श्लोक 1-6
स राजा शान्तनुर्धीमान्देवराजर्षिसत्कृतः। धर्मात्मा सर्वलोकेषु सत्यवागिति विश्रुतः।। (1-107-1) शान्तनोः कीर्तयिष्यामि सर्वानेव गुणानहम्। दमो दानं क्षमा बुद्धिर्ह्रीर्धृतिस्तेज उत्तमम्। नित्यान्यासन्महासत्वे शान्तनौ पुरुषर्षभे।। (1-107-2) एवं स गुणसंपन्नो धर्मार्थकुशलो नृपः। आसीद्भरतवंशस्य गोप्ता सर्वजनस्य च।। (1-107-3) कम्बुग्रीवः पृथुव्यंसो मत्तवारणविक्रमः। अन्वितः परिपूर्णार्थैः सर्वैर्नृपतिलक्षणैः।। (1-107-4) तस्य कीर्तिमतो वृत्तमवेक्ष्य सततं नराः। धर्म एव परः कामादर्थाच्चेति व्यवस्थितः।। (1-107-5) एवमासीन्महासत्वः शान्तनुर्भरतर्षभ। न चास्य सदृशः कश्चिद्धर्मतः पार्थिवोऽभवत्।। (1-107-6)
हिंदी अनुवाद: वे बुद्धिमान राजा शांतनु देवर्षियों द्वारा सत्कृत, धर्मात्मा और संपूर्ण लोकों में 'सत्यवादी' के रूप में विख्यात थे। अब मैं शांतनु के सभी गुणों का वर्णन करूँगा— दम (इन्द्रियनिग्रह), दान, क्षमा, बुद्धि, लज्जा, धृति (धैर्य) और उत्तम तेज— ये सभी गुण उन महासत्व पुरुषर्षभ शांतनु में नित्य निवास करते थे। इस प्रकार वे गुणसंपन्न, धर्म और अर्थ में कुशल राजा भरतवंश के रक्षक तथा समस्त प्रजा के पालक थे। उनकी गर्दन शंख जैसी रेखाओं वाली (कम्बुग्रीव), कंधे चौड़े (पृथुव्यंस) तथा पराक्रम मतवाले हाथी के समान था। वे सभी परिपूर्ण राजलक्षणों से युक्त थे। उन कीर्तिमान राजा के आचरण को देखकर निरंतर मनुष्य यही मानते थे कि काम और अर्थ से बढ़कर धर्म ही सर्वोपरि है। हे भरतर्षभ! ऐसे महासत्वशाली शांतनु थे, धर्म के मामले में पृथ्वी पर उनके समान दूसरा कोई राजा नहीं हुआ था।
व्याख्या: राजा शांतनु के उत्कृष्ट चरित्र, उनके शारीरिक लक्षणों, और उनकी नैतिक श्रेष्ठता का वर्णन यहाँ किया गया है। वे प्रजा के लिए धर्म के मूर्तिमान स्वरूप थे।
श्लोक 7-13
वर्तमानं हि धर्मेषु सर्वधर्मभृतां वरम्। तं महीपा महीपालं राजराज्येऽभ्यषेचयन्।। (1-107-7) वीतशोकभयाबाधाः सुखस्वप्ननिबोधनाः। पतिं भारतगोप्तारं समपद्यन्त भूमिपाः।। (1-107-8) तेन कीर्तिमता शिष्टाः शक्रप्रतिमतेजसा। यज्ञदानक्रियाशीलाः समपद्यन्त भूमिपाः।। (1-107-9) शान्तनुप्रमुखैर्गुप्ते लोके नृपतिभिस्तदा। नियमात्सर्ववर्णानां धर्मोत्तरमवर्तत।। (1-107-10) ब्रह्म पर्यचरत्क्षत्रं विशः क्षत्रमनुव्रताः। ब्रह्मक्षत्रानुरक्ताश्च शूद्राः पर्यचरन्विशः।। (1-107-11) स हास्तिनपुरे रम्ये कुरूणां पुटभेदने। वसन्सागरपर्यन्तामन्वशासद्वसुन्धराम्।। (1-107-12) स देवराजसदृशो धर्मज्ञः सत्यवागृजुः। दानधर्मतपोयोगाच्छ्रिया परमया युतः।। (1-107-13)
हिंदी अनुवाद: धर्मों में तत्पर और सभी धर्मपालकों में श्रेष्ठ उन महीपाल को अन्य राजाओं ने मिलकर 'राजराज्य' (सम्राट के पद) पर अभिषिक्त किया था। भारतवर्ष के रक्षक उन राजा को पाकर सभी भूमिपाल शोक, भय और बाधाओं से रहित हो गए तथा सुखपूर्वक सोने और जागने लगे। इन्द्र के समान तेज वाले उन कीर्तिमान राजा द्वारा शासित होकर सभी राजा यज्ञ और दान के कार्य में संलग्न हो गए। शांतनु जैसे प्रमुख राजाओं द्वारा सुरक्षित उस संसार में सभी वर्णों के अपने नियमों से चलने के कारण धर्म की प्रधानता हो गई। क्षत्रिय वर्ग ब्राह्मणों की सेवा करता था, वैश्य वर्ग क्षत्रियों के अनुकूल रहता था और शूद्रगण ब्रह्म (ब्राह्मण), क्षत्रिय तथा वैश्यों के प्रति अनुरक्त रहकर उनकी सेवा करते थे। वे कुरुवंशियों के प्रसिद्ध नगर रमणीय हस्तिनापुर में निवास करते हुए समुद्र तक फैली हुई संपूर्ण पृथ्वी पर शासन करते थे। वे देवराज इंद्र के समान, धर्मज्ञ, सत्यवादी, सरल स्वभाव वाले तथा दान, धर्म एवं तप के योग से परम शोभा से युक्त थे।
व्याख्या: शांतनु के शासनकाल में वर्णव्यवस्था और धर्म की सुदृढ़ स्थापना का उल्लेख है। हस्तिनापुर की राजधानी से वे संपूर्ण पृथ्वी पर शांति और न्याय का राज्य स्थापित करते हैं।
