श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत आदिपर्व अध्याय 103 संस्कृत हिन्दी व्याख्या

श्लोक 1-4

वैशंपायन उवाच। ततः प्रतीपो राजाऽऽसीत्सर्वभूतहितः सदा। निषसाद समा बह्वीर्गङ्गाद्वारगतो जपन्।। (1-103-1) तस्य रूपगुणोपेता गङ्गा स्त्रीरूपधारिणी। उत्तीर्य सलिलात्तस्माल्लोभनीयतमाकृतिः।। (1-103-2) अधीयानस्य राजर्षेर्दिव्यरूपा मनस्विनी। दक्षिणं शालसङ्काशमूरुं भेजे शुभानना।। (1-103-3) प्रतीपस्तु महीपालस्तामुवाच यशस्विनीम्। करोमि किं ते कल्याणि प्रियं यत्तेऽभिकाङ्क्षितम्।। (1-103-4)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तत्पश्चात राजा प्रतीप सदा सभी प्राणियों के हित में तत्पर रहने वाले हुए। उन्होंने गंगाद्वार (हरिद्वार) पर जाकर अनेक वर्षों तक बैठकर जप किया। जप करते हुए उन राजर्षि के पास जल से बाहर निकलकर रूप-गुण से संपन्न, अत्यंत लोभनीय आकृति वाली तथा स्त्री-रूप धारण करने वाली देवी गंगा आईं। दिव्य रूप वाली और मनस्विनी शुभानना गंगा ने वेदपाठ (या जप) में लीन उन राजर्षि के शाल के वृक्ष के समान सुअंग वाले दाहिने जंघा (अुरु) का आश्रय लिया (अर्थात दाहिने पाँव पर बैठ गईं)। तब महीपाल प्रतीप ने उन यशस्विनी से कहा— "हे कल्याणि! वाक्य के मर्म को जानने वालों में श्रेष्ठ और धर्म के निश्चय को जानने वाला मैं आपका क्या प्रिय करूँ, जिसकी आप इच्छा रखती हैं?"

व्याख्या: यहाँ राजा प्रतीप की तपस्या और गंगा के उनके समक्ष स्त्री रूप में प्रकट होकर उनके दाहिने जंघा पर बैठने का प्रसंग है। राजा प्रतीप ने एक धर्मज्ञ और शिष्ट पुरुष की भाँति उनका सत्कार करते हुए उनकी इच्छा पूछी।

श्लोक 5-7

स्त्र्युवाच। त्वामहं कामये राजन्भजमानां भजस्व माम्। त्यागः कामवतीनां हि स्त्रीणां सद्भिर्विगर्हितः।। (1-103-5) प्रतीप उवाच। नाहं परस्त्रियं कामाद्गच्छेदं वरवर्णिनि। न चासवर्णां कल्याणि धर्म्यमेतद्धि मे व्रतम्।। (1-103-6) यः स्वदारान्परित्यज्य पारक्यां सेवते स्त्रियम्। निरयान्नैव मुच्यते यावदाभूतसंप्लवम्।। (1-103-7)

हिंदी अनुवाद: स्त्री (गंगा) बोली— हे राजन्! मैं आपकी कामना करती हूँ, इसलिए प्रेमभाव से मेरा सेवन करती हुई मुझ (मुझसे प्रेम करने वाली) का आप भी भजन (स्वीकार) कीजिए। काम-पीडित स्त्रियों का परित्याग करना सज्जनों द्वारा निन्दित माना गया है। प्रतीप ने उत्तर दिया— हे वरवर्णिनि! मैं कामवश पराई स्त्री के पास नहीं जाऊँगा, और हे कल्याणि! असवर्णा (अजाति या अनुचित) स्त्री के पास भी नहीं जाऊँगा; क्योंकि यही मेरा धर्म्य व्रत है। जो व्यक्ति अपनी पत्नी को छोड़कर पराई स्त्री का सेवन करता है, वह प्रलय काल तक नरक से कभी मुक्त नहीं होता।

