श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुर्नवतितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुर्नवतितमोऽध्यायः

श्लोक 1-4

दुष्यन्त उवाच। सुव्यक्तं राजपुत्री त्वं यथा कल्याणि भाषसे। भार्या मे भव सुश्रोणि ब्रूहि किं करवाणि ते।। (1-94-1) सुवर्णमालां वासांसि कुण्डले परिहाटके। नानापत्तनजे शुभ्रे मणिरत्ने च शोभने।। (1-94-2) आहरामि तवाद्याहं निष्कादीन्यजिनानि च। सर्वं राज्यं तवाद्यास्तु भार्या मे भव शोभने।। (1-94-3) गान्धर्वेण च मां भीरु विवाहेनैहि सुन्दरि। विवाहानां हि रम्भोरु गान्धर्वः श्रेष्ठ उच्यते।। (1-94-4)

हिंदी अनुवाद: दुष्यंत ने कहा— "हे कल्याणि! जिस प्रकार तुम बोलती हो, उससे स्पष्ट है कि तुम राजपुत्री हो। हे सुश्रोणि! तुम मेरी पत्नी बन जाओ, बताओ मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? हे शोभने! आज ही मैं तुम्हारे लिए सुवर्णमाला, वस्त्र, शुद्ध स्वर्ण के कुंडल, नाना प्रकार के पत्तनों में उत्पन्न होने वाले सुंदर मणिरत्न, निष्क (स्वर्णमुद्राएँ) और मृगचर्म आदि ले आऊँगा। यह संपूर्ण राज्य आज से तुम्हारा हो जाए, हे शोभने! तुम मेरी पत्नी बन जाओ। हे भीरु सुन्दरी! तुम गंधर्व विवाह द्वारा मेरी हो जाओ। हे रम्भोरु! सभी विवाहों में गंधर्व विवाह ही श्रेष्ठ कहा गया है।"

व्याख्या: राजा दुष्यंत शकुंतला के राजसी वचनों और कुल का परिचय पाकर पूरी तरह आश्वस्त हो जाते हैं और उन्हें अपनी रानी बनाने का प्रस्ताव देते हुए गंधर्व विवाह करने का आग्रह करते हैं।

श्लोक 5-8

शकुन्तलोवाच। फलाहारो गतो राजन्पिता मे इत आश्रमात्। मुहूर्तं संप्रतीक्षस्व स मां तुभ्यं प्रदास्यति।। (1-94-5) पिता हि मे प्रभुर्नित्यं दैवतं परमं मम। यस्मै मां दास्यति पिता स मे भर्ता भविष्यति।। (1-94-6) पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्रस्तु स्थाविरे भावे न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति।। (1-94-7) समन्यमाना राजेन्द्र पितरं मे तपस्विनम्। अधर्मेण हि धर्मिष्ठ कथं वरमुपास्महे।। (1-94-8)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोली— "हे राजन्! मेरे पिता फल लाने के लिए इस आश्रम से गए हैं, आप थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए, वे स्वयं ही आपको मेरा दान करेंगे (मेरा विवाह आपसे करेंगे)। पिता ही मेरे सदा प्रभु और परम देवता हैं। मेरे पिता जिसे मुझे सौंपेंगे, वही मेरे पति होंगे। बाल्यावस्था में पिता रक्षा करते हैं, यौवन में पति रक्षा करते हैं और वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है, स्त्री कभी स्वतंत्रता की अधिकारी नहीं होती। हे राजेन्द्र! धर्मिष्ठ होकर भी आप मेरे तपस्वी पिता के क्रोध की उपेक्षा करते हुए अधर्मपूर्वक कैसे इस वर (विवाह) का उपभोग कर सकते हैं?"

व्याख्या: शकुंतला अपनी मर्यादा, कुल-परंपरा और पितृभक्ति का परिचय देते हुए राजा दुष्यंत से कहती हैं कि वे महर्षि कण्व की अनुमति के बिना गांधर्व विवाह नहीं करेंगी, क्योंकि स्त्री स्वतंत्र नहीं होती और पिता की आज्ञा सर्वोपरि है।

