विषय प्रवेश
यह श्लोक समूह महाभारत के आदिपर्व के अन्तर्गत संभव पर्व (अध्याय ६८) से लिया गया है। इस अध्याय में महर्षि वैशंपायन राजा जनमेजय को यह विस्तार से बताते हैं कि द्वापर युग के अंत में देवताओं, दानवों, गन्धर्वों और अप्सराओं आदि ने मनुष्यों के रूप में किस प्रकार पृथ्वी पर जन्म लिया था। यहाँ दानवों और असुरों के मानवीय रूपों में अवतरण का क्रमवार वर्णन किया गया है।
1. जरासन्धादीनां संभवः (जरासंध आदि का जन्म)
- संस्कृत श्लोक (1-68-4):
विप्रचित्तिरिति ख्यातो य आसीद्दानवर्षभः। जरासन्ध इति ख्यातः स आसीन्मनुजर्षभः।।
- हिन्दी अनुवाद: जो दानवश्रेष्ठ 'विप्रचित्ति' के नाम से विख्यात थे, वे ही मनुष्यों में श्रेष्ठ राजा जरासंध के रूप में उत्पन्न हुए थे।
- व्याख्या: मगध के प्रतापी और शक्तिशाली सम्राट जरासंध का पूर्वजन्म का स्वरूप दानवराज विप्रचित्ति था। इसी कारण उनके स्वभाव में प्रचंडता, शक्ति और असुरोचित तेज झलकता था।
2. द्रोणादीनां संभवः (द्रोणाचार्य आदि का जन्म)
(नोट: इस अध्याय की सूची में द्रोणाचार्य के जन्म का प्रसंग आगे या अन्यत्र संदर्भित है, जहाँ वे बृहस्पति के अंश से उत्पन्न माने गए हैं। इस विशिष्ट श्लोक सूची में यह क्रमगत नाम मात्र है।)
3. धृतराष्ट्रादीनां संभवः (धृतराष्ट्र आदि का जन्म)
(नोट: धृतराष्ट्र आदि का जन्म भी कौरव वंश के अंतर्गत इसी आनुवंशिक पृष्ठभूमि में वर्णित है।)
4. दुर्योधनादीनां संभवः (दुर्योधन आदि का जन्म)
(नोट: दुर्योधन को कलियुग या कलि का अंश तथा असुरों के समवेत बल का प्रतीक माना गया है, जो इस महावंश के विस्तार का मुख्य आधार है।)
5. युधिष्ठिरादीनां संभवः (युधिष्ठिर आदि का जन्म)
(नोट: युधिष्ठिर धर्मराज के अंश से उत्पन्न थे, जिनकी कथा इसी पर्व के आगे के अध्यायों में आती है।)
6. धृष्टद्युम्नादीनां संभवः (धृष्टद्युम्न आदि का जन्म)
(नोट: द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न अग्नि के अंश से उत्पन्न हुए थे, जो द्रोण के वध के लिए प्रकट हुए थे।)
7. पृथाचरित्रं। कर्णोत्पत्तिश्च (कुंती चरित्र और कर्ण की उत्पत्ति)
(नोट: कुंती (पृथा) के चरित्र और सूर्यपुत्र कर्ण के जन्म का वृत्तांत भी इसी कथा-क्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।)
8. बलरामादीनां संभवः (बलराम आदि का जन्म)
(नोट: भगवान बलराम शेषनाग के अवतार के रूप में यदुवंश में अवतरित हुए थे।)
9. द्रौपदीसंभवः (द्रौपदी का जन्म)
(नोट: पांचालराज द्रुपद के यहाँ यज्ञकुण्ड से द्रौपदी का प्राकट्य हुआ था, जो इंद्राणी या शची का अंश मानी गई हैं।)
10. कुन्तीमाद्र्योः संभवः (कुंती और माद्री का जन्म)
(नोट: पाण्डु की दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के प्राकट्य का प्रसंग यहाँ समाहित है।)
विस्तृत श्लोक अनुवाद एवं व्याख्या (जनमेजय के प्रश्न से आगे)
- संस्कृत श्लोक (1-68-1 से 1-68-3):
जनमेजय उवाच। देवानां दानवानां च गन्धर्वोरगरक्षसाम्। सिंहव्याघ्रमृगाणां च पन्नगानां पतत्त्रिणाम्।। अन्येषां चैव भूतानां संभवं भगवन्नहम्। श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन मानुषेषु महात्मनाम्। जन्म कर्म च भूतानामेतेषामनुपूर्वशः।। वैशंपायन उवाच। मानुषेषु मनुष्येन्द्र संभूता ये दिवौकसः। प्रथमं दानवाश्चैव तांस्ते वक्ष्यामि सर्वशः।।
- हिन्दी अनुवाद: जनमेजय ने कहा— हे भगवन्! मैं देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, सर्पों, राक्षसों, सिंहों, बाघों, मृगों, नागों, पक्षियों तथा अन्य समस्त प्राणियों एवं महात्माओं का मनुष्यों के रूप में किस प्रकार जन्म हुआ है, उन सबका जन्म और कर्म क्रमपूर्वक तत्त्व से सुनना चाहता हूँ। वैशंपायन जी बोले— हे मनुष्येन्द्र! मनुष्यों में जो देवता और सबसे पहले दानव उत्पन्न हुए हैं, उन सबका मैं विस्तार से वर्णन करता हूँ।
प्रमुख असुरों और उनके मानवीय अवतारों की सूची
- शिशुपाल का जन्म:
दितेः पुत्रस्तु यो राजन्हिरण्यकशिपुः स्मृतः। स जज्ञे मानुषे लोके शिशुपालो नरर्षभः।। (1-68-5) अनुवाद: हे राजन्!दिति के पुत्र जो 'हिरण्यकशिपु' कहे गए हैं, वे ही इस मनुष्य लोक में नरेषशष्ठ शिशुपाल के रूप में जन्मे।
- शल्य का जन्म:
संह्लाद इति विख्यातः प्रह्लादस्यानुजस्तु यः। स शल्य इति विख्यातो जज्ञे वाहीकपुङ्गवः।। (1-68-6) अनुवाद: प्रह्लाद के छोटे भाई जो 'संह्लाद' नाम से विख्यात थे, वे ही मद्रदेश के श्रेष्ठ राजा शल्य के रूप में उत्पन्न हुए।
- धृष्टकेतु का जन्म:
अनुह्लादस्तु तेजस्वी योऽभूत्ख्यातो जघन्यजः। धृष्टकेतुरिति ख्यातः स बभूव नरेश्वरः।। (1-68-7) अनुवाद: संह्लाद के भी छोटे भाई जो तेजस्वी अनुह्लाद थे, वे ही भूतल पर धृष्टकेतु नामक नरेश हुए।
- द्रुम का जन्म:
यस्तु राजञ्शिबिर्नाम दैतेयः परिकीर्तितः। द्रुम इत्यभिविख्यातः स आसीद्भुवि पार्थिवः।। (1-68-8) अनुवाद: हे राजन्! शिबि नामक जो दैत्य कहे गए हैं, वे ही पृथ्वी पर द्रुम नामक राजा हुए।
- भगदत्त का जन्म:
बाष्कलो नाम यस्तेषामासीदसुरसत्तमः। भगदत्त इति ख्यातः सं जज्ञे पुरुषर्षभः।। (1-68-9) अनुवाद: उन असुरों में जो बाष्कल नामक असुरश्रेष्ठ थे, वे ही पुरुषसिंह भगदत्त के रूप में उत्पन्न हुए।
अयःशिरा अश्वशिरा अयःशङ्कुश्च वीर्यवान्। तथा गगनमूर्धा च वेगवांश्चात्र पञ्चमः।। 1-68-10a पञ्चैते जज्ञिरे राजन्वीर्यवन्तो महासुराः। केकयेषु महात्मानः पार्थिवर्षभसत्तमाः। केतुमानिति विख्यातो यस्ततोऽन्यःप्रतापवान्।। 1-68-11a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! पराक्रमी अयःशिरा, अश्वशिरा, वीर अयःशङ्कु, गगनमूर्धा और पाँचवें वेगवान्—ये पाँचों महापराक्रमी महासुर केकय देश में महात्मा एवं श्रेष्ठ राजाओं के रूप में उत्पन्न हुए। इनके अतिरिक्त एक अन्य प्रतापवान् राजा हुए जो 'केतुमान्' के नाम से विख्यात थे।
- व्याख्या: महाभारत के संभव पर्व के इन श्लोकों में वैशंपायन जी राजा जनमेजय को बता रहे हैं कि पाताल के शक्तिशाली दैत्य और असुर पृथ्वी पर राजाओं के रूप में क्यों और कहाँ जन्मे। केकय देश में जन्म लेने वाले ये पाँचों महासुर अपनी वीरता और उग्र स्वभाव के लिए जाने जाते थे। असुरों का यह मानवीय अवतरण ही आगे चलकर महाभारत के युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार करता है।
अमितौजा इति ख्यातः सोग्रकर्मा नराधिपः। स्वर्भानुरिति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः।। 1-68-12a उग्रसेन इति ख्यात उग्रकर्मा नराधिपः। यस्त्वश्व इति विख्यातः श्रीमानासीन्महासुरः।। 1-68-13a
- हिन्दी अनुवाद: जो श्रीमान् महासुर 'स्वर्भानु' के नाम से विख्यात थे, वे ही पृथ्वी पर उग्र कर्म करने वाले राजा 'अमितौजा' के रूप में प्रसिद्ध हुए। इसी प्रकार जो श्रीमान् महासुर 'अश्व' नाम से विख्यात थे, वे ही उग्रकर्मा राजा 'उग्रसेन' हुए।
- व्याख्या: यहाँ स्वर्भानु नामक प्रसिद्ध दैत्य का पृथ्वी पर अमितौजा नाम के राजा के रूप में जन्म लेना बताया गया है। साथ ही, अश्व नामक महासुर यदुवंश में कंस के पिता महाराज उग्रसेन के रूप में अवतरित हुए थे। असुरों के ये रूप उनके पूर्वजन्म के संस्कारों और कर्मों के अनुरूप ही धरातल पर प्रकट हुए थे।
अशोको नाम राजाऽभून्महावीर्योऽपराजितः। तस्मादवरजो यस्तु राजन्नश्वपतिः स्मृतः।। 1-68-14a दैतेयः सोऽभवद्राजा हार्दिक्यो मनुजर्षभः। वृषपर्वेति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः।। 1-68-15a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! महावीर्यवान् और अपराजित 'अशोक' नामक राजा हुए। उनसे छोटे भाई के रूप में 'अश्वपति' नामक राजा प्रसिद्ध हुए। वे दैतेय (दैत्य) ही इस मनुष्य लोक में मनुष्यों में श्रेष्ठ 'हार्दिक्य' राजा हुए। जो श्रीमान् महासुर 'वृषपर्वन्' के नाम से विख्यात थे...
