श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोत्तरशततमोऽध्यायः

महाभारत आदि पर्व अध्याय १०१

श्लोक 1-7

वैशंपायन उवाच। दुष्यन्ताद्भरतो राज्यं यथान्यायमवाप सः। तस्य तत्प्रथितं कर्म प्रावर्तत महात्मनः।। (1-101-1) भास्वरं दिव्यमजितं लोकसंनादनं महत्। स विजित्य महीपालांश्चकार वशवर्तिनः।। (1-101-2) चचार च सतां धर्मं प्राप्य चानुत्तमं यशः। स राजा चक्रवर्त्यासीत्सार्वभौमः प्रतापवान्।। (1-101-3) ईजे च बहुभिर्यज्ञैर्यथा शक्रो मरुत्पतिः। याजयामास तं कण्वो दक्षवद्भूरिदक्षिणम्।। (1-101-4) श्रीमद्गोविततं नाम वाजिमेधमवाप सः। यस्मिन्सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ।। (1-101-5) सोऽश्वमेधशतैरीजे यमुनामनु तीरगः। त्रिशतैश्च सरस्वत्यां गङ्गामनु चतुःशतैः।। (1-101-6) दौष्यन्तिर्भरतो यज्ञैरीजे शाकुन्तलो नृपः। तस्माद्भरतवंशस्य विप्रतस्थे महद्यशः।। (1-101-7)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— दुष्यंत के पश्चात् महात्मा भरत ने यथानिधि न्यायपूर्वक राज्य प्राप्त किया। उन महात्मन भरत के वे प्रख्यात, भास्वर (तेजस्वी), दिव्य, अजेय, लोक-आनंददायक और महान कर्म प्रवृत्त हुए। उन्होंने समस्त राजाओं को जीतकर उन्हें अपने वश में कर लिया। सज्जनों के धर्म का आचरण करते हुए उन्होंने अनुत्तम यश प्राप्त किया और वे प्रतापवान सार्वभौम चक्रवर्ती राजा हुए। मरुतों के स्वामी देवराज इंद्र की भाँति उन्होंने अनेक यज्ञ किए। महर्षि कण्व ने दक्ष और प्रचुर दक्षिणा वाले उन यज्ञों द्वारा उनका अनुष्ठान कराया। उन्होंने 'गोवितत' नाम के श्रीमद् अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान किया, जिसमें भरत ने कण्व ऋषि को 'पद्म' (अरबों) की संख्या में स्वर्ण-मुद्राएँ दान दीं। उस दौष्यन्त शाकुंतल नृप भरत ने यमुना के तट पर सौ, सरस्वती के तट पर तीन सौ और गंगा के तट पर चार सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान किया। इसी से भरत वंश का महान यश चारों दिशाओं में फैल गया।

व्याख्या: चक्रवर्ती सम्राट भरत के पराक्रम, शासन और उनके द्वारा किए गए विशाल यज्ञों का वर्णन यहाँ किया गया है। कण्व ऋषि के सान्निध्य में किए गए इन यज्ञों और अपार दान-पुण्य से उनके वंश की प्रतिष्ठा पूरे विश्व में स्थापित हो गई।

श्लोक 8-11

भरतस्य वरस्त्रीषु पुत्राः संजज्ञिरे पृथक्। नाभ्यनन्दत्तदा राजा नानुरूपा ममेति तान्।। (1-101-8) ततस्तान्मातरः क्रुद्धाः पुत्रान्निन्युर्यमक्षयम्। ततस्तस्य नरेन्द्रस्य वितथं पुत्रजन्म तत्।। (1-101-9) ततो महद्भिः क्रतुभिरीजानो भरतस्तदा। लेभे पुत्रं भरद्पाजाद्भुमन्युं नाम भारत।। (1-101-10) ततः पुत्रिणमात्मानं ज्ञात्वा पौरवनन्दनः। भुमन्युं भरतश्रेष्ठ यौवराज्येऽभ्यषेचयत्।। (1-101-11)

