श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षट्सप्ततितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षट्सप्ततितमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 76, श्लोक 1-37) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण

ययाति, देवयानी और शर्मिष्ठा का जीवन तथा शर्मिष्ठा की व्यथा (1-76-1 से 1-76-16)

  • मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। 1-76-1 ययातिः स्वपुरं प्राप्य महेन्द्रपुरसंनिभम्। प्रविश्यान्तःपुरं तत्र देवयानीं न्यवेशयत्।। 1-76-1 देवयान्याश्चानुमते सुतां तां वृषपर्वणः। अशोकवनिकाभ्याशे गृहं कृत्वा न्यवेशयत्।। 1-76-2 ऋतुकाले तु संप्राप्ते देवयानी वराङ्गना। लेभे गर्भं प्रथमतः कुमारं च व्यजायत।। 1-76-8 गते वर्षसहस्रे तु शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी। ददर्श यौवनं प्राप्ता ऋतुं सा चान्वचिन्तयत्।। 1-76-9

  • अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—ययाति अपने इंद्र की नगरी के समान सुंदर नगर में पहुँचे और अंतःपुर में प्रवेश कर देवयानी को वहाँ बसाया। देवयानी की सहमति से उन्होंने वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा के लिए अशोकवाटिका के पास एक अलग घर बनवाकर उसे वहाँ रखा, जहाँ हजारों दासियाँ उसकी सेवा में थीं। समय आने पर श्रेष्ठ अंगों वाली देवयानी ने सबसे पहले गर्भ धारण किया और एक पुत्र को जन्म दिया। इसके बाद, एक हजार वर्ष बीत जाने पर (पौराणिक कालमान अनुसार लंबा समय बीतने पर), शर्मिष्ठा भी पूर्ण यौवन को प्राप्त हुई और उसने अपने ऋतुकाल (संतानोत्पत्ति के समय) पर विचार किया।
  • व्याख्या: राजा ययाति देवयानी के साथ सुखपूर्वक रहने लगे और शर्मिष्ठा को भी अपनी दासी के रूप में सभी सुख-सुविधाओं के साथ अशोकवाटिका के निकट बसा दिया। देवयानी को ययाति से पुत्र प्राप्ति हुई। समय बीतने पर शर्मिष्ठा भी युवा हो गई और उसे अपनी सूनी जिंदगी तथा संतानहीनता का अहसास हुआ।

शर्मिष्ठा का ययाति से निवेदन (1-76-17 से 1-76-26)

  • मूल श्लोक:

शर्मिष्ठोवाच। 1-76-19 सोमस्येन्द्रस्य विष्णोर्वा यमस्य वरुणस्य वा। तव वा नाहुष गृहे कः स्त्रियं द्रष्टुमर्हति।। 1-76-19 रूपाभिजनशीलैर्हि त्वं राजन्वेत्थ मां सदा। सा त्वां याचे प्रसाद्याहमृतुं देहि नराधिप।। 1-76-20 शर्मिष्ठोवाच। 1-76-24 न नर्मयुक्तमनृतं हिनस्ति न स्त्रीषु राजन्न विवाहकाले। प्राणात्यये सर्वधनापहारे पञ्चानृतान्याहुरपातकानि।। 1-76-24

  • अनुवाद: (संयोगवश राजा ययाति अकेले ही अशोकवाटिका के पास पहुँचे, जहाँ शर्मिष्ठा ने उन्हें देखकर कहा—) शर्मिष्ठा ने कहा—'हे नहुषपुत्र! चंद्रमा, इंद्र, विष्णु, यम, वरुण या तुम्हारे अलावा तुम्हारे घर में दूसरी स्त्री को कौन देख सकता है? हे राजन्! तुम मेरे रूप, कुल और शील को अच्छी तरह जानते हो। इसलिए मैं प्रसन्न होकर तुमसे प्रार्थना करती हूँ—हे नराधिप! मुझे मेरा ऋतुफल (संतान प्राप्ति का अवसर) दो।' शर्मिष्ठा ने आगे कहा—'हे राजन्! हँसी-मजाक में बोला गया झूठ, स्त्रियों के मामले में कहा गया झूठ, विवाह के समय, प्राणों पर संकट आने पर और सर्वस्व धन छिन जाने पर—ये पाँच प्रकार के झूठ पापकारक नहीं माने जाते, इन्हें अपातक कहा गया है।'
  • व्याख्या: जब एक दिन ययाति अकेले अशोकवाटिका के पास आते हैं, तो शर्मिष्ठा अवसर पाकर उनसे अपने मन की बात कहती है। वह शुक्राचार्य की चेतावनी (कि शर्मिष्ठा को शयनकक्ष में न बुलाना) के संदर्भ में धर्म और शास्त्र के तर्कों का सहारा लेती है कि संकट या विवाह/प्रेम के मामलों में कुछ अपवाद होते हैं।

ययाति की दुविधा और शर्मिष्ठा के तर्‍क (1-76-27 से 1-76-37)

  • मूल श्लोक:

ययातिरुवाच। 1-76-27 राजा प्रमाणं भूतानां स नश्येत मृषा वदन्। अर्थकृच्छ्रमपि प्राप्य न मिथ्या कर्तुमुत्सहे।। 1-76-27 शर्मिष्ठोवाच। 1-76-35 अधर्मात्पाहि मां राजन्धर्मं च प्रतिपादय।। 1-76-35 नान्यं वृणे पुत्रकामा पुत्रात्परतरं न च। त्वत्तोऽपत्यवती लोके चरेयं धर्ममुत्तमम्।। 1-76-36

