श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुरधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत आदिपर्व अध्याय 104 संस्कृत हिन्दी व्याख्या

श्लोक 1-4

वैशंपायन उवाच। एतच्छ्रुत्वा वचो राज्ञः सस्मितं मृदु वल्गु च। यशस्विनी च साऽगच्छच्छान्तनोर्भूतये तदा।। (1-104-1) सा तु दृष्ट्वा नृपश्रेष्ठं चरन्तं तीरमाश्रितम्। वसूनां समयं स्मृत्वाऽथाभ्यगच्छदनिन्दिता।। (1-104-2) प्रजार्थिनी राजपुत्रं शान्तनुं पृथिवीपतिम्। प्रतीपवचनं चापि संस्मृत्यैव स्वयं नृपम्।। (1-104-3) कालोऽयमिति मत्वा सा वसूनां शापचोदिता। उवाच चैव राज्ञः सा ह्लादयन्ती मनो गिरा।। (1-104-4)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— राजा के उस मुस्कानयुक्त, कोमल और मधुर वचन को सुनकर यशस्विनी गंगा राजा शांतनु के कल्याण (भूतये) के लिए वहाँ आईं। तीर पर विचरते हुए उन नृपश्रेष्ठ को देखकर अनिन्दिता (दोषरहित) गंगा ने वसुओं के साथ किए गए अपने समझौते (समय) का स्मरण किया। संतान (प्रजा) की इच्छा रखने वाली तथा वसुओं के शाप से प्रेरित उन देवी ने राजा प्रतीप के वचनों को भी मन में याद किया। यह समय उचित है— ऐसा मानकर वसुओं के शाप से प्रेरित उन देवी ने राजा के मन को आह्लादित करने वाली वाणी में यह बात कही।

व्याख्या: राजा शांतनु का प्रस्ताव सुनकर और अपने पूर्व-निश्चय (वसुओं और राजा प्रतीप के साथ हुए समझौते) का स्मरण कर गंगा जी ने राजा के पास जाने का उचित अवसर समझा।

श्लोक 5-8

गङ्गोवाच। भविष्यामि महीपाल महिषी ते वशानुगा। न तु त्वं वा द्वितीयो वा ज्ञातुमिच्छेत्कथंचन।। (1-104-5) यत्तु कुर्यामहं राजञ्शुभं वा यदि वाऽशुभम्। न तद्वारयितव्याऽस्मि न वक्तव्या तथाऽप्रियम्।। (1-104-6) एवं हि वर्तमानेऽहं त्वयि वत्स्यामि पार्थिव। वारिता विप्रियं चोक्ता त्यजेयं त्वामसंशयम्।। (1-104-7) एष मे समयो राजन्भज मां त्वं यथेप्सितम्। अनुनीताऽस्मि ते पित्रा भर्ता मे त्वं भव प्रभो।। (1-104-8)

हिंदी अनुवाद: गंगा जी बोलीं— हे महीपाल! मैं आपकी वशानुगा महिषी (रानी) बनूँगी, किंतु न तो आप और न ही अन्य कोई दूसरा व्यक्ति कभी यह जानने की इच्छा करेगा कि मैं कौन हूँ। हे राजन्! मैं जो कुछ भी करूँ— वह शुभ हो अथवा अशुभ— मुझे कभी (किसी भी कार्य से) रोका न जाए और न ही मुझसे कोई अप्रिय वचन कहा जाए। हे पार्थिव! इस प्रकार की स्थिति रहने पर ही मैं आपके साथ निवास करूँगी। यदि मुझे रोका गया या मुझसे कोई अप्रिय बात कही गई, तो मैं निःसंशय रूप से आपको त्याग दूँगी। हे राजन्! यही मेरी शर्त (समय) है, आप अपनी इच्छा के अनुसार मेरा भजन (स्वीकार) कीजिए। आपके पिता द्वारा भी मेरा अनुरोध किया गया है, अतः हे प्रभो! आप मेरे पति बनिए।

व्याख्या: गंगा जी राजा शांतनु के सामने अपनी शर्तें रखती हैं कि वे उनकी पहचान के बारे में कभी प्रश्न नहीं करेंगे और उनके किसी भी कार्य में बाधा नहीं डालेंगे; ऐसा करने पर ही वे उनके साथ रह सकती हैं।

