श्लोक 1-5
वैशंपायन उवाच। तं कुमारमृषिर्दृष्ट्वा कर्म चास्यातिमानुषम्। समयो यौवराज्याय इत्यनुध्याय स द्विजः।। (1-96-1) शकुन्तलां समाहूय कण्वो वचनमब्रवीत्। कण्व उवाच। शृणु भद्रे मम सुते मम वाक्यं शुचिस्मिते।। (1-96-2) पतिव्रतानां नारीणां विशिष्टमिति चोच्यते। पतिशुश्रूषणं पूर्वं मनोवाक्कायचेष्टितैः।। (1-96-3) अनुज्ञाता मया पूर्वं पूजयैतद्व्रतं तव। एतेनैव च वृत्तेन पुण्याँल्लोकानवाप्य च।। (1-96-4) तस्यान्ते मानुषे लोके विशिष्टां तप्स्यसे श्रियम्। तस्माद्भद्रेऽद्य यातव्यं समीपं पौरवस्य ह।। (1-96-5)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— उस कुमार के अतिमानुष (अलौकिक) कर्मों को देखकर और यह विचार करके कि अब इसके यौवराज्य (राज्याधिकार) का समय आ गया है, उन द्विज (कण्व) ने शकुंतला को पास बुलाया और कहा— "हे भद्रे! हे शुचिस्मिते मेरी पुत्री! मेरी बात सुनो। पतिव्रता स्त्रियों के लिए मन, वाणी और शरीर की चेष्टाओं से पति की सेवा करना ही सबसे विशिष्ट व्रत कहा गया है। मेरे द्वारा तुम्हें पहले ही अनुमति दी गई थी और तुमने अपने इस व्रत का पालन किया है। इसी आचरण के प्रभाव से पुण्यलोकों को प्राप्त करके अंत में तुम इस मनुष्य लोक में विशिष्ट ऐश्वर्य को भोगोगी। इसलिए हे भद्रे! तुम्हें आज ही पौरव (दुष्यंत) के समीप जाना चाहिए।"
व्याख्या: सर्वदमन के अलौकिक पराक्रम और उसकी बारह वर्ष की आयु को देखकर महर्षि कण्व यह निर्णय लेते हैं कि अब बालक को उसके पिता दुष्यंत के पास भेजना चाहिए। वे शकुंतला को बुलाकर पतिव्रता धर्म का स्मरण कराते हैं और उन्हें अपने पति के घर जाने की आज्ञा देते हैं।
श्लोक 6-9
स्वयं नायाति मत्वा ते गतं कालं शुचिस्मिते। गत्वाऽऽराधय राजानं दुष्यन्तं हितकाम्यया।। (1-96-6) दौष्यन्तिं यौवराज्यस्थं दृष्ट्वा प्रीतिमवाप्स्यसि। देवतानां गुरूणां च क्षत्रियाणां च भामिनि।। (1-96-7) भर्तॄणां च विशेषेम हितं संगमनं भवेत्। तस्मात्पुत्रि कुमारेण गन्तव्यं मत्प्रियेप्सया।। (1-96-8) प्रतिवाक्यं न दद्यास्त्वं शपिता मम पादयोः।। (1-96-9)
हिंदी अनुवाद: "हे शुचिस्मिते! राजा स्वयं लेने नहीं आए, यह समझकर कि समय बीत चुका है, तुम स्वयं जाकर राजा दुष्यंत के हित की कामना करते हुए उनकी आराधना करो। दौष्यन्ति (सर्वदमन) को यौवराज्य के पद पर आसीन देखकर तुम्हें भारी प्रसन्नता मिलेगी। हे भामिनि! देवताओं, गुरुओं, क्षत्रियों और विशेषकर पतियों के साथ मिलन हितकारी होता है। इसलिए हे पुत्री! मेरी प्रिय इच्छा को पूर्ण करने के लिए तुम्हें इस कुमार के साथ वहाँ जाना चाहिए। यदि तुमने इसमें कोई प्रतिवाद (ना-नुकी) किया, तो तुम्हें मेरे चरणों की शपथ है।"
व्याख्या: महर्षि कण्व शकुंतला को समझाते हैं कि राजा के स्वयं न आने पर भी उन्हें अपने कर्तव्य का पालन करते हुए पुत्र सहित हस्तिनापुर जाना चाहिए। वे अत्यंत स्नेह और दृढ़ता के साथ शकुंतला को अपने आदेश की पालना करने का निर्देश देते हैं।
श्लोक 10-14
वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा सुतां तत्र पौत्रं कण्वोऽभ्यभाषत। परिष्वज्य च बाहुभ्यां मूर्ध्न्युपाघ्राय पौरवम्।। (1-96-10) सोमवंशोद्भवो राजा दुष्यन्त इति विश्रुतः। तस्याग्रमहिषी चैषा तव माता शुचिव्रता।। (1-96-11) गन्तुकामा भर्तृपार्श्वं त्वया सह सुमध्यमा। गत्वाऽभिवाद्य राजनं यौवराज्यमवाप्स्यसि।। (1-96-12) स पिता तव राजेन्द्रस्तस्य त्वं वशगो भव। पितृपैतामहं राज्यमातिष्ठस्व स्वभावतः।। (1-96-13) तस्मिन्काले स्वराज्यस्थो मामनुस्मर पौरव।। (1-96-14)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— पुत्री से ऐसा कहकर कण्व ने अपने पौत्र (दौहित्र) पौरव को अपनी दोनों भुजाओं में भरकर आलिंगन किया और उसके मस्तक को सूँघा। उन्होंने कहा— "सोमवंश में उत्पन्न होने वाले प्रसिद्ध राजा दुष्यंत तुम्हारे पिता हैं, और ये शुचिव्रता तुम्हारी माता हैं। ये सुमध्यमा (शकुंतला) अपने पति के समीप जाना चाहती हैं और तुम भी इनके साथ चलोगे। वहाँ जाकर राजा को अभिवादन करना और यौवराज्य को प्राप्त करना। वे राजेन्द्र तुम्हारे पिता हैं, तुम उनके वशवर्ती (आज्ञाकारी) होकर रहना और अपने पिता-परदादा के इस राज्य को सहज ही संभालना। हे पौरव! उस समय जब तुम अपने राज्य पर स्थित होगे, तब मुझे स्मरण करते रहना।"
व्याख्या: महर्षि कण्व अपनी पुत्री शकुंतला और दौहित्र सर्वदमन (पौरव) को स्नेहपूर्वक गले लगाते हैं और बालक को उसके पिता दुष्यंत का परिचय देते हुए राजनैतिक व पारिवारिक कर्तव्यों का बोध कराते हैं।
श्लोक 15-19
वैशंपायन उवाच। अभिवाद्य मुनेः पादौ पौरवो वाक्यमब्रवीत्। त्वं पिता मम विप्रर्षे त्वं माता त्वं गतिश्च मे।। (1-96-15) न चान्यं पितरं मन्ये त्वामृते तु महातपः। तव शुश्रूषणं पुण्यमिह लोके परत्र च।। (1-96-16) शकुन्तला भर्तृकामा स्वयं यातु यथेष्टतः। अहं सुश्रूषणपरः पादमूले वसामि वः।। (1-96-17) क्रीडां व्यालमृगैः सार्धं करिष्ये न पुरा यथा। त्वच्छासनपरो नित्यं स्वाध्यायं च करोम्यहम्।। (1-96-18) एवमुक्त्वा तु संश्लिष्य पादौ कण्वस्य तिष्ठतः। तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्ररुरोद शकुन्तला।। (1-96-19)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— मुनि के चरणों में अभिवादन करके पौरव (सर्वदमन) ने कहा— "हे विप्रर्षे! आप ही मेरे पिता हैं, आप ही मेरी माता हैं और आप ही मेरी गति हैं। हे महातपस्वी! आपके सिवाय मैं अन्य किसी को अपना पिता नहीं मानता। आपकी सेवा करना ही इस लोक और परलोक में मेरा पुण्य है। शकुंतला जी अपने पति के पास इच्छापूर्वक स्वयं चली जाएँ, किंतु मैं आपकी सेवा में तत्पर होकर आपके चरणों के पास ही निवास करूँगा। अब मैं पहले की तरह हिंसक पशुओं के साथ क्रीड़ा नहीं करूँगा, नित्य आपकी आज्ञा का पालन करूँगा और स्वाध्याय करूँगा।" ऐसा कहकर कण्व के चरणों से लिपटकर खड़े हुए उस बालक के वचन को सुनकर शकुंतला फूट-फूट कर रोने लगीं।
व्याख्या: बालक सर्वदमन अपनी माता के साथ राजा दुष्यंत के पास जाने से मना कर देता है और महर्षि कण्व की सेवा में आश्रम में ही रहने की जिद करता है। बालक का यह निश्छल और आज्ञाकारी प्रेम देखकर शकुंतला का हृदय भर आता है और वे विलाप करने लगती हैं।
श्लोक 20-25
स्नेहात्पितुश्च पुत्रस्य हर्षशोकसमन्विता। निशाम्य रुदतीमार्तां दौष्यन्तिर्वाक्यमब्रवीत्।। (1-96-20) श्रुत्वा भगवतो वाक्यं किं रोदिषि शकुन्तले। गन्तव्यं काल्य उत्थाय भर्तृप्रीतिस्ववास्ति चेत्।। (1-96-21) शकुन्तलोवाच। एकस्तु कुरुते पापं फलं भुङ्क्ते महाजनः। मया निवारितो नित्यं न करोषि वचो मम।। (1-96-22) निःसृतान्कुञ्जरान्नित्यं बाहुभ्यां संप्रमथ्य वै। वनं च लोडयन्नित्यं सिंहव्याघ्रगणैर्वृतम्।। (1-96-23) एवंविधानि चान्यानि कृत्वा वै पुरुनन्दन। रुषितो भगवांस्तात तस्मादावां विवासितौ।। (1-96-24) नाहं गच्छामि दुष्यन्तं नास्मि पुत्र हितैषिणी। पादमूले वसिष्यामि महर्षेर्भावितात्मनः।। (1-96-25)
