श्लोक 1-4
वैशंपायन उवाच। प्रतिज्ञाय च दुष्यन्ते प्रतियाते दिने दिने। गर्भश्च ववृधे तस्यां राजपुत्र्यां महात्मनः।। (1-95-1) शकुन्तला चिन्तयन्ती राजानं कार्यगौरवात्। दिवारात्रमनिद्रैव स्नानभोजनवर्जिता।। (1-95-2) राजप्रेषणिका विप्राश्चतुरङ्गबलान्विताः। अद्य श्वो वा परश्वो वा समायान्तीति निस्चिता।। (1-95-3) दिनान्पक्षानृतून्मासानयनानि च सर्वशः। गण्यमानानि वर्षाणि व्यतीयुस्त्रीणि भारत।। (1-95-4)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— राजा दुष्यंत के प्रतिज्ञा करके लौट जाने पर, दिन-प्रतिदिन उन महात्मा की राजपुत्री शकुंतला का गर्भ बढ़ने लगा। राजा के कार्य की गंभीरता (राजकीय व्यस्तताओं) का स्मरण करती हुई शकुंतला दिन-रात अनिद्रा में, स्नान और भोजन से विरत होकर राजा का चिंतन करती रहती थीं। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि राजा द्वारा भेजी गई चतुरङ्गिणी सेना से युक्त दूत तथा ब्राह्मण आज, कल या परसों में अवश्य ही लेने आ रहे होंगे। इस प्रकार दिन, पक्ष, ऋतु, मास, अयन और संपूर्ण वर्षों की गणना करते-करते हे भारत! पूरे तीन वर्ष बीत गए।
व्याख्या: राजा दुष्यंत शकुंतला को वचन देकर अपनी राजधानी लौट जाते हैं, किंतु राजनैतिक व्यस्तताओं के कारण सेना या दूत भेजने में विलंब कर देते हैं। इधर शकुंतला राजा की प्रतीक्षा में अत्यंत व्याकुल होकर दिन-रात बिताती हैं और देखते-देखते तीन वर्ष बीत जाते हैं।
श्लोक 5-8
त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु ऋषेर्वचनगौरवात्। ऋषिपत्न्यः सुबहुशो हेतुमद्वाक्यमब्रुवन्।। (1-95-5) ऋषिपत्न्य ऊचुः। शृणु भद्रे लोकवृत्तं श्रुत्वा यद्रोचते तव। तत्कुरुष्व हितं देवि नावमान्यं गुरोर्वचः।। (1-95-6) देवानां दैवतं विष्णुर्विप्राणामग्निर्ब्रह्म च। नारीणाम् दैवतं भर्ता लोकानां ब्राह्मणो गुरुः।। (1-95-7) सूतिकाले प्रसूष्वेति भगवांस्ते पिताऽब्रवीत्। करिष्यामीति कर्तव्यं तदा ते सुकृतं भवेत्।। (1-95-8)
हिंदी अनुवाद: तीन वर्ष पूरे होने पर, ऋषि (कण्व) के वचनों की गरिमा को ध्यान में रखते हुए आश्रम की ऋषिपत्नियों ने शकुंतला से बहुत प्रकार की युक्तिसंगत बातें कहीं। ऋषिपत्नियों ने कहा— "हे भद्रे! लोक-व्यवहार को सुनो और सुनकर जो तुम्हें रुचिकर लगे, अपने हित के अनुसार वैसा ही करो। गुरु (पिता) का वचन कभी अवमान्य नहीं होना चाहिए। देवताओं के देवता विष्णु हैं, ब्राह्मणों के देवता अग्नि और ब्रह्म हैं, स्त्रियों के देवता उनके पति हैं और समस्त लोकों के गुरु ब्राह्मण हैं। तुम्हारे भगवान पिता (कण्व) ने कहा था कि 'सूतिका काल आने पर प्रसूति होना', अतः तुम्हें अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए, तभी तुम्हारा कल्याण होगा।"
व्याख्या: तीन वर्ष बीत जाने पर भी जब राजा की ओर से कोई संदेशवाहक नहीं आता, तब आश्रम की ऋषिपत्नियां शकुंतला को समझाती हैं कि अब बालक के जन्म का समय आ गया है, अतः उन्हें गुरुजनों की आज्ञा और लोक-मर्यादा का पालन करना चाहिए।
श्लोक 9-16
वैशंपायन उवाच। पत्नीनां वचनं श्रुत्वा साधु साध्वित्यचिन्तयत्। गर्भं सुषाव वामोरूः कुमारममितौजसम्।। (1-95-9) त्रिषु वर्षेषु पूर्णेषु प्राजायत शकुन्तला। रूपौदार्यगुणोपेतं दौष्यन्तिं जनमेजय।। (1-95-10) जाते तस्मिन्नन्तरिक्षात्पुष्पवृष्टिः पपात ह। देवदुन्दुभयो नेदुर्ननृतुश्चाप्सरोगणाः।। (1-95-11) गायद्भिर्मधुरं तत्र देवैः शक्रोऽभ्युवाच ह। शकुन्तले तव सुतश्चक्रवर्ती भविष्यति।। (1-95-12) बलं तेजश्च रूपं च न समं भुवि केनचित्। आहर्ता वाजिमेधस्य शतसङ्ख्यस्य