श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत चौहत्तरवें (74वें) अध्याय के इन श्लोकों का हिन्दी अनुवाद और विस्तृत व्याख्या नीचे दी गई है। यह प्रसंग दैत्यराज वृषपर्वव, उसकी पुत्री शर्मिष्ठा, आचार्य शुक्राचार्य और उनकी पुत्री देवयानी के संवाद से संबंधित है।

1. श्लोक (1-74-1 से 1-74-3)

मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। ततः काव्यो भृगुश्रेष्ठः समन्युरुपगम्य ह। वृषपर्वाणमासीनमित्युवाचाविचारयन्।। 1-74-1 नाधर्मश्चरितो राजन्सद्यः फलति गौरिव। शनैरावर्त्यमानो हि कर्तुर्मूलानि कृन्तति।। 1-74-2 पुत्रेषु वा नप्तृषु वा न चेदात्मनि पश्यति। फलत्येव ध्रुवं पायं गुरुभुक्तमिवोदरे।। 1-74-3

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा—तत्पश्चात् भृगुवंश में श्रेष्ठ क्रोधी शुक्राचार्य (काव्य) ने वहाँ जाकर बैठे हुए दैत्यराज वृषपर्व से बिना किसी संकोच के यह कहा—'हे राजन्! किया हुआ अधर्म गाय की तरह तत्काल फल नहीं देता (अर्थात उसका परिणाम तुरंत सामने नहीं आता), परंतु धीरे-धीरे बढ़ता हुआ वह कर्ता के (पाप करने वाले के) मूल (वंश या जीवन) को ही काट डालता है। यदि वह पाप करने वाले को अपने ऊपर फलित होता नहीं दिखता, तो उसके पुत्रों या पौत्रों (पोतों) के यहाँ अवश्य फलता है; वह निश्चित रूप से वैसे ही परिणाम देता है जैसे गरिष्ठ या विषैला भोजन पेट में पचने के बाद अपना असर दिखाता है।'
  • व्याख्या: शुक्राचार्य वृषपर्व को अधर्म के परिणामों से अवगत करा रहे हैं। उनका तात्पर्य है कि पाप का फल भले ही तुरंत न मिले, किंतु उसका चक्र अवश्य चलता है। अन्याय और अधर्म का बीज अंततः पूरे वंश का विनाश कर देता है, ठीक वैसे ही जैसे खाया हुआ भारी भोजन पचकर शरीर पर अपना प्रभाव छोड़ता है।

2. श्लोक (1-74-4 से 1-74-7)

मूल श्लोक:

अधीयानं हितं राजन्क्षमावन्तं जितेन्द्रियम्।' यदघातयथा विप्रं कचमाङ्गिरसं तदा। अपापशीलं धर्मज्ञं शुश्रूषुं मद्गृहे रतम्।। 1-74-4 शर्मिष्ठया देवयानी क्रूरमुक्ता बहु प्रभो। विप्रकृत्य च संरम्भात्कूपे क्षिप्ता मनस्विनी।। 1-74-5 सा न कल्पेत वासाय तयाहं रहितः कथम्। वसेयमिह तस्मात्ते त्यजामि विषयं नृप।।' 1-74-6 वधादनर्हतस्तस्य वधाच्च दुहितुर्मम। वषपर्वन्निबोधेयं त्यक्ष्यामि त्वां सबान्धवम्। स्थातुं त्वद्विषये राजन्न शक्ष्यामि त्वया सह।। 1-74-7

  • हिन्दी अनुवाद: शुक्राचार्य ने आगे कहा—'हे राजन्! अंगिरा के वंशज, वेदों के अध्येता, हितकारी, क्षमावान्, जितेन्द्रिय, पापरहित, धर्मज्ञ तथा मेरे घर में रहकर मेरी सेवा करने वाले कच को तुमने बिना किसी अपराध के मरवा डाला था। हे प्रभो! तुम्हारी पुत्री शर्मिष्ठा ने बहुत से क्रूर वचन कहकर मनस्विनी देवयानी को क्रोध में आकर कुएँ में फेंक दिया था। देवयानी के बिना मेरा यहाँ रहना संभव नहीं है। इसलिए, हे नृप! मैं तुम्हारा यह राज्य छोड़कर जा रहा हूँ। उस अ절 (निर्दोष) कच के वध के कारण और मेरी पुत्री के अपमान के कारण, हे वृषपर्व! तुम मेरे इस निश्चय को जान लो—मैं अपने बान्धवों सहित तुम्हारा त्याग कर रहा हूँ और अब तुम्हारे राज्य में तुम्हारे साथ नहीं रह सकता।'
  • व्याख्या: आचार्य शुक्राचार्य दैत्यराज को उनके राज्य में हुए अन्यायों—विशेषकर उनके प्रिय शिष्य कच की हत्या और उनकी पुत्री देवयानी के साथ शर्मिष्ठा द्वारा किए गए दुर्व्यवहार—की याद दिलाते हैं। वे क्रुद्ध होकर अपने यजमान का राज्य छोड़ने की घोषणा करते हैं।

3. श्लोक (1-74-8 से 1-74-13)

मूल श्लोक:

`मा शोच वृषपर्वंस्त्वं मा क्रुध्यस्व विशांपते। स्थातुं ते विषये राजन्न शक्ष्यामि तया विना। अस्या गतिर्गतिर्मह्यं प्रियमस्याः प्रियं मम।। 1-74-8 वृषपर्वोवाच। 1-74-9 यदि ब्रह्मन्घातयामि यदि वा क्रोशयाम्यहम्। शर्मिष्ठया देवयानीं तेन गच्छाम्यसद्गतिम्।। 1-74-9 शुक्र उवाच।' 1-74-10 अहो मामभिजानासि दैत्य मिथ्याप्रलापिनम्। यथेममात्मनो दोषं न नियच्छस्पुपेक्षसे।। 1-74-10 वृषपर्वोवाच। 1-74-11 नाधर्मं न मृषावादं त्वयि जानामि भार्गव। त्वयि धर्मश्च सत्यं च तत्प्रसीदतु नो भवान्।। 1-74-11 यद्यस्मानपहाय त्वमितो गच्छसि भार्गव। समुद्रं संप्रवेक्ष्यामि पूर्वं मद्बान्धवैः सह।। 1-74-12 पातालमथवा चाग्निं नान्यदस्ति परायणम्। यद्येव देवान्गच्छेस्त्वं मां च त्यक्त्वा ग्रहाधिप। सर्वत्यागं ततः कृत्वा प्रविशामि हुताशनम्'।। 1-74-13

  • हिन्दी अनुवाद: (शुक्रजी ने राजा से कहा था—) 'हे वृषपर्व! तुम शोक मत करो और क्रोध भी मत करो। हे राजन्! मैं देवयानी के बिना तुम्हारे राज्य में नहीं ठहर सकता। इसकी गति ही मेरी गति है और इसका प्रिय ही मेरा प्रिय है।' वृषपर्व ने कहा—'हे ब्राह्मण! यदि मैंने शर्मिष्ठा द्वारा देवयानी का घात (अपमान या वध का प्रयास) कराया हो या उसे रुलाया हो, तो मैं असद्गति को प्राप्त होऊँ!' शुक्रजी ने कहा—'अरे दैत्य! क्या तू मुझे झूठी बातें करने वाला समझता है, जो तू अपने इस दोष को नियंत्रित नहीं कर रहा है और उपेक्षा कर रहा है?' वृषपर्व ने कहा—'हे भार्गव! मैं न तो आपमें कोई अधर्म जानता हूँ और न ही असत्य। आपमें तो धर्म और सत्य दोनों निवास करते हैं, इसलिए आप हम पर प्रसन्न हों। हे भार्गव! यदि आप हमें छोड़कर यहाँ से चले गए, तो मैं अपने बान्धवों के साथ समुद्र में प्रवेश कर जाऊँगा, अथवा पाताल में चला जाऊँगा या अग्नि में प्रवेश कर लूँगा, क्योंकि आपके बिना हमारा कोई दूसरा आश्रय नहीं है। हे ग्रहों के स्वामी! यदि आप हमें और देवताओं (या अपने यजमानों) को छोड़कर चले जाएंगे, तो मैं सब कुछ त्यागकर अग्नि में प्रवेश करूँगा।'
  • व्याख्या: यहाँ दैत्यराज वृषपर्व भयभीत और विनम्र हो जाता है क्योंकि वह जानता है कि शुक्राचार्य के बिना असुरों की रक्षा करना असंभव है। वह अपनी निष्कलंकता की कसम खाता है और आचार्य को रोकने के लिए अपने पूरे परिवार सहित जलसमाधि या अग्निप्रवेश की धमकी देता है।