व्याख्या: राजा प्रतीप ने अपने उच्च नैतिक चरित्र और धर्मपरायणता का परिचय देते हुए गंगा के कामुक प्रस्ताव को दृढ़तापूर्वक ठुकरा दिया, क्योंकि वे पराई और असवर्णा स्त्री के संग को अधर्म मानते थे।

श्लोक 8-12

स्त्र्युवाच। नाश्रेयस्यस्मि नागम्या न वक्तव्या च कर्हिचित्। भजन्तीं भज मां राजन्दिव्यां कन्यां वरस्त्रियम्।। (1-103-8) प्रतीप उवाच। त्वया निवृत्तमेतत्तु यन्मां चोदयसि प्रियम्। अन्यथा प्रतिपन्नं मां नाशयेद्धर्मविप्लवः।। (1-103-9) प्राप्य दक्षिणमूरुं मे त्वमाश्लिष्टा वराङ्गने। अपत्यानां स्नुषाणां च भीरु विद्ध्येतदासनम्।। (1-103-10) सव्योरुः कामिनीभोग्यस्त्वया स च विवर्जितः। तस्मादहं नाचरिष्ये त्वयि कामं वराङ्गने।। (1-103-11) स्नुषा मे भव सुश्रोणि पुत्रार्थं त्वां वृणोम्यहम्। स्नुषापक्षं हि वामोरु त्वमागम्य समाश्रिता।। (1-103-12)

हिंदी अनुवाद: स्त्री ने कहा— मैं न तो श्रेयहीन हूँ, न अगम्या हूँ और न ही कभी निंदा के योग्य हूँ। हे राजन्! मुझ भजन करने वाली दिव्य कन्या और श्रेष्ठ स्त्री को आप स्वीकार कीजिए। प्रतीप ने कहा— आप मुझे जिस प्रिय कार्य के लिए प्रेरित कर रही हैं, उससे मेरा व्रत खंडित होता है। यदि मैं इसके विपरीत आचरण करूँ, तो धर्म का विप्लव (नाश) मुझे नष्ट कर देगा। हे वराङ्गने! आपने मेरे दाहिने जंघा का आश्रय लेकर उसे आलिंगित किया है, और हे भीरु! शास्त्रों में यह आसन संतानों (पुत्रों) और बहुओं (स्नुषाओं) का स्थान माना गया है। बायाँ जंघा कामिनी (पत्नी) के भोग का स्थान है, और आपने उसका सेवन नहीं किया है (वह खाली है)। इसीलिए हे वराङ्गने! मैं आपके प्रति काम-भावना का आचरण नहीं करूँगा। हे सुश्रोणि! आप मेरी बहू (स्नुषा) बन जाइए, मैं पुत्र प्राप्ति के लिए आपको चुनता हूँ; क्योंकि आपने बाएँ जंघा के स्थान पर आकर बाएँ भाग का आश्रय लिया है (यहाँ राजा ने उनके बैठने के स्थान से धर्मसम्मत संबंध का संकेत दिया)।

व्याख्या: राजा प्रतीप ने गंगा के बैठने के स्थान (दाहिना जंघा बनाम बायाँ जंघा) के आधार पर एक बहुत ही सूक्ष्म और धर्मसम्मत समाधान निकाला। दाहिना जंघा संतान या पुत्रवधू का स्थान होता है, इसलिए उन्होंने गंगा को अपनी भावी पुत्रवधू के रूप में स्वीकार करने का प्रस्ताव रखा।

