सूक्त ४
०३।००४।०१
आ त्वा॑ गन्रा॒ष्त्रं स॒ह वर्च॒सोदि॑हि॒ प्राङ्वि॒शां पति॑रेक॒राट्त्वं वि रा॑ज । सर्वा॑स्त्वा राजन्प्र॒दिशो॑ ह्वयन्तूप॒सद्यो॑ नम॒स्यो॑ भवे॒ह ॥ १॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (राजन्) हे राजन् ! (राष्ट्रम्) यह राज्य (त्वा) तुझको (आ, गन्=अगमत्) प्राप्त हुआ है। (वर्चसा सह) तेज के साथ (उत्+इहि=उदिहि) उदय हो। (प्राङ्) अच्छे प्रकार पूजा हुआ, (विशाम्) प्रजाओं का (पतिः) रक्षक, (एकराट्) एक महाराजाधिराज (त्वम्) तू (वि, राज) विराजमान हो। (सर्वाः) सब (प्रदिशः) पूर्वादि दिशायें (त्वा) तुझको (ह्वयन्तु) पुकारें। (उपसद्यः) सबका सेवनीय और (नमस्यः) नमस्कार योग्य (इह) यहाँ पर [अपने राज्य में] (भव) तू हो ॥१॥
भावार्थः राजा सिंहासन पर विराजकर महाप्रतापी और प्रजापालक हो, सब दिशाओं में उसकी दुहाई फिरे और सब प्राजगण उसकी न्यायव्यवस्था पर चलकर उसका सदा आदर और अभिनन्दन करते रहें ॥१॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [हे सम्राट !] (त्वा) तुझे (राष्ट्रम्) राष्ट्र (आ गन्) पुनः आ गया है, प्राप्त हो गया है। (वर्चसा सह) निज तेज के साथ (उदिहि) सूर्य के सदृश तू उदित हो, (प्राङ्) प्रगति करता हुआ (विशाम् पतिः) प्रजाओं का पति (त्वम्) तु (एकराट्) मुख्य या अकेला राजा होकर (विराज) विराजमान हो, दीप्यमान हो। (राजन्) हे राजन ! (सर्वा दिशः) सब विशाओं में स्थित प्रजाएँ (त्वा ह्वयन्तु) तेरा आह्वान करें। (इह) इस साम्राज्य में (उपसद्यः) सब द्वारा समीप बैठने योग्य और (नमस्यः) नमस्कार योग्य (भव) तू हो।
टिप्पणी: [सूक्त ३ के अनुसार वापस आ गये सम्राट का वर्णन सुक्त ४ में है। एतदर्थ देखो मन्त्र ५, ६, ७। मन्त्र में "उदिहि" पद द्वारा उदय होना कहकर सम्राट् को सूर्य से उपमित किया है। प्राङ् के दो अर्थ हैं-पूर्व दिशा तथा प्रगति करनेवाला। प्राङ=प्र+अञ्चु गतौ। सूर्योदय पूर्व दिशा में ही होता है और पश्चिम की ओर गति करता है। उपसद्य:= उप+षद् (बैठना); अथवा उप + षद् (गतौ) उपगमन करना, समीप जाना, तद्योग्य। षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु (भ्वादिः, तुदादिः)।]
०३।००४।०२
त्वां विशो॑ वृणतां रा॒ज्या॑य॒ त्वामि॒माः प्र॒दिशः॒ पञ्च॑ दे॒वीः। वर्ष्म॑न्रा॒ष्ट्रस्य॑ क॒कुदि॑ श्रयस्व॒ ततो॑ न उ॒ग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि ॥२॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः [हे राजन् !] (त्वाम्) तुझको (राज्याय) राज्य के लिये (विशः) प्रजायें और (त्वाम्) तुझको ही (इमाः) यह सब (पञ्च) विस्तीर्ण वा पाँच (देवीः=०−व्यः) दिव्य गुणवाली (प्रदिशः) महा दिशायें (वृणताम्) स्वीकार करें। (राष्ट्रस्य) राज्य के (वर्ष्मन्=०−णि) ऐश्वर्ययुक्त वा ऊँचे (ककुदि) शिखर पर (श्रयस्व) आश्रय ले। (ततः) फिर (उग्रः) तेजस्वी तू (नः) हमारे लिये (वसूनि) धनों का (वि, भज) विभाग कर ॥२॥
