श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः

महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 150वें अध्याय (संभवपर्व) के श्लोकों का क्रमबद्ध श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:

श्लोक 1 और 2

श्लोक:

जनमेजय उवाच। द्रुपदस्यापि विप्रर्षे श्रोतुमिच्छामि संभवम्। कथं चापि समुत्पन्नः कथमस्त्राण्यवाप्तवान्।। (1-150-1) एतदिच्छामि भगवंस्त्वत्तः श्रोतुं द्विजोत्तम। कौतूहलं जन्मसु मे कीर्त्यमानेष्वनेकशः।। (1-150-2)

  • हिंदी अनुवाद: जनमेजय ने कहा—हे विप्रर्षे! मैं द्रुपद के भी जन्म (संभव) के विषय में सुनना चाहता हूँ कि उनका जन्म किस प्रकार हुआ था और उन्होंने अस्त्र-शस्त्रों की प्राप्ति कैसे की थी? (1-150-1) हे भगवन्! हे द्विजोत्तम! मैं यह सब आपसे सुनना चाहता हूँ, क्योंकि अनेकों जन्मों के विषय में चर्चा होने पर मेरे मन में महान कौतूहल उत्पन्न हो रहा है। (1-150-2)
  • व्याख्या: राजा जनमेजय वैशंपायन जी से राजा द्रुपद के पूर्व जन्म या उनके मूल जन्म और उनकी अस्त्र-प्राप्ति की कथा विस्तार से सुनाने का अनुरोध करते हैं।

श्लोक 3, 4, 5 और 6

श्लोक:

वैशंपायन उवाच। राजा बभूव पाञ्चालः पुत्रार्थी पुत्रकारणात्। वनं गतो महाराजस्तपस्तेपे सुदारुणम्।। (1-150-3) आराधयन्प्रयत्नेन महर्षीन्संशितव्रतान्। तस्य संतप्यमानस्य वने मृगगणायुते।। (1-150-4) कालस्तु सुमहान्राजन्नत्ययात्सुतकारणात्। स तु राजा महातेजास्तपस्तीव्रं समाददे।। (1-150-5) कंचित्कालं वायुभक्षो निराहारस्तथैव च। तथैव तु महाबाहोर्वर्तमानस्य भारत।। (1-150-6)

  • हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—हे महाराज! पाँचाल देश के राजा (पूर्ववर्ती राजा) पुत्र की इच्छा से पुत्र प्राप्ति के लिए वन में गए और उन्होंने अत्यंत दारुण (कठिन) तपस्या की। (1-150-3) वे दृढ़ व्रत वाले महर्षियों की पूरी प्रयत्न के साथ आराधना करते थे। मृगों के समूहों से युक्त उस वन में तपस्या करते हुए उन राजा का... (1-150-4) पुत्र की कामना में बहुत लंबा समय बीत गया। तब उन महातेजस्वी राजा ने और भी तीव्र तपस्या आरंभ कर दी। (1-150-5) हे भारत! महाबाहु राजा ने कुछ काल तक केवल वायु का भक्षण करते हुए और बिल्कुल निराहार रहकर वैसा ही कठिन व्रत जारी रखा। (1-150-6)
  • व्याख्या: प्राचीनकाल में पाँचाल देश के एक राजा संतान प्राप्ति की इच्छा से घोर वन में जाकर अत्यंत कठिन तपस्या करते हैं, जिसमें वे लंबे समय तक केवल वायु के सहारे बिना भोजन के रहते हैं।

श्लोक 7, 8, 9, 10 और 11

श्लोक:

