महाभारत के आदिपर्व (अध्याय 77, श्लोक 1-27) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण
देवयानी और शर्मिष्ठा का प्रसंग तथा शर्मिष्ठा का उत्तर (1-77-1 से 1-77-11)
- मूल श्लोक:
वैशंपायन उवाच। 1-77-1 प्रजानां श्रीरिवाभ्याशे शर्मिष्ठा ह्यभवद्वधूः। पन्नगीवोग्ररूपा वै देवयानी ममाप्यभूत्।। 1-77-2 श्रुत्वा कुमारं जातं तु देवयानी शुचिस्मिता। चिन्तयामास दुःखार्ता शर्मिष्ठां प्रति भारत।। 1-77-4 शर्मिष्ठोवाच। 1-77-6 ऋषिरभ्यागतः कश्चिद्धर्मात्मा वेदपारगः। स मया वरदः कामं याचितो धर्मसंहितम्।। 1-77-6
- हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—प्रजा के लिए साक्षात् लक्ष्मी के समान शर्मिष्ठा वधू (प्रियतमा) बन गई, किंतु देवयानी राजा को उग्र रूप वाली नागिन के समान प्रतीत होने लगी। (राजा मन-ही-मन शर्मिष्ठा को अधिक प्रिय मानने लगे)। जब सुंदर मुस्कान वाली देवयानी ने सुना कि शर्मिष्ठा ने एक पुत्र को जन्म दिया है, तो वह दुःख से पीड़ित होकर शर्मिष्ठा के पास गई और बोली—'हे सुंदर भौहों वाली कामलुब्धा (काम के वशीभूत)! तूने यह कौन सा पाप किया है?' शर्मिष्ठा ने उत्तर दिया—'कोई धर्मात्मा और वेदों के पारंगत ऋषि यहाँ आए थे। मैंने धर्मयुक्त होकर उन वरद ऋषि से संतान के लिए प्रार्थना की थी। हे चारुहासिनी! मैंने कोई अन्यायपूर्ण काम नहीं किया है, मैं सत्य कहती हूँ कि वे संतान उसी ऋषि की है।'
- व्याख्या: शर्मिष्ठा के पुत्र होने का समाचार जब देवयानी को मिलता है, तो वह क्रुद्ध होकर उससे पूछताछ करती है। अपनी असलियत और राजा ययाति के साथ हुए संबंध को छिपाने के लिए शर्मिष्ठा चतुराई से कहती है कि उसने किसी अज्ञत तपस्वी ऋषि से वरदान स्वरूप यह संतान प्राप्त की है। देवयानी इस बात को सच मानकर शांत हो जाती है।
ययाति के पुत्र और मदिरापान का प्रसंग (1-77-12 से 1-77-21)
- मूल श्लोक:
ययातिर्देवयान्यां तु पुत्रावजनयन्नृपः। यदुं च तुर्वसुं चैव शक्रविष्णू इवापरौ।। 1-77-12 `तस्मिन्काले तु राजर्षिर्ययातिः पृथिवीपतिः। माध्वीकरससंयुक्तां मदिरां मदवर्धनीम्।। 1-77-13 पाययामास शुक्रस्य तनयां रक्तपिङ्गलाम्। पीत्वा पीत्वा च मदिरां देवयानी मुमोह सा।। 1-77-14
- हिन्दी अनुवाद: राजा ययाति ने देवयानी के गर्भ से इंद्र और विष्णु के समान पराक्रमी दो पुत्रों—यदु और तुर्वसु को उत्पन्न किया। उस समय राजर्षि ययाति ने शुक्राचार्य की पुत्री (देवयानी) को मधु (मदिरा) और रस से युक्त तथा मद को बढ़ाने वाली मदिरा पिलाई। उस मदिरा को बार-बार पीकर देवयानी पूरी तरह मोह (नशे) में आ गई। नशे में वह रोने, गाने, बार-बार नाचने और बहुत सी प्रलप (असंतुलित बातें) करने लगी। राजा द्वारा अपनी सुरक्षा और व्यवस्था किए जाने के बाद, बुद्धिमान ययाति छिपकर शर्मिष्ठा से मिलने लगे और लंबे समय तक उसके साथ आनंदित रहे।
- व्याख्या: राजा ययाति देवयानी से दो पुत्रों (यदु और तुर्वसु) के पिता बनते हैं। इस बीच कथा में एक नया प्रसंग आता है जहाँ राजा देवयानी को मदिरापान कराते हैं। इसी गुप्त या अंतरंग जीवन के दौरान ययाति और शर्मिष्ठा के संबंध आगे भी जारी रहते हैं, जिससे शर्मिष्ठा से उन्हें और तीन पुत्र (द्रुह्यु, अनु और पूरु) प्राप्त होते हैं।
