श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 75) के इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या

1. श्लोक (1-75-1 से 1-75-6)

मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। अथ दीर्घस्य कालस्य देवयानी नृपोत्तम। वनं तदेव निर्याता क्रीडार्थं वरवर्णिनी।। 1-75-1 तेन दासीसहस्रेण सार्धं शर्मिष्ठया तदा। तमेव देशं संप्राप्ता यथाकामं चचार सा।। 1-75-2 ताभिः सखीभिः सहिता सर्वाभिर्मुदिता भृशम्। क्रीडन्त्योऽभिरताः सर्वाः पिबन्त्यो मधुमाधवीं।। 1-75-3 खादन्त्यो विविधान्भक्ष्यान्विदशन्त्यः फलानि च। पुनश्च नाडुषो राजा मृगलिप्सुर्यदृच्छया।। 1-75-4 तमेव देशं संप्राप्तो जलार्थी श्रमकर्शितः। ददर्श देवयानीं स शर्मिष्ठां ताश्च योषितः।। 1-75-5 पिबन्तीर्ललमानाश्च दिव्याभरणभूषिताः। आसनप्रवरे दिव्ये सर्वरत्नविभूषिते। उपविष्टां च ददृशे देवयानीं शुचिस्मिताम्।। 1-75-6

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—हे नृपोत्तम! तदनंतर बहुत समय बीत जाने पर सुंदर वर्ण वाली देवयानी क्रीड़ा (मनोरंजन) करने के लिए उसी वन में बाहर निकली। उस समय एक हजार दासियों और शर्मिष्ठा के साथ वह उसी स्थान पर पहुँची और अपनी इच्छा के अनुसार विहार करने लगी। वे सभी सखियाँ अत्यंत प्रसन्न होकर क्रीड़ा में मग्न थीं, मधुपान कर रही थीं, भाँति-भांति के भोज्य पदार्थ खा रही थीं और फलों का आस्वादन कर रही थीं। उसी समय यदुवंश के राजा (नहुष के पुत्र) ययाति दैवयोग से मृग (हिरण) की खोज करते हुए तथा प्यास से तृण-श्रम से आहत होकर उसी स्थान पर आ पहुँचे। उन्होंने वहाँ देवयानी, शर्मिष्ठा और अन्य स्त्रियों को देखा जो दिव्य आभूषणों से सुसज्जित होकर मदिरा पी रही थीं और आनंद मना रही थीं। सर्वरत्नों से विभूषित एक उत्कृष्ट दिव्य आसन पर बैठी हुई, सुंदर मुस्कान वाली देवयानी को उन्होंने देखा।
  • व्याख्या: इस प्रसंग में घटना चक्र आगे बढ़ता है। देवयानी अपनी सखियों और दासी बनी शर्मिष्ठा के साथ वन में आनंद-विहार कर रही है। संयोगवश, राजा ययाति शिकार की तलाश और प्यास से व्याकुल होकर उसी सुंदर वन में आ जाते हैं, जहाँ देवयानी का समूह मौजूद है।

2. श्लोक (1-75-7 से 1-75-9)

मूल श्लोक:

रूपेणाप्रतिमां तासां स्त्रीणां मध्ये वराङ्गनम्। `आसनाच्च ततः किंचिद्विहीनां हेमभीषिताम्।। 1-75-7 असुरेन्द्रसुतां चापि निषण्णां चारुहासिनीम्। ददर्श पादौ विप्रायाः संवहन्तीमनिन्दिताम्।। 1-75-8 गायन्त्योऽथ प्रनृत्यन्त्यो वादयन्त्योऽथ भारत। दृष्ट्वा ययातिमतुलं लज्जयाऽवनताः स्थिताः।।' 1-75-9