श्लोक 13-17

स्त्र्युवाच। एवमप्यस्तु धर्मज्ञ संयुज्येयं सुतेन ते। त्वद्भक्त्या तु भजिष्यामि प्रख्यातं भारतं कुलम्।। (1-103-13) पृथिव्यां पार्थिवा ये च तेषां यूयं परायणम्। गुणा न हि मया शक्या वक्तुं वर्षशतैरपि।। (1-103-14) कुलस्य ये वः प्रथितास्तत्साधुत्वमथोत्तमम्। समयेनेह धर्मज्ञ आचरेयं च यद्विभो।। (1-103-15) तत्सर्वमेव पुत्रस्ते न मीमांसेत कर्हिचित्। एवं वसन्ती पुत्रे ते वर्धयिष्याम्यहं रतिम्।। (1-103-16) पुत्रैः पुण्यैः प्रियैश्चैव स्वर्गं प्राप्स्यति ते सुतः। तथेत्युक्त्वा तु राजंस्तत्रैवान्तरधीयत। (1-103-17)

हिंदी अनुवाद: स्त्री ने कहा— हे धर्मज्ञ! ऐसा ही हो, मैं आपके पुत्र के साथ संयुक्त होऊँगी। आपकी भक्ति के कारण ही मैं इस प्रख्यात भारत कुल का सेवन (वर्चस्व) करूँगी। पृथ्वी पर जितने भी राजा हैं, उन सबका आश्रय आप लोग ही हैं। आपके कुल के जो प्रख्यात और उत्तम साधुत्व (सज्जनता) हैं, उनके गुणों का वर्णन मैं सौ वर्षों में भी नहीं कर सकती। हे धर्मज्ञ विभो! मैं इस शर्त पर आचरण करूँगी कि आपके पुत्र मेरे साथ जो भी व्यवहार (कर्म) करें, उसकी कभी कोई मीमांसा (प्रश्न या आपत्ति) न करें। आपके पुत्र के साथ इस प्रकार निवास करती हुई मैं उसकी प्रसन्नता और प्रेम को बढ़ाऊँगी। आपके वे पुण्यशील और प्रिय पुत्रों द्वारा आपके सुत स्वर्ग को प्राप्त होंगे। वैशंपायन जी ने कहा— हे राजन्! 'तथास्तु' (ऐसा ही हो) कहकर गंगा वहीं अंतर्ध्यान हो गईं और राजसिंह के देखते-देखते वे अदृश्य हो गईं।

व्याख्या: गंगा जी राजा प्रतीप का प्रस्ताव स्वीकार कर लेती हैं और एक शर्त रखती हैं कि उनका होने वाला पति (राजा का पुत्र) उनके किसी भी कार्य पर कभी कोई आपत्ति या प्रश्न नहीं उठाएगा। राजा प्रतीप इस शर्त को मान लेते हैं।

श्लोक 18-20

पुत्रजन्म प्रतीक्षन्वै स राजा तदधारयत्। एतस्मिन्नेव काले तु प्रतीपः क्षत्रियर्षभः।। (1-103-18) तपस्तेपे सुतस्यार्थे सभार्यः कुरुनन्दन। प्रतीपस्य तु भार्यायां गर्भः श्रीमानवर्धत।। (1-103-19) श्रिया परमया युक्तः शरच्छुक्ले यथा शशी। ततस्तु दशमे मासि प्राजायत रविप्रभम्।। (1-103-20)

हिंदी अनुवाद: पुत्र के जन्म की प्रतीक्षा करते हुए उन राजा ने अपने मन में वह बात धारण कर ली। उसी समय क्षत्रियर्षभ कुरुनन्दन राजा प्रतीप ने अपनी पत्नी के साथ पुत्र की प्राप्ति के लिए तपस्या की। तदनंतर प्रतीप की पत्नी (ऐक्ष्वाकी) के गर्भ में श्री संपन्न गर्भ की वृद्धि हुई। वह गर्भ परम शोभा से युक्त था, जैसे शरद ऋतु के शुक्ल पक्ष का चंद्रमा हो। इसके बाद दसवें महीने में सूर्य के समान प्रकाशमान पुत्र उत्पन्न हुआ।

व्याख्या: राजा प्रतीप और उनकी रानी ने पुत्र प्राप्ति के लिए तप किया, जिसके परिणामस्वरूप उनके यहाँ एक अत्यंत तेजस्वी और श्रीसंपन्न पुत्र का जन्म हुआ, जो आगे चलकर महाराज शान्तनु के रूप में प्रसिद्ध हुए।

