ये अग्नयो अप्स्वन्तर्ये वृत्रे ये पुरुषे ये अश्मसु ।
य आविवेशोषधीर्यो वनस्पतींस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥१॥
०३।०२१।०१
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ये) जो (अग्नयः) अग्नियाँ [ईश्वर के तेज] (अप्सुअन्तः) जल के भीतर, (ये) जो (वृत्रे) मेघ में, (ये) जो (पुरुषे) पुरुष [मनुष्य शरीर] में और (ये) जो (अश्मसु) शिलाओं में हैं। (यः) जिस [अग्नि] ने (ओषधीः) औषधियों [अन्न, सोम लता आदि] में, और (यः) जिसने (वनस्पतीन्) वनस्पतियों [वृक्ष आदि] में (आ विवेश) प्रवेश किया है, (तेभ्यः) उन (अग्निभ्यः) अग्नियों [ईश्वर तेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥१॥
भावार्थः इस सूक्त में गुणों के वर्णन से गुणी परमेश्वर का ग्रहण है, अर्थात् जिस परमेश्वर की शक्ति से समुद्र में बड़वानल, मेघ में बिजुली, मनुष्य में अन्न पाचक अग्नि और पत्थर में चकमक, ओषधियों में फलपाक अग्नि आदि अद्भुत उपकारी शक्तियाँ वर्त्तमान हैं, उनके प्रेरक परमेश्वर को हमारा प्रणाम है ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ये) जो (अग्नयः) अग्नियाँ (अप्सु अन्तः) जलों के भीतर हैं, (ये) जो (वृत्रे) आकाश के आवरण करनेवाले मेघ हैं, (ये) जो (पुरुष) पुरुष में, (ये) जो (अश्मसु) नामाविध व्यापी-मेघों में या सूर्यकान्तादिशिलाओं में हैं। (यः) जो अग्नि (ओषधीः आविवेश) ओषधियों में प्रविष्ट है, (यः) जो अग्नि (वनस्पतीन्) वनस्पतियों में प्रविष्ट है (तेभ्यः अग्निभ्यः) उन अग्नियों के लिए (एतत्) यह हविः (हुतमस्तु) प्रदत्त हो।
टिप्पणी: [मन्त्र में "ये""बहुवचन" द्वारा नाना अग्नियाँ प्रत्येक वस्तु में दर्शाकर, उन अग्नियों के "एकत्व" को "यः" द्वारा मन्त्र के उत्तरार्ध में दर्शाया है। एकवचन द्वारा एक परमेश्वराग्नि को दर्शाया है, यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यः" (यजु:० ३२।१); और बहुवचन द्वारा परमेश्वराग्नियों को परमेश्वर की इच्छा, ज्ञान और कृति रूप में दर्शाया है। परमेश्वर एकाग्निरूप में भी सब में प्रविष्ट है, और इच्छा, ज्ञान, और कृतिरूप में भी सब में प्रविष्ट है। एक परमेश्वराग्नि के स्वरूप का स्पष्टीकरण मन्त्र (३) आदि में "देवः" आदि पदों द्वारा हुआ है। अश्मा मेघनाथ (निघं० १।१०)। पुरुष में भी इच्छा, ज्ञान और कृतिरूप में अग्नियां१ प्रविष्ट हैं, जोकि परमेश्वर की इच्छा, ज्ञान और कृतिरूप अग्नियों द्वारा अभिव्यक्त होती हैं। पुरुष की इच्छा आदि की अभिव्यक्ति शरीर के होते होती है, और शरीर का निर्माण परमेश्वर द्वारा होता है।] [१. ज्ञान, इच्छा, कृति अर्थात् संकल्प विषयों का प्रकाश करते हैं, अतः ये अग्नियाँ हैं, "अग्निवत् प्रकाशिका है"]