कालस्तस्य महाराज यातो वै नृपसत्तम। ततो नातिचिरात्काले वसन्ते कामदीपने।। (1-150-7) फुल्लाशोकवने चैव प्राणिनां सुमनोहरे। नद्यास्तीरं ततो गत्वा गङ्गायाः पद्मलोचनः।। (1-150-8) नियमस्थश्च राजासीत्तदा भरतसत्तम। ततो नातिचिरात्काले वनं तन्मनुजेश्वर।। (1-150-9) संप्राप्ता ह्यप्सरा राजन्मेनकेत्यभिविश्रुता। पुष्पद्रुमान्सज्जमाना राज्ञो दर्शनमागमत्।। (1-150-10) न ददर्श तु सा राजंस्तत्र स्थानगतं नृपम्। दृष्ट्वा चाप्सरसं तां तु शुक्रं राज्ञोऽपतद्भुवि।। (1-150-11)

  • हिंदी अनुवाद: हे महाराज नृपसत्तम! इस प्रकार उनका बहुत सा समय बीत गया। तदनंतर, काम भावना को प्रदीप्त करने वाले वसंत ऋतु के आने पर— (1-150-7) खिले हुए अशोक के वनों से तथा प्राणियों के मन को मोहने वाले गङ्गा जी के तट पर जाकर, कमल जैसे नेत्रों वाले वे राजा नियमपूर्वक स्थित हो गए। (1-150-8, 9) हे मनुजेश्वर भरतसत्तम! उसी समय उस वन में मेनका नाम से विख्यात एक प्रसिद्ध अप्सरा आ पहुँची। (1-150-10) फूलों के वृक्षों को सजाती हुई वह अप्सरा राजा के दर्शन के लिए आई। हे राजन्! लेकिन उसने वहाँ ध्यान में बैठे हुए राजा को नहीं देखा (अर्थात राजा अपने कड़े नियमों और तप के कारण छिपे या स्थिर थे)। जब राजा ने उस अप्सरा को देखा, तो उनके मन में विकार उत्पन्न होने से उनका वीर्य (शुक्र) पृथ्वी पर गिर गया। (1-150-11)
  • व्याख्या: तपस्या के दौरान वसंत ऋतु में जब मेनका नामक अप्सरा गङ्गा तट पर आती है, तो उसके सौंदर्य को देखकर राजा का मन विचलित हो जाता है और उनका वीर्य पृथ्वी पर गिर पड़ता है।

श्लोक 12, 13, 14 और 15

श्लोक:

ततः स राजा राजेन्द्र लज्जया नृपतिः स्वयम्। पद्भ्यामाक्रमतायुष्मंस्ततस्तु द्रुपदोऽभवत्।। (1-150-12) ततस्तु तपसा तस्य राजर्षेर्भावितात्मनः। पुत्रः समभवच्छीघ्रं पदोस्तस्य क्रमेण तु।। (1-150-13) तेनास्य ऋषयः सर्वे समागम्य तपोधनाः। नाम चुक्रुर्हि विद्वांसो द्रुपदोऽस्त्विति भारत।। (1-150-14) स तस्यैवाश्रमे राजन्भरद्वाजस्य भारत। ववृधे सुमुखं तत्र कामैः सर्वैर्नृपोत्तम।। (1-150-15)

  • हिंदी अनुवाद: हे आयुष्मन् राजेन्द्र! तब लज्जित होकर उन राजा ने अपने पैरों से उस (गिर Weery) को पृथ्वी पर कुचल दिया (मसल दिया)। हे राजन्! उसी से 'द्रुपद' का जन्म हुआ (अर्थात पैरों से कुचले जाने के कारण उनका नाम द्रुपद पड़ा)। (1-150-12) तदनंतर उस शुद्ध अंतःकरण वाले राजर्षि की तपस्या और उस पद (पैर द्वारा कुचले जाने के क्रम) के प्रभाव से शीघ्र ही एक पुत्र उत्पन्न हुआ। (1-150-13) हे भारत! इससे संकलित होकर सभी तपोधन विद्वान ऋषियों ने मिलकर उसका नाम "द्रुपद" रख दिया। (1-140-14) हे राजन् नृपोत्तम! भारत, वह बालक भरद्वाज मुनि के ही आश्रम में सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं और कामनाओं के साथ हँसता-खेलता बड़ा हुआ। (1-150-15)
  • व्याख्या: पैर (पाद) से कुचले जाने के कारण उस बालक का नाम 'द्रुपद' रखा जाता है। वह बालक महर्षि भरद्वाज के आश्रम में ही पलता-बढ़ता है।