हिंदी अनुवाद: राजा भरत की श्रेष्ठ पत्नियों से अलग-अलग कई पुत्र उत्पन्न हुए, किंतु राजा ने उनमें से किसी को भी अपने अनुकूल (योग्य) नहीं माना और उनका अभिनंदन नहीं किया। इस बात से क्रोधित होकर उन माताओं ने अपने उन पुत्रों को यमक्षय (मृत्यु) के लोक में पहुँचा दिया। इस प्रकार उस नरेन्द्र के वे सभी पुत्र-जन्म व्यर्थ (वितथ) हो गए। तदनन्तर, महान यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले भरत ने महर्षि भरद्वाज की कृपा से 'भुमन्यु' नामक पुत्र प्राप्त किया। तब पौरवनन्दन भरत ने स्वयं को पुत्रवान जानकर उस श्रेष्ठ भुमन्यु का यौवराज्य के पद पर अभिषेक कर दिया।

व्याख्या: भरत के अपनी रानियों से उत्पन्न पुत्रों के योग्य न होने के कारण वंश संकट उत्पन्न हो गया था, जिसे भरद्वाज ऋषि की कृपा से प्राप्त भुमन्यु ने दूर किया। भुमन्यु के आने से पौरव वंश की अगली पीढ़ी सुरक्षित हुई।

श्लोक 12-17

ततो दिविरथो नाम भुमन्योरभवत्सुतः। सुहोत्रश्च सुहोता च सुहविः सुयजुस्तथा।। (1-101-12) पुष्करिण्यामृचीकश्च भुमन्योरभवन्सुताः। तेषां ज्येष्ठः सुहोत्रस्तु राज्यमाप महीक्षिताम्।। (1-101-13) राजसूयाश्वमेधाद्यैः सोऽयजद्बहुभिः सवैः। सुहोत्रः पृथिवीं कृत्स्नां बुभुजे सागराम्बराम्।। (1-101-14) पूर्णां हस्तिगवाश्वैश्च बहुरत्नसमाकुलाम्। ममज्जेव मही तस्य भूरिभारावपीडिता।। (1-101-15) हस्त्यश्वरथसंपूर्णा मनुष्यकलिला भृशम्। सुहोत्रे राजनि तदा धर्मतः शासति प्रजाः।। (1-101-16) चैत्ययूपाङ्किता चासीद्भूमिः शतसहस्रशः। प्रवृद्धजनसस्या च सर्वदैव व्यरोचत।। (1-101-17)

हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात भुमन्यु के दिविरथ, सुहोत्र, सुहोता, सुहवि, सुयजु, पुष्करिणी और ऋचीक— ये पुत्र हुए। उनमें सबसे बड़े सुहोत्र ने समस्त राजाओं का राज्य प्राप्त किया। सुहोत्र ने राजसूय और अश्वमेध आदि अनेक महान यज्ञों का अनुष्ठान किया। उन सुहोत्र ने समुद्र रूपी वस्त्रों वाली संपूर्ण पृथ्वी का भोग किया। हाथियों, गायों, घोड़ों और अनमोल रत्नों से परिपूर्ण होने के कारण उनकी विशाल सेना और भार से पृथ्वी मानो दब सी गई थी। जब राजा सुहोत्र धर्मपूर्वक प्रजा का शासन कर रहे थे, तब वह भूमि हाथियों, घोड़ों और रथों से तथा मनुष्यों से पूरी तरह आकीर्ण थी। उस समय वह पृथ्वी सैकड़ों-हजारों यज्ञीयूपों (यज्ञ के खंभों) से अंकित थी और प्रचुर जनसमूह तथा फसलों से हमेशा सुशोभित होती रहती थी।

व्याख्या: भुमन्यु के वंश का विस्तार और राजा सुहोत्र के यशस्वी शासन का वर्णन यहाँ मिलता है। उनके राज्य में धर्म और यज्ञों की प्रधानता थी, जिससे संपूर्ण पृथ्वी समृद्ध और सुशोभित थी।