भावार्थः इस सूक्त में गुणों के वर्णन से गुणी परमेश्वर का ग्रहण है, अर्थात् जिस परमेश्वर की शक्ति से समुद्र में बड़वानल, मेघ में बिजुली, मनुष्य में अन्न पाचक अग्नि और पत्थर में चकमक, ओषधियों में फलपाक अग्नि आदि अद्भुत उपकारी शक्तियाँ वर्त्तमान हैं, उनके प्रेरक परमेश्वर को हमारा प्रणाम है ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ये) जो (अग्नयः) अग्नियाँ (अप्सु अन्तः) जलों के भीतर हैं, (ये) जो (वृत्रे) आकाश के आवरण करनेवाले मेघ हैं, (ये) जो (पुरुष) पुरुष में, (ये) जो (अश्मसु) नामाविध व्यापी-मेघों में या सूर्यकान्तादिशिलाओं में हैं। (यः) जो अग्नि (ओषधीः आविवेश) ओषधियों में प्रविष्ट है, (यः) जो अग्नि (वनस्पतीन्) वनस्पतियों में प्रविष्ट है (तेभ्यः अग्निभ्यः) उन अग्नियों के लिए (एतत्) यह हविः (हुतमस्तु) प्रदत्त हो।
टिप्पणी: [मन्त्र में "ये""बहुवचन" द्वारा नाना अग्नियाँ प्रत्येक वस्तु में दर्शाकर, उन अग्नियों के "एकत्व" को "यः" द्वारा मन्त्र के उत्तरार्ध में दर्शाया है। एकवचन द्वारा एक परमेश्वराग्नि को दर्शाया है, यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यः" (यजु:० ३२।१); और बहुवचन द्वारा परमेश्वराग्नियों को परमेश्वर की इच्छा, ज्ञान और कृति रूप में दर्शाया है। परमेश्वर एकाग्निरूप में भी सब में प्रविष्ट है, और इच्छा, ज्ञान, और कृतिरूप में भी सब में प्रविष्ट है। एक परमेश्वराग्नि के स्वरूप का स्पष्टीकरण मन्त्र (३) आदि में "देवः" आदि पदों द्वारा हुआ है। अश्मा मेघनाथ (निघं० १।१०)। पुरुष में भी इच्छा, ज्ञान और कृतिरूप में अग्नियां१ प्रविष्ट हैं, जोकि परमेश्वर की इच्छा, ज्ञान और कृतिरूप अग्नियों द्वारा अभिव्यक्त होती हैं। पुरुष की इच्छा आदि की अभिव्यक्ति शरीर के होते होती है, और शरीर का निर्माण परमेश्वर द्वारा होता है।] [१. ज्ञान, इच्छा, कृति अर्थात् संकल्प विषयों का प्रकाश करते हैं, अतः ये अग्नियाँ हैं, "अग्निवत् प्रकाशिका है"]
यः सोमे अन्तर्यो गोष्वन्तर्य आविष्टो वयःसु यो मृगेषु । य आविवेश द्विपदो यस्चतुष्पदस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥२॥
०३।०२१।०२
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (यः) जो [अग्नि] (सोमे) सोम [चन्द्र, अमृत वा दूध, घी, आदि] के (अन्तः) भीतर, (यः) जो (गोषु अन्तः) गौ आदि पालतू पशुओं में, (यः) जो (वयःसु) पक्षियों में और (यः) जो (मृगेषु) बनैले जीवों में (आविष्टः) प्रविष्ट है, और (यः) जिसने (द्विपदः) दोपायों, और (यः) जिसने (चतुष्पदः) चौपायों में (आविवेश) प्रवेश किया है, (तेभ्यः) उन (अग्निभ्यः) अग्नियों [ईश्वरतेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥२॥
भावार्थः जो अग्नि चन्द्रमा में सूर्य से है और जो सोमलता वा दूध आदि में रस पकाकर पौष्टिक बनाता है, और जो प्राणियों में वेग, बलवत्ता, जंगलीपन, और अन्य विशेषता का कारण है, उस अग्नि के संयोजक, वियोजक परमात्मा को हमारा नमस्कार है ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (यः) जो (सोमे अन्तः) चन्द्रमा के भीतर [अग्निः] परमेश्वराग्नि है, (यः) जो (गोषु अन्तः) गमन करनेवाले नक्षत्र आदि में परमेश्वराग्नि है, (यः) जो (वयःसु) पक्षियों में, (यः) जो (मृगेषु) मृगों में (आविष्टः) सर्वत्र प्रविष्ट परमेश्वराग्नि है। (यः) जो (आविवेश) सर्वत्र प्रविष्ट है (द्विपदः) दो-पायों में, (यः) जो (चतुष्पदः) चौ-पायों में, (तेभ्यः अग्निभ्यः) उन अग्नियों के लिए (एतत्) यह हवि (हुतम् अस्तु) प्रदत्त हो।
