अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः ।
तं जानन्न् अग्न आ रोहाधा नो वर्धय रयिम् ॥१॥
०३।०२०।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (अयम्) यह [सर्वव्यापी परमेश्वर] (ते) तेरा (ऋत्वियः) सब ऋतुओं [कालों] में मिलनेवाला (योनिः) कारण है, (यतः) जिससे (जातः) प्रकट होकर (अरोचनाः) तू प्रकाशमान हुआ है, (तम्) उस [योनि] को (जानन्) पहिचानकर (आ रोह) ऊँचा चढ़, (अथ) और (नः) हमारे लिये (रयिम्) धन (वर्धय) बढ़ा ॥१॥
भावार्थः परमात्मा ने अपनी सर्वशक्तिमत्ता और सर्वव्यापकता से हमें बड़ा समर्थ और उपकारी मनुष्य देह दिया है, ऐसा जानकर हम अपना ऐश्वर्य बढ़ावें ॥१॥ यह मन्त्र कुछ भेद से ऋग्वेद ३।२९।१०। और यजुर्वेद ३।१४ और १२।५२ एवं १५।५६। में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (अग्ने) हे अग्निनामक परमेश्वर! (अयम् ते योनिः) यह [हृदय] तेरा घर है, (ऋत्वियः) जिसेकि ऋतु अर्थात् काल प्राप्त हो गया है, (यतः जातः) जहाँ से प्रकट हुआ तू (अरोचथाः) प्रदीप्त होता है। (जानन्१) जानता हुआ (तम्) उस पर (आरोह२) तू आरोहण कर, (अध) तदनन्तर (नः रयिम्) हमारी सम्पत्ति को (वर्धय) बढ़ा।
टिप्पणी: [परमेश्वर का नाम है अग्नि, वह अग्नि के सदृश प्रकाशित होता है (यजु:० ३२।१), हृदय-गृह में। योनिः गृहनाम (निघं० ३।४)। प्रार्थी परमेश्वर से प्रार्थना करता है कि मेरे हृदय-गृह में तेरे प्रदीप्त होने का काल हो गया है, अत: तू प्रकाशित हो, और प्रकाशित होकर हम योगियों की अध्यात्मसम्पत्तियों को बड़ा] [१. "जानन्" द्वारा अग्नि को चेतन कहा है, अतः अग्नि प्राकृतिक अर्थात् जड़ नहीं। २. आरोहण का अर्थ है चढ़ना। वेद में चार पैरों पर खड़ी हस्तिनी के सदृश, चार स्तम्भों पर निर्मित शाला का कथन हुआ है (अथर्व० ९।३।१७), जिस पर आरोहण सीढ़ी द्वारा हो सकता है। इसलिए हृदय गृह पर परमेश्वर का आरोहण कहा है।]
अग्ने अछा वदेह नः प्रत्यङ्नः सुमना भव ।
प्र णो यच्छ विशां पते धनदा असि नस्त्वम् ॥२॥
प्र णो यच्छ विशां पते धनदा असि नस्त्वम् ॥२॥
०३।०२०।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (अग्ने) हे विद्वान् पुरुष ! (अच्छ) अच्छे प्रकार से (इह) यहाँ पर (नः) हमसे (वद) बोल, और (प्रत्यङ्) प्रत्यक्ष होकर (नः) हमारे लिए (सुमनाः) प्रसन्न मन (भव) हो। (विशाम् पते) हे प्रजाओं के रक्षक ! (नः) हमें (प्र यच्छ) दान दे, (त्वम्) तू (नः) हमारा (धनदाः) धनदाता (असि) है ॥२॥
भावार्थः सब मनुष्य विद्वानों से विद्या ग्रहण करके संसार में ऐश्वर्य प्राप्त करें ॥२॥ मन्त्र २-७ ऋग्वेद म० १० सू० १४१ म० १-५ में कुछ भेद से हैं। यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद अ० ९ मन्त्र २८ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (अग्ने) हे अग्नि के सदृश प्रकाशमान परमेश्वर! (इह) इस जीवन में (न: अच्छ) हमारे अभिमुख होकर (वद) हमारे साथ वार्तालाप कर, (नः प्रत्यङ्) हमारे प्रति गति करता हुआ तू (सुमनाः भव) सुप्रसन्न हो। (विशांपते) हे प्रजाओं के पति! (नः प्रयच्छ) हमें प्रदान कर [धन], (त्वम्) तू (न:) हमारा (धनदाः असि) धनदाता है।