श्लोक 18-20

ऐक्ष्वाकी जनयामास सुहोत्रात्पृथिवीपतेः। अजमीढं सुमीढं च पुरुमीढं च भारत।। (1-101-18) अजमीढो वरस्तेषां तस्मिन्वंशः प्रतिष्ठितः। षट् पुत्रान्सोप्यजनयत्तिसृषु स्त्रीषु भारत।। (1-101-19) ऋक्षं धूमिन्यथो नीली दुष्यन्तपरमेष्ठइनौ। केशिन्यजनयज्जह्नुं सुतौ च जनरूषिणौ।। (1-101-20)

हिंदी अनुवाद: हे भारत! पृथ्वीपति सुहोत्र की पत्नी ऐक्ष्वाकी ने अजमीढ, सुमीढ और पुरुमीढ— इन तीन पुत्रों को जन्म दिया। उन तीनों में अजमीढ सबसे श्रेष्ठ थे और उन्हीं से आगे वंश की प्रतिष्ठा हुई। हे भारत! उस अजमीढ ने अपनी तीन स्त्रियों से छह पुत्र उत्पन्न किए। धूमिनी ने ऋक्ष को, नीली ने दुष्यंत और परमेष्ठी को, तथा केशिनी ने जह्नु और जनरूपी (जनरूषी) नामक दो पुत्रों को जन्म दिया।

व्याख्या: यहाँ पौरव वंश की अगली पीढ़ियों और अजमीढ के वंश विस्तार का परिचय दिया गया है, जिनसे आगे चलकर कुरु वंश और अन्य प्रसिद्ध राजवंशों का उद्भव होता है।

श्लोक 21-25

विदुः संवरणं वीरमृक्षाद्राथन्तरीसुतम्। तथेमे सर्वपञ्चाला दुष्यन्तपरमेष्ठिनोः। अन्वयाः कुशिका राजञ्जन्होरमिततेजसः।। (1-101-21) जनरूषणयोर्ज्येष्ठमृक्षमाहुर्जनाधिपम्। ऋक्षात्संवरणो जज्ञे राजन्वंशकरस्तव।। (1-101-22) आर्क्षे संवरणे राजन्प्रशासति वसुन्धराम्। संक्षयः सुमहानासीत्प्रजानामिति नः श्रुतम्।। (1-101-23) व्यशीर्यत ततो राष्ट्रं क्षयैर्नानाविधैस्तदा। क्षुन्मृत्युभ्यामनावृष्ट्या व्याधिभिश्च समाहतम्।। (1-101-24) अभ्यघ्नन्भारतांश्चैव सपत्नानां बलानि च। चालयन्वसुधां चेमां बलेन चतुरङ्गिणा।। (1-101-25)

हिंदी अनुवाद: हे राजन्! लोग वीर संवरण को रथन्तरी (धूमिनी/ऋक्ष की माता) के गर्भ से उत्पन्न ऋक्ष का पुत्र जानते हैं। इसी प्रकार ये सभी पञ्चाल, दुष्यंत और परमेष्ठी के वंशज तथा अमिततेजस्वी जह्नु के वंशज कुशिका (कुशिक वंशी) हैं। जनरूषण (जनरूषी) के भाइयों में सबसे बड़े ऋक्ष को ही जनाधिप कहा गया है। हे राजन्! उसी ऋक्ष से तुम्हारे वंश को बढ़ाने वाले संवरण उत्पन्न हुए थे। हमने ऐसा सुना है कि जब ऋक्ष के पुत्र संवरण इस पृथ्वी का शासन कर रहे थे, तब प्रजा का बहुत बड़ा संक्षय (विनाश) हुआ था। उस समय अनावृष्टि (सूखे), भूख, मृत्यु और तरह-तरह की बीमारियों से पीड़ित होने के कारण संपूर्ण राष्ट्र बिखर गया था। शत्रुओं की चतुरङ्गिणी सेना ने इस पृथ्वी को कंपाते हुए भारताें (भरतवंशियों) पर आक्रमण कर दिया और उन्हें परास्त करने लगे।