टिप्पणी: [परमेश्वराग्नि सर्वव्यापक होने से सबमें प्रविष्ट है। पदार्थगत है। नाना प्रवेश्यों की दृष्टि से परमेश्वराग्नि को नानारूपों में दर्शाया है। अतः अग्नि पद का प्रयोग हुआ है। परमेश्वर के प्रत्येक अग्नि स्वरूप के प्रति आहुति समर्पित की गई है।]
य इन्द्रेण सरथं याति देवो वैश्वानर उत विश्वदाव्यः ।
यं जोहवीमि पृतनासु सासहिं तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥३॥
यं जोहवीमि पृतनासु सासहिं तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥३॥
०३।०२१।०३
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (यः) जो (देवः) प्रकाशमान वा जय चाहनेवाला [अग्नि] (इन्द्रेण) ऐश्वर्यवान् शूर के साथ (सरथम्) एक रथ पर चढ़कर (याति) चलता है, और [जो हमारे] (वैश्वानरः) सब नरों का हितकारी, (उत) और [जो शत्रु का] (विश्वदाव्यः) सब कुछ जलानेवाला है, और (यम्) जिस (सासहिम्) विजयी [अग्नि] को (पृतनासु) संग्रामों में (जोहवीमि) वारंवार आवाहन करता हूँ, (तेभ्यः) उन (अग्निभ्यः) अग्नियों [ईश्वरतेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥३॥
भावार्थः जिस परमात्मा के तेज को हृदय में धारण करके साहसी शूर आग्नेय अस्त्र-शस्त्रधारी सेना के द्वारा शत्रुओं को शीघ्र जीत लेता है, उस जगदीश्वर को हमारा नमस्कार है ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (यः) जो (वैश्वानरः) समग्र नर-नारियों का हित करनेवाला, तथा (विश्वदाव्यः) समग्र जगत् के लिए दावाग्नि के सदृश (देव:) परमेश्वर देव, (इन्द्रेण) इन्द्रियों के स्वामी जीवात्मा के साथ (सरथम्) एक शरीररथ में आरूढ़ हुआ (याति) गमन करता है, विचरता है। (यम्) जिस (पृतनासु) देवासुर संग्रामों में (साहसिम्) अत्यर्थ पराभव करनेवाले को (जोहवीमि) मैं बार-बार पुकारता हूँ, (तेभ्यः अग्निभ्य:) उन वैश्वानर आदि अग्नियों के लिए [निज सहायतार्थ] (एतत्) यह प्राकृतिक तथा आत्महवि (हुतम् अस्तु) प्रदत्त हो, अर्पित हो।
टिप्पणी: [सरथम्="आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु" (कठ० उप० ३।३), अर्थात् जीवात्मा है रथस्वामी और शरीर है रथ। इन्द्र अर्थात् इन्द्रियों का अधिष्ठाता जीवात्मा। यह और वैश्वानर-देव–ये दोनों, शरीर-रथस्थ हदय में विद्यमान हैं, और परस्पर सखा हैं। पृतनासु=आध्यात्मिक देवासुर-संग्राम, जोकि मनुष्य जीवन में होते रहते हैं। परमेश्वर निज ध्याताओं की आसुर भावनाओं का पराभव करता है। अग्निभ्यः=इन्द्र और वैश्वानर-देव आदि अग्नियाँ हैं। ये आसुरी-भावनाओं को दग्ध करती हैं।]
यो देवो विश्वाद्यमु काममाहुर्यं दातारं प्रतिगृह्णन्तमाहुः । यो धीरः शक्रः परिभूरदाभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥४॥
