श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रिनवतितमोऽध्यायः

श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रिनवतितमोऽध्यायः

श्लोक 1-4

कण्व उवाच। एवमुक्तस्तया शक्रः संदिदेश सदागतिम्। प्रातिष्ठत तदा काले मेनका वायुना सह।। (1-93-1) अथापश्यद्वरारोहा तपसा दग्धकिल्बिषम्। विश्वामित्रं तप्यमानं मेनका भीरुराश्रमे।। (1-93-2) अभिवाद्य ततः सा तं प्राक्रीडदृषिसन्निधौ। अपोवाह च वासोऽस्या मारुतः शशिसंनिभम्।। (1-93-3) सागच्छत्त्वरिता भूमिं वासस्तदभिलिप्सती। कुत्सयन्तीव सव्रीडं मारुतं वरवर्णिनी।। (1-93-4)

हिंदी अनुवाद: कण्व जी ने कहा— मेनका के ऐसा कहने पर देवराज इंद्र ने सदागति (वायु) को आदेश दिया। उस समय मेनका वायु के साथ (विश्वामित्र के आश्रम की ओर) चल पड़ी। वहाँ आश्रम में उत्तम कटिप्रदेश वाली और भयभीत मेनका ने तपस्या से समस्त पापों को भस्म कर चुके महर्षि विश्वामित्र को तपस्या करते हुए देखा। तब उसने उन महर्षि को अभिवादन करके उनके संनिधि में क्रीड़ा करना शुरू किया। उसी समय चंद्रमा के समान श्वेत उसके वस्त्र को वायु ने उड़ा लिया। वह वरवर्णिनि (सुंदर अंगों वाली) मेनका उस वस्त्र को पाने की इच्छा से लज्जित होती हुई और वायु की निंदा करती हुई त्वरित गति से नीचे (भूमि की ओर) आई।

व्याख्या: पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार वायु देवता मेनका के वस्त्र उड़ा लेते हैं, जिससे लज्जित और विचलित हुई मेनका महर्षि विश्वामित्र के समक्ष प्रकट होती हैं।

श्लोक 5-8

पश्यतस्तस्य राजर्षेरप्यग्निसमतेजसः। विश्वामित्रस्ततस्तां तु विषमस्थामनिन्दिताम्।। (1-93-5) गृद्धां वाससि संभ्रान्तां मेनकां मुनिसत्तमः। अनिर्देश्यवयोरूपामपश्यद्विवृतां तदा।। (1-93-6) तस्या रूपगुणान्दृष्ट्वा स तु विप्रर्षभस्तदा। चकार भावं संसर्गे तया कामवशं गतः।। (1-93-7) न्यमन्त्रयत चाप्येनां सा चाप्यैच्छदनिन्दिता। तौ तत्र सुचिरं कालमुभौ व्यवहरतां तदा।। (1-93-8)

हिंदी अनुवाद: अग्नि के समान तेजस्वी उन राजर्षि विश्वामित्र के देखते-देखते, मुनिसत्तम विश्वामित्र ने उस समय विषम स्थिति में पड़ी हुई, अनिंदिता, वस्त्र के लिए उत्सुक, संभ्रान्त तथा अनिर्दिष्ट वय (अद्भुत यौवन) और रूप वाली उन विवृता (असंरक्षित/उघाड़े अंगों वाली) मेनका को देखा। तब उन विप्रर्षभ विश्वामित्र ने उनके रूप और गुणों को देखकर कामवश हो उनके साथ संपर्क करने का भाव बना लिया। उन्होंने मेनका को आमंत्रित किया और अनिंदिता मेनका ने भी उस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन दोनों ने वहाँ बहुत लंबे समय तक विहार किया।

व्याख्या: मेनका के अद्भुत सौंदर्य और इस आकस्मिक परिस्थिति ने महातपस्वी विश्वामित्र के मन को भी विचलित कर दिया और वे काम के वशीभूत होकर उनके साथ रहने लगे।

श्लोक 9-14

रममाणौ यथाकामं यतैकदिवसं तथा। एवं वर्षसहस्राणामतीतं नान्वचिन्तयत्।। (1-93-9) कामक्रोधावजितवान्मुनिर्नित्यं समाहितः। चिरार्जितस्य तपसः क्षयं स कृतवान्मुनिः।। (1-93-10) तपसः संक्षयादेव मुनिर्मोहं समाविशत्। मोहाभिभूतः क्रोधात्मा ग्रसन्मूलफलान्मुनिः।। (1-93-11) पादैर्जलरवं कृत्वा अन्तर्द्वीपे कुटीं गतः। मेनका गन्तुकामा तु शुश्राव जलनिस्वनम्।। (1-93-12) तपसा दीप्तवीर्योऽसावाकाशादेति याति च। अद्य संज्ञां विजानामि ययाऽद्य तपसः क्षयः।। (1-93-13) गन्तुं न युक्तमित्युक्त्वा ऋतुस्नाताथ मेनका। कामरागाभिभूतस्य मुनेः पार्स्वं जगाम ह।। (1-93-14)