टिप्पणी: [हृदय में प्रकट हुए परमेश्वर के साथ वार्तालाप सम्भव है, जबकि हृदयस्थ जीवात्मा और उसमें प्रकट परमेश्वर, एक-दूसरे के अभिमुख होते हैं। धन प्राकृतिक नहीं, अपितु अध्यात्म है।]
प्र णो यच्छत्वर्यमा प्र भगः प्र बृहस्पतिः ।
प्र देवीः प्रोत सूनृता रयिं देवी दधातु मे ॥३॥
प्र देवीः प्रोत सूनृता रयिं देवी दधातु मे ॥३॥
०३।०२०।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (अर्यमा) वैरियों का नियन्ता वीर पुरुष, (प्र) अच्छे प्रकार (भगः) ऐश्वर्यवान् धनी पुरुष (प्र) अच्छे प्रकार, और (बृहस्पतिः) बड़ी-बड़ी विद्याओं का स्वामी, प्रधान आचार्य (प्र) अच्छे प्रकार (नः) हमें (देवीः) दिव्य शक्तियाँ (प्र यच्छतु) प्रदान करे। (उत) और (सूनृता) प्रिय सत्य वाणी (देवी) देवी [दिव्य गुणवाली] (मे) मुझे (रयिम्) ऐश्वर्य (प्र) अच्छे प्रकार (दधातु) देवे ॥३॥
भावार्थः मनुष्य, विशेष गुणी आचार्यों से विशेष शिक्षाएँ पाकर, सत्यवादी सत्यकर्मी होकर ऐश्वर्यवान् होवें ॥३॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद ९।२९। में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (अर्यमा) कामादि अरियों का नियन्त्रण करनेवाला परमेश्वर! (नः प्रयच्छतु) हमें अध्यात्म सम्पत्ति प्रदान करे, (भग:) षड्विध सम्पत्तियोंवाला परमेश्वर (प्र यच्छतु) इन षड्विध सम्पत्तियों को प्रदान करें, (बृहस्पति प्रयच्छतु) वेदवाणी का पति बृहती वेदवाणी को प्रदान करे। (देवीः) मेरी दिव्य चित्तवृत्तियां (प्र यच्छन्तु) प्रदान करें मुझे दिव्यचित्तवृत्तियों को, (उत) तथा (सूनृता देवी) दिव्या-सत्य-प्रियरूपा वाणी (मे) मुझे (प्र दधातु रयिम्) प्रदान करे सत्य-प्रियरूपा वाणी को।
टिप्पणी: [अर्यमा=अरीन् नियच्छतीति (निरुक्त ११।३।२३)। यद्यपि यह निर्वाचन आदित्य के सम्बन्ध में है, तो भी "अदीन् नियच्छतिमात्र" निर्वाचन का ग्रहण किया है। षड्विध सम्पत्तियां= ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा॥]
सोमं राजानमवसेऽग्निं गीर्भिर्हवामहे ।
आदित्यं विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् ॥४॥
आदित्यं विष्णुं सूर्यं ब्रह्माणं च बृहस्पतिम् ॥४॥
०३।०२०।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (अवसे) रक्षा के लिए (गीर्भिः) स्तुतियों से (सोमम्) ऐश्वर्य के कारण, (राजानम्) सबके शासक (अग्निम्) विद्वान् (आदित्यम्) बड़े दीप्यमान, (विष्णुम्) सबमें व्यापक, (सूर्यम्) चलानेवाले, (ब्रह्माणम्) सबमें बड़े वेदप्रकाशक ब्रह्मा (च) और (बृहस्पतिम्) बड़े बड़ों के रक्षक बृहस्पति [परमेश्वर वा मनुष्य] को (हवामहे) हम बुलाते हैं ॥४॥