०३।०२१।०४
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (यः) जो (देवः) प्रकाशमान अग्नि, [वैरियों में] (विश्वात्) सबका खानेवाला है, (यम्) जिसको (उ) ही (कामम्) कमनीय वा कामना पूरी करनेवाला (आहुः) लोग कहते हैं, (यम्) जिसको (दातारम्) देनेवाला और (प्रतिगृह्णन्तम्) लेनेवाला (आहुः) बताते हैं। (यः) जो (धीरः) पुष्टि करनेवाला, (शक्रः) शक्तिमान् (परिभूः) सर्वव्यापक और (अदाभ्यः) न दबने योग्य है, (तेभ्यः) उन (अग्निभ्यः) अग्नियों [ईश्वरतेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥४॥
भावार्थः जिस परमात्मा को विद्वान् लोग आनन्ददाता और प्रार्थना का माननेवाला जानते हैं, और जिसके ध्यान से पुरुषार्थी लोग शत्रुओं को जीतते हैं, उसको हमारा प्रणाम है ॥४॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (यः) जो (देव:) परमेश्वर-देव (विश्वाद्) विश्व को खा जाता है [प्रलयकाल में] (यम्, उ) जिसे ही (कामम्) कामनावाला या काम्य (आहुः) कहते हैं, (यम्) जिसे (दातारम्) दाता तथा (प्रतिगृह्णन्तम्) हमारी भक्ति-श्रद्धा को स्वीकार करनेवाला (आहुः) कहते हैं। (यः) जो (धीरः) धीमान्, (शक्रः) शक्तिशाली, (परिभूः) सर्वत्र विद्यमान, (अदाभ्यः) न खाया जा सकनेवाला है, (तेभ्यः अग्नि भ्यः) परमेश्वर के उन अग्निस्वरूपों के लिए (एतत्) यह प्राकृतिक तथा आत्म हविः (हुतम्, अस्तु) प्रदत्त हो, अर्पित हो।
टिप्पणी: [परमेश्वर विश्वाद् है, विश्व+अद भक्षणे (अदादिः), वह विश्व का भक्षण करता है, अतः अग्निरूप है। वह कामनावाला है, अतः काम है। इसे उपनिषदों में "अकामयत" द्वारा कहा है। कामना द्वारा जगत् को वह प्रकाशित करता है, इसलिए भी वह अग्नि है। अग्नि प्रकाशक होती है। वह धीर है, बुद्धिमान् है, ज्ञानवान् है। ज्ञान ज्ञेयों को प्रकाशित करता है, इसलिए भी वह अग्निरूप है।]
यं त्वा होतारं मनसाभि संविदुस्त्रयोदश भौवनाः पञ्च मानवाः । वर्चोधसे यशसे सूनृतावते तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥५॥
०३।०२१।०५
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (त्रयोदश) तेरह [दो कान, दो नथनें, दो आंखें और एक मुख यह सात शिर के, और दो हाथ, दो पद, एक उपस्थेन्द्रिय, और एक गुदास्थान, यह छः शिर के नीचे के] (भौवनाः) भुवनों से संबन्धवाले प्राणी, और (पञ्च) पांच [पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश, इन पांच तत्त्व] से संबन्धवाले (मानवाः) मनुष्य (मनसा) मनन शक्ति से (वर्चोधसे) तेज धारण करानेवाले और (सूनृतावते) प्रिय सत्य वाणीवाले (यशसे) यश के लिये (यम्) जिस (त्वा) तुझ [अग्नि] को (होतारम्) दानी (अभि) सब प्रकार (संविदुः) ठीक ठीक जानते हैं, (तेभ्यः) उन (अग्निभ्यः) अग्नियों [ईश्वर तेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥५॥