रहस्य का उद्घाटन और बालकों का परिचय (1-77-22 से 1-77-27)
- मूल श्लोक:
देवयान्युवाच। 1-77-24 `कस्यैते दारका राजन्देवपुत्रोपमाः शुभाः। वर्चसा रूपतश्चैव सदृशा मे मतास्तव।। 1-77-24 कुमारा ऊचुः। 1-77-27 ऋषिश्च ब्राह्मणश्चैव द्विजातिश्चैव नः पिता। शर्मिष्ठा नानृतं ब्रूते देवयानि क्षमस्व नः।।' 1-77-27
- हिन्दी अनुवाद: तदनंतर किसी समय सुंदर मुस्कान वाली देवयानी राजा ययाति के साथ एकांत वन में गई। वहाँ उसने देवताओं के पुत्रों के समान सुंदर, तेज और रूप में ययाति तथा स्वयं अपने से मिलते-जुलते उन बालकों को क्रीड़ा करते हुए देखा और विस्मित होकर पूछा—'हे राजन्! देवताओं के पुत्रों जैसे ये शुभ बालक किसके हैं? इनका तेज और रूप मेरे तथा आपके सदृश ही प्रतीत होता है।' (जब देवयानी ने बालकों से पूछा, तब धात्री के संकेत पर बालकों ने कहा—) कुमारों ने कहा—'हमारे पिता ऋषि, ब्राह्मण और द्विजाति हैं। शर्मिष्ठा कभी झूठ नहीं बोलती, हे देवयानी! हमें क्षमा कीजिए।'
- व्याख्या: एक दिन जब देवयानी वन में घूम रही होती है, तो उसकी नजर शर्मिष्ठा के पुत्रों पर पड़ती है। उन बच्चों के चेहरे-मोहरे और तेज को देखकर उसे शक होता है कि वे राजपरिवार के ही बालक हैं। जब वह बच्चों से उनका परिचय पूछती है, तो वे वही बात दोहराते हैं जो शर्मिष्ठा ने पहले कही थी (कि उनके पिता कोई ऋषि हैं)। इस प्रकार यह रहस्य अभी भी कुछ हद तक छिपा रहता है, किंतु ययाति और शर्मिष्ठा का यह गुप्त संबंध अब धीरे-धीरे सामने आने की स्थिति में आ जाता है।
आदिपर्व (अध्याय 77, श्लोक 28-64) का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत विवरण
सत्य का खुलासा और देवयानी का रोष (1-77-28 से 1-77-47)
- मूल श्लोक:
देवयान्युवाच। 1-77-28 किन्रामधेयगोत्रो वः पुत्रका ब्राह्मणः पिता। प्रब्रूत तत्त्वतः क्षिप्रं कश्चासौ क्व च वर्तते।। 1-77-28 देवयान्युवाच। 1-77-49 अधर्मेण जितो धर्मः प्रवृत्तमधरोत्तरम्। शर्मिष्ठयाऽतिवृत्ताऽस्मि दुहित्रा वृषपर्वणः।। 1-77-49 त्रयोऽस्यां जनिताः पुत्रा राज्ञाऽनेन ययातिना। दुर्भगाया मम द्वौ तु पुत्रौ तात ब्रवीमि ते।। 1-77-50
- हिन्दी अनुवाद: देवयानी ने बालकों से पूछा—'पुत्रों! तुम्हारे ब्राह्मण पिता का नाम और गोत्र क्या है? तुम लोग सच-सच शीघ्र बताओ कि वे कौन हैं और कहाँ रहते हैं।' तब उन बालकों ने अपनी तर्जनी उंगली से राजा ययाति की ओर इशारा कर दिया और शर्मिष्ठा को अपनी माता बताया। यह देखकर देवयानी अत्यंत क्रुद्ध हुई, उसने अपने आभूषण उतार फेंके और रोती हुई सीधे अपने पिता शुक्राचार्य के पास पहुँची। वहाँ पहुँचकर उसने कहा—'तात! अधर्म से धर्म जीत गया है और सब कुछ उलट-पुलट हो गया है। वृषपर्व की पुत्री शर्मिष्ठा ने मेरा अपमान किया है। इस राजा ययाति ने उस शर्मिष्ठा से तीन पुत्र उत्पन्न किए हैं, जबकि अभागिन मुझ से केवल दो ही पुत्र हैं।'
- व्याख्या: जब बच्चों के इशारे और शर्मिष्ठा के तर्कों से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके पिता कोई और नहीं बल्कि राजा ययाति ही हैं, तो देवयानी का भ्रम टूट जाता है। अपमान की आग में जलती हुई देवयानी अपने पिता शुक्राचार्य के पास शिकायत लेकर पहुँचती है।