श्लोक 21-25

कुमारं देवगर्भाभं प्रतीपमहिषी तदा। तयोः समभवत्पुत्रो वृद्धयोः स महाभिषक्।। (1-103-21) शान्तस्य जज्ञे सन्तानस्तस्मादासीत्स शान्तनुः। तस्य जातस्य कृत्यानि प्रतीपोऽकारयत्प्रभुः।। (1-103-22) जातकर्मादि विप्रेण वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा। नामकर्म च विप्रास्तु चक्रुः परमसत्कृतम्।। (1-103-23) शान्तनोरवनीपाल वेदोक्तैः कर्मभिस्तदा। ततः संवर्धितो राजा शान्तनुर्लोकधार्मिकः।। (1-103-24) स तु लेभे परां निष्ठां प्राप्य धर्मभृतां वरः। धनुर्वेदे च वेदे च गतिं स परमा गतः।। (1-103-25)

हिंदी अनुवाद: तदनंतर प्रतीप की महिषी (रानी) ने देवताओं के गर्भ (तेज) के समान कांति वाले उस कुमार को जन्म दिया। उन वृद्ध माता-पिता के यहाँ वे महाभिष ही पुत्र रूप में उत्पन्न हुए। शांत (शांत चित्त वाले राजा प्रतीप) की संतान होने के कारण उनका नाम 'शांतनु' हुआ। प्रभु प्रतीप ने अपने उस नवजात पुत्र के वेदोक्त संस्कारों को संपन्न कराया। विद्वान ब्राह्मणों ने वेदोक्त विधियों से उनका जातकर्म और अत्यंत सत्कारपूर्वक नामकरण संस्कार किया। अवनीपाल शांतनु वेदोक्त कर्मों द्वारा संवर्धित हुए और आगे चलकर लोक में धार्मिक राजा के रूप में प्रसिद्ध हुए। धर्मपालकों में श्रेष्ठ उन शांतनु ने परम निष्ठा प्राप्त की तथा धनुर्वेद और वेद दोनों में सर्वोच्च गति (परिपक्वता) प्राप्त की।

व्याख्या: राजा प्रतीप और रानी के यहाँ महाभिष के रूप में पुनर्जन्म लेने वाले बालक का जन्म होता है। शांत चित्त से उत्पन्न होने के कारण उनका नाम शांतनु रखा गया। वेदों और धनुर्वेद में पारंगत होकर वे एक आदर्श शासक के रूप में विकसित हुए।

श्लोक 26-31

यौवनं चापि संप्राप्तः कुमारो वदतां वरः। संस्मरंश्चाक्षयाँल्लोकान्विजातान्स्वेन कर्मणा।। (1-103-26) पुण्यकर्मकृदेवासीच्छान्तनुः कुरुसत्तमः। प्रतीपः शान्तनुं पुत्रं यौवनस्थं ततोऽन्वशात्।। (1-103-27) पुरा स्त्री मां समभ्यागाच्छान्तनो भूतये तव। त्वामाव्रजेद्यदि रहः सा पुत्र वरवर्णिनी।। (1-103-28) कामयानाऽभिरूपाढ्या दिव्यस्त्री पुत्रकाम्यया। सा त्वया नानुयोक्तव्या कासि कस्यासि चाङ्गने।। (1-103-29) यच्च कुर्यान्न तत्कर्म सा प्रष्टव्या त्वयाऽनघ। सन्नियोगाद्भजन्तीं तां भजेथा इत्युवाच तम्।। (1-103-30) एवं संदिश्य तनयं प्रतीपः शान्तनुं तदा। स्वे च राज्येऽभिषिच्यैनं वनं राजा विवेश ह।। (1-103-31)