- व्याख्या: इन श्लोकों में अशोक, अश्वपति और हार्दिक्य (कृतवर्मा के वंश या संदर्भ से जुड़े राजा) के रूप में दैत्यों के जन्म का उल्लेख है। राजा अशोक और अश्वपति जैसे पराक्रमी शासकों के पीछे असुरों के अंशावतार की बात कही गई है, जो तत्कालीन राजनीतिक पटल पर अत्यधिक प्रभावशाली थे।
दीर्घप्रज्ञ इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः। अजकस्त्ववरो राजन्य आसीद्वृषपर्वणः।। 1-68-16a स शाल्व इति विख्यातः पृथिव्यामभवन्नृपः। अश्वग्रीव इति ख्यातः सत्ववान्यो महासुरः।। 1-68-17a
- हिन्दी अनुवाद: ...वे ही पृथ्वी पर 'दीर्घप्रज्ञ' नाम के राजा हुए। हे राजन्! वृषपर्वा के छोटे भाई 'अजक' थे। जो सत्त्ववान् महासुर 'अश्वग्रीव' नाम से विख्यात थे, वे ही पृथ्वी पर प्रतापी राजा 'शाल्व' के रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: यहाँ वृषपर्वा और अश्वग्रीव जैसे शक्तिशाली असुरों के पुनर्जन्म का विवरण है। असुर अश्वग्रीव ने ही पृथ्वी पर राजा शाल्व के रूप में जन्म लिया था, जिनका महाभारत काल में और खासतौर पर शिशुपाल तथा कौरवों के साथ गहरा संबंध रहा है।
रोचमान इति ख्यातः पृथिव्यां कोऽभवन्नृपः। सूक्ष्मस्तु मतिमान्राजन्कीर्तिमान्यः प्रकीर्तितः।। 1-68-18a बृहद्रथ इति ख्यातः क्षितावासीत्स पार्थिवः। तुहुण्ड इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः।। 1-68-19a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! जो मतिमान् और कीर्तिमान् 'सूक्ष्म' कहे गए हैं, वे ही पृथ्वी पर 'रोचमान' नाम के राजा हुए। इसी प्रकार जो असुरोत्तम 'तुहुण्ड' के नाम से विख्यात थे, वे ही इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध राजा 'बृहद्रथ' हुए।
- व्याख्या: सूक्ष्म नामक असुर ने रोचमान राजा के रूप में और महासुर तुहुण्ड ने मगध के प्रतापी सम्राट बृहद्रथ के रूप में जन्म लिया था। बृहद्रथ वही राजा हैं जिनके यहाँ जरासंध का जन्म हुआ था और जिनके वंश ने मगध साम्राज्य को सुदृढ़ किया था।
सेनाबिन्दुरिति ख्यातः स बूभव नराधिपः। इषुमान्नाम यस्तेषामसुराणां बलाधिकः।। 1-68-20a
- हिन्दी अनुवाद: जो उन असुरों में अत्यधिक बलवान् 'इषुमान्' नाम के असुर थे, वे ही पृथ्वी पर 'सेनाबिन्दु' नाम से विख्यात नराधिप (राजा) हुए।
- व्याख्या: अत्यधिक बलशाली माने जाने वाले इषुमान् असुर का मानवीयवतार सेनाबिन्दु नामक राजा के रूप में हुआ। यह श्रृंखला दिखाती है कि कैसे पाताल लोक के बलवान असुर द्वापर युग के अंत में अलग-अलग राज्यों के राजा बनकर पृथ्वी पर भारी वजन (भार) बन गए थे।
नग्नजिन्नाम राजासीद्भुवि विख्यातविक्रमः। एकचक्र इति ख्यात आसीद्यस्तु महासुरः।। 1-68-21a प्रतिविन्घ्य इति ख्यातो बभूव प्रथितः क्षितौ। विरूपाक्षस्तु दैतेयश्चित्रयोधी महासुरः।। 1-68-22a
- हिन्दी अनुवाद: पृथ्वी पर अपनी वीरता के लिए विख्यात 'नग्नजित्' नाम के राजा हुए। जो महासुर 'एकचक्र' के नाम से विख्यात थे, वे ही इस पृथ्वी पर प्रसिद्ध राजा 'प्रतिविन्ध्य' हुए। इसके अलावा दैत्य कुल में उत्पन्न हुए चित्रयोधी महासुर 'विरूपाक्ष' थे।
- व्याख्या: महाभारत काल के प्रसिद्ध राजा नग्नजित् (जो गांधार या कम्बोज क्षेत्र से जुड़े थे) और प्रतिविन्ध्य के पूर्वजन्म का आधार असुरों का पराक्रम बताया गया है। विरूपाक्ष जैसे विचित्र युद्ध कौशल वाले दैत्य भी भूतल पर राजाओं के रूप में अवतरित हुए थे।
चित्रधर्मेति विख्यातः क्षितावासीत्स पार्थिवः। हरस्त्वरिहरो वीर आसीद्यो दानवोत्तमः।। 1-68-23a सुबाहुरिति विख्यातः श्रीमानासीत्स पार्थिवः। अहरस्तु महातेजाः शत्रुपक्षक्षयंकरः।। 1-68-24a
- हिन्दी अनुवाद: जो दानवोत्तम वीर 'हर' (अरिहर) थे, वे ही पृथ्वी पर 'चित्रधर्म' नाम के राजा हुए। इसी प्रकार जो शत्रुपक्ष का नाश करने वाले महातेजा 'अहर' नामक असुर थे, वे ही श्रीमान् राजा 'सुबाहु' के रूप में पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुए।
- व्याख्या: यहाँ दानवश्रेष्ठ हर और अहर के पुनर्जन्म का क्रमशः चित्रधर्म और सुबाहु राजाओं के रूप में वर्णन किया गया है। ये सभी शासक अपने उग्र और युद्धप्रिय स्वभाव के कारण जाने जाते थे।
बाह्लिको नाम राजा स बभूव प्रथितः क्षितौ। निचन्द्रश्चन्द्रवक्त्रस्तु य आसीदसुरोत्तमः।। 1-68-25a मुञ्जकेश इति ख्यातः श्रीमानासीत्स पार्थिवः। निकुम्भस्त्वजितः संख्ये महामतिरजायत।। 1-68-26a
- हिन्दी अनुवाद: जो असुरोत्तम 'निचन्द्र' (चन्द्रवक्त्र) थे, वे ही पृथ्वी पर प्रसिद्ध राजा 'बाह्लिक' हुए। इसी प्रकार जो युद्ध में अजय और महाबुद्धिमान् महासुर 'निकुम्भ' थे, वे ही पृथ्वी पर श्रीमान् राजा 'मुञ्जकेश' के रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: बाह्लीक देश के प्रसिद्ध राजा बाह्लीक का पूर्वजन्म निचन्द्र असुर था। साथ ही, निकुम्भ जैसे पराक्रमी और अजेय असुर ने मुञ्जकेश नामक राजा के रूप में पृथ्वी पर जन्म लिया था।
भूमौ भूमिपतिश्रेष्ठो देवाधिप इति स्मृतः। शरभो नाम यस्तेषां दैतेयानां महासुरः।। 1-68-27a पौरवो नाम राजर्षिः स बभूव नरोत्तमः। कुपटस्तु महावीर्यः श्रीमान्राजन्महासुरः।। 1-68-28a
- हिन्दी अनुवाद: दैत्यों में जो 'शरभ' नामक महासुर थे, वे ही इस भूमि पर भूमिपतियों में श्रेष्ठ 'देवाधिप' नाम से जाने गए। जो महावीर्यवान् और श्रीमान् महासुर 'कुपट' थे, वे ही नरोत्तम राजर्षि 'पौरव' के रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: दैत्यराज शरभ का अवतार देवाधिप के रूप में और कुपट महासुर का अवतार पौरव राजर्षि के रूप में हुआ था। यह इस बात का प्रतीक है कि उच्च कुलों या राजर्षि कहे जाने वाले कई पात्रों की पृष्ठभूमि भी दैवीय संतुलन बिगाड़ने वाले असुरों से जुड़ी थी।
सुपार्श्व इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः। कपटस्तु राजन्राजर्षिः क्षितौ जज्ञे महासुरः।। 1-68-29a पार्वतेय इति ख्यातः काञ्चनाचलसन्निभः। द्वितीयः शलभस्तेषामसुराणां बभूव ह।। 1-68-30a
- हिन्दी अनुवाद: जो महासुर 'कपट' नाम से विख्यात थे, वे ही पृथ्वी पर 'सुपार्श्व' नाम के महीपति (राजा) के रूप में जन्मे। इसके अतिरिक्त सुवर्ण के पर्वत (सुमेरु) के समान कांति वाले और असुरों में दूसरे 'शलभ' कहे जाने वाले महासुर 'पार्वतेय' के रूप में विख्यात हुए।
- व्याख्या: यहाँ कपट असुर के सुपार्श्व राजा बनने और शलभ नामक असुर के पर्वतीय क्षेत्र के प्रतापी राजा 'पार्वतेय' के रूप में जन्म लेने का प्रसंग है।
प्रह्लादो नाम बाह्लीकः स बभूव नराधिपः। चन्द्रस्तु दितिजश्रेष्ठो लोके ताराधिपोपमः।। 1-68-31a चन्द्रवर्मेति विख्यातः काम्बोजानां नराधिपः। अर्क इत्यभिविख्यातो यस्तु दानवपुङ्गवः।। 1-68-32a
- हिन्दी अनुवाद: प्रह्लाद नामक बाह्लीक राजा हुए। दिति के पुत्रों में श्रेष्ठ तथा आकाश के चंद्रमा के समान कांति वाले जो 'चंद्र' नाम के दैत्यश्रेष्ठ थे, वे ही संसार में 'चंद्रवर्मा' नाम से विख्यात काम्बोज देश के राजा हुए। जो दानवश्रेष्ठ 'अर्क' नाम से विख्यात थे...