पौरवः।। (1-95-13) अनेकारपि साहस्रै राजसूयादिभिर्मखैः। स्वार्थं ब्राह्मणसात्कृत्वा दक्षिणाममितां ददत्।। (1-95-14) देवतानां वचः श्रुत्वा कण्वाश्रमनिवासिनः। सभाजयन्तः कण्वस्य सुतां सर्वे महर्षयः।। (1-95-15) शकुन्तला च तच्छ्रुत्वा परं हर्षमवाप सा। द्विजानाहूय मुनिभिः सत्कृत्य च महायशाः।। (1-95-16)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— उन पत्नियों के वचनों को सुनकर 'यह बहुत ठीक है' ऐसा सोचकर सुंदर जंघा वाली उन शकुंतला ने अमित तेजस्वी कुमार को जन्म दिया। हे जनमेजय! पूरे तीन वर्ष बीतने पर शकुंतला ने रूप, उदारता और समस्त गुणों से संपन्न दुष्यंत के पुत्र को जन्म दिया। उसके उत्पन्न होते ही आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी, देवदुंदुभि बज उठीं और अप्सराओं के समूह नृत्य करने लगे। वहाँ मधुर स्वर में गाते हुए देवताओं के बीच देवराज इंद्र ने आकाशवाणी की— "हे शकुंतले! तुम्हारा यह पुत्र चक्रवर्ती सम्राट होगा। पृथ्वी पर इसके बल, तेज और रूप की समता करने वाला कोई नहीं होगा। यह पौरववंशी कुमार सौ अश्वमेध यज्ञों का अनुष्ठान करने वाला तथा हज़ारों राजसूय आदि महायज्ञों को संपन्न करने वाला होगा, जो यज्ञ में अपनी संपत्ति ब्राह्मणों को समर्पित कर असीम दक्षिणा देगा।" देवताओं के ये वचन सुनकर कण्वाश्रम में निवास करने वाले सभी महर्षियों ने कण्व की पुत्री (शकुंतला) का अभिनंदन किया। महायशा शकुंतला उन वचनों को सुनकर अत्यंत हर्षित हुईं और मुनियों के साथ ब्राह्मणों को बुलाकर उनका सत्कार किया।
व्याख्या: तीन वर्ष की प्रतीक्षा के पश्चात शकुंतला एक अत्यंत तेजस्वी और दिव्य गुणों से युक्त पुत्र को जन्म देती हैं। बालक के जन्म पर आकाश से पुष्पवर्षा होती है और स्वयं देवराज इंद्र भविष्यवाणी करते हैं कि यह बालक आगे चलकर महान चक्रवर्ती सम्राट और सौ अश्वमेध यज्ञों का कर्ता बनेगा।
श्लोक 17-18
जातकर्मादिसंस्कारं कण्वः पुण्यवतां वरः। तस्याथ कारयामास वर्धमानस्य चासकृत्।। (1-95-17) यथाविधि यथान्यायं क्रियाः सर्वास्त्वकारयत्। दन्तैः शुक्लैः शिखरिभिःसिंहसंहननोऽभवत्।। (1-95-18)
हिंदी अनुवाद: पुण्यवानों में श्रेष्ठ महर्षि कण्व ने उस निरंतर बढ़ते हुए बालक के जातकर्म आदि सभी संस्कार विधिपूर्वक और यथान्याय संपन्न करवाए। शिखरों के समान सफेद और सुंदर दाँतों वाले तथा सिंह के समान बलवान व पराक्रमी शरीर (सिंहसंहनन) वाले वे कुमार बढ़ने लगे।
व्याख्या: महर्षि कण्व आश्रम लौटकर अपने इस दौहित्र (नाती) के सभी वैदिक संस्कार विधि-विधान से पूरे करवाते हैं। वह बालक धीरे-धीरे सिंह के समान पराक्रमी और सुंदर शारीरिक लक्षणों से युक्त होकर बढ़ने लगता है।
श्लोक 19-21
चक्राङ्कितकरः श्रीमान्स्वयं विष्णुरिवापरः। चतुष्किष्कुर्महातेजा महामूर्धा महाबलः।। (1-95-19) कुमारो देवगर्भाभः स तत्राशु व्यवर्धत। ऋषेर्भयात्तु दुष्यन्तः स्मरन्नैवाह्वयत्तदा।। (1-95-20) गते काले तु महति न सस्मार तपोधनाम्। षड्वर्षेषु ततो बालः कण्वाश्रमपदं प्रति।। (1-95-21)
हिंदी अनुवाद: जिनके हाथों में चक्र के चिह्न हैं, जो श्रीमान् और स्वयं दूसरे विष्णु के समान प्रतीत होते हैं, चार किष्कु (हाथ) लंबे, महातेजस्वी, बड़े मस्तक वाले और महाबली थे— वे देवगर्भ के समान सुंदर कुमार वहाँ शीघ्रता से बढ़ने लगे। इधर महर्षि (कण्व) के भय से राजा दुष्यंत ने याद करते हुए भी उन्हें (शकुंतला को) उस समय नहीं बुलाया। बहुत समय बीत जाने पर वे तपोधनी शकुंतला को याद नहीं रख पाए। तब जब वह बालक छह वर्ष का हुआ, कण्वाश्रम के क्षेत्र में...
