया है।

प्रणयग्रहणार्थाय वक्ष्येव वासवि तच्छृणु। बर्हिषद इति ख्याताः पितरः सोमपास्तुते।। (1-64-93) हे वासवि! अपने प्रेम की बात कहने के लिए मैं तुम्हें सब बताता हूँ, सुनो। तुम्हारे सोमपान करने वाले 'बर्हिषद्' नाम से विख्यात पितर हैं।

तेषां त्वं मानसी कन्या अच्छोदा नाम विश्रुता। अच्छोदं नाम तद्दिव्यं सरो यस्मात्समुत्थितम्।। (1-64-94) उन्हीं की 'अच्छोदा' नाम से प्रसिद्ध मानसी कन्या तुम हो, जिससे 'अच्छोद' नामक वह दिव्य सरोवर उत्पन्न हुआ है।

त्वया न दृष्टपूर्वास्तु पितरस्ते कदाचन। संभूता मनसा तेषां पितॄन्स्वान्नाभिजानती।। (1-64-95) तुमने अपने उन पितरों को कभी नहीं देखा था। तुम उनके मन से उत्पन्न हुई थी और अपने पितरों को जानती नहीं थी।

सा त्वन्यं पितरं वव्रे स्वानतिक्रम्य तान्पितॄन्। नाम्ना वसुरिति ख्यातं मनुपुत्रं दिवि स्थितम्।। (1-64-96) तुमने अपने उन पितरों की उपेक्षा करके दूसरे ही पितर का वरण कर लिया—जो स्वर्ग में रहने वाले मनुपुत्र 'वसु' नाम से विख्यात हैं।

अद्रिकाऽप्सरसा युक्तं विमाने दिवि विष्ठितम्। सा तेन व्यभिचारेण मनसा कामचारिणी।। (1-64-97) जो अद्रिका अप्सरा के साथ स्वर्ग में विमान पर बैठे थे। स्वेच्छा से आचरण करने वाली तुमने मन से उस व्यभिचार (अनौचित्य) के कारण...

पितरं प्रार्थयित्वाऽन्यं योगाद्भष्टा पपात सा। अपश्यत्पतमाना सा विमानत्रयमन्तिकात्।। (1-64-98) अपने पितरों को छोड़कर दूसरे को पति के रूप में प्रार्थना की, जिससे योगभ्रष्ट होकर तुम गिर पड़ीं। गिरते समय तुमने अपने पास ही तीन विमान देखे।

त्रसरेणुप्रमाणांस्तांस्तत्रापश्यत्स्वकान्पितॄन्। सुसूक्ष्मानपरिव्यक्तानङ्गैरङ्गेष्विवाहितान्।। (1-64-99) वहाँ तुमने अपने उन पितरों को त्रसरेणु (सूर्य की किरण में दिखने वाले धूल के कण) के समान अत्यंत सूक्ष्म, अस्पष्ट और अंगों में अंग समाए हुए देखा।

तातेति तानुवाचार्ता पतन्ती सा ह्यधोमुखी। तैरुक्ता सा तु माभैषीस्तेन सा संस्थिता दिवि।। (1-64-100) नीचे की ओर गिरती हुई आर्त (दुःखी) हुई तुमने 'तात!' कहकर उनको पुकारा। उन्होंने तुमसे कहा—"डरो मत।" इसी से तुम स्वर्ग में स्थिर रहीं (पुनः शाप का भागी होना पड़ा)।

ततः प्रसादयामास स्वान्पितॄन्दीनया गिरा। तामूचुः पितरः कन्यां भ्रैष्टश्वर्यां व्यतिक्रमात्।। (1-64-101) तदनन्तर दीन वाणी से तुमने अपने पितरों को प्रसन्न किया। तब पितरों ने उस कन्या से कहा, जो अपने व्यतिक्रम (अपराध) के कारण ऐश्वर्य से भ्रष्ट हो चुकी थी—

भ्रष्टैश्वर्या स्वदोषेण पतसि त्वं शुचिस्मिते। यैरारभन्ते कर्माणि शरीरैरिह देवताः।। (1-64-102) "हे सुंदर मुस्कान वाली! तुम अपने ही दोष से ऐश्वर्यभ्रष्ट होकर नीचे गिर रही हो। इस संसार में देवता जिन शरीरों से कर्मों का आरंभ करते हैं..."

तैरेव तत्कर्मफलं प्राप्नुवन्ति स्म देवताः। मनुष्यास्त्वन्यदेहेन शुभाशुभमिति स्थितिः।। (1-64-103) देवता उन्हीं शरीरों से अपने कर्मों का फल पाते हैं। किंतु मनुष्य दूसरे शरीर से शुभ और अशुभ फल पाते हैं—ऐसी मर्यादा है।

सद्यः फलन्ति कर्माणि देवत्वे प्रेत्य मानुषे। तस्मात्त्वं पतसे पुत्रि प्रेत्यत्वं प्राप्स्यसे फलम्।। (1-64-104) देवलोक में कर्मों का फल तुरंत मिलता है, किंतु मनुष्य योनि में मरने के बाद फल मिलता है। इसीलिए, पुत्री! तुम गिर रही हो और मनुष्य योनि में जाकर फल प्राप्तोगी।

पितृहीना तु कन्या त्वं वसोर्हि त्वं सुता मता। मत्स्ययोनौ समुत्पन्ना सुताराज्ञो भविष्यसि।। (1-64-105) तुम पितृहीन कन्या हो और वसु की पुत्री मानी जाओगी। मत्स्ययोनि में उत्पन्न होकर तुम एक राजा की माता बनोगी।

अद्रिका मत्स्यरूपाऽभूद्गङ्गायमनुसङ्गमे। पराशरस्य दायादं त्वं पुत्रं जनयिष्यसि।। (1-64-106) गंगा-यमुना के संगम पर अद्रिका मछली के रूप में थी। तुम पराशर के अंश (पुत्र) को जन्मोगी।

यो वेदमेकं ब्रह्मर्षिश्चतुर्धा विबजिष्यति। महाभिषक्सुतस्यैव शन्तनोः कीर्तिवर्धनम्।। (1-64-107) जो ब्रह्मर्षि एकमात्र वेद को चार भागों में विभक्त करेंगे। महाभिष के पुत्र शंतनु की कीर्ति को बढ़ाने वाले...

ज्येष्ठं चित्राङ्गदं वीरं चित्रवीरं च विश्रुतम्। एतान्सूत्वा सुपुत्रांस्त्वं पुनरेव गमिष्यसि।। (1-64-108) ज्येष्ठ वीर चित्रांगद और प्रसिद्ध विचित्रवीर—इन श्रेष्ठ पुत्रों को जन्म देकर तुम पुनः (स्वर्ग को) चली जाओगी।

व्यतिक्रमात्पितॄणां च प्राप्स्यसे जन्म कुत्सितम्। अस्यैव राज्ञस्त्वं कन्या ह्यद्रिकायां भविष्यसि।। (1-64-109) पितरों के उल्लंघन के कारण तुम कुत्सित जन्म प्राप्त करोगी। इन्ही राजा (वसु) की कन्या अद्रिका के गर्भ से तुम उत्पन्न होगी।

अष्टाविंशे भवित्री त्वं द्वापरे मत्स्ययोनिजा। एवमुक्ता पुरा तैस्त्वं जाता सत्यवती शुभा।। (1-64-110) अट्ठाइसवें द्वापर युग में तुम मत्स्ययोनि से उत्पन्न होगी।" पहले उन (पितरों) द्वारा ऐसा कहे जाने पर तुम शुभ सत्यवती के रूप में उत्पन्न हुई हो।

अद्रिकेत्यभिविख्याता ब्रह्मशापाद्वराप्सराः। मीनभावमनुप्राप्ता त्वं जनित्वा गता दिवम्।। (1-64-111) ब्रह्मशॉप के कारण 'अद्रिका' के नाम से विख्यात वह श्रेष्ठ अप्सरा मछली का भाव प्राप्त हुई थी और तुम्हें जन्म देकर वह स्वर्ग चली गई थी।

तस्यां जातासि सा कन्या राज्ञो वीर्येण चैवहि। तस्माद्वासवि भद्रं ते याचे वंशकरं सुतम्।। (1-64-112) उसी अद्रिका में राजा (वसु) के वीर्य से तुम कन्या उत्पन्न हुई हो। इसलिए, हे वासवि! तुम्हारा कल्याण हो, मैं वंश को चलाने वाले पुत्र के लिए तुमसे याचना करता हूँ।

संगमं मम कल्याणि कुरुष्वेत्यभ्यभाषत।। (1-64-113) हे कल्याणि! मेरे साथ संगम (संबंध) करो—ऐसा पराशर ने कहा।

वैशंपायन उवाच। वैशंपायनजी ने कहा— विस्मयाविष्टसर्वाङ्गी जातिस्मरणतां गता। साब्रवीत्पश्य भगवन्परपारे स्थितानृषीन्।। (1-64-114) पराशर के वचन सुनकर जिनके सभी अंग विस्मय से भर गए और जिन्हें अपने पूर्वजन्म का स्मरण हो गया, उन सत्यवती ने कहा—"हे भगवन्! देखिए, नदी के दूसरे पार ऋषिगण बैठे हैं।"

आवयोर्दृष्टयोरेभिः कथं नु स्यात्समागमः। एवं तयोक्तो भगवान्नीहारमसृजत्प्रभुः।। (1-64-115) "इन सबकी दृष्टि के सामने हम दोनों का समागम कैसे हो सकता है?" सत्यवती के ऐसा कहने पर भगवान प्रभु पराशर ने कोहरा (धुंध) उत्पन्न कर दिया।

येन देशः स सर्वस्तु तमोभूत इवाभवत्। दृष्ट्वा सृष्टं तु नीहारं ततस्तं परमर्षिणा।। (1-64-116) जिससे वह सारा देश अंधकारमय (कोहरे से ढका हुआ) जैसा हो गया। परमर्षि द्वारा उस कोहरे की रचना देखकर...

