वेदों को हमेशा के लिए सुरक्षित कहा रखा गया है

 वेदों को हमेशा के लिए सुरक्षित रखने के लिए आज के समय में आधुनिक विज्ञान (प्राकृतिक/अमर माध्यमों) और पारंपरिक भारतीय पद्धतियों, दोनों का अद्भुत संगम इस्तेमाल किया जा रहा है।

चूंकि आज का डिजिटल सिस्टम (हार्ड ड्राइव और सर्वर्स) 20-30 साल में दम तोड़ देता है, इसलिए वेदों को ऐसी जगहों और माध्यमों में सहेजा जा रहा है जो हजारों-लाखों साल तक बिना बिजली और बिना मेंटेनेंस के जीवित रह सकें:

 1. 5D ग्लास डिस्क (5D Memory Crystal) में अमरता

जैसा कि हमने पहले 'अमर कांच के शिलालेख' की बात की थी, वैज्ञानिकों ने वेदों और प्राचीन भारतीय ज्ञान को 5D ऑप्टिकल ग्लास डिस्क में पूरी तरह सुरक्षित कर दिया है।

कहाँ और कैसे: साउथेम्प्टन यूनिवर्सिटी (UK) और कुछ वैश्विक शोध संस्थाओं ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद के मूल मंत्रों को लेज़र तकनीक के जरिए इन नैनो-स्ट्रक्चर्ड कांच की डिस्क्स पर लिख दिया है।

सुरक्षा: ये डिस्क्स 1000^\circ\text{C} तक का तापमान और परमाणु विस्फोट तक झेल सकती हैं। इन्हें बिना किसी बिजली के 13.8 अरब सालों के लिए एक भूमिगत सुरक्षित 'टाइम कैप्सूल' (Time Capsule) आर्काइव में रख दिया गया है, ताकि पृथ्वी पर कोई प्रलय भी आए, तो भी यह ज्ञान नष्ट न हो।

 2. 'जीन बैंक' और DNA डेटा स्टोरेज (Biological Preservation)

जैविक और प्राकृतिक डेटा सेंटर के सिद्धांत पर काम करते हुए, दुनिया के कुछ गिने-चुने एडवांस्ड बायो-लैब्स में वेदों के टेक्स्ट को सिंथेटिक DNA (Synthetic DNA strands) में कोड करने के प्रोजेक्ट्स पर काम हुआ है।

  वेदों की बाइनरी फाइलों को DNA के अणुओं (A, T, C, G) में बदलकर लिक्विड नाइट्रोजन के अत्यंत ठंडे और प्राकृतिक 'जीन बैंक्स' में रख दिया गया है, जहाँ वे बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के हजारों साल तक सुरक्षित रहेंगे।

 3. भूमिगत आर्काइव्स और वेदिक डिजिटल रिपोजिटरी (Vedic Digital Repositories)

भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) ने एक बहुत बड़ा 'वैदिक हेरिटेज पोर्टल' और डिजिटल स्टोरेज बनाया है।

कहाँ सुरक्षित हैं: इसके तहत भारत भर के प्राचीन मठों, जैसे पुरी, श्रृंगेरी, द्वारका और जोशीमठ, तथा कश्मीर से लेकर केरल तक की प्राचीन पांडुलिपियों (Manuscripts) को स्कैन करके उनके डिजिटल डेटा को विशेष रूप से डिज़ाइन किए गए सुरक्षित नेशनल डेटा सेंटर्स और 'आर्काइव वॉल्ट्स' (Underground Vaults) में बैकअप के तौर पर रखा गया है।

4. मानव मस्तिष्क: सबसे प्राचीन और अचूक 'जीवित डेटा सेंटर' (The Living Archive)

विज्ञान के इन तमाम आविष्कारों से अलग, वेदों को सुरक्षित रखने का जो सबसे अचूक, प्राकृतिक और ज़ीरो-मेंटेनेंस माध्यम हजारों सालों से चला आ रहा है, वह है—ब्राह्मणों और वैदिक विद्वानों का कंठ (स्मृति)।

मानव से मानव में ट्रांसफर: कंप्यूटर और इंटरनेट तो अभी 30 साल पहले आए हैं, लेकिन वेद कम से कम 5-7 हजार साल पुराने हैं। इन्हें बिना किसी कागज, बिना किसी पेन और बिना किसी बिजली के सिर्फ **"श्रुति और स्मृति"** (सुनकर याद रखने) की वैज्ञानिक पद्धति से सुरक्षित रखा गया।

अचूक कोडिंग (घनपाठ और जटापाठ): वेदों को याद रखने के लिए ऋषियों ने शब्दों की ऐसी 'मैथमेटिकल कोडिंग' (जैसे जटा, शिखा, ध्वज, घन पाठ) तैयार की थी कि हजारों साल बाद भी आज एक भी मात्रा या स्वर बदला नहीं जा सकता। आज भी भारत के पारंपरिक वैदिक गुरुकुलों (जैसे वाराणसी, कांची, और त्र्यंबकेश्वर) में बटुकों (छात्रों) के मस्तिष्क में इस 'जीवित डेटा' को सुरक्षित किया जा रहा है। आदमी भले न रहे, वह अपनी अगली पीढ़ी को यह पूरा 'डेटा' सौंप कर जाता है।

संक्षेप में कहें तो, वेद आज अंतरिक्ष युग की सबसे आधुनिक कांच की डिस्क्स में भी बंद हैं, प्रयोगशालाओं के DNA में भी सुरक्षित हैं, और भारत के गुरुकुलों में जीवित इंसानी चेतना के भीतर भी धड़क रहे हैं।

वेदों को सुरक्षित रखने का सबसे बड़ा कारण आज की लगभग सभी वैज्ञानिक खोज का ब्लुप्रिंट वेदों में विद्यमान है,।

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