श्लोक 1-4
वैशंपायन उवाच। (1-108-1x)
चेदिराजसुतां ज्ञात्वा दाशराजेन वर्धिताम्। विवाहं कारयामास शास्त्रदृष्टेन कर्मणा।।'(1-108-1) ततो विवाहे निर्वृत्ते स राजा शान्तनुर्नृपः। तां कन्यां रूपसंपन्नां स्वगृहे संन्यवेशय्रत्।। (1-108-2) ततः शान्तनवो धीमान्सत्यवत्यामजायत। वीरश्चित्राङ्गद नाम वीर्यवान्पुरुषेश्वरः।। (1-108-3) अथापरं महेष्वासं सत्यवत्यां सुतं प्रभुः। विचित्रवीर्यं राजानं जनयामास वीर्यवान्।। (1-108-4)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— चेदिराज की पुत्री (एवं दाशराज द्वारा पाली गई सत्यवती) को जानकर राजा शांतनु ने शास्त्रोक्त विधि से उसके साथ विवाह संपन्न कराया। विवाह संपन्न होने पर राजा शांतनु उस रूपसंपन्न कन्या को अपने घर ले आए और वहाँ उन्हें स्थापित किया। तदनंतर धीमान शांतनु के और सत्यवती के गर्भ से वीर, वीर्यवान् और पुरुषेश्वर चित्राङ्गद नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। इसके पश्चात वीर एवं प्रभु शांतनु ने सत्यवती के गर्भ से एक अन्य महान धनुर्धर पुत्र विचित्रवीर्य राजा को उत्पन्न किया।
व्याख्या: भीष्म की भीषण प्रतिज्ञा के बाद राजा शांतनु और सत्यवती का विवाह विधिवत संपन्न होता है। सत्यवती से शांतनु को दो पुत्र रत्न प्राप्त होते हैं— चित्राङ्गद और विचित्रवीर्य।
श्लोक 5-11
अप्राप्तवति तस्मिंस्तु यौवनं पुरुषर्षभे। स राजा शान्तनुर्धीमान्कालधर्ममुपेयिवान्।। (1-108-5) स्वर्गते शान्तनौ भीष्मश्चित्राङ्गदमरिन्दनम्। स्थापयामास वै राज्ये सत्यवत्या मते स्थितः।। (1-108-6) स तु चित्राङ्गदः शौर्यात्सर्वांश्चिक्षेप पार्थिवान्। मनुष्यं न हि मेन स कंचित्सदृशमात्मनः।। (1-108-7) तं क्षिपन्तं सुरांश्चैव मनुष्यानसुरांस्तथा। गन्धर्वराजो बलवांस्तुल्यनामाऽभ्ययात्तदा।। (1-108-8) गन्धर्व उवाच। (1-108-9x) `त्वं वै सदृशनामासि युद्धं देहि नृपात्मज। नाम वाऽन्यत्प्रगृह्णीष्व यदि युद्धं न दास्यसि।। (1-108-9) त्वयाहं युद्धमिच्छामि त्वत्सकाशं तु नामतः। आगतोस्मि वृथाऽऽभाष्य न गच्छेन्नाम ते मम।। (1-108-10) इत्युक्त्वा गर्जमानौ तौ हिरण्वत्यास्तटं गतौ'। तेनास्य सुमहद्युद्धं कुरुक्षेत्रे बभूव ह।। (1-108-11)
हिंदी अनुवाद: अभी छोटे पुत्र विचित्रवीर्य ने यौवन भी प्राप्त नहीं किया था कि धीमान राजा शांतनु कालधर्म को प्राप्त हो गए (मृत्यु को प्राप्त हुए)। शांतनु के स्वर्गवासी होने पर भीष्म ने सत्यवती की सहमति से अरिंदम चित्राङ्गद को राज्य के सिंहासन पर स्थापित किया। वह चित्राङ्गद अपने शौर्य के बल पर सभी राजाओं को तुच्छ समझता था और किसी भी मनुष्य को अपने समान नहीं मानता था। जब वह देवताओं, मनुष्यों और असुरों तक को परास्त करने की डींग हाँकता था, तब उसी नाम वाला (चित्राङ्गद नाम का) एक बलवान गन्धर्वराज उसके पास युद्ध के लिए आ पहुँचा। गन्धर्व ने कहा— "तुम मेरे