  • हिन्दी अनुवाद: उन सभी स्त्रियों के मध्य रूप में अद्वितीय और श्रेष्ठ अंगों वाली देवयानी को देखकर, राजा ने उससे कुछ नीचे सुवर्ण-भूषित आसन पर बैठी हुई, सुंदर हँसी वाली असुरराज की पुत्री शर्मिष्ठा को भी देखा, जो उन अनिन्दिता (दोषरहित) ब्राह्मणी (देवयानी) के चरणों को दबा रही थी। हे भारत (जनमेजय)! वहाँ गान करने वाली, नृत्य करने वाली और वाद्य यंत्र बजाने वाली उन सभी स्त्रियों ने जब अचानक ययाति को देखा, तो वे लज्जा से झुक गईं (या संकोचवश शांत हो गईं)।
  • व्याख्या: ययाति देखते हैं कि दैत्यराज वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा, जो स्वयं अत्यंत सुंदर है, वह देवयानी के चरण दबा रही है। इससे देवयानी के अत्यधिक प्रभाव और शर्मिष्ठा की विवशता का स्पष्ट संकेत मिलता है। अचानक एक अनजान पुरुष (ययाति) को देखकर राजकुमारियाँ और दासियाँ लज्जित हो जाती हैं।

3. श्लोक (1-75-10 से 1-75-12)

मूल श्लोक:

ययातिरुवाच। 1-75-10 द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां द्वे कन्ये परिवारिते। गोत्रे च नामनी चैव द्वयोः पृच्छाम्यहं शुभे। देवयान्युवाच। 1-75-11 आख्यास्याम्यहमादत्स्व वचनं मे नराधिप। शुक्रो नामासुरगुरुः सुतां जानीहि तस्य माम्।। 1-75-11 इयं च मे सखी दासी यत्राहं तत्र गामिनी। दुहिता दानवेन्द्रस्य शर्मिष्ठा वृषपर्वणः।। 1-75-12

  • हिन्दी अनुवाद: ययाति ने कहा—'हे शुभे! दो-दो हजार कन्याओं से घिरी हुई इन दोनों कन्याओं के गोत्र और नाम क्या हैं? मैं यह पूछना चाहता हूँ।' देवयानी ने कहा—'हे नराधिप! मैं आपको सब बताती हूँ, मेरा वचन ध्यान से सुनिए। असुरों के गुरु शुक्राचार्य की पुत्री मुझे जानिए। और यह जो मेरी सखी और दासी है, जो मेरे साथ ही रहने वाली है, वह दानवेन्द्र वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा है।'
  • व्याख्या: राजा ययाति दोनों प्रमुख कुमारियों का परिचय जानना चाहते हैं, क्योंकि उनके साथ हजारों दासियों का होना उनकी विशिष्टता को दर्शाता है। देवयानी बिना किसी संकोच के अपना परिचय शुक्राचार्य की पुत्री के रूप में और शर्मिष्ठा का परिचय अपनी दासी (वृषपर्व की पुत्री) के रूप में देती है।

4. श्लोक (1-75-13 से 1-75-17)

मूल श्लोक:

ययातिरुवाच। 1-75-13 कथं तु ते सखी दासी कन्येयं वरवर्णिनी। असुरेन्द्रसुता सुभ्रूः परं कौतूहलं हि मे।। 1-75-13 `नैव देवी न गन्धर्वी न यक्षी न च किन्नरी। नैवंरूपा मया नारी दृष्टपूर्वा महीतले।। 1-75-14 श्रीरिवायतपद्माक्षी सर्वलक्षणशोभना। असुरेन्द्रसुता कन्या सर्वालङ्कारभूषिता।। 1-75-15 दैवेनोपहता सुभ्रूरुताहो तपसापि वा। अन्यथैषाऽनवद्याङ्गी दासी नेह भविष्यति।। 1-75-16 अस्या रूपेण ते रूपं न किंचित्सदृशं भवेत्। पुरा दुश्चरितेनेयं तव दासी भवत्यहो।।' 1-75-17