भावार्थः सब शरीरधारी उस परमपिता की महिमा विचारपूर्वक गाकर तेजस्वी, सत्यवादी और यशस्वी होते हैं, उसको यह हमारा नमस्कार है ॥५॥ ‘पञ्च मानवाः’ शब्द ‘पञ्चजनाः’ शब्द का पर्यायवाची है, जिसका अर्थ “मनुष्य” है−निघ० २।३। उसकी व्याख्या, निरु० ३।८ में इस प्रकार की है−“पञ्च जनाः” गन्धर्व, पितर, देव, असुर और राक्षस, ऐसा कोई-२ मानते हैं, चारों वर्ण और निषाद पाँचवाँ, यह औपमन्यव ऋषि का मत है निषाद किस लिये, इसमें पाप स्थित है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [हे परमेश्वराग्नि!] (यम्, त्वा) जिस तुझको, (होतारम्) दाता तथा अत्तारूप में (भौवनाः) भुवनवासी (त्रयोदश) १३ मास, १ तथा (पञ्च)२ पाँच प्रकार के (मानवाः) मननाभ्यासी मनुष्य, (मनसा) मन या मनन द्वारा (अभि) साक्षात् (संविदः) सम्यक्तया जानते हैं, उस (वर्चोधसे) दीपिथारी के लिए, (यशसे) यशस्वी के लिए, (सुनृतावते) प्रिय तथा सत्य वेद वाणी वाले के लिए, (तेभ्य अग्निभ्य ) उन् सब तेरै आग्नेय स्वरूपों के लिए, (एतत्) यह प्राकृतिक तथा अध्यात्म अर्थात् आत्महत्या (हुतम् अस्तु) आहुति रूप में प्रदत्त हो, समर्पित हो।
टिप्पणी: [परमेश्वर अग्निरूप है। यथा "तदेवाग्निस्तदादित्यः" (यजु:० ३२।१)। परमेश्वर के नानाविध आग्नेयस्वरूपों के प्रति प्राकृतिक तथा आत्महविः समर्पित की है। चांद, सूर्य, विद्युत, तथा नक्षत्र तारागण परमेश्वराग्नि के ही नानारूप हैं, "तस्य भासा सर्वमिदं विभाति"] [१. मासों में संविदु: की शक्ति नहीं, मास जड़ हैं। अत: मास का अभिप्राय है मास-निवासिनः, उपचारात्। यथा मञ्चा: क्रोशन्ति=मञ्चस्थाः पुरुषाः क्रोशन्ति। २. पाँच प्रकार के मानव यथा, "पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम्" गन्धर्वाः पितरो देवा असुरा रक्षांसि (निरुक्त ३।२।८)। होत्रम् का अभिप्राय है अग्निहोत्र आदि यज्ञ। पितरः और देवा: के साथ पठित "गन्धर्वाः, असुराः, रक्षांसि" पद भी श्रेष्टार्थवाचक हैं। गन्धर्वा हैं गानविद्याज्ञातारः, असुराः हैं प्रज्ञानवन्तः" असुः प्रज्ञानाम" (निघं० ३।९)। रक्षासि हैं रक्षक। परमेश्वर को भी रक्षस् कहा है, यथा "स एव मृत्युः सोऽमृतं सोभ्वं स रक्षः" (अथर्व० १३।३।२५)। परमेश्वर रक्षस् है, वह सबका रक्षक है। १३ मास हैं, १२ मास संवत्सर के और १ अधिमास यथा "अहोरात्रैर्विमितं त्रिंशदङ्ग त्रयोदशं मासं यो निर्मिमीते" (अथर्व० १३।३।८)। यह चान्द्रमास है। सौरवर्ष के दिन अधिक होते और चान्द्रवर्ष के दिन ३० कम होते हैं। उनकी पूर्ति के लिए १३वॉ अधिमास है। अधिमास=अधिक मास। मानवा:=मननाभ्यासिनः। यह अर्थ यहाँ संगत प्रतीत होता है। यद्यपि अद्भुत है। ऐसा अद्भुत अर्थ भी है "मानुष=मनुष्यहितोऽयमादित्यः" (मा ते राधांसि) मन्त्र ऋ० १।८४।२० पर निरुक्त १३ (१४) ३ (२), खं० ३७ (५०)।]
उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे ।
वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥६॥
वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥६॥
०३।०२१।०६