व्याख्या: यहाँ पौरव वंश के राजा संवरण के शासनकाल की संकटपूर्ण परिस्थितियों का वर्णन है। प्राकृतिक आपदाओं (अकाल, महामारी) के साथ-साथ शत्रुओं के आक्रमणों से भरतवंशियों का राज्य अत्यधिक कमजोर और विपत्ति में घिर गया था।

श्लोक 26-30

अभ्ययात्तं च पाञ्चल्यो विजित्य तरसा महीम्। अक्षौहिणीभिर्दशभिः स एनं समरेऽजयत्।। (1-101-26) ततः सदारः सामात्यः सपुत्रः ससुहृज्जनः। राजा संवरणस्तस्माặtपलायत महाभयात्।। (1-101-27) ते प्रतीचीं पराभूताः प्रपन्ना भारता दिशम्। सिंходомनस्य महतो निकुञ्जे न्यवसंस्तदा। नदीविपयपर्यन्ते पर्वतस्य समीपतः।। (1-101-28) तत्रावसन्बहून्कालान्भारता दुर्गमाश्रिताः। तेषां निवसतां तत्र सहस्रं परिवत्सरान्।। (1-101-29) अथाभ्यगच्छद्भरतान्वसिष्ठो भगवानृषिः। तमागतं प्रयत्नेन प्रत्युद्गम्याभिवाद्य च।। (1-101-30)

हिंदी अनुवाद: पञ्चालराज ने अपनी शक्ति से पृथ्वी को जीतकर दस अक्षौहिणी सेना के साथ संवरण पर आक्रमण कर दिया और युद्ध में उन्हें पराजित कर दिया। इसके बाद राजा संवरण अपनी पत्नी, मंत्रियों, पुत्रों और सगे-सम्बन्धियों के साथ उस महान भय के कारण वहाँ से पलायन कर गए। पराजित होने के बाद वे भरतवंशी पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान कर गए और महान सिंधु नदी के निकुंज (तटवर्ती वनों), नदी के किनारे तथा पर्वत के समीप निवास करने लगे। वे भरतवंशी दुर्गम स्थानों का आश्रय लेकर वहाँ बहुत काल तक रहे। वहाँ निवास करते हुए उन्हें काफी समय बीत गया। एक दिन भगवान वशिष्ठ ऋषि उन भरतवंशियों के पास स्वयं चलकर आए। अपने पास आए हुए उन महर्षि का भरतवंशियों ने प्रयत्नपूर्वक आगे बढ़कर स्वागत और अभिवादन किया।

व्याख्या: पञ्चालराज से पराजय के पश्चात राजा संवरण अपने परिवार और प्रजाजनों के साथ सिंधु नदी के तटवर्ती पर्वतीय दुर्गम क्षेत्रों में शरण लेने को विवश हुए। इस कठिन समय में उनके कुलगुरु भगवान वशिष्ठ का आगमन उनके लिए एक नए संबल और आशा की किरण बनकर आता है।

श्लोक 31-35

अर्घ्यमभ्याहरंस्तस्मै ते सर्वे भारतास्तदा। निवेद्य सर्वमृषये सत्कारेण सुवर्चसे।। (1-101-31) तमासने चोपविष्टं राजा वव्रे स्वयं तदा। पुरोहितो भवान्नोऽस्तु राज्याय प्रयतेमहि।। (1-101-32) ओमित्येवं वसिष्ठोऽपि भारतान्प्रत्यपद्यत। अथाभ्यषिञ्चत्साम्राज्ये सर्वक्षत्रस्य पौरवम्।। (1-101-33) विषाणभूतं सर्वस्यां पृथिव्यामिति नः श्रुतम्। भरताध्युषितं पूर्वं सोऽध्यतिष्ठत्पुरोतोतमम्।। (1-101-34) पुनर्बलिभृतश्चैव चक्रे सर्वमहीक्षितः। ततः स पृथिवीं प्राप्य पुनरीजे महाबलः।। (1-101-35)