  • हिन्दी अनुवाद: ययाति ने आश्चर्य से कहा—'सुंदर वर्ण वाली हे कन्ये! असुरराज की यह सुंदर भौहों वाली पुत्री तेरी सखी और दासी कैसे हो गई? मुझे इस बात पर परम कौतूहल (आश्चर्य) हो रहा है। न तो यह कोई देवी है, न गंधर्वी, न यक्षी और न ही किन्नरी। पृथ्वी पर इस रूप की नारी मैंने पहले कभी नहीं देखी है। यह कमल के समान विशाल नेत्रों वाली साक्षात् लक्ष्मी के समान, सभी लक्षणों से सुशोभित और समस्त आभूषणों से विभूषित असुरराज की पुत्री है। हे सुंदर भौहों वाली! क्या यह किसी दैवयोग (भाग्य के आघात) से अथवा तप के प्रभाव से विपत्ति में पड़ी है? अन्यथा ऐसी निर्दोष अंगों वाली स्त्री इस प्रकार दासी नहीं हो सकती। यद्यपि तुम्हारा रूप भी कम नहीं है, किंतु इसके रूप की तुलना में तुम्हारा रूप भी इसके आगे न्यून प्रतीत होता है। अवश्य ही अपने पूर्वकृत किसी बुरे आचरण (दुश्चरित्र) के कारण यह आज तुम्हारी दासी बनी है।'
  • व्याख्या: शर्मिष्ठा के असाधारण और अलौकिक सौंदर्य को देखकर ययाति मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। वे यह समझ नहीं पाते कि राजसी ठाट-बाट वाली एक असुर राजकुमारी सामान्य दासी की तरह कैसे रह सकती है। वे अनुमान लगाते हैं कि यह या तो किसी बड़े भाग्य के फेर का परिणाम है या उसके अपने कर्मों का फल है।

5. श्लोक (1-75-18 से 1-75-22)

मूल श्लोक:

देवयान्युवाच। 1-75-18 सर्व एव नरश्रेष्ठ विधानमनुवर्तते। विधानविहितं मत्वा मा विचित्राः कथाःकृथाः।। 1-75-18 राजवद्रूपवेषौ ते ब्राह्मीं वाचं बिभर्षि च। को नाम त्वं कुतश्चासि कस्य पुत्रश्च शस मे।। 1-75-19 ययातिरुवाच। 1-75-20 ब्रहमचर्येण वेदो मे कृत्स्रः श्रुतिपथं गतः। राजाहं राजपुत्रश्च ययातिरिति विश्रुतः।। 1-75-20 देवयान्युवाच। 1-75-21 কেनास्यर्थेन नृपते इमं देशमुपागतः। जिघृक्षुर्वारिजं किंचिदथवा मृगलिप्सया।। 1-75-21 ययातिरुवाच। 1-75-22 मृगलिप्सुरहं भद्रे पानीयार्थमुपागतः। बहुधाऽप्यनुयुक्तोऽस्मि तदनुज्ञातुमर्हसि।। 1-75-22

  • हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने कहा—'हे नरश्रेष्ठ! सब लोग भाग्य (विधान) का ही अनुसरण करते हैं। इसे विधाता का विधान मानकर आप ऐसी विचित्र बातें या चर्चाएँ न करें। आपका रूप और वेश-भूषा राजाओं जैसी है, परंतु आप वाणी ब्राह्मणों जैसी (शुद्ध और गंभीर) बोल रहे हैं। आप कौन हैं, कहाँ से आए हैं और किसके पुत्र हैं? मुझे बताइए।' ययाति ने कहा—'मैंने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदों का अध्ययन किया है। मैं राजा और राजपुत्र हूँ तथा संसार में ययाति नाम से प्रसिद्ध हूँ।' देवयानी ने बोली—'हे नृपते! आप किस प्रयोजन से इस देश में आए हैं? क्या आप यहाँ जल प्राप्त करने आए हैं या मृग (शिकार) की इच्छा से?' ययाति ने उत्तर दिया—'हे भद्रे! मैं मृग की खोज में आया था, और अब प्यास लगने के कारण पानी की तलाश में यहाँ पहुँचा हूँ। आपने मुझसे बहुत सी बातें पूछ ली हैं, अब आप मुझे जाने की आज्ञा दीजिए।'
  • व्याख्या: देवयानी और ययाति के बीच यह संवाद उनके आपसी परिचय का माध्यम बनता है। देवयानी ययाति के राजसी व्यक्तित्व और विद्वतापूर्ण वाणी से प्रभावित होती है, जबकि ययाति अपनी पहचान एक राजकुमार (ययाति) के रूप में देकर अपनी प्यास और उद्देश्य का संक्षेप में विवरण देते हैं।

आदिपर्व (अध्याय 75, श्लोक 23-49) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण

देवयानी का ययाति को वर के रूप में चुनना (1-75-23 से 1-75-26)

  • मूल श्लोक:

देवयान्युवाच। 1-75-23 द्वाभ्यां कन्यासहस्राभ्यां दास्या शर्मिष्ठया सह। त्वदधीनाऽस्मि भद्रं ते सखा भर्ता च मे भव।। 1-75-23 ययातिरुवाच। 1-75-25 विद्ध्यौशनसि भद्रं ते न त्वामर्होऽस्मि भामिनि। अविवाह्या हि राजानो देवयानि पितुस्तव।। 1-75-25

  • अनुवाद: देवयानी ने कहा—'दो हजार कन्याओं और दासी शर्मिष्ठा के साथ मैं आपकी अधीन (समर्पिट) हूँ। आपका कल्याण हो, आप मेरे सखा और पति बनिए।' ययाति ने कहा—'हे भामिनी देवयानी! तुम्हारा कल्याण हो, मुझे उशना (शुक्राचार्य) की पुत्री रूपी तुम योग्य नहीं हो, क्योंकि हम राजा लोग तुम्हारे पिता (ब्राह्मण) के साथ विवाह संबंध के योग्य नहीं हैं।'
  • व्याख्या: देवयानी ययाति के प्रति आकृष्ट होकर स्वयं को उन्हें सौंप देती है और विवाह का प्रस्ताव रखती है। परंतु राजा ययाति वर्ण व्यवस्था और मर्यादा का हवाला देते हुए कहते हैं कि एक क्षत्रिय राजा का विवाह ब्राह्मण ऋषि की पुत्री के साथ सामान्य नियमों के अनुसार वर्जित या असहज माना जाता है।

वर्ण और विवाह की चर्चा (1-75-27 से 1-75-34)

  • मूल श्लोक:

देवयान्युवाच। 1-75-27 संसृष्टं ब्रह्मणा क्षत्रं क्षत्रेण ब्रह्म संहितम्। ऋषिश्चाप्यृषिपुत्रश्च नाहुषाङ्ग वहस्व माम्।। 1-75-27 ययातिरुवाच। 1-75-33 एकमाशीविषो हन्ति शस्त्रेणैकश्च वध्यते। हन्ति विप्रः सराष्ट्राणि पुराण्यपि हि कोपितः।। 1-75-33 दुराधर्षतरो विप्रस्तस्माद्भीरु मतो मम। अतोऽदत्तां च पित्रा त्वां भद्रे न विवहाम्यहम्।। 1-75-34

  • अनुवाद: देवयानी बोली—'ब्रह्म (तेज) और क्षत्र (बल) परस्पर जुड़े हुए हैं। आप भी ऋषि और ऋषिपुत्र के समान हैं, अतः हे नाहुष (नहुषपुत्र ययाति)! मेरा पाणिग्रहण कीजिए।' ययाति ने कहा—'एक सर्प (आशीविष) केवल एक को मारता है और शस्त्र से भी एक ही वध होता है, परंतु कुपित हुआ ब्राह्मण संपूर्ण राष्ट्रों और नगरों को नष्ट कर देता है। इसलिए विप्र अत्यंत दुर्धर्ष (भयानक) होते हैं। इसी डर से, हे भद्रे! तुम्हारे पिता द्वारा न दी गई तुम्हें मैं विवाह नहीं रहा हूँ।'
  • व्याख्या: देवयानी तर्कों के माध्यम से समझाती है कि दोनों के कुलों में गहरा संबंध है। इसके विपरीत, ययाति ब्राह्मण के कोप (श्राप) के भय से बिना पिता की आज्ञा के विवाह करने में असमर्थता जताते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि शुक्राचार्य का गुस्सा राज्य और कुल का सर्वनाश कर सकता है।

शुक्राचार्य द्वारा विवाह की स्वीकृति (1-75-35 से 1-75-44)

  • मूल श्लोक:

