महाभारत के आदिपर्व के अंतर्गत 152वें अध्याय (संभवपर्व) का क्रमबद्ध श्लोक, हिंदी अनुवाद और व्याख्या नीचे प्रस्तुत है:
श्लोक 1 से 3: दुर्योधन की ईर्ष्या और पाण्डवों की नीति
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। प्राणाधिकं भीमसेनं कृतविद्यं धनञ्जयम्। दुर्योधनो लक्षयित्वा पर्यतप्यत दुर्मनाः।। (1-152-1) ततो वैकर्तनः कर्णः शकुनिश्चापि सौबलः। अनेकारभ्युपायैस्ते जिघांसन्ति स्म पाण्डवान्।। (1-152-2) पाण्डवा अपि तत्सर्वं प्रतिचक्रुर्यथाबलम्। उद्भावनमकुर्वन्तो विदुरस्य मते स्थिताः।। (1-152-3)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—प्राणों से भी बढ़कर प्रिय भीमसेन तथा अस्त्र-विद्या में निपुण धनंजय (अर्जुन) को देखकर दुर्मना दुर्योधन मन ही मन अत्यधिक संतप्त (दुखी) होने लगा। (1-152-1) तदनंतर सूतपुत्र कर्ण और गांधारराज शकुनि ने अनेक उपायों से पाण्डवों को मारने (प्राण से समाप्त करने) की योजनाएँ बनानी शुरू कर दीं। (1-152-2) उधर पाण्डव भी महात्मा विदुर के परामर्श के अनुसार चलते हुए, अपनी ओर से कोई बड़ा विवाद उत्पन्न किए बिना, यथाशक्ति उनके उन षड्यंत्रों का प्रतिविधेय (बचाव) करते रहे। (1-152-3)
- व्याख्या: भीम और अर्जुन की बढ़ती लोकप्रियता और पराक्रम को देखकर दुर्योधन, कर्ण और शकुनि पाण्डवों को रास्ते से हटाने के षड्यंत्र रचने लगते हैं, जबकि विदुरजी के मार्गदर्शन में पाण्डव सतर्क रहते हैं।
श्लोक 4 से 9: नगरवासियों (पौरों) की चर्चा और युधिष्ठिर के प्रति प्रेम
श्लोक:
गुणैः समुदितान्दृष्ट्वा पौराः पाण्डुसुतांस्तदा। कथयाञ्चक्रिरे तेषां गुणान्संसत्सु भारत।। (1-152-4) राज्यप्राप्तिं च संप्राप्तं ज्येष्ठं पाण्डुसुतं तदा। कथयन्ति स्म संभूय चत्वरेषु सभासु च।। (1-152-5) प्रज्ञाश्चक्षुरचक्षुष्ट्वाद्धृतराष्ट्रो जनेश्वरः। राज्यं न प्राप्तवान्पूर्वं स कथं नृपतिर्भवेत्।। (1-152-6) तथा शान्तनवो भीष्मः सत्यसन्धो महाव्रतः। प्रत्याख्याय पुरा राज्यं न स जातु ग्रहीष्यति।। (1-152-7) ते वयं पाण्डवज्येष्ठं तरुणं वृद्धशीलिनम्। अभिषिञ्चाम साध्वद्य सत्यकारुण्यवेदिनम्।। (1-152-8) स हि भीष्मं शान्तनवं धृतराष्ट्रं च धर्मवित्। सपुत्रं विविधैर्भोगैर्योजयिष्यति पूजयन्।। (1-152-9)
- हिंदी अनुवाद: हे भारत! पाण्डुपुत्रों को सभी सद्गुणों से संपन्न देखकर नगर के लोग (पौर) सभाओं में उनके गुणों की चर्चा करने लगे। (1-152-4) वे चौराहों और सभा-भवनों में एकत्र होकर यह कहने लगे कि अब ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर को राज्याधिकार प्राप्त होना चाहिए। (1-152-5) जनता कहती थी—"राजा धृतराष्ट्र नेत्रहीन (प्रज्ञाचक्षु) होने के कारण पूर्वकाल में राजा नहीं बन सके थे, अतः अब वे राजसिंहासन के अधिकारी कैसे हो सकते हैं? (1-152-6) इसी प्रकार सत्यसंध और महाव्रती शांतनु-पुत्र भीष्म ने पहले ही राज्य का त्याग कर दिया है, अतः वे भी कभी राज्य ग्रहण नहीं करेंगे। (1-152-7) इसलिए हम सबका यही कर्तव्य है कि हम युवा होने पर भी वृद्धों जैसा शील रखने वाले, सत्य और करुणा के ज्ञाता ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर का आज ही राज्याभिषेक करें। (1-152-8) वे धर्मज्ञ युधिष्ठिर शांतनुपुत्र भीष्म तथा धृतराष्ट्र को उनके पुत्रों सहित विभिन्न प्रकार के भोगों से संतुष्ट करते हुए उनका पूर्ण आदर करेंगे।" (1-152-9)