श्लोक 9-12

दुष्यन्त उवाच। मामैवं वद कल्याणि तपोराशिं दमात्मकम्। शकुन्तलोवाच। मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्राः शस्त्रपाणयः।। (1-94-9) मन्युना घ्नन्ति ते शत्रून्वज्रेणेन्द्र इवासुरान्। अग्निर्दहति तेजोभिः सूर्यो दहति रश्मिभिः।। (1-94-10) राजा दहति दण्डेन ब्राह्मणो मन्युना दहेत्। क्रोधिता मन्युना घ्नन्ति वज्रपाणिरिवासुरान्।। (1-94-11) दुष्यन्त उवाच। जाने भद्रे महर्षिं तं तस्य मन्युर्न विद्यते।' इच्छामि त्वां वरारोहे भजमानामनिन्दिते। त्वदर्थं मां स्थितं विद्धि त्वद्गतं हि मनो मम।। (1-94-12)

हिंदी अनुवाद: दुष्यंत ने कहा— "हे कल्याणि! तपोराशि और शांत चित्त वाले मुनि के विषय में ऐसा मत कहो।" शकुंतला बोली— "ब्राह्मणों का अस्त्र उनका क्रोध (मन्यु) होता है, वे शस्त्रपाणि (हाथ में हथियार रखने वाले) नहीं होते। वे अपने क्रोध से शत्रुओं का नाश वैसे ही कर देते हैं जैसे इंद्र वज्र से असुरों का नाश करते हैं। अग्नि अपने तेज से जलाती है, सूर्य अपनी किरणों से जलाता है, राजा अपने दंड से दण्डित करता है और ब्राह्मण अपने क्रोध से जला देता है। क्रुद्ध होने पर ब्राह्मण वज्रपाणि इंद्र की भाँति असुरों का संहार कर देते हैं।" दुष्यंत ने कहा— "हे भद्रे! मैं उन महर्षि को अच्छी तरह जानता हूँ, उनके हृदय में क्रोध नहीं है। हे अनिंदिते वरारोहे! मैं तुम्हें अपनी भजन करने वाली (प्रेम करने वाली) देखना चाहता हूँ। तुम यह जान लो कि मैं तुम्हारे लिए ही यहाँ स्थित हूँ और मेरा मन पूरी तरह तुममें ही लीन हो चुका है।"

व्याख्या: जब राजा दुष्यंत कण्व ऋषि के क्रोध से निडर रहने की बात कहते हैं, तो शकुंतला उन्हें ब्राह्मणों के तपोबल और क्रोध की शक्ति से अवगत कराती हैं। इसके बाद दुष्यंत अपना गाढ़ प्रेम प्रकट करते हैं।

श्लोक 13-20

आत्मनो बन्धुरात्मैव गतिरात्मैव चात्मनः। आत्मनैवात्मनो दानं कर्तुमर्हसि धर्मतः।। (1-94-13) अष्टावेव समासेन विवाहा धर्मतः स्मृताः। ब्राह्मो दैवस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्तथाऽऽसुरः।। (1-94-14) गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमः स्मृतः। तेषां धर्म्यान्यथापूर्वं मनुः स्वायंभुवोऽब्रवीत।। (1-94-15) प्रशस्तांश्चतुरः पूर्वान्ब्राह्मणस्योपधारय। षडानुपूर्व्या क्षत्रस्य विद्धि धर्म्याननिन्दिते।। (1-94-16) राज्ञां तु राक्षसोऽप्युक्तो विट्शूद्रेष्वासुरः स्मृतः। पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या अधर्म्यौ द्वौ स्मृताविह।। (1-94-17) पैशाच आसुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन। अनेन विधिना कार्यो धर्मस्यैषा गतिः स्मृता।। (1-94-18) गान्धर्वराक्षसौ क्षत्रे धर्म्यौ तौ मा विशङ्किथाः। पृथग्वा यदि वा मिश्रौ कर्तव्यौ नात्र संशयः।। (1-94-19) सा त्वं मम सकामस्य सकामा वरवर्णिनी। गान्धर्वेण विवाहेन भार्या भवितुमर्हसि।। (1-94-20)

हिंदी अनुवाद: "आत्मा ही अपना बंधु है और आत्मा ही अपनी गति है, अतः धर्म के अनुसार तुम स्वयं ही अपनी आत्मा का दान (विवाह) करने योग्य हो। धर्म के अनुसार संक्षेप में आठ प्रकार के विवाह कहे गए हैं— ब्राह्म, दैवीय, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गंधर्व, राक्षस और आठवाँ पैशाच। स्वायंभुव मनु ने इनमें से धर्मयुक्त विवाहों का क्रमानुसार वर्णन किया है। इनमें से आरंभ के चार विवाह ब्राह्मण के लिए प्रशस्त (उत्तम) हैं। हे अनिन्दिते! क्षत्रिय के लिए क्रम से छह विवाह धर्मसम्मत कहे गए हैं। राजाओं के लिए राक्षस विवाह भी कहा गया है तथा वैश्य और शूद्रों के लिए आसुर विवाह माना गया है। इन पाँच (ब्राह्म आदि पाँच) में से तीन धर्म्य (उत्तम) और दो अधर्म्य कहे गए हैं। पैशाच और आसुर विवाह कभी नहीं करने चाहिए, धर्म की गति का यही विधान है। क्षत्रियों के लिए गंधर्व और राक्षस विवाह धर्मयुक्त हैं, अतः तुम इसमें कोई शंका मत करो। ये दोनों अलग-अलग या मिलकर भी किए जा सकते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। इसलिए हे वरवर्णिनी! तुम भी मेरी ही तरह काम-ना से युक्त हो, अतः गंधर्व विवाह द्वारा मेरी पत्नी बनने की कृपा करो।"