हिंदी अनुवाद: वे दोनों अपनी इच्छा के अनुसार ऐसे रमण करने लगे मानो केवल एक ही दिन बीता हो; इस प्रकार उन्होंने हजारों वर्षों के बीत जाने का भी चिंतन नहीं किया। जो मुनि नित्य समाहित रहकर काम और क्रोध को जीत चुके थे, उन्होंने उस मुनि ने अपने चिरंचित तप का नाश कर दिया। तपस्या के क्षीण होने से ही मुनि मोह को प्राप्त हो गए। मोह से अभिभूत और क्रोधी स्वभाव वाले वे मुनि कंद-मूल-फल खाते हुए, पैरों से जल का शब्द करते हुए अन्तर्द्वीप स्थित अपनी कुटी में चले गए। उधर जाने की इच्छा करती हुई मेनका ने जल का वह निस्वन (ध्वनि) सुना। "ये तपस्या से दीप्तवीर्य हैं, जो आकाश से आते और जाते हैं। आज मैं उस संज्ञा को जानती हूँ, जिससे आज तपस्या का क्षय हुआ है। अब यहाँ से जाना उचित नहीं है"—ऐसा कहकर ऋतुस्नाता मेनका काम-राग से अभिभूत हुए उन मुनि के पास पुनः चली गई।

व्याख्या: विश्वामित्र और मेनका के मिलन में हजारों वर्ष बीत जाते हैं, जिससे महर्षि की तपस्या का क्षय हो जाता है और उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है।

श्लोक 15

जनयामास स मुनिर्मेनकायां शकुन्तलाम्। प्रस्थे हिमवतो रम्ये मालिनीमभितो नदीम्।। (1-93-15)

हिंदी अनुवाद: उस मुनि (विश्वामित्र) ने हिमालय के रमणीय प्रस्थ (तत्य) पर, मालिनी नदी के समीप मेनका के गर्भ से शकुन्तला को उत्पन्न किया (अर्थात शकुंतला का जन्म हुआ)।

व्याख्या: विश्वामित्र और मेनका के संयोग से मालिनी नदी के तट पर हिमालय की तलहटी में शकुंतला का जन्म होता है, जिन्हें मेनका आश्रम के पास छोड़कर चली जाती हैं और बाद में महर्षि कण्व उन्हें पा लेते हैं।

श्लोक 16-20

देवगर्भोपमां बालां सर्वाभरणभूषिताम्। शयानां शयने रम्ये मेनका वाक्यमब्रवीत्।। (1-93-16) महर्षेरुग्रतपसस्तेजस्त्वमसि भामिनि। तस्मात्स्वर्गं गमिष्यामि देवकार्यार्थमागता।। (1-93-17) जातमुत्सृज्य तं गर्भं मेनका मालिनीमनु। कृतकार्या ततस्तूर्णमगच्छच्छक्रसंसदम्।। (1-93-18) तं वने विजने गर्भं सिंहव्याघ्रसमाकुले। दृष्ट्वा शयानं शकुनाः समन्तात्पर्यवारयन्। नेमां हिंस्युर्वने बालां क्रव्यादा मांसगृद्धिनः।। (1-93-19) पर्यरक्षन्त तां तत्र शकुन्ता मेनकात्मजाम्। उपस्प्रष्टुं गतश्चाहमपश्यं शयितामिमाम्।। (1-93-20)

हिंदी अनुवाद: देवता की पुत्री के समान सुंदर, समस्त आभूषणों से सुभूषित और रमणीय शैया पर लेटी हुई उस बालिका से मेनका ने कहा— "हे भामिनि! तू उग्र तपस्या करने वाले महर्षि विश्वामित्र का तेज है। अतः देव-कार्य के लिए आई हुई मैं अब स्वर्ग को जाऊँगी।" उत्पन्न हुए उस गर्भ (बालिका) को मालिनी नदी के तट पर छोड़कर, अपना कार्य पूरा हुआ मानकर मेनका तुरंत ही इंद्र की सभा में चली गई। सिंह और बाघों से भरे हुए उस निर्जन वन में शयन करती हुई उस बालिका को देखकर पक्षियों ने चारों ओर से उसे घेर लिया, ताकि मांस के लोभी क्रूर हिंसक जीव वन में इस बालिका की हिंसा न कर सकें। उन पक्षियों ने वहाँ मेनका की उस पुत्री की सब प्रकार से रक्षा की। (कण्व ऋषि कहते हैं—) जब मैं वहाँ जाने के लिए गया, तब मैंने इस लेटी हुई बालिका को देखा।

व्याख्या: शकुंतला के जन्म के उपरांत मेनका अपना देव-कार्य पूर्ण मानकर स्वर्ग लौट जाती हैं। निर्जन वन में अकेली छूटी इस नवजात शिशु की रक्षा सिंह-बाघों आदि हिंसक जीवों से पक्षी (शकुंत) करते हैं।