हिंदी अनुवाद: उन सभी भरतवंशियों ने सत्कारपूर्वक सुवर्चस ऋषि वशिष्ठ को अर्घ्य अर्पित किया और अपनी सारी स्थिति उन्हें विस्तार से बताई। इसके बाद आसन पर बैठे हुए महर्षि से राजा संवरण ने स्वयं प्रार्थना की— "आप हमारे पुरोहित बनें, जिससे हम पुनः अपने राज्य को प्राप्त करने के लिए प्रयत्न कर सकें।" वशिष्ठ जी ने 'तथास्तु' (ओम्) कहकर उन भरतवंशियों की बात स्वीकार कर ली। तिनके बाद उन्होंने पौरवराज (संवरण) का समस्त क्षत्रियों के साम्राज्य पर अभिषेक किया। हमने सुना है कि वे पृथ्वी पर श्रेष्ठ स्थान पर प्रतिष्ठित हुए और उन्होंने पूर्वकाल में भरतों द्वारा अधिष्ठित उस उत्तमपुर (हस्तिनापुर आदि) को पुनः प्राप्त किया। उन्होंने समस्त राजाओं को पुनः कर (बलि) देने के लिए बाध्य किया (अपने अधीन किया)। इसके बाद उस महाबलवान राजा ने पृथ्वी को पुनः प्राप्त करके अनेक यज्ञों का अनुष्ठान किया।

व्याख्या: गुरु वशिष्ठ के आश्रय और पुरोहिती स्वीकार करने के बाद राजा संवरण का भाग्य पलटता है। वशिष्ठ जी के आशीर्वाद और अभिषेक से पौरव वंश अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा, राज्य और वैभव को पुनः प्राप्त कर लेता है तथा संवरण फिर से सार्वभौम राजा बनते हैं।

श्लोक 36-40

आजमीढो महायज्ञैर्बहुभिर्भूरिदक्षिणैः। ततः संवरणात्सौरी तपती सुषुवे कुरुम्।। (1-101-36) राजत्वे तं प्रजाः सर्वा धर्मज्ञ इति वव्रिरे। महिम्ना तस्य कुरवो लेभिरे प्रत्ययं भृशम्। तस्य नाम्नाऽभिविख्यातं पृथिव्यां कुरुजाङ्गलं।। (1-101-37) कुरुक्षेत्रं स तपसा पुण्यं चक्रे महातपाः। अश्ववन्तमभिष्यन्तं तथा चैत्ररथं मुनिम्।। (1-101-38) जनमेजयं च विख्यातं पुत्रांश्चास्यानुशुश्रुम। पञ्चैतान्वाहिनी पुत्रान्व्यजायत मनस्विनी।। (1-101-39) अविक्षितः परिक्षित्तु शबलाश्वस्तु वीर्यवान्। आदिराजो विराजश्च शाल्मलिश्च महाबलः।। (1-101-40)

हिंदी अनुवाद: अजमीढ ने प्रचुर दक्षिणा वाले अनेक महायज्ञ किए। इसके बाद संवरण और सूर्यपुत्री तपती के संयोग से 'कुरु' नामक प्रतापी पुत्र उत्पन्न हुआ। सभी प्रजाजनों ने उस धर्मज्ञ कुरु को राजा के रूप में स्वीकार किया। उनके ही महात्म्य से कुरुओं (कुरुवंशियों) ने अत्यधिक प्रतिष्ठा और विश्वास प्राप्त किया। उन्हीं के नाम से इस पृथ्वी पर 'कुरुजांगल' क्षेत्र अतिविख्यात हुआ। उन महातपस्वी कुरु ने अपनी तपस्या से कुरुक्षेत्र को पवित्र तीर्थ बनाया। मनस्विनी पत्नी ने कुरु के पाँच प्रसिद्ध पुत्रों को जन्म दिया— अश्ववान्, अभिष्यन्त, चैत्ररथ मुनि, विख्यात जनमेजय और वाहिनी। (इनके आगे के वंश में) अविक्षित, परीक्षित, वीर्यवान शबलाश्व, आदिराज, विराज और महाबलशाली शाल्मलि हुए।