हिंदी अनुवाद: पिता और पुत्र के स्नेह के कारण हर्ष और शोक से युक्त तथा दुःखी होकर रोती हुई शकुंतला को देखकर दौष्यन्ति (सर्वदमन) ने यह वचन कहा— "हे शकुंतले! भगवान (कण्व) के वचन को सुनकर तुम क्यों रो रही हो? यदि पति के प्रति प्रेम है, तो सवेरे उठकर चलना ही चाहिए।" शकुंतला बोली— "पाप कोई एक करता है और उसका फल बहुत से लोग (या पूरा समाज) भोगते हैं। (हे पुत्र!) मैंने तुम्हें हमेशा रोका, पर तुमने मेरा कहना नहीं माना। तुम नित्य ही हाथियों को अपनी बाहों से मथकर बाहर निकाल देते थे और सिंह तथा बाघों से भरे हुए वन में उपद्रव मचाते थे। हे पुरुनन्दन! इस प्रकार के और भी कर्म करके, भगवान (कण्व) हम पर रुष्ट हो गए हैं, इसीलिए हम दोनों यहाँ से निकाले जा रहे हैं। मैं दुष्यंत के पास नहीं जाऊँगी और न ही मैं अपने पुत्र की हितैषिणी हूँ; मैं तो इन भावितात्मा महर्षि के चरणों के पास ही निवास करूँगी।"
व्याख्या: शकुंतला अपने पुत्र सर्वदमन के उद्दंड स्वभाव (जंगल के हिंसक जीवों से लड़ने) को अपने और पुत्र के आश्रम से निष्कासन का कारण मानती हैं। वे सोचती हैं कि महर्षि कण्व उनके पुत्र के स्वभाव के कारण ही उन्हें विदा कर रहे हैं, अतः वे राजा दुष्यंत के पास जाने से मना करते हुए कण्व के चरणों में ही रहने की जिद करती हैं।
श्लोक 26-29
वैशंपायन उवाच। एवमुक्त्वा तु रुदती पपात मुनिपादयोः। एवं विलपतीं कण्वश्चानुनीय च हेतुभिः। पुनः प्रोवाच भगवानानृशंस्याद्धितं वचः।। (1-96-26) कण्व उवाच। शकुन्तले शृणुष्वेदं हितं पथ्यं च भामिनि। पतिव्रताभावगुणान्हित्वा साध्यं न किंचन।। (1-96-27) पतिव्रतानां देवा वै तुष्टाः सर्वरप्रदाः। प्रसादं च करिष्यन्ति आपदो मोक्षयन्ति च।। (1-96-28) पतिप्रसादात्पुण्यं च प्राप्नुवन्ति न चाशुभम्। तस्माद्गत्वा तु राजानमाराधय शुचिस्मिते।। (1-96-29)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा कहकर रोती हुई शकुंतला मुनि के चरणों में गिर पड़ीं। इस प्रकार विलाप करती हुई शकुंतला को महर्षि कण्व ने विभिन्न युक्तियों से सांत्वना दी और तब करुणा से ओत-प्रोत होकर हितकारी वचन फिर से बोले— कण्व जी ने कहा— "हे शकुंतले! हे भामिनि! मेरे इस हितकारी और पथ्य वचन को सुनो। पतिव्रता होने के गुणों को छोड़कर अन्य कुछ भी साध्य (प्राप्त करने योग्य) नहीं है। पतिव्रता स्त्रियों पर देवता प्रसन्न होकर समस्त वर प्रदान करते हैं, वे उन पर कृपा करते हैं और आपत्तियों से बचाते हैं। पति की प्रसन्नता से ही पुण्य की प्राप्ति होती है, अशुभ की नहीं। इसलिए हे शुचिस्मिते! तुम जाकर राजा की आराधना (सेवा) करो।"
व्याख्या: महर्षि कण्व शकुंतला के विलाप को प्रेमपूर्वक शांत करते हैं और उन्हें समझाते हैं कि स्त्री के लिए पतिव्रता धर्म का पालन करना ही सर्वोपरि है। वे शकुंतला को आश्वस्त करते हैं कि उनका निष्कासन किसी क्रोध के कारण नहीं, बल्कि उनके उचित कर्तव्य के पालन हेतु है।
श्लोक 30-35
वैशंपायन उवाच। शकुन्तलां तथोक्त्वा वै शाकुन्तलमथाब्रवीत्। दौहित्रो मम पौत्रस्त्वमिलिलस्य महात्मनः।। (1-96-30) शृणुष्व वचनं सत्यं प्रब्रवीमि तवानघ। मनसा भर्तृकामा वै वाग्भिरुक्त्वा पृथग्विधम्।। (1-96-31) गन्तुं नेच्छति कल्याणी तस्मात्तात वहस्व वै। शक्तस्त्वं प्रतिगन्तुं च मुनिभिः सह पौरव।। (1-96-32) इत्युक्त्वा सर्वदमनं कण्वः शिष्यानथाब्रवीत। शकुन्तलामिमां शीग्रं सपुत्रामाश्रमादितः।। (1-96-33) भर्तुः प्रापयताभ्याशं सर्वलक्षणपूजिताम्। नारीणां