श्लोक 9-13

वैशंपायन उवाच। तथेति सा यदा तूक्ता तदा भरतसत्तम। प्रहर्षमतुलं लेभे प्राप्य तं पार्थिवोत्तमम्।। (1-104-9) प्रतिज्ञाय तु तत्तस्यास्तथेति मनुजाधिपः। रथमारोप्य तां देवीं जगाम स तया सह।। (1-104-10) सा च शान्तनुमभ्यागात्साक्षाल्लक्ष्मीरिवापरा। आसाद्य शान्तनुस्तां च बुभुजे कामतो वशी।। (1-104-11) न प्रष्टव्येति मन्वानो न स तां किंचिदूचिवान्। स तस्याः शीलवृत्तेन रूपौदार्यगुणेन च।। (1-104-12) उपचारेण च रहस्तुतोष जगतीपतिः। स राजा परमप्रीतः परमस्त्रीप्रलालितः।। (1-104-13)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे भरतसत्तम! जब गंगा जी ने ऐसा कहा, तब उन पार्थिवोत्तम को पाकर उन्होंने (शांतनु ने) अतुलनीय प्रहर्ष (आनंद) प्राप्त किया। मनुजाधिप शांतनु ने उनकी वह शर्त 'तथास्तु' (स्वीकार है) कहकर मान ली और उस देवी को अपने रथ पर बैठाकर उनके साथ अपने नगर को लौटे। साक्षात् दूसरी लक्ष्मी के समान वह देवी शांतनु के पास आईं। उन वशीजित (काम पर विजय पाने वाले) शांतनु ने उन गंगा को पाकर अपनी इच्छा के अनुसार उनका उपभोग किया। "मुझे इनसे कुछ नहीं पूछना है"— ऐसा मन में विचार करते हुए राजा ने उनसे कभी कोई प्रश्न नहीं किया। वे जगतीपति शांतनु उनके शील-व्यवहार, रूप, औदार्य (उदारता) के गुणों तथा एकांत में उनकी सेवा-सुश्रुषा से अत्यंत संतुष्ट हुए। उस श्रेष्ठ स्त्री द्वारा प्रलालित (प्रेरित/प्रेमासक्त) वे राजा परम प्रसन्न हुए।

व्याख्या: राजा शांतनु गंगा की सभी शर्तें खुशी-खुश स्वीकार कर लेते हैं और उन्हें अपनी रानी बनाकर हस्तिनापुर ले आते हैं। वे अपने मन में पिता की चेतावनी और गंगा की शर्त को ध्यान में रखते हुए कोई प्रश्न नहीं करते और उनके साथ सुखमय जीवन बिताते हैं।

श्लोक 14-17

दिव्यरूपा हि सा देवी गङ्गा त्रिपथगामिनी। मानुषं विग्रहं कृत्वा श्रीमन्तं वरवर्णिनी।। (1-104-14) भाग्योपनतकामस्य भार्या चोपनताऽभवत्। शन्तनोर्नृपसिंहस्य देवराजसमद्युतेः।। (1-104-15) संभोगस्नेहचातुर्यैर्हावलास्यैर्मनोहरैः। राजानं रमयामास यथा रज्येत स प्रभुः।। (1-104-16) स राजा रतिसक्तोऽभूदुत्तमस्त्रीगुणैर्हृतः।। (1-104-17)

हिंदी अनुवाद: त्रिपथगामिनी (स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में बहने वाली) वे दिव्यरूपा देवी गंगा ने मनुष्य का श्रीमंत (शोभा संपन्न) वरवर्णिनी विग्रह (शरीर) धारण कर लिया था। देवराज इंद्र के समान कांति वाले नृपसिंह शांतनु के भाग्य से उनकी कामना के अनुसार वे पत्नी के रूप में प्राप्त हो गई थीं। संभोग, स्नेह, चातुर्य, तथा मनोहर हाव-भाव और विलासों द्वारा उन्होंने राजा को इस प्रकार रमया (प्रसन्न) किया कि वे प्रभु पूर्णतः आसक्त हो गए। उत्तम स्त्रियों के गुणों से मोहग्रस्त वे राजा पूरी तरह रति (प्रेम-क्रीड़ा) में लीन हो गए।

व्याख्या: यहाँ गंगा और राजा शांतनु के आत्यंतिक प्रेम और दांपत्य सुख का सुंदर चित्रण किया गया है। दिव्य गंगा मानवी रूप में राजा शांतनु को अपने विभिन्न विलासों और गुणों से पूरी तरह मंत्रमुग्ध कर रखती हैं।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुरधिकशततमोऽध्यायः।। 104 ।।

संभवपर्वणि त्र्यधिकशततमोऽध्यायः

संभवपर्वणि पञ्चाधिकशततमोऽध्यायः