श्लोक 21-24

निर्जने विपिने रम्ये शकुन्तैः परिवारिताम्। `मां दृष्ट्वैवाभ्यपद्यन्त पादयोः पतिता द्विजाः। अब्रुञ्शकुनाः सर्वे कलं मधुरभाषिणः।। (1-93-21) विश्वामित्रसुतां ब्रह्मन्न्यासभूतां भरस्व वै। कामक्रोधावजितवानsखा ते कौशिकीं गतः।। (1-93-22) तस्मात्पोषय तत्पुत्रीं दयावानिति तेऽब्रुवन्। सर्वभूतरुतज्ञोऽहं दयावान्सर्वजन्तुषु।। (1-93-23) आनयित्वा ततश्चैनां दुहितृत्वे न्यवेशयम्।। (1-93-24)

हिंदी अनुवाद: "उस रमणीय निर्जन वन में पक्षियों से घिरी हुई इसे देखकर, वे द्विज (पक्षी) मेरे चरणों में आ गिरे और कल-कर्कश मधुर वाणी में बोले— 'हे ब्रह्मन्! यह विश्वामित्र की पुत्री और धरोहर रूपी बालिका है, आप इसका पालन-पोषण कीजिए। आपके सखा (विश्वामित्र) काम और क्रोध को जीतकर कौशिकी (नदी) के पास चले गए हैं। अतः आप दयावान होकर इनकी पुत्री का पालन कीजिए।' समस्त प्राणियों की बोलियों को जानने वाला और सभी जीवों पर दया करने वाला मैं था। इसलिए मैं इसे अपने आश्रम ले आया और इसे अपनी पुत्री के रूप में स्थापित किया।"

व्याख्या: महर्षि कण्व बताते हैं कि पक्षियों ने किस प्रकार उन्हें इस बालिका (शकुंतला) के बारे में बताया और उन्होंने इसे अपनी मानस पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया।

श्लोक 25-27

शरीरकृत्प्राणदाता यस्य चान्नानि भुञ्जते। क्रमगणैते त्रयोऽप्युक्ताः पितरो धर्मशासने।। (1-93-25) निर्जने तु वने यस्माच्छकुन्तैः परिवारिता। शकुन्तलेति नामास्याः कृतं चापि ततो मया।। (1-93-26) एवं दुहितरं विद्धि मम विप्र शकुन्तलाम्। शकुन्तला च पितरं मन्यते मामनिन्दिता।। (1-93-27)

हिंदी अनुवाद: धर्मशासन में शरीर की रचना करने वाला (जन्मदाता), प्राणदाता (जीवन रक्षा करने वाला) और अन्न खिलाने वाला—ये तीनों ही पिता कहे गए हैं। निर्जन वन में यह जिस प्रकार पक्षियों (शकुंतों) से घिरी हुई पाई गई थी, इसलिए मैंने इसका नाम 'शकुंतला' रख दिया। हे विप्र! तुम मेरी इस पुत्री शकुंतला के विषय में ऐसा ही जानो। यह अनिंदिता शकुंतला भी मुझे ही अपना पिता मानती है।

व्याख्या: ऋषि कण्व स्पष्ट करते हैं कि शास्त्रानुसार जन्मदाता के अलावा प्राण रक्षा और पालन-पोषण करने वाले का भी पिता का ही स्थान होता है, और चूंकि इसे पक्षियों ने पाला था तथा उन्होंने इसे संरक्षण दिया, इसलिए इसका नाम शकुंतला पड़ा और वे इसके पालक पिता हैं।

श्लोक 28-29

शकुन्तलोवाच। एतदाचष्ट पृष्टः सन्मम जन्म महर्षये। सुतां कण्वस्य मामेवं विद्धि त्वं मनुजाधिप।। (1-93-28) कण्वं हि पितरं मन्ये पितरं स्वमजानती। इति ते कथितं राजन्यथावृत्तं श्रुतं मया।। (1-93-29)

हिंदी अनुवाद: शकुंतला बोली— "महर्षि कण्व ने पूछे जाने पर मेरे जन्म का यह सारा वृत्तांत उस ऋषि से कहा था। हे मनुजाधिप! आप मुझे कण्व की ही पुत्री जानिए। मैं अपने वास्तविक पिता को नहीं जानती, केवल कण्व को ही अपना पिता मानती हूँ। हे राजन्! जैसा मैंने सुना था और जैसा घटित हुआ था, वह सब इतिहास मैंने आपको कह सुनाया है।"

व्याख्या: शकुंतला राजा दुष्यंत के समक्ष अपने जन्म का संपूर्ण सत्य और महर्षि कण्व के साथ अपने संबंधों का विवरण समाप्त करती हैं, जिससे दुष्यंत को उनके राजवंश और उत्पत्ति का संपूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

।। इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि त्रिनवतितमोऽध्यायः।। 93 ।।

संभवपर्वणि द्विनवतितमोऽध्यायः

संभवपर्वणि चतुर्नवतितमोऽध्यायः