4. श्लोक (1-74-14 से 1-74-19)

मूल श्लोक:

शुक्र उवाच। 1-74-14 समुद्रं प्रविशध्वं वा दिशो वा द्रवतासुराः। दुहितुर्नाप्रियं सोहुं शक्तोऽहं दयिता हि मे।। 1-74-14 प्रसाद्यतां देवयानी जीवितं यत्र मे स्थितम्। योगक्षेमकरस्तेऽहमिन्द्रस्येव बृहस्पतिः।। 1-74-15 वृषपर्वोवाच। 1-74-16 यत्किंचिदसुरेन्द्राणां विद्यते वसु भार्गव। भुवि हस्तिगवाश्वं च तस्य त्वं मम चेश्वरः।। 1-74-16 शुक्र उवाच। 1-74-17 यत्किंचिदस्ति द्रविणं दैत्येन्द्राणां महासुर। तस्येश्वरोस्मि यद्येषा देवयानी प्रसाद्यताम्।। 1-74-17 वैशंपायन उवाच। 1-74-18 एवमुक्तस्तथेत्याह वृषपर्वा महाकविम्। देवयान्यन्तिकं गत्वा तमर्थं प्राह भार्गवः।। 1-74-18 देवयान्युवाच। 1-74-19 यदि त्वमीश्वरस्तात राज्ञो वित्तस्य भार्गव। नाभिजानामि तत्तेऽहं राजा तु वदतु स्वयम्।। 1-74-19

  • हिन्दी अनुवाद: शुक्रजी ने कहा—'हे असुरो! तुम चाहे समुद्र में प्रवेश करो या दिशाओं में भाग जाओ, मैं अपनी पुत्री का अप्रिय सहन करने में असमर्थ हूँ, क्योंकि वह मुझे प्राणों से भी प्यारी है। तुम लोग जाकर देवयानी को प्रसन्न करो, क्योंकि उसी में मेरा जीवन बसा है। जिस प्रकार इन्द्र के लिए बृहस्पति हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारा योगक्षेम (कल्याण) करने वाला हूँ।' वृषपर्व ने कहा—'हे भार्गव! असुरों के पास पृथ्वी पर जो कुछ भी धन, हाथी, गाय और घोड़े हैं, उन सबका आप और मैं दोनों समान रूप से स्वामी हैं।' शुक्रजी ने कहा—'हे महासुर! दैत्यराजों के पास जो भी धन है, यदि मैं उसका स्वामी हूँ, तो पहले इस देवयानी को प्रसन्न किया जाए।' वैशंपायन जी कहते हैं—ऐसा कहे जाने पर वृषपर्व ने महाकवि शुक्र से 'तथास्तु' (वैसा ही हो) कहा। तब भार्गव (शुक्राचार्य) ने देवयानी के पास जाकर वह सारी बात कही। देवयानी बोली—'हे तात! यदि आप इस राजा के धन के स्वामी हैं, तो मैं उसे नहीं जानती; राजा स्वयं आकर यह बात मुझसे कहें।'
  • व्याख्या: आचार्य शुक्राचार्य अपनी पुत्री के प्रति अत्यधिक स्नेह के कारण पूरी तरह से देवयानी के पक्ष में खड़े हैं। जब दैत्यराज अपनी संपत्ति पर अधिकार देने की बात कहता है, तो देवयानी अपनी जिद पर अड़ जाती है कि राजा वृषपर्व स्वयं आकर उससे अनुनय-विनय करे।

5. श्लोक (1-74-20 से 1-74-24)

मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। 1-74-20 शुक्रस्य वचनं श्रुत्वा वृषपर्वा सबान्धवः। देवयानि प्रसीदेति पपात भुवि पादयोः।। 1-74-20 वृषपर्वोवाच। 1-74-21 स्तुत्यो वन्द्यश्च सततं मया तातश्च ते शुभे।' यं काममभिकामाऽसि देवयानि शुचिस्मिते। तत्तेऽहं संप्रदास्यामि यदि वापि हि दुर्लभम्।। 1-74-21 देवयान्युवाच। 1-74-22 दासीं कन्यासहस्रेण शर्मिष्ठामभिकामये। अनु मां तत्र गच्छेत्सा यत्र दद्याच्च मे पिता।। 1-74-22 वृषपर्वोवाच। 1-74-23 उत्तिष्ठ त्वं गच्छ धात्रि शर्मिष्ठां शीघ्रमानय। यं च कामयते कामं देवयानी करोतु तम्।। 1-74-23 `त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामार्थे च कुलं त्यजेत्। ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्'।। 1-74-24

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—शुक्र का वचन सुनकर वृषपर्व अपने बान्धवों सहित देवयानी के चरणों में गिर पड़ा और बोला—'हे देवयानी! प्रसन्न हो जाओ।' वृषपर्व ने कहा—'हे शुभे! तू मेरे द्वारा हमेशा स्तुत्य, वंदनीय और पिता के समान आदरणीय है। हे सुंदर मुस्कान वाली देवयानी! तेरी जो भी इच्छा हो, वह चाहे कितनी भी दुर्लभ क्यों न हो, मैं तुझे अवश्य दूँगा।' देवयानी ने कहा—'मैं यह चाहती हूँ कि शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओं के साथ मेरी दासी बने और जहाँ मेरे पिता मुझे विदा करें, यह मेरे साथ वहीं चले।' वृषपर्व ने कहा—'उठो, हे ध्यात्रे (दासी)! जाओ, शीघ्र ही शर्मिष्ठा को यहाँ ले आओ और देवयानी जो कुछ भी चाहती है, उसे पूरा करो। [नीति कहती है—] कुल की रक्षा के लिए एक व्यक्ति का त्याग कर देना चाहिए, गाँव की रक्षा के लिए कुल का त्याग करना चाहिए, जनपद (देश) की रक्षा के लिए गाँव का त्याग करना चाहिए और अपनी आत्मा (प्राणों) की रक्षा के लिए पूरी पृथ्वी का त्याग कर देना चाहिए।'
  • व्याख्या: यहाँ राजा वृषपर्व अपनी और अपने प्रजाजनों की रक्षा के लिए अपनी पुत्री शर्मिष्ठा को देवयानी की दासी बनाने के लिए विवश हो जाता है। श्लोक 24 में एक महान कूटनीतिक और व्यावहारिक नीतिवचन दिया गया है कि बड़े स्वार्थ (या प्राण-रक्षा) के लिए छोटे स्वार्थ का त्याग करना ही बुद्धिमत्ता है।

6. श्लोक (1-74-25 से 1-74-34)

मूल श्लोक:

वैशंपायन उवाच। 1-74-25 ततो धात्री तत्र गत्वा शर्मिष्ठां वाक्यमब्रवीत्। उत्तिष्ठ भद्रे शर्मिष्ठे ज्ञातीनां सुखमावह।। 1-74-25 त्यजति ब्राह्मणः शिष्यान्देवयान्या प्रचोदितः। सायं कामयते कां स कार्योऽद्य त्वयाऽनघे।। 1-74-26 शर्मिष्ठोवाच। 1-74-27 यं सा कामयते कां करवाण्यहमद्य तम्। यद्येवमाह्वयेच्छुक्रो देवयानीकृते हि माम्। मद्दोषान्मागमच्छुक्रो देवयानी च मत्कृते।। 1-74-27 वैशंपायन उवाच। 1-74-28 ततः कन्यासहस्रेण वृता शिबिकया तदा। पितुर्नियोगात्त्वरिता निश्चक्राम पुरोत्तमात्।। 1-74-29 (संशोधित क्रम अनुसार 28) शर्मिष्ठोवाच। 1-74-29 अहं दासीसहस्रेण दासी ते परिचारिका। अनु त्वां तत्र यास्यामि यत्र दास्यति ते पिता।। 1-74-30 (संशोधित क्रम अनुसार 29) देवयान्युवाच। 1-74-31 (क्रम 30) स्तवतो दुहिताऽहं ते याचतः प्रतिगृह्णतः। स्तूयमानस्य दुहिता कथं दासी भविष्यसि।। 1-74-31 शर्मिष्ठोवाच। 1-74-32 (क्रम 31) येनकेनचिदार्तानां ज्ञातीनां सुखमावहेत्। अतस्त्वामनुयास्यामी तत्र दास्यति ते पिता।। 1-74-32 वैशंपायन उवाच। 1-74-33 (क्रम 32) प्रतिश्रुते दासभावे दुहित्रा वृषपर्वणः। देवयानी नृपश्रेष्ठ पितरं वाक्यमब्रवीत्।। 1-74-33 देवयान्युवाच। 1-74-34 (क्रम 33) प्रविशामि पुरं तात तुष्टाऽस्मि द्विजसत्तम। अमोघं तव विज्ञानमस्ति विद्याबलं च ते।। 1-74-34 वैशंपायन उवाच। 1-74-34 (अंतिम श्लोक) एवमुक्तो दुहित्रा स द्विजश्रेष्ठो महायशाः। प्रविवेश पुरं हृष्टः पूजितः सर्वदानवैः।। 1-74-34