चिरवासो हि बान्धवेषु न रोचते।। (1-96-34) कीर्तिचारित्रधर्म्नस्तस्मान्नयत मा चिरम्।। (1-96-35)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— शकुंतला से ऐसा कहकर कण्व जी ने शाकुंतल (सर्वदमन) से कहा— "हे अनघ! तुम महात्मा इलिन के पौत्र और मेरे दौहित्र हो। मैं जो सत्य वचन कहता हूँ, उसे सुनो। यद्यपि यह कल्याणी (शकुंतला) मन से पति की कामना करती है और विभिन्न प्रकार की बातें कहती है, तथापि यह जाने की इच्छा नहीं कर रही है। इसलिए हे तात पौरव! तुम इन्हें ले चलो। तुम मुनियों के साथ वहाँ जाने में समर्थ हो।" सर्वदमन से ऐसा कहकर कण्व ने अपने शिष्यों से कहा— "तुम सब मिलकर सभी लक्षणों से पूजिता इस शकुंतला को पुत्र सहित शीघ्र ही आश्रम से ले जाकर इनके पति के समीप पहुँचा दो। स्त्रियों का अपने मायके में बहुत लंबे समय तक निवास करना अच्छा नहीं माना जाता, इससे उनकी कीर्ति, चरित्र और धर्म की रक्षा होती है। इसलिए बिना देर किए इन्हें ले जाओ।"
व्याख्या: महर्षि कण्व अब अपने पौत्र सर्वदमन को समझाते हैं कि वे अपनी माता को लेकर हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान करें। साथ ही वे अपने शिष्यों को आदेश देते हैं कि वे शकुंतला और उनके पुत्र को सुरक्षित राजा दुष्यंत के पास पहुँचा आएं, क्योंकि समाज और धर्म की मर्यादा यही कहती है कि विवाहित स्त्री का लंबे समय तक पिता के घर रहना उचित नहीं है।
श्लोक 36-40
वैशंपायन उवाच। धर्माभिपूजितं पुत्रं काश्यपेन निशाम्य तु। काश्यपात्प्राप्य चानुज्ञां मुमुदे च शकुन्तला।। (1-96-36) कण्वस्य वचनं श्रुत्वा प्रतिगच्छेति चासकृत्। तथेत्युक्त्वा तु कण्वं च मातरं पौरवोऽब्रवीत्। किं चिरायसि मातस्त्वं गमिष्यामो नृपालयम्।। (1-96-37) एवमुक्त्वा तु तां देवीं दुष्यन्तस्य महात्मनः। अभिवाद्य मुनेः पादौ गन्तुमैच्छत्स पौरवः।। (1-96-38) शकुन्तला च पितरमभिवाद्य कृताञ्जलिः। प्रदक्षिणीकृत्य तदा पितरं वाक्यमब्रवीत्।। (1-96-39) अज्ञानान्मे पिता चेति दुरुक्तं वापि चानृतम्। अकार्यं वाप्यनिष्टं वा क्षन्तुमर्हति तद्भवान्।। (1-96-40)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— काश्यप (कण्व) द्वारा धर्मसम्मत बात कहे जाने पर और उनकी अनुमति पाकर शकुंतला बहुत प्रसन्न हुईं। कण्व के बार-बार 'जाओ' कहने पर 'तथास्तु' (बहुत अच्छा) कहकर पौरव (सर्वदमन) ने अपनी माता से कहा— "हे माता! अब आप देर क्यों कर रही हैं? चलिए, हम राजा के महल की ओर चलें।" महात्मा दुष्यंत की उस देवी (पत्नी) से ऐसा कहकर और मुनि के चरणों का अभिवादन करके पौरव ने जाने की इच्छा प्रकट की। शकुंतला ने भी हाथ जोड़कर अपने पिता का अभिवादन किया और उनकी परिक्रमा करके पिता से यह कहा— "हे पिता जी! मैंने अज्ञानवश यदि कोई गलत बात, असत्य, अकार्य या अनिष्ट कर दिया हो, तो आप उसे क्षमा करने की कृपा करें।"
व्याख्या: महर्षि कण्व की अनुमति और आदेश मिलने पर शकुंतला का संकोच दूर होता है और वे प्रसन्न होती हैं। बालक सर्वदमन जो पहले जाने से कतरा रहा था, अब स्वयं अपनी माता को चलने के लिए प्रेरित करता है। प्रस्थान से पूर्व शकुंतला अपने पिता कण्व से अपने किसी भी अज्ञानपूर्ण व्यवहार के लिए क्षमा माँगती हैं और विदा लेती हैं।
श्लोक 41-44