देवयान्युवाच। 1-75-35 दत्तां वहस्व तन्मा त्वं पित्रा राजन्वृतो मया। आयचतो भयं नास्ति दत्तां च प्रतिगृह्णतः।। 1-75-35 शुक्र उवाच। 1-75-41 गृहाणेमां मया दत्तां महिषीं नहुषात्मज।। 1-75-41 शुक्र उवाच। 1-75-43 अधर्मात्त्वां विमुञ्चामि शृणु त्वं वरमीप्सितम्। अस्मिन्विवाहे मा म्लासीरहं पापं नुदामि ते।। 1-75-43 वहस्व भार्यां धर्मेण देवयानीं सुमध्यमाम्। अनया सह संप्रीतिमतुलां समवाप्नुहि।। 1-75-44

  • अनुवाद: देवयानी ने कहा—'हे राजन्! मेरे द्वारा चुने जाने पर मेरे पिता द्वारा आपको दी गई समझकर आप मेरा पाणिग्रहण कीजिए। दान में दी हुई वस्तु को ग्रहण करने में कोई भय नहीं है।' (धात्री द्वारा बुलाए जाने पर शुक्राचार्य वहाँ आए।) शुक्र ने कहा—'हे नहुषपुत्र! मेरे द्वारा दी गई इस देवयानी को अपनी मुख्य रानी (महिषी) के रूप में स्वीकार करो।' शुक्रजी ने आगे कहा—'मैं तुम्हें इस अधर्म से मुक्त करता हूँ। तुम इस विवाह को लेकर म्लान (दुखी) मत हो, मैं तुम्हारे सारे पाप को दूर किए देता हूँ। तुम धर्मपूर्वक सुंदर कटिप्रदेश वाली देवयानी को अपनी पत्नी बनाओ और इसके साथ अतुलनीय प्रेम प्राप्त करो।'
  • व्याख्या: जब देवयानी अपनी दासी को भेजकर अपने पिता शुक्राचार्य को बुलवाती है, तब शुक्राचार्य स्वयं आकर राजा ययाति को देवयानी सौंपते हैं। आचार्य शुक्राचार्य के आशीर्वाद और दिव्य अनुमति के कारण वर्ण-संकर से उत्पन्न होने वाला सारा दोष समाप्त हो जाता है।

शर्मिष्ठा से संबंधित नियम और विवाह संपन्न होना (1-75-45 से 1-75-49)

  • मूल श्लोक:

शुक्र उवाच। 1-75-45 इयं चापि कुमारी ते शर्मिष्ठा वार्षपर्वणी। संपूज्या सततं राजन्मा चैनां शयने ह्वयेः।। 1-75-45 वैशंपायन उवाच। 1-75-47 एवमुक्तो ययातिस्तु शुक्रं कृत्वा प्रदक्षिणम्। शास्त्रोक्तविधिना राजा विवाहमकरोच्छुभम्।। 1-75-47 जगम स्वपुरं हृष्टोऽनुज्ञातोऽथ महात्मना।। 1-75-49

  • अनुवाद: शुक्र ने कहा—'हे राजन्! वृषपर्व की पुत्री यह कुमारी शर्मिष्ठा भी तुम्हारी पूजनीय है, किंतु कभी भी इसे अपने शयनकक्ष में मत बुलाना। एकांत में इसे न तो बुलाना, न इससे बात करना और न इसका स्पर्श करना। भद्र हो, तुम इस प्रकार देवयानी को पत्नी रूप में स्वीकार करो।' वैशंपायन जी कहते हैं—शुक्राचार्य द्वारा ऐसा कहे जाने पर राजा ययाति ने उनकी परिक्रमा की और शास्त्रोक्त विधि से शुभ विवाह संपन्न किया। तदन्तर, शुक्र और दानवों द्वारा सम्मानित तथा उनके द्वारा अनुज्ञा पाकर वे प्रफुल्लित मन से अपने नगर की ओर प्रस्थान कर गए।
  • व्याख्या: आचार्य शुक्राचार्य अपनी बेटी देवयानी का विवाह ययाति के साथ करवा देते हैं, साथ ही शर्मिष्ठा को भी ययाति की सेवा में भेजते हैं लेकिन उसके साथ शारीरिक संबंध न बनाने की सख्त चेतावनी (सीमा) तय करते हैं। यही सीमा आगे चलकर महाभारत के आदिपर्व में एक बड़े नाटकीय और ऐतिहासिक प्रसंग का आधार बनती है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः।। 75 ।।