श्लोक 1-8
वैशंपायन उवाच। इक्ष्वाकुवंशप्रभो राजासीत्पृथिवीपतिः। महाभिषगिति ख्यातः सत्यवाक्सत्यविक्रमः।। (1-102-1) सोऽश्वमेधसहस्रेण राजसूयशतेन च। तोषयामास देवेशं स्वर्गं लेभे ततः प्रभुः।। (1-102-2) ततः कदाचिद्ब्रह्माणमुपासांचक्रिरे सुराः। तत्र राजर्षयो ह्यासन्स च राजा महाभिषक्।। (1-102-3) अथ गङ्गा सरिच्छ्रेष्ठा समुपायात्पितामहम्। तस्या वासः समुद्धूतं मारुतेन शशिप्रभम्।। (1-102-4) ततोऽभवन्सुरगणाः सहसाऽवाङ्मुखास्तदा। महाभिषक्तु राजर्षिरशङ्को दृष्टवान्नदीम्।। (1-102-5) सोपध्यातो भगवता ब्रह्मणा तु महाभिषक्। उक्तश्च जातो मर्त्येषु पुनर्लोकानवाप्स्यसि।। (1-102-6) यया हृतमनाश्चासि गङ्गया त्वं हि दुर्मते। सा ते वै मानुषे लोके विप्रियाण्याचरिष्यति।। (1-102-7) यदा ते भविता मन्युस्तदा शापाद्विमोक्ष्यते। (1-102-8)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— इक्ष्वाकु वंश के प्रभु, सत्यवादी और सत्यपराक्रमी महाभिष नाम के एक पृथ्वीपति राजा थे। उन्होंने एक हजार अश्वमेध और सौ राजसूय यज्ञों द्वारा देवेश्वर (इंद्र/ब्रह्मा) को संतुष्ट किया था, जिससे वे प्रभु तदनंतर स्वर्ग को प्राप्त हुए। तदनंतर एक बार सभी देवता ब्रह्मा जी की उपासना करने के लिए एकत्रित हुए। वहाँ अन्य राजर्षियों के साथ राजा महाभिष भी उपस्थित थे। उसी समय नदियों में श्रेष्ठ माँ गंगा पितामह ब्रह्मा के दर्शन के लिए वहाँ आईं। वायु के झोंके से उनका चंद्रमा के समान प्रकाशमान वस्त्र कुछ विचलित (हिल) गया। उस समय सभी सुरगण (देवता) अचानक नीचे की ओर मुँह करके बैठ गए, किंतु राजर्षि महाभिष ने निस्संकोच दृष्टि से उस नदी (गंगा) को देखा। भगवान ब्रह्मा ने महाभिष के इस आचरण को देखकर उन पर ध्यान केंद्रित किया और उन्हें शाप देते हुए कहा— "तुम मनुष्यों में जन्म लो और फिर अपने लोक को प्राप्त होगे। हे दुर्मते! जिस गंगा पर तुम्हारा मन आासक्त हो गया है, वह मनुष्य लोक में तुम्हारे साथ प्रतिकूल आचरण (प्रिय के विपरीत कार्य) करेगी। जब तुम पर क्रोध (मन्यु) उत्पन्न होगा, तब तुम इस शाप से मुक्त हो जाओगे।"
व्याख्या: यहाँ राजा महाभिष और गंगा के प्रसंग का उल्लेख है। सभा में मर्यादा का उल्लंघन करने के कारण ब्रह्मा जी ने महाभिष को मृत्युलोक में जन्म लेने का शाप दिया, जो आगे चलकर राजा शान्तनु के रूप में उनके पुनर्जन्म का आधार बनता है।
श्लोक 9-16