एवमुक्तो नतशिरा मुनिर्नोवाच किंचन। मनुष्यभावात्कण्वोऽपि मुनिरश्रूण्यवर्तयत्।। (1-96-41) अब्भक्षान्वायुभक्षांश्च शीर्णपर्णाशनान्मुनीन्। फलमूलाशिनो दान्तान्कृशान्धमनिसंततान्।। (1-96-42) व्रतिनो जटिलान्मुण्डान्वल्कलाजिनसंवृतान्। समाहूय मुनिः कण्वः कारुण्यादिदमब्रवीत्।। (1-96-43) मया तु लालिता नित्यं मम पुत्री यशस्विनी। वने जाता विवृद्धा च न च जानाति किंचन।। (1-96-44)
हिंदी अनुवाद: शकुंतला द्वारा ऐसा कहे जाने पर सिर झुकाए हुए मुनि कण्व ने कुछ नहीं कहा। मनुष्य होने के स्वाभाविक स्नेह व भावुकता के कारण महर्षि कण्व की आँखों से भी आँसू बह निकले। जल पीने वाले, वायु का आहार करने वाले, सूखे पत्ते खाने वाले, कन्द-मूल खाने वाले, जितेंद्रिय, कृश शरीर वाले, जिनकी नसें दिखाई दे रही थीं, ऐसे व्रती, जटाधारी, मुंडित सिर वाले तथा वल्कल और मृगचर्म धारण करने वाले मुनियों को बुलाकर महर्षि कण्व ने करुणावश यह कहा— "यह मेरी यशस्विनी पुत्री मेरे द्वारा हमेशा लाड़-प्यार से पाली गई है। यह इसी वन में जन्मी और यहीं बड़ी हुई है, इसलिए यह संसार के छल-छद्म को कुछ भी नहीं जानती।"
व्याख्या: शकुंतला की विदाई के समय महर्षि कण्व भी सामान्य मनुष्यों की भाँति अपने स्नेह को रोक नहीं पाते और उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकलती है। वे आश्रम के तपस्वी मुनियों को अपने पास बुलाकर शकुंतला के भोलेपन और वन में उसके लालन-पालन का स्मरण कराते हैं।
श्लोक 45-48
आश्रमात्तु पथा सर्वैर्नीयतां क्षत्रियालयम्। द्वितीययोजने विप्राः प्रतिष्ठानं प्रतिष्ठितम्।। (1-96-45) प्रतिष्ठाने पुरे राजा शाकुन्तलपितामहः। अध्युवास चिरं कालमुर्वश्या सहितः पुरा।। (1-96-46) अनूपजाङ्गलयुतं धनधान्यसमाकुलम्। प्रतिष्ठितं पुरवरं गङ्गायामुनसङ्गमे।। (1-96-47) तत्र सङ्गममासाद्य स्नात्वा हुतहुताशनाः। शाकमूलफलाहारा निवर्तध्वं तपोधनाः। अन्यथा तु भवेद्विप्रा अध्वनो गमने श्रमः।। (1-96-48)
हिंदी अनुवाद: "हे विप्राओ! आप सब लोग मार्ग से इसे क्षत्रियराज (हस्तिनापुर/प्रतिष्ठानपुर) के पास ले चलिए। यहाँ से दो योजन की दूरी पर प्रतिष्ठित नाम की प्रसिद्ध नगरी है। उस प्रतिष्ठानपुर में शकुंतला के पितामह (पुरूरवा) ने प्राचीन काल में उर्वशी के साथ निवास किया था। वह श्रेष्ठ नगर अनूप (जलप्राय) और जाङ्गल देश से युक्त, धन-धान्य से परिपूर्ण तथा गंगा-यमुना के संगम पर प्रतिष्ठित है। हे तपोधनो! आप लोग वहाँ संगम पर पहुँचकर स्नान करना, अग्निहोत्र करना और शाक, मूल व फल का आहार करके वहाँ से लौट आना; अन्यथा हे विप्रो! मार्ग में चलने का अत्यधिक श्रम हो जाएगा।"
व्याख्या: कण्व ऋषि अपने शिष्यों को निर्देश देते हैं कि वे शकुंतला और सर्वदमन को सुरक्षित राजा दुष्यंत की राजधानी 'प्रतिष्ठानपुर' (जो गंगा-यमुना के संगम के पास स्थित है) तक पहुँचाएँ। साथ ही वे तपस्वियों को अधिक श्रम से बचाने के लिए संगम तक ही जाकर लौटने का उचित परामर्श देते हैं।
श्लोक 49-52
तथेत्युक्त्वा च ते सर्वे प्रातिष्ठन्त महौजसः। शकुन्तलां पुरस्कृत्य दुष्यन्तस्य पुरं प्रति।। (1-96-49) गृहीत्वा चामरप्रख्यं पुत्रं कमललोचनम्। आजग्मुश्च पुरं रम्यं दुष्यन्ताध्युषितं वनात्।। (1-96-50) शकुन्तलां समादाय मुनयो धर्मवत्सलाः। ते वनानि नदीः शैलान्गिरिप्रस्रवणानि च।। (1-96-51) कन्दराणि नितम्बांश्च राष्ट्राणि नगराणि च। आश्रमाणि च पुण्यानि गत्वा चैव गतश्रमाः।। (1-96-52)