व्याख्या: राजा संवरण और सूर्यपुत्री तपती के पुत्र 'कुरु' से ही आगे चलकर महान 'कुरु वंश' की नींव पड़ती है। उनके नाम पर कुरुक्षेत्र और कुरुजांगल जैसे पवित्र व प्रसिद्ध भूभाग विख्यात हुए, तथा उनके पुत्र-पौत्रों ने इस राजवंश की परंपरा को आगे बढ़ाया।

श्लोक 41-45

उच्चैःश्रवा भङ्गकारो जितारिश्चाष्टमः स्मृतः। एतेषामन्ववाये तु ख्यातास्ते कर्मजैर्गुणैः। जनमेजयादयः सप्त तथैवान्ये महारथाः।। (1-101-41) परीक्षितोऽभवन्पुत्राः सर्वे धर्मार्थकोविदाः। कक्षसेनोग्रसेनौ तु चित्रसेनश्च वीर्यवान्।। (1-101-42) इन्द्रसेनः सुषेणश्च भीमसेनश्च नामतः। जनमेजयस्य तनया भुवि ख्याता महाबलाः।। (1-101-43) धृतराष्ट्रः प्रथमजः पाण्डुर्बाह्लीक एव च। निषधश्च महातेजास्तथा जाम्बूनदो बली।। (1-101-44) कुण्डोदरः पदातिश्च वसातिश्चाष्टमः स्मृतः। सर्वे धर्मार्थकुशलाः सर्वभूतहिते रताः।। (1-101-45)

हिंदी अनुवाद: उच्चैःश्रवा, भङ्गकार और आठवें जितारि कहे गए हैं। इनके वंश में अपने कर्मजन्य गुणों से विख्यात जनमेजय आदि सात तथा अन्य कई महारथी हुए। परीक्षित के सभी पुत्र धर्म और अर्थ के मर्मज्ञ थे— कक्षसेन, उग्रसेन, वीरवान चित्रसेन, इंद्रसेन, सुषेण और भीमसेन नाम वाले जनमेजय के ये महाबली पुत्र पृथ्वी पर प्रसिद्ध हुए। (तदनन्तर) धृतराष्ट्र सबसे बड़े हुए, तथा पाण्डु, बाह्लीक, महातेजा निषध, बलवान जाम्बूनद, कुण्डोदर, पदाति और आठवें वसाति कहे गए हैं। ये सभी धर्म और अर्थ में कुशल तथा समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले थे।

व्याख्या: यहाँ कुरु वंश की विभिन्न शाखाओं और परीक्षित तथा जनमेजय आदि राजाओं के पराक्रमी व गुणवान पुत्रों का परिचय दिया गया है, जो आगे चलकर इस राजवंश को व्यापकता प्रदान करते हैं।

श्लोक 46-52

धृतराष्ट्रोऽथ राजासीत्तस्य पुत्रोऽथ कुण्डिकः। हस्ती वितर्कः क्राथश्च कुण्डिनश्चापि पञ्चमः।। (1-101-46) हविश्रवास्तथेन्द्राभो भुमन्युश्चापराजितः। धृतराष्ट्रसुतानां तु त्रीनेतान्प्रथितान्भुवि।। (1-101-47) प्रतीपं धर्मनेत्रं च सुनेत्रं चापि भारत। प्रतीपः प्रथितस्तेषां बभूवाप्रतिमो भुवि।। (1-101-48) प्रतीपस्य त्रयः पुत्रा जज्ञिरे भरतर्षभ। देवापिः शन्तनुश्चैव बाह्लीकश्च महारथः।। (1-101-49) देवापिस्तु प्रवव्राज तेषां धर्महितेप्सया। शन्तनुश्च महीं लेभे बाह्लीकश्च महारथः।। (1-101-50) भरतस्यान्वयास्त्वेते देवकल्पा महारथाः। बभूवुर्ब्रह्मकल्पाश्च बहवो राजसत्तमाः।। (1-101-51) एवंविधा महाभागा देवरूपाः प्रहारिणः। अन्ववाये महाराज ऐलवंशविवर्धनाः।। (1-101-52)

