🌿 जन्म और मृत्यु: ईश्वरीय सृष्टि के अटल नियम
संसार में जो जन्म लेता है, उसका मृत्यु को प्राप्त होना निश्चित है, और जो मृत्यु को प्राप्त होता है, उसका पुनर्जन्म भी प्रकृति के नियमों के अनुसार होता है। यह व्यवस्था किसी मनुष्य, राजा, ऋषि या देवता द्वारा नहीं, बल्कि स्वयं ईश्वर द्वारा स्थापित सृष्टि का शाश्वत विधान है।
श्रीमद्भगवद्गीता का प्रमाण
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि॥— गीता 2.27
भावार्थ: जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जो मर गया है उसका पुनर्जन्म भी निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य सत्य पर शोक करना उचित नहीं।
यह श्लोक स्पष्ट करता है कि जन्म और मृत्यु जीवन के दो अवश्यंभावी पड़ाव हैं।
कठोपनिषद् का प्रमाण
न जायते म्रियते वा विपश्चित्
नायं कुतश्चिन्न बभूव कश्चित्।— कठोपनिषद् 1.2.18
भावार्थ: आत्मा न जन्म लेती है और न मरती है। वह अजन्मा, नित्य और शाश्वत है।
यहाँ उपनिषद् बताता है कि जन्म और मृत्यु शरीर के हैं, आत्मा के नहीं। शरीर बदलते हैं, आत्मा अपनी यात्रा जारी रखती है।
ऋग्वेद का संकेत
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्।
जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा निश्चित नियमों से संचालित होते हैं, उसी प्रकार जन्म और मृत्यु का चक्र भी ईश्वर के विधान के अनुसार चलता है।
यजुर्वेद का संदेश
वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्तं शरीरम्।
— यजुर्वेद 40.15
भावार्थ: यह शरीर अंततः भस्म हो जाता है, परन्तु आत्मा अमर रहती है।
अतः मृत्यु अंत नहीं, बल्कि एक परिवर्तन है—पुराने वस्त्र छोड़कर नए धारण करने के समान।
गीता में पुनः स्पष्ट घोषणा
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही॥— गीता 2.22
भावार्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्र त्यागकर नए धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को छोड़कर नया शरीर धारण करती है।
जीवन के लिए शिक्षा
यदि जन्म निश्चित है तो मृत्यु भी निश्चित है। यदि मृत्यु निश्चित है तो उससे भय क्यों? बुद्धिमान व्यक्ति मृत्यु से नहीं डरता, बल्कि जीवन को सार्थक बनाने का प्रयास करता है।
वेद और उपनिषद् हमें सिखाते हैं कि—
- जन्म पर अहंकार न करें,
- मृत्यु से भयभीत न हों,
- और जीवन को धर्म, ज्ञान तथा सत्कर्मों से महान बनाएं।
निष्कर्ष
जन्म और मृत्यु ईश्वर की सृष्टि के अटल नियम हैं। इन्हें कोई बदल नहीं सकता। जो इस सत्य को समझ लेता है, वह शोक, भय और मोह से ऊपर उठकर जीवन को एक दिव्य यात्रा के रूप में देखता है।
"मृत्यु जीवन का अंत नहीं, बल्कि आत्मा की अनन्त यात्रा का एक पड़ाव मात्र है।"
🌿 जन्म और मृत्यु शरीर के हैं, आत्मा तो नित्य, शाश्वत और अविनाशी है। 🙏
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आज संसार में लगभग ७ अरब व उससे भी अधिक मनुष्य हैं। प्रत्येक क्षण सैकड़ों लोग संसार में मृत्यु को प्राप्त हो रहे हैं और जितने मरते हैं उससे कहीं अधिक जन्म भी लेते हैं।
जन्म का परिणाम मृत्यु होता है और मृत्यु का परिणाम जन्म होना निश्चित है। जन्म होने पर जड़ व भौतिक पदार्थों से बना शरीर प्राप्त होता है परन्तु इसमें एक चेतन तत्व जीवात्मा विद्यमान है जो कि अभौतिक व अविनाशी पदार्थ है। वृद्धावस्था एवं अन्य कुछ अवस्थाओं में इससे पूर्व भी मृत्यु होने पर यह जीवात्मा शरीर से निकल कर आकाश व वायु में चला जाता है व उसमें रहता है। कोई भी मनुष्य अनेकानेक विपरीत परिस्थितियों में मरना नहीं चाहता।