व्याख्या: राजा दुष्यंत शकुंतला को शास्त्र सम्मत आठ प्रकार के विवाहों का उपदेश देते हैं और समझाते हैं कि क्षत्रियों के लिए गंधर्व विवाह पूर्णतः धर्मसम्मत है, इसलिए उन्हें बिना किसी संकोच के इस विवाह को स्वीकार करना चाहिए।

श्लोक 21-22

शकुन्तलोवाच। यदि धर्मपथस्त्वेव यदि चात्मा प्रभुर्मम। प्रदाने पौरवश्रेष्ठ शृणु मे समयं प्रभो।। (1-94-21) सत्यं मे प्रतिजानीहि यथा वक्ष्याम्यहं रहः। मयि जायेत यः पुत्रः स भवेत्त्वदनन्तरः।। (1-94-22)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोली— "हे पौरवश्रेष्ठ प्रभो! यदि यह मार्ग धर्मसम्मत है और यदि मैं अपनी आत्मा की स्वयं मालकिन (स्वतंत्र) हूँ, तो मेरे इस विवाह संबंधी शर्त (नियम) को सुनिए। आप मुझे एकांत में सत्य-सत्य प्रतिज्ञा दीजिए कि— 'मुझसे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वही आपके बाद आपके राज्य का उत्तराधिकारी (राज्यासन का अधिकारी) बनेगा।'"

व्याख्या: शकुंतला राजा दुष्यंत के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले एक शर्त रखती हैं कि उनसे उत्पन्न होने वाला पुत्र ही दुष्यंत के बाद राजा बनेगा, जिससे उनके वंश और अधिकारों की रक्षा हो सके।

श्लोक 23-28

युवराजो महाराज सत्यमेतद्ब्रवीमि ते। यद्येतदेवं दुष्यन्त अस्तु मे सङ्गमस्त्वया।। (1-94-23) वैशंपायन उवाच। तस्यास्तु सर्वं संश्रुत्य यथोक्तं स विशांपतिः। दुष्यन्तः पुनरेवाह यद्यदिच्छसि तद्वद।। (1-94-24) शकुन्तलोवाच। ख्यातो लोकप्रवादोयं विवाह इति शास्त्रतः। वैवाहिकीं क्रियां सन्तः प्रशंसन्ति प्रजाहिताम्।। (1-94-25) लोकप्रवादशान्त्यर्थं विवाहं विधिना कुरु। सन्त्यत्र यज्ञपात्राणि दर्भाः सुमनसोऽक्षताः।। (1-94-26) यथा युक्तो विवाहः स्यात्तथा युक्ता प्रजा भवेत्। तस्मादाज्यं हविर्लाजाः सिकता ब्राह्मणास्तव।। (1-94-27) वैवाहिकानि चान्यानि समस्तानीह पार्थिव। दुरुक्तमपि राजेन्द्र क्षन्तव्यं धर्मकारणात्।। (1-94-28)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोली— "हे महाराज! हे युवराज दुष्यंत! मैं आपसे यह सत्य कहती हूँ कि यदि ऐसा (पुत्र के उत्तराधिकारी होने की बात) है, तभी मेरा आपके साथ संगम हो।" वैशंपायन जी ने कहा— राजा दुष्यंत ने उसकी वह सारी बात वैसे ही स्वीकार करके फिर कहा— "जो कुछ तुम चाहती हो, वह सब कहो।" शकुंतला बोली— "शास्त्रों के अनुसार 'विवाह' ही लोक में प्रसिद्ध लोकप्रवाद (मान्यता) है। संत पुरुष प्रजा के हितकारी इस वैवाहिक संस्कार की ही प्रशंसा करते हैं। इसलिए लोक-निंदा या लोकप्रवाद को शांत करने के लिए आप विधिपूर्वक विवाह कीजिए। यहाँ यज्ञपात्र, दर्भ (कुशा), पुष्प और अक्षत सभी कुछ मौजूद हैं। जिस प्रकार विधि-युक्त विवाह होता है, उसी प्रकार उससे उत्पन्न होने वाली प्रजा भी सुसंस्कृत होती है। इसलिए हे पार्थिव! आपके लिए यहाँ आज्य (घी), हविष्य, लावा, रेत (वेदिका के लिए) और ब्राह्मण आदि सब कुछ उपलब्ध है। विवाह से संबंधित अन्य समस्त सामग्रियाँ भी यहाँ मौजूद हैं। हे राजेन्द्र! धर्म के कारण यदि मुझसे कुछ अनुचित भी कहा गया हो, तो आपको उसे क्षमा करना चाहिए।"

व्याख्या: शकुंतला अपनी शर्त मनवाने के बाद राजा दुष्यंत के समक्ष यह आग्रह करती हैं कि केवल गंधर्व रूप से ही नहीं, बल्कि लोक-मर्यादा और शास्त्रोक्त विधि (यज्ञीय सामग्री, दर्भ व पुरोहित की उपस्थिति) के अनुसार विधिवत विवाह संपन्न होना चाहिए, ताकि भविष्य में समाज में कोई प्रश्न न उठे।

श्लोक 29-34

वैशंपायन उवाच। एवमस्त्विति तां राजा प्रत्युवाचाविचारयन्। अपि च त्वां हि नेष्यामि नगरं स्वं शुचिस्मिते।। (1-94-29) यथा त्वमर्हा सुश्रोणि मन्यसे तद्ब्रवीमि ते। एवमुक्त्वा स राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम्।। (1-94-30) पुरोहितं समाहूय वचनं युक्तमब्रवीत्। राजपुत्र्या यदुक्तं वै न वृथा कर्तुमुत्सहे।। (1-94-31) क्रियाहीनो हि न भवेन्मम पुत्रो महाद्युतिः। तथा कुरुष्व शास्त्रोक्तं विवाहं मा चिरंकुरु।। (1-94-32) एवमुक्तो नृपतिना द्विजः परमयन्त्रितः। शोभनं राजराजेति विधिना कृतवान्द्विजः।। (1-94-33) शासनाद्विप्रमुख्यस्य कृतकौतुकमङ्गलः। जग्राह विधिवत्पाणावुवास च तया सह।। (1-94-34)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— राजा ने बिना किसी संकोच के "एवमस्तु" (ऐसा ही हो) कहकर उससे कहा— "हे शुचिस्मिते! मैं तुम्हें अपने नगर ले चलूँगा। हे सुश्रोणि! तुम जैसी उचित समझती हो, मैं वैसा ही करूँगा।" ऐसा कहकर उस राजर्षि ने अनिंदितगामिनी शकुंतला से तथा अपने पुरोहित को बुलाकर यह उचित बात कही— "राजपुत्री ने जो कुछ कहा है, मैं उसे व्यर्थ नहीं होने देना चाहता। मेरा महातेजस्वी पुत्र संस्कारहीन न हो, अतः आप शास्त्रोक्त विधि से विवाह संपन्न कराइए, इसमें देर मत कीजिए।" राजा द्वारा ऐसा कहे जाने पर उन श्रेष्ठ द्विज (पुरोहित) ने अत्यंत प्रसन्नता के साथ "राजराज! बहुत अच्छा" कहकर विधिपूर्वक विवाह संपन्न कराया। विप्रमुख्य (पुरोहित) की आज्ञा से विवाह के सभी कौतुक-मंगल कार्य संपन्न हुए और राजा दुष्यंत ने विधि-विधान से शकुंतला का पाणिग्रहण (विवाह) किया तथा उनके साथ कुछ समय तक वहाँ निवास किया।

व्याख्या: राजा दुष्यंत शकुंतला की बात मानकर अपने साथ आए पुरोहित को निर्देश देते हैं, जो तपोवन में ही शास्त्रोक्त विधि और वैदिक मंत्रोच्चार के साथ उनका विवाह संपन्न कराते हैं।

श्लोक 35-39

विश्वास्य चैनां स प्रायादब्रवीच्च पुनः पुनः। प्रेषयिष्ये तवार्थाय वाहिनीं चतुरङ्गिणीम्।। (1-94-35) त्रैविद्यवृद्धैः सहितां नानाराजजनैः सह। शिबिकासहस्रैः सहिता वयमायान्ति बान्धवाः।। (1-94-36) मूकाश्चैव किराताश्च कुब्जा वामनकैः सह। सहिताः कञ्चुकिवरैर्वाहिनी सूतमागधैः।। (1-94-37) शङ्खदुन्दुभिनिर्घोषैर्वनं च समुपैष्यति। तथा त्वामानयिष्यामि नगरं स्वं शुचिस्मिते।। (1-94-38) अन्यथा त्वां न नेष्यामि स्वनिवेशमसत्कृताम्। सर्वमङ्गलसत्कारैः सुभ्रु सत्यं करोमि ते।। (1-94-39)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला को आश्वस्त करके और बार-बार यह कहकर कि वे प्रस्थान कर रहे हैं, राजा ने कहा— "मैं तुम्हारे पास चतुरङ्गिणी सेना भेजूँगा। वेदज्ञ ब्राह्मणों, नाना प्रकार के राजकर्मचारियों, हजारों पालकियों और संबंधियों के साथ वह सेना आएगी। मूक, किरात, कुब्ज (बौने), वामन, श्रेष्ठ कंचुकी तथा सूत और मागधों से युक्त वह वाहिनी शंख और दुंदुभि के गगनभेदी घोष के साथ इस वन में पहुँचेगी। हे शुचिस्मिते! उसी प्रकार राजकीय ठाट-बाट से मैं तुम्हें अपने नगर ले आऊंगा। हे सुभ्रु! मैं तुमसे सत्य कहता हूँ कि बिना संपूर्ण मंगलों और सत्कार के मैं तुम्हें असम्मानित रूप से अपने घर नहीं ले जाऊँगा।"

व्याख्या: विवाह के पश्चात राजा दुष्यंत अपने राज्य लौटने की तैयारी करते हैं। वे शकुंतला को वचन देते हैं कि वे जल्द ही अपनी पूरी राजकीय सेना, पालकियों और लवाजमे के साथ उन्हें पूरी शान-शौकत से अपनी राजधानी ले जाने के लिए प्रबंध करेंगे।

श्लोक 40-46

वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा स राजर्षिस्तामनिन्दितगामिनीम्। परिष्वज्य च बाहुभ्यां स्मितपूर्वमुदैक्षत।। (1-94-40) प्रदक्षिणीकृतां देवीं पुनस्तां परिषस्वजे। शकुन्तला सा सुमुखी पपात नृपपादयोः।। (1-94-41) तां देवीं पुनरुत्थाप्य मा शुचेति पुनः पुनः। शपेयं सुकृतेनैव प्रापयिष्ये नृपात्मजे।। (1-94-42) इति तस्याः प्रतिश्रुत्य स नृपो जनमेजय। मनसा चिन्तयन्प्रायात्काश्यपं प्रति पार्थिव।। (1-94-43) भगवांस्तपसा युक्तः श्रुत्वा किं नु करिष्यति। तं न प्रसाद्यागतोऽहं प्रसीदेति द्विजोत्तमम्। एवं संचिन्तयन्नेव प्रविवेश स्वकं पुरम्।। (1-94-44) ततो मुहूर्ते याते तु कण्वोऽप्याश्रममागमत्। शकुन्तला च पितरं ह्रिया नोपजगाम तम्।। (1-94-45) शङ्कितेव च विप्रर्षिमुपचक्राम सा शनैः। ततोऽस्य भारं जग्राह आसनं चाप्यकल्पयत्।। (1-94-46)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— हे जनमेजय! ऐसा कहकर उस राजर्षि ने अनिंदितगामिनी शकुंतला को अपनी भुजाओं में भरकर आलिंगन किया और मुस्कुराते हुए उनकी ओर देखा। देवी रूप शकुंतला की प्रदक्षिणा करके उन्होंने पुनः उनका आलिंगन किया। सुंदर मुख वाली वे शकुंतला राजा के चरणों में गिर पड़ीं। तब उन देवी को उठाकर राजा ने बार-बार कहा— "विलाप मत करो, मैं अपने पुण्यों की शपथ लेकर कहता हूँ कि हे नृपात्मजे! मैं तुम्हें शीघ्र ही अपने पास बुलवा लूँगा।" ऐसा प्रतिश्रुत (वचन) देकर वे राजर्षि मन में महर्षि काश्यप (कण्व) के विषय में चिंता करते हुए अपनी राजधानी की ओर चल पड़े। "तपस्या से युक्त भगवान कण्व यह सुनकर क्या करेंगे? मैं उस द्विजोत्तम को 'प्रसन्न होइए' कहकर प्रसादित (शांत) किए बिना ही लौट आया हूँ"—यही सब सोचते हुए वे अपने नगर में प्रवेश कर गए। तदन्तर, कुछ ही मुहूर्त बीतने पर महर्षि कण्व भी आश्रम में लौट आए। संकोच और लज्जा के कारण शकुंतला अपने पिता के पास नहीं जा सकीं। वे किसी संकित (भयभीत) की भाँति धीरे-धीरे विप्रर्षि के पास गईं और तब उनके भार (सामान आदि) को ग्रहण किया तथा उनके बैठने के लिए आसन की व्यवस्था की।

व्याख्या: राजा दुष्यंत शकुंतला को गाढ़ आलिंगन देकर और शीघ्र ही अपने पास बुलवाने का दृढ वचन देकर अपनी राजधानी हस्तिनापुर लौट जाते हैं। उनके जाने के थोड़ी ही देर बाद महर्षि कण्व आश्रम लौट आते हैं, और शकुंतला लज्जा व संकोच के कारण उनके सामने जाने में हिचकिचाती हैं।

श्लोक 47-50

प्राक्षालयच्च सा पादौ काश्यपस्य महात्मनः। न चैनं लज्जयाऽशक्नोदक्षिभ्यामभिवीक्षितुम्।। (1-94-47) शकुन्तला च सव्रीडा तमृषिं नाभ्यभाषत। तस्मात्स्वधर्मात्स्खलिता भीता सा भरतर्षभ।। (1-94-48) अभवद्दोषदर्शित्वाद्ब्रह्मचारिण्ययन्त्रिता। स तदा व्रीडितां दृष्ट्वा ऋषिस्तां प्रत्यभाषत।। (1-94-49) कण्व उवाच। सव्रीडैव च दीर्घायुः पुरेव भविता न च। वृत्तं कथय रम्भोरु मा त्रासं च प्रकल्पय।। (1-94-50)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला ने महात्मा काश्यप (कण्व) के चरण धोए, किंतु लज्जा के कारण वे अपनी आँखों से उनकी ओर देखने में असमर्थ थीं। हे भरतर्षभ! लज्जा से युक्ता शकुंतला उस ऋषि से कुछ बोल नहीं पाईं। अपने स्वधर्म (ब्रह्मचर्य/कुमार्य धर्म) से विचलित होने और दोषयुक्त आचरण करने के कारण वह ब्रह्मचारिणी भयभीत थीं। तब उन लज्जित बालिका को देखकर महर्षि कण्व ने कहा— "हे रम्भोरु! तुम लज्जा से युक्त हो, तुम्हारी आयु दीर्घ हो, और तुम्हारा आचरण पहले के समान ही रहेगा। जो कुछ हुआ है, उसे सच-सच कहो, मन में कोई भय मत रखो।"

व्याख्या: महर्षि कण्व आश्रम लौटते हैं तो शकुंतला लज्जा और भय के कारण उनके सामने देखने में संकोच करती हैं। अंतर्यामी महर्षि कण्व अपनी योगदृष्टि से सब कुछ जान लेते हैं और शकुंतला को अभयदान देते हुए पूरी घटना सच-सच बताने को कहते हैं।

श्लोक 51-57

वैशंपायन उवाच। ततः प्रक्षाल्य पादौ सा विश्रान्तं पुनरब्रवीत्। निधाय कामं तस्यर्षेः कन्दानि च फलानि च।। (1-94-51) ततः संवाह्य पादौ सा विश्रान्तं वेदिमध्यमा। शकुन्तला पौरवाणां दुष्यन्तं जग्मुषी पतिम्।। (1-94-52) ततः कृच्छ्रादतिशुभा सव्रीडा श्रमती तदा। सगद्गदमुवाचेदं काश्यपं सा शुचिस्मिता।। (1-94-53) शकुन्तलोवाच। राजा ताताजगामेह दुष्यन्त इलिलात्मजः। मया पतिर्वृतो योऽसौ दैवयोगादिहागतः।। (1-94-54) तस्य तात प्रसीद त्वं भर्ता मे सुमहायशाः। अतः सर्वं तु यद्वृत्तं दिव्यज्ञानेन पश्यसि।। (1-94-55) अभयं क्षत्रियकुले प्रसादं कर्तुमर्हसि। वैशंपायन उवाच। चक्षुषा स तु दिव्येन सर्वं विज्ञाय काश्यपः।। (1-94-56) ततो धर्मिष्ठतां मत्वा धर्मे चास्खलितं मनः। उवाच भगवान्प्रीतस्तद्वृत्तं सुमहातपाः।। (1-94-57)

हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— तदनन्तर उनके चरण धोकर, ऋषि के कंद-मूल और फल आदि सुरक्षित रखकर, और उनके पैरों को दबाकर जब वे विश्राम कर चुके, तब पौरव वंश के श्रेष्ठ राजा दुष्यंत को अपने पति के रूप में प्राप्त करने वाली वे वेदिमध्यमा (सुंदर कटिप्रदेश वाली) शकुंतला ने बात आगे बढ़ाई। तब अत्यंत कठिनाई से, लज्जा और संकोच से काँपते हुए, उस शुचिस्मिता (सुंदर हँसी वाली) ने गद्गद वाणी में काश्यप जी से यह कहा— "हे तात! इलिन के पुत्र राजा दुष्यंत दैवयोग से यहाँ आ पहुँचे और मैंने उन्हें अपना पति चुन लिया है। हे तात! वे महायशा मेरे पति हैं, आप उन पर प्रसन्न होइए। इसके आगे जो कुछ भी घटित हुआ है, उसे आप अपने दिव्य ज्ञान से देख ही रहे हैं। आप क्षत्रिय कुल को अभय प्रदान करें और मुझ पर कृपा करें।" वैशंपायन जी ने कहा— काश्यप जी ने अपने दिव्य चक्षु से सब कुछ जान लिया और यह समझकर कि इसमें धर्म का कोई पतन नहीं हुआ है तथा धर्म में ही मन स्थिर रहा है, तब वे महातपस्वी भगवान कण्व प्रसन्न होकर वह सारा वृत्तांत बोले।

व्याख्या: शकुंतला गद्गद स्वर में महर्षि कण्व को राजा दुष्यंत के आगमन, उनके साथ हुए विवाह और संपूर्ण प्रसंग की जानकारी देती हैं तथा उनसे क्षमा व आशीर्वाद की प्रार्थना करती हैं।

श्लोक 58-65

कण्व उवाच। एवमेतन्मया ज्ञातं दृष्टं दिव्येन चक्षुषा। त्वयाऽद्य राजान्वयया मामनादृत्य यत्कृतम्।। (1-94-58) पुंसा सह समायोगो न स धर्मोपघातकः। न भयं विद्यते भद्रे मा शुचः सुकृतं कृतम्।। (1-94-59) क्षत्रियस्य तु गान्धर्वो विवाहः श्रेष्ठ उच्यते। सकामायाः सकामेन निमन्त्रः श्रेष्ठ उच्यते।। (1-94-60) किं पुनर्विधिवत्कृत्वा सुप्रजस्त्वमवाप्स्यसि। धर्मात्मा च महात्मा च दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः।। (1-94-61) अभ्यागच्छत्पतिर्यस्त्वां भजमानां शकुन्तले। महात्मा जनिता लोके पुत्रस्तव महायशाः।। (1-94-62) स च सर्वां समुद्रान्तां कृत्स्नां भोक्ष्यति मेदिनीम्। परं चाभिप्रयातस्य चक्रं तस्य महात्मनः।। (1-94-63) भविष्यत्यप्रतिहतं सततं चक्रवर्तिनः। प्रसन्न एव तस्याहं त्वकृते वरवर्णिनि।। (1-94-64) ऋतवो बहवस्ते वै गता व्यर्थाः शुचिस्मिते। सार्थकं सांप्रतं ह्येतन्न च पाप्मास्ति तेऽनघे। गृहाण च वरं मत्तस्तत्कृते यदभीप्सितम्।। (1-94-65)

हिंदी अनुवाद: कण्व जी ने कहा— "मैंने अपने दिव्य चक्षु से यह सब जान लिया है और देख लिया है कि तुमने आज राजकुल में उत्पन्न होने वाले राजा के साथ मेरी अवहेलना करके जो कार्य किया है, वह किसी पुरुष के साथ तुम्हारा समागम होने पर भी धर्म का उपघातक (धर्म को नष्ट करने वाला) नहीं है। हे भद्रे! तुम्हें कोई भय नहीं होना चाहिए, शोक मत करो, तुमने बहुत ही उत्तम कार्य किया है। क्षत्रिय के लिए गंधर्व विवाह श्रेष्ठ कहा गया है, और अपनी इच्छा से काम-भावना वाले नर-नारी का अपनी इच्छा से मिलना (निमन्त्र) भी उत्तम माना गया है। फिर जब यह विवाह विधि-विधान से भी कर लिया गया है, तब तो तुम श्रेष्ठ संतति को प्राप्त करोगी ही। धर्मात्मा, महात्मा और पुरुषोत्तम दुष्यंत तुम्हें पति के रूप में प्राप्त हुए हैं, जो स्वयं चलकर तुम्हारे पास आए थे। हे शकुंतले! तुम्हारे गर्भ से संसार में एक महायशस्वी पुत्र उत्पन्न होगा। वह चक्रवर्ती सम्राट चारों समुद्रों से घिरी हुई इस संपूर्ण पृथ्वी का भोग करेगा। आगे चलकर उस महाबली चक्रवर्ती सम्राट का चक्र (पहिया) अप्रतिहत गति से चलेगा। हे वरवर्णिनि! तुम्हारे कारण मैं दुष्यंत पर अत्यंत प्रसन्न हूँ। हे शुचिस्मिते! तुम्हारे जीवन के जो बहुत से ऋतु (वर्ष) व्यर्थ चले गए थे, वे अब सार्थक हो गए हैं। हे अनघे! अब तुम्हारे ऊपर कोई पाप नहीं है, अतः तुम मेरे पास से अपने मनचाहा वर मांग लो।"