श्लोक 14-21
अरागद्वेषसंयुक्तः सोमवत्प्रियदर्शनः।। तेजसा सूर्यकल्पोऽभूद्वायुवेगसमो जवे। अन्तकप्रतिमः कोपे क्षमया पृथिवीसमः।। (1-107-14) वधः पशुवराहाणां तथैव मृगपक्षिणाम्। शान्तनौ पृथिवीपाले नावर्तत तथा नृप।। (1-107-15) ब्रह्मधर्मोत्तरे राज्ये शान्तनुर्विनयात्मवान्। समं शशास भूतानि कामरागविवर्जितः।। (1-107-16) चकोरनेत्रस्ताम्रास्यः सिंहर्षभगतिर्युवा। गुणैरनुपमैर्युक्तः समस्तैराभिगामिकैः। गम्भीरः सत्वसंपन्नः पूर्णचन्द्रनिभाननः।। (1-107-17) देवर्षिपितृयज्ञार्थमारभ्यन्त तदा क्रियाः। न चाधर्मेण केषांचित्प्राणिनामभवद्वधः।। (1-107-18) असुखानामनाथानां तिर्यग्योनिषु वर्तताम्। स एव राजा सर्वेषां भूतानामभवत्पिता।। (1-107-19) तस्मिन्कुरुपतिश्रेष्ठे राजराजेश्वरे सति। श्रिता वागभवत्सत्यं दानधर्माश्रितं मनः।। (1-107-20) यज्ञार्थं पशवः सृष्टाः संतानार्थं च मैथुनम्। स समाः षोडशाष्टौ च चतस्रोऽष्टौ तथाऽपराः। रतिमप्राप्नुवन्स्त्रीषु बभूव वनगोचरः।। (1-107-21)
हिंदी अनुवाद: वे राग और द्वेष से रहित तथा चंद्रमा के समान प्रिय दर्शन वाले थे। वे तेज में सूर्य के समान, वेग में वायु के समान, क्रोध में यमराज के समान और क्षमा में पृथ्वी के समान थे। हे नृप! पृथ्वीपाल शांतनु के राज्यकाल में पशुओं, सुअरों तथा मृग-पक्षियों का अकारण वध नहीं होता था। ब्रह्म और धर्म की प्रधानता वाले उस राज्य में विनयात्मवान शांतनु काम और राग से दूर रहकर सभी प्राणियों पर समान रूप से शासन करते थे। उनके नेत्र चकोर के समान, मुख ताम्रवर्ण (कान्तिमान), चाल सिंह या वृषभ जैसी, और वे युवा थे। वे सभी अनुपम तथा आभिगामिक (आकर्षक) गुणों से युक्त, गंभीर, सत्त्वसंपन्न और पूर्ण चंद्रमा के समान मुख वाले थे। उस समय देवर्षियों और पितरों के यज्ञ के उद्देश्य से ही क्रियाएँ आरंभ होती थीं और किसी भी प्राणी का अधर्म से वध नहीं होता था। असुखों से ग्रस्त, अनाथ तथा तिर्यग्योनि (पशु-पक्षियों) में जीवन बिताने वाले समस्त भूतों के वे राजा स्वयं पिता के समान रक्षक थे। कुरुपतियों में श्रेष्ठ तथा राजराजेश्वर के पद पर उनके रहने पर वाणी सत्य का आश्रय ले चुकी थी और मन दान-धर्म में लगा रहता था। (शास्त्रों का वचन है कि यज्ञ के लिए ही पशुओं की और संतानोत्पत्ति के लिए ही मैथुन की सृष्टि हुई है।) इस प्रकार उन्होंने अनेक वर्षों (68 वर्ष) तक स्त्रियों में आसक्ति न रखते हुए प्रायः वन में ही निवास किया (या धर्मयुक्त जीवन बिताया)।
व्याख्या: शांतनु के शासन की भव्यता, मूक जीवों पर उनकी दया, और उनके संयमित जीवन का वर्णन किया गया है। वे प्रजा के वास्तविक पालक और धर्म के रक्षक थे।
श्लोक 22-25
तथारूपस्तथाचारस्तथावृत्तस्तथाश्रुतः। गाङ्गेयस्तस्य पुत्रोऽभून्नाम्ना देवव्रतो वसुः।। (1-107-22) सर्वास्त्रेषु स निष्णातः पार्थिवेष्वितरेषु च। महाबलो महासत्वो महावीर्यो महारथः।। (1-107-23) स कदाचिन्मृगं विद्ध्वा गङ्गामनुसरन्नदीम्। भागीरथीमल्पजलां शान्तनुर्दृष्टवान्नृपः।। (1-107-24) तां दृष्ट्वा चिन्तयामास शान्तनुः पुरुषर्षभः। स्यन्दते किं न्वियं नाद्य सरिच्छ्रेष्ठा यथा पुरा।। (1-107-25)
हिंदी अनुवाद: उन्हीं के जैसे रूप, आचार, आचरण और कीर्ति वाले उनके वे पुत्र हुए, जो गंगा जी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे और जिनका नाम 'देवव्रत' (वसु) तथा 'गांगेय' था। वे सभी प्रकार के दिव्य और मानवीय अस्त्र-शस्त्रों में निष्णात, महाबली, महासत्वशाली, महावीर्यवान और महारथी थे। हे राजन्! एक बार मृग का शिकार करके गंगा नदी के किनारे-किनारे चलते हुए राजा शांतनु ने भागीरथी (गंगा) को बहुत अल्प जल वाली (सूखी हुई-सी) देखा। उसे देखकर पुरुषर्षभ राजा शांतनु ने चिंता करते हुए सोचा— "यह सरिच्छ्रेष्ठा (नदियों में श्रेष्ठ गंगा) आज पहले की तरह क्यों नहीं बह रही है?"