मृत्यु के समय संसार की एक अदृश्य सत्ता व शक्ति उसे बलपूर्वक शरीर से निकालती है। उसे तो ईसाई हो या इस्लाम, हिन्दू हों या यहूदी, पारसी, बौद्ध, जैन व सिख आदि सभी को स्वीकार करना ही पड़ता है। शरीर से आत्मा को पृथक कर संसार में मनुष्य व अन्य योनियों में जो नये बच्चे जन्म लेते हैं, उनमें उन आत्माओं को जन्म देने वाली शक्ति का नाम ही ईश्वर है। ईश्वर व जीवात्मा के अन्य भाषाओं में पृथक-पृथक नाम हैं व हो सकते हैं। इसमें किसी को कोई आपत्ति नहीं हो सकती।
ईश्वर और उसकी सृष्टि का बहुत अनोखा नियम है कि किसी भी मनुष्य को यह पता नहीं होता कि उसका कितना जीवन शेष है अर्थात् उसकी मृत्यु कब होनी है। इसकी मीमांसा करने पर विद्वान इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यदि किसी मनुष्य को अपनी मृत्यु की तिथि व समय ज्ञात होता तो उसका जीवन दूभर हो जाता। वह मृत्यु की चिन्ता में ही डूबा रहता और संसार में वह मृत्यु को भुलाकर या उसे भूल कर जो शुभ-अशुभ व पुण्य-पाप कर्म करता है, वह न कर पाता। हमने देखा है कि जब भी किसी मनुष्य पर कोई रोग या मुसीबत आती है तो वह उसके भावी परिणामों की चिन्ता करने लगता है जिसमें मृत्यु का दुःख व पीड़ा भी होती है।
जब वह मृत्यु को भुला रहता है तो किंचित सुखी रहता है और जब उसे वहयाद आ जाती है तो उसका चित्त खिन्नता व क्षोभ से भर जाता है। यह भी आश्चर्य है कि हम सब मनुष्यों की एक न एक दिन मृत्यु अवश्य होनी है फिर भी सभी मनुष्य मृत्यु को जानने व उससे बचने तथा मृत्यु के दुःख पर विजय पाने का प्रयास नहीं करते।
मृत्यु का कारण शरीर की नश्वरता है। सृष्टि का यह नियम है कि जिस पदार्थ की उत्पत्ति होती है उसका विनाश भी अवश्य ही होता है। संसार में हम जिस भी चीज को बनाते हैं, बनने व तैयार होने के साथ उल्टी गिनती आरम्भ हो जाती है। सरकारी नियमों के अनुसार तो भोजन व दवाओं पर ‘एक्सपायरी डेट’ व ‘बैस्ट यूज बिफोर’ भी अंकित करने का प्रचलन है। यह इसी नियम के अनुसार है कि बनने वाली प्रत्येक वस्तु समय के साथ पुरानी होकर नाश व विकार को प्राप्त होती है। ऐसा ही मनुष्य शरीर है जो कि भौतिक पदार्थों से बना है, विनाशी है और इसमें ईश्वरीय व ईश्वर के बनाये प्राकृतिक नियमों के अनुसार उत्पत्ति, वृद्धि, स्थिरता व ह्रास की अवस्थायें आकर इसका एक दिन विनाश होना अवश्यम्भावी है।
संसार के सभी महापुरुष, अवतार नामधारी पुरुष, ईश्वर के पुत्र व सन्देश वाहक किंवा ऋषि, मुनि, सज्जन व दुर्जन कोई इस नियम से बचे नहीं हैं। मृत्यु की निश्चितता और उसके बाद जन्म होने के कारण ही साक्षात्कर्मा ऋषियों ने वेदों के आधार पर यह विधान किया है कि मनुष्य को शुभ कर्म करने चाहिये, अशुभ कर्म कदापि किसी को करना उचित नहीं। अशुभ कर्मों का फल इस जन्म में भी दुःख होता है और परजन्म में योनि परिर्वतन होकर इस जन्म में भोगे सुखों की तुलना से भी कहीं अधिक दुःखदायी होता है। इस सत्य सिद्धान्त को अज्ञान व अविद्या के कारण न मानने वाले मनुष्य भी इन नियमों से बच नहीं पाते और अन्धे मनुष्य के कुवें में गिरने के समान दुःख के सागर में डूबते व दुःखी होते हैं।