भावार्थः राजा को सब प्रजागण चुनें। और सब मनुष्यादि प्रजा और चारों पूर्वादि दिशाओं और पाँचवी ऊपर नीचे की दिशा के पदार्थ [जैसे आकाश मार्ग और भूगर्भादि के पदार्थ] सब राजा के आधीन रहें और यह बड़ा ऐश्वर्यवान् होकर राजभक्त सुपात्रों को विद्या और सुवर्णादि धनों का दान करता रहे ॥२॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [हे सम्राट् !] (त्वाम) तेरा (विशः) प्रजाएं (वृणताम्) वरण करें (राज्याय) राज्य के लिए (इमाः) ये (प्रदिशः) विस्तृत दिशाएँ, जोकि (पञ्च) पाँच हैं, और (देवीः) दिव्य प्रजाओं बाली हैं (त्वाम्) तेरा वरण करें। (वर्ष्मन्) श्रेष्ठ (राष्ट्रस्य ककुदि) राष्ट्र के उन्नत स्थान में या सिंहासन में (श्रयस्व) तूं आश्रय पा, (तत:) उस उन्नत स्थान या सिंहासन से (उग्र) उग्र हुआ तु (न:) हम प्रजाओं में (वसूनि, वि भज) सम्पत्तियों का विभाग कर। पञ्च=पचि विस्तारे (चुरादिः) यथा पंचास्यः= सिंह:। या ऊर्ध्वादिशा तथा शेष चार दिशाएँ।
टिप्पणी: [राष्ट्र में सम्पत्तियों का यथोचित विभाग करना चाहिए, जिससे सबका पालन-पोषण हो सके। ककूद=बैल के कन्धों में उच्च अङ्ग, तथा पर्वतशिखर।]
०३।००४।०३
अछ॑ त्वा यन्तु ह॒विनः॑ सजा॒ता अ॒ग्निर्दू॒तो अ॑जि॒रः सं च॑रातै । जा॒याः पु॒त्राः सु॒मन॑सो भवन्तु ब॒हुं ब॒लिं प्रति॑ पश्यासा उ॒ग्रः॥३॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (हविनः) पुकार करनेवाले (सजाताः) सजातीय लोग (त्वा) तुझको (अच्छ) सन्मुख आकर (यन्तु) मिलें। (अग्निः) आग के समान (दूतः) तापकारी और (अजिरः) वेगवान् [आप] (सम्) यथायोग्य (चरातै) आचरण करें। (जायाः) हमारी धर्मपत्नियाँ और (पुत्राः) कुलशोधक वा बहुरक्षक सन्तान (सुमनसः) प्रसन्नमन (भवन्तु) रहें। (उग्रः) तेजस्वी तू (बहुं बलिम्) बहुत भेंट को (प्रति) सन्मुख (पश्यासै) देखे ॥३॥
भावार्थः सब भाई-बन्धु और प्रजागण राजा से मिले रहें और प्रसन्न होके (बलि) राजग्राह्य भागकर आदि देवें और वह राजा भी उनकी रक्षा में सर्वथा तत्पर रहे ॥३॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः हे सम्राट् ! (त्वाम्) तुझे (सजाताः) समान जाति के अर्थात् एक वर्गीय राजा लोग (हविनः१) देय भेदों या राज्य करवाले हुए (अच्छ यन्तु) आभिमुख्येन प्राप्त प्राप्त हों। (अजिर:) तुझ द्वारा प्रेरित (अग्नि:) ज्ञानाग्निवाला (दूतः) दूत (संचरातै) स्व साम्राज्य तथा परराष्ट्र में संचार करे। (जायाः पुत्राः) साम्राज्य की पत्नियाँ और पुत्र (सुमनस:) सु प्रसन्न हों। (उग्रः) शासन में उग्र हुआ तू (बहुम्) बहुत (बलिम्) भेदों या राज्य करों को (प्रतिपश्यासै) देख।
टिप्पणी: [१. हविन. हु दाने (अदादिः) + इनिः (मत्वर्थे)।]
०३।००४।०४