हिंदी अनुवाद: तत्पश्चात धृतराष्ट्र राजा हुए, जिनके पुत्र कुण्डिक, हस्ती, वितर्क, क्राथ और पाँचवें कुण्डिन हुए। हविश्रवा, इन्द्रार्भ और अपराजित भुमन्यु— धृतराष्ट्र के इन तीन पुत्रों को पृथ्वी पर विशेष रूप से प्रख्यात माना गया है। हे भारत! प्रतीप, धर्मनेत्र और सुनेत्र— इनमें प्रतीप पृथ्वी पर सबसे अधिक प्रसिद्ध और अप्रतिम राजा हुए। हे भरतर्षभ! प्रतीप के तीन पुत्र उत्पन्न हुए— देवापि, शन्तनु और महारथी बाह्लीक। उनमें देवापि ने धर्म की इच्छा से प्रव्रज्या (संन्यास) ले ली, जिससे शन्तनु और महारथी बाह्लीक ने पृथ्वी का राज्य प्राप्त किया। भरत के ये सभी वंशज देवतुल्य महारथी और ब्रह्मकल्प (ब्राह्मणों जैसी तेजस्विनी प्रतिष्ठा वाले) अनेक राजसत्तम हुए। हे महाराज! ऐल वंश (पुरूरवा के वंश) को बढ़ाने वाले ये सभी महाभागा, देवरूप और प्रतापी योद्धा इसी वंश में उत्पन्न हुए।

व्याख्या: यहाँ प्रतीप और उनके पुत्रों (देवापि, शन्तनु, बाह्लीक) का प्रसंग आता है। शन्तनु के राजा बनने की पृष्ठभूमि तैयार होती है, जो आगे चलकर महाभारत की मुख्य कथा (पांडव और कौरवों के पूर्वज) का आधार बनती है।

श्लोक 53-60

गङ्गातीरं समागम्य दीक्षितो जनमेजय। अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च।। (1-101-53) पुनरीजे महायज्ञैः समाप्तवरदक्षिणैः। अग्निष्टोमातिरात्राणामुक्थानां सोमवत्पुनः।। (1-101-54) वाजपेयेष्टिसत्राणां सहस्रैश्च सुसंभृतैः। दृष्ट्वा शाकुन्तलो राजा तर्पयित्वा द्विजान्धनैः।। (1-101-55) पुनः सहस्रं पद्मानां कण्वाय भरतो ददौ। जम्बूनदस्य शुद्धस्य कनकस्य महायशाः।। (1-101-56) यस्य यूपाः शतव्यामाः परिणाहेऽथ काञ्चनाः। सहस्रव्याममुद्वृद्धाः सेन्द्रैर्देवैः समुच्छ्रिताः।। (1-101-57) स्वलङ्कृता भ्राजमानाः सर्वरत्नैर्मनोरमैः। हिरण्यं द्विरदानश्वान्महिषोष्ट्रगजाविकम्।। (1-101-58) दासीदासं धनं धान्यं गाः सुशीलाः सवत्सकाः। भूमिं यूपसहस्राङ्कां कण्वाय बहुदक्षिणाम्।। (1-101-59) बहूनां ब्रह्मकल्पानां धनं दत्त्वा क्रतून्बहून्। ग्रामान्गृहाणि शुभ्राणि कोटिशोथाददत्तदा।। (1-101-60)