- व्याख्या: चंद्र नामक दितिज श्रेष्ठ ने काम्बोज के राजा चंद्रवर्मा के रूप में जन्म लिया था। प्राचीन राजवंशों में ऐसे असुरों का प्रवेश कथा को महाभारत के महान संहार की ओर ले जाता है।
ऋषिको नाम राजर्षिर्बभूव नृपसत्तमः। मृतपा इति विख्यातो य आसीदसुरोत्तमः।। 1-68-33a पश्चिमानूपकं विद्धि तं नृपं नृपसत्तम। गविष्ठस्तु महातेजाः यः प्रख्यातो महासुरः।। 1-68-34a
- हिन्दी अनुवाद: ...वे ही असुरोत्तम 'मृतपा' नाम से विख्यात थे और नृपश्रेष्ठ 'ऋषिक' नामक राजर्षि हुए। हे नृपसत्तम! महातेजा महासुर जो 'गविष्ठ' के नाम से प्रख्यात थे, उन्हें तुम 'पश्चिमानूपक' देश का राजा समझो।
- व्याख्या: असुरोत्तम मृतपा का जन्म ऋषिक राजर्षि के रूप में तथा महातेजा गविष्ठ का जन्म पश्चिमानूपक नरेश के रूप में होना बताया गया है।
द्रुमसेन इति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः। मयूर इति विख्यातः श्रीमान्यस्तु महासुरः।। 1-68-35a स विश्व इति विख्यातो बभूव पृथिवीपतिः। सुपर्ण इति विख्यातस्तस्मादवरजस्तु यः।। 1-68-36a
- हिन्दी अनुवाद: जो श्रीमान् महासुर 'मयूर' नाम से विख्यात थे, वे ही पृथ्वी पर 'द्रुमसेन' नाम के राजा हुए। जो 'सुपर्ण' नाम से विख्यात थे और उनके छोटे भाई थे, वे ही 'विश्व' नाम से प्रसिद्ध पृथ्वीपति हुए।
- व्याख्या: मयूर महासुर ने द्रुमसेन राजा के रूप में और सुपर्ण के छोटे भाई ने विश्व नामक पृथ्वीपति के रूप में अवतार लिया था।
कालकीर्तिरिति ख्यातः पृथिव्यां सोऽभवन्नृपः। चन्द्रहन्तेति यस्तेषां कीर्तितः प्रवरोऽसुरः।। 1-68-37a शुनको नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः। विनाशनस्तु चन्द्रस्य य आख्यातो महासुरः।। 1-68-38a
- हिन्दी अनुवाद: उन असुरों में जो 'चंद्रहन्ता' नाम के प्रवर असुर कीर्तन किए गए हैं, वे ही पृथ्वी पर 'कालकीर्ति' नाम के राजा हुए। इसी प्रकार चंद्र का नाश करने वाले जो महासुर 'विनाशन' कहे गए हैं, वे ही राजर्षि 'शुनक' नाम के नराधिप हुए।
- व्याख्या: चंद्रमा के विरोधी या नाशक माने जाने वाले चंद्रहन्ता और विनाशन असुरों ने क्रमशः कालकीर्ति और शुनक राजर्षि के रूप में मानवीय चोले में जन्म लिया था।
जानकिर्नाम विख्यातः सोऽभवन्मनुजाधिपः। दीर्घजिह्वस्तु कौरव्य य उक्तो दानवर्षभः।। 1-68-39a काशिराजः स विख्यातः पृथिव्यां पृथिवीपते। ग्रहं तु सुषुवे यं तु सिंहिकार्केन्दुमर्दनम्। स क्राथ इति विख्यातो बभूव मनुजाधिपः।। 1-68-40a
- हिन्दी अनुवाद: हे कौरव्य! दानवश्रेष्ठ जो 'दीर्घजिह्व' कहे गए हैं, वे ही विख्यात मनुजाधिप जानकि (जनक) हुए। हे पृथिवीपते! सिंहिका के पुत्र राहु (जो सूर्य और चंद्रमा का मर्दन करने वाला ग्रह है) ने जिस 'क्राथ' को उत्पन्न किया, वही दानवश्रेष्ठ पृथ्वी पर प्रसिद्ध काशिराज (काशी के राजा) के रूप में मनुजाधिप हुआ।
- व्याख्या: इस श्लोक में बहुत महत्वपूर्ण संकेत है कि दानवश्रेष्ठ दीर्घजिह्व ने जानकि (जनक) के रूप में और राहु-संबंधित या सिंहिका के कुल से जुड़े क्राथ ने काशी के प्रतापी राजा (काशिराज) के रूप में जन्म लिया था।
दनायुषस्तु पुत्राणां चतुर्णां प्रवरोऽसुरः। विक्षरो नाम तेजस्वी वसुमित्रो नृपः स्मृतः।। 1-68-41a द्वितीयो विक्षराद्यस्तु नराधिप महासुरः। पाण्ड्यराष्ट्राधिप इति विख्यातः सोऽभवन्नृपः।। 1-68-42a
- हिन्दी अनुवाद: दनायु के चारों पुत्रों में जो तेजस्वी और प्रवर असुर 'विक्षर' नाम के थे, वे ही पृथ्वी पर 'वसुमित्र' नामक राजा हुए। विक्षर से दूसरे जो महासुर नराधिप थे, वे ही 'पाण्ड्यराष्ट्र के अधिपति' (पाण्ड्य नरेश) के रूप में विख्यात राजा हुए।
- व्याख्या: दनायु नामक दैत्य की संतानें किस प्रकार दक्षिण और अन्य क्षेत्रों में राजा बनीं, इसका वर्णन यहाँ है। विक्षर असुर ने वसुमित्र और पाण्ड्यराज के रूप में जन्म लिया था।
बली वीर इति ख्यातो यस्त्वासीदसुरोत्तमः। पौण्ड्रमात्स्यक इत्येवं बभूव स नराधिपः।। 1-68-43a वृत्र इत्यभिविख्यातो यस्तु राजन्महासुरः। मणिमान्नाम राजर्षिः स बभूव नराधिपः।। 1-68-44a
- हिन्दी अनुवाद: असुरों में जो 'बली' नाम से विख्यात वीर असुरोत्तम थे, वे ही 'पौण्ड्र' और 'मात्स्यक' देशों के नराधिप (राजा) हुए। हे राजन्! जो महासुर 'वृत्र' के नाम से भली-भांति विख्यात थे, वे ही नराधिप राजर्षि 'मणिमान्' के रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: महाबली और वृत्र जैसे प्रसिद्ध एवं शक्तिशाली असुरों का प्राकट्य पौण्ड्र, मत्स्य तथा मणिमान राजर्षि के रूप में हुआ था, जो युद्ध में अत्यधिक शक्तिशाली माने जाते थे।
क्रोधहन्तेति यस्तस्य बभूवावरजोऽसुरः। दण्ड इत्यभिविख्यातः स आसीन्नृपतिः क्षितौ।। 1-68-45a क्रोधवर्धन इत्येवं यस्त्वन्यः परिकीर्तितः। दण्डधार इति ख्यातः सोऽभवन्मनुजर्षभः।। 1-68-46a
- हिन्दी अनुवाद: उनके छोटे भाई जो 'क्रोधहन्ता' नामक असुर थे, वे ही पृथ्वी पर 'दण्ड' नाम से विख्यात नृपति हुए। दूसरे जो 'क्रोधवर्धन' नाम से कहे गए हैं, वे ही मनुष्यों में श्रेष्ठ 'दण्डधार' राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए।
- व्याख्या: क्रोधहन्ता और क्रोधवर्धन नामक असुरों ने पृथ्वी पर दण्ड और दण्डधार नामक राजाओं के रूप में जन्म लिया, जिनका स्वभाव कठोर और शासन दण्डात्मक था।
कालेयानां तु ये पुत्रास्तेषामष्टौ नराधिपाः। जज्ञिरे राजशार्दूल शार्दूलसमविक्रमाः।। 1-68-47a मगधेषु जयत्सेनस्तेषामासीत्स पार्थिवः। अष्टानां प्रवरस्तेषां कालेयानां महासुरः।। 1-68-48a द्वितीयस्तु ततस्तेषां श्रीमान्हरिहयोपमः। अपराजित इत्येवं स बभूव नराधिपः।। 1-68-49a तृतीयस्तु महातेजा महामायो महासुरः। निषादाधिपतिर्जज्ञे भुवि भीमपराक्रमः।। 1-68-50a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजशार्दूल! कालेय असुरों के जो आठ पुत्र थे, वे सब बाघ के समान पराक्रमी राजा हुए। उनमें जो कालेय महासुरों में प्रवर थे, वे मगध देश में 'जयत्सेन' नाम के पार्थिव (राजा) हुए। उन आठों में दूसरे जो इंद्र के समान श्रीमान् थे, वे 'अपराजित' नामक नराधिप हुए। तीसरे जो महातेजा, महामायी और भीमपराक्रमी महासुर थे, वे इस पृथ्वी पर 'निषादों के अधिपति' (निषादाधिपति) के रूप में जन्मे।
- व्याख्या: कालेय कुल के आठ शक्तिशाली असुर भाइयों ने मगध और अन्य क्षेत्रों में राजाओं के रूप में जन्म लिया, जिनमें जयत्सेन, अपराजित और निषादराज प्रमुख थे।
तेषामन्यतमो यस्तु चतुर्थः परिकीर्तितः। श्रेणिमानिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः।। 1-68-51a पञ्चमस्त्वभवत्तेषां प्रवरो यो महासुरः। महौजा इति विख्यातो बभूवेह परन्दपः।। 1-68-52a षष्ठस्तु मतिमान्यो वै तेषामासीन्महासुरः। अभीरुरिति विख्यातः क्षितौ राजर्षिसत्तमः।। 1-68-53a समुद्रसेनस्तु नृपस्तेषामेवाभवद्गणात्। विश्रुतः सागरान्तायां क्षितौ धर्मार्थतत्त्ववित्।। 1-68-54a बृहन्नामाष्टमस्तेषां कालेयानां नराधिप। बभूव राजा धर्मात्मा सर्वभूतहिते रतः।। 1-68-55a
- हिन्दी अनुवाद: उनमें जो चौथे कहे गए हैं, वे पृथ्वी पर राजर्षिसोत्तम 'श्रेणिमान्' नाम से विख्यात हुए। पाँचवें जो प्रवर महासुर थे, वे शत्रुओं को ताप देने वाले 'महौजा' नाम से यहाँ प्रकट हुए। छठे जो मतिमान् महासुर थे, वे पृथ्वी पर राजर्षिसोत्तम 'अभीरु' नाम से विख्यात हुए। उसी गण के राजा 'समुद्रसेन' हुए, जो समुद्र पर्यंत पृथ्वी पर धर्म और अर्थ के तत्त्व को जानने वाले के रूप में प्रसिद्ध हुए। हे नराधिप! उन कालेय असुरों में आठवें राजा 'बृहत्' हुए, जो धर्मात्मा और समस्त प्राणियों के हित में रत रहने वाले राजा थे।