अ॒श्विना॒ त्वाग्रे॑ मि॒त्रावरु॑णो॒भा विश्वे दे॒वा म॒रुत॒स्त्वा ह्व॑यन्तु । अधा॒ मनो॑ वसु॒देया॑य कृणुष्व॒ ततो॑ न उ॒ग्रो वि भ॑जा॒ वसू॑नि ॥४ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (अग्रे) अगले वा मुख्य पद पर [विराजमान] (त्वा) तुझको (अश्विना=०−नौ) सूर्य और चन्द्र और (उभा=उभौ) दोनों (मित्रावरुणा=०−णौ) प्राण और अपान वा दिन और रात और (विश्वे देवाः) सब व्यवहारकुशल (मरुतः) शूर पुरुष (त्वा) तुझको (ह्वयन्तु) पुकारें [मार्गदर्शक हों]। (अधा) और तू (मनः) अपने मन को (वसुदेयाय) धन का दान करने के लिये (कृणुष्व) स्थिर कर। (ततः) फिर (उग्रः) तेजस्वी तू (नः) हमारेलिये (वसूनि) धनों का (वि, भज) विभाग कर ॥४॥
भावार्थः जैसे सूर्य और चन्द्र परस्पर आकर्षण से, दिन और रात, प्राण और अपान अपने-२ क्रम से और शूर विद्वान् पुरुष नियम पर चलने से संसार का उपकार करते हैं, इसी प्रकार ऐश्वर्यवान् राजा विचारपूर्वक सुपात्रों को दान देकर प्रजा की उन्नति करें ॥४॥
इस मन्त्र का अन्तिम पाद (ततो न उग्रो....) मन्त्र २ में आ चुका है। ऋ० म० ५ सू० १५ म० १५ का भी मिलान करें ॥
स्व॒स्ति पन्था॒मनु॑चरेम सूर्याचन्द्र॒मसा॑विव ॥
(सूर्याचन्द्रमसौ इव) सूर्य और चन्द्रमा के समान (स्वस्ति) कल्याणयुक्त (पन्थाम्) मार्ग पर (अनुचरेम) हम चलते रहें ॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [हे सम्राट्!] (अग्रे) प्रथम (अश्विना) अश्वारोही तथा अश्वरथारोही (त्वा) तेरा (ह्वयन्तु) आह्वान करें, (उभा मित्रावरुणा) दोनों मित्र राजा और वरुण राजा, (विश्वे देवाः) साम्राज्य के सब दिव्य अधिकारी या जन, तथा (मरुतः) सैनिक (त्वा) तेरा (ह्वयन्तु) आह्वान करें। (अधा) तदनन्तर [साम्राज्य में आकर] (वसुदेयाय) संपत्ति-प्रदान के लिये (मनः कृणुष्व) मन को तय्यार कर, (ततः) तदनन्तर (उग्र:) उग्र हुआ (नः) हमें (वसूनि) पत्तियों का (वि भज) यथोचित विभाग कर, बाण्ट।
टिप्पणी: [मित्रावरुणा=मित्र राजा, और वरुण माण्डलिक राजा, यथा "इन्द्रश्च सम्राट वरुणश्च राजा" (यजु० ८।३७)। मरुत:=सैनिक (यजु० १७।४०)।]
०३।००४।०५
आ प्र द्र॑व पर॒मस्याः॑ परा॒वतः॑ शि॒वे ते॒ द्यावा॑पृथि॒वी उ॒भे स्ता॑म् । तद॒यं राजा॒ वरु॑ण॒स्तथा॑ह॒ स त्वा॒यम॑ह्व॒त्स उ॑पे॒दमेहि॑ ॥५॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (परमस्याः) अत्यन्त (परावतः) दूर देश से (आ, प्र, द्रव) आकर पधार। (ते) तेरेलिये (उभे) दोनों (द्यावापृथिवी=०−व्यौ) सूर्य और पृथिवी (शिवे) मङ्गलकारी (स्ताम्) होवें। (तथा) वैसा ही (अयम्) यह (राजा) राजा (वरुणः) सबमें श्रेष्ठ परमेश्वर (तत्) वह (आह) कहता है। सो (सः अयम्) इस [वरुण परमेश्वर] ने (त्वा) तुझको (अह्वत्) बुलाया है। (सः=सः त्वम्) सो तू (इदम्) इस [राज्य] को (उप) आदरपूर्वक (आ) आकर (इहि) प्राप्त कर ॥५॥
भावार्थः प्रजागण श्रेष्ठ राजा को दूर देश से भी बुला लेवें और वह अपने बुद्धिबल से ऐसा प्रबन्ध करे कि राज्यभर में दैवी और पार्थिव शान्ति रहें, अर्थात् अनावृष्टि और दुर्भिक्षादि में भी उपद्रव न मचे और आकाश, पृथिवी और समुद्रादि के मार्ग अनुकूल रहें। यही आज्ञा परमेश्वर ने वेदों में दी है, उसको राजा यथावत् माने ॥५॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः [हे सम्राट् !] (आ प्रद्रव) स्व-साम्राज्य के अभिमुख, तू शीघ्रता से आ, (परमस्याः परावतः) अत्यन्त दूर देश से भी। (उभे द्यावापृथिवी) दोनों द्युलोक और पृथिवी (ते) तेरे लिए (शिवे) मङ्गलकारी (स्ताम्) हों। (तत्) इसे (अयम् राजा वरुणः) इस वरुण राजा ने भी (तथा) उस प्रकार (आह) कहा है, (सः) उस (अयम्) इस वरुण राजा ने (त्वा) तुझे (अह्वत्) बुलाया है, (सः) बह तू (इदम्) इस साम्राज्य में (एहि) आ।
टिप्पणी: [भावी सम्राट् परकीय राष्ट्र में विद्यमान है, परकीय राष्ट्र अति दूर है। वहाँ से आने में उसे कोई कष्ट न हो इसलिए मङ्गल की अभिलाषा प्रकट की है। मन्त्र के उत्तरार्द्ध में वरुण राजा का वर्णन है। वरुण राजा का वर्णन वरुण-सूक्त में हुआ है (अथर्व० ४।१६।१-९)। वरुण राजा परमेश्वर है। इसे "सः" द्वारा दूरस्थ तथा "अयम्" द्वारा समीपस्थ दर्शाता है, "तद् दूरे तद्वन्तिके" (यजु० ४०।५)। इससे यह दर्शाया है कि सर्वव्यापक वरुण-राजा भी भावी सम्राट के आगमन को चाहता है।]
०३।००४।०६
इन्द्रे॑न्द्र मनु॒ष्या॑३ परे॑हि॒ सं ह्यज्ञा॑स्था॒ वरु॑णैः संविदा॒नः।
स त्वा॒यम॑ह्व॒त्स्वे स॒धस्थे॒ स दे॒वान्य॑क्ष॒त्स उ॑ कल्पय॒द्विशः॑॥६ ॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (इन्द्रेन्द्र) हे राजराजेश्वर ! (मनुष्याः=मनुष्यान्) मनुष्यों को (परेहि) समीप से प्राप्त कर, (हि) क्योंकि (वरुणैः) श्रेष्ठ पुरुषों से (संविदानः) मिलाप करता हुआ तू (सम्) यथाविधि (अज्ञास्थाः) जाना गया है। (सः अयम्) सो इस [प्रत्येक मनुष्य] ने (त्वा) तुझको (स्वे सधस्थे) अपने समाज में (अह्वत्) बुलाया है। (सः=सः भवान्) सो आप (देवान्) व्यवहार कुशल पुरुषों का (यक्षत्) सत्कार करें, (सः उ=सः उ भवान्) वही आप (विशः) प्रजाओं को (कल्पयात्) समर्थ करें ॥६॥
भावार्थः प्रजापालक राजा विद्वान् चतुर मनुष्यों से मिलता रहे और सुपात्रों को योग्यतानुसार पदाधिकारी करे ॥६॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (इन्द्रेन्द्र१) हे सम्राटों के भी सम्राट् ! (मनुष्याः) मनुष्य ! (परेहि) परेस्थित सिंहासन की ओर आ, (वरुणै:) वरण करनेवाले माण्डलिक बरुण-राजाओं के साथ (संविदान:) ऐकभत्य को प्राप्त तू, (सम्, हि, अशास्थाः) निश्चय से सम्यक् ज्ञानी हुआ है। (सः) उस वरुण-परमेश्वर ने (त्वा अह्वत्) तेरा आह्वान किया है। (स्वे सधस्थे) अपने साथ बैठने के निज सिंहासन पर, (सः) वह वरुण-परमेश्वर (देवान्) साम्राज्य के दिव्य अधिकारियों के (यक्षत्) साम्राज्य-यज्ञ को सफल करे, (सः उ) वह ही (विशः) प्रजाओं को (कल्पयात्) सामर्थ्यसम्पन्न करे।