हिंदी अनुवाद: 'बहुत अच्छा' कहकर वे सभी महौजस (तेजस्वी) ऋषि शकुंतला को आगे करके दुष्यंत की नगरी की ओर चल पड़े। वे चामर के समान कांतिमंती शोभा वाले तथा कमल के समान नेत्रों वाले पुत्र को साथ लेकर उस रमणीय नगर की ओर वनों से निकल पड़े। धर्मवत्सल मुनिगण शकुंतला को साथ लेकर वनों, नदियों, पर्वतों, झरनों, गुफाओं, पर्वत-नितम्बों, राष्ट्रों, नगरों और पवित्र आश्रमों को पार करते हुए (मार्ग की थकान मिटाते हुए) आगे बढ़े।
व्याख्या: महर्षि कण्व की आज्ञा पाकर तेजस्वी मुनिगण शकुंतला और बालक सर्वदमन को साथ लेकर हस्तिनापुर (प्रतिष्ठानपुर) की यात्रा पर निकल पड़ते हैं। वे विभिन्न प्राकृतिक दृश्यों, जंगलों और बस्तियों को पार करते हुए अपनी यात्रा तय करते हैं।
श्लोक 53-60
शनैर्मध्याह्नवेलायां प्रतिष्ठानं समाययुः। तां पुरीं पुरुहूतेन ऐलस्यार्थे विनिर्मिताम्।। (1-96-53) परिघाट्टालकैर्मुख्यैरुपकल्पशतैरपि। शतघ्नीचक्रयन्त्रैश्च गुप्तामन्यैर्दुरासदाम्।। (1-96-54) हर्म्यप्रसादसंबाधां नानापण्यविभूषिताम्। मण्टपैः ससभै रम्यैः प्रपाभिश्च समावृताम्।। (1-96-55) राजमार्गेण महता सुविभक्तेन शोभिताम्। कैलासशिखराकारैर्गोपुरैः समलङ्कृताम्।। (1-96-56) द्वारतोरणनिर्यूहैर्मङ्गलैरुपशोभिताम्। उद्यानाम्रवणोपेतां महतीं सालमेखलाम्।। (1-96-57) सर्वपुष्करिणीभिश्च उद्यानैश्च समावृताम्। वर्णाश्रमैः स्वधर्मस्थैर्नित्योत्सवसमाहितैः।। (1-96-58) धनधान्यसमृद्धैश्च संतुष्टै रत्नपूजितैः। कृतयज्ञैश्च विद्वद्भिरग्निहोत्रपरैः सदा।। (1-96-59) वर्जिता कार्यकरणैदानशीलैर्दयापरैः। अधर्मभीरुभिः सर्वैः स्वर्गलोकजिगीषुभिः।। (1-96-60)
हिंदी अनुवाद: वे सब धीरे-धीरे मध्याह्न के समय प्रतिष्ठानपुर (नगरी) में जा पहुँचे। वह नगरी देवराज इंद्र द्वारा पुरूरवा (ऐल) के लिए बसाई गई थी। वह नगर परिधि (चारदीवारी), अटारियों, सैकड़ों उपधानों (बुर्जों), शतघ्नी (तोप/अग्नयास्त्र) तथा चक्र-यंत्रों से सुरक्षित होने के कारण शत्रुओं के लिए अत्यंत दुरासद (अजेय) था। वह बड़े-बड़े महलों व राजभवनों से आच्छादित, नाना प्रकार की वस्तुओं (पण्यों) से विभूषित, सुंदर मंडपों, सभाओं और प्याऊ (प्रपा) से परिपूर्ण थी। वह सुविभक्त एवं विशाल राजमार्गो से सुशोभित थी और कैलास पर्वत के शिखरों के समान भव्य गोपुरों (द्वार-अट्टालिकाओं) से अलंकृत थी। वह द्वार-तोरणों और मंगलमय अलंकारों से सुशोभित थी तथा उद्यान, आम के बागों और विशाल परकोटे से घिरी हुई थी। वह नगर समस्त कमल-पुष्करिणियों और उद्यानों से आवृत्त था, जहाँ चारों वर्ण और आश्रमों के लोग अपने स्वधर्म में तत्पर, नित्य उत्सव मनाने में मग्न, धन-धान्य से समृद्ध, संतुष्ट, रत्नों से पूजित, यज्ञ करने वाले, विद्वान और सदा अग्निहोत्र में संलग्न रहते थे। वहाँ के लोग अनीति या कुकर्मों से दूर, दानशील, दयालु, अधर्म से डरने वाले और स्वर्गलोक की इच्छा रखने वाले थे।
व्याख्या: यहाँ राजा दुष्यंत की राजधानी 'प्रतिष्ठानपुर' (हस्तिनापुर के समीप) की भव्यता, सुरक्षा व्यवस्था, वास्तुकला और वहाँ के नागरिकों के उच्च चरित्र व धार्मिक स्वभाव का अत्यंत विस्तृत और सुंदर वर्णन किया गया है।
श्लोक 61-66
एवमुक्तविधजनोपेतमिन्द्रलोकमिवापरम्। तस्मिन्नगरमध्ये तु राजवेश्म प्रतिष्ठितम्।। (1-96-61) इन्द्रसद्मप्रतीकाशं संपूर्णं वित्तसंचयैः। तस्य मध्ये सभा दिव्या नानारत्नविभूषिता।। (1-96-62) तस्यां सभायां राजर्षिः सर्वालङ्कारभूषितः। ब्राह्मणैः क्षत्रियैश्चापि मन्त्रिभिश्चापि संवृतः।। (1-96-63) संस्तूयमानो राजेन्द्रः सूतमागधबन्दिभिः। कार्यार्थिषु तदाऽभ्येत्य कृत्वा कार्यं गतेषु सः।। (1-96-64) सुखासीनोऽभवद्राजा तस्मिन्काले महर्षयः। शकुन्तानां स्वनं श्रुत्वा निमित्तज्ञास्त्वलक्षयन्।। (1-96-65) शकुन्तले निमित्तानि शोभनानि भवन्ति नः। कार्यसिद्धिं वदन्त्येते ध्रुवं राज्ञी भविष्यसि। अस्मिंस्तु दिवसे पुत्रो युवराजो भविष्यति।। (1-96-66)