आग में हाथ डालने पर हाथ जलेगा, पीड़़ा होगी, अतः कोई भी अपना हाथ जानबूझकर आग में नहीं डालता परन्तु पाप कर्मों का परिणाम आग की तरह मनुष्य को जलायेगा, इस ज्ञान व विद्या के अभाव में मनुष्य स्वार्थ, राग, द्वेष व मोह आदि दुर्गुणों में फंस कर दुःखदायी कामों को करके इच्छापूर्ति होने पर खुश होते हैं। समाज में जो मनुष्य अभावग्रस्त होते हैं वह भी पदार्थों की उपलब्धता से कम परन्तु अपने अज्ञान व अविद्या के कारण अधिक दुःखी होते हैं। अतः आवश्यकता है कि स्कूली लाभकारी शिक्षा व विज्ञान की भांति संसार में कर्म-फल सिद्धान्तों पर सभी मतों के विद्वानों को एक मत व एक राय वाला होना चाहिये और इसका पाठ संसार के सभी स्कूल व कालेजों में एक समान रूप से पढ़ाया जाना चाहिये जिससे संसार में पाप कर्म कम होकर सुखों में वृद्धि हो। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन के सभी सुखों का त्याग कर सत्य वैदिक नियमों वा धर्म का प्रचार व प्रसार किया था। लोगों ने उनके प्रचार पर कान नहीं धरे और मताचार्यों ने अपने स्वार्थों को आगे रखा, जिसका परिणाम आज की स्थिति है। यह स्थिति शीघ्रातिशीघ्र बदलनी चाहिये अन्यथा इससे हानि समस्त मानवजाति की ही होनी है।
जब अपने परिवार व अन्य किसी प्रिय व्यक्ति की मृत्यु होती तो मनुष्य के मन में वैराग्य भाव उत्पन्न होते हैं। इसका कारण यह प्रतीत होता है कि कभी पूर्वजन्मों में हम भी इसी प्रकार से मृत्यु को प्राप्त हुए हैं व हमारे पूर्व पूर्वजन्मों में अनेक प्रिय सम्बन्धी भी इसी प्रकार मृत्यु को प्राप्त होते रहे जिनके संस्कार हमारे चित्त पर अंकित हैं। इन्हीं संस्कारों के प्रभाव से वैराग्य की भावना हमें मृत्यु के भय से बचने के लिए सावधान करती है।
ऋषि दयानन्द ने भी कुमारावस्था में जब अपनी बहिन व चाचा की मृत्यु देखी व इससे लगभग दो हजार वर्ष पूर्व महात्मा बुद्ध जी ने वृद्ध, रोगी और मृतक की घटनायें देखीं, तो वह भी भय व वैराग्य को प्राप्त हुए थे। इन घटनाओं से इन महापुरुषों ने शिक्षा लेकर अपने जीवन की दिशा व दशा बदल दी थी।
हम व अन्य सांसारिक लोगों के चित्त पर अविद्या के संस्कार इतने प्रगाढ़ हैं कि हम ऐसे विषयों पर विचार ही नहीं करते। इसके पीछे यह भी कारण है कि संसार के सभी लोग किसी न किसी मत के अनुयायी होते हैं। वहां उनके जो मताचार्य हैं, वह ईश्वर, जीवात्मा, जन्म-मृत्यु व पाप-पुण्य को लेकर मिथ्या मान्यताओं व अविद्या से गहराई से ग्रसित हैं। उनके स्वार्थ भी सत्य को स्वीकार करने में बाधक हैं। एक बात यह भी है कि संसार में परा व अपरा दो विद्यायें हैं।
हमारे सभी मनुष्य व वैज्ञानिक अपरा विद्या के अधिकारी विद्वान हैं परन्तु वह परा विद्या के ज्ञान से सर्वथा शून्य हैं। जिस प्रकार एक इंजीनियर किसी गम्भीर रूग्ण व्यक्ति की चिकित्सा नहीं कर सकता और एक डाक्टर एक इंजीनियर के काम नहीं कर सकता, इसी प्रकार एक अपरा विद्या का विद्वान परा विद्या अर्थात् आत्मा व परमात्मा के ज्ञान के बारे में नहीं जान सकता व बता सकता।
इसके लिए उसे परा विद्या की योग्य गुरुओं से शिक्षा लेनी होगी, अध्ययन करने के साथ चिन्तन व मनन भी करना होगा तभी वह आध्यात्मिक विषयों को समझ व जान सकता है। जन्म व मृत्यु का विषय भी कुछ परा व कुछ अपरा विद्या दोनों से युक्त है। शरीर भौतिक पदार्थों से ईश्वर के विधान के अनुसार उत्पन्न होता है परन्तु जीवात्मा अभौतिