दश कुमार चरित भाग १० मित्रगुप्त के साहसिक कारनामे

मित्रगुप्त के साहसिक कारनामे (The Adventures of Mitragupta)

मित्रगुप्त के साहसिक कारनामे (The Adventures of Mitragupta)

"हे महाराज! मैं भी अन्य लोगों की भाँति आपकी खोज में यात्रा पर निकला हूँ। भटकते हुए एक दिन मैं दामलिप्त (ताम्रलिप्त) नगर पहुँचा। वहाँ मैंने देखा कि नगर के बाहर एक विशाल उद्यान में लोगों की भारी भीड़ एकत्र है। उत्सव का कारण जानने के लिए मैं किसी परिचित को ढूँढ़ ही रहा था कि मेरी दृष्टि एक नवयुवक पर पड़ी। वह एक एकांत लता-कुंज में बैठा हुआ वीणा बजाकर स्वयं का मनोरंजन कर रहा था।

मैंने उसके समीप जाकर पूछा, 'भद्र! इस जनसमूह के एकत्र होने का क्या कारण है? और आप यहाँ दूसरों से दूर अकेले क्यों बैठे हैं?'

उसने लंबी श्वास लेकर उत्तर दिया, 'सखे! बहुत समय पहले इस देश के राजा निःसंतान थे। संतान प्राप्ति की कामना से उन्होंने देवी दुर्गा की कठोर आराधना की और अनेक उत्तम बलियाँ अर्पित कीं। अंततः देवी ने प्रसन्न होकर उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और कहा—*तुम्हारी प्रार्थना स्वीकार कर ली गई है। तुम्हारी रानी जुड़वाँ बच्चों को जन्म देगी; एक पुत्री, जो तुम्हारी राज्य-उत्तराधिकारी बनेगी, और एक पुत्र, जो विवाह के पश्चात अपनी बहन और उसके पति के अधीन रहकर कार्य करेगा। इसके अतिरिक्त मेरी यह भी इच्छा है कि पुत्री के सातवें वर्ष से आरम्भ करके, प्रतिवर्ष कृत्तिका नक्षत्र से युक्त महीने (कार्तिक मास) में एक महान उत्सव आयोजित किया जाए। इसे "कन्दुक उत्सव" (गेंद का खेल) कहा जाएगा, जिसमें वह सार्वजनिक रूप से जनसमूह के सम्मुख अपने नृत्य और कला-कौशल का प्रदर्शन करेगी। विवाह के विषय में उसे पूर्ण स्वतंत्रता होगी; वह स्वयं बिना किसी दबाव के अपने पति का चुनाव करेगी। जो कोई भी उससे विवाह करेगा, उसे उसके समान ही शक्ति प्राप्त होगी और वह तुम्हारी मृत्यु के पश्चात इस राज्य पर शासन करेगा।*

नवयुवक ने आगे कहा, 'देवी का वह स्वप्न-वचन पूर्ण हुआ। रानी ने एक पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। राजा ने सहर्ष देवी की आज्ञा का पालन किया। आज वही राजकुमारी, जिसका नाम **कन्दुकवती** है, देवी दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए यहाँ कन्दुक-नृत्य (गेंद का खेल) प्रस्तुत करने वाली है। यह जनसमूह उसी का गवाह बनने आया है।

अब रही मेरी बात कि मैं यहाँ अकेला क्यों बैठा हूँ, तो सुनिए। राजकुमारी कन्दुकवती की एक अत्यंत प्रिय सखी और धात्री-भगिनी (पालक बहन) है—**चन्द्रसेना**। मेरा उससे प्रेम है और हमारी सगाई हो चुकी है। किंतु हाल ही में राजकुमारी के दुष्ट और क्रूर भाई **भीमधन्वा** की कुदृष्टि उस पर पड़ी है। वह उसे निरंतर प्रताड़ित कर रहा है। भीमधन्वा के दुराचारी चरित्र को जानते हुए मुझे यह घोर भय है कि वह किसी दिन चन्द्रसेना के साथ बलप्रयोग न कर बैठे। इसी चिंता और व्याकुलता के कारण मैं इस उत्सव में सम्मिलित नहीं हो पा रहा हूँ।'

तभी अचानक नूपुरों (पायल) की मधुर झंकार सुनाई दी और एक अत्यंत सुंदर युवती हमारे समीप आई। उसे देखकर मेरा वह नया मित्र आनंदित हो उठा। उसने उसका हाथ थामकर मुझसे परिचय कराते हुए कहा, 'मित्र! यह वही चन्द्रसेना है, जो मुझे अपने प्राणों से भी प्रिय है। इस दुष्ट भीमधन्वा के कारण इसके वियोग का विचार मुझे चिता की अग्नि की भाँति जलाता है। यदि उस पापी ने अपनी कुचेष्टाएँ बंद नहीं कीं, तो मैं अपने प्राण दे दूँगा, किंतु उसे सहूँगा नहीं।'