व्याख्या: बालक सर्वदमन के असीम शारीरिक लक्षणों और देवतुल्य तेज का वर्णन किया गया है। साथ ही यह प्रसंग भी स्पष्ट किया जाता है कि राजनैतिक व्यस्तताओं या कण्व ऋषि के कोप के भय के कारण दुष्यंत ने लंबे समय तक शकुंतला को बुलवाने की सुधि नहीं ली।
श्लोक 22-25
व्याघ्रान्सिंहान्वराहांश्च वृकांश्च महिषांस्तथा। ऋक्षांश्चाभ्यहनद्व्यालान्पद्भ्यामाश्रमपीडकान्।। (1-95-22) बलाद्भुजाभ्यां संगृह्य बलवान्संनियम्य च। बद्ध्वा वृक्षेषु दौष्यन्तिराश्रमस्य समन्ततः।। (1-95-23) आरुरोह द्रुमांश्चैव क्रीडन्स्म परिधावति। वनं च लोडयामास सिंहव्याघ्रगणैर्वृतम्।। (1-95-24) ततश्च राक्षसान्सर्वान्पिशाचांश्च रिपून्रणे। मुष्टियुद्धेन तान्हत्वा ऋषीनाराधयत्तदा।। (1-95-25)
हिंदी अनुवाद: ...छह वर्ष की आयु में वह बालक आश्रम को पीड़ा पहुँचाने वाले व्याघ्र, सिंह, वराह, वृक (भेड़िया), महिषासुर (भैंसे), रीछ और अन्य भयानक जीवों को अपने पैरों से कुचलकर पकड़ लेता था। वह बलवान दौष्यन्ति (दुष्यंत का पुत्र) अपनी दोनों भुजाओं से बलपूर्वक उन्हें पकड़कर, नियंत्रित कर आश्रम के चारों ओर वृक्षों से बाँध देता था। वह पेड़ों पर चढ़ जाता था और क्रीड़ा करता हुआ इधर-उधर दौड़ता था। सिंह और व्याघ्रों के समूहों से घिरे हुए उस वन में वह हुड़दंग मचा देता था। तदनन्तर युद्ध में मुष्टियुद्ध (घूंसों की लड़ाई) के द्वारा सभी राक्षसों और पिशाचों रूपी शत्रुओं को मारकर उसने उस समय ऋषियों को प्रसन्न किया था।
व्याख्या: छह वर्ष की अल्प आयु में ही बालक सर्वदमन का अद्भुत पराक्रम सामने आता है। वह जंगल के हिंसक पशुओं और राक्षसों को अपने भुजबल से वश में कर लेता है और आश्रम के ऋषियों की रक्षा करता है।
श्लोक 26-31
कश्चिद्दितिसुतस्तं तु हन्तुकामो महाबलः। वध्यमानांस्तु दैतेयानमर्षी तं समभ्ययात्।। (1-95-26) तमागतं प्रहस्यैव बाहुभ्यां परिगृह्य च। दृढं चाबध्य बाहुभ्यां पीडयामास तं तदा।। (1-95-27) मर्दितो न शशाकास्मान्मोचितुं बलवत्तया। प्राक्रोशद्भैरवं तत्र द्वारेभ्यो निःसृतं त्वसृक्।। (1-95-28) तेन शब्देन वित्रस्ता मृगाः सिंहादयो गणाः। सुस्रुवुश्च शकृन्मूत्रमाश्रमस्थाश्च सुस्रुवुः।। (1-95-29) निरसुं जानुभिः कृत्वा विससर्ज च सोऽपतत्। तद्दृष्ट्वा विस्मयं जग्मुः कुमारस्य विचेष्टितम्।। (1-95-30) नित्यकालं वध्यमाना दैतेया राक्षसैः सह। कुमारस्य भयादेव नैव जग्मुस्तदाश्रमम्।। (1-95-31)