- व्याख्या: कालेय असुरों के इन विभिन्न रूपों (श्रेणिमान्, महौजा, अभीरु, समुद्रसेन और बृहत्) ने अपने-अपने क्षेत्रों में शासन किया, जिनमें कुछ धर्मात्मा स्वभाव के भी प्रतीत होते हैं।
कुक्षिस्तु राजन्विख्यातो दानवानां महाबलः। पार्वतीय इति ख्यातः काञ्चनाचलसन्निभः।। 1-68-56a क्रथनश्च महावीर्यः श्रीमान्राजा महासुरः। सूर्याक्ष इति विख्यातः क्षितौ जज्ञे महीपतिः।। 1-68-57a असुराणां तु यः सकूर्यः श्रीमांश्चैव महासुरः। दरदो नाम बाह्लीकः वरः सर्वमहीक्षिताम्।। 1-68-58a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! दानवों में महाबली जो 'कुक्षि' नाम से विख्यात थे, वे ही सुवर्ण पर्वत के समान कांति वाले 'पार्वतीय' के रूप में विख्यात हुए। महावीर्यवान् और श्रीमान् महासुर 'क्रथन' ही पृथ्वी पर 'सूर्याक्ष' नाम से प्रसिद्ध महीपति (राजा) के रूप में जन्मे। असुरों में जो 'सकूर्य' श्रीमान् महासुर थे, वे सब राजाओं में श्रेष्ठ 'दरद' नामक बाह्लीक राजा हुए।
- व्याख्या: कुक्षि, क्रथन और सकूर्य जैसे महासुरों का अवतरण पार्वतीय, सूर्याक्ष और दरद (बाह्लीक) के रूप में हुआ था, जो तत्कालीन भूराजनीति में बड़े योद्धा थे।
गणः क्रोधवशो नाम यस्ते राजन्प्रकीर्तितः। ततः संजज्ञिरे वीराः क्षिताविह नराधिपाः।। 1-68-59a मद्रकः कर्णवेष्टश्च सिद्धार्थः कीटकस्तथा। सुवीरश्च सुबाहुश्च महावीरोऽथ बाह्लिकः।। 1-68-60a क्रथो विचित्रः सुरथः श्रीमान्नीलश्च भूमिपः। चीरवासाश्च कौरव्य भूमिपालश्च नामतः।। 1-68-61a दन्तवक्त्रश्च नामासीद्दुर्जयश्चैव दानवः। रुक्मी च नृपशार्दूलो राजा च जनमेजयः।। 1-68-62a आषाढो वायुवेगश्च भूरितेजास्तथैव च। एकलव्यः सुमित्रश्च वाटधानोऽथ गोमुखः।। 1-68-63a कारूषकाश्च राजानः क्षेमधूर्तिस्तथैव च। श्रुतायुरुद्वहश्चैव बृहत्सेनस्तथैव च।। 1-68-64a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! 'क्रोधवश' नाम का जो असुरों का गण कहा गया है, पृथ्वी पर वीर नराधिप के रूप में उन्हीं से ये सब उत्पन्न हुए—मद्रक, कर्णवेष्ट, सिद्धार्थ, कीटक, सुवीर, सुबाहु, महावीर बाह्लिक, क्रथ, विचित्र, सुरथ, श्रीमान् भूमिप नील, हे कौरव्य! चीरवासा, भूमिपाल, दानव दन्तवक्त्र, दुर्जय, नृपशार्दूल रुक्मी, राजा जनमेजय, आषाढ, वायुवेग, भूरितेजा, एकलव्य, सुमित्र, वाटधान, गोमुख, कारूष देश के राजा, क्षेमधूति, श्रुतायु, उद्वह और बृहत्सेन।
- व्याख्या: इन अंतिम श्लोकों में 'क्रोधवश' नामक असुर गण के व्यापक विस्तार का वर्णन है। महाभारत काल के कई जाने-माने और शक्तिशाली राजा एवं योद्धा—जैसे रुक्मी, दन्तवक्त्र, एकलव्य, जनमेजय (विभिन्न प्रसंग), और शाल्व-कौरव पक्ष से जुड़े कई प्रमुख नरेश—इसी क्रोधवश गण के अंश से उत्पन्न बताए गए हैं, जिनका अंत युद्ध में निश्चित था।
क्षेमोग्रतीर्थः कुहरः कलिङ्गेषु नराधिपः। मतिमांश्च मनुष्येन्द्र ईश्वरश्चेति विश्रुतः।। 1-68-65a गणात्क्रोधवशादेष राजपूगोऽभवत्क्षितौ। जातः पुरा महाभागो महाकीर्तिर्महाबलः।। 1-68-66a कालनेमिरिति ख्यातो दानवानां महाबलः। स कंस इति विख्यात उग्रसेनसुतो बली।। 1-68-67a
- हिन्दी अनुवाद: कलिङ्ग देश में क्षेम, उग्रतीर्थ, कुहर, मतिमान् और ईश्वर नाम से जो नराधिप (राजा) विख्यात हुए, वे सब क्रोधवश नामक असुर गण के ही राजाओं का समूह थे। प्राचीन काल में जो महाबलवान्, महाकीर्तिशाली और महाभाग दानव 'कालनेमि' के नाम से विख्यात थे, वे ही उग्रसेन के पुत्र बलवान् राजा कंस के रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: कलिङ्ग के इन राजाओं के साथ-साथ यदुवंश में आतंक का पर्याय बने राजा कंस का पूर्वजन्म प्रख्यात महासुर कालनेमि था, जिसका वध भगवान श्रीकृष्ण ने किया था।
यस्त्वासीद्देवको नाम देवराजसमद्युतिः। स गन्धर्वपतिर्मुख्यः क्षितौ जज्ञे नराधिपः।। 1-68-68a बृहस्पतेर्बृहत्कीर्तेर्देवर्षेर्विद्धि भारत। अंशाद्द्रोणं समुत्पन्नं भारद्वाजमयोनिजम्।। 1-68-69a
- हिन्दी अनुवाद: देवराज इंद्र के समान कांति वाले जो मुख्य गन्धर्वपति 'देवदक' (देवको नाम) थे, वे ही पृथ्वी पर नराधिप (राजा देवक) हुए। हे भारत! देवर्षि तथा महान् कीर्ति वाले बृहस्पति के अंश से अयोनिज (गर्भ से उत्पन्न न होने वाले) भारद्वाज पुत्र द्रोणाचार्य उत्पन्न हुए, ऐसा जानो।
- व्याख्या: देवक (जो कंस के नाना थे) गन्धर्वराज के अंश से थे। वहीं, कौरव-पाण्डवों के गुरु द्रोणाचार्य सीधे देवर्षि बृहस्पति के अंश से अयोनिज रूप में प्रकट हुए थे।
धन्विनां नृपशार्दूल यः सर्वास्त्रविदुत्तमः। धनुर्वेदे च वेदे च यं तं वेदविदो विदुः। वरिष्ठं चित्रकर्माणं द्रोणं स्वकुलवर्धनम्।। 1-68-71a महादेवान्तकाभ्यां च कामात्क्रोधाच्च भारत। एकत्वमुपसंपद्य जज्ञे शूरः परन्तपः।। 1-68-72a अश्वत्थामा महावीर्यः शत्रुपक्षभयावहः। वीरः कमलपत्राक्षः क्षितावासीन्नराधिपः।। 1-68-73a
- हिन्दी अनुवाद: हे नृपशार्दूल! वे द्रोण धनुर्धरों में श्रेष्ठ, सभी अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता, धनुर्वेद और वेदों के मर्मज्ञ तथा अपने कुल को बढ़ाने वाले थे। हे भारत! महादेव, यम, काम और क्रोध—इन चारों की शक्तियों का एकीकरण होकर शूरवीर, शत्रुओं को ताप देने वाले, महावीर्यवान्, शत्रुओं के लिए भयावह और कमलपत्राक्ष महाबली अश्वत्थामा पृथ्वी पर नराधिप के रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: द्रोणाचार्य की महिमा के बाद उनके पुत्र अश्वत्थामा के जन्म का रहस्य बताया गया है। अश्वत्थामा साधारण मानव नहीं, बल्कि भगवान शिव, यम, काम और क्रोध के समवेत अंश (संयोग) से प्रकट हुए महायोद्धा थे।
जज्ञिरे वसवस्त्वष्टौ गङ्गायां शन्तनोः सुताः। वसिष्ठस्य च शापेन नियोगाद्वासवस्य च।। 1-68-74a तेषामवरजो भीष्मः कुरूणामभयङ्करः। मतिमान्वेदविद्वाग्मी शत्रुपक्षक्षयङ्करः।। 1-68-75a जामदग्न्येन रामेण सर्वास्त्रविदुषां वरः। योऽप्युध्यत महातेजा भार्गवेण महात्मना।। 1-68-76a
- हिन्दी अनुवाद: वसिष्ठ ऋषि के शाप से तथा इंद्र की आज्ञा से आठ वसुओं ने गंगा के गर्भ से महाराज शंतनु के पुत्रों के रूप में जन्म लिया। उन सब में सबसे छोटे भाई कुरुवंश को अभय देने वाले, मतिमान्, वेदज्ञ, वाग्मी और शत्रुपक्ष का नाश करने वाले भीष्म थे, जिन्होंने सभी अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता महात्मा परशुराम (जामदग्न्य राम) के साथ भी महायुद्ध किया था।
- व्याख्या: पितामह भीष्म अष्टवसुओं में से एक थे, जो मानवीय रूप में गंगा और शंतनु के पुत्र के रूप में अवतरित हुए थे और जिन्होंने परशुराम जैसे महान गुरु से भी द्वन्द्व युद्ध किया था।
यस्तु राजन्कृपो नाम ब्रह्मर्षिरभवत्क्षितौ। रुद्राणां तु गणाद्विद्धि संभूतमतिपौरुषम्।। 1-68-77a शकुनिर्नाम यस्त्वासीद्राजा लोके महारथः। द्वापरं विद्धि तं राजन्संभूतमरिमर्दनम्।। 1-68-78a सात्यकिः सत्यसन्धश्च योऽसौ वृष्णिकुलोद्वहः। पक्षात्स जज्ञे मरुतां देवानामरिमर्दनः।। 1-68-79a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! जो 'कृप' नामक ब्रह्मर्षि पृथ्वी पर हुए, उन्हें रुद्रों के गण से उत्पन्न अतिपौरुषवान् जानो। संसार में महारथी राजा जो 'शकुनि' नाम से थे, हे राजन्! उन्हें अरिमर्दन द्वापर (द्वापर युग के देवता या अंश) के रूप में उत्पन्न हुआ समझो। सत्यसंधी और वृष्णिकुल के उद्वाहक जो 'सात्यकि' हैं, वे देवताओं के मरुत् गण के अंश से शत्रुओं का मर्दन करने वाले रूप में जन्मे थे।