चन्द्रसेना ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से अपने प्रियतम को देखते हुए कहा, 'हे प्रिय! ऐसा आत्मघाती कदम उठाने का विचार भी मन में न लाएँ। यदि आप कोई हिंसक कदम उठाएँगे, तो निश्चित ही अपने प्राणों से हाथ धो बैठेंगे। यदि आप मुझसे वास्तव में प्रेम करते हैं, तो मेरी बात मानिए। हम इसी क्षण यह देश छोड़कर किसी दूरस्थ राज्य में पलायन कर जाते हैं, जहाँ हम उस अत्याचारी भीमधन्वा से सुरक्षित रहकर अपना जीवन व्यतीत कर सकें।'

इसके पश्चात उस युवक ने मेरी ओर मुड़कर कहा, 'महाभाग! आप एक महान यात्री प्रतीत होते हैं। कृपा कर हमें किसी ऐसे सुरक्षित और रमणीय देश का मार्ग सुझाइए, जहाँ हम सुखपूर्वक रह सकें।'

मैं उनकी विवशता पर मंद-मंद मुस्कुराया और कहा, 'यह संसार अत्यंत विशाल है और यहाँ रहने के लिए अनेक सुखद देश हैं; किंतु अपने ही देश को छोड़कर निर्वासित होना बुद्धिमानी नहीं है। धैर्य रखिए, मेरे मस्तिष्क में एक ऐसी योजना है जिससे आप दोनों इसी राज्य में पूर्ण सुरक्षा और सम्मान के साथ रह सकेंगे। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें, यदि मेरी योजना विफल रही, तो मैं स्वयं आपको सर्वोत्तम स्थान पर ले जाऊँगा।'

### राजकुमारी कन्दुकवती का अद्भुत कन्दुक-नृत्य

इससे पूर्व कि हम अपनी चर्चा आगे बढ़ाते, चन्द्रसेना हड़बड़ाकर बोली, 'मुझे अब एक क्षण भी यहाँ रुकने का साहस नहीं है। मैं अपनी स्वामिनी (राजकुमारी) को छोड़कर आपसे मिलने आई थी। मुझे उनके आने की आहट सुनाई दे रही है। मुझे तुरंत उनके पास पहुँचना होगा। आप दोनों भी मंच के समीप आकर कन्दुक-उत्सव का आनंद लें।' इतना कहकर वह तीव्रता से चली गई और हम दोनों भी उसके पीछे-पीछे मुख्य रंगमंच की ओर बढ़ गए।

कुछ ही क्षणों में सखियों और परिचारिकाओं से घिरी हुई राजकुमारी कन्दुकवती मंच पर अवतरित हुई। जैसे ही मेरी दृष्टि उस पर पड़ी, मेरा हृदय पूर्णतः उसका दास हो गया। उसकी अपूर्व सुंदरता को देखकर मुझे भ्रम हो गया कि वह कोई स्वर्गीय अप्सरा है या पृथ्वी की कोई नश्वर सुंदरी। जब उसने कन्दुक-क्रीड़ा आरम्भ की, तो उसकी दैवीय भंगिमाओं ने मुझे और भी सम्मोहित कर दिया।

सर्वप्रथम उसने झुककर देवी दुर्गा को प्रणाम किया। फिर अपनी कोमल, लाल कमल जैसी उंगलियों से उस रक्त-वर्ण (लाल रंग) की गेंद को उठाकर कौतुकवश भूमि पर गिराया। भूमि से टकराकर जब गेंद वेग से ऊपर उछली, तो उसने अत्यंत फुर्ती से उसे अपने हाथ के पिछले भाग से हवा में ही रोक लिया। इसके बाद खेल की गति तीव्र होती गई। वह कभी मंद गति से तो कभी अत्यंत तीव्र वेग से गेंद को थपकियाँ देने लगी। उसके पैरों की थिरकन और घुँघरुओं की ध्वनि खेल की गति के साथ पूर्ण तालमेल बिठा रही थी।

कभी वह एकाएक स्थिर हो जाती, तो कभी किसी विहंग (पक्षी) की भाँति हवा में उड़ती हुई प्रतीत होती। कभी वह दाएँ हाथ से तो कभी बाएँ हाथ से गेंद पर प्रहार करती। एक समय ऐसा आया जब वह मधुर स्वर में गाते हुए, हवा में उछलती गेंद के नीचे नृत्य कर रही थी। गेंद मानो उसके वश में थी, वह जितनी दूर जाती, चुंबकीय आकर्षण की भाँति उसके पास लौट आती।

दर्शकों की निरंतर तालियों और जयघोष के बीच राजकुमारी का वह अद्भुत प्रदर्शन चलता रहा। उसने हाथों के साथ-साथ अपने कोमल चरणों से भी गेंद को हवा में उछाला। उसने गेंद को अपने चारों ओर इतनी तीव्र गति से घुमाया कि ऐसा प्रतीत होने लगा मानो वह स्वयं किसी लाल रंग के प्रकाश-पिंजरे में आबद्ध हो गई हो। कभी वह एक हाथ से अपने गिरे हुए केशों को सँभालती, तो दूसरे हाथ से गेंद की गति बनाए रखती। अंत में, उसने एक साथ कई गेंदों को हवा में उछालकर उन सभी को एक साथ नियंत्रण में रखने का विस्मयकारी कौशल प्रदर्शित किया।