टिप्पणी: [मनुष्याः में "दूराद्धूते च" (अष्टा० ८।२।८४) के अनुसार प्लुत होकर "विसर्गान्त आकार" हुआ है। सायणाचार्य ने "मनुष्यान्" अर्थ किया है और कहा है कि "शसो नत्वाभावः छान्दसः"। मन्त्र के उत्तरार्ध में यह दर्शाता है कि हे भावी सम्राट् ! सिंहासन पर तो बरुण-परमेश्वर स्थित है, उसने तेरा आह्वान किया है सिंहासन के अर्धासन पर, निज के साथ बैठने के लिए। तू जान कि शासन करते हुए साथ वरुण-परमेश्वर भी बैठा है तेरी शासन-व्यवस्था के निरीक्षण के लिए। अतः तू न्यायपूर्वक और धर्मपूर्वक शासन करना, तब तेरे राज्याधिकारी, तथा प्रजाएं सामर्थ्यसम्पन्न होगा। कल्पयात् =कृपू सामर्थ्ये (भ्वादिः)।]
[१. सम्राटों के भी सम्राट्। भिन्न-भिन्न जातियों के अपने-अपने सम्राट होते हैं। परन्तु भुमण्डल व्यापी संगठन में सम्राटो का भी एक सम्राट् होना आवश्यक है। इसे एकराट् (सूक्त ४।१) तथा जनराट् (अथर्थ ० २०।२१।९) कहते हैं।]
०३।००४।०७
प॒थ्या॑ रे॒वती॑र्बहु॒धा विरू॑पाः॒ सर्वाः॑ सं॒गत्य॒ वरी॑यस्ते अक्रन् । तास्त्वा॒ सर्वाः॑ संविदा॒ना ह्व॑यन्तु दश॒मीमु॒ग्रः सु॒मना॑ वशे॒ह ॥७॥
✍क्षेमकरण दास त्रिवेदी 👉
भाषार्थः (पथ्याः) मार्ग पर चलनेवाली, (रेवतीः=०−त्यः) धनवाली, (बहुधा) प्रायः (विरूपाः) विविध आकार वा स्वभाववाली (सर्वाः) सब [प्रजाओं] ने (संगत्य) मिलकर (ते) तेरेलिये (वरीयः) अधिक विस्तीर्ण वा श्रेष्ठ [पद] (अक्रन्) किया है। (ताः सर्वाः) वे सब [प्रजायें] (संविदानाः) एकमत होकर (त्वा) तुझको (ह्वयन्तु) पुकारें। (उग्रः) तेजस्वी और (सुमनाः) प्रसन्न चित्त तू (इह) इस [राज्य] में (दशमीम्) दसवी [नव्वे वर्ष से ऊपर] अवस्था को (दश) वश में कर ॥७॥
भावार्थः सब प्रजागण मिलकर और सुमार्ग में चलकर राजा को सिंहासन पर बिठलावें और अपना रक्षक बनावें। और वह राजा भी इस प्रकार से न्याय और आनन्द करता हुआ नीरोग पूर्ण आयु भोगे ॥७॥
✍विश्वनाथ विद्यालंकार👉
भाषार्थः (पथ्याः) सत्पथगामिनी, (रेवती:) धनसम्पन्ना, (बहुधा विरूपाः) बहुत प्रकार से विविध रूपोंवाली (सर्वाः) सब प्रजाओं ने (ते) तेरा (वरीयः) वरण अर्थात् चुनाव (अक्रन्) किया है, (ता: सर्वाः संविदानाः) वे सब एकमत हुई (त्वा) तेरा (ह्वयन्तु) आह्वान करें, (उग्र:) उग्र हुआ तु (दशमीम्) दसवीं अवस्था को, (सुमनाः) सुप्रसन्न मनवाला, (इह) इस सिंहासन पर रहकर (वश) सबको वश में कर।
टिप्पणी: [गौरवर्णी, कृष्णवर्णी तथा अन्यवर्णी सब प्रजाओं ने मिलकर, जिसका सम्राटरूप में चुनाव किया है, उसे आयुभर सम्राट रूप में रहने देना चाहिए। दशमी अवस्था है ९० वर्षों से ऊपर की अवस्था ।]

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