हिंदी अनुवाद: वक्ताओं में श्रेष्ठ वे कुमार जब युवावस्था को प्राप्त हुए, तब अपने सत्कर्मों से अजय (अक्षर) लोकों का स्मरण करते हुए कुरुसत्तम शांतनु पुण्यकर्मी बने। तदनंतर यौवन को प्राप्त हुए पुत्र शांतनु को राजा प्रतीप ने बुलाकर यह निर्देश (शिक्षा) दिया— "हे पुत्र! तुम्हारे कल्याण के लिए पूर्वकाल में एक स्त्री मेरे पास आई थी। यदि वह वरवर्णिनी दिव्य स्त्री पुत्र की कामना से रूपवती और कामवती होकर एकांत में तुम्हारे पास आए, तो हे अनघ! तुम उससे कभी यह प्रश्न मत करना कि 'तुम कौन हो?' और 'किसकी हो?' वह जो भी कर्म करे, उसके संबंध में भी उससे कोई पूछताछ मत करना। वह जिस प्रकार से तुम्हारी सेवा करे, तुम उसका वैसा ही सेवन करना।" अपने पुत्र शांतनु को इस प्रकार उपदेश देकर राजा प्रतीप ने उन्हें अपने राज्य के सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया और स्वयं वन (वानप्रस्थ) में प्रवेश कर गए।

व्याख्या: राजा प्रतीप अपने पुत्र शांतनु के युवा होने पर उन्हें राजपाट सौंपकर वन चले जाते हैं। जाने से पहले वे शांतनु को गंगा से जुड़ी पूर्व की घटना के बारे में चेताते हैं और निर्देश देते हैं कि भविष्य में जब वह रहस्यमयी दिव्य स्त्री उनसे मिले, तो वे उससे कोई भी प्रश्न या जिज्ञासा न करें।

श्लोक 32-38

स राजा शान्तनुर्धीमान्देवराजसमद्युतिः। बभूव सर्वलोकस्य सत्यवागिति संमतः।। (1-103-32) पीनस्कन्धो महाबाहुर्मत्तवारणविक्रमः। अन्वितः परिपूर्णार्थैः सर्वैर्नृपतिलक्षणैः।। (1-103-33) अमात्यलक्षणोपेतः क्षत्रधर्मविशेषवित्। वशे चक्रे महीमेको विजित्य वसुधाधिपान्।। (1-103-34) वेदानागमयत्कृत्स्नान्राजधर्मांश्च सर्वशः। ईजे च बहुभिः सत्रैः क्रतुभिर्भूरिदक्षिणैः।। (1-103-35) तर्पयामास विप्रांश्च वेदाध्ययनकोविदान्। रत्नैरुच्चावचैर्गोभिर्ग्रामैरश्वैर्धनैरपि।। (1-103-36) वयोरूपेण संपन्नः पौरुषेण बलेन च। ऐश्वर्येण प्रतापेन विक्रमेण धनेन च।। (1-103-37) वर्तमानश्च सत्येन सर्वधर्मविशारदः। तं महीपं महीपाला राजराजमकुर्वत।। (1-103-38)

हिंदी अनुवाद: वे बुद्धिमान राजा शांतनु देवराज इंद्र के समान कांति वाले और संपूर्ण लोक में 'सत्यवादी' के रूप में प्रसिद्ध हुए। वे स्थूल कंधों वाले, लंबी भुजाओं वाले, मस्त हाथी के समान पराक्रमी तथा सभी परिपूर्ण राजलक्षणों से युक्त थे। योग्य मंत्रियों के लक्षणों से परिचित और क्षत्रधर्म के मर्म को जानने वाले उन राजा ने समस्त भूमण्डलों के राजाओं को जीतकर अकेले ही पूरी पृथ्वी को अपने वश में कर लिया। उन्होंने संपूर्ण वेदों और सभी प्रकार के राजधर्मों का ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने प्रचुर दक्षिणा वाले अनेक सत्रों और यज्ञों का अनुष्ठान किया। वेदाध्ययन में कोविद (कुशल) ब्राह्मणों को उन्होंने ऊँचे-नीचे (विविध) रत्नों, गायों, गाँवों, घोड़ों और अपार धन से तृप्त किया। वे उम्र, रूप, पुरुषार्थ, बल, ऐश्वर्य, प्रताप, विक्रम और धन से संपन्न थे। सत्यवादी और सभी धर्मों में विशारद उन राजा शांतनु को अन्य सभी महिपालों (राजाओं) ने मिलकर 'राजराज' (राजाओं का राजा) बना दिया।