व्याख्या: यहाँ से शांतनु के महान पुत्र देवव्रत (भीष्म) का परिचय दिया जाता है, जो अपने पिता के समान ही सभी गुणों से संपन्न थे। इसके बाद कथा उस प्रसंग की ओर मुड़ती है जहाँ राजा शांतनु कम जल वाली गंगा को देखकर चकित होते हैं, जो आगे चलकर भीष्म और गंगा की भेंट का कारण बनता है।
श्लोक 26-33
ततो निमित्तमन्विच्छन्ददर्श स महामनाः। कुमारं रूपसंपन्नं बृहन्तं चारुदर्शनम्।। (1-107-26) दिव्यमस्त्रं विकुर्वाणं यथा देवं पुरन्दरम्। कृत्स्नां गङ्गां समावृत्य शरैस्तीक्ष्णैरवस्थितम्।। (1-107-27) तां शरैराचितां दृष्ट्वा नदीं गङ्गां तदन्तिके। अभवद्विस्मितो राजा दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम्।। (1-107-28) जातमात्रं पुरा दृष्टं तं पुत्रं शान्तनुस्तदा। नोपलेभे स्मृतिं धीमानभिज्ञातुं तमात्मजम्।। (1-107-29) स तु तं पितरं दृष्ट्वा मोहयामास मायया। संमोह्य तु ततः क्षिप्रं तत्रैवान्तरधीयत।। (1-107-30) तदद्बुतं ततो दृष्ट्वा तत्र राजा स शान्तनुः। सङ्कमानः सुतं गङ्गामब्रवीद्दर्शयेति ह।। (1-107-31) दर्शयामास तं गङ्गा बिभ्रती रूपमुत्तमम्। गृहीत्वा दक्षिणे पाणौ तं कुमारमलङ्कृतम्।। (1-107-32) अलङ्कृतामाभरणैर्विरजोम्बरधारिणीम्। दृष्टपूर्वामपि स तां नाभ्यजानात्स शान्तनुः।। (1-107-33)
हिंदी अनुवाद: तदनंतर उस कारण को ढूँढते हुए महामना राजा शांतनु ने रूपसंपन्न, विशाल और सुंदर दर्शन वाले एक कुमार को देखा। वे देवराज इंद्र के समान दिव्य अस्त्र का प्रयोग करते हुए संपूर्ण गंगा नदी को तीक्ष्ण बाणों से आच्छादित करके खड़े थे। गंगा नदी को पास ही बाणों से ढँकी हुई देखकर राजा शांतनु उस अतिमानुष कर्म को देख कर विस्मित हो गए। पहले जन्म लेते समय देखे गए उस पुत्र को धीमान शांतनु पहचान नहीं पाए और उनकी स्मृति काम नहीं कर रही थी। तब उस पुत्र ने अपने पिता को देखकर अपनी माया से उन्हें मोहित कर दिया और तुरंत ही वहीं अंतर्धान हो गया। उस अद्भुत घटना को देखकर राजा शांतनु अपने पुत्र की शंका करते हुए बोले— "हे गंगे! मेरे पुत्र को मुझे दिखाओ।" उत्तम रूप धारण करने वाली गंगा जी ने दाहिने हाथ में उस अलंकृत कुमार को पकड़कर प्रकट किया। आभूषणों से अलंकृत और निर्मल वस्त्र धारण करने वाली उन गंगा जी को पहले देखा होने पर भी राजा शांतनु पहचान नहीं पाए।
व्याख्या: राजा शांतनु गंगा नदी को बाणों से रोके हुए एक अलौकिक कुमार को देखते हैं। जब वे उसे पहचान नहीं पाते, तो गंगा जी स्वयं प्रकट होकर बताती हैं कि यह उन्हीं का आठवां पुत्र है, जिसे वे पाल-पोकर लाई हैं।
श्लोक 34-41
गङ्गोवाच। यं पुत्रमष्टमं राजंस्त्वं पुरा मय्यविन्दथाः। स चायं पुरुषव्याघ्र सर्वास्त्रविदनुत्तमः।। (1-107-34) गृहाणेमं महाराज मया संवर्धितं सुतम्। आदाय पुरुषव्याघ्र नयस्वैनं गृहं विभो।। (1-107-35) वेदानधिजगे साङ्गान्वसिष्ठादेष वीर्यवान्। कृतास्त्रः परमेष्वासो देवराजसमो युधि।। (1-107-36) सुराणां संमतो नित्यमसुराणां च भारत। उशा वेद यच्छास्त्रमयं तद्वेद सर्वशः।। (1-107-37) तथैवाङ्गिरसः पुत्रः सुरसुरनमस्कृतः। यद्वेद शास्त्रं तच्चापि कृत्स्नमस्मिन्प्रतिष्ठितम्।। (1-107-38) तव पुत्रे महाबाहौ साङ्गोपाङ्गं महात्मनि। ऋषिः परैरनाधृष्यो जामदग्न्यः प्रतापवान्।। (1-107-39) यदस्त्रं वेद राभश्च तदेतस्मिन्प्रतिष्ठितम्। महेष्वासमिमं राजन्राजधर्मार्थकोविदम्।। (1-107-40) मया दत्तं निजं पुत्रं वीरं वीर गृहं नय। (1-107-41)
हिंदी अनुवाद: गंगा जी बोलीं— "हे राजन्! पूर्वकाल में तुमने मुझमें जिस आठवें पुत्र को उत्पन्न किया था, यह वही पुरुषव्याघ्र और समस्त अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञान में अनुत्तम कुमार है। हे महाराज! मेरे द्वारा पाले गए इस सुत को ग्रहण करो। हे पुरुषव्याघ्र विभो! इसे साथ लेकर अपने घर ले जाओ। इस वीर ने महर्षि वसिष्ठ से अंगों सहित वेदों का अध्ययन किया है। यह उत्तम धनुर्धर युद्ध में देवराज इंद्र के समान अस्त्र-विद्या में निपुण है। हे भारत! यह देवताओं और असुरों दोनों को सदा प्रिय है। शुक्राचार्य (उशा) जो शास्त्र जानते हैं, यह उन सबको पूरी तरह जानता है। इसी प्रकार अंगिरा के पुत्र (बृहस्पति) का जो ज्ञान है और जिसे देवता तथा असुर नमस्कार करते हैं, वह संपूर्ण शास्त्र भी इसमें प्रतिष्ठित है। महाबाहु और महात्मा तुम्हारे इस पुत्र में अंगों तथा उपांगों सहित वह संपूर्ण विद्या है। शत्रुओं के लिए अप्रतिष्ठित प्रतापवान ऋषि जमदग्निपुत्र (परशुराम जी) जो भी अस्त्र जानते हैं, वह सब इस पर प्रतिष्ठित है। हे राजन्! राजधर्म और अर्थ के मर्म को जानने वाले तथा महान धनुर्धर इस अपने वीर पुत्र को मैं तुम्हें सौंपती हूँ, इसे अपने घर ले जाओ।"
व्याख्या: गंगा जी राजा शांतनु को उनके पुत्र देवव्रत के महान गुरुओं (वसिष्ठ, शुक्राचार्य, बृहस्पति और परशुराम) और उसकी असीम विद्याओं का परिचय देती हैं तथा उसे हस्तिनापुर ले जाने के लिए कहती हैं।