शुक्राचार्य का कोप और ययाति को शाप (1-77-48 से 1-77-59)
- मूल श्लोक:
शुक्र उवाच। 1-77-52 धर्मज्ञः सन्महाराज योऽधर्ममकृथाः प्रियम्। तस्माज्जरा त्वामचिराद्धर्षयिष्यति दुर्जया।। 1-77-52 ययातिरुवाच। 1-77-57 इत्येतानि समीक्ष्याहं कारणानि भृगूद्वह। अधर्मभयसंविग्नः शर्मिष्ठामुपजग्मिवान्। `मत्वैतन्मे धर्म इति कृतं ब्रह्मन्क्षमस्व माम्।।' 1-77-57 वैशंपायन उवाच। 1-77-59 क्रुद्धेनोशनसा शप्तो ययातिर्नाहुषस्तदा। पूर्वं वयः परित्यज्य जरां सद्योऽन्वपद्यत।। 1-77-59
- हिन्दी अनुवाद: अपनी पुत्री का दुःखी और अपमानित रूप देखकर शुक्राचार्य को अत्यधिक क्रोध आया। उन्होंने राजा ययाति को शाप देते हुए कहा—'महाराज! धर्मज्ञ होते हुए भी तुमने जो यह प्रिय लगने वाला अधर्म किया है, इसी कारण से अजेय बुढ़ापा (जरा) शीघ्र ही तुम्हें आ घेरेगी।' ययाति ने हाथ जोड़कर अपनी सफाई में कहा—'हे भृगुश्रेष्ठ! शर्मिष्ठा के ऋतुकाल की रक्षा करना मेरा धर्म था, मैंने अधर्म के भय से ही ऐसा किया है, अतः हे ब्राह्मण! मुझे क्षमा करें।' परंतु क्रुद्ध शुक्राचार्य के शाप देते ही राजा ययाति का युवा शरीर तत्काल नष्ट हो गया और वे असमय ही दुर्जय बुढ़ापे (जरा) से ग्रस्त हो गए।
- व्याख्या: शुक्राचार्य अपनी पुत्री के साथ हुए इस छल और वचन-भंग से आग-बबूला हो जाते हैं। वे ययाति को तत्काल वृद्धावस्था का शाप दे देते हैं। ययाति अपनी सफाई में धर्म और संकट का हवाला देते हैं, किंतु आचार्य का क्रोध शांत नहीं होता।
ययाति की विनती और वरदान/समाधान (1-77-60 से 1-77-64)
- मूल श्लोक:
ययातिरुवाच। 1-77-60 अतृप्तो यौवनस्याहं देवयान्यां भृगूद्वह। प्रसादं कुरु मे ब्रह्मञ्जरेयं न विशेच्च माम्।। 1-77-60 शुक्र उवाच। 1-77-61 नाहं मृषा ब्रवीम्येतज्जरां प्राप्तोऽसि भूमिप। जरां त्वेतां त्वमन्यस्मिन्संक्रामय यदीच्छसि।। 1-77-61 शुक्र उवाच। 1-77-63 वयो दास्यति ते पुत्रो यः स राजा भविष्यति। आयुष्मान्कीर्तिमांश्चैव बह्वपत्यस्तथैव च।। 1-77-64
- हिन्दी अनुवाद: बुढ़ापे से ग्रस्त होकर ययाति ने विनती की—'हे भृगुश्रेष्ठ! अभी मेरी यौवन की तृप्ति नहीं हुई है। मुझ पर कृपा करें और इस बुढ़ापे को मुझ पर हावी न होने दें।' शुक्रजी ने कहा—'हे भूमिप! मेरा दिया हुआ शाप मिथ्या नहीं हो सकता, तुम बुढ़ापे को प्राप्त हो चुके हो। किंतु यदि तुम चाहो, तो इस बुढ़ापे को किसी अन्य व्यक्ति पर संक्रमण (स्थानांतरित) कर सकते हो।' शुक्रजी ने आगे वरदान दिया—'जो पुत्र तुम्हें अपना युवापन (वय) देगा, वही तुम्हारा उत्तराधिकारी राजा होगा, वह आयुष्मान, कीर्तिवान और बहुत सी संतानों का पिता बनेगा।'
- व्याख्या: अचानक बुढ़ापे की अवस्था में पहुँच जाने पर ययाति घबरा जाते हैं और आचार्य से दया की भीख मांगते हैं। शुक्राचार्य अपना शाप वापस तो नहीं लेते, किंतु एक उपाय (विकल्प) अवश्य बताते हैं कि वे अपनी वृद्धावस्था किसी ऐसे स्वेच्छा से आगे आने वाले पुत्र को दे सकते हैं जो उन्हें अपना युवापन सौंप दे। यही घटना महाभारत में आगे चलकर पूरुवंश के उत्थान और राजकुमार पूरु के द्वारा अपने पिता का बुढ़ापा लेने की कथा का आधार बनती है।