व्याख्या: राजा शांतनु के पराक्रमी, सत्यवादी और सर्वगुणसंपन्न शासनकाल का विस्तृत वर्णन यहाँ किया गया है। उनके सुशासन, यज्ञ-अनुष्ठानों और दानशीलता से प्रभावित होकर अन्य राजाओं ने उन्हें अपनी सहमति से सर्वोच्च सम्राट (राजराज) के पद पर प्रतिष्ठित किया।

श्लोक 39-42

वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्नप्रबोधाः। श्रिया भरतशार्दूल समपद्यन्त भूमिपाः।। (1-103-39) नियमैः सर्ववर्णानां ब्रह्मोत्तरमवर्तत। ब्राह्मणाभिमुखं क्षत्रं क्षत्रियाभिमुखा विशः।। (1-103-40) ब्रह्मक्षत्रानुकूलांश्च शूद्राः पर्यचरन्विशः। एवं पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम्।। (1-103-41) शान्तनावथ राज्यस्थे नावर्तत वृथा वधः। असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम्।। (1-103-42)

हिंदी अनुवाद: हे भरतश्रेष्ठ! राजा शांतनु के राज्य में सभी भूमिपाल (प्रजाजन व राजा) शोक, भय और बाधाओं से रहित होकर सुखपूर्वक सोते और जागते थे तथा ऐश्वर्य से संपन्न रहते थे। सभी वर्णों के अपने नियमों में तत्पर रहने के कारण राज्य में ब्रह्मतेज की प्रधानता थी। क्षत्रिय वर्ग ब्राह्मणों के प्रति समर्पित था और वैश्य वर्ग क्षत्रियों के अनुकूल चलता था। शूद्र और वैश्यगण ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्यों के अनुकूल रहकर उनकी सेवा करते थे। राजा शांतनु के राज्यकाल में पशुओं, सुअरों, तथा मृग-पक्षियों तक का भी कभी वृथा (अकारण) वध नहीं होता था। असुखों से ग्रस्त, अनाथ तथा तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियों) में जन्म लेने वाले जीवों को भी वहाँ पूरा सुख प्राप्त था।

व्याख्या: शांतनु के रामराज्य जैसा आदर्श शासन प्रबंध होने का उल्लेख यहाँ मिलता है। उनके राज्य में मनुष्य ही नहीं, बल्कि मूक पशु-पक्षियों तक को सुरक्षा और सुख प्राप्त था, और समाज का प्रत्येक वर्ग अपने धर्म व मर्यादा का पालन करता था।

श्लोक 43-47

स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत्पिता। स हस्तिनाम्नि धर्मात्मा विहरन्कुरुनन्दनः।। (1-103-43) तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद्वायुना च समो बले। अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः।। (1-103-44) बभूव राजा सुमतिः प्रजानां सत्यविक्रमः। स वनेषु च रम्येषु शैलप्रस्रवणेषु च।। (1-103-45) चचार मृगयाशीलः शान्तनुर्वनगोचरः। स मृगान्महिषांश्चैव विनिघ्नन्राजसत्तमः।। (1-103-46) गङ्गामनु चचारैकः सिद्धचारणसेविताम्। स कदाचिन्महाराज ददर्श परमां स्त्रियम्।। (1-103-47)