श्लोक 42-50
वैशंपायन उवाच। इत्युक्त्वा सा महाभागा तत्रैवान्तरधीयत। तयैवं समनुज्ञातः पुत्रमादाय शान्तनुः।। (1-107-41) भ्राजमानं यथाऽदित्यमाययौ स्वपुरं प्रति। पौरवस्तु पुरीं गत्वा पुरन्दरपुरोपमाम्।। (1-107-42) सर्वकामसमृद्धार्थं मेने सोत्मानमात्मना। पौरवेषु ततः पुत्रं राज्यार्थमभयप्रदम्।। (1-107-43) गुणवन्तं महात्मानं यौवराज्येऽभ्यषेचयत्। पौरवाञ्शान्तनोः पुत्रः पितरं च महायशाः।। (1-107-44) राष्ट्रं च रञ्जयामास वृत्तेन भरतर्षभ। स तथा सह पुत्रेण रममाणो महीपतिः।। (1-107-45) वर्तयामास वर्षाणि चत्वार्यमितविक्रमः। स कदाचिद्वनं यातो यमुनामभितो नदीम्।। (1-107-46) महीपतिरनिर्देश्यमाजिघ्रद्गन्धमुत्तमम्। तस्य प्रभवमन्विच्छन्विचचार समन्ततः।। (1-107-47) स ददर्श तदा कन्यां दाशानां देवरूपिणीम्। तामपृच्छत्स दृष्ट्वैव कन्यामसितलोचनाम्।। (1-107-48) कस्य त्वमसि का चासि किं च भीरु चिकीर्षसि। साऽब्रवीद्दाशकन्याऽस्मि धर्मार्थं वाहये तरिम्।। (1-107-49) पितुर्नियोगाद्भद्रं तद् दाशराज्ञो महात्मनः। रूपमाधुर्यगन्धैस्तां संयुक्तां देवरूपिणीम्।। (1-107-50)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा कहकर वे महाभागा वहीं अंतर्धान हो गईं। उनके द्वारा इस प्रकार आज्ञा दिए जाने पर राजा शांतनु सूर्य के समान प्रज्वलित होने वाले उस पुत्र को लेकर अपने नगर की ओर लौटे। इंद्रपुरी के समान शोभा देने वाली कुरुओं की पुरी में पहुँचकर पौरव नरेश शांतनु ने अपने को सभी कामनाओं से पूर्ण माना। तदनंतर पौरव वंश में प्रजा को अभय देने वाले, गुणवान और महात्मा उस पुत्र को राजा ने युवराज के पद पर अभिषिक्त कर दिया। महायशस्वी शांतनु के उस पुत्र ने अपने श्रेष्ठ आचरण से पौरव राष्ट्र और अपने पिता को पूरी तरह प्रसन्न कर दिया। अमित पराक्रमी वे महीपति उस पुत्र के साथ आनंदपूर्वक चार वर्षों तक निवास करते रहे। तदनंतर किसी समय वे राजा वन में गए और यमुना नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ महीपति शांतनु ने किसी अनिर्वचनीय (अद्भुत) उत्तम सुगंध को सूँघा और उसके उद्गम का पता लगाने के लिए वे चारों ओर विचरण करने लगे। तब उन्होंने देवकन्या के समान रूप वाली दाशराज (मछुआरों के राजा) की एक कन्या को देखा। उस असितलोचना (काले नेत्रों वाली) कन्या को देखते ही उन्होंने उससे पूछा— "तुम किसकी पुत्री हो, कौन हो और हे भीरु! यहाँ क्या करना चाहती हो?" उसने उत्तर दिया— "मैं दाशकन्या हूँ। हे भद्र! महात्मा दाशराज (निषादराज) पिता की आज्ञा से धर्म के निमित्त मैं इस नाव को खेति हूँ (पार लगाती हूँ)।" वे रूप, माधुर्य और सुगंध से युक्त साक्षात् देवकन्या जैसी प्रतीत हो रही थीं।
व्याख्या: शांतनु देवव्रत को युवराज बनाकर चार वर्ष तक सुखपूर्वक रहते हैं। एक दिन यमुना तट पर भ्रमण करते हुए उन्हें एक अत्यंत मनमोहक सुगंध प्राप्त होती है, जिसके पीछे जाने पर उनकी भेंट निषादराज की सुंदर कन्या सत्यवती से होती है।
श्लोक 51-59
समीक्ष्य राजा दाशेयीं कामयामास शान्तनुः। स गत्वा पितरं तस्या वरयामास तां तदा।। (1-107-51) पर्यपृच्छत्ततस्तस्याः पितरं सोत्मकारणात्। स च तं प्रत्युवाचेदं दाशराजो महीपतिम्।। (1-107-52) जातमात्रैव मे देया वराय वरवर्णिनी। हृदि कामस्तु मे कश्चित्तं निबोध जनेश्वर।। (1-107-53) यदीमां धर्मपत्नीं त्वं मत्तः प्रार्थयसेऽनघ। सत्यवागसि सत्येन समयं कुरु मे ततः।। (1-107-54) समयेन प्रदद्यां ते कन्यामहमिमां नृप। न हि मे त्वत्समः कश्चिद्वरो जातु भविष्यति।। (1-107-55) शान्तनुरुवाच। श्रुत्वा तव वरं दाश व्यवस्येयमहं तव। दातव्यं चेत्प्रदास्यामि न त्वदेयं कथंचन।। (1-107-56) दाश उवाच। अस्यां जायेत यः पुत्रः स राजा पृथिवीपते। त्वदूर्ध्वमभिषेक्तव्यो नान्यः कश्चन पार्थिव।। (1-107-57) वैशंपायन उवाच। नाकामयत तं दातुं वरं दाशाय शान्तनुः। शरीरजेन तीव्रेण दह्यमानोऽपि भारत।। (1-107-58) स चिन्तयन्नेव तदा दाशकन्यां महीपतिः। प्रत्ययाद्धास्तिनपुरं कामोपहतचेतनः।। (1-107-59)
हिंदी अनुवाद: उस दाशराज की पुत्री (सत्यवती) को देखकर राजा शांतनु उस पर आसक्त हो गए और उन्होंने उसके पिता के पास जाकर उससे उसका विवाह तय करने की प्रार्थना की। राजा शांतनु ने उसके पिता से उचित कारणों से उसके संबंध में पूछा। तब दाशराज (निषादराज) ने राजा शांतनु से उत्तर दिया— "यह वरवर्णिनी (सुंदरी) जन्म से ही मुझे देय (प्राप्त) है। हे जनेश्वर! मेरे हृदय में एक अभिलाषा है, उसे आप जानिए। हे अनघ! यदि आप मेरी इस पुत्री को अपनी धर्मपत्नी बनाना चाहते हैं, तो आप सत्यवादी हैं, अतः मेरे साथ सत्य की प्रतिज्ञा (शर्त) कीजिए। हे नृप! शर्त पूरी होने पर ही मैं अपनी इस कन्या को आपको दूँगा, क्योंकि आपके समान दूसरा कोई श्रेष्ठ वर भविष्य में कभी नहीं मिल सकता।" शांतनु ने कहा— "हे दाश! तुम्हारी शर्त सुनकर मैं उस पर विचार करूँगा। यदि देने योग्य होगा, तो मैं अवश्य दूँगा, कोई ऐसी वस्तु नहीं है जो न दी जा सके।" दाशराज ने कहा— "हे पृथिवीपते! इस कन्या से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही आपके बाद राजा होकर राजपद पर अभिषिक्त होगा, दूसरा कोई भी पार्थिव (राजकुमार) नहीं।" वैशंपायन जी ने कहा— कामदेव की तीव्र अग्नि से जलते हुए भी राजा शांतनु ने दाशराज को वह वर (शर्त) देना स्वीकार नहीं किया (क्योंकि युवराज पद पर पहले ही देवव्रत प्रतिष्ठित थे)। तब दाशकन्या का चिंतन करते हुए कामोपहत चेतन (प्रेम में सुधि-बुधि खो चुके) वे महीपति लौटकर हस्तिनापुर आ गए।