  • अनुवाद: ययाति ने कहा—'राजा संपूर्ण प्रजा के लिए आदर्श और प्रमाण होता है। झूठ बोलने से उसका पतन हो जाता है। अतः भारी संकट आने पर भी मैं असत्य बोलने का साहस नहीं कर सकता (क्योंकि मैंने शुक्राचार्य को वचन दिया है)।' शर्मिष्ठा ने कहा—'हे राजन्! मुझे अधर्म से बचाओ और धर्म की स्थापना करो। पुत्र की कामना करने वाली मैं तुम्हारे सिवाय किसी अन्य का वरण नहीं करूँगी, क्योंकि पुत्र से बढ़कर इस संसार में कुछ नहीं है। मैं तुमसे ही संतान पाकर इस लोक में उत्तम धर्म का आचरण करूँगी।'
  • व्याख्या: राजा ययाति शुक्राचार्य को दिए गए वचन और अपने राजधर्म के कारण शुरुआत में शर्मिष्ठा की मांग का विरोध करते हैं। वे डरते हैं कि ऐसा करने से शुक्राचार्य का कोपभाजन बनना पड़ेगा। इसके विपरीत, शर्मिष्ठा अपनी रक्षा, वंश वृद्धि और धर्म का हवाला देकर ययाति को मनाने का अथक प्रयास करती है, जिससे आगे चलकर महाभारत की कथा में एक नया मोड़ आता है।

महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 76, श्लोक 37-43) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण

शर्मिष्ठा के तर्‍क और राजा ययाति की सहमति (1-76-37 से 1-76-41)

  • मूल श्लोक:

त्रय एवाधना राजन्भार्या दासस्तथा सुतः। यत्ते समधिगच्छन्ति यस्यैते तस्य तद्धनम्।। 1-76-37 देवयान्या भुजिष्याऽस्मि वश्या च तव भार्गवी। सा चाहं च त्वया राजन्भजनीये भजस्व माम्।। 1-76-39 वैशंपायन उवाच। 1-76-40 एवमुक्तस्तु राजा स तथ्यमित्यभिजज्ञिवान्। पूजयामास शर्मिष्ठां धर्मं च प्रत्यपादयत्।। 1-76-40

  • हिन्दी अनुवाद: शर्मिष्ठा ने आगे कहा—'हे राजन्! पत्नी, दास और पुत्र—ये तीनों ही धनहीन (स्वतंत्र अस्तित्व से रहित) कहे गए हैं। ये जो कुछ भी अर्जित करते हैं, वह जिसके ये होते हैं, उसी का धन कहलाता है। हे राजन्! मैं देवयानी की दासी और आपकी आज्ञाकारी हूँ। वह (देवयानी) और मैं—दोनों ही आपके द्वारा उपभोग (भजन) करने योग्य हैं, अतः आप मेरा भी उपभोग (भजस्व) कीजिए।' वैशंपायन जी कहते हैं—शर्मिष्ठा के द्वारा ऐसा कहे जाने पर राजा ने उसकी बात को 'सत्य' (उचित) मान लिया। उन्होंने शर्मिष्ठा का सत्कार किया और उसके धर्म (संतान प्राप्ति की इच्छा) की रक्षा की। वे दोनों एक-दूसरे का सम्मान करके यथास्थान चले गए।
  • व्याख्या: शर्मिष्ठा अपने अंतिम और सबसे प्रभावशाली तर्क में प्राचीन सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था का हवाला देती है कि दासी या पत्नी का स्वामी पर पूर्ण अधिकार होता है। उसके इन तर्कों से राजा ययाति का संकोच और विरोध समाप्त हो जाता है। वे मान लेते हैं कि शर्मिष्ठा की रक्षा करना और उसे संतान का सुख देना भी एक प्रकार से धर्म का ही पालन है।

गर्भधारण और राजकुमार का जन्म (1-76-42 से 1-76-43)

  • मूल श्लोक:

स समागम्य शर्मिष्ठां यथा काममवाप्य च। अन्योन्यं चाभिसंपूज्य जग्मतुस्तौ यथागतम्।। 1-76-41 तस्मिन्समागमे सुभ्रूः शर्मिष्ठा चारुहासिनी। लेभे गर्भं प्रथमतस्तस्मान्नृपतिसत्तमात्।। 1-76-42 प्रयज्ञे च ततः काले राजन्राजीवलोचना। कुमारं देवगर्भाभं राजीवनिभलोचनम्।। 1-76-43

  • हिन्दी अनुवाद: तदनंतर, उस समागम से सुंदर भौहों तथा मधुर हँसी वाली शर्मिष्ठा ने श्रेष्ठ राजा ययाति से सबसे पहले गर्भ धारण किया। हे राजन्! तदनंतर समय आने पर उस कमल नयनी ने कमल के समान नेत्रों वाले, देवताओं के बालक के समान कांतिमान् एक सुंदर कुमार को जन्म दिया।
  • व्याख्या: इस प्रकार राजा ययाति और शर्मिष्ठा के गुप्त मिलन से शर्मिष्ठा गर्भधारण करती है और उचित समय पर एक अत्यंत तेजस्वी तथा सुंदर पुत्र को जन्म देती है। यह प्रसंग आगे चलकर महाभारत की कथा में देवयानी और शर्मिष्ठा के परिवारों के बीच के अंतर्द्वंद्व और ययाति के शाप का मुख्य कारण बनता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि षट्सप्ततितमोऽध्यायः।। 76 ।।