श्लोक 16, 17, 18, 19 और 20

श्लोक:

पाञ्चालोऽपि हि राजेन्द्र स्वराज्यं गतवान्प्रभुः। भरद्वाजस्य विद्यार्थं सुतं दत्वा महात्मनः।। (1-150-16) स कुमारस्ततो राजन्द्रोणेन सहितो वने। वेदांश्चाधिजगे साङ्गान्धनुर्वेदांश्च भारत।। (1-150-17) परया स मुदा युक्तो विचचार वने सुखम्। तस्यैवं वर्तमानस्य वने वनचरैः सह।। (1-150-18) कालेनातिचिराद्राजन्पिता स्वर्गमुपेयिवान्। स समागम्य पाञ्चालैः पाञ्चालेष्वभिषेचितः।। (1-150-19) प्राप्तश्च राज्यं राजेन्द्र सुहृदां प्रीतिवर्धनः। राज्यं ररक्ष धर्मेण यथा चेन्द्रस्त्रिविष्टपम्।। (1-150-20)

  • हिंदी अनुवाद: हे राजेन्द्र! पाँचाल नरेश (पूर्व राजा) ने महात्मा भरद्वाज के पुत्र (द्रोण) को शिक्षा दिलाने के लिए अपना पुत्र (द्रुपद) सौंप दिया और वे स्वयं अपने स्वराज्य को लौट गए। (1-150-16) हे भारत! राजन्, वे दोनों कुमार (द्रोण और द्रुपद) वन में एक साथ रहकर अंगों सहित वेदों और धनुर्विद्या (अस्त्र-शस्त्रों का ज्ञान) का अध्ययन करने लगे। (1-150-17) वे परम आनंद से युक्त होकर वन में सुखपूर्वक विचरते थे। वन में वनचरों (मित्रों) के साथ इस प्रकार रहते हुए... (1-150-18) हे राजन्! बहुत समय बीतने पर उनके पिता (पूर्व राजा) स्वर्ग को प्राप्त हो गए। तब पाँचालों ने मिलकर उन्हें पाँचाल देश के सिंहासन पर राज्याभिषेक कर दिया। (1-150-19) हे राजेन्द्र! मित्रों के आनंद को बढ़ाने वाले द्रुपद ने राज्य प्राप्त करके देवताओं के राजा इंद्र की भाँति स्वर्ग (त्रिविष्टप) के समान धर्मपूर्वक अपनी प्रजा की रक्षा की। (1-150-20)
  • व्याख्या: द्रुपद और द्रोण बचपन में भरद्वाज आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण करते हैं और गाढ़ मित्रता रखते हैं। बाद में पिता की मृत्यु के पश्चात द्रुपद पाँचाल देश के राजा बनते हैं और धर्मपूर्वक राज्य का संचालन करते हैं।

श्लोक 21 (अध्याय का समापन)

श्लोक:

एतन्मया ते राजेन्द्र यथावत्परिकीर्तितम्। द्रुपदस्य च राजर्षेर्धृष्टद्युम्नस्य जन्म च।। (1-150-21) इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि संभवपर्वणि पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।। 150 ।।

  • हिंदी अनुवाद: हे राजेन्द्र! इस प्रकार राजर्षि द्रुपद का और धृष्टद्युम्न का जन्म—जैसा हुआ था, वह सब मैंने आपको यथार्थ रूप से कह सुनाया है। (1-150-21)
  • व्याख्या: इस प्रकार वैशंपायन मुनि राजा जनमेजय को द्रुपद के अनोखे जन्म और धृष्टद्युम्न तथा द्रौपदी के जन्म की पूरी पृष्ठभूमि विस्तार से सुनाकर इस अध्याय को समाप्त करते हैं।
॥ इति श्रीमन्महाभारते आदिपर्वणि
संभवपर्वणि पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः॥

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