व्याख्या: राजा शांतनु सत्यवती (दाशराज की पुत्री) पर मोहित हो जाते हैं और उसके पिता से विवाह का प्रस्ताव रखते हैं। दाशराज शर्त रखता है कि सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही हस्तिनापुर का अगला राजा बनेगा। चूँकि शांतनु पहले ही देवव्रत को युवराज बना चुके थे, इसलिए वे दुखी मन से बिना शर्त माने हस्तिनापुर लौट आते हैं।
श्लोक 60-75
ततः कदाचिच्छोचन्तं शान्तनुं ध्यानमास्थितम्। पुत्रो देवव्रतोऽभ्येत्य पितरं वाक्यमब्रवीत्।। (1-107-60) सर्वतो भवतः क्षेमं विधेयाः सर्वपार्थिवाः। तत्किमर्थमिहाभीक्ष्णं परिशोचसि दुःखितः।। (1-107-61) ध्यायन्निव च मां राजन्नाभिभाषसि किंचन। न चाश्वेन विनिर्यासि विवर्णो हरिणः कृशः।। (1-107-62) व्याधिमिच्छामि ते ज्ञातुं प्रतिकुर्यां हि तत्र वै।। (1-107-63) एवमुक्तः स पुत्रेण शान्तनुः प्रत्यभाषत।। (1-107-64) असंशयं ध्यानपरो यथा वत्स तथा शृणु। अपत्यं नस्त्वमेवैकः कुले महति भारत।। (1-107-65) शस्त्रनित्यश्च सततं पौरुषे पर्यवस्थितः। अनित्यतां च लोकानामनुशोचामि पुत्रक।। (1-107-66) कथंचित्तव गाङ्गेय विपत्तौ नास्ति नः कुलम्। असंशयं त्वमेवैकः शतादपि वरः सुतः।। (1-107-67) न चाप्यहं वृथा भूयो दारान्कर्तुमिहोत्सहे। संतानस्याविनाशाय कामये भद्रमस्तु ते।। (1-107-68) अनपत्यतैकपुत्रत्वमित्याहुर्धर्मवादिनः। अग्निहोत्रं त्रयी विद्या यज्ञाश्च सहदक्षिणाः। सर्वाण्येतान्यपत्यस्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्।। (1-107-70) एवमेतन्मनुष्येषु तच्च सर्वं प्रजास्विति। यदपत्यं महाप्राज्ञ तत्र मे नास्ति संशयः।। (1-107-71) एषा त्रयी पुराणानां देवतानां च शाश्वती।। (1-107-72) त्वं च शूरः सदाऽमर्षी शस्त्रनित्यश्च भारत। नान्यत्र युद्धात्तस्मात्ते निधनं विद्यते क्वचित्।। (1-107-74) सोऽस्मि संशयमापन्नस्त्वयि शान्ते कथं भवेत्। इति ते कारणं तात दुःखस्योक्तमशेषतः।। (1-107-75)
हिंदी अनुवाद: तदनंतर किसी समय शोकलीन और ध्यानमग्न बैठे हुए शांतनु के पास आकर उनके पुत्र देवव्रत ने पिता से यह वचन कहा— "सब प्रकार से आपका क्षेम-कुशल है और सभी पार्थिव आपके अधीन हैं, फिर किस कारण से आप लगातार दुःखी होकर शोक कर रहे हैं? हे राजन्! आप ध्यान में डूबे हुए से प्रतीत होते हैं और मुझसे कुछ भी बात नहीं करते हैं। न तो आप घोड़े पर सवार होकर बाहर जाते हैं, और आपका शरीर भी विवर्ण, पीला तथा कृश हो गया है। मैं आपके इस व्याधि (रोग) को जानना चाहता हूँ ताकि उसका प्रतिकार (उपचार) कर सकूं।" पुत्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर शांतनु ने उत्तर दिया— "हे वत्स! मैं जिस प्रकार ध्यानपरो (चिंतित) हूँ, उसे तुम सुनो। हे भारत! इस महान कुल में हमारे एकमात्र संतान तुम ही हो। तुम निरंतर अस्त्र-शस्त्रों में तत्पर रहने वाले और पौरुष में स्थित रहने वाले वीर हो, अतः हे पुत्रक! मैं लोकों की अनित्यता का अनुशोक (चिंता) कर रहा हूँ। हे गांगेय! यदि किसी प्रकार तुम्हारी विपत्ति (मृत्यु) हो जाए, तो हमारा यह कुल ही समाप्त हो जाएगा। इसमें कोई संशय नहीं है कि तुम अकेले ही सौ पुत्रों से बढ़कर श्रेष्ठ हो। मैं वंश के विस्तार के लिए पुनः विवाह करने की इच्छा रखता हूँ, ताकि संतान का नाश न हो। तुम्हारा कल्याण हो।" धर्मवादियों का कहना है कि एक ही संतान होने पर व्यक्ति अनपत्य (संतानहीन) के समान ही माना जाता है। अग्निहोत्र, त्रयी विद्या और दक्षिणासहित यज्ञ— ये सब भी संतान की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं हैं। हे महाप्राज्ञ! मनुष्य समाज में और समस्त प्रजा में जो संतान का महत्त्व है, उसके विषय में मेरे मन में कोई संशय नहीं है। तुम शूरवीर, सदा अमर्षी (तेजस्वी) और शस्त्रों में तत्पर रहने वाले हो, अतः युद्ध के सिवा तुम्हारा अंत अन्य किसी भी स्थान पर होना संभव नहीं है। ऐसी स्थिति में यदि तुम शांत (मृत) हो जाओगे, तो हमारा वंश कैसे चलेगा? हे तात! मैंने तुम्हें अपने दुःख का संपूर्ण कारण बता दिया है।
व्याख्या: राजा शांतनु सत्यवती के वियोग और वंश के नाश की चिंता में घुल रहे होते हैं। जब युवराज देवव्रत आकर उनके दुखों का कारण पूछते हैं, तो शांतनु उन्हें बताते हैं कि वे उनकी सुरक्षा को लेकर और वंश के निरंतरता को लेकर चिंतित हैं, क्योंकि वे एकमात्र संतान हैं और क्षत्रिय होने के कारण उनका जीवन युद्ध में हमेशा खतरे में रहता है।