- व्याख्या: आचार्य कृप रुद्रों के अंश से, धृतराष्ट्र के साले शकुनि स्वयं द्वापर युग के मानवीय अवतार (अंश) थे, और यदुवंशी सात्यकि मरुद्गण के अंश से उत्पन्न हुए थे। यह पूरी सूची स्पष्ट करती है कि महाभारत का युद्ध केवल मनुष्यों का नहीं, बल्कि विभिन्न लोकों, देवताओं, गंधर्वों और असुरों के अंशावतारों का एक महासंग्राम था।
द्रुपदश्चैव राजर्षिस्तत एवाभवद्गणात्। मानुषे नृप लोकेऽस्मिन्सर्वशस्त्रभृतां वरः।। 1-68-80a ततश्च कृतवर्माणं विद्धि राजञ्जनाधिपम्। तमप्रतिमकर्माणं क्षत्रियर्षभसत्तमम्।। 1-68-81a मरुतां तु गणाद्विद्धि संजातमरिमर्दनम्। विराटं नाम राजानं परराष्ट्रप्रतापनम्।। 1-68-82a
- हिन्दी अनुवाद: हे नृप! मरुद्गणों के उसी समूह से समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ राजर्षि द्रुपद इस मनुष्य लोक में उत्पन्न हुए। हे राजन्! तुम अप्रतिम कर्मा तथा क्षत्रियों में श्रेष्ठ जनाधिप कृतवर्मा को भी मरुद्गण का ही अंश जानो। शत्रुओं का मर्दन करने वाले तथा परराष्ट्र को प्रतापी करने वाले राजा विराट को भी मरुतों के गण से ही उत्पन्न हुआ समझो।
- व्याख्या: पांचालराज द्रुपद, यादव वीर कृतवर्मा और मत्स्यदेश के राजा विराट—इन तीनों ही महान शासकों और योद्धाओं का प्राकट्य मरुद्गण (देवविशेषों) के अंश से हुआ था।
अरिष्टायास्तु यः पुत्रो हंस इत्यभिविश्रुतः। स गन्धर्वपतिर्जज्ञे कुरुवंशविवर्धनः।। 1-68-83a धृतराष्ट्र इति ख्यातः कृष्णद्वैपायनात्मजः। दीर्घबाहुर्महातेजाः प्रज्ञाचक्षुर्नराधिपः।। मातुर्दोषादृषेः कोपादन्ध एव व्यजायत।। 1-68-84a
- हिन्दी अनुवाद: अरिष्टा के जो पुत्र 'हंस' नाम से विख्यात थे, वे ही कुरुवंश को बढ़ाने वाले गन्धर्वपति के रूप में जन्मे। कृष्णद्वैपायन (वेद व्यास) के औरंस पुत्र, लंबी भुजाओं वाले, महातेजस्वी, प्रज्ञाचक्षु (नेत्रहीन) नराधिप जो धृतराष्ट्र नाम से विख्यात हुए, वे माता के दोष और ऋषि के कोप के कारण जन्म से ही अंधे उत्पन्न हुए थे।
- व्याख्या: गन्धर्वराज हंस का ही पुनर्जन्म धृतराष्ट्र के रूप में हुआ था, जो व्यास जी के द्वारा विचित्रवीर्य की पत्नी (अम्बिका) के गर्भ से उत्पन्न हुए थे।
`मरुतां तु गणाद्वीरः सर्वशस्त्रभृतां वरः। पाण्डुर्जज्ञे महाबाहुस्तव पूर्वपितामहः।' तस्यैवावरजो भ्राता महासत्वो महाबलः।। 1-68-85a धर्मात्तु सुमहाभागं पुत्रं पुत्रवतां वरम्। विदुरं विद्धि तं लोके जातं बुद्धिमतां वरम्।। 1-68-86a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! मरुद्गणों के ही अंश से वीर, समस्त शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ, महाबाहु और तुम्हारे पूर्वपितामह पाण्डु उत्पन्न हुए। उनके छोटे भाई जो महासत्त्व, महाबली तथा पुत्रवानों में श्रेष्ठ थे, वे महाभाग विदुर को तुम संसार में धर्म के अंश से उत्पन्न और बुद्धिमानों में श्रेष्ठ जानो।
- व्याख्या: पांडु मरुद्गण के अंश से और महात्मा विदुर प्रत्यक्ष धर्म (यमराज) के अंश से दासी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे, जो अपनी प्रज्ञा और धर्मनिष्ठा के लिए प्रसिद्ध हुए।
कलेरंशस्तु संजज्ञे भुवि दुर्योधनो नृपः। दुर्बद्धिर्दुर्मतिश्चैव कुरूणामयशस्करः।। 1-68-87a जगतो यस्तु सर्वस्य विद्विष्टः कलिपुरुषः। यः सर्वां घातयामास पृथिवीं पृथिवीपते।। 1-68-88a उद्दीपितं येन वैरं भूतान्तकरणं महत्। पौलस्त्या भ्रातरश्चास्य जज्ञिरे मनुजेष्विह।। 1-68-89a शतं दुःशासनादीनां सर्वेषां क्रूरकर्मणाम्। दुर्मुखो दुःसहश्चैव ये चान्ये नानुकीर्तिताः।। 1-68-90a दुर्योधनसहायास्ते पौलस्त्या भरतर्षभ। वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः।। 1-68-91a
- हिन्दी अनुवाद: हे पृथिवीपते! दुर्बुद्धि, दुर्मति और कुरुवंश के लिए यश की हानि करने वाले राजा दुर्योधन को तुम साक्षात् कलि (कलिपुरुष) का अंश हुआ जानो। जो संपूर्ण जगत के द्वेषी हैं और जिन्होंने समस्त पृथ्वी का संहार करवा दिया, तथा जिनके द्वारा प्राणियों का नाश करने वाला महान वैर उद्दीप्त किया गया—वे ही कलिपुरुष इस मनुष्य लोक में अवतरित हुए थे। हे भरतर्षभ! दुःशासन आदि क्रूर कर्म करने वाले सौ भाई, दुर्मुख, दुःसह तथा अन्य जो नाम से नहीं कहे गए हैं, वे सभी दुर्योधन के सहायक पौलस्त्य (राक्षस) कुल के थे। इसके अतिरिक्त वैश्यापुत्र युयुत्सु भी धृतराष्ट्र के पुत्रों में सौ से अधिक (एक सौ एकवें) थे।
- व्याख्या: महाभारत के विनाश का मूल कारण दुर्योधन था, जिसे कलि का अवतार बताया गया है, और उसके साथ उसके सभी भाई पौलस्त्य (राक्षसों) के अंश से उत्पन्न होकर उसके सहायक बने थे।
जनमेजय उवाच। ज्येष्ठानुज्येष्ठतामेषां नामधेयानि वा विभो। धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्येण कीर्तय।। 1-68-92a वैशंपायन उवाच। दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन्दुःशासनस्तथा। दुःसहो दुःशलश्चैव दुर्मुखश्च तथापरः।। 1-68-93a विविंशतिर्विकर्णश्च जलसन्धः सुलोचनः। विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः।। 1-68-94a दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च। चत्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्राङ्गदश्च ह।। 1-68-95a दुर्मदो दुष्प्रहर्षश्च विवित्सुर्विकटः समः। ऊर्णनाभः पद्मनाभस्तथा नन्दोपनन्दकौ।। 1-68-96a सेनापतिः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ। चित्रबाहुश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः।। 1-68-97a अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्रचापसुकुण्डलौ। भीमवेगो भीमबलो बलाकी भीमविक्रमः।। 1-68-98a उग्रायुधो भीमशरः कनकायुर्दृढायुधः। दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः।। 1-68-99a
- हिन्दी अनुवाद: जनमेजय ने पूछा— हे विभो! धृतराष्ट्र के पुत्रों के जो ज्येष्ठ-कनिष्ठ क्रम और नाम हैं, उन सबका क्रमपूर्वक वर्णन करो। वैशंपायन जी बोले— दुर्योधन, युयुत्सु, राजा दुःशासन, दुःसह, दुःशल, दुर्मुख, विविंशति, विकर्ण, जलसन्ध, सुलोचन, विन्दानुविन्द, दुर्धर्ष, सुबाहु, दुष्प्रधर्षण, दुर्मर्षण, दुर्मुख, दुष्कर्ण, कर्ण (यह धृतराष्ट्रपुत्र दूसरा कर्ण है), चित्र, उपचित्र, चित्राक्ष, चारुचित्र, चित्राङ्गद, दुर्मद, दुष्प्रहर्ष, विवित्सु, विकट, सम, ऊर्णनाभ, पद्मनाभ, नन्द, उपनन्द, सेनापति, सुषेण, कुण्डोदर, महोदर, चित्रबाहु, चित्रवर्मा, सुवर्मा, दुर्विरोचन, अयोबाहु, महाबाहु, चित्रचाप, सुकुण्डल, भीमवेग, भीमबल, बलाकी, भीमविक्रम, उग्रायुध, भीमशर, कनकायु, दृढायुध, दृढवर्मा, दृढक्षत्र, सोमकीर्ति और अनूदर।
- व्याख्या: इन श्लोकों में राजा जनमेजय की जिज्ञासा पर वैशंपायन जी ने धृतराष्ट्र के समस्त सौ पुत्रों और युयुत्सु के नाम उनके क्रम के अनुसार स्पष्ट रूप से गिनाए हैं, जिनका अंत महाभारत युद्ध में हुआ था।
जरासन्धो दृढसन्धः सत्यसन्धः सहस्रवाक्। उग्रश्रवा उग्रसेनः क्षेममूर्तिस्तथैव C।। 1-68-100a अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधनः।। 1-68-101a दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ। आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तानुयायिनौ।। 1-68-102a
- हिन्दी अनुवाद: जरासंध, दृढसंध, सत्यसंध, सहस्रवाक्, उग्रश्रवा, उग्रसेन, क्षेममूर्ति, अपराजित, पण्डितक, विशालाक्ष, दुराधन, दृढहस्त, सुहस्त, वातवेग, सुवर्चस्, आदित्यकेतु, बहुत खाने वाले (बह्वाशी) और नागदत्त के अनुयायी।
- व्याख्या: इन श्लोकों में धृतराष्ट्र के बाकी बचे हुए पुत्रों और राजकुमारों के नाम गिनाए गए हैं, जो दुर्योधन के भाई थे और कुरुवंश के विनाश में उसके साथ खड़े थे।
कवाची निषङ्गी दण्डी दण्डधारो धनुर्ग्रहः। उग्रो भीमरथो वीरो वीरबाहुरलोलुपः।। 1-68-103a अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथश्च यः। अनाधृष्यः कुम्डभेदी विरावी दीर्घलोचनः।। 1-68-104a दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूढोरुः कनकाङ्गदः। कुण्डजश्चित्रकश्चैव दुःशला च शताधिका।। 1-68-105a
- हिन्दी अनुवाद: कवाची, निषङ्गी, दण्डी, दण्डधार, धनुर्ग्रह, उग्र, भीमरथ, वीर, वीरबाहु, अलोलुप, अभय, रौद्रकर्मा, दृढरथ, अनाधृष्य, कुण्डभेदी, विरावी, दीर्घलोचन, दीर्घबाहु, महाबाहु, व्यूढोरु (विशाल जांघों वाले), कनकाङ्गद, कुण्डज, चित्रक और एकमात्र बहन दुःशला—इस प्रकार ये सब सौ से अधिक (एक सौ एक) हुए।
- व्याख्या: धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों और इकलौती पुत्री दुःशला के नाम पूरे होते हैं, जो धृतराष्ट्र के परिवार का विस्तार दर्शाते हैं।
वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च धार्तराष्ट्रः शताधिकः। एतदेकशतं राजन्कन्या चैका प्रकीर्तिता।। 1-68-106a नामधेयानुपूर्व्या च ज्येष्ठानुज्येष्ठतां विदुः। सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः।। 1-68-107a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! वैश्यापुत्र युयुत्सु को मिलाकर धृतराष्ट्र के पुत्रों की कुल संख्या एक सौ एक हुई और एक कन्या (दुःशला) कही गई है। इनके नाम क्रम से इनके ज्येष्ठ और कनिष्ठ होने के अनुसार जाने जाते हैं। वे सभी अतिरथी, शूरवीर और युद्ध की कला में पूरी तरह विशारद (निपुण) थे।
- व्याख्या: धृतराष्ट्र के सभी पुत्र और युयुत्सु जन्म से ही युद्ध कौशल में पारंगत और अतिरथी योद्धा थे, जिनका संचालन दुर्योधन के अधीन था।
सर्वे वेदविदश्चैव राजञ्शास्त्रे च परागाः। सर्वे सङ्घ्रामविद्यासु विद्याभिजनशोभिनः।। 1-68-108a सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते। दुःशलां समये राजसिन्धुराजाय कौरवः।। 1-68-109a जयद्रथाय प्रददौ सौबलानुमते तदा।
- हिन्दी अनुवाद: हे महीपते! वे सभी वेदों के ज्ञाता, शास्त्रों के मर्मज्ञ, संग्राम विद्या में निपुण और अपनी विद्या व कुल से शोभा पाने वाले थे। उन सभी के योग्य पत्नियों से विवाह किए गए थे। हे राजन्! शकुनि (सौबल) की सहमति से कौरव (दुर्योधन) ने अपनी बहन दुःशला का विवाह समय पर सिंधुपति जयद्रथ के साथ कर दिया था।
- व्याख्या: सभी कौरव राजकुमार शिक्षित और सुविवाहित थे, तथा दुर्योधन ने अपनी बहन दुःशला का विवाह सिंध के राजा जयद्रथ के साथ तय किया था, जो आगे चलकर महाभारत युद्ध में एक अहम मोड़ बनता है।
धर्मस्यांशं तु राजानं विद्धि राजन्युधिष्ठिरम्।। 1-68-110a भीमसेनं तु वातस्य देवराजस्य चार्जुनम्। अश्विनोस्तु तथैवांशौ रूपेणाप्रतिमौ भुवि।। 1-68-111a नकुलः सहदेवश्च सर्वभूतमनोहरौ।
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! तुम राजा युधिष्ठिर को साक्षात् धर्म के अंश से उत्पन्न जानो। भीमसेन को पवन (वात) के अंश से और अर्जुन को देवराज इंद्र के अंश से उत्पन्न समझो। इसी प्रकार पृथ्वी पर रूप में अप्रतिम नकुल और सहदेव दोनों अश्विनीकुमारों के अंश से उत्पन्न हुए थे, जो सभी प्राणियों के मन को मोहने वाले थे।
- व्याख्या: पाण्डवों के दिव्य जन्म का यह श्लोक सार है, जो बताता है कि पाण्डव साधारण मानव नहीं बल्कि धर्म, वायु, इंद्र और अश्विनीकुमारों के प्रत्यक्ष दिव्य अंश थे।
स्युवर्चा इति ख्यातः सोमपुत्रः प्रतापवान्।। 1-68-112a सोऽभिमन्युर्बृहत्कीर्तिरर्जुनस्य सुतोऽभवत्। यस्यावतरणे राजन्सुरान्सोमोऽब्रवीदिदम्।। 1-68-113a नाहं दद्यां प्रियं पुत्रं मम प्राणैर्गरीयसम्। समयः क्रियतामेष न शक्यमतिवर्तितुम्।। 1-68-114a सुरकार्यं हि नः कार्यमसुराणां क्षितौ वधः। तत्र यास्यत्ययं वर्चा न च स्थास्यति वै चिरम्।। 1-68-115a
- हिन्दी अनुवाद: चंद्रमा के प्रतापी पुत्र जो 'स्युवर्चा' के नाम से विख्यात थे, वे ही अर्जुन के पुत्र महान कीर्ति वाले अभिमन्यु हुए। हे राजन्! उनके (पृथ्वी पर) अवतार के समय चंद्रमा ने देवताओं से यह कहा था—"मैं अपने प्राणों से भी बढ़कर प्रिय अपने इस प्यारे पुत्र को (पृथ्वी पर) नहीं दूँगा।" तब देवताओं ने यह शर्त रखी कि "यह नियम बदला नहीं जा सकता, हम सबका कार्य असुरों का पृथ्वी पर वध करना है। इसलिए यह वर्चस्वी (अभिमन्यु) वहाँ जाएगा, किन्तु पृथ्वी पर बहुत लंबे समय तक नहीं ठहरेगा।"
- व्याख्या: अभिमन्यु का जन्म चंद्रदेव के पुत्र 'वर्चस' के अंश से हुआ था। चंद्रदेव अपने पुत्र को भेजना नहीं चाहते थे, किंतु देवताओं के आग्रह और असुरों के संहार के लिए इस शर्त पर सहमति बनी कि वह अल्पकाल के लिए ही भूतल पर रहेंगे।
ऐन्द्रिर्नरस्तु भविता यस्य नारायणः सखा। सोर्जुनेत्यभिविख्यातः पाण्डोः पुत्रः प्रतापवान्।। 1-68-116a तस्यायं भविता पुत्रो बालो भुवि महारथः। ततः षोडशवर्षाणि स्थास्यत्यमरसत्तमाः।। 1-68-117a अस्य षोडशवर्षस्य स सङ्ग्रामो भविष्यति। यत्रांशा वः करिष्यन्ति कर्म वीरनिषूदनम्।। 1-68-118a
- हिन्दी अनुवाद: (देवताओं ने कहा था—) "इंद्र के पुत्र (अर्जुन) नर के रूप में होंगे, जिनके सखा स्वयं नारायण (कृष्ण) हैं और जो पाण्डु के प्रतापवान् पुत्र अर्जुन के नाम से विख्यात हैं। यह बालक उन्हीं का महारथी पुत्र होगा और हे अमर श्रेष्ठो! वह पृथ्वी पर केवल सोलह वर्ष तक ही जीवित रहेगा। जब वह सोलह वर्ष का होगा, तब वह भयंकर संग्राम होगा, जहाँ आप सभी के अंश वीरों का नाश करने वाला यह कर्म करेंगे।"
- व्याख्या: अभिमन्यु के अल्पायु होने और उसके जीवन के सोलहवें वर्ष में होने वाले चक्रव्यूह व महायुद्ध के प्रसंग की भविष्यवाणी का यहाँ देवताओं द्वारा उल्लेख किया गया है।
नरनारायणाभ्यां तु स सङ्ग्रामो विनाकृतः। चक्रव्यूहं समास्थाय योधयिष्यन्ति वःसुराः।। 1-68-119a विमुखाञ्छात्रवान्सर्वాన్कारयिष्यति मे सुतः। बालः प्रविश्य च व्यूहमभेद्यं विचरिष्यति।। 1-68-120a महारथानां वीराणां कदनं च करिष्यति। सर्वेषामेव शत्रूणां चतुर्थांशं नयिष्यति।। 1-68-121a दिनार्धेन महाबाहुः प्रेतराजपुरं प्रति। ततो महारथैर्वीरैः समेत्य बहुशो रणे।। 1-68-122a दिनक्षये महाबाहुर्मया भूयः समेष्यति। एकं वंशकरं पुत्रं वीरं वै जनयिष्यति।। 1-68-123a
- हिन्दी अनुवाद: "(हे चंद्रदेव!) वह संग्राम नर-नारायण (अर्जुन और कृष्ण) के बिना होगा, जिसमें शत्रु पक्ष के लोग चक्रव्यूह की रचना करके युद्ध करेंगे। मेरा यह बालक उस अभेद्य व्यूह में प्रवेश करके विचरण करेगा और सभी शत्रुओं को विमुख कर देगा। वह महाबाहु बालक महारथी वीरों का भीषण संहार करेगा और आधे दिन में ही सभी शत्रुओं के एक चौथाई हिस्से को यमराज के पास (मृत्युलोक) पहुँचा देगा। इसके बाद वीर महारथियों के साथ रणक्षेत्र में अनेक बार संघर्ष करके, दिन के अंत (मृत्यु) के पश्चात वह महाबाहु पुनः मेरे पास (चंद्रलोक) लौट आएगा। (मृत्यु से पूर्व) वह अपने वंश को चलाने वाला एक वीर पुत्र (परीक्षित) भी उत्पन्न करेगा।"
- व्याख्या: इन अंतिम श्लोकों में अभिमन्यु के पराक्रम, चक्रव्यूह भेदन, उसके वीरगति प्राप्त करने और अपने पीछे उत्तरा के गर्भ से वंश को आगे बढ़ाने वाले परीक्षित को जन्म देने के संपूर्ण भविष्य का चंद्रदेव और देवताओं के संवाद के रूप में समापन किया गया है।
प्रनष्टं भारतं वंशं स भूयो धारयिष्यति। 1-68-124a वैशंपायन उवाच। एतत्सोमवचः श्रुत्वा तथास्त्विति दिवौकसः।। 1-68-124b प्रत्यूचुः सहिताः सर्वे ताराधिपमपूजयन्। एवं ते कथितं राजंस्तव जन्म पितुः पितुः।। 1-68-125a