वैशंपायन उवाच। स चिन्तयित्वा नृपतिर्नृपानन्यांस्तपोधनान्।। (1-102-8b) प्रतीपं रोचयामास पितरं भूरितेजसम्। सा महाभिषजं दृष्ट्वा नदी दैर्याच्च्युतं नृपम्।। (1-102-9) तमेव मनसा ध्यायन्त्युपावृत्ता सरिद्वरा। सा तु विध्वस्तवपुषः कश्मलाभिहतान्नृप।। (1-102-10) ददर्श पथि गच्छन्ती वसून्देवानदिवौकसः। तथारूपांश्च तान्दृष्ट्वा प्रपच्छ सरितां वरा।। (1-102-11) किमिदं नष्टरूपाः स्थ कच्चित्क्षेमं दिवौकसाम्। तामूचुर्वसवो देवाः शप्ताः स्मो वै महानदि।। (1-102-12) अल्पेऽपराधे संरम्भाद्वसिष्ठेन महात्मना। विमूढा हि वयं सर्वे प्रच्छन्नमृषिसत्तमम्।। (1-102-13) सन्ध्यां वसिष्ठमासीनं तमत्यभिसृताः पुरा। तेन कोपाद्वयं शप्ता योनौ संभवतेति ह।। (1-102-14) न तच्छक्यं निवर्तयितुं यदुक्तं ब्रह्मवादिना। त्वमस्मान्मानुषी भूत्वा सूष्व पुत्रान्वसून्भुवि।। (1-102-15) न मानुषीणां जठरं प्रविशेम वयं शुभे। इत्युक्ता तैश्च वसुभिस्तथेत्युक्त्वाऽब्रवीदिदम्।। (1-102-16)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तदनंतर उन नृपति (महाभिष) ने अन्य नृपतियों और तपोधनों के विषय में विचार करके भूरितेजस्वी राजा प्रतीप को अपना पिता बनना तय किया (अर्थात प्रतीप के यहाँ जन्म लेना चाहा)। उधर नदी (गंगा) भी महाभिष को देखकर धैर्यच्युत हो गई और मन में उन्हीं का ध्यान करती हुई वापस लौटी। मार्ग में जाते हुए उस श्रेष्ठ नदी ने देखा कि देवलोक के आठों वसु अपने देदीप्यमान रूप से भ्रष्ट (तेजहीन) हो चुके हैं। उस सरिता-श्रेष्ठा ने उन सभी को उस अवस्था में देखकर पूछा— "यह क्या है? आप लोगों के रूप नष्ट क्यों हो गए हैं? क्या देवलोक में सब कुछ कुशल-क्षेम तो है?" वसु देवताओं ने उत्तर दिया— "हे महानदी! हम महात्मा वशिष्ठ द्वारा अत्यधिक क्रोधित होकर अल्प अपराध के कारण शाप दिए गए हैं। हम सब मूढ़तावश संध्या के समय बैठे हुए उन ऋषिसত্তম वशिष्ठ के समीप से अनजाने में निकल गए थे, जिससे कोपवश उन्होंने हमें शाप दिया कि 'तुम सब योनि में जन्म लो।' ब्रह्मवादी ऋषि द्वारा कही गई बात को टाला नहीं जा सकता। अतः हे शुभे! तुम मानुषी (स्त्री) बनकर पृथ्वी पर हमारे (वसुओं के) रूप में पुत्रों को जन्म दो, क्योंकि हम में से कोई भी सामान्य मनुष्यों के गर्भ में प्रवेश नहीं करना चाहता।" गंगा जी ने उनकी यह बात सुनकर 'तथास्तु' कहा और आगे बोलीं।
व्याख्या: इस खंड में यह स्पष्ट होता है कि महाभिष ने राजा प्रतीप को अपने पिता के रूप में चुना (जो आगे चलकर शान्तनु बने), और साथ ही अष्टवसुओं के वशिष्ठ ऋषि द्वारा दिए गए शाप तथा गंगा जी से उनके अनुरोध का प्रसंग भी जुड़ जाता है।
श्लोक 17-23
गङ्गोवाच। मर्त्येषु पुरुषश्रेष्ठः को वः कर्ता भविष्यति। (1-102-17a) वसव ऊचुः। प्रतीपस्य सुतो राजा शान्तनुर्लोकविश्रुतः। भविता मानुषे लोके स नः कर्ता भविष्यति।। (1-102-17b/c) गङ्गोवाच। ममाप्येवं मतं देवा यथा मां वदथानघाः। प्रियं तस्य करिष्यामि युष्माकं चेतदीप्सितम्।। (1-102-18) वसव ऊचुः। जातान्कुमारान्स्वानप्सु प्रक्षेप्तुं वै त्वमर्हसि। यथा नचिरकालं नो निष्कृतिः स्यात्त्रिलोकगे।। (1-102-19) जिघृक्षवो वयं सर्वे सुरभिं मन्दबुद्धयः। शप्ता ब्रह्मर्षिणा तेन तांस्त्वं मोचय चाशु नः।। (1-102-20) गङ्गोवाच। एवमेतत्करिष्यामि पुत्रस्तस्य विधीयताम्। नास्य मोघः सङ्गमः स्यात्पुत्रहेतोर्मया सह।। (1-102-21) वसव ऊचुः। तुरीयार्धं प्रदास्यामो वीर्यस्यैकैकशो वयम्। तेन वीर्येण पुत्रस्ते भविता तस्य चेप्सितम्।। (1-102-22) न संपत्स्यति मर्त्येषु पुनस्तस्य तु सन्ततिः। तस्मादपुत्रः पुत्रस्ते भविष्यति स वीर्यवान्।। (1-102-23)
हिंदी अनुवाद: गंगा जी ने पूछा— "मर्त्यलोक (मृत्युलोक) में पुरुषों में श्रेष्ठ ऐसा कौन है जो आप लोगों का पिता (उत्पादक) बनेगा?" वसुओं ने उत्तर दिया— "लोकविश्रुत राजा प्रतीप के पुत्र शान्तनु मनुष्य लोक में होंगे, वही हमारे पिता बनेंगे।" गंगा जी ने कहा— "हे अनघ देवताओं! जैसा तुम कह रहे हो, वैसा ही मेरा भी मत है। मैं उन (शान्तनु) का प्रिय करूँगी और आप लोगों की भी इच्छा पूर्ण करूँगी।" वसुओं ने कहा— "हे त्रिलोकगामिनी! उत्पन्न होते ही हमारे कुमारों (पुत्रों) को जल में फेंक (प्रवाहित कर) देना, जिससे शीघ्र ही हमारी इस शाप से निष्कृति (मुक्ति) हो सके। हम मन्दबुद्धियों ने ही लोभ वश महर्षि वशिष्ठ की सुरभि (कामधेनु) को पकड़ने का प्रयास किया था, जिसके कारण उस ब्रह्मर्षि ने हमें शाप दिया है। आप हम सबको उस शाप से शीघ्र मुक्त करें।" गंगा जी ने कहा— "मैं ऐसा ही करूँगी, किंतु उनका (शान्तनु का) पुत्र ऐसा होना चाहिए कि पुत्र के कारण मेरे साथ उनका संगम व्यर्थ (मोघ) न हो।" वसुओं ने उत्तर दिया— "हम सब अपने-अपने तेज का एक-चौथाई (तुरीयार्ध) अंश आपको प्रदान करेंगे। उस तेज से आपका और उनकी इच्छा के अनुसार एक महान पुत्र होगा। मर्त्यलोक में उस (पुत्र) की आगे कोई संतान नहीं होगी, इसलिए वह वीर पुत्र यद्यपि आपका होगा, तथापि वह (अन्य रूप से) अपुत्र (वंश न बढ़ाने वाला) ही रहेगा।"
व्याख्या: यहाँ गंगा और अष्टवसुओं के बीच एक गुप्त समझौते का वर्णन है, जिसके तहत वसुगण मनुष्य योनि में जन्म लेकर तुरंत जल में प्रवाहित होने (मुक्ति पाने) की शर्त रखते हैं, और गंगा जी शान्तनु से विवाह कर इस कार्य को संपन्न करने का वचन देती हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिप्रवमि संभवपर्वणि द्व्यधिकशततमोऽध्यायः।। 102 ।।