श्लोक 1-8
वैशंपायन उवाच। (1-107-76x) ततस्तत्कारणं राज्ञो ज्ञात्वा सर्वमशेषतः। देवव्रतो महाबुद्धिः प्रज्ञया चान्वचिन्तयत्।। (1-107-76) अपत्यफलसंयुक्तमेतच्छ्रुत्वा पितुर्वचः। सूतं भूयोऽपि संतप्त आह्वयामास वै पितुः।। (1-107-77) सूतस्तु कुरुमुख्यस्य उपयातस्तदाज्ञया। तमुवाच महाप्राज्ञो भीष्मो वै सारथिं पितुः।। (1-107-78) त्वं सारथे पितुर्मह्यं सखासि रथधूर्गतः। अपि जानासि यदि वै कस्यां भावो नृपस्य तु।। (1-107-79) तदाचक्ष्व भवान्पृष्टः करिष्ये न तदन्यथा। (1-107-80a) सूत उवाच। (1-107-80x) दाशकन्या कुरुश्रेष्ठ तत्र भावः पितुर्गतः।। (1-107-80b) वृतः स नरदेवेन तदा वचनमब्रवीत्। योऽस्यां पुमान्भवेज्जातः स राजा त्वदनन्तरम्।। (1-107-81) नाकामयत तं दातुं पिता तव वरं तदा। स चापि निश्चयस्तस्य न च दद्यां ततोऽन्यथा।। (1-107-82) एतत्ते कथितं वीर कुरुष्व यदनन्तरम्। (1-107-83a)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तदनंतर राजा के उस समस्त कारण को पूरी तरह जानकर महाबुद्धिमान देवव्रत ने अपनी बुद्धि से विचार किया। संतान की उत्पत्ति के फल से युक्त अपने पिता के उस वचन को सुनकर तथा संतप्त होकर उन्होंने अपने पिता के सारथी को फिर से बुलाया। तब कुरुश्रेष्ठ की आज्ञा पाकर वह सारथी पास आया और महाप्राज्ञ भीष्म ने पिता के उस सारथी से कहा— "हे सारथी! तुम मेरे पिता के सखा और रथ हाँकने वाले हो। यदि तुम जानते हो तो बताओ कि राजा का मन किस पर आया है? मेरे द्वारा पूछे जाने पर तुम वह बात मुझे बताओ, मैं उसके अन्यथा कुछ नहीं करूँगा।" सारथी ने कहा— "हे कुरुश्रेष्ठ! दाशराज की कन्या पर आपके पिता का मन आया है। जब राजा ने उसका वरण किया, तब उसके पिता (दाशराज) ने यह वचन कहा था— 'जो पुरुष इस कन्या से उत्पन्न होगा, वही आपके बाद राजा होगा।' परंतु तुम्हारे पिता शांतनु ने दाशराज को वह वर देना स्वीकार नहीं किया, क्योंकि दाशराज का भी यही निश्चय था कि इसके बिना वह कन्या नहीं देगा। हे वीर! मैंने तुम्हें यह बात बता दी है, अब इसके बाद जो उचित हो, वह करो।"
व्याख्या: देवव्रत अपने पिता शांतनु के दुःख का कारण जान जाते हैं। वे सारथी से सत्यवती और दाशराज की शर्त के बारे में पूरी जानकारी प्राप्त करते हैं, जिससे उन्हें यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके युवराज होने के कारण ही विवाह में बाधा आ रही है।
श्लोक 9-18
वैशंपायन उवाच। (1-107-83x) ततः स पितुराज्ञाय मतं सम्यगवेक्ष्य च। ज्ञात्वा च मानसं पुत्रः प्रययौ यमुनां प्रति।। (1-107-83) क्षत्रियैः सह धर्मात्मा पुराणैर्धर्मचारिभिः। उच्चैश्श्रवसमागम्य कन्यां वव्रे पितुः स्वयम्'।। (1-107-84) तं दाशः प्रतिजग्राह विधिवत्प्रतिपूज्य च। अब्रवीच्चैनमासीनं राजसंसदि भारत।। (1-107-85)
राज्यशुल्का प्रदातव्या कन्येयं याचतां वर। अपत्यं यद्भवेदस्याः स राजाऽस्तु पितुः परम्।। (1-107-86) त्वमेवात्र महाबाहो शान्तनोर्वंशवर्धनः। पुत्रः शस्त्रभृतां श्रेष्ठः किं नु वक्ष्यामि ते वचः।। (1-107-87)कुमारिकायाः शुल्कार्थं किंचिद्वक्ष्यामि भारत।' कोहि संबन्धखं श्लाघ्यमीप्सितं यौनमीदृशम्। अतिक्रामन्न तप्येत साक्षादपि शतक्रतुः।। (1-107-88) अपत्यं चैतदार्यस्य यो युष्माकं समो गुणैः। यस्य शुक्रात्सत्यवती संभूता वरवर्णिनी।। (1-107-89) तेन मे बहुशस्तात पिता ते परिकीर्तितः। अर्हः सत्यवतीं वोढुं धर्मज्ञः स नराधिपः।। (1-107-90) `इयं सत्यवती देवी पितरं तेऽब्रवीत्तथा। अर्थितश्चापिराजर्षिः प्रत्याख्यातः पुरा मया'।। (1-107-91) कन्यापितृत्वात्किंचित्तु वक्ष्यामि त्वां नराधिप। बलवत्सपत्नतामत्र दोषं पश्यामि केवलम्।। (1-107-92)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तदनंतर पिता के मत को भलीभांति समझकर और उनके मन की बात जानकर धर्मात्मा पुत्र (देवव्रत) प्राचीन धर्म का पालन करने वाले क्षत्रियों के साथ यमुना नदी की ओर गए और वहाँ जाकर अपने पिता के लिए स्वयं उस कन्या का वरण किया। दाशराज ने विधिपूर्वक सत्कार करके उनका स्वागत किया और राजसभा में बैठे हुए उनसे कहा— "हे भारत! यह कन्या राज्य शुल्क के रूप में वर माँगने वाले को दी जानी चाहिए, और इसका जो पुत्र हो, वही तुम्हारे पिता के बाद राजा बने। हे महाबाहो! तुम ही शांतनु के वंश को बढ़ाने वाले और शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ पुत्र हो, मैं तुम्हें क्या अधिक कहूँ? इस कुमारी कन्या के शुल्क के विषय में मैं कुछ कहूँगा। ऐसा श्लाघ्य और वांछित वैवाहिक संबंध यदि कोई ठुकरा दे, तो साक्षात् इंद्र (शतक्रतु) भी उसके लिए पश्चाताप करेंगे। तुम आर्य के ऐसे पुत्र हो जो गुणों में सबके समान हो। जिस वीर्य से यह सुंदरि सत्यवती उत्पन्न हुई है, हे तात! उस पिता ने मुझसे कई बार तुम्हारे पिता की प्रशंसा की है। वे धर्मज्ञ नराधिप शांतनु ही सत्यवती को ब्याहने के योग्य हैं। तुम्हारी देवी सत्यवती ने भी अपने पिता से यही कहा था, और राजर्षि शांतनु द्वारा प्रार्थना किए जाने पर भी मैंने पहले उन्हें अस्वीकार कर दिया था। हे नराधिप! कन्या का पिता होने के कारण मैं तुमसे कुछ कहता हूँ— मैं यहाँ केवल एक ही बलवान दोष (भविष्य का संकट) देखता हूँ।"