हिंदी अनुवाद: कोई महाबली दैत्य (दितिपुत्र) उस बालक को मारना चाहता था। दैत्यों का वध होते देख अमर्षी (क्रोधित) होकर वह दैत्य उस बालक की ओर झपटा। अपने पास आए हुए उस दैत्य को बालक ने हँसते-हँसते अपनी दोनों भुजाओं में जकड़ लिया और अपनी मजबूत बाहों से उसे कसकर पीस डाला। बालक के अत्यधिक बल के कारण कुचला गया वह दैत्य स्वयं को छुड़ा नहीं सका और उसके अंगों के द्वारों (मुँह-नाक आदि) से भयानक चीख के साथ खून बहने लगा। उस भयानक शब्द से आश्रम के मृग, सिंह आदि सभी पशु भयभीत होकर मल-मूत्र त्यागने लगे और आश्रमवासी भी काँप उठे। बालक ने उसे अपने घुटनों से कुचलकर प्राणहीन कर दिया और फेंक दिया। कुमार के इस पराक्रम को देखकर सब लोग विस्मय में डूब गए। दैत्यों और राक्षसों के साथ जो दैत्य नित्यप्रति उपद्रव करते थे, वे अब इस कुमार के भय से कण्वाश्रम की ओर कभी नहीं जाते थे।
व्याख्या: बालक की अलोकसमान शक्ति का एक और पराक्रमी प्रसंग यहाँ वर्णित है, जहाँ वह एक शक्तिशाली दैत्य को अकेले ही परास्त कर देता है। उसके इस भीषण पराक्रम के कारण आश्रम में राक्षसों का उपद्रव पूरी तरह समाप्त हो जाता है।
श्लोक 32-36
ततोऽस्य नाम चक्रुस्ते कण्वाश्रमनिवासिनः। कण्वेन सहिताः सर्वे दृष्ट्वा कर्मातिमानुषम्।। (1-95-32) अस्त्वयं सर्वदमनः सर्वं हि दमयत्यसौ। स सर्वदमनो नाम कुमारः समपद्यत।। (1-95-33) विक्रमेणौजसा चैव बलेन च समन्वितः। अप्रेषयति दुष्यन्ते महिष्यास्तनयस्य च।। (1-95-34) पाण्डुभावपरीताङ्गीं चिन्तया समभिप्लुताम्। लम्बालकां कृशां दीनां तथा मलिनवाससम्।। (1-95-35) शकुन्तलां च संप्रेक्ष्य प्रदध्यौ स मुनिस्तदा। शास्त्राणि सर्ववेदाश्च द्वादशाब्दस्य चाभवन्।। (1-95-36)
हिंदी अनुवाद: तब महर्षि कण्व के साथ कण्वाश्रम के सभी निवासियों ने उसके इस अतिमानुष (अलौकिक) कर्म को देखकर उसका नामकरण किया— "चूंकि यह सबको वश में कर लेता है (दमन करता है), अतः इसका नाम 'सर्वदमन' हो।" इस प्रकार वह कुमार पराक्रम, ओज और बल से संपन्न 'सर्वदमन' नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह विक्रम, ओज और बल से युक्त था। राजा दुष्यंत द्वारा अपनी महिषी (पत्नी) और पुत्र के पास कोई दूत न भेजने के कारण, पाण्डुर वर्ण (पीले पड़ चुके अंगों वाली), चिंता से ग्रस्त, लटकी हुई लटों वाली, दुबली-पतली, दीन और मलिन वस्त्र पहने हुई शकुंतला को देखकर वह मुनि (कण्व) मन ही मन विचार करने लगे। इधर बारह वर्ष की आयु होने पर वह कुमार सभी शास्त्रों और वेदों में पारंगत हो गया।
व्याख्या: अतिमानुष कर्मों के कारण आश्रमवासियों द्वारा बालक का नाम 'सर्वदमन' रखा जाता है। दूसरी ओर, बारह वर्ष बीत जाने पर भी राजा दुष्यंत की ओर से कोई सुधि न लिए जाने के कारण शकुंतला की दुर्दशा और चिंता को देखकर महर्षि कण्व गंभीर चिंतन में लीन हो जाते हैं, जबकि बालक सर्वदमन अल्पायु में ही समस्त वेदों और शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लेता है।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चनवतितमोऽध्यायः।। 95 ।।