व्याख्या: महर्षि कण्व शकुंतला के इस विवाह को पूरी तरह धर्मसम्मत और उचित ठहराते हैं। वे आशीर्वाद देते हैं कि उनके गर्भ से उत्पन्न होने वाला बालक संपूर्ण पृथ्वी का अजेय चक्रवर्ती सम्राट बनेगा, और शकुंतला को इसके लिए वरदान मांगने को कहते हैं।

श्लोक 66-71

शकुन्तलोवाच। मया पतिर्वृतो योऽसौ दुष्यन्तः पुरुषोत्तमः। मम चैव पतिर्दृष्टो देवतानां समक्षतः। तस्मै ससचिवाय त्वं प्रसादं कर्तुमर्हसि।। (1-94-66) वैशंपायन उवाच। इत्येवमुक्त्वा मनसा प्रणिधाय मनस्विनी। ततो धर्मिष्ठतां वव्रे राज्ये चास्खलनं तथा।। (1-94-67) शकुन्तलां पौरवाणां दुष्यन्तहितकाम्यया। `एवमस्त्विति तां प्राह कण्वो धर्मभृतां वरः।। (1-94-68) पस्पर्श चापि पाणिभ्यां सुतां श्रीमिवरूपिणीम्।। (1-94-69) कण्व उवाच। अद्यप्रभृति देवी त्वं दुष्यन्तस्य महात्मनः। पतिव्रतानां या वृत्तिस्तां वृत्तिमनुपालय।। (1-94-70) वैशंपायन उवाच। इत्येवमुक्त्वा तां विशुद्ध्यर्थमस्पृशत्। स्पृष्टमात्रे शरीरे तु परं हर्षमवाप सा।। (1-94-71)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोली— "मैंने पुरुषोत्तम दुष्यंत को अपना पति चुना है, और देवताओं के समक्ष भी वे मेरे पति के रूप में दृष्ट (स्वीकृत) हैं। अतः आप मंत्रियों सहित उन पर अपनी कृपा बनाए रखें।" वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा कहकर उस मनस्विनी ने मन ही मन ध्यान लगाकर पौरव वंश के राजा दुष्यंत के हित की कामना करते हुए धर्मिष्ठता और उनके राज्य की अखंडता (अस्खलन) का वरदान माँगा। धर्म की रक्षा करने वालों में श्रेष्ठ कण्व ने "एवमस्तु" (ऐसा ही हो) कहकर उस श्रीलक्ष્मीरूपा कन्या शकुंतला को अपने दोनों हाथों से स्पर्श किया। कण्व जी ने कहा— "आज से तुम महात्मा दुष्यंत की पटरानी (देवी) हो, अतः पतिव्रता स्त्रियों का जो सदाचरण है, उसका पालन करना।" वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा कहकर धर्मात्मा कण्व ने उनकी पवित्रता के लिए उन्हें स्पर्श किया। उनके शरीर का स्पर्श मात्र होते ही शकुंतला को परम हर्ष की प्राप्ति हुई।

व्याख्या: शकुंतला अपने लिए कुछ न माँगकर केवल पति दुष्यंत और उनके राज्य की मंगलकामना का वर माँगती हैं। महर्षि कण्व उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि वे दुष्यंत की पटरानी के रूप में पतिव्रता धर्म का पालन करें, और उनके स्पर्श से शकुंतला का अंतःकरण आनंदित हो उठता है।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि चतुर्नवतितमोऽध्यायः।। 94 ।।

संभवपर्वणि त्रिनवतितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि पञ्चनवतितमोऽध्यायः