### भीमधन्वा का विश्वासघात और समुद्र का संकट

प्रदर्शन की समाप्ति पर राजकुमारी ने पुनः देवी दुर्गा को मौन प्रणाम किया और अपनी धात्री-पुत्री चन्द्रसेना की बाहें थामकर मंच से नीचे उतरी। जाते-जाते उसने अपनी कटीली और तिरछी चितवन से मेरी ओर एक लंबी, अर्थपूर्ण दृष्टि डाली, जिसने मेरे हृदय में प्रेम की अग्नि को और प्रज्वलित कर दिया।

मेरे नए मित्र **कोशदास** (जो कि उस नवयुवक का नाम था) ने मुझे आदरपूर्वक अपने गृह पर आमंत्रित किया, जहाँ मेरा अत्यंत उत्तम सत्कार हुआ। संध्या समय चन्द्रसेना गुपचुप तरीके से कोशदास से मिलने आई। मैंने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा, 'चन्द्रसेना! मैंने तुमसे वादा किया था कि मैं तुम्हें राजकुमार भीमधन्वा के अत्याचारों से मुक्त कराऊँगा। मेरे पास एक अत्यंत दुर्लभ सिद्ध जादुई मरहम (अंजन) है। यदि इसकी अल्प मात्रा भी तुम्हारे मुख पर लगा दी जाए, तो तुम देखने वालों को एक कुरूप बंदरिया जैसी प्रतीत होने लगोगी। ऐसा होने पर वह कामी राजकुमार तुमसे स्वतः ही विमुख हो जाएगा और तुम्हारी समस्या का अंत हो जाएगा।'

चन्द्रसेना ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया, 'आर्य! आपकी इस अद्भुत सहायता के लिए मैं अत्यंत कृतज्ञ हूँ। परंतु अगले जन्म में चाहे जो भी हो, इस सुंदर यौवन में मैं बंदरिया बनने की तनिक भी इच्छा नहीं रखती! यदि आपकी बुद्धि केवल यहीं तक सीमित है, तो मुझे अपनी योजना स्वयं ही बतानी होगी। देवी दुर्गा के वरदान स्वरूप राजकुमारी कन्दुकवती को अपना वर चुनने की पूर्ण स्वतंत्रता है। वह आपके रूप-लावण्य को देखकर प्रथम दृष्टि में ही आप पर मोहित हो चुकी है। मेरी माता (राजकुमारी की मुख्य धाय), जिससे राजकुमारी अत्यधिक स्नेह करती है, वह राजकुमारी के मन में आपके प्रति प्रेम को और सुदृढ़ करेगी। राजा-रानी भी अपनी पुत्री की इच्छा का सम्मान करेंगे। एक बार यदि आपका विवाह राजकुमारी से संपन्न हो गया, तो दुष्ट भीमधन्वा स्वतः ही आपके अधीन हो जाएगा और हम सब सदा के लिए सुरक्षित हो जाएँगे। अतः आप धैर्यपूर्वक यहीं निवास करें।'

चन्द्रसेना के जाने के बाद कोशदास और मैं पूरी रात इसी विषय पर कूटनीतिक चर्चा करते रहे और हमें सोने का भान ही नहीं रहा। प्रातः काल मैं पुनः उसी उद्यान में गया और उस मंच के समीप खड़े होकर राजकुमारी की स्मृतियों में खो गया। तभी अचानक भीमधन्वा वहाँ आया। उसने अत्यंत विनम्र और मधुर व्यवहार करते हुए मुझसे परिचय बढ़ाया और मुझे राजमहल आने का निमंत्रण दिया।

उसके इस अचानक उमड़े प्रेम पर बिना कोई संदेह किए, मैं उसके साथ महल चला गया, जहाँ मेरा भव्य स्वागत हुआ। भोजन के उपरांत, रात्रि को थकान के कारण मैं पलंग पर लेटते ही गहरी नींद में सो गया और स्वप्न में अपनी प्रिय कन्दुकवती को देखने लगा। किंतु अचानक मेरी नींद खुली, तो मैंने स्वयं को लोहे की भारी जंजीरों में जकड़ा हुआ पाया। सामने भीमधन्वा खड़ा था, जिसके चेहरे पर क्रूरता और कुटिल मुस्कान थी।

वह अट्टहास करते हुए बोला, 'मूर्ख विदेशी! तूने क्या सोचा था कि तू मेरे ही विरुद्ध गुप्त योजनाएँ बनाएगा और मुझे भनक तक नहीं लगेगी? चन्द्रसेना ने जो कुछ भी तुझसे कहा था, वह सब खिड़की के बाहर छिपे मेरे एक चतुर गुप्तचर ने सुन लिया था। मेरी मूर्ख बहन तुझसे विवाह करके मुझे तेरा दास बनाना चाहती है? और तू मुझे चन्द्रसेना को छोड़ने का आदेश देगा? तू अत्यंत भ्रम में है। मैं इतनी सुगमता से पराजित होने वाला नहीं हूँ।' इसके बाद उसने अपने दो शक्तिशाली दासों को बुलाया और उनके माध्यम से मुझे जंजीरों सहित समुद्र की उत्ताल तरंगों में फेंकवा दिया।