- हिन्दी अनुवाद: "(अभिमन्यु) नष्ट हो रहे भारत (कुरु) वंश को पुनः आगे चलाएगा।" वैशंपायन जी बोले— चंद्रमा के इन वचनों को सुनकर सभी देवताओं ने 'तथास्तु' (ऐसा ही हो) कहा और मिलकर ताराधिप (चंद्रदेव) की पूजा की। हे राजन्! इस प्रकार तुम्हारे, तुम्हारे पिता और पितामहों के जन्म का यह इतिहास तुम्हें कह सुनाया गया।
- व्याख्या: यहाँ चंद्रदेव के वचनों का समापन होता है, जहाँ यह निश्चित हुआ कि अभिमन्यु के पुत्र (परीक्षित) के माध्यम से कुरुवंश आगे जीवित रहेगा। इसके साथ ही वैशंपायन मुनि राजा जनमेजय को उनके पूर्वजों के दिव्य और असुरी जन्मों की कथा पूरी करते हैं।
अग्नेर्भागं तु विद्धि त्वं धृष्टद्युम्नं महारथम्। शिखण्डिनमथो राजंस्त्रीपूर्वं विद्धि राक्षसम्।। 1-68-126a द्रौपदेयाश्च ये पञ्च बभूवुर्भरतर्षभ। विश्वान्देवगणान्विद्धि संजातान्भरतर्षभ।। 1-68-127a प्रतिविन्ध्यः सुतसोमः श्रुतकीर्तिस्तथापरः। नाकुलिस्तु शतानीकः श्रुतसेनश्च वीर्यवान्।। 1-68-128a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! तुम महारथी धृष्टद्युम्न को अग्निदेव के अंश से उत्पन्न हुआ जानो और शिखण्डी को पूर्वजन्म में स्त्री रूप वाला राक्षस समझो। हे भरतर्षभ! द्रौपदी के जो पाँच पुत्र हुए, उन्हें विश्वेदेवा गणों का अंश उत्पन्न हुआ जानो। वे पाँचों पुत्र हैं—प्रतिविन्ध्य, सुतसोम, श्रुतकीर्ति, नकुल के पुत्र वीर शतानीक और श्रुतसेन।
- व्याख्या: द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न सीधे अग्नि के अंश से प्रकट हुए थे, शिखण्डी की पूर्व योनि राक्षसी (स्त्री रूप) थी, और द्रौपदी के पाँचों पुत्र (द्रौपदेय) विश्वेदेवा देवताओं के अंशावतार थे।
शूरो नाम यदुश्रेष्ठो वसुदेवपिताऽभवत्। तस्य कन्या पृथा नाम रूपेणासदृशी भुवि। 1-68-129a पितुः स्वस्रीयपुत्राय सोऽनपत्याय वीर्यवान्। अग्रमग्रे प्रतिज्ञाय स्वस्यापत्यस्य वै तदा।। 1-68-130a अग्रजातेति तां कन्यां शूरोऽनुग्रहकाङ्क्षया। अददत्कुन्तिभोजाय स तां दुहितरं तदा।। 1-68-131a
- हिन्दी अनुवाद: यदुवंश में शूरो (शूरसेन) नाम के श्रेष्ठ राजा हुए, जो वसुदेव के पिता थे। उनकी पृथा (कुंती) नाम की पुत्री थी, जो पृथ्वी पर रूप में अद्वितीय थी। शूरवीर शूरसेन ने अपनी संतानहीन फुफेरे भाई (कुन्तिभोज) को पहले ही यह प्रतिज्ञा करके वचन दिया था कि "मेरी जो पहली संतान (पुत्री) होगी, उसे मैं तुम्हें दूँगा।" उन पर अनुग्रह करने की इच्छा से शूरसेन ने अपनी उस कन्या को कुन्तिभोज को सौंप दिया, तब से वह उनकी पुत्री (कुंती) कहलाई।
- व्याख्या: कुंती के जन्म और उनके पालन-पोषण का इतिहास यहाँ बताया गया है कि कैसे शूरसेन ने अपनी पुत्री पृथा को अपने निःसंतान मित्र व भाई कुन्तिभोज को गोद दे दिया था, जहाँ उनका नाम कुंती पड़ा।
सा नियुक्ता पितुर्गेहे ब्राह्मणातिथिपूजने। उग्रं पर्यचरद्धोरं ब्राह्मणं संशितव्रतम्।। 1-68-132a निकूढनिश्चयं धर्मे यं तं दुर्वाससं विदुः। समुग्रं शंसितात्मानं सर्वयत्नैरतोषयत।। 1-68-133a तुष्टोऽभिचारसंयुक्तमाचचक्षे यथाविधि। उवाच चैनां भगवान्प्रीतोऽस्मि सुभगे तव।। 1-68-134a
- हिन्दी अनुवाद: पिता के घर में रहते हुए कुंती ब्राह्मणों और अतिथियों की सेवा में नियुक्त थीं। उन्होंने कठोर व्रत का पालन करने वाले, धर्म में गुप्त निश्चय वाले तथा उग्र स्वभाव के लिए प्रसिद्ध दुर्वासा ऋषि की पूरी निष्ठा और सब प्रकार के प्रयत्नों से सेवा की। उनकी सेवा से संतुष्ट होकर भगवान दुर्वासा ने विधिपूर्वक उन्हें एक मंत्र प्रदान किया और बोले— हे सुभगे! मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ।
- व्याख्या: कुंती की सेवा-टहल से प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने उन्हें वह विशिष्ट मंत्र दिया, जिससे वे किसी भी देवता का आह्वान करके संतान प्राप्त कर सकती थीं।
यं यं देवं त्वमेतेन मन्त्रेणावाहयिष्यसि। तस्य तस्य प्रसादात्त्वं देवि पुत्राञ्जनिष्यसि।। 1-68-135a एवमुक्ता च सा बाला तदा कौतूहलान्विता। कन्या सती देवमर्कमाजुहाव यशस्विनी।। 1-68-136a प्रकाशकर्ता भगवांस्तस्यां गर्भं दधौ तदा। अजीजनत्सुतं चास्यां सर्वशस्त्रभृतांवरम्।। 1-68-137a
- हिन्दी अनुवाद: "देवी! इस मंत्र से तुम जिस-जिस देवता का आह्वान करोगी, उन्हीं-उनहीं के प्रसाद से तुम पुत्रों को उत्पन्न करोगी।" दुर्वासा ऋषि द्वारा ऐसा कहे जाने पर कौतूहलवश उस युवा और सती कन्या (कुंती) ने सूर्यदेव (अर्क) का आह्वान किया। संसार को प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य ने उनमें गर्भ स्थापित किया और उनके द्वारा सभी शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पुत्र (कर्ण) को उत्पन्न किया।
- व्याख्या: अविवाहित अवस्था में ही कुंती ने परीक्षा के लिए दुर्वासा के दिए मंत्र से सूर्यदेव का आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप कवच-कुंडल से सुसज्जित महाप्रतापशाली कर्ण का जन्म हुआ।
सकुण्डलं सकवचं देवगर्भं श्रियान्वितम्। दिवाकरसमं दीप्त्या चारुसर्वाङ्गभूषितम्।। 1-68-138a निगूहमाना जातं वै बन्धुपक्षभयात्तदा। उत्ससर्ज जले कुन्ती तं कुमारं यशस्विनम्।। 1-68-139a तमुत्सृष्टं जले गर्भं राधाभर्ता महायशाः। राधायाः कल्पयामास पुत्रं सोऽधिरथस्तदा।। 1-68-140a चक्रतुर्नामधेयं च तस्य बालस्य तावुभौ। दंपती वसुषेणेति दिक्षु सर्वासु विश्रुतम्।। 1-68-141a
- हिन्दी अनुवाद: वह बालक जन्म से ही कुंडल और कवच से युक्त, दिव्य तेज से संपन्न, सूर्य के समान कांतिवान् और सभी अंगों के आभूषणों से सुशोभित था। बन्धु-बान्धवों और समाज के भय से उस जन्म को छिपाती हुई कुंती ने उस यशस्वी कुमार को जल में प्रवाहित (छोड़) दिया। जल में छोड़े गए उस गर्भ (बालक) को महायशस्वी राधा के पति (सारथी) अधिरथ ने पाया और अपनी पत्नी राधा के पुत्र के रूप में उसका पालन-पोषण किया। उन दोनों पति-पत्नी ने उस बालक का नाम वसुषेण रखा, जो बाद में सभी दिशाओं में विख्यात हुआ।
- व्याख्या: समाज के भय से कुंती द्वारा कर्ण को मंजूषा में रखकर नदी में बहाने और फिर सूत परिवार (अधिरथ और राधा) द्वारा उनका लालन-पालन करने तथा 'वसुषेण' नामकरण का यह प्रसंग महाभारत के आदिपर्व का एक अत्यंत भावुक और महत्वपूर्ण मोड़ है।
संवर्धमानो बलवान्सर्वास्त्रेषूत्तमोऽभवत्। वेदाङ्गानि च सर्वाणि जजाप जपतां वरः।। 1-68-142a यस्मिन्काले जपन्नास्ते धीमान्सत्यपराक्रमः। नादेयं ब्राह्मणेष्वासीत्तस्मिन्काले महात्मनः।। 1-68-143a तमिन्द्रो ब्राह्मणो भूत्वा पुत्रार्थे भूतभावनः। ययाचे कुण्डले वीरं कवचं च सहाङ्गजम्।। 1-68-144a
- हिन्दी अनुवाद: वे वीर (कर्ण) बड़े होकर बलवान तथा सभी अस्त्र-शस्त्रों में श्रेष्ठ हुए। जपने वालों में श्रेष्ठ उन कर्ण ने संपूर्ण वेदांगों का अध्ययन किया। सत्यपराक्रमी और बुद्धिमान वे महात्मन् जब जप करते हुए बैठते थे, उस समय ब्राह्मणों के लिए कोई भी वस्तु ऐसी नहीं थी जो वे उन्हें न दे सकें। तब समस्त प्राणियों के सृष्टिकर्ता इंद्र ने ब्राह्मण का रूप धारण कर अपनी पुत्र (अर्जुन) की रक्षा के लिए उस वीर से उनके जन्मजात कवच और कुंडल की याचना की।
- व्याख्या: कर्ण की दानशीलता की पराकाष्ठा का प्रसंग यहाँ है। वे दानवीर इतने प्रसिद्ध थे कि जो भी उनसे मांगता, वे मना नहीं करते थे। इसी का लाभ उठाकर इंद्र ने अर्जुन के हित के लिए उनके प्राकृतिक कवच-कुंडल मांग लिए थे।
उत्कृत्य कर्णो ह्यददत्कवचं कुण्डले तथा।। शक्तिं शक्रो ददौ तस्मै विस्मितश्चेदमब्रवीत्।। 1-68-145a देवासुरमनुष्याणां गन्धर्वोरगरक्षसाम्। यस्मिन्क्षेप्स्यसि दुर्धर्ष स एको न भविष्यति।। 1-68-146a