हिंदी अनुवाद: इस प्रकार नाना प्रकार के जनों से युक्त वह नगर दूसरे इंद्रलोक के समान प्रतीत होता था। उस नगर के मध्य में राजा का राजमहल प्रतिष्ठित था, जो इंद्र के भवन के समान सुंदर और धन-धान्य के संचयों से परिपूर्ण था। उस महल के बीचों-बीच नाना प्रकार के रत्नों से सुसज्जित एक दिव्य सभा थी। उस सभा में सब प्रकार के आभूषणों से भूषित, ब्राह्मणों, क्षत्रियों और मंत्रियों से घिरे हुए तथा सूत, मागध एवं बंदिजनों द्वारा स्तुति किए जा रहे राजर्षि (दुष्यंत) सुखपूर्वक विराजमान थे। कार्यों के लिए आए हुए लोगों के अपने-अपने कार्य समाप्त करके चले जाने पर जब राजा सुख से बैठे थे, उसी समय निमित्तशास्त्र (शकुन-अपशकुन विज्ञान) के ज्ञाता महर्षियों ने पक्षियों के मधुर स्वर को सुनकर उसका लक्षण इस प्रकार पहचाना— "हे शकुंतले! ये शकुन हमारे लिए अत्यंत शुभ हैं। ये पक्षी कार्य की सिद्धि की घोषणा कर रहे हैं। निश्चित ही आज तुम पटरानी बनोगी और आज ही तुम्हारा यह पुत्र युवराज के पद को प्राप्त होगा।"
व्याख्या: यहाँ प्रतिष्ठानपुर के राजभवन और उसमें बैठे राजा दुष्यंत के वैभवशाली स्वरूप का वर्णन है। साथ ही, मार्ग में पक्षियों के शुभ शकुनों को देखकर मुनिगण शकुंतला को आश्वस्त करते हैं कि आज उनका मान-सम्मान और उनके पुत्र का युवराज के रूप में अभिषेक अवश्य होगा।
श्लोक 67-73
वैशंपायन उवाच। वर्धमानपुरद्वारं तूर्यघोषनिनादितम्। शकुन्तलां पुरस्कृत्य विविशुस्ते महर्षयः।। (1-96-67) प्रविशन्तं नृपसुतं प्रशशंसुश्च वीक्षकाः। वर्धमानपुरद्वारं प्रविशन्नेव पौरवः।। (1-96-68) इन्द्रलोकस्थमात्मानं मेने हर्षसमन्वितः।। (1-96-69) ततो वै नागराः सर्वे समाहूय परस्परम्। द्रष्टुकामा नृपसुतं समपद्यन्त भारत।। (1-96-70) नागरा ऊचुः। देवतेव जनस्याग्रे भ्राजते श्रीरिवागता। जयन्तेनेव पौलोमी इन्द्रलोकादिहागता।। (1-96-71) इति ब्रुवन्तस्ते सर्वे महर्षीनिदमब्रुवन्। अभिवादयन्तः सहिता महर्षीन्देववर्चसः।। (1-96-72) अद्य नः सफलं जन्म कृतार्थाश्च ततो वयम्। एवं ये स्म प्रपश्यामो महर्षीन्सूर्यवर्चसः।। (1-96-73)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— बाजे-गाजे और नगाड़ों की गूँज से गूँजते हुए वर्धमानपुर (नगरी) के द्वार से वे महर्षिगण शकुंतला को आगे करके नगर के भीतर प्रवेश कर गए। नगर में प्रवेश करते हुए राजकुमार (सर्वदमन) की वहाँ उपस्थित दर्शकों ने प्रशंसा की। वर्धमानपुर के द्वार में प्रवेश करते ही पौरव (सर्वदमन) हर्ष से भर गया और उसने स्वयं को इंद्रलोक में पहुँचा हुआ माना। तब हे भारत! नगर के सभी नागरिक आपस में एकत्रित होकर उस राजकुमार को देखने के लिए दौड़ पड़े। नागरिकों ने कहा— "यह स्त्री जनसमूह के आगे ऐसी सुशोभित हो रही है जैसे कोई प्रत्यक्ष देवी या लक्ष्मी आ गई हो, और यह बालक ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो इंद्रलोक से शची (पौलोमी) के साथ जयंत आ गया हो!" ऐसा कहते हुए उन सभी नागरिकों ने सूर्य के समान तेजस्वी और देवर्चस उन महर्षियों का अभिवादन किया और कहा— "सूर्य के समान तेजस्वी इन महर्षियों के दर्शन करके आज हमारा जन्म सफल हो गया और हम कृतार्थ हो गए हैं।"