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (उक्षान्नाय) प्रबलों के अन्नदाता, (वशान्नाय) वशीभूत निर्बल प्रजाओं के अन्नदाता, (सोमपृष्ठाय) अमृत सींचनेवाले और (वेधसे) उत्पन्न करनेवाले (तेभ्यः) उन [चार प्रकार के] (वैश्वानरज्येष्ठेभ्यः) सब नरों के हितकारी [परमेश्वर] को प्रधान रखनेवाले (अग्निभ्यः) अग्नियों [ईश्वरतेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥६॥
भावार्थः जिस (वैश्वानर) सब मनुष्य आदि के हितकारी परमेश्वर की शक्ति से सब प्राणी पुष्ट होते हैं, उसको हमारा नमस्कार है ॥६॥ इस मन्त्र का पूर्वार्ध ऋग्वेद ८।४३।११ में है ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (उक्षान्नाय) वर्षा द्वारा सींचनेवाला आदित्य जिसका अन्न है, उसके लिए, (बशान्नाय) तथा वशा जिसका अन्न है उसके लिए, (सोमपृष्ठाय) उत्पन्न जगत् का जो पृष्ठ अर्थात् आधार है उसके लिए, (वेधसे) जगत् का, या विधियों का विधान करनेवाले के लिए, (वैश्वानर-ज्येष्ठेभ्यः) समग्र नर-नारियों का हित करनेवाला परमेश्वररूप जिनमें ज्येष्ठ है, (तेथ्य: अग्निभ्य:) उन अग्नियों के लिए (एतत्) यह प्राकृतिक तथा आत्महविः (हुतम्, अरस्तु) प्रदत्त हो, अर्पित हो।
टिप्पणी: [उक्षा= उक्ष सेचने (भ्वादिः), "आदित्याद् जायते वृष्टिः वृष्टेरन्नम्"। वशा="वशेदं सर्वमभवत, देवा मनुष्या असुराः पितर ऋषयः" (अथर्व० १०।१०।२६) अर्थात् यह दृश्यमान जगत् तथा देव, मनुष्य, असुर, पितर और ऋषि "वशा" हैं। अर्थात् उक्षा और दृश्यमान जगत्, तथा देव आदि जिसके अन्त हैं। प्रलयकाल में आदित्य तथा वशोक्त सब परमेश्वराग्नि के अन्नरूप हो जाते हैं। परमेश्वर अन्नाद है, मंत्राभिप्रेत अन्न का अदन करता है। यह सृष्टिकाल में भी हो रहा है, और महाप्रलय काल में भी। परमेश्वर अन्न भी है। उपासक इसके अन्नरस अर्थात् आनन्दरस का पान करते हैं, और यह अन्नाद भी है। यथा "अहमन्नम्, अहमन्नादः" (तैत्ति० उप० वल्ली ३।१०।६)। सोमपृष्ठाय सोम है उत्पन्न जगत् (षु प्रसवे, भ्वादिः, अदादि)। परमेश्वर उत्पन्न जगत् की पीठ है, आधार है। जैसे अश्व की पीठ अश्वारोही का आधार होती है। वैश्वानरज्येष्ठेभ्यः=परमेश्वर है वैश्वानर, सब नर नारियों का हितकारी। सबका हितकारी होने से यह सर्व ज्येष्ठ अग्नि है। अग्नि रूप होकर यह पाप-मल को भस्मीभूत कर देता है और प्रलय में जगत् को भी।]
दिवं पृथिवीमन्वन्तरिक्षं ये विद्युतमनुसंचरन्ति ।
ये दिक्ष्वन्तर्ये वाते अन्तस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥७॥
ये दिक्ष्वन्तर्ये वाते अन्तस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्॥७॥
०३।०२१।०७
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ये) जो [तेज] (दिवम्) सूर्यलोक में, (पृथिवीम्) पृथिवी में और (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष में (अनु) लगातार और (विद्युतम्) बिजुली में (अनुसंचरन्ति) लगातार चलते रहते हैं, (ये) जो (दिक्षु अन्तः) दिशाओं के भीतर और (ये) जो (वाते अन्तः) पवन के भीतर हैं, (तेभ्यः) उन (अग्निभिः) अग्नियों [ईश्वर तेजों] को (एतत्) यह (हुतम्) दान [आत्मसमर्पण] (अस्तु) होवे ॥७॥