विस्मिता साभवत्कन्या व्रीडिता च तपस्विनी। (1-64-117) वह कन्या सत्यवती विस्मित और लज्जित हो गई।

सत्यवत्युवाच। सत्यवती ने कहा— विद्धि मां भगवन्कन्यां सदा पितृवशानुगाम्।। (1-64-118) "हे भगवन्! आप मुझे सदा पिता के वश में रहने वाली एक कन्या ही समझिए।"

त्वत्संयोगाच्च दुष्येत कन्याभावो ममाऽनघ। कन्यात्वे दूषिते वापि कथं शक्ष्ये द्विजोत्तम।। (1-64-119) "हे अनघ! आपके साथ संयोग होने से मेरा कन्यापन दूषित हो जाएगा। और कन्यापन दूषित हो जाने पर, हे द्विजोत्तम! मैं कैसे अपने घर जा सकूँगी?"

गृह गन्तुमुषे चाहं धीमन्न स्थातुमुत्सहे। एतत्संचिन्त्य भगवन्विधत्स्व यदनन्तरम्।। (1-64-120) "हे धीमान्! मैं घर जाना चाहती हूँ, यहाँ रुकने का साहस नहीं करती। हे भगवन्! इस पर विचार करके इसके आगे जो उचित हो, वह कीजिए।"

वैशंपायन उवाच। (1-64-119) वैशंपायनजी ने कहा—

एवमुक्तवतीं तीं तु प्रीतिमानुषिसत्तमः। उवाच मत्प्रियं कृत्वा कन्यैव त्वं भविष्यति।। (1-64-120) ऐसा कहने वाली उन सत्यवती से प्रीतिमान् मुनिश्रेष्ठ पराशर ने कहा—"तुम मेरी प्रिय इच्छा को पूर्ण करके कन्या ही बनी रहोगी।"

वृणीष्व च वरं भीरुं यं त्वमिच्छसि भामिनि। वृथा हि न प्रसादो मे भूतपूर्वः शुचिस्मिते।। (1-64-121) "हे भीरु! हे भामिनि! हे सुंदर मुस्कान वाली! तुम अपनी इच्छा के अनुसार जो चाहो वह वर माँग लो। मेरा दिया हुआ वरदान कभी भी व्यर्थ नहीं होता।"

एवमुक्ता वरं वव्रे गात्रसौगन्ध्यमुत्तमम्। सचास्यै भगवान्प्रादान्मनः काङ्क्षितं प्रभुः।। (1-64-122) इस प्रकार कहे जाने पर उन्होंने शरीर से उत्तम सुगंध आने का वर माँगा। तब भगवान् प्रभु (पराशर) ने उन्हें उनके मनपसंद वह वर प्रदान किया।

ततो लब्धवरा प्रीता स्त्रीभावगुणभूषिता। जगाम सह संसर्गमृषिणाऽद्भुतकर्मणा।। (1-64-123) तदनन्तर, उस वर को प्राप्त करके तथा स्त्रीत्व के गुणों से भूषित होकर प्रसन्नचित्त सत्यवती ने अद्भुत कर्म वाले उन ऋषि के साथ संगम किया।

तस्यास्तु योजनाद्गन्धमाजिघ्रन्त नरा भुवि।। (1-64-124) पृथ्वी पर मनुष्य एक योजन (चार कोस) दूर से उनके शरीर की सुगंध को सूँघ लेते थे।

तस्या योजनगन्धेति ततो नामापरं स्मृतम्। इति सत्यवती हृष्टा लब्ध्वा वरमनुत्तमम्।। (1-64-125) इसी कारण उनका दूसरा नाम 'योजनगंधा' पड़ गया। इस प्रकार सत्यवती उत्तम वर को पाकर बहुत प्रसन्न हुईं।

पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भं सुषाव सा। जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान्।। (1-64-126) पराशर ऋषि के साथ मिलन के बाद उन्होंने तुरंत गर्भ धारण किया और प्रसव किया। यमुना के एक द्वीप में उन वीर्यवान् पाराशर्य (पराशर पुत्र) का जन्म हुआ।

स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे। स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत्।। (1-64-127) वे बालक जन्म लेते ही माता की अनुमति लेकर तपस्या में लीन हो गए और उन्होंने कहा—"स्मरण करने पर मैं कार्यों को पूरा करने के लिए प्रकट हो जाऊँगा।"

एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात्। न्यस्तोद्वीपे यद्बालस्तस्माद्द्वैपायनःस्मृतः।। (1-64-128) इस प्रकार सत्यवती के गर्भ से पराशर के द्वारा द्वैपायन का जन्म हुआ। वे बालक द्वीप में रखे (उत्पन्न हुए) थे, इसलिए वे 'द्वैपायन' कहलाए।

पादापसारिणं धर्मं स तु विद्वान्युगे युगे। आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगावस्थामवेक्ष्यच।। (1-64-129) वे विद्वान् ऋषि युग-युग में घटते हुए धर्म, मनुष्यों की आयु, शक्ति और युगावस्था को अच्छी प्रकार देखकर...

ब्रह्मणो ब्राह्मणानां च तथानुग्रहकाङ्क्षया। विव्यास वेदान्यस्मत्स तस्माद्व्यास इति स्मृतः।। (1-64-130) ब्रह्म और ब्राह्मणों पर अनुग्रह करने की इच्छा से जिन्होंने वेदों का विस्तार (विभाग) किया, वे इसीलिए 'वेदव्यास' के नाम से प्रसिद्ध हुए।

वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्। सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम्।। (1-64-131) उन्होंने महाभारत को पाँचवाँ वेद मानते हुए सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुक...

प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशंपायनमेव च। संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकाशिताः।। (1-64-132) और वर देने वाले श्रेष्ठ प्रभु वैशंपायन—इन सबको वेदों का अध्ययन कराया। उन शिष्यों ने भारत (महाभारत) की संहिताओं को अलग-अलग प्रकाशित किया।

[ततो रम्ये वनोद्देशे दिव्यास्तरणसंयुते। वीरासनमुपास्थाय योगी ध्यानपरोऽभवत्।। तदनन्तर एक रमणीय वन-प्रदेश में दिव्य बिस्तरों से सुयुक्त स्थान पर वीरासन में स्थित होकर वे योगी ध्यानपरायण हो गए।

श्वेतपट्टगृहे रम्ये पर्यङ्के सोत्तरच्छदे। तूष्णींभूतां तदा कन्यां ज्वलन्तीं योगतेजसा।। (1-64a-2) श्वेत वस्त्रों से सुसज्जित सुंदर गृह में, उत्तम चादर बिछे हुए पलङ्ग पर, उस समय योगतेज से प्रदीप्त, चुपचाप बैठी हुई कन्या को देखकर...

दृष्ट्वा तां तु समाधाय विचार्य च पुनः पुनः। स चिन्तयामास मुनिः किं कृतं सुकृतं भवेत्।। (1-64a-3) मुनि (पराशर) ने अपने मन को एकाग्र कर और बार-बार विचार करके यह सोचना शुरू किया कि यहाँ कौन सा कार्य करना पुण्यकारक (धर्मसम्मत) होगा।

शिष्टानां तु समाचारः शिष्टाचार इति स्मृतः। श्रुतिस्मृतिविदो विप्रा धर्मज्ञा ज्ञानिनः स्मृताः।। (1-64a-4) शिष्ट पुरुषों का जो आचरण होता है, उसे 'शिष्टाचार' कहा गया है। श्रुति और स्मृति के ज्ञाता ब्राह्मण ही धर्मज्ञ और ज्ञानी कहे गए हैं।

धर्मज्ञैर्विहितो धर्मः श्रौतः स्मार्तो द्विधा द्विजैः। दानाग्निहोत्रमिज्या च श्रौतस्यैतद्धि लक्षणम्।। (1-64a-5) धर्मज्ञ द्विजों द्वारा बताया गया धर्म श्रौत और स्मार्त के भेद से दो प्रकार का होता है। दान, अग्निहोत्र और यज्ञ—यह श्रौत धर्म का लक्षण है।

स्मार्तो वर्णाश्रमाचारो यमैश्च नियमैर्युतः। धर्मे तु धारणे धातुः सहत्वे चापि पठ्यते।। (1-64a-6) वर्ण और आश्रम के आचार, यम और नियमों से युक्त धर्म को 'स्मार्त' कहा गया है। 'धर्म' शब्द 'धृ' धातु से बना है, जिसका अर्थ धारण करना और साथ लेकर चलना है।

तत्रेष्टफलभाग्धर्म आचार्यैरुपदिश्यते। अनिष्टफलभाक्रेति तैरधर्मोऽपि भाष्यते।। (1-64a-7) आचार्यों द्वारा उपदेश दिया जाता है कि धर्म से इष्ट (शुभ) फल की प्राप्ति होती है, और इसके विपरीत अधर्म से अनिष्ट (अशुभ) फल मिलता है।

तस्मादिष्टफलार्थाय धर्ममेव समाश्रयेत्। ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यश्च धार्मिकः।। (1-64a-8) इसलिए इष्ट फल की प्राप्ति के लिए केवल धर्म का ही आश्रय लेना चाहिए। ब्राह्मण, दैव, आर्ष और प्राजापत्य—ये विवाह धार्मिक (उत्तम) कहे गए हैं।

विवाहा ब्राह्मणानां तु गान्धर्वो नैव धार्मिकः। त्रिवर्णेतरजातीनां गान्धर्वासुरराक्षसाः।। (1-64a-9) ब्राह्मणों के लिए उपर्युक्त विवाह ही धार्मिक हैं, गान्धर्व विवाह धार्मिक नहीं है। त्रिवर्ण से इतर जातियों के लिए गान्धर्व, आसुर और राक्षस विवाह कहे गए हैं।

पैशाचो नैव कर्तव्यः पैशाचश्चाष्टमोऽधमः। सामर्षां व्यङ्गिकां कन्यां मातुश्च कुलजां तथा।। (1-64a-10) पैशाच विवाह कभी नहीं करना चाहिए, क्योंकि आठवाँ पैशाच विवाह सबसे अधम है। [इसके अतिरिक्त] अमर्षयुक्त (क्रोधित), अङ्गहीन (व्यङ्गिका), माता के कुल की कन्या...

वृद्धां प्रव्राजितां वन्ध्यां पतितां च रजस्वलाम्। अपस्मारकुले जातां पिङ्गलांकुष्ठिनीं व्रणीम्।। (1-64a-11) वृद्धा, संन्यासिनी (प्रव्राजिता), वन्ध्या, पतिता, रजस्वला, अपस्मार (मिर्गी) के कुल में उत्पन्न, पिंगल नेत्रों वाली, अंगूठे से हीन या व्रणयुक्त (घाव वाली)...

न चास्नातां स्त्रियं गच्छेदिति धर्मानुशासनम्। पिता पितामहो भ्राता माता मातुल एव च।। (1-64a-12) तथा बिना स्नान की हुई स्त्री के पास नहीं जाना चाहिए—ऐसा धर्म का अनुशासन है। पिता, पितामह, भाई, माता और मामा...

उपाध्यायर्त्विजश्चैव कन्यादाने प्रभूत्तमाः। एतैर्दत्तां निषेवेत नादत्तामाददीत च।। (1-64a-13) तथा उपाध्याय और ऋत्विज—ये कन्यादान करने में सर्वश्रेष्ठ प्रभु (अधिकारी) माने गए हैं। इनके द्वारा दी गई कन्या का ही सेवन करना चाहिए, बिना दी हुई (अदत्ता) कन्या को ग्रहण नहीं करना चाहिए।

इत्येव ऋषयः प्राहुर्विवाहे धर्मवित्तमाः। अस्या नास्ति पिता भ्राता माता मातुल एव च।। (1-64a-14) धर्म के मर्म को जानने वाले ऋषियों ने विवाह के विषय में ऐसा ही कहा है। [किन्तु विचार करने पर प्रतीत होता है कि] इस कन्या के न तो पिता हैं, न भाई, न माता और न ही मामा हैं।

गान्धर्वेण विवाहेन न स्पृशामि यदृच्छया। क्रियाहीनं तु गान्धर्वं न कर्तव्यमनापदि।। (1-64a-15) ऐसी स्थिति में यदि मैं स्वेच्छा से गान्धर्व विवाह द्वारा इसका स्पर्श करूँ, तो आपत्ति (संकट) काल के बिना क्रियाहीन गान्धर्व विवाह करना उचित नहीं है।

यदस्यां जायते पुत्रो वेदव्यासो भवेदृषिः। क्रियाहीनः कथं विप्रो भवेदृषिरुदारधीः।। (1-64a-16) [विशेषकर] इस कन्या से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह वेदों का व्यास (विद्वान) और महान ऋषि होगा। भला, क्रियाहीन विवाह से उत्पन्न होने वाला विप्र कैसे उदारधी (श्रेष्ठ बुद्धि वाला) ऋषि हो सकता है?

वैशंपायन उवाच। (1-64a-17x) वैशंपायनजी ने कहा—

एवं चिन्तयतो भावं महर्षेर्भावितात्मनः। ज्ञात्वा चैवाभ्यवर्तन्त पितरो बर्हिषस्तदा।। (1-64a-17) विभावितात्मा (संयमी) महर्षि पराशर के इस प्रकार विचार करते हुए उनके मन के भाव को जानकर,दर्भ बिछाकर यज्ञ करने वाले उनके पितृगण वहाँ आ पहुँचे।

तस्मिन्क्षणे ब्रह्मपुत्रो वसिष्ठोऽपि समेयिवान्। पूर्वं स्वागतमित्युक्त्वा वसिष्ठः प्रत्यभाषत।। (1-64a-18) उसी क्षण ब्रह्माजी के पुत्र वसिष्ठ मुनि भी वहाँ आ गए। उन्होंने पहले स्वागत कहकर (कुशलक्षेम पूछकर) इस प्रकार कहा—

पितृगणा ऊचुः। (1-64a-19x) पितृगणों ने कहा—

अस्माकं मानसीं कन्यामस्मच्छापेन वासवीम्। यदिचच्छशि पुत्रार्थं कन्यां गृह्मीष्वमा चिरम्।। (1-64a-19) "यह हमारी ही मानसी कन्या है, जो हमारे शाप से वसु (दाशराज) के यहाँ उत्पन्न हुई है। यदि आप पुत्र चाहते हैं, तो बिना किसी विलम्ब के इस कन्या को अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कीजिए।"

पितॄणां वचनं श्रुत्वा वसिष्ठः प्रत्यभाषत। महर्षीणां वचः सत्यं पुराणेपि मया श्रुतम्।। (1-64a-20) पितरों के वचन सुनकर वसिष्ठजी ने उत्तर दिया—"महर्षियों के ये वचन सत्य हैं, ऐसा मैंने पुराणों में भी सुना है।"

पराशरो ब्रह्मचारी प्रजार्थी मम वंशधृत्। एवं संभाषमाणे तु वसिष्ठे पितृभिः सह।। (1-64a-21) "पराशर ब्रह्मचारी हैं, वे संतान की इच्छा रखते हैं और मेरे वंश को चलाने वाले हैं।" वसिष्ठजी के पितरों के साथ इस प्रकार बातचीत करने पर...

ऋषयोऽभ्यागमंस्तत्र नैमिशारण्यवासिनः। विवाहं द्रष्टुमिच्छन्तः शक्तिपुत्रस्य धीमतः।। (1-64a-22) नियमित रूप से नैमिशारण्य में निवास करने वाले ऋषिगण वहाँ आ गए, जो बुद्धिमान शक्तिपुत्र (पराशर) का विवाह देखना चाहते थे।

अरुन्धती महाभागा अदृश्यन्त्या सहैव सा। विश्वकर्मकृतां दिव्यां पर्णशालां प्रविश्य सा।। (1-64a-23) महाभागा अरुन्धती, अदृश्यन्ती के साथ विश्वकर्मा द्वारा बनाई गई एक दिव्य पर्णशाला (कुटी) के भीतर गईं।

वैवाहिकांस्तु संभारान्संकल्प्य च यथाक्रमम्। अरुन्धती सत्यवतीं वधूं संगृह्य पाणिना।। (1-64a-24) उन्होंने यथाक्रम विवाह की सारी सामग्रियों का संकल्प किया। तत्पश्चात अरुन्धती ने वधू सत्यवती का हाथ अपने हाथ में लेकर...

भद्रासने प्रतिष्ठाप्य इन्द्राणीं समकल्पयत्। आपूर्यमाणपक्षे तु वैशाख सोमदैवते।। (1-64a-25) उन्हें भद्रासन पर बिठाया और उनका श्रृंगार इंद्राणी के समान कर दिया। यह वैशाख मास के शुक्ल पक्ष (आपूर्यमाण पक्ष) में, सोम (चन्द्रमा) के नक्षत्र से युक्त...

शुभग्रहे त्रयोदश्यां मुहूर्ते मैत्र आगते। विवाहकाल इत्युक्त्वा वसिष्ठो मुनिभिः सह।। (1-64a-26) शुभ ग्रह, त्रयोदश तिथि और मैत्र मुहूर्त के आने पर—"यही विवाह का उत्तम काल है" ऐसा कहकर, वसिष्ठजी ने अन्य मुनियों के साथ मिलकर...

यमुनाद्वीपमासाद्य शिष्यैश्च मुनिपङ्क्तिभिः। स्थण्डिलं चतुरश्रं च गोमयेनोपलिप्य च।। (1-64a-27) यमुना के द्वीप में पहुँचकर, शिष्यों और मुनियों की पंक्ति के साथ चौरस वेदी (स्थण्डिल) को गोबर से लीप कर शुद्ध किया।

अक्षतैः फलपुष्पैश्च स्वस्तिकैराम्रपल्लवैः। जलपूर्णघटैश्चैव सर्वतः परिशोभितम्।। (1-64a-28) उस वेदी को चारों ओर अक्षत (अतूट चावल), फल, फूल, स्वस्तिक चिह्नों, आम के पत्तों और जल से भरे हुए कलशों से भली-भांति सुशोभित किया गया।

तस्य मध्ये प्रतिष्ठाप्य बृस्यां मुनिवरं तदा। सिद्धार्थयवकल्कैश्च स्नातं सर्वौषधैरपि।। (1-64a-29) तत्पश्चात उस वेदी के मध्यभाग में कुश के आसन (बृस्या) पर मुनिवर पराशर को प्रतिष्ठित किया, जिन्हें पहले ही सफेद सरसों, जौ के उबटन तथा सभी औषधियों से स्नान कराया जा चुका था।

कृत्वार्जुनानि वस्त्राणि परिधाप्य महामुनिम्। वाचयित्वा तु पुण्याहमक्षतैस्तु समर्चितः।। (1-64a-30) श्वेत (अर्जुन वर्ण) वस्त्र धारण कराकर महामुनि का पूजन किया गया और पुण्याहवाचन कराया गया, तथा अक्षतों से उनका अर्चन हुआ।

गन्धानुलिप्तः स्रग्वी च सप्रतोदो वधूगृहे। अपदातिस्ततो गत्वा वधूज्ञातिभिरर्चितः।। (1-64a-31) गंध से अनुलिप्त, माला धारण किए हुए और हाथ में प्रतोद (चाबुक या नियंत्रण दण्ड) लिए हुए वे वधू के घर गए। पैदल चलकर वहाँ पहुँचने पर वधू के संबंधियों (ज्ञातिजनों) द्वारा उनका सत्कार किया गया।

स्नातामहतसंवीतां गन्धलिप्तां स्रगुज्ज्वलाम्। वधूं मङ्गलसंयुक्तामिषुहस्तां समीक्ष्य च।। (1-64a-32) स्नान की हुई, रेशमी (अहत) वस्त्र पहने हुए, गंध से लेपित, सुंदर माला से प्रदीप्त, मंगल चिन्हों से युक्त और हाथ में बाण (इषु) लिए हुई वधू (सत्यवती) को देखकर...

उवाच वचनं काले कालज्ञः सर्वधर्मवित्। प्रतिग्रहो दातृवशः श्रुतमेवं मया पुरा।। (1-64a-33) समय के ज्ञाता और सभी धर्मों को जानने वाले मुनि ने यथोचित काल में यह वचन कहा—"मैंने पहले ऐसा सुना है कि कन्या का प्रतिग्रह (ग्रहण) दाता के अधीन होता है।"

यथा वक्ष्यन्ति पितरस्तत्करिष्यामहे वयम्। (1-64a-34a) "जैसा पितृगण कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे।"

वैशंपायन उवाच। (1-64a-34x) वैशंपायनजी ने कहा—

तद्धर्मिष्ठं यशस्यं च वचनं सत्यवादिनः।। (1-64a-34b) सत्यवादी (पराशर) के उस धर्मयुक्त और यश बढ़ाने वाले वचन को...

श्रुत्वा तु पितरः सर्वे निःसङ्गा निष्परिग्रहाः। वसुं परमधर्मिष्ठमानीयेदं वचोऽब्रुवन्।। (1-64a-35) सुनकर आसक्ति और परिग्रह से रहित वे सभी पितृगण अत्यंत धर्मी राजा वसु (दाशराज) को बुलाकर यह वचन बोले—

मत्स्ययोनौ समुत्पन्ना तव पुत्री विशेषतः। पराशराय मुनये दातुमर्हसि धर्मतः।। (1-64a-36) "यह तुम्हारी पुत्री विशेष रूप से मत्स्य की योनि (गर्भ) से उत्पन्न हुई है, अतः तुम्हें धर्मपूर्वक इसे महर्षि पराशर को दे देना चाहिए।"

वसुरुवाच। (1-64a-37x) राजा वसु (दाशराज) ने कहा—

सत्यं मम सुता सा हि दाशराजेन वर्धिता। अहं प्रभुः प्रदाने तु प्रजापालः प्रजार्थिनाम्।। (1-64a-37) "यह सत्य है कि यह मेरी पुत्री है और दाशराज (मछुआरे) द्वारा पाली-बढ़ाई गई है। प्रजा के पालक तथा प्रजार्थियों की इच्छा पूरी करने वाले होने के नाते मैं इसके कन्यादान में पूर्ण स्वतंत्र (प्रभु) हूँ।"

पितर ऊचुः। (1-64a-38x) पितरों ने कहा—

निराशिषो वयं सर्वे निःसङ्गा निष्परिग्रहाः। कन्यादानेन संबन्धो दक्षिणाबन्ध उच्यते।। (1-64a-38) "हम सब कामनाओं से रहित, आसक्तिहीन और परिग्रहरहित हैं। कन्यादान से जो संबंध बनता है, उसे 'दक्षिणाबन्ध' कहा जाता है।"

कर्मभूमिस्तु मानुष्यं भोगभूमिस्त्रिविष्टपम्। इह पुण्यकृतो यान्ति स्वर्गलोकं न संशयः।। (1-64a-39) "मनुष्य योनि कर्मभूमि है और स्वर्ग भोगभूमि है। इस लोक में पुण्यकर्म करने वाले लोग निःसंशय स्वर्गलोक को प्राप्त होते हैं।"

इह लोके दुष्कृतिनो नरकं यान्ति निर्घृणाः। दक्षिणाबन्ध इत्युक्ते उभे सुकृतदुष्कृते।। (1-64a-40) "इस लोक में पाप कर्म करने वाले निर्दयी लोग नरक में जाते हैं। दक्षिणाबन्ध के प्रसंग में पुण्य और पाप दोनों का उल्लेख आता है।"

दक्षिणाबन्धसंयुक्ता योगिनः प्रपतन्ति ते। तस्मान्नो मानसीं कन्यां योगाद्भ्रष्टां विशापते।। (1-64a-41) "दक्षिणाबन्ध (दक्षिणा या मोह से जुड़ा बंधन) से युक्त होने पर योगीजन भी नीचे गिर जाते हैं। इसलिए हे राजन! योग से भ्रष्ट हुई हमारी इस मानसी कन्या को..."

सुतात्वं तव संप्राप्तां सतीं भिक्षां ददस्व वै। इत्युक्त्वा पितरः सर्वे क्षणादन्तर्हितास्तदा।। (1-64a-42) "जो आपकी पुत्री के रूप में प्राप्त हुई है, उस सती कन्या को हमें भिक्षा (दान) के रूप में दे दीजिए।" ऐसा कहकर सभी पितृगण क्षणभर में अंतर्ध्यान हो गए।

वैशंपायन उवाच। (1-64a-43x) वैशंपायनजी ने कहा—

याज्ञवल्क्यं समाहूय विवाहाचार्यमित्युत। वसुं चापि समाहूय वसिष्ठो मुनिभिः सह।। (1-64a-43) तत्पश्चात वसिष्ठजी ने अन्य मुनियों के साथ मिलकर याज्ञवल्क्य को विवाह का आचार्य बनाया और राजा वसु (दाशराज) को भी बुलाया।

विवाहं कारयामास विधिदृष्टेन कर्मणा। (1-64a-44a) शास्त्रों में बताए गए विधि-विधान के अनुसार विवाह की सम्पूर्ण क्रिया संपन्न कराई।

वसुरुवाच। (1-64a-44x) राजा वसु ने कहा—

पराशर महाप्राज्ञ तव दास्याम्यहं सुताम्।। (1-64a-44b) "हे महाप्राज्ञ पराशर! मैं अपनी यह पुत्री आपको सौंपता हूँ।"

प्रतीच्छ चैनां भद्रं ते पाणिं गृह्णीष्व पाणिना। (1-64a-45a) "आपका कल्याण हो, आप इसे स्वीकार करें और अपने हाथ से इसका हाथ (पाणिग्रहण) ग्रहण करें।"

वैशंपायन उवाच। (1-64a-45x) वैशंपायनजी ने कहा—

वसोस्तु वचनं श्रुत्वा याज्ञवल्क्यमते स्थितः।। (1-64a-45b) वसु का यह वचन सुनकर और याज्ञवल्क्य के निर्देश के अनुसार आचरण करते हुए...

कृतकौतुकमङ्गल्यः पाणिना पाणिमस्पृशत्। प्रभूताज्येन हविषा हुत्वा मन्त्रैर्हुताशनम्।। (1-64a-46) कौतुक (कंगन आदि) और मंगल कार्य संपन्न करके उन्होंने [पराशर ने] अपने हाथ से सत्यवती का हाथ स्पर्श किया। प्रचुर मात्रा में घी और हविष्य से मंत्रों द्वारा अग्नि में आहुति दी।

त्रिरग्निं तु परिक्रम्य समभ्यर्च्य हुताशनम्। महर्षीन्याज्ञवल्क्यादीन्दक्षिणाभिः प्रतर्प्यच।। (1-64a-47) अग्नि की तीन बार परिक्रमा की, अग्नि देव की पूजा की और याज्ञवल्क्य आदि महर्षियों को दक्षिणा देकर संतुष्ट किया।

लब्धानुज्ञोऽभिवाद्याशु प्रदक्षिणमथाकरोत्। पराशरे कृतोद्वाहे देवाः सर्पिगणास्तदा।। (1-64a-48) उनकी अनुमति पाकर और प्रणाम करके उन्होंने प्रदक्षिणा की। पराशर का विवाह संपन्न हो जाने पर उस समय देवता और सर्पगण...

हृष्टा जग्मुः क्षणादेव वेदव्यासो भवत्विति। एवं सत्यवती हृष्टा पूजां लब्ध्वा यथेष्टतः।। (1-64a-49) "इनके यहाँ वेदव्यास उत्पन्न हों"—यह कामना करते हुए प्रसन्नतापूर्वक क्षणभर में चले गए। इस प्रकार सत्यवती यथेष्ट आदर-सत्कार पाकर बहुत प्रसन्न हुईं।

पराशरेण संयुक्ता सद्यो गर्भं सुषाव सा। जज्ञे च यमुनाद्वीपे पाराशर्यः स वीर्यवान्।। (1-64a-50) पराशरजी के साथ मिलन के तुरंत बाद उन्होंने गर्भ धारण किया और प्रसव किया। यमुना के द्वीप में उन वीर्यवान् पाराशर्य (पराशर पुत्र) का जन्म हुआ।

जातमात्रः स ववृधे सप्तवर्षोऽभवत्तदा। स्नात्वाभिवाद्य पितरं तस्थौ व्यासः समाहितः।। (1-64a-51) जन्म लेते ही वे बालक बड़े हो गए और तभी सात वर्ष के हो गए। स्नान करके पिता को प्रणाम कर व्यासजी एकाग्र चित्त से खड़े हो गए।

स्वस्तीति वचनं चोक्त्वा ददौ कलशमुत्तमम्। गृहीत्वा कलशं प्राप्ते तस्थौ व्यासः समाहितः।। (1-64a-52) "तुम्हारा कल्याण हो"—ऐसा कहकर (पराशर ने) उन्हें एक उत्तम कलश दिया। उस कलश को ग्रहण करके व्यासजी एकाग्र होकर खड़े रहे।

ततो दाशभयात्पत्नी स्नात्वा कन्या बभूव सा। अभिवाद्य मुनेः पादौ पुत्रं जग्राह पाणिना।। (1-64a-53) तदनन्तर, दाश (मछुआरे) के भय से सत्यवती ने स्नान किया और पुनः कन्या बन गईं। उन्होंने मुनि (पराशर) के चरणों में प्रणाम करके अपने पुत्र को हाथों में उठाया।

स्पृष्टमात्रे तु निर्भर्त्स्य मातरं वाक्यमब्रवीत्। मम पित्रा तु संस्पर्शान्मातस्त्वमभवः शुचिः।। (1-64a-54) पुत्र के स्पर्श मात्र से माता ने संकोच किया, तब व्यासजी ने डाँटते हुए अपनी माता से कहा—"हे माता! मेरे पिता के स्पर्श से ही आप पवित्र हुई हैं।"

अद्य दाशसुता कन्या न स्पृशेर्मामनिन्दिते। (1-64a-55a) "हे अनिन्दिते! आज से यह दाशसुता कन्या (मछुआरे की पुत्री के रूप में तुम्हारी पुरानी स्थिति) मेरा स्पर्श न करे।"

वैशंपायन उवाच। (1-64a-55x) वैशंपायनजी ने कहा—

व्यासस्य वचनं श्रुत्वा बाष्पपूर्णमुखी तदा।। (1-64a-55b) व्यासजी की यह बात सुनकर उस समय आँसुओं से भरा मुख किए हुए...

मनुष्यभावात्सा योषित्पपात मुनिपादयोः। महाप्रसादो भगवान्पुत्रं प्रोवाच धर्मवित्।। (1-64a-56) मनुष्य स्वभाव के कारण वह स्त्री मुनि (पराशर) के चरणों में गिर पड़ी। तब धर्मज्ञ भगवान (पराशर) ने अपने पुत्र से कहा—

मा त्वमेवंविधं कार्षीर्नैतद्धर्म्यं मतं हि नः। दूष्यौ न मातापितरौ तथा पूर्वोपकारिणौ।। (1-64a-57) "तुम इस प्रकार का व्यवहार मत करो, क्योंकि हमारा यह मत धर्मसम्मत नहीं है। माता-पिता और पूर्वोपकारी कभी दूषित (अपवित्र) नहीं होते।"

धारणाद्दुःखसहनात्तयोर्माता गरीयसी। बीजक्षेत्रसमायोगे सस्यं जायेत लौकिकम्।। (1-64a-58) "गर्भ धारण करने और दुःख सहन करने के कारण माता श्रेष्ठ होती है। जिस प्रकार बीज और खेत के मिलने से संसार में फसल पैदा होती है..."

जायते च सुतस्तद्वत्पुरुषस्त्रीसमागमे। मृगीणां पक्षिणां चैव अप्सराणां तथैव च।। (1-64a-59) "उसी प्रकार स्त्री-पुरुष के समागम से संतान उत्पन्न होती है। मृगियों, पक्षियों और अप्सराओं में भी..."

शूद्रयोन्यां च जायन्ते मुनयो वेदपारगाः। ऋष्यशृङ्गो मृगीपुत्रः कण्वो बर्हिसुतस्तथा।। (1-64a-60) "तथा शूद्र योनि में भी वेद के पारगामी मुनि उत्पन्न हुए हैं। मृगी के पुत्र ऋष्यशृंग, बर्हि (कश्यप या अन्य) के पुत्र कण्व..."

अगस्त्यश्च वसिष्ठश्च उर्वश्यां जनितावुभौ। सोमश्रवास्तु सर्प्यां तु अश्विनावश्विसंभवौ।। (1-64a-61) "अगस्त्य और वसिष्ठ दोनों उर्वशी से उत्पन्न हुए थे। सर्पिणी के गर्भ से सोमश्रवा तथा अश्विनीकुमारों की उत्पत्ति हुई थी।"

स्कन्दः स्कन्नेन शुक्लेन जातः शरवणे पुरा। एवमेव च देवानामृषीमां चैव संभवः।। (1-64a-62) "पूर्वकाल में सरकंडे के वन में गिरे हुए वीर्य (शुक्ल) से स्कन्द का जन्म हुआ था। इसी प्रकार देवताओं और ऋषियों की उत्पत्ति हुई है।"

लोकवेदप्रवृत्तिर्हि न मीमांस्या बुधैः सदा। वेदव्यास इति प्रोक्तः पुराणे च स्वयंभुवा।। (1-64a-63) "लोक और वेद की प्रवृत्ति की विद्वानों द्वारा कभी मीमांसा (दोष-दृष्टि) नहीं करनी चाहिए। पुराणों में स्वयं ब्रह्माजी ने तुम्हें 'वेदव्यास' कहा है।"

धर्मनेता महर्षीणां मनुष्याणां त्वमेव च। तस्मात्पुत्र न दूष्येत वासवी योगचारिणी।। (1-64a-64) "तुम महर्षियों और मनुष्यों के धर्म के नेता हो। इसलिए हे पुत्र! योग का आचरण करने वाली यह वासवी (सत्यवती) दूषित नहीं है।"

मत्प्रीत्यर्थं महाप्राज्ञ सस्नेहं वक्तुमर्हसि। प्रजाहितार्थं संभूतो विष्णोर्भागो महानृषिः।। (1-64a-65) "हे महाप्राज्ञ! मेरी प्रसन्नता के लिए तुम स्नेहपूर्वक इनसे बात करो। प्रजा के हित के लिए उत्पन्न हुए तुम भगवान विष्णु के अंश महान ऋषि हो।"

तस्मात्स्वमातरं स्नेहात्प्रबवीहि तपोधन। (1-64a-66a) "इसलिए हे तपोधन! स्नेहपूर्वक अपनी माता से बोलो।"

वैशंपायन उवाच। (1-64a-66x) वैशंपायनजी ने कहा—

गुरोर्वचनमाज्ञाय व्यासः प्रीतोऽभवत्तदा।। (1-64a-66b) गुरु (पिता) का यह वचन जानकर व्यासजी उस समय प्रसन्न हो गए।

चिन्तयित्वा लोकवृत्तं मातुरङ्कमथाविशत्। पुत्रस्पर्शात्तु लोकेषु नान्यत्सुखमतीव हि।। (1-64a-67) लोक-मर्यादा का विचार करके वे माता की गोद में बैठ गए। पुत्र के स्पर्श से बढ़कर संसार में दूसरा कोई अत्यधिक सुख नहीं है।

व्यासं कमलपत्राक्षं परिष्वज्याश्र्ववर्तयत्। स्तन्यासारैः क्लिद्यमाना पुत्रमाघ्राय मूर्धनि।। (1-64a-68) कमल के समान नेत्रों वाले व्यासजी को गले लगाकर और उनके सिर को सूँघकर सत्यवती के स्तनों से आनंद के दूध की धारा बहने लगी और वे उससे भीग गईं।

वासव्युवाच। (1-64a-69x) सत्यवती (वासवी) ने कहा—

पुत्रलाभात्परं लोके नास्तीह प्रसवार्थिनाम्। दुर्लभं चेति मन्येऽहं मया प्राप्तं महत्तपः।। (1-64a-69) "इस संसार में संतान की इच्छा रखने वालों के लिए पुत्र लाभ से बढ़कर दूसरा कोई सुख नहीं है। जिसे मैं दुर्लभ मानती थी, वह महान तप का फल मैंने प्राप्त कर लिया है।"

महता तपसा तात महायोगबलेन च। मया त्वं हि महाप्राज्ञ लब्धोऽमृतमिवामरैः।। (1-64a-70) "हे तात! हे महाप्राज्ञ! मैंने महान तप और महायोग के बल से, देवताओं द्वारा अमृत की प्राप्ति के समान आपको प्राप्त किया है।"

तस्मात्त्वं मामृषेः पुत्र त्यक्तुं नार्हसि सांप्रतम्। (1-64a-71a) "इसलिए हे ऋषिपुत्र! इस समय तुम मुझे छोड़ने योग्य नहीं हो।"

वैशंपायन उवाच। (1-64a-71x) वैशंपायनजी ने कहा—

एवमुक्तस्ततः स्नेहाद्व्यासो मातरमब्रवीत्।। (1-64a-71b) इस प्रकार कहे जाने पर व्यासजी ने स्नेहपूर्वक माता से कहा—

त्वया स्पृष्टः परिष्वक्तो मूर्ध्नि चाघ्रायितो मुहुः। एतावन्मात्रया प्रीतो भविष्येषु नृपात्मजे।। (1-64a-72) "हे नृपात्मजे! आपके द्वारा स्पर्श किए जाने, आलिंगित होने और मस्तक पर बार-बार सूँघे जाने मात्र से ही मैं भविष्य में संतुष्ट रहूँगा।"

स्मृतोऽहं दर्शयिष्यामि कृत्येष्विति च सोऽब्रवीत्। स मातरमनुज्ञाप्य तपस्येव मनो दधे।। (1-64a-73) "स्मरण किए जाने पर मैं कार्यों को पूरा करने के लिए प्रकट हो जाऊँगा"—ऐसा कहकर उन्होंने माता की अनुमति ली और तपस्या में ही अपना मन लगा दिया।

ततः कन्यामनुज्ञाय पुनः कन्या भवत्विति। पराशरोऽपि भगवान्पुत्रेण सहितो ययौ।। (1-64a-74) तदनन्तर "तुम पुनः कन्या हो जाओ"—ऐसा सत्यवती को वरदान देकर भगवान पराशर भी अपने पुत्र के साथ वहाँ से चले गए।

गत्वाश्रमपदं पुम्यमदृश्यन्त्या पराशरः। जातकर्मादिसंस्कारं कारयामास धर्मतः।। (1-64a-75) अदृश्यन्ती के पवित्र आश्रम पद पर पहुँचकर पराशरजी ने धर्मपूर्वक (व्यासजी के) जातकर्मादि संस्कार कराए।

कृतोपनयनो व्यासो याज्ञवल्केन भारत। वेदानधिजगौ साङ्गानोङ्कारेण त्रिमात्रया।। (1-64a-76) हे भारत! याज्ञवल्क्य द्वारा जिनका उपनयन संस्कार कराया गया था, उन व्यासजी ने अंगों सहित वेदों का त्रिमात्र ओंकार के साथ अध्ययन किया।

गुरवे दक्षिणां दत्त्वा तपः कर्तुं प्रचक्रमे। एवं द्वैपायनो जज्ञे सत्यवत्यां पराशरात्।। (1-64a-77) गुरु को दक्षिणा देकर उन्होंने तपस्या करनी शुरू की। इस प्रकार सत्यवती के गर्भ से पराशर द्वारा द्वैपायन का जन्म हुआ।

द्वीप न्यस्तः स यद्वालस्तस्माद्द्वैपायनोऽभवत्। पादापसारिणं धर्मं विद्वान्स तु युगे युगे।। (1-64a-78) वे बालक द्वीप में रखे (उत्पन्न हुए) थे, इसलिए 'द्वैपायन' कहलाए। वे विद्वान् ऋषि युग-युग में घटते हुए धर्म को...

आयुः शक्तिं च मर्त्यानां युगाद्युगमवेक्ष्य च। ब्रह्मर्षिर्ब्राह्मणानां च तथाऽनुग्रहकाङ्क्षया।। (1-64a-79) युग-युग में मनुष्यों की आयु और शक्ति को देखकर, तथा ब्रह्मर्षियों और ब्राह्मणों पर अनुग्रह करने की इच्छा से...

विव्यास वेदान्यस्माच्च वेदव्यास इति स्मृतः। ततः स महर्षिर्विद्वाञ्शिष्यानाहूय धर्मतः।। (1-64a-80) जिन्होंने वेदों का विस्तार (विभाग) किया, वे इसीलिए 'वेदव्यास' कहलाए। तदनन्तर उन विद्वान महर्षि ने धर्मपूर्वक अपने शिष्यों को बुलाकर...

सुमन्तुं जैमिनिं पैलं शुकं चैव स्वमात्मजम्। प्रभुर्वरिष्ठो वरदो वैशंपायनमेव च।। (1-64a-81) सुमन्तु, जैमिनि, पैल, अपने पुत्र शुक, तथा वर देने वाले श्रेष्ठ प्रभु वैशंपायन—इन सबको...

वेदानध्यापयामास महाभारतपञ्चमान्। संहितास्तैः पृथक्त्वेन भारतस्य प्रकीर्तिता।। (1-64a-82) महाभारत को पाँचवाँ वेद मानते हुए वेदों का अध्ययन कराया। उन शिष्यों ने भारत (महाभारत) की संहिताओं को अलग-अलग प्रकाशित किया।

ततः सत्यवती हृष्टा जगाम स्वं निवेशनम्। तस्यास्तु योजनाद्गन्धमाजिघ्रन्ति नरा भुवि।। (1-64a-83) तत्पश्चात सत्यवती प्रसन्न होकर अपने घर गईं। पृथ्वी पर मनुष्य एक योजन दूर से उनके शरीर की सुगंध को सूँघ लेते थे।

दाशराजस्तु तद्गन्धमाजिघ्रन्पीतिमावहत्। (1-64a-84a) दाशराज (मछुआरा) भी उस सुगंध को सूँघकर प्रसन्नता से भर गया।

दाशराज उवाच। (1-64a-84x) दाशराज ने कहा—

त्वामाहुर्मत्स्यगन्धेति कथं बाले सुगन्धता।। (1-64a-84b) "हे बाले! लोग तो तुम्हें 'मत्स्यगंधा' कहते हैं, फिर तुम्हारे शरीर में यह सुगंध कैसे आ गई?"

अपास्य मत्स्यगन्धत्वं केन दत्ता सुगन्धता (1-64a-85a) "मत्स्यगंधा होने की स्थिति को दूर करके यह सुगंध तुम्हें किसने दी है?"

सत्यवत्युवाच। (1-64a-85x) सत्यवती ने कहा—

शक्तेः पुत्रो महाप्राज्ञः पराशर इति श्रुतः।। (1-64a-85b) "शक्ति (वसिष्ठ के पुत्र शक्ति) के महाप्राज्ञ पुत्र, जो पराशर नाम से प्रसिद्ध हैं..."

नावं वाहयमानाया मम दृष्ट्वां सुशिक्षितम्। उपास्य मत्स्यगन्धत्वं योजनाद्गन्धतां ददौ।। (1-64a-86) "नाव खेने वाली मुझ पर कृपा करके उन्होंने मेरे मत्स्यगंधत्व को दूर कर दिया और एक योजन दूर तक महकने वाली सुगंध प्रदान की।"

ऋषेः प्रसादं दृष्ट्वा तु जनाः प्रीतिमुपागमन्। एवं लब्धो मया गन्धो न रोषं कर्तुमर्हसि।। (1-64a-87) "ऋषि की इस कृपा को देखकर सभी लोग बहुत प्रसन्न हुए। इस प्रकार मैंने यह सुगंध प्राप्त की है, अतः आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।"

दाशराजस्तु तद्वाक्यं प्रशशंस ननन्द च। एतत्पवित्रं पुण्यं च व्याससमवमुत्तमम्। इतिहासमिमं श्रुत्वा प्रजावन्तो भवन्ति च।। (1-64a-88) 

हिन्दी अनुवाद: दाशराज ने सत्यवती के उस वचन की प्रशंसा की और बहुत प्रसन्न हुए। व्यासजी के इस पवित्र, पुण्यमय और उत्तम इतिहास को जो मनुष्य सुनता है, वह संतानवान (प्रजावान) होता है।

महाभारत आदिपर्व के चतुःषष्टितम (64वें) अध्याय के दिए गए श्लोकों का हिन्दी अनुवाद:

श्लोक 133: तथा भीष्मः शान्तनवो गङ्गायाममितद्युतिः। वसुवीर्यात्समभवन्महावीर्यो महायशाः।। 

हिन्दी अनुवाद: इसी प्रकार शांतनु पुत्र, अमित कांतिमान, महाबली और अपार यश वाले महायशस्वी भीष्म जी वसुओं के अंश से गंगा जी के गर्भ from उत्पन्न हुए।

श्लोक 134-135: वैदार्थविच्च भगवानृषिर्विप्रो महायशाः। शूले प्रोतः पुराणर्षिरचोरश्चोरशङ्कया।। अणीमाण्डव्य इत्येवं विख्यातः स महायशाः। स धर्ममाहूय पुरा महर्षिरिदमुक्तवान्।। 

हिन्दी अनुवाद: वेद के अर्थ को जानने वाले, भगवान्, महर्षि, श्रेष्ठ ब्राह्मण तथा महायशस्वी पुराणऋषि अणिमाण्डव्य चोर की शंका (भ्रम) के कारण चोर न होने पर भी शूल पर चढ़ाए गए थे। उन महायशस्वी महर्षि ने प्राचीनकाल में धर्मराज को बुलाकर यह बात कही थी—

श्लोक 136-137: इषीकया मया बाल्याद्विद्धा ह्येका शकुन्तिका। तत्किल्बिषं स्मरे धर्म नान्यत्पापमहं स्मरे।। तन्मे सहस्रममितं कस्मान्नेहाजयत्तपः। गरीयान्ब्राह्मणवधः सर्वभूतवधाद्यतः।। 

हिन्दी अनुवाद: हे धर्म! मैंने बाल्यावस्था में एक घास (सीक) से एक छोटी चिड़िया को बींध दिया था। मैं केवल उसी एक पाप को स्मरण करता हूँ, इसके अतिरिक्त अन्य कोई पाप मुझे स्मरण नहीं है। फिर मेरे उस अमित तप ने इस अल्प पाप का फल (दंड) सहस्रगुना होकर क्यों नहीं जीता? क्योंकि सभी प्राणियों के वध से ब्राह्मण का वध अधिक भारी (गंभीर) होता है।

श्लोक 138: तस्मात्त्वं किल्बिषादस्माच्छूद्रयोनौ जनिष्यसि। वैशंपायन उवाच। तेन शापेन धर्मोऽपि शूद्रयोनावजायत।। 

हिन्दी अनुवाद: (धर्म ने उत्तर दिया था—) इसलिए तुम इस पाप के कारण शूद्र की योनि में जन्म लोगे। वैशंपायन जी कहते हैं— तदनन्तर उस शाप के कारण धर्मराज ने भी शूद्र की योनि में जन्म लिया।

श्लोक 139: विद्वान्विदुररूपेण धार्मिकः किल्बिषात्ततः। संजयो मुनिकल्पस्तु जज्ञे सूतो गवल्गणात्।। 

हिन्दी अनुवाद: वे विद्वान और अत्यधिक धार्मिक धर्मराज उस पाप के फलस्वरूप विदुर के रूप में उत्पन्न हुए। तथा मुनितुल्य धर्मात्मा सूत संजय गवल्गण के यहाँ पैदा हुए।

श्लोक 140: सूर्याच्च कुन्तिकन्यायां जज्ञे कर्णो महाबलः। सहजं कवचं बिभ्रत्कुण्डलोद्योतिताननः।। 

हिन्दी अनुवाद: कुंती कुमारी के गर्भ से सूर्यदेव द्वारा महाबली कर्ण का जन्म हुआ, जो जन्म से ही कवच धारण किए हुए थे और जिनके मुख पर कुंडल शोभा दे रहे थे।

श्लोक 141: अनुग्रहार्थं लोकानां विष्णुर्लोकनमस्कृतः। वसुदेवात्तु देवक्यां प्रादुर्भूतो महायशाः।। 

हिन्दी अनुवाद: संसार के कल्याण के लिए, समस्त लोकों द्वारा वंदनीय और महायशस्वी भगवान विष्णु वसुदेव जी के यहाँ देवकी के गर्भ से प्रकट हुए।

श्लोक 142-145: अनादिनिधनो देवः स कर्ता जगतः प्रभुः। अव्यक्तमक्षरं ब्रह्म प्रधानं त्रिगुणात्मकम्।। आत्मानमव्ययं चैव प्रकृतिं प्रभवं प्रभुम्। पुरुषं विश्वकर्माणं सत्वयोगं ध्रुवाक्षरम्।। अनन्तमचलं देवं हंसं नारायणं प्रभुम्। धातारमजमव्यक्तं यमाहुः परमव्ययम्।। कैवल्यं निर्गुणं विश्वमनादिमजमव्ययम्। पुरुषः स विभुः कर्ता सर्वभूतपितामहः।। 

हिन्दी अनुवाद: वे देव जिनका न आदि है न अंत, जो इस जगत के रचयिता और प्रभु हैं— जो अव्यक्त, अक्षर ब्रह्म, त्रिगुणात्मक प्रधान, अव्यय आत्मा, प्रकृति, उद्गम स्थान, प्रभु, पुरुष, विश्वकर्मा, सत्त्वयुक्त, ध्रुव, अक्षर, अनंत, अचल, हंस, नारायण, धाता, अजन्मा, अव्यक्त और जिन्हें परम अव्यय कहा जाता है; जो कैवल्य स्वरूप, निर्गुण, विश्वरूप, अनादि, अजन्मा और अव्यय हैं, वे ही समस्त भूतों के पितामह सर्वव्यापक पुरुष और कर्ता भगवान हैं।

श्लोक 146-147: धर्मसंस्थापनार्थाय प्रजज्ञेऽन्धकवृष्णिषु। अस्त्रज्ञौ तु महावीर्यौ सर्वशास्त्रविशारदौ।। सात्यकिः कृतवर्मा च नारायणमनुव्रतौ। सत्यकाद्धृदिकाच्चैव जज्ञातेऽस्त्रविशारदौ।। 

हिन्दी अनुवाद: धर्म की स्थापना के लिए उन्होंने अंधक और वृष्णि वंश में अवतार लिया। भगवान नारायण के अनन्य भक्त, अस्त्रविद्या के ज्ञाता, महाबली और समस्त शास्त्रों में पारंगत सात्यकि और कृतवर्मा— ये दोनों क्रमशः सत्यक और हृदिक के पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए।

श्लोक 148: भरद्वाजस्य च स्कन्नं द्रोण्यां शुक्रमवर्धत। सहर्षेरुग्रतपसस्तस्माद्द्रोणो व्यजायत।। 

हिन्दी अनुवाद: उग्र तपस्या करने वाले महर्षि भरद्वाज का गिरा हुआ वीर्य एक द्रोणी (द्रोण/बर्तन) में बढ़ा, जिससे द्रोणाचार्य का जन्म हुआ।

श्लोक 149-150: गौतमान्मिथुनं जज्ञे शरस्तम्बाच्छरद्वतः। अश्वत्थाम्नश्च जननी कृपश्चैव महाबलः।। अश्वत्थामा ततो जज्ञे द्रोणादेव महाबलः। तथैव धृष्टद्युम्नोऽपि साक्षादग्निसमद्युतिः।। 

हिन्दी अनुवाद: शरस्तम्भ (सरकंडे के झुंड) से गौतम वंश के शरद्वान् ऋषि के यहाँ एक मिथुन (जुड़वां भाई-बहन) उत्पन्न हुआ— जो अश्वत्थामा की माता (कृपी) और महाबली कृप थे। तत्पश्चात द्रोणाचार्य से महाबली अश्वत्थामा उत्पन्न हुए। उसी प्रकार साक्षात् अग्नि के समान कांतिमान धृष्टद्युम्न भी प्रकट हुए।

श्लोक 151-152: वैताने कर्मणि तते पावकात्समजायत। वीरो द्रोणविनाशाय धनुरादाय वीर्यवान्।। तथैव वेद्यां कृष्णापि जज्ञे तेजस्विनी शुभा। विभ्राजमाना वपुषा बिभ्रती रूपमुत्तमम्।। 

हिन्दी अनुवाद: यज्ञीय कर्म के संपन्न होने पर द्रोण के विनाश के लिए धनुष धारण करने वाले वीर और वीर्यवान धृष्टद्युम्न अग्नि से उत्पन्न हुए। इसी प्रकार वेदी से तेजस्विनी, कल्याणमयी, अपने शरीर से प्रदीप्त और उत्तम रूप को धारण करने वाली द्रौपदी (कृष्णा) का भी जन्म हुआ।

श्लोक 153-154: प्रह्रादशिष्यो नग्नजित्सुबलश्चाभवत्ततः। तस्य प्रजा धर्महन्त्री जज्ञे देवप्रकोपनात्।। गान्धारराजपुत्रोऽभूच्छकुनिः सौबलस्तथा। दुर्योधनस्य जननी जज्ञातेऽर्थविशारदौ।। 

हिन्दी अनुवाद: प्रह्लाद के शिष्य नग्नजित् और सुबल हुए। देवताओं के कोप से उनकी धर्म का नाश करने वाली संतान उत्पन्न हुई। गांधारराज सुबल के पुत्र शकुनि (सौबल) तथा दुर्योधन की माता (गांधारी)— ये दोनों अर्थशास्त्र (नीति) में विशारद थे।

श्लोक 155-156: कृष्णद्वैपायनाज्जज्ञे धृतराष्ट्रो जनेश्वरः। क्षेत्रे विचित्रवीर्यस्य पाण्डुश्चैव महाबलः।। धर्मार्थकुशलो धीमान्मेधावी धूतकल्मषः। विदुरः शूद्रयोनौ तु जज्ञे द्वैपायनादपि।। 

हिन्दी अनुवाद: कृष्ण द्वैपायन (व्यास जी) द्वारा विचित्रवीर्य की क्षेत्र में (क्षेत्रोत्पन्न रूप से) राजा धृतराष्ट्र और महाबली पाण्डु का जन्म हुआ। तथा द्वैपायन से ही धर्म और अर्थ में कुशल, बुद्धिमान, मेधावी और पाप रहित विदुर ने शूद्र योनि (दासी के गर्भ) में जन्म लिया।

श्लोक 157-159: पाण्डोस्तु जज्ञिरे पञ्च पुत्रा देवसमाः पृथक्। द्वयोः स्त्रियोर्गुणज्येष्ठस्तेषामासीद्युधिष्ठिरः।। धर्माद्युधिष्ठिरो जज्ञे मारुताच्च वृकोदरः। इन्द्राद्धनंजयः श्रीमान्सर्वशस्त्रभृतां वरः।। जज्ञाते रूपसंपन्नावश्विभ्यां च यमावपि। नकुलः सहदेवश्च गुरुशुश्रूषणे रतौ।। 

हिन्दी अनुवाद: पाण्डु के दो स्त्रियों (कुंती और माद्री) से देवताओं के समान पाँच पुत्र हुए, जिनमें गुणों में सबसे ज्येष्ठ युधिष्ठिर थे। युधिष्ठिर धर्मराज से, भीमसेन वायुदेव से, और समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ श्रीमान् अर्जुन इन्द्र से उत्पन्न हुए। रूपवान यमदूर्य (अश्विनी कुमारों) से नकुल और सहदेव का जन्म हुआ, जो गुरुओं की सेवा में तत्पर रहते थे।

श्लोक 160-162: तथा पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः। दुर्योधनप्रभृतयो युयुत्सुः करणस्तथा।। ततो दुःशासनश्चैव दुःसहश्चापि भारत। दुर्मर्षणो विकर्णश्च चित्रसेनो विविंशतिः।। जयः सत्यव्रतश्चैव पुरुमित्रश्च भारत। वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च एकादश महारथाः।। 

हिन्दी अनुवाद: हे भारत! इसी प्रकार बुद्धिमान धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए, जिनमें दुर्योधन प्रमुख था; तथा युयुत्सु और कर्ण (पालक पुत्र के रूप में)। उनके नाम दुःशासन, दुःसह, दुर्मर्षण, विकर्ण, चित्रसेन, विविंशति, जय, सत्यव्रत, पुरुमित्र और वैश्यापुत्र युयुत्सु— ये ग्यारह महारथी थे।

श्लोक 163-164: अभिमन्युः सुभद्रायामर्जुनादभ्यजायत। स्वस्रीयो वासुदेवस्य पौत्रः पाण्डोर्महात्मनः।। पाण्डवेभ्यो हि पाञ्चाल्यां द्रौपद्यां पञ्च जज्ञिरे। कुमारा रूपसंपन्नाः सर्वशास्त्रविशारदाः।। 

हिन्दी अनुवाद: अर्जुन के द्वारा सुभद्रा के गर्भ से अभिमन्यु का जन्म हुआ, जो वासुदेव (श्रीकृष्ण) के भगिनीपुत्र (भांजे) और महात्मा पाण्डु के पौत्र थे। पाण्डवों से पंचाली (द्रौपदी) के गर्भ से पाँच पुत्र उत्पन्न हुए, जो सभी कुमार रूप-वान और समस्त शास्त्रों में विशारद थे।

श्लोक 165-167: प्रतिविन्ध्यो युधिष्ठिरात्सुतसोमो वृकोदरात्। अर्जुनाच्छ्रुतकीर्तिस्तु शतानीकस्तु नाकुलिः।। तथैव सहदेवाच्च श्रुतसेनः प्रतापवान्। हिडिम्बायां च भीमेन वने जज्ञे घटोत्कचः।। शिखण्डी द्रुपदाज्जज्ञे कन्या पुत्रत्वभागता। यां यक्षः पुरुषं चक्रे स्थूमः प्रियचिकीर्षया।। 

हिन्दी अनुवाद: युधिष्ठिर से प्रतिविन्ध्य, भीमसेन से सुतसोम, अर्जुन से श्रुतकीर्ति, नकुल से शतानीक और सहदेव से प्रतापी श्रुतसेन उत्पन्न हुआ। वन में भीमसेन के द्वारा हिडिम्बा के गर्भ से घटोत्कच का जन्म हुआ। द्रुपद के यहाँ शिखंडी का जन्म हुआ जो कन्या होते हुए भी पुत्र के रूप में परिणत हुई (जिसे यक्ष स्थूणकर्ण ने अपनी प्रिय कामना से पुरुष बना दिया था)।

श्लोक 168-169: कुरूणां विग्रहे तस्मिन्समागच्छन्बहून्यथ। राज्ञां शतसहस्राणि योत्स्यमानानि संयुगे।। तेषामपरिमेयानां नामधेयानि सर्वशः। न शक्यानि समाख्यातुं वर्षाणामयुतैरपि। एते तु कीर्तिता मुख्या यैराख्यानमिदं ततम्।। 

हिन्दी अनुवाद: उस कुरुक्षेत्र के युद्ध में युद्ध करने के लिए लाखों-करोड़ों राजा एकत्र हुए थे। उन अनगिनत राजाओं के सभी नाम दस हजार वर्षों में भी पूरी तरह कहे नहीं जा सकते। यहाँ तो केवल उन मुख्य-मुख्य पात्रों का वर्णन किया गया है जिनसे यह आख्यान (महाभारत) विस्तृत हुआ है।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
अंशावतरणपर्वणि चतुःषष्टितमोऽध्यायः।। 64 ।।

अंशावतरणपर्वणि त्रिषष्टितमोऽध्यायः

अंशावतरणपर्वणि पञ्चषष्टितमोऽध्यायः