  • हिन्दी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—तब धात्री (परिचारिका) ने वहाँ जाकर शर्मिष्ठा से कहा—'हे भद्रे शर्मिष्ठे! उठो और अपने कुटुम्बियों को सुख पहुँचाओ। देवयानी के कहने पर ब्राह्मण (शुक्राचार्य) अपने शिष्यों को छोड़कर जा रहे हैं। हे अनघे! देवयानी आज जो कुछ भी चाहती है, वह तुम्हें करना ही होगा।' शर्मिष्ठा ने कहा—'वह जो कुछ भी चाहती है, मैं आज वही करूँगी। यदि शुक्राचार्य देवयानी के लिए मुझे बुला रहे हैं, तो मेरे दोष के कारण शुक्राचार्य और देवयानी यहाँ से न जाएँ।' वैशंपायन जी कहते हैं—तब पिता की आज्ञा पाकर शर्मिष्ठा एक हजार कन्याओं के साथ पालकी में बैठकर शीघ्र ही उत्तम नगर से बाहर निकली। शर्मिष्ठा ने देवयानी से कहा—'मैं एक हजार दासियों के साथ तुम्हारी परिचारिका (दासी) हूँ। जहाँ तुम्हारे पिता तुम्हें सौंपेंगे, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगी।' देवयानी ने कहा—'मैं स्तुति करने वाले, याचना करने वाले और प्रतिग्रह (दान) लेने वाले (शुक्राचार्य) की पुत्री हूँ; और तू स्तुति पाने वाले राजा की पुत्री है, अतः तू मेरी दासी कैसे बन सकती है?' शर्मिष्ठा बोली—'जिस किसी भी उपाय से संकट में पड़े हुए अपने कुटुंबियों को सुख पहुँचाया जा सके, वही करना चाहिए। इसलिए मैं तुम्हारा अनुसरण करूँगी और तुम्हारे पिता जहाँ कहेंगे, वहीं रहूँगी।' वैशंपायन जी कहते हैं—वृषपर्व की पुत्री द्वारा दासी-भाव स्वीकार कर लिए जाने पर, देवयानी ने श्रेष्ठ राजा (या अपने पिता) से कहा—'हे तात! अब मैं नगर में प्रवेश करती हूँ, मैं अत्यंत संतुष्ट हूँ। हे द्विजश्रेष्ठ! आपका ज्ञान अमोघ है और आप में अपार विद्या का बल है।' अपनी पुत्री द्वारा ऐसा कहे जाने पर महायशा द्विजश्रेष्ठ (शुक्राचार्य) बहुत प्रसन्न हुए और सभी दानवों द्वारा पूजित होकर पुनः नगर में प्रवेश कर गए।
  • व्याख्या: इस अंतिम चरण में शर्मिष्ठा अपने कुल और राज्य की रक्षा के लिए अपनी राजसी प्रतिष्ठा का त्याग कर देवयानी की दासी बनना स्वीकार करती है। यह इस बात को दर्शाता है कि संकट के समय व्यक्तिगत अहंकार का त्याग कर सामूहिक और पारिवारिक हित को प्राथमिकता देनी चाहिए। अंततः शुक्राचार्य का मान-सम्मान वापस लौटता है और वे प्रसन्नतापूर्वक दैत्यराज के नगर में प्रवेश करते हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि चतुःसप्ततितमोऽध्यायः।। 74 ।।