हिंदी अनुवाद: वे धर्मात्मा कुरुनन्दन राजा ही समस्त प्राणियों के पिता (रक्षक) के समान हो गए। वे हस्तिनापुर में विहार करते थे। वे तेज में सूर्य के समान, बल में वायु के समान, कोप (क्रोध) में यमराज के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान थे। प्रजा के बुद्धिमान और सत्यपराक्रमी राजा शांतनु रमणीय वनों, पर्वतों और झरनों के पास भ्रमण किया करते थे। वन में विचरने के स्वभाव वाले और मृगया (शिकार) के शौकीन वे राजसत्तम शांतनु मृगों और भैंसों का वध करते हुए अकेले ही सिद्ध तथा चारणों द्वारा सेवित गंगा के तट पर घूम रहे थे। हे महाराज! उसी समय उन्होंने एक परम सुंदर स्त्री को देखा।

व्याख्या: राजा शांतनु के महान गुणों— उनके तेज, पराक्रम, क्षमाशीलता और पितृवत प्रजापालन का यहाँ वर्णन है। शिकार खेलते हुए वे गंगा के तट पर पहुँचते हैं, जहाँ उन्हें एक अलौकिक रूपवती स्त्री दिखाई देती है, जो कथा का मुख्य मोड़ है।

श्लोक 48-53

जाज्वल्यमानां वपुषा साक्षाच्छ्रियमिवापराम्। सर्वानवद्यां सुदतीं दिव्याभरणभूषिताम्।। (1-103-48) सूक्ष्माम्बरधरामेकां पद्मोदरसमप्रभाम्। स्नातगात्रां धौतवस्त्रां गङ्गातीररुहे वने।। (1-103-49) प्रकीर्णकेशीं पाणिभ्यां संस्पृशन्तीं शिरोरुहान्। रूपेण वयसा कान्त्या शरीरावयवैस्तथा।। (1-103-50) हावभावविलासैश्च लोचनाञ्चलविक्रियैः। श्रोणीभारेण मध्येन स्तनाभ्यामुरसा दृशा।। (1-103-51) कवरीभरेण पादाभ्यामिङ्गितेन स्मितेन च। कोकिलालापसंल्लापैर्ल्यक्कुर्वन्तीं त्रिलोकगाम्।। (1-103-52) वाणीं च गिरिजां लक्ष्मीं योषितोन्याः सुराङ्गनाः। सा च शान्तनुमब्यागादलक्ष्मीमपकर्षती।। (1-103-53)

हिंदी अनुवाद: वह स्त्री अपने शरीर की कांति से दूसरी साक्षात लक्ष्मी की तरह प्रज्वलित हो रही थी। वह सभी दोषों से रहित, सुंदर दाँतों वाली, दिव्य आभूषणों से भूषित, सूक्ष्म वस्त्र धारण करने वाली और कमल के भीतरी भाग के समान कांति वाली थी। गंगा तट के वन में स्नान करने के पश्चात जिनके शरीर पर धुले हुए वस्त्र थे, जो खुले केशों को दोनों हाथों से छू रही थीं— रूप, अवस्था, कांति, शारीरिक अवयवों, हाव-भाव, विलास, नेत्रों के कटाक्ष, नितंब के भार, कटिप्रदेश, वक्षस्थल, मुख, केशपाश, चरणों, हाव-भाव के संकेत, मुसकान और कोकिल के समान कूकने वाली वाणी से वह त्रिलोकगामिनी (गंगा) वाणी (सरस्वती), पार्वती, लक्ष्मी और अन्य सभी सुरांगनाओं (अप्सराओं) की शोभा को भी तिरस्कृत कर रही थी। अमंगल या अलक्ष्मी को दूर भगाने वाली वह स्त्री राजा शांतनु के पास आईं।

व्याख्या: गंगा के अलौकिक सौंदर्य का अत्यंत सजीव और विस्तृत चित्रण यहाँ किया गया है। उनका रूप इतना मनमोहक और दिव्य था कि वे अन्य देवियों और अप्सराओं के सौंदर्य को भी मात दे रहा था।