व्याख्या: देवव्रत स्वयं यमुना तट पर दाशराज के पास जाते हैं और अपने पिता शांतनु के लिए सत्यवती का हाथ माँगते हैं। दाशराज उनका सत्कार करता है और शांतनु के गुणों की सराहना करता है, किंतु भविष्य में दोनों पक्षों के संतानों के बीच संभावित सत्ता संघर्ष (सपत्नता) की आशंका व्यक्त करता है।
श्लोक 93-101
भूयांसं त्वयि पश्यामि तद्दोषमपराजित।'यस्य हि त्वं सपत्नः स्या गन्धर्वस्यासुरस्य वा।। (1-107-93) न स जातु चिरं जीवेत्त्वयि क्रुद्धे परन्तप। एतावानत्र दोषो हि नान्यः कश्चन पार्थिव।। (1-107-94) एतज्जानीहि भद्रं ते दानादाने परन्तप।। (1-107-95) वैशंपायन उवाच। एवमुक्तस्तु गाङ्गेयस्तद्युक्तं प्रत्यभाषत। शृण्वतां भूमिपालानां पितुरर्थाय भारत।। (1-107-96)इदं वचनमाधत्स्व नास्ति वक्तास्य मत्समः। अन्यो जातो न जनिता न च कश्चन संप्रति'।। (1-107-97) एवमेतत्करिष्यामि यथा त्वमनुभाषसे। योऽस्यां जनिष्यते पुत्रः स नो राजा भविष्यति।। (1-107-98) इत्युक्तः पुनरेव स्म तं दाशः प्रत्यभाषत। चिकीर्षुर्दुष्करं कर्म राज्यार्थे भरतर्षभ।। (1-107-99) त्वमेव नाथः संप्राप्तः शान्तनोरमितद्युते। कन्यायाश्चैव धर्मात्मन्प्रभुर्दानाय चेश्वरः।। (1-107-100) इदं तु वचनं सौम्य कार्यं चैव निबोध मे। कौमारिकाणां शीलेन वक्ष्याम्यहमरिन्दम।। (1-107-101)
हिंदी अनुवाद: दाशराज ने आगे कहा— "हे अपराजित परन्तप! मैं तो तुम में ही सबसे बड़ा दोष देखता हूँ। यदि गंधर्व हो या असुर, कोई भी तुम्हारा सपत्न (प्रतियोगी) हो जाए, तो हे परन्तप! तुम्हारे क्रुद्ध होने पर वह कभी अधिक समय तक जीवित नहीं रह सकता। हे पार्थिव! इसके सिवा यहाँ अन्य कोई दोष नहीं है। हे परन्तप! दान और आदान (लेन-देन) के इस रहस्य को भलीभांति जान लो, तुम्हारा कल्याण हो।" वैशंपायन जी ने कहा— दाशराज द्वारा ऐसा कहे जाने पर गांगेय देवव्रत ने वहाँ उपस्थित समस्त भूमिपालों के सुनते हुए अपने पिता के कार्य के लिए यह यथोचित उत्तर दिया— "मेरे समान इस बात को कहने वाला न तो दूसरा कोई उत्पन्न हुआ है, न आगे होगा और न इस समय कोई है। जैसा तुम कह रहे हो, मैं वैसा ही करूँगा— सत्यवती के गर्भ से जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही हम सबका राजा होगा।" भरतर्षभ! ऐसा कहने पर भी दाशराज ने राजा के हित के लिए एक और दुष्कर कर्म की इच्छा करते हुए उनसे फिर कहा— "हे अमितद्युति शांतनु के नाथ! हे धर्मात्मन्! तुम ही इस कन्या के प्रभु और इसे दान करने के पूर्ण स्वामी हो। हे सौम्य अरिन्दम! तुम मेरी यह बात और कार्य सुनो, जिसे मैं कुमारियों के शील और मर्यादा के अनुसार कह रहा हूँ।"
व्याख्या: दाशराज देवव्रत की महानता से भयभीत है कि कहीं उनके पराक्रम के कारण उसकी पुत्री के संतानों के अधिकार सुरक्षित न रह सकें। इस पर देवव्रत पूरी सभा के समक्ष सत्यवती के पुत्र को ही राजा बनाने की प्रतिज्ञा करते हैं।
श्लोक 102-108
यत्त्वया सत्यवत्यर्थे सत्यधर्मपरायण। राजमध्ये प्रतिज्ञातमनुरूपं तवैव तत्।। (1-107-102) नान्यथा तन्महाबाहो संशयोऽत्र न कश्चन। तवापत्यं भवेद्यत्तु तत्र नः संशयो महान्।। (1-107-103) वैशंपायन उवाच। तस्यैतन्मतमाज्ञाय सत्यधर्मपरायणः। प्रत्यजानात्तदा राजन्पितुः प्रियचिकीर्षया।। (1-107-104) गाङ्गेय उवाच। `उच्चैश्श्रवः समाधत्स्व प्रतिज्ञां जनसंसदि। ऋषयो वाथ वा देवा भूतान्यन्तर्हितानि च।। (1-107-105) यानि यानीह शृण्वन्तु नास्ति वक्तास्य मत्समः।' दाशराज निबोधेदं वचनं मे नृपोत्तम।। (1-107-106) शृण्वतां भूमिपालानां यद्ब्रवीमि पितुः कृते। राज्यं तावत्पूर्वमेव मया त्यक्तं नराधिपाः।। (1-107-107) अपत्यहेतोरपि च करिष्येऽद्य विनिश्चयम्। अद्यप्रभृति मे दाश ब्रह्मचर्यं भविष्यति।। (1-107-108)
हिंदी अनुवाद: दाशराज बोला— "हे सत्यधर्मपरायण! तुमने राजसभा के बीच सत्यवती के लिए जो प्रतिज्ञा की है, वह तुम्हारे ही अनुरूप है। हे महाबाहो! इसमें कोई संशय नहीं है कि तुम्हारी बात झूठी नहीं होगी, किंतु तुम्हारे जो अपनी संतान होगी, उसको लेकर हमारे मन में बहुत बड़ा संशय है।" वैशंपायन जी ने कहा— दाशराज के इस मन की बात को जानकर सत्यधर्मपरायण देवव्रत ने अपने पिता को प्रिय पहुँचाने की इच्छा से तब एक अत्यंत कठिन प्रतिज्ञा की। गांगेय ने कहा— "हे उच्चश्रवा! जनसभा में मेरी इस प्रतिज्ञा को सुनो। यहाँ उपस्थित ऋषिगण, देवता और अंतर्धान रहने वाले समस्त भूत— जो-जो भी इस बात को सुन रहे हैं, वे सब सुनें! हे नृपोत्तम दाशराज! मेरी इस बात को अच्छी तरह जान लो। मैं उपस्थित सभी राजाओं के सुनते हुए अपने पिता के लिए यह कह रहा हूँ— हे नराधिपाः! मैंने राज्य तो पहले ही छोड़ दिया है। अब अपनी संतान के कारण उत्पन्न होने वाले संशय को दूर करने के लिए मैं आज एक और पक्का निर्णय करता हूँ— हे दाशराज! आज से मेरा जीवन ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने वाला होगा।"