व्याख्या: शकुंतला और सर्वदमन का नगर में भव्य प्रवेश होता है। उनकी अलौकिक सुंदरता और तेज को देखकर नगरवासी उन्हें किसी देवी-देवता के समान मानते हैं और तेजस्वी ऋषियों के दर्शन पाकर स्वयं को धन्य महसूस करते हैं।
श्लोक 74-78
वैशंपायन उवाच। इत्युक्त्वा सहिताः केचिदन्वगच्छन्त पौरवम्। हैमवत्याः सुतमिव कुमारं पुष्करेक्षणम्।। (1-96-74) ये केचिदब्रुवन्मूढाः शाकुन्तलदिदृक्षवः। कृष्णाजिनेन संछन्नाननिच्छन्तो ह्यवेक्षितुम्।। (1-96-75) पिशाचा इव दृश्यन्ते नागराणां विरूपिणः। विना सन्ध्यां पिशाचास्ते प्रविशन्ति पुरोत्तमम्।। (1-96-76) क्षुत्पिपासार्दितान्दीनान्वल्कलाजिनवाससः। त्वगस्थिभूतान्निर्मांसान्धमनीसन्ततानपि।। (1-96-77) पिङ्गलाक्षान्पिङ्गजटान्दीर्घदन्तान्निरूदरान्। विशीर्षकानूर्ध्वहस्तान्दृष्ट्वा हास्यन्ति नागराः।। (1-96-78)
हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी ने कहा— ऐसा कहकर कुछ लोग मिलकर पौरव (सर्वदमन) के पीछे चल पड़े, जो हिमालय के पुत्र (कार्तिकेय) के समान कमल के समान नेत्रों वाला कुमार था। किंतु कुछ मूर्ख और अज्ञानी नगरवासी, जो शाकुंतल (मुनियों और शकुंतला) के दर्शन की इच्छा तो रखते थे, पर मृगचर्म ओढ़े हुए उन मुनियों को देखना नहीं चाहते थे, वे उपहास करने लगे। वे बोले— "ये नगरवासियों के बीच पिशाच जैसे विकृत रूप वाले कौन हैं? बिना किसी संध्या (शाम) के ही ये पिशाच इस उत्तम नगर में कैसे प्रवेश कर रहे हैं?" भूख-प्यार से पीड़ित, दीन, वल्कल और मृगचर्म पहनने वाले, केवल त्वचा और हड्डियों से शेष बचे, मांसहीन, उभरी हुई नसों वाले, पिंगल (भूरे) नेत्रों वाले, भूरी जटाओं वाले, लंबे दाँतों वाले, पिचके पेट वाले, अजीब सिर और ऊँचे हाथ वाले इन मुनियों को देखकर नगर के कुछ मूर्ख लोग हँसी उड़ाने लगे।
व्याख्या: यहाँ नगर के कुछ अज्ञानी और उच्छृंखल नागरिकों के संकीर्ण स्वभाव का वर्णन है, जो तपस्या के कारण कृशकाय और जटाधारी हो चुके तपस्वी मुनियों के स्वरूप को समझ नहीं पाते और उनका उपहास करते हुए उन्हें पिशाच की संज्ञा देते हैं।
श्लोक 79-82
एवमुक्तवतां तेषां गिरं श्रुत्वा महर्षयः। अन्योन्यं ते समाहूय इदं वचनमब्रुवन्।। (1-96-79) उक्तं भगवता वाक्यं न कृतं सत्यवादिना। पुरप्रवेशनं नात्र कर्तव्यमिति शासनम्।। (1-96-80) किं कारणं प्रवेक्ष्यामो नगरं दुर्जनैर्वृतम्। त्यक्तसङ्गस्य च मुनेर्नगरे किं प्रयोजनम्।। (1-96-81) गमिष्यामो वनं तस्माद्गङ्गायामुनसङ्गमम्। एवमुक्त्वा मुनिगणाः प्रतिजग्मुर्यथागतम्।। (1-96-82)
हिंदी अनुवाद: ऐसा कहने वाले उन लोगों की वाणी को सुनकर महर्षियों ने आपस में विचार किया और एक-दूसरे से यह वचन कहा— "सत्यवादी भगवान (कण्व) द्वारा कही गई बात हमने नहीं मानी, जिनका यह स्पष्ट आदेश था कि इस नगर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। दुर्जनों से भरे हुए इस नगर में प्रवेश करने का क्या कारण है? संसार के संग का त्याग करने वाले मुनियों का इस नगर से क्या प्रयोजन है? इसलिए अब हम वापस गंगा-यमुना के संगम वाले वन की ओर लौट चलते हैं।" ऐसा कहकर मुनिगणों का वह समूह जैसे आया था, वैसे ही वापस लौट गया।
व्याख्या: अज्ञानी नागरिकों द्वारा अपमानित किए जाने पर महर्षिगण आत्मग्लानि और क्षोभ महसूस करते हैं कि उन्होंने कण्व ऋषि की बात न मानकर नगर में प्रवेश करके बहुत बड़ी भूल की। वे तुरंत नगर छोड़कर वापस अपने आश्रम (गंगा-यमुना संगम की ओर) लौट जाते हैं।
।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि षण्णवतितमोऽध्यायः।। 96 ।।