### समुद्री डाकू, राक्षस और चार जटिल प्रश्न

यद्यपि मेरी भुजाएँ जंजीरों से बंधी थीं, तथापि मैंने अपना धैर्य नहीं खोया और पैरों के सहारे स्वयं को तैरता हुआ बनाए रखा। भाग्यवश समुद्र में बहता हुआ लकड़ी का एक विशाल लट्ठा मेरे हाथ लग गया। मैंने स्वयं को उस पर टिका दिया। पूरी रात समुद्र की लहरों से जूझने के बाद, भोर की पहली किरण के साथ मुझे एक व्यापारिक जहाज़ दिखाई दिया। उस जहाज़ के नाविकों ने मुझे संकट में देखकर ऊपर खींच लिया।

परंतु उस जहाज़ का कप्तान एक निर्दयी विदेशी था। उसने मेरी दुर्दशा पर दया करने के स्थान पर यह सोचा कि मैं युवा और बलशाली हूँ, अतः मुझे दास-बाज़ार में बेचकर वह प्रचुर धन कमा सकता है। उसने मेरी जंजीरें नहीं खोलीं। अभी हम कुछ ही दूर बढ़े थे कि समुद्र के भयानक डाकुओं (Pirates) ने अपनी तीव्र नौकाओं से हमारे जहाज़ को चारों ओर से घेर लिया और तीरों की बौछार कर दी।

व्यापारिक जहाज़ के नाविकों को परास्त होते देख मैंने कप्तान से कहा, 'यदि तुम अपनी और अपने जहाज़ की रक्षा चाहते हो, तो तुरंत मेरी जंजीरें खोल दो। मैं अकेले ही इन डाकुओं को मार भगाऊँगा।' कप्तान ने संकट की घड़ी में मेरी बात मान ली और मेरी जंजीरें काट दीं। उसने मुझे एक उत्तम धनुष और बाण सौंपे। मैंने इतनी अचूक और तीव्र तीरंदाज़ी की कि डाकुओं के प्रमुख योद्धा क्षण भर में हताहत हो गए और उनकी नावें पीछे हटने लगीं।

इसी बीच हमारा जहाज़ डाकुओं के मुख्य जहाज़ के अत्यंत समीप पहुँच गया। मैंने फुर्ती से उनके जहाज़ पर छलांग लगा दी। डाकुओं का दल पहले ही भयभीत था, मैंने उनके सेनापति को बंदी बना लिया। जब मैंने उसका मुख देखा, तो मैं स्तब्ध रह गया—वह कोई और नहीं, बल्कि स्वयं दुष्ट **भीमधन्वा** था, जो गुप्त रूप से समुद्री डाकुओं का संचालन करता था। मुझे जीवित देख उसके चेहरे का रंग उड़ गया और वह लज्जा से सिर झुकाकर मौन हो गया। मैंने कहा, 'भीमधन्वा! कहाँ गई तुम्हारी वह कूटनीति और अहंकार? आज तुम पूरी तरह मेरे अधीन हो।'

जहाज़ के नाविकों ने प्रसन्नतापूर्वक उसी लोहे की जंजीर से भीमधन्वा को बांध दिया जिससे मुझे बांधा गया था। परंतु तभी एक भयानक समुद्री चक्रवात (तूफान) आया और हमारा जहाज़ दिशा भटककर एक निर्जनावस्था वाले द्वीप के तट पर जा लगा। हम सब पानी और जंगली फलों की खोज में द्वीप पर उतरे।

जब नाविक आराम कर रहे थे, मैं द्वीप के आंतरिक भाग के अन्वेषण के लिए निकल पड़ा। एक ऊंचे पर्वत की ढलान को पार करते हुए मैं एक अत्यंत सुरम्य घाटी में पहुँचा, जहाँ रंग-बिरंगे पुष्प खिले थे और शीतल मंद हवा चल रही थी। घाटी के मध्य में एक अत्यंत सुंदर, माणिक्य जैसी चट्टानों से घिरी झील थी, जो नील कमलों से आच्छादित थी। मैंने उस पावन जल में स्नान किया और कुछ मधुर कमल-नाल (कंद) उखाड़कर खाने लगा।

जैसे ही मैं जल से बाहर आया, मेरे सम्मुख मानव रूप धारी एक विशाल और भयानक **राक्षस (ब्रह्मराक्षस)** आ खड़ा हुआ। उसने अत्यंत क्रोध में गर्जना करते हुए कहा, 'मूर्ख मानव! तू कौन है? और यहाँ आकर मेरे इस पवित्र सरोवर के कमलों को नष्ट करने का दुस्साहस कैसे किया?'