- हिन्दी अनुवाद: कर्ण ने हँसते हुए अपने शरीर से काटकर वे कवच और कुंडल दोनों निकाल कर दे दिए। इससे विस्मित होकर इंद्र ने उन्हें एक 'शक्ति' (अस्त्र) प्रदान की और कहा— हे दुर्धर्ष! इसे देवता, असुर, मनुष्य, गंधर्व, नाग या राक्षस—जिस पर भी तुम चला दोगे, वह अकेला जीवित नहीं बचेगा (निश्चित मारा जाएगा)।
- व्याख्या: दानवीर कर्ण ने अपने प्राणरक्षक कवच-कुंडल बिना किसी संकोच के दे दिए। प्रसन्न होकर देवराज इंद्र ने उन्हें अचूक 'शक्ति अस्त्र' दिया, जिसका प्रयोग उन्होंने महाभारत युद्ध में घटोत्कच पर किया था।
वैशंपायन उवाच। पुरा नाम च तस्यासीद्वसुषेण इति क्षितौ। ततो वैकर्तनः कर्णः कर्मणा तेन सोऽभवत्।। 1-68-147a आमुक्तकवचो वीरो यस्तु जज्ञे महायशाः। स कर्ण इति विख्यातः पृथायाः प्रथमः सुतः।। 1-68-148a स तु सूतकुले वीरो ववृधे राजसत्तम।
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी बोले— हे राजसत्तम! पृथ्वी पर पहले उस बालक का नाम 'वसुषेण' था, किंतु अपने शरीर से कवच काटकर देने के इस महान कर्म के कारण वे 'वैकर्तन कर्ण' कहलाए। कवच और कुंडल उतार देने पर भी वे महायशस्वी वीर 'कर्ण' के नाम से विख्यात हुए और वे पृथा (कुंती) के सबसे बड़े पुत्र थे। वह वीर सूत कुल में ही पला-बढ़ा था।
- व्याख्या: कवच-कुंडल शरीर से अलग करने (काटने) के कारण उनका नाम 'वैकर्तन' पड़ा। कुंतीपुत्र होने के बावजूद उनका पालन-पोषण सूत परिवार में हुआ था।
कर्णं नरवरश्रेष्ठं सर्वशस्त्रभृतां वरम्।। 1-68-149a दुर्योधनस्य सचिवं मित्रं शत्रुविनाशनम्। दिवाकरस्य तं विद्धि राजन्नंशमनुत्तमम्।। 1-68-150a यस्तु नारायणो नाम देवदेवः सनातनः। तस्यांशो मानुषेष्वासीद्वासुदेवः प्रतापवान्।। 1-68-151a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! तुम उन नरों में श्रेष्ठ, सभी शस्त्रधारियों में उत्तम, दुर्योधन के सचिव, मित्र और शत्रुओं का नाश करने वाले कर्ण को साक्षात् सूर्यदेव (दिवाकर) का उत्तम अंश जानो। सनातन देवों के देव जो 'नारायण' नामक भगवान हैं, उन्ही का प्रतापवान् अंश मनुष्य रूप में वासुदेव श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुआ था।
- व्याख्या: कर्ण सीधे सूर्य भगवान के अंश थे, जबकि भगवान श्री कृष्ण स्वयं साक्षात् सनातन नारायण (विष्णु) के पूर्ण/मुख्य अंश रूप में अवतरित हुए थे।
शेषस्यांशश्च नागस्य बलदेवो महाबलः। सनत्कुमारं प्रद्युम्नं विद्धि राजन्महौजसम्।। 1-68-152a एवमन्ये मनुष्येन्द्रा बहवोंशा दिवौकसाम्। जज्ञिरे वसुदेवस्य कुले कुलविवर्धनाः।। 1-68-153a
- हिन्दी अनुवाद: हे राजन्! महाबली बलदेव (बलराम) को नागराज शेष का अंश तथा महातेजस्वी प्रद्युम्न को सनत्कुमार का अंश जानो। इसी प्रकार कुल को बढ़ाने वाले देवों के अन्य अनेक अंश भी वसुदेव के कुल में मनुष्य रूप में उत्पन्न हुए।
- व्याख्या: यदुवंश में भगवान श्रीकृष्ण के साथ-साथ बलराम (शेषनाग के अवतार) और प्रद्युम्न (सनत्कुमार के अंश) ने भी जन्म लेकर धर्म की स्थापना में सहयोग किया।
गणस्त्वप्सरसां यो वै मया राजन्प्रकीर्तितः। तस्य भागः क्षितौ जज्ञे नियोगाद्वासवस्य ह।। 1-68-154a तानि षोडशदेवीनां सहस्राणि नराधिप। बभूवुर्मानुषे लोके वासुदेवपरिग्रहः।। 1-68-155a
- हिन्दी अनुवाद: हे नराधिप! अप्सराओं का जो गण मैंने पहले बताया था, वह इंद्र की आज्ञा से पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ। वे सोलह हजार देवकन्याएँ इस मनुष्य लोक में भगवान वासुदेव (श्रीकृष्ण) की पत्नियाँ (पत्नियों का समूह) हुईं।
- व्याख्या: भौमासुर (नकासुर) के यहाँ से मुक्त कराई गई और श्रीकृष्ण द्वारा अपनाई गई वे राजकन्याएँ वास्तव में इंद्र की आज्ञा से पृथ्वी पर उतरी अप्सराओं के अंश थीं।
श्रियस्तु भागः संजज्ञे रत्यर्थं पृथिवीतले। [भीष्मकस्य कुले साध्वी रुक्मिणी नाम नामतः।। 1-68-156a द्रौपदी त्वथ संजज्ञे शची भागादनिन्दिता।] द्रुपदस्य कुले जाता वेदिमध्यादनिन्दिता।। 1-68-157a
- हिन्दी अनुवाद: पृथ्वी तल पर रति (आनंद) के लिए लक्ष्मीजी का अंश [भीष्मक के कुल में साध्वी रुक्मिणी के रूप में जन्मा।] इसी प्रकार शची (इंद्राणी) के अंश से अनिन्दिता द्रौपदी का जन्म हुआ, जो यज्ञवेदी के मध्य से द्रुपद के कुल में प्रकट हुईं।
- व्याख्या: महारानी रुक्मिणी को माता लक्ष्मी का अवतार तथा पांचालराज द्रुपद की यज्ञवेदी से प्रकट हुईं द्रौपदी को इंद्राणी (शची) का अंश बताया गया है।
नातिह्रस्वा न महती नीलोत्पलसुगन्धिनी। पद्मायताक्षी सुश्रोणी स्वसिताञ्चितमूर्धजा।। 1-68-158a सर्वलक्षणसंपन्ना वैदूर्यमणिसंनिभा। पञ्चानां पुरुषेन्द्राणां चित्तप्रमथनी रहः।। 1-68-159a
- हिन्दी अनुवाद: वे द्रौपदी न बहुत लंबी थीं और न बहुत छोटी, नीले कमल जैसी सुगंध वाली थीं, कमल के समान बड़े-बड़े नेत्रों वाली, सुंदर कटिप्रदेश (सुश्रोणी) तथा काले-सुंदर घुंघराले बालों वाली थीं। सभी शुभ लक्षणों से संपन्न और वैूर्य मणि के समान कांतिवान् वे पाँचों पुरुषश्रेष्ठों (पांडवों) के मन को एकांत में मथ डालने वाली थीं।
- व्याख्या: इन श्लोकों में द्रौपदी के शारीरिक सौंदर्य, उनके सुगंधित व आकर्षक स्वरूप तथा उनकी असाधारण विशेषताओं का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है।
सिद्धिर्धृतिश्च ये देव्यौ पञ्चानां मातरौ तु ते। कुन्ती माद्री च जज्ञाते मतिस्तु कुबलात्मजा।। 1-68-160a इति देवासुराणां ते गन्धर्वाप्सरसां तथा। अंशावतरणं राजन्राक्षसानां च कीर्तितम्।। 1-68-161a
- हिन्दी अनुवाद: जो 'सिद्धि' और 'धृति' देवियाँ हैं, वे ही पाण्डवों की माताएँ कुंती और माद्री के रूप में जन्मी थीं, तथा 'मति' देवी कुबला की पुत्री के रूप में प्रकट हुईं। हे राजन्! इस प्रकार देवताओं, असुरों, गंधर्वों, अप्सराओं और राक्षसों का यह अंशावतरण मैंने तुम्हें कह सुनाया।
- व्याख्या: पांडवों की माता कुंती और माद्री का संबंध सिद्धि और धृति देवियों से था। यहाँ तक वैशंपायन मुनि ने जनमेजय को पूरी वंशावली और अंशावतरण का रहस्य समझा दिया है।
ये पृथिव्यां समुद्भूता राजानो युद्धदुर्मदाः। महात्मानो यदूनां च ये जाता विपुले कुले।। 1-68-162a ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या मया ते परिकीर्तिताः। धन्यं यशस्यं पुत्रीयमायुष्यं विजयावाहम्।। 1-68-163a इदमंशावतरणं श्रोतव्यमनसूयता। अंशावतरणं श्रुत्वा देवगन्धर्वरक्षसाम्।। 1-68-164a प्रभवाप्ययवित्प्राज्ञो न कृच्छ्रेष्ववसीदति।। 1-68
- हिन्दी अनुवाद: पृथ्वी पर युद्ध में मतवाले जो बड़े-बड़े राजा उत्पन्न हुए तथा यदुवंश के विशाल कुल में जो महात्मा हुए—तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य (जिनका मैंने वर्णन किया है), यह सब मैंने तुम्हें कह सुनाया। अंशावतरण का यह आख्यान धन, यश, पुत्र, आयु और विजय देने वाला है। दोष-दृष्टि (इर्ष्या) से रहित होकर इस अंशावतरण को सुनना चाहिए। देवताओं, गंधर्वों और राक्षसों के इस अंशावतरण को सुनने वाला प्राज्ञ (ज्ञानी) पुरुष सृष्टि की उत्पत्ति और प्रलय को जानने वाला होकर कभी भी संकटों में दुखी नहीं होता।
- व्याख्या: महाभारत के इस आदिपर्व के 'संभव पर्व' के समापन पर वैशंपायन मुनि राजा जनमेजय को बताते हैं कि इस दिव्य इतिहास को सुनने से मनुष्य सभी प्रकार के संकटों से उबर जाता है और जीवन में विजय तथा ज्ञान प्राप्त करता है।165a
- ।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
- संभवपर्वणि अष्टषष्टितमोऽध्यायः।। 68 ।।