भावार्थः सब मनुष्य जगदीश्वर के गुण, कर्म स्वभाव के ज्ञान और बड़े लोगों के आश्रय से अपना सामर्थ्य बढ़ावें ॥४॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद ९।२६ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (सोमम् राजानम्) सर्वोत्पादक अतः सबके राजा परमेश्वर का, तथा (अग्निम्) अग्नि के सदृश प्रकाशमान परमेश्वर का, (अवसे) निज रक्षार्थ, (गोभिः) स्तुतिरूपा वेदवाणियों द्वारा (हवामहे) हम आह्वान करते हैं। तथा (आदित्यम्, विष्णुम्, सूर्यम्, ब्रह्माणम् च बृहस्पतिम्)१ आदित्य नामक, सर्वव्यापक, सर्वप्रेरक, चतुर्वेदविद्, बृहद्-ब्रह्माण्ड के पति परमेश्वर का स्तुतिवाणियों द्वारा हम आह्वान करते हैं।
टिप्पणी: [सोम=षु प्रसवे (भ्वादिः)। आदित्य= परमेश्वर, यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यः (यजुः ३२।२), तथा आदित्यवर्णम्, तमसः परस्तात् (यजु:० ३१।१८)। विष्णुम्= विष्लृ व्याप्तौ (जुहोत्यादिः)। सूर्यम्=षू प्रेरणे (तुदादिः), सूर्य के प्रकाश में प्राणी निज कार्यों में प्रेरित होते हैं। ब्रह्मा है चतुर्वेदविद् परमेश्वर। सूक्त में अग्नि आदि नामों (मन्त्र १) द्वारा नाना देवता अभिमत नहीं, अपितु एक ही परमेश्वर के भिन्न भिन्न गुणकर्मों के प्रदर्शक हैं इन नामों द्वारा एक ही परमेश्वर का आह्वान किया है हदय में।] [१. बृहस्पति:=अथवा वृहती वेदवाणी का पति:। यथा "वृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रम्" (ऋ० १०।७१।१)। ]
त्वं नो अग्ने अग्निभिर्ब्रह्म यज्ञं वर्धय ।
त्वं नो देव दातवे रयिं दानाय चोदय ॥५॥
त्वं नो देव दातवे रयिं दानाय चोदय ॥५॥
०३।०२०।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (अग्ने) हे विद्वान् ! [परमेश्वर वा पुरुष] (अग्निभिः) विद्वानों के द्वारा (त्वम्) तू (नः) हमारे (ब्रह्म) वेद ज्ञान वा ब्रह्मचर्य (च) और (यज्ञम्) यज्ञ [१-विद्वानों के पूजन, २-पदार्थों के संगतिकरण, और ३-विद्यादि के दान] को (वर्धय) बढ़ा, (देव) हे दानशील, ! (त्वम्) तू (नः) हममें से (दातवे) दानशील पुरुष को (दानाय) दान के लिए (रयिम्) धन (चोदय) भेज ॥५॥
भावार्थः मनुष्य परमेश्वर के ज्ञान से अपना ज्ञान और कर्मकौशल्य बढ़ावें और उपकारी कामों में आप सहायक बनें और दूसरों को सहायक बनावें ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (अग्ने) हे अग्नि नामवाले, या अग्नि के सदृश प्रकाशवाले परमेश्वर! (त्वम्) तू (अग्निभिः) गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि आदि अग्नियों के द्वारा (नः ब्रह्म) हमारे अन्न को (च) और (यज्ञम्) यज्ञ को (वर्धय) बढ़ा। (देव) हे परमेश्वरदेव! (त्वम्) तू (न:) हमारे (दातवे) दाता के लिए (रयिम् चोदय) धन को प्रेरित कर, (दानाय) ताकि वह दान करे।