मैंने बिना किसी भय के अत्यंत शांत स्वर में उत्तर दिया, 'मैं एक ब्राह्मण हूँ, जो अनेक भयंकर विपत्तियों—समुद्र में फेंके जाने, डाकुओं के आक्रमण और तूफ़ान से बचकर यहाँ पहुँचा है। मुझे इस सरोवर का जल अत्यंत प्रिय लगा, अतः मैंने स्नान किया। मैं आपके उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता हूँ।'

राक्षस मेरी निर्भीकता से प्रभावित हुआ, किंतु उसने कड़ककर कहा, 'तू अत्यंत साहसी प्रतीत होता है। मैं तुझे जीवन दान दे सकता हूँ, परंतु इसके लिए तुझे मेरे चार प्रश्नों के सही उत्तर देने होंगे। यदि तू विफल रहा, तो मैं इसी क्षण तुझे निगल जाऊँगा।'

मैंने कहा, 'मैं आपके प्रश्नों के उत्तर देने के लिए प्रस्तुत हूँ। आप पूछ सकते हैं।'

राक्षस ने पहला प्रश्न किया: **'इस संसार में सर्वाधिक क्रूर क्या है?'**

मैंने उत्तर दिया: **'एक दुष्ट और व्यभिचारिणी स्त्री का हृदय।'**

राक्षस ने दूसरा प्रश्न किया: **'एक गृहस्थ के लिए सबसे बड़ा लाभ या संपत्ति क्या है?'**

मैंने उत्तर दिया: **'पत्नी में सद्गुणों (अच्छे चरित्र) का होना।'**

राक्षस ने तीसरा प्रश्न किया: **'वास्तव में प्रेम क्या है?'**

मैंने उत्तर दिया: **'प्रेम और कुछ नहीं, केवल मन की कल्पना है।'**

राक्षस ने अंतिम प्रश्न किया: **'अत्यंत कठिन और असंभव कार्यों को सर्वोत्तम तरीके से कैसे सिद्ध किया जा सकता है?'**

मैंने उत्तर दिया: **'केवल तीक्ष्ण बुद्धि और चालाकी (बुद्धिमत्ता) से। और यदि आप इन चारों उत्तरों के प्रत्यक्ष प्रमाण चाहते हैं, तो धुमिनी, गोमिनी, रत्नावती और नितम्बवती के चरित्र इसके सर्वोत्तम उदाहरण हैं।'**

राक्षस कौतूहलवश बोला, 'मुझे इन चारों स्त्रियों की कथाएँ सुनाओ, जिससे सिद्ध हो सके कि तुम्हारे उत्तर सत्य हैं।'

### राक्षस को सुनाई गईं चार नीतिकथाएँ

मैंने राक्षस को संतुष्ट करने के लिए कथाएँ आरम्भ कीं:

#### १. धुमिनी की कथा (क्रूर हृदय)

"त्रिगर्त देश में तीन अत्यंत धनी भाई रहते थे। उनके पास अपार धन, पशुधन और सेवक थे। किंतु समय का चक्र बदला और उस देश में भयंकर अकाल पड़ा। कई वर्षों तक वर्षा नहीं हुई, नदियाँ और सरोवर सूख गए, वृक्ष ठूँठ हो गए और चारों ओर भुखमरी फैल गई। स्थिति यहाँ तक भयावह हो गई कि लोग भूख के व्याकुल होकर एक-दूसरे को खाने लगे। तीनों भाइयों का अन्न भंडार भी समाप्त हो गया। अंततः उन्होंने अपने दासों और पत्नियों को एक-एक कर मारकर खाना आरम्भ किया।

जब केवल तीन पसंदीदा पत्नियाँ बचीं, तो पर्ची निकाली गई कि आज किसकी बारी है। पर्ची सबसे छोटे भाई की पत्नी **धुमिनी** की निकली। छोटा भाई अपनी पत्नी से अत्यधिक प्रेम करता था, अतः वह रात्रि के अंधकार में धुमिनी को लेकर वहाँ से भाग निकला। वे एक घने जंगल में पहुँचे जहाँ जलाशय और फल उपलब्ध थे। वहाँ उन्होंने एक कुटिया बनाई।

एक दिन शिकार करते समय उस भाई को एक अपंग व्यक्ति मिला, जिसके डाकुओं ने हाथ, पैर और नाक काट दिए थे। दयावश वह उसे अपनी कुटिया में ले आया और दोनों पति-पत्नी उसकी सेवा करने लगे। किंतु धुमिनी का हृदय अत्यंत कलुषित था। वह उस विकृत अपंग के प्रति कामासक्त हो गई। एक दिन जब उसका पति थका-हारा और प्यासा शिकार से लौटा, तो धुमिनी ने सिरदर्द का बहाना बनाकर उसे स्वयं कुएँ से पानी निकालने को कहा। जैसे ही वह कुएँ पर झुका, धुमिनी ने उसे पीछे से धक्का दे दिया।