ही समान नाम वाले हो, इसलिए या तो मुझे युद्ध दो या फिर अपना दूसरा नाम रख लो, यदि तुम युद्ध नहीं दोगे। मैं विशेष रूप से तुम्हारे नाम के कारण ही तुम्हारे पास युद्ध की इच्छा से आया हूँ; व्यर्थ में बात करके मैं तुम्हारा नाम अपने पास छोड़े बिना यहाँ से नहीं जाऊँगा।" ऐसा कहकर गरजते हुए वे दोनों हिरण्यवती नदी के तट पर गए और कुरुक्षेत्र में उनका एक अत्यंत भयंकर युद्ध हुआ।
व्याख्या: शांतनु की मृत्यु के पश्चात चित्राङ्गद राजा बनते हैं। वे अत्यधिक पराक्रमी और अहंकारी हो जाते हैं। उसी समय 'चित्राङ्गद' नाम का ही एक शक्तिशाली गंधर्व उनके समान नाम होने और अहंकार के कारण उन्हें युद्ध के लिए ललकारता है।
श्लोक 12-17
तयोर्बलवतोस्तत्र गन्धर्वकुरुमुख्ययोः। नद्यास्तीरे हिरण्वत्याः समास्तिस्रोऽभवद्रणः।। (1-108-12) तस्मिन्विमर्दे तुमुले शस्त्रवर्षसमाकुले। मायाधिकोऽवधीद्वीरं गन्धर्वः कुरुसत्तमम्।। (1-108-13) स हत्वा तु नरश्रेष्ठं चित्राङ्गदमरिन्दमम्। अन्ताय कृत्वा गन्धर्वो दिवमाचक्रमे ततः।। (1-108-14) तस्मिन्पुरुषशार्दूले निहते भूरितेजसि। भीष्मः शान्तनवो राजा प्रेतकार्याण्यकारयत्।। (1-108-15) विचित्रवीर्यं च तदा बालमप्राप्तयौवनम्। कुरुराज्ये महाबाहुरभ्यषिञ्चदनन्तरम्।। (1-108-16) विचित्रवीर्यः स तदा भीष्मस्य वचने स्थितः। अन्वशासन्महाराज पितृपैतामहं पदम्।। (1-108-17) ।।
हिंदी अनुवाद: हिरण्यवती नदी के तट पर उन दोनों बलवानों— गन्धर्व और कुरुश्रेष्ठ चित्राङ्गद का तीन वर्षों (या तीन रात्रियों) तक भयंकर युद्ध होता रहा। उस तुमुल और शस्त्रों की वर्षा से आच्छादित भीषण संघर्ष में मायावी शक्तियों में श्रेष्ठ उस गन्धर्व ने कुरुसत्तम वीर चित्राङ्गद का वध कर दिया। नरश्रेष्ठ एवं अरिंदम चित्राङ्गद का अंत करके वह गन्धर्व अपने लोक (स्वर्ग) को लौट गया। भूरितेजस्वी और पुरुषसिंह चित्राङ्गद के मारे जाने पर शान्तनु पुत्र राजा भीष्म ने उनके सभी प्रेत-कर्म (अंतिम संस्कार) संपन्न करवाए। इसके पश्चात महाबाहु भीष्म ने तब बाल्यवस्था में ही, जिन्हें यौवन भी प्राप्त नहीं हुआ था, ऐसे विचित्रवीर्य को कुरुराज्य के सिंहासन पर अभिषिक्त कर दिया। वे विचित्रवीर्य तदनंतर भीष्म के वचने अनुसार स्थित रहकर अपने पिता-पितामह के पैतृक राज्य का शासन चलाने लगे। इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत संभवपर्व का एक सौ आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
व्याख्या: गंधर्व के साथ हुए भीषण और मायावी युद्ध में चित्राङ्गद मारे जाते हैं। इसके बाद भीष्म सत्यवती की इच्छा और कुल की मर्यादा के अनुसार छोटे बालक विचित्रवीर्य को हस्तिनापुर के राजसिंहासन पर बिठाते हैं, और वे स्वयं उनके संरक्षक के रूप में राज्य का संचालन करते हैं।
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि अष्टाधिकशततमोऽध्यायः।। 108 ।।