टिप्पणी: [ब्रह्म=अन्ननाम (निघं० २।७)। अग्नियों में आहुतियों द्वारा वर्षा और तद् द्वारा अन्न पैदा होता है। दातवे="दातु" पद का चतुर्थ्येकवचन दातु= दाता कर्तरि१ तु प्रत्यय।" तु" प्रत्यय औणादिक (१।७२।७५)। सायण पाठ है, दातवे; दत्तवते।] [१. दातवे में तुमुन्नर्थ मानने पर दातवे और दानाय में पुनरुक्ति दोष होता है।]
इन्द्रवायू उभाविह सुहवेह हवामहे ।
यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद्दानकामश्च नो भुवत्॥६॥
यथा नः सर्व इज्जनः संगत्यां सुमना असद्दानकामश्च नो भुवत्॥६॥
०३।०२०।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (उभौ) दोनों (सुहवा=०-वौ) सुख से बुलाने योग्य (इन्द्रवायू) सूर्य और पवन [के समान स्त्री पुरुष] को (इह इह) यहाँ पर ही (हवामहे) हम बुलाते हैं, (यथा) जिससे (सर्वः इत्) सभी (जनः) जने (नः) हमारी (संगत्याम्) संगति में (सुमनाः) प्रसन्न चित्तवाले (असत्) होवें, (च) और (नः) हमारी (दानकामः) दान के लिए कामना (भुवत्) होवे ॥६॥
भावार्थः सब स्त्री पुरुष प्रयत्न करके घर में और सभा में परस्पर परोपकारी, प्रसन्न चित्त, धार्मिक और धर्मकार्यों में दानशील हों, जैसे सूर्य अपने प्रकाश और वृष्टि आदि से और पवन अपने चेष्टादान और शीघ्रगमन आदि से असंख्य लाभ पहुँचाते हैं ॥६॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद ३३।८६ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (इन्द्रवायू) सम्राट् और वायुमंडल के अधिपति (उभौ) इन दोनों का (इह) इस यज्ञकर्म में (हवामहे) हम आह्वान करते हैं, (सुहवौ) ये दोनों सुगमता से आह्वानयोग्य हों, अतः इन दोनों को (इह) इस यज्ञकर्म में (हवामहे) हम आहूत करते हैं। (यथा) जिस प्रकार कि (नः) हमारा (सर्वः इत् जनः) सब जनसमूह, (संगत्याम्) पारस्परिक सत्सङ्ग में (सुमना: असत्) सुप्रसन्न मनवाला हो, (च) और (न:) हमें (दानकामः) दान देने की कामनावाला (भूत) हो ।
टिप्पणी: [इन्द्र=सम्राट् (यजु० ८।३७)। वायु है वायुमण्डल का अधिपति, वायुमण्डल में यानों द्वारा धनार्जन का अधिपति (अथर्व० ३।१५।१-६)। सत्सङ्गों में दान की आवश्यकता तो होती ही है अत: "दानकामः" कहा है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्त्तव्य है कि वह सत्सङ्गों में सहयोग दे, और दान भी करे।]
अर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय ।
वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम् ॥७॥
वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम् ॥७॥
०३।०२०।०७
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: [हे ईश्वर !] (अर्यमणम्) वैरियों के रोकनेवाले राजा, (बृहस्पतिम्) बड़े बड़ों के रक्षक गुरु और (इन्द्रम्) बड़े ऐश्वर्यवाले पुरुष और (वातम्) पवन, (विष्णुम्) यज्ञ, (च) और (वाजिनम्) वेगवाले, वा अन्नवाले, वा बलवाले (सवितारम्) लोकों के चलानेवाले सूर्य से (सरस्वतीम्) विज्ञानों के भण्डार सरस्वती, वेदविद्या को (दानाय) दान के लिये (चोदय) प्रवृत्त कर ॥७॥