अपने पति को मृत समझकर, वह उस अपंग को अपनी पीठ पर लादकर अवंती नगरी पहुँचे। वहाँ उसने राजा को कथा सुनाई कि यह उसका पति है जिसकी शत्रुओं ने यह दुर्दशा की है। राजा ने उसके पति-व्रत धर्म से प्रभावित होकर उसे पेंशन दे दी। इस बीच, उसका वास्तविक पति कुएँ से जीवित बाहर निकलने में सफल रहा और भटकता हुआ अवंती नगरी आया। धुमिनी ने उसे देखते ही राजा से शिकायत कर दी कि यह वही दुष्ट शत्रु है जिसने उसके पति को अपंग किया था। राजा ने बिना सोचे-समझे उसे मृत्युदंड दे दिया।

वधशाला ले जाते समय उस निर्दोष पति ने जल्लादों से प्रार्थना की कि एक बार उस अपंग व्यक्ति से एकांत में पूछताछ की जाए। जल्लादों ने दयावश ऐसा ही किया। राजा के सम्मुख उस अपंग व्यक्ति ने रोते हुए धुमिनी के इस घिनौने कृत्य और उस ब्राह्मण की महानता को स्वीकार कर लिया। राजा ने तुरंत उस निर्दोष को मुक्त किया और दुष्ट धुमिनी के टुकड़े-टुकड़े करवाकर कुत्तों को डलवा दिया। अतः सिद्ध हुआ कि दुष्ट स्त्री का हृदय सर्वाधिक क्रूर होता है।"

राक्षस ने संतुष्ट होकर सिर हिलाया। मैंने दूसरी कथा आरम्भ की:

#### २. गोमिनी की कथा (गुणवती पत्नी)

"द्रविड़ देश में **शक्त कुमार** नाम का एक अत्यंत धनी और बुद्धिमान युवा ब्राह्मण रहता था। उसने प्रतिज्ञा की थी कि वह किसी के दबाव में आकर विवाह नहीं करेगा, बल्कि स्वयं परीक्षा लेकर एक गुणवती पत्नी की खोज करेगा। वह अपने साथ भूसी सहित मात्र दो पाउंड (एक प्रस्थ) धान लेकर देश-भ्रमण पर निकल पड़ा। वह जहाँ भी जाता, सुंदर कन्याओं से कहता—'क्या तुम इस थोड़े से धान से मुझे एक पूर्ण और स्वादिष्ट भोजन करा सकती हो?' सभी उसका उपहास उड़ाते।

एक दिन वह एक दरिद्र किंतु कुलीन परिवार की कन्या **गोमिनी** के घर पहुँचा। गोमिनी का शारीरिक लावण्य अत्यंत शुभ और आनुपातिक था। शक्त कुमार की बात सुनकर उसने मौन रहकर धान ले लिया। उसने सर्वप्रथम धान को धूप में सुखाया, फिर अत्यंत चतुरता से उसे रगड़कर उसकी भूसी को बिना दाने तोड़े अलग कर लिया। उसने भूसी को अपनी धाय के माध्यम से एक सुनार को बेचा, जिससे प्राप्त पैसों से जलाऊ लकड़ी, कुछ मिट्टी के बर्तन और आवश्यक सामग्री खरीदी।

उसने चावल को अत्यंत कुशलता से पकाया। मांड (चावल का पानी) को अलग करके चावल के दानों को खिले-खिले रखा। बचे हुए कोयले को बेचकर उसने घी, दही, मसाले और शाक मँगवाए। उसने शक्त कुमार को सुगंधित तेल से स्नान कराया, फिर अत्यंत आदरपूर्वक उसे भोजन परोसा। भोजन के उपरांत उसने उसे कमल के फूलों से सुवासित शीतल जल पीने को दिया, जिससे शक्त कुमार की आत्मा तृप्त हो गई। गोमिनी की इस गृह-प्रबंधन कला और बुद्धिमत्ता से प्रभावित होकर शक्त कुमार ने उससे विवाह कर लिया। बाद में शक्त कुमार ने एक अन्य स्त्री से भी विवाह किया जो कटु स्वभाव की थी, किंतु गोमिनी ने अपने मधुर व्यवहार से उसे भी अपनी सखी बना लिया और गृह को स्वर्ग बना दिया। अतः सिद्ध हुआ कि गुणी पत्नी ही गृहस्थ का वास्तविक धन है।"

#### ३. रत्नावती की कथा (प्रेम केवल कल्पना है)

"सूरत (सुराष्ट्र) नगर में **रत्नावती** नाम की एक रूपवती कन्या थी। उसका विवाह **बलभद्र** नामक व्यापारी के पुत्र से हुआ। विवाह के प्रथम दिन ही बलभद्र के मन में रत्नावती के प्रति अकारण ही घोर अरुचि उत्पन्न हो गई। उसने रत्नावती की पूर्ण उपेक्षा की, जिससे वह अत्यंत दयनीय जीवन जीने लगी।

एक दिन एक बौद्ध भिक्षुणी (परिव्राजिका) ने रत्नावती को दुखी देखकर कारण पूछा। रत्नावती ने अपनी व्यथा सुनाई। रत्नावती जानती थी कि उसका पति अन्य स्त्रियों के प्रति शीघ्र आकर्षित हो जाता है। उसने एक योजना बनाई। पड़ोस में एक धनिक की पुत्री रहती थी जो रत्नावती की परम सखी थी और हुबहू रत्नावती जैसी दिखती थी। रत्नावती ने उस भिक्षुणी के माध्यम से अपने पति बलभद्र के पास संदेश भिजवाया कि वह धनिक-पुत्री उससे प्रेम करती है और संध्या समय उद्यान में मिलेगी।