व्याख्या: दाशराज की शंका यह थी कि भले ही देवव्रत स्वयं राजा न बनें, किंतु कल को उनके अपने पराक्रमी पुत्र सत्यवती के वंशजों के अधिकारों को छीन सकते हैं। इस गहरी आशंका का निवारण करने के लिए देवव्रत आजीवन ब्रह्मचारी रहने की भीषण प्रतिज्ञा करते हैं।
श्लोक 109-115
अपुत्रस्यापि मे लोका भविष्यन्त्यक्षया दिवि।
न हि जन्मप्रभृत्युक्तं मया किंचिदिहानृतम्।। (1-107-109) यावत्प्राणा ध्रियन्ते वै मम देहं समाश्रिताः। तावन्न जनयिष्यामि पित्रे कन्यां प्रयच्छ मे।। (1-107-110) परित्यजाम्यहं राज्यं मैथुनं चापि सर्वशः। ऊर्ध्वरेता भविष्यामि दाश सत्यं ब्रवीमि ते।।' (1-111) वैशंपायन उवाच। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा संप्रहृष्टतनूरुहः। ददानीत्येव तं दाशो धर्मात्मा प्रत्यभाषत।। (1-112) ततोन्तरिक्षेऽप्सरसो देवाः सर्षिगणास्तदा।तद्दृष्टा दुष्करं कर्म प्रशशंसुश्च पार्थिवाः।।' (1-113) अभ्यवर्षन्त कुसुमैर्भीष्मोऽयमिति चाब्रुवन्। ततः स पितुरर्थाय तामुवाच यशस्विनीम्।। (1-114) अधिरोह रथं मातर्गच्छावः स्वगृहानिति। एवमुक्त्वा तु भीष्मस्तां रथमारोप्य भामिनीं।। (1-115)
हिंदी अनुवाद: देवव्रत ने आगे कहा— "संतानहीन होने पर भी मेरे लिए स्वर्ग में अक्षय लोक सुरक्षित रहेंगे। मैंने जन्म से लेकर आज तक कभी कोई असत्य बात नहीं कही है। जब तक मेरे शरीर में प्राण टिके रहेंगे, तब तक मैं कभी संतान उत्पन्न नहीं करूँगा, अतः तुम मेरे पिता को यह कन्या सौंप दो। मैं राज्य और मैथुन— दोनों का सर्वथा परित्याग करता हूँ। हे दाशराज! मैं आजीवन ऊर्ध्वरेता (ब्रह्मचारी) रहूँगा, मैं तुमसे सत्य कहता हूँ।" वैशंपायन जी ने कहा— उनके इस वचन को सुनकर दाशराज के शरीर के रोम हर्ष से पुलकित हो उठे और धर्मात्मा दाशराज ने उत्तर दिया— "मैं यह कन्या देता हूँ।" तदनंतर अंतरिक्ष में अप्सराएँ, देवता और ऋषियों के संघ एकत्रित हो गए। उस अत्यंत दुष्कर कर्म को देखकर सभी पार्थिव राजाओं ने उसकी प्रशंसा की। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी और सबने पुकार कर कहा— "यह तो 'भीष्म' हैं!" इसके बाद पिता के हित के लिए उन्होंने उस यशस्विनी सत्यवती से कहा— "माता! रथ पर सवार होइए, हम अपने घर चलें।" ऐसा कहकर भीष्म ने उस भामिनी (सुंदरी) को रथ पर बिठा लिया।
व्याख्या: देवव्रत द्वारा आजीवन विवाह न करने और ब्रह्मचर्य व्रत अपनाने की इस भीषण प्रतिज्ञा के कारण ही उनका नाम 'भीष्म' पड़ा। देवता और ऋषि उनके इस त्याग की महिमा गाते हैं और पुष्प वर्षा करते हैं।
श्लोक 116-120
आगम्य हास्तिनपुरं शान्तनोः संन्यवेदयत्। तस्य तद्दुष्करं कर्म प्रशशंसुर्नाराधिपाः।। (1-107-116) समेताश्च पृथक्चैव भीष्मोजयमिति चाब्रुवन्। तच्छ्रुत्वा दुष्करं कर्म कृतं भीष्मेण शान्तनुः।। (1-107-117) बभूव दुःखितो राजा चिररात्राय भारत। स तेन कर्मणा सूनोः प्रीतस्तस्मै वरं ददौ।। (1-118) स्वच्छन्दमरणं तुष्टो ददौ तस्मै महात्मने। न ते मृत्युः प्रभविता यावज्जीवितुमिच्छसि।। (1-119) त्वत्तो ह्यनुज्ञां संप्राप्य मृत्युः प्रभविताऽनघ।। (1-120)
हिंदी अनुवाद: हस्तिनापुर में आकर उन्होंने यह सारा वृत्तांत शांतनु को निवेदन किया। भीष्म के उस दुष्कर कर्म की सभी नराधिपों ने प्रशंसा की। सब राजाओं ने मिलकर और अलग-अलग भी यही कहा— "यह तो वास्तव में 'भीष्म' (भीषण प्रतिज्ञा करने वाले) हैं!" भीष्म द्वारा किए गए उस दुष्कर कर्म को सुनकर राजा शांतनु दीर्घकाल तक दुःखी रहे। तत्पश्चात अपने पुत्र के इस महान त्याग से प्रसन्न होकर राजा ने उन्हें एक वरदान दिया। उस महात्मा पुत्र से संतुष्ट होकर राजा शांतनु ने उन्हें 'स्वच्छन्द मरण' (इच्छा मृत्यु) का वर दिया— "जब तक तुम जीवित रहना चाहोगे, तब तक मृत्यु तुम पर प्रभाव नहीं डाल सकेगी। हे अनघ! जब तुम स्वयं मृत्यु से अनुमति प्राप्त कर लोगे, तभी वह तुम पर प्रभावी होगी।" इस प्रकार श्रीमन्महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत संभवपर्व में एक सौ सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
व्याख्या: भीष्म सत्यवती को हस्तिनापुर ले आते हैं और शांतनु को सौंप देते हैं। यद्यपि शांतनु इस कठोर त्याग से दुःखी होते हैं, किंतु वे अपने पुत्र की निष्ठा से प्रसन्न होकर उन्हें 'इच्छा-मृत्यु' का महान वरदान प्रदान करते हैं।
इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि सप्ताधिकशततमोऽध्यायः।। 107 ।।