- व्याख्या: हस्तिनापुर की प्रजा और नगरवासी पाण्डवों के गुणों से अत्यधिक प्रभावित थे और वे चाहते थे कि धृतराष्ट्र और भीष्म के पूर्वत्याग/अक्षमता को देखते हुए युधिष्ठिर को ही राजा बनाया जाए।
श्लोक 10 से 15: दुर्योधन का धृतराष्ट्र के पास जाकर विलाप करना
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। तेषां दुर्योधनः श्रुत्वा तानि वाक्यानि जल्पताम्। युधिष्ठिरानुरक्तानां पर्यतप्यत दुर्मतिः।। (1-152-10) स तप्यमानो दुष्टात्मा तेषां वाचो न चक्षमे। ईर्ष्यया चापि संतप्तो धृतराष्ट्रमुपागमत।। (1-152-11) ततो विरहितं दृष्ट्वा पितरं प्रतिपूज्य सः। पौरानुरागसंतप्तः पश्चादिदमभाषत।। (1-152-12) श्रुता मे जल्पतां तात पौराणामशिवा गिरः। त्वामनादृत्य भीष्मं च पतिमिच्छन्ति पाण्डवम्।। (1-152-13) मतमेतच्च भीष्मस्य न स राज्यं बुभुक्षति। अस्माकं तु परां पीडां चिकीर्षन्ति पुरे जनाः।। (1-152-14) पितृतः प्राप्तवान्राज्यं पाण्डुरात्मगुणैः पुरा। त्वमन्धगुणसंयोगात्प्राप्तं राज्यं न लब्धवान्।। (1-152-15)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—युधिष्ठिर के प्रति अनुरक्त उन नगरवासियों के ऐसे वचन सुनकर दुर्मति दुर्योधन जल उठा। (1-152-10) ईर्ष्या से संतप्त और क्रुद्ध उस दुष्टात्मा ने लोगों की वह बातें सहन नहीं कीं और वह सीधे अपने पिता धृतराष्ट्र के पास गया। (1-152-11) तब पिता को एकांत में बैठे देख, उनका आदर करके, नगरवासियों के प्रेम से दुखी हुए दुर्योधन ने उनसे यह बात कही— (1-152-12) "हे तात! मैंने नगरवासियों के मुँह से वे अशुभ वचन सुने हैं, जो वे आपस में कह रहे थे। वे आपकी और भीष्म जी की उपेक्षा करके पाण्डव (युधिष्ठिर) को अपना स्वामी बनाना चाहते हैं। (1-152-13) भीष्म जी की भी यही इच्छा है कि वे राज्य नहीं भोगेंगे। इस प्रकार ये नगर के लोग हम लोगों को अत्यंत पीड़ा पहुँचाना चाहते हैं। (1-152-14) पूर्वकाल में पाण्डु ने अपने सद्गुणों से पिता (व्यास/शांतनु की परंपरा से) का राज्य प्राप्त किया था, किंतु आप नेत्रहीन होने के कारण उस समय राज्य नहीं पा सके थे। (1-152-15)
- व्याख्या: जनता द्वारा युधिष्ठिर के पक्ष में की जा रही चर्चाओं को सुनकर दुर्योधन भय और ईर्ष्या से भर जाता है और अपने पिता धृतराष्ट्र के पास जाकर अपनी व्यथा और आशंका व्यक्त करता है।
श्लोक 16 से 19: दुर्योधन की आशंका और धृतराष्ट्र को उकसाना
श्लोक:
स एष पाण्डोर्दायाद्यं यदि प्राप्नोति पाण्डवः। तस्य पुत्रो ध्रुवं प्राप्तस्तस्य तस्यापि चापरः।। (1-152-16) ते वयं राजवंशेन हीनाः सह सुतैरपि। अवज्ञाता भविष्यामो लोकस्य जगतीपते।। (1-152-17) सततं निरयं प्राप्ताः परपिण्डोपजीविनः। न भवेम यथा राजंस्तथा नीतिर्विधीयताम्।। (1-152-18) यदि त्वं हि पुरा राजन्निदं राज्यमवाप्तवान्। ध्रुवं प्राप्स्याम च वयं राज्यमप्यवशे जने।। (1-152-19)
- हिंदी अनुवाद: "यदि यह पाण्डव युधिष्ठिर पाण्डु की इस पैतृक संपत्ति को पा जाता है, तो इसके बाद इसका पुत्र और फिर उसका पुत्र भी निश्चित ही राज्य का अधिकारी बन जाएगा। (1-152-16) ऐसी स्थिति में हे जगतीपते! हम सब अपने पुत्रों सहित राजवंश से हीन होकर इस संसार में अपमानित हो जाएँगे। (1-152-17) हे राजन्! हम सदा नरक के समान कष्ट पाते हुए दूसरों के अन्न पर पलने वाले (परावलम्बी) न बनें, इसके लिए आप ऐसी नीति का निर्धारण करें। (1-152-18) यदि आप पूर्वकाल में राजा बन जाते (राज्य प्राप्त कर लेते), तो हम लोग भी इस जनता के अनिच्छा होने पर भी निश्चित रूप से इस राज्य को पा लेते।" (1-152-19)
- व्याख्या: दुर्योधन अपने पिता को राज्याधिकार छिन जाने और भविष्य में दासों जैसा जीवन जीने का भय दिखाता है, ताकि धृतराष्ट्र पाण्डवों के विरुद्ध कोई कठोर कदम उठाने के लिए बाध्य हों।
श्लोक 20 से 28: धृतराष्ट्र का उत्तर और पाण्डवों की स्थिति का वर्णन
श्लोक:
वैशंपायन उवाच। धृतराष्ट्रस्तु पुत्रस्य श्रुत्वा वचनमीदृशम्। मुहूर्तमिव संचिन्त्य दुर्योधनमथाब्रवीत्।। (1-152-20) धर्मनित्यस्तथा पाण्डुः सुप्रीतो मयि कौरवः। सर्वेषु ज्ञातिषु तथा मदीयेषु विशेषतः।। (1-152-21) नात्र किंचन जानाति भोजनादि चिकीर्षितम्। निवेदयति तत्सर्वं मयि धर्मभृतां वरः।। (1-152-22) तस्य पुत्रो यथा पाण्डुस्तथा धर्मपरः सदा। गुणावाँल्लोकविख्यातो नगरे च प्रतिष्ठितः।। (1-152-23) स कथं शक्यतेऽस्माभिरपाक्रष्टुं नरर्षभः। राज्यमेष हि नः प्राप्तः ससहयो विशेषतः।। (1-152-24) भृता हि पाण्डुनाऽमात्या बलं च सततं मतम्। धृताः पुत्राश्च पौत्राश्च तेषामपि विशेषतः।। (1-152-25) ते तथा संस्तुतास्तात विषये पाण्डुना नराः। कथं युधिष्ठिरस्यार्थे न नो हन्युः सबान्धवान्।। (1-152-26) नैते विषयमिच्छेयुर्धर्मत्यागे विशेषतः। ते वयं कौरवेन्द्राणामेतेषां च महात्मनाम्।। (1-152-27) कथं न वाच्यतां तात गच्छेम जगतस्तथा।। (1-152-28)
- हिंदी अनुवाद: वैशंपायन जी कहते हैं—पुत्र दुर्योधन के ऐसे वचन सुनकर राजा धृतराष्ट्र ने थोड़ी देर तक विचार किया और फिर दुर्योधन से कहा— (1-152-20) "हे कौरव! पाण्डु हमेशा धर्मपरायण रहे और मुझ पर, तथा विशेषकर हमारे सभी संबंधियों पर बहुत प्रेम रखते थे। (1-152-21) वे धर्मभृतां वर पाण्डु अपने भोजन आदि की इच्छाओं में भी कभी कोई भेद नहीं मानते थे और हर बात मुझसे कहकर ही करते थे। (1-152-22) उनके पुत्र युधिष्ठिर भी अपने पिता पाण्डु के ही समान सदा धर्मपरायण, गुणी, लोकविख्यात और नगर में प्रतिष्ठित हैं। (1-152-23) ऐसे नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर को हम लोग उनके राज्य से कैसे हटा सकते हैं? विशेषकर वे अपने सहयोगियों के साथ इस समय राज्य प्राप्त कर चुके हैं। (1-152-24) पाण्डु ने अपने समय में मंत्रियों और सेना का हमेशा सम्मान किया तथा उनके पुत्रों और पौत्रों का भी विशेष पालन-पोषण किया है। (1-152-25) हे तात! पाण्डु द्वारा सम्मानित वे लोग युधिष्ठिर के लिए क्या हम सबको सपरिवार नहीं मार डालेंगे? (1-152-26) वे लोग धर्म का त्याग करके इस प्रकार अन्यायपूर्ण राज्य-हरण को कभी स्वीकार नहीं करेंगे। यदि हम ऐसा करेंगे, तो कौरव-वंश के इन महापुरुषों की दृष्टि में हम संसार भर में क्या अपयश और निंदा के पात्र नहीं बन जाएँगे?" (1-152-27, 28)
- व्याख्या: धृतराष्ट्र दुर्योधन को समझाते हैं कि पाण्डु और पाण्डव अत्यंत धर्मिष्ठ, प्रिय और प्रजा-समर्थित हैं। उनके साथ अन्याय करने से कुल का नाश होगा और संसार में घोर अपयश मिलेगा।
श्लोक 29 से 33: दुर्योधन का कुटिल सुझाव (वारणावत भेजने की योजना)
श्लोक:
दुर्योधन उवाच। मध्यस्थः सततं भीष्मो द्रोणपुत्रो मयि स्थितः। यतः पुतस्ततो द्रोणो भविता नात्र संशयः।। (1-152-29) कृपः शारद्वतश्चैव यत एव वयं ततः। बागिनेयं ततो द्रौणिं न त्यक्ष्यति कथंचन।। (1-152-30) क्षत्ता तु बन्धुरस्माकं प्रच्छन्नस्तु ततः परैः। न चैकः स समर्थोऽस्मान्पाण्डवार्थे प्रबाधितुम्।। (1-152-31) सुविस्रब्धान्पाण्डुसुतान्सह मात्रा विवासय। वारणावतमद्यैव नात्र दोषो भविष्यति।। (1-152-32) विनिद्राकरणं घोरं हृदि शल्यमिवार्पितम्। शोपकपावकमुद्धूतं कर्मणानेन नाशय।। (1-152-33)
- हिंदी अनुवाद: दुर्योधन ने कहा—"भीष्मपितामह हमेशा तटस्थ (निष्पक्ष) रहते हैं। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थानी (द्रोणि) मेरे पक्ष में हैं, और जहाँ उनका पुत्र है, वहाँ द्रोणाचार्य भी निःसंशय हमारे ही पक्ष में होंगे। (1-152-29) शारद्वत कृपाचार्य भी उसी पक्ष में हैं जिधर हम हैं, और वे अपनी बहन के पुत्र (भांजे) अश्वत्थामा को किसी भी हाल में नहीं छोड़ेंगे। (1-152-30) विदुर (क्षत्ता) यद्यपि हमारे संबंधी हैं, किंतु उनका हृदय अंदर से पाण्डवों की तरफ है। फिर भी वे अकेले हम लोगों को पाण्डवों के पक्ष में रोक पाने में समर्थ नहीं हैं। (1-152-31) इसलिए आप पाण्डुपुत्रों को उनकी माता (कुंती) के साथ पूर्णतः आश्वस्त करके आज ही वारणावत नगर के लिए विवासित (बेच) कर दीजिए, इसमें कोई दोष नहीं होगा। (1-152-32) नींद उड़ा देने वाली, हृदय में कांटे की तरह चुभने वाली और शरीर को जलाने वाली इस भयानक ईर्ष्या रूपी अग्नि को इस कर्म (योजना) से शांत कर दीजिए।" (1-152-33)
- व्याख्या: दुर्योधन अपने पिता धृतराष्ट्र को समझाता है कि प्रमुख आचार्य (भीष्म, द्रोण, कृप) तटस्थ या परोक्ष रूप से उनके नियंत्रण में हैं, और विदुर अकेले कुछ नहीं कर सकते। इसलिए पाण्डवों और कुंती को किसी बहाने से वारणावत भेज देना चाहिए, ताकि लाक्षागृह के षड्यंत्र की नींव रखी जा सके।
संभवपर्वणि द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः।। 152 ।।