बलभद्र उस छद्म रूपी धनिक-पुत्री (जो वास्तव में रत्नावती ही थी) से मिलने उद्यान पहुँचा। रत्नावती ने वहाँ कन्दुक (गेंद) खेलते हुए जानबूझकर गेंद उसकी ओर फेंक दी। इस प्रकार दोनों में प्रेम बढ़ गया। बलभद्र को तनिक भी आभास नहीं हुआ कि वह अपनी ही पत्नी से प्रेम कर रहा है। अंततः रत्नावती के कहने पर बलभद्र सारा धन समेटकर उसके साथ दूसरे नगर पलायन कर गया। वहाँ उन्होंने सुखपूर्वक जीवन व्यतीत किया और बलभद्र अपनी ही पत्नी को अन्य स्त्री समझकर जीवन भर अगाध प्रेम करता रहा। अतः सिद्ध हुआ कि प्रेम और कुछ नहीं, केवल मन की एक कल्पना (भ्रम) है।"

#### ४. निताम्बावती की कथा (कठिन कार्य चालाकी से सिद्ध होते हैं)

"मधुरा नगरी में **कलहकण्टक** नाम का एक धूर्त और साहसी चोर रहता था। एक दिन उसने एक चित्रकार द्वारा बनाया गया **निताम्बावती** (एक धनी व्यापारी की अत्यंत सुंदर पत्नी) का चित्र देखा और उस पर काममोहित हो गया। उसने ओउजेन (उज्जयिनी) जाकर श्मशान घाट के रखवाले की नौकरी कर ली।

उसने एक कुटिल वृद्धा को धन देकर निताम्बावती के पास कुप्रस्ताव भेजा, जिसे निताम्बावती ने क्रोधपूर्वक ठुकरा दिया। तब कलहकण्टक ने कूटनीति बदली। उसने वृद्धा से कहलवाया कि वह एक सिद्ध योगी है और जानता है कि निताम्बावती निःसंतान क्यों है, क्योंकि उसके पति पर किसी ने तांत्रिक अभिचार (जादू) कर दिया है। यदि वह रात्रि को एकांत उद्यान में आकर उस योगी के सम्मुख अपना चरण बढ़ाए, तो वह उस मंत्र को काट देगा।

संतान की कामना में निताम्बावती वहाँ पहुँची। जैसे ही उसने पैर आगे बढ़ाया, कलहकण्टक ने उसकी बहुमूल्य रत्नजड़ित पायल (नूपुर) उतार ली और उसके पैर पर कटार से एक हल्का सा घाव करके भाग गया। अगले दिन कलहकण्टक वह पायल लेकर उसके पति के पास पहुँचा और उसे बेचने का नाटक किया। पति ने पायल पहचान ली और जब घर जाकर देखा तो पत्नी के पैर में घाव था और दूसरी पायल गायब थी। उसने मजिस्ट्रेट से शिकायत की। कलहकण्टक ने न्यायालय में गवाही दी कि रात्रि को श्मशान में एक 'डाकिनी' लाश को घसीट रही थी, जिससे संघर्ष के दौरान उसने यह पायल छीनी और उसके पैर पर वार किया।

न्यायालय ने निताम्बावती को डाकिनी मानकर त्यागने और श्मशान के खंभे से बांधने का आदेश दिया। रात्रि को कलहकण्टक ने वहाँ जाकर उसकी रस्सियाँ काटीं, उसके चरणों में गिरकर अपने प्रेम की सत्यता स्वीकार की और उसे लेकर सुदूर देश चला गया, जहाँ निताम्बावती ने उसे ही अपना पति स्वीकार कर लिया। इस प्रकार जो कार्य बल से असंभव था, उसे कलहकण्टक ने अपनी कुटिल चालाकी से सिद्ध कर दिया।"

### राजकुमारी से पुनर्मिलन और सुखद अंत

मित्रगुप्त की इन चारों ज्ञानवर्धक कथाओं को सुनकर वह राक्षस अत्यधिक प्रसन्न हुआ। उसने कहा, 'हे विप्र! मैं तुम्हारे उत्तरों और कथाओं से पूर्णतः संतुष्ट हूँ। मैं तुम्हें जीवनदान देता हूँ और यदि तुम्हें कोई सहायता चाहिए, तो अवश्य माँगो।'

उसी क्षण आकाश से हमारे समीप कुछ बहुमूल्य मोती गिरे। मैंने ऊपर देखा, तो आकाश मार्ग से एक अन्य दुष्ट राक्षस एक सुंदरी कन्या को बलपूर्वक ले जा रहा था और वह कन्या स्वयं की रक्षा के लिए संघर्ष कर रही थी। मैंने अपने रक्षक राक्षस से कहा, 'क्या हम इस निरपराध स्त्री को इस प्रकार हरण होते देखते रहेंगे? कृपा कर इसकी रक्षा करें।'