श्लोक 54-57

तां दृष्ट्वा हृष्टरोमाऽभूद्विस्मितो रूपसंपदा। पिबन्निव च नेत्राभ्यां नातृप्यत नराधिपः।। (1-103-54) सा च दृष्ट्वैव राजानं विचरन्तं महाद्युतिम्। स्नेहादागतसौहार्दा नातृप्यत विलासिनी।। (1-103-55) गङ्गा कामेन राजानं प्रेक्षमाणा विलासिनी। चञ्चूर्यताग्रतस्तस्य किन्नरीवाप्सरोपमा।। (1-103-56) दृष्ट्वा प्रहृष्टरूपोऽभूद्दर्शनादेव शान्तनुः। रूपेणातीत्य तिष्ठन्तीं सर्वा राजन्ययोषितः।। (1-103-57)

हिंदी अनुवाद: उन्हें देखकर राजा शांतनु के रोंगटे खड़े हो गए और वे उनके रूप-सौंदर्य को देखकर विस्मित हो गए। वे नराधिप अपनी दोनों आँखों से जैसे उस रूप को पीते हुए भी तृप्त नहीं हो पा रहे थे। वह विलासिनी गंगा भी महाद्युतिमान विचरते हुए राजा को देखकर स्नेह और आगत सौहार्द के कारण तृप्त नहीं हो रही थीं। कामभाव सेज से राजा की ओर देखती हुई अप्सरा के समान वह किन्नरी रूपी विलासिनी गंगा उनके आगे-आगे विचरने लगीं। शांतनु भी उनके दर्शन मात्र से ही प्रहृष्ट (अत्यंत प्रसन्न) हो गए, क्योंकि वे रूप में समस्त राजवंश की स्त्रियों से कहीं बढ़कर थीं।

व्याख्या: राजा शांतनु और गंगा की पहली दृष्टि में ही एक-दूसरे के प्रति तीव्र आकर्षण उत्पन्न हो जाता है। दोनों एक-दूसरे के रूप को निहारते हुए तृप्त नहीं हो पा रहे थे।

श्लोक 58-60

तामुवाच ततो राजा सान्त्वयञ्श्लक्ष्णया गिरा। देवी वा दानवी वा त्वं गन्धर्वी चाथवाऽप्सराः।। (1-103-58) यक्षी वा पन्नगी वाऽपि मानुषी वा सुमध्यमे। याऽसि काऽसि सुरप्रख्ये महिषी मे भवानघे।। (1-103-59) त्वां गता हि मम प्रामा वसु यन्मेऽस्ति किंचन।' याचे त्वां सुरगर्भाभे भार्या मे भव शोभने।। (1-103-60)

हिंदी अनुवाद: तदनंतर राजा ने शांतवना देती हुई श्लक्ष्ण (कोमल) वाणी में उन से कहा— "हे सुमध्यमे! तुम देवी हो, दानवी हो, गंधर्वी हो अथवा अप्सरा हो? यक्षी हो, पन्नगी हो या मानुषी (मनुष्य की पुत्री) हो? हे सुरप्रख्ये अनघे! तुम जो कोई भी हो, मेरी महिषी (रानी) बन जाओ। तुम्हारे पास जाने पर मेरा जो कुछ भी वसु (धन) है, वह सब तुम्हारा ही हो जाएगा। हे सुरगर्भाभे शोभने! मैं तुमसे हाथ जोड़कर याचना करता हूँ, तुम मेरी पत्नी बन जाओ।"

व्याख्या: राजा शांतनु मोहित होकर उस रहस्यमयी सुंदरी के सम्मुख अपने प्रेम का प्रस्ताव रखते हैं और अपनी रानी बनने का अनुरोध करते हुए अपना सर्वस्व उन्हें समर्पित करने की बात कहते हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्र्यधिकशततमोऽध्यायः।। 103 ।।

संभवपर्वणि द्व्यधिकशततमोऽध्यायः

संभवपर्वणि चतुरधिकशततमोऽध्यायः