भावार्थः ईश्वरभक्त (अर्यमा) राजा वा सेनापति, (बृहस्पति) प्रधान आचार्य और (इन्द्र) दण्डनेता वा कोषाध्यक्ष आदि अधिकारी अपने-२ पदों पर दृढ़ रहकर पवन, सूर्य, अग्नि, जल, पृथिवी आदि अद्भुत पदार्थों द्वारा वेदविज्ञान फैलावें ॥७॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद अ० ९ म० २७ में है ॥ मनु महाराज ने लिखा है−सैनापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च। सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति ॥ मनु० १२।१० ॥ वेद शास्त्र का जाननेवाला पुरुष, सेनापति के पद, राजा के पद, और दण्डदाता के पद और सब लोगों पर आधिपत्य [चक्रवर्ति राज्य] के योग्य होता है ॥७॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे अग्नि! मन्त्र ५], (अर्यमणम्) अरियों के नियन्ता को, (बृहस्पतिम्) राष्ट्र को बृहती-सेना के अधिपति को, (इन्द्रम्) सम्राट् को, (वातम्) वायुमंडल के अधिपति को, (विष्णुम्) वनों तथा ओषधियों के अधिपति को, (सरस्वतीम्) ज्ञानाधिपति महिला को, (च) तथा (वाजिनम् सवितारम्) अन्न के अधिष्ठाता अन्नोत्पादन के अधिपति को (दानाय चोदय) दान देने के लिए प्रेरित कर।
टिप्पणी: [राष्ट्र के सब अधिकारियों को राष्ट्रोन्नति के लिए दान देने में प्रेरणा की प्रार्थना अग्नि नामक परमेश्वर से की गई है। अर्यमा=अदीन् नियच्छतीति (निरुक्त ११।३।२३), अदिति पद की व्याख्या में। अर्यमा है सेनाध्यक्ष और बृहस्पति है राष्ट्र की वृहती-सेना-का अधिपति। विष्णु:= "ध्रुवां दिग् विष्णुरधिपतिः कल्माषग्रीवो रक्षिता वीरुध इषवः" (अथर्व० ३।२७।५)। सरस्वती= सरो विज्ञानं वा विद्यतेऽस्यां सा [वाक्] (उणा० ४।१९०; दयानन्द)। यह महिला है जो कि शिक्षा की अधिकारिणी है। वाजिनम्, सवितारम्= वाजः अन्ननाम (निघं० २।७); सविता है अन्नोत्पादन अर्थात् कृषि का अधिकारी। षु प्रसवैश्वर्ययोः (भ्वादि:)। अर्यमा आदि के आधिभौतिक स्वरूपों के प्रदर्शन में यथातथा प्रयत्न हुआ है। मन्त्र ७वाँ वाज प्रसव के सम्बन्ध में है। इस प्रकार मन्त्र १ और ७ में परस्पर सम्बन्ध दर्शाया है।]
वाजस्य नु प्रसवे सं बभूविमेमा च विश्वा भुवनानि अन्तः । उतादित्सन्तं दापयतु प्रजानन् रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ ॥८॥
०३।०२०।०८
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (वाजस्य) बल के (प्रसवे) उत्पत्ति में (नु) ही (संबभूविम) हम समर्थ हुए हैं, (च) और (इमा=इमानि) यह (विश्वा=विश्वानि) सब (भुवनानि) लोक (अन्तः) [उसीके] भीतर हैं, (प्रजानन्) ज्ञानवान् ईश्वर (अदित्सन्तम्) देने की इच्छा न करनेवाले से (उत) भी (दापयतु) दिलावे। (च) और [हे ईश्वर] (नः) हमें (सर्ववीरम्) सर्ववीरों से युक्त (रयिम्) धन (नि) नित्य (यच्छ) दे ॥८॥
भावार्थः सब चराचर जगत् अन्न के आश्रित ठहरा है। सर्वज्ञ परमेश्वर अदानी पुरुषों को भी सुपात्रों के लिये दान शक्ति देवे, और हमें और हमारे वीरों को धनी बनावे ॥८॥ यह मन्त्र कुछ भेद से यजुर्वेद १९।२५ वा २४ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (वाजस्य प्रसवे) अन्न की उत्पत्ति में (नु) निश्चय से (संवभूविम) हम मिलकर रहे हैं, (च), और (इमा विश्वा भुवनानि) ये सब उत्पन्न प्राणी (अन्तः) अन्न के भीतर सत्तावान् रहे हैं। (प्रजानन्) इसे जानता हुआ [सम्राट्] (उत अदित्सन्तम्) दान देने की अनिच्छा वाले को भी (दापयतु) दान देनेवाला करे। (च) और [ हे सम्राट्] (न:) हमें (सर्ववीरम्) सब वीर पुत्रोंवाली (रयिम्) सम्पत्ति (नि यच्छ) नितरां प्रदान कर। वीरपुत्र=दानवीर पुत्र, दानशूर पुत्र।
टिप्पणी: [अन्तः= सब प्राणियों की सत्ता अन्नाधीन है। यथा " अन्नाद् रेतः रेतसः पुरुषः" (तैत्ति० उपनिषद्) अर्थात् अत्र से वीर्य और वीर्य से पुरुष। पुरुष पद सब प्राणियों का उपलक्षक है, प्राणी वीर्यजात ही हैं।]
दुह्रां मे पञ्च प्रदिषो दुह्रामुर्वीर्यथाबलम् ।
प्रापेयं सर्वा आकूतीर्मनसा हृदयेन च ॥९॥
प्रापेयं सर्वा आकूतीर्मनसा हृदयेन च ॥९॥
०३।०२०।०९
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (पञ्च) फैली हुई [वा पाँच] (प्रदिशः) उत्तम दान क्रियायें [वा प्रधान दिशायें] (मे) मेरे लिये (उर्वीः) फैली हुई शक्तियों को (यथाबलम्) यथाशक्ति (दुह्राम्) भरती रहें, (दुह्राम्) भरती रहें। (मनसा) मन [मनन शक्ति] से (च) और (हृदयेन) हृदय [ग्रहण शक्ति] से (सर्वाः) सब (आकूतीः) संकल्पों को (प्र, आपेयम्) मैं पाता रहूँ ॥९॥
भावार्थः मनुष्य विद्या आदि के दान से अपना सामर्थ्य बढ़ावें और सब दिशाओं से उत्तम गुण प्राप्त करें तथा श्रवण, मनन और निदिध्यासन [ध्यान देकर विचार] से अपने मनोरथ सिद्ध करें ॥९॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (पञ्च प्रदिशः) पञ्च या विस्तृत सब दिशाएँ (मे) मेरे लिए (दुह्राम्) अभिमत फल का दोहन करें, (उर्वीः) तथा महती, ६ संख्या वाली द्यौ पृथिवी आदि (यथाबलम्) निज शक्त्यनुसार (दुह्राम्) मुझे अभिमत फल का दोहन करें। ताकि (मनसा) मन द्वारा (हृदयेन च) और इदय द्वारा (सर्वाः आकूतिः) सब संकल्पों को (प्रापेयम्) मैं प्राप्त करूं।
टिप्पणी: [पञ्च=पचि विस्तारे (चुरादिः)। ६ उर्वी:=द्यौश्च पृथिवी च, अहश्च रात्री च आपश्च ओषधीश्च (सायण)। मनसा=मन द्वारा। हृदयेन=हार्दिक भावनाओं द्वारा। दुह्राम् में दुह धातु के प्रयोग द्वारा प्रदिश: तथा उर्वीः को गोरूप में वर्णित किया है। जैसे कि गौएँ हमें दुग्ध प्रदान करती हैं, वैसे प्रदिश: आदि अभिमत फल का प्रदान करें। द्यौः आदि को धेनवः कहा भी है (अथर्व० ४।३९,१-१०)।]
गोसनिं वाचमुदेयं वर्चसा माभ्युदिहि ।
आ रुन्धां सर्वतो वायुस्त्वष्टा पोषं दधातु मे ॥१०॥
आ रुन्धां सर्वतो वायुस्त्वष्टा पोषं दधातु मे ॥१०॥
०३।०२०।१०
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (गोसनिम्) गोलोक [गौओं वा स्वर्ग] की देनेवाली (वाचम्) वाणी को (उदेयम्) मैं बोलूँ। [हे ईश्वर !] (वर्चसा) तेज के साथ (मा=माम्) मेरे ऊपर (अभ्युदिहि) सब ओर से उदय हो। (वायुः) प्राण वायु [मुझको] (सर्वतः) सब प्रकार से (आ रुन्धाम्) घेरे रहे। (त्वष्टा) विश्वकर्मा परमेश्वर वा सूर्य (मे) मेरे लिए (पोषम्) पोषण (दधातु) देता रहे ॥१०॥
भावार्थः मनुष्य ईश्वर के ध्यान से सत्यवादी और सत्यकर्मी होकर अपने प्राणों को वश में रक्खे और पुरुषार्थी होकर सूर्य से वृष्टि द्वारा अपना पोषण प्राप्त करे ॥१०॥ ॥ इति चतुर्थोऽनुवाकः ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (गोसनिम्) गोदान१ सम्बन्धी (वाचम्) वेद वाक् का (उदेयम्) मैं कथन अर्थात् प्रवचन करूं, [हे वाक्!] (वर्चसा) निजज्ञानदीप्ति के साथ (मा अभि) मेरे अभिमुख (उदिहि) उदित हो। (वायुः) वायुनामक परमेश्वर (सर्वत:) सब ओर (आ रुन्धाम्) मेरा आवरण करे, (त्वष्टा) कारीगर परमेश्वर (मे) मुझ में (पोषम्) पुष्टि (दधातु) स्थापित करे।
टिप्पणी: [गोसनिम्=गौः वाङ्नाम (निघं० १।११)+ षणु दाने (तनादि:)। वाक् का दान करनेवाली वाणी है वेदवाक्। वेदवाक् ही सब वाणियों की मातृरूपा है। सब वाणियों का मूलस्रोत वेदवाणी ही है। अभ्युदिहि="उदिहि" द्वारा दृष्टान्तरूप में सूर्योदय अभिप्रेत है, जोकि दीप्ति द्वारा सबको प्रकाशित करता है। इसी प्रकार वेद वाक् है, जोकि निजज्ञान दीप्ति द्वारा ज्ञेयों का ज्ञान देती है। वायु से अभिप्रेत परमेश्वर है (यजुः० ३२।१)। परमेश्वर वायु अर्थात् प्राणरूप होकर सबका आवरण कर रहा है। रुन्धाम्=रुधिर् आवरणे (रुधादि:)। त्वष्टा="त्वक्षतेर्वा स्यात् करोतिकर्मणः" (निरुक्त ८।२।११)। "त्वक्षु तनूकरणे" (भ्वादिः) तनूकरण अर्थात् सूक्ष्मकरण का काम बढ़ई करता है। वह स्थूल काष्ठ से सूक्ष्म चमस, तथा कुर्सी आदि का निर्माण करता है। परमेश्वर भी बढ़ई के सदृश कारीगर है। वह महाव्यापिनी प्रकृति से अल्पकाय पृथिवी आदि और अन्न का उत्पादन कर हम में पोषण स्थापित कर रहा है। उदेयम्="वद व्यक्तायां वाचि" (भ्वादिः), "लिङयाशिष्यङ्" (अष्टा० ३।१।८६) इत्यङ्। उदेयम्=उद्यासम् उच्यासम् (सायण)] [१. परमेश्वर ने गोदान अर्थात् वेदवाणी हम सबको दी है, उसका दान किया है। यथा, "यथेमां वाचं कल्याणीमावदानी जनेभ्य:" आदि (यजु:० २६।२)। इसे "गोसनिम्" द्वारा निर्दिष्ट किया है। इस वेद वाणी के संबंध में कहा है कि "वाचम् उदेयम्"।]

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