हिंदी अनुवाद: गंगा के तट पर आकर राजा जनमेजय ने दीक्षा ली और प्रचुर दक्षिणा वाले महायज्ञों— हजारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञों का अनुष्ठान किया। अग्निष्टोम, अतिरात्र, उक्थ, सोमयाग, वाजपेय और सत्रों के हजारों अनुष्ठानों को भली-भांति संपन्न कर, महायशस्वी शाकुंतल राजा भरत ने ब्राह्मणों को धन से तृप्त किया। उन्होंने शुद्ध जाम्बूनद (स्वर्ण) की पद्मों (अरबों) की संख्या में मुद्राएँ पुनः कण्व ऋषि को दान दीं। उनके यज्ञों के स्वर्णमयी यूप (खंभे) सौ-सौ व्याम परिधि वाले और एक-एक हजार व्याम ऊँचे थे, जो देवराज इंद्र सहित देवताओं द्वारा भी पूजित (सुशोभित) प्रतीत होते थे। वे खंभे सभी मनोरम रत्नों से भली-भांति अलंकृत और दैदीप्यमान थे। उन्होंने कण्व ऋषि तथा अन्य ब्राह्मणों को सुवर्ण, हाथी, घोड़े, भैंसे, ऊँट, भेड़-बकरियाँ, दास-दासियाँ, धन, धान्य, बछड़ों सहित शीलवान गायें, हजारों यज्ञीयूपों से अंकित भूमि और प्रचुर दक्षिणायुक्त बहुमूल्य दान दिए। ब्रह्मकल्प अनेक ऋषियों को यज्ञों में अपार धन तथा कोटि-कोटि शुभ ग्राम और घर दान में दिए।

व्याख्या: इस भाग में राजा भरत (शाकुंतल) के विराट यज्ञों, उनकी अपार उदारता और उनके द्वारा महर्षि कण्व व अन्य ब्राह्मणों को दिए गए महादानों का विस्तृत एवं भव्य वर्णन किया गया है, जो उनकी सम्राट-सुलभ महिमा को रेखांकित करता है।

श्लोक 61-63

भरताद्भारती कीर्तिर्येनेदं भारतं कुलम्।' भरतस्यान्वये जाता देवकल्पा महारथाः।। (1-101-61) बहवो ब्रह्मकल्पाश्च बभूवुः क्षत्रसत्तमाः। तेषामपरिमेयानि नामधेयानि सन्त्युत।। (1-101-62) तेषां कुले यथा मुख्यान्कीर्तयिष्यामि भारत। महाभागान्देवकल्पान्सत्यार्जवपरायणान्।। (1-101-63)

हिंदी अनुवाद: भरत से ही 'भारती कीर्ति' फैली और उन्हीं से यह 'भारत कुल' (वंश) कहलाया। भरत के वंश में अनेक देवतुल्य महारथी और ब्रह्मकल्प क्षत्रियश्रेष्ठ उत्पन्न हुए, जिनके नाम अपरिमेय (अगणित) हैं। हे भारत! उस कुल में जो मुख्य-मुख्य महाभाग, देवकल्प और सत्य तथा आर्जव (सरलता/ऋजुता) के परायण राजा हुए हैं, उनके नामों का मैं अब आगे कीर्तन (वर्णन) करूँगा।

व्याख्या: यह अध्याय इस बात पर मुहर लगाता है कि संपूर्ण भारतवर्ष का नाम और इस महान राजवंश की प्रतिष्ठा सम्राट भरत के नाम पर ही 'भारत कुल' पड़ी। आगे के अध्यायों के लिए पृष्ठभूमि बाँधते हुए वैशंपायन जी वंश के अन्य प्रमुख प्रतापी राजाओं के नामों का वर्णन करने का संकेत देते हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि एकोत्तरशततमोऽध्यायः।। 101 ।।

संभवपर्वणि शततमोऽध्यायः

संभवपर्वणि द्व्यधिकशततमोऽध्यायः