मेरी प्रार्थना पर, वह राक्षस तुरंत आकाश में उछला और उसने उस दुष्ट राक्षस पर भयंकर आक्रमण किया। दोनों के मध्य आकाश में ही भयानक युद्ध छिड़ गया। युद्ध के दौरान, उस दुष्ट राक्षस के हाथ से वह कन्या छूटकर नीचे गिरने लगी। मैंने फुर्ती से आगे बढ़कर अपनी बाहें फैला दीं। वह कन्या सीधे मेरी गोद में आ गिरी। यद्यपि वह अत्यंत भयभीत और अचेत थी, किंतु उसे कोई गंभीर चोट नहीं आई। मैंने उसे अत्यंत कोमल घास पर लिटाया और उस पर शीतल जल के छींटे मारे। इसी बीच, आकाश में लड़ते हुए दोनों राक्षस एक-दूसरे के घातक प्रहारों से मारे गए और भूमि पर गिर पड़े।

जब उस कन्या को होश आया और उसने आँखें खोलीं, तो मेरे आश्चर्य का ठिकाना न रहा—वह कोई और नहीं, बल्कि मेरी प्राणप्रिय राजकुमारी **कन्दुकवती** थी! मुझे अपने सम्मुख देखकर कन्दुकवती के हर्ष का पार न रहा।

स्वस्थ होने पर उसने अश्रु बहाते हुए कहा, 'प्रियतम! उस कन्दुक-उत्सव के पश्चात जब चन्द्रसेना ने मुझे आपके प्रेम का संदेश दिया, तो मेरा हृदय आनंदित हो उठा था। किंतु जब मुझे ज्ञात हुआ कि मेरे क्रूर भाई भीमधन्वा ने आपको जंजीरों में बांधकर समुद्र में फेंक दिया है, तो मैं घोर निराशा में डूब गई और जीवन त्यागने उद्यान की ओर चल पड़ी। वहीं इस दुष्ट राक्षस ने मुझे एकांत में पाकर मेरा हरण कर लिया। विधाता की कृपा से आज आप पुनः मेरे रक्षक बनकर आए हैं। अब हमें अविलंब मेरे माता-पिता के पास चलना चाहिए, जो मेरे विरह में तड़प रहे होंगे।'

मैंने तुरंत नाविकों को एकत्र किया, डाकुओं के उस जहाज़ को अपने नियंत्रण में लिया (जिसमें भीमधन्वा पहले से ही बंधा हुआ था) और अनुकूल पवन के सहारे हम शीघ्र ही दामलिप्त नगर के तट पर पहुँचे। वहाँ पहुँचकर हमें अत्यंत दुखद समाचार प्राप्त हुआ कि राजा और रानी अपनी पुत्री और पुत्र के शोक में अपने प्राण त्यागने हेतु गंगा तट पर आमरण अनशन (प्रायोपवेशन) के लिए प्रस्थान कर चुके हैं।

मैं तुरंत राजकुमारी को साथ लेकर उनके पीछे भागा और उन्हें मार्ग में ही रोक लिया। जब उन्होंने अपनी पुत्री को सकुशल और मुझे एक रक्षक के रूप में देखा, तो उनके विलाप के आँसू हर्ष के अश्रुओं में बदल गए। हम ससम्मान नगर वापस लौटे। राजा ने मेरी वीरता और बुद्धिमत्ता का सम्मान करते हुए अत्यंत वैभव के साथ राजकुमारी कन्दुकवती का हाथ मेरे हाथ में सौंप दिया।

मेरे अनुरोध पर भीमधन्वा को भी क्षमा कर दिया गया। भीमधन्वा ने अपनी पराजय स्वीकार करते हुए अपनी हठ छोड़ दी और चन्द्रसेना का विवाह उसके प्रियतम कोशदास से सकुशल संपन्न हो गया।

हे राजकुमार राजवाहन! इन दिनों जब मुझे समाचार प्राप्त हुआ कि आपके परम मित्र राजा सिंहवर्मा पर शत्रुओं ने आक्रमण किया है, तो मैं कलिंग और दामलिप्त की एक विशाल चतुरंगिणी सेना लेकर उनकी सहायता हेतु यहाँ उपस्थित हुआ। इस प्रकार, इस पावन रणभूमि पर मुझे आपके इन श्रीचरणों के दर्शन का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ।"

*मित्रगुप्त के इस अदम्य साहस, अद्भुत कूटनीति और अद्वितीय कथा-चातुर्य को सुनकर राजकुमार राजवाहन अत्यंत आनंदित हुए। उन्होंने मित्रगुप्त की भूरि-भूरि प्रशंसा की और कहा, 'सखे! मृत्यु के मुख से बचकर आना और अपनी बुद्धिमत्ता से राक्षस को परास्त करना तुम्हारी श्रेष्ठता को सिद्ध करता है।' इसके पश्चात उन्होंने अगले कुमार को अपनी गाथा सुनाने की आज्ञा दी।*




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दश कुमार चरित भाग १२ विश्रुत के साहसिक कारनामे

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