भावार्थः जिस परमात्मा के तेज सब लोकों, सब पदार्थों और सब दिशाओं में हैं, उस जगदीश्वर को हमारा नमस्कार है ॥७॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (ये) जो अग्नियाँ (दिवम्) द्युलोक में, (पृथिवीम्) पृथिवी में, (अन्तरिक्षम्) अन्तरिक्ष में (अनु) अनुप्रवेश करके (संचरन्ति) संचार करती हैं, (ये) जो (विद्युतम्) विद्योतमान राशिचक्र में विचरती हैं। (ये) जो (दिक्षु अन्तः) सब दिशाओं के भीतर हैं, (थे) जो (वाते अन्तः) वायु के भीतर उल्काग्नियाँ हैं, (तेभ्यः अग्निभ्यः) उन अग्नियों के लिए (एतत्) यह प्राकृतिक तथा आत्म हवि: (हुतमस्तु) प्रदत्त हो, अर्पित हो।
टिप्पणी: [उल्का=(अथर्व० १९।९।८,९)। दिक्षु= अथर्व० (१९।८।१)। ये अग्नियाँ हैं परमेश्वर का तेज:स्वरूप जो कि इनमें भासित हो रहा है, "तस्य भासा सर्वमिदं विभाति" (मुण्डक० उप० २।२।१०)।]
हिरण्यपाणिं सवितारमिन्द्रं बृहस्पतिं वरुणं मित्रमग्निम् । विश्वान् देवान् अङ्गिरसो हवामहे इमं क्रव्यादं शमयन्त्वग्निम् ॥८॥
०३।०२१।०८
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (हिरण्यपाणिम्) सूर्य आदि तेजों से स्तुति किये हुए (सवितारम्) सबके प्रेरक (इन्द्रम्) बड़े ऐश्वर्यवाले (बृहस्पतिम्) बड़े लोकों के रक्षक (वरुणम्) सबमें श्रेष्ठ, (मित्रम्) हितकारी (अग्निम्) ज्ञानस्वरूप परमेश्वर से (विश्वान्) सब (देवान्) विजय करानेवाले (अङ्गिरसः) ज्ञानों वा पुरुषार्थों को (हवामहे) हम माँगते हैं (इमम्) इस (क्रव्यादम्) मांस खानेवाले (अग्निम्) अग्नि [समान दुःख] को (शमयन्तु) वे शान्त कर दें ॥८॥
भावार्थः मनुष्य ईश्वर के अनुपम गुणों का अनुभव करके पुरुषार्थी बनें और अग्नि समान तापकारी और शरीरशोषक दुःखों का नाश करें ॥८॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (हिरण्यपाणिम्) हिरण्य जिसके हाथ में है (सवितारम्) उस सर्वप्रेरक या सर्वोत्पादक परमेश्वर का (इन्द्रम्) इन्द्रियों के अधिष्ठाता जीवात्मा का, (बृहस्पतिम्) बृहती वेदवाणी के पति का, (वरुणम्) अपांपति का, (मित्रम्) स्नेहकारी [वर्षा द्वारा] मेघ का, (अग्निम्) यज्ञियाग्नि का तथा (अङ्गिरसः विश्वान् देवान्) अङ्गों तथा अङ्गी शरीर के सब रसों का (हवामहे) हम कथन करते हैं, ये सब (इमम्, क्रव्यादम्,१ अग्निम्) इस कच्चे मांस का भक्षण करनेवाली शवाग्नि को (शमयन्तु) शान्त करें।"हिरण्यपाणिम्" द्वारा यह दर्शाया है कि परमेश्वर ही सबकी रक्षा दान द्वारा कर रहा है।
शान्तो अग्निः क्रव्याच्छान्तः पुरुषरेषणः ।
अथो यो विश्वदाव्यस्तं क्रव्यादमशीशमम् ॥९॥
अथो यो विश्वदाव्यस्तं क्रव्यादमशीशमम् ॥९॥
०३।०२१।०९
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (क्रव्यात्) मांस खानेवाला (अग्निः) अग्नि [समान तापकारी दुःख] (शान्तः) शान्त हो। (पुरुषरेषणः) पुरुषों का सतानेवाला [कष्ट] (शान्तः) शान्त हो। (अथो) और भी (यः) जो (विश्वदाव्यः) सब [सुखों] का जलानेवाला है (तम्) उस (क्रव्यादम्) मांस खानेवाले [अग्निरूप दुःख] को (अशीशमम्) मैंने शान्त कर दिया है ॥९॥
भावार्थः दूरदर्शी पुरुष विघ्नों को हटाकर आप सुखी रहते और सबको सुखी रखते हैं ॥९॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: [सविता आदि के प्रभाव द्वारा, मन्त्र ८] (क्रव्याद् अग्निः शान्तः) कच्चे मांस की भक्षक अग्नि शान्त हो गई है, (पुरुषरेषणः) पुरुषहिंसक क्रव्याद् अग्नि (शान्त:) शान्त हो गई है (अथो) तथा (य:) जो अग्नि (विश्वदाव्यः) विश्व का दहन करनेवाली दावाग्नि है (तम् क्रव्यादम्) उस क्रव्याद् अग्नि को (अशीशमम्) मैंने शान्त कर दिया है।
टिप्पणी: [विश्वदाव्यः=हृदयस्थ ताप-संतापरूपी अग्नि। यह अग्नि सब पुरुषों को दावाग्नि के सदृश दग्ध करती रहती है। "अशीशमम्" उक्ति परमेश्वर की है।]
[१. क्रव्यम्=कृवि हिंसाकरणयोश्च (भ्यादिः)। हिंसा द्वारा प्राप्त मांस अर्थात् शरीर।]
ये पर्वताः सोमपृष्ठा आप उत्तानशीवरीः ।
वातः पर्जन्य आदग्निस्ते क्रव्यादमशीशमन् ॥१०॥
वातः पर्जन्य आदग्निस्ते क्रव्यादमशीशमन् ॥१०॥
०३।०२१।१०
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थ: (ये) जो (पर्वताः) पहाड़ (सोमपृष्ठाः) सोम [अमृत अर्थात् ओषधि वा जल] को पीठ पर रखनेवाले हैं, [उन्होंने और] (उत्तानशीवरीः वर्यः) ऊपर को मुख करके सोनेवाले [सूर्य की ओर चढ़नेवाले] (आपः) जल, (वातः) पवन, (पर्जन्यः) मेघ, (आत्) और (अग्निः) अग्नि, (ते) उन सबने (क्रव्यादम्) मांसभक्षक [अग्नि रूप दुःख] को (अशीशमन्) शान्त कर दिया है ॥१०॥
भावार्थः मनुष्य प्रयत्न करें कि सोमलता आदि औषध उत्पन्न करनेवाले पर्वत, जल, वायु, मेघ, अग्नि आदि सब पदार्थ शुद्ध रहकर सुखदायक होवें ॥१०॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थ: (सोमपृष्ठाः) सोमौषधि जिनकी पीठ पर विद्यमान है, ऐसे (ये) जो (पर्वता:) पर्वत हैं, तथा (उत्तानशीवरी:) ऊपर-ताने अर्थात् विस्तृत वायु-मण्डल में शयन करनेवाले जो (आपः) जल हैं; (वातः) प्रवाही वायु (पर्जन्य:) मेघ, (आत्) तदनन्तर (अग्निः) यज्ञियाग्नि है (ते) उन्होंने (क्रव्यादम्) कच्चे मांस का भक्षण करनेवाली शवाग्नि अर्थात् श्मशानाग्नि को (अशीशमन्) शान्त कर दिया है, प्रभावरहित कर दिया है।
टिप्पणी: [सोम है वीरुघों का अधिपति यथा "सोमो वीरुधामधिपतिः।" (अथर्व० ५।२४।७)। आप: हैं ऊपर अर्थात् वायुमण्डल में शयन किये हुए जल, जिनकी जागृति वर्षाकाल में होती है तथा वायु आदि, क्रव्यादग्नि को शान्त कर देते हैं। मनुष्य की आयु १०० वर्षों की कही है। १०० वर्षों से पूर्व मृत्यु अन्नादि के दोषादि द्वारा होती है। इस मृत्यु में शरीर कच्चे मांस-वाला होता है, पूर्णतया परिपक्व मांसवाला नहीं होता, यह "क्रव्य" होता है, इसे भक्षण करनेवाली श्मशानाग्नि क्रव्यादग्नि है। क्रव्यम्= कृवि हिंसा- करणयोश्च। सोम आदि के सेवन में क्रव्यादग्नि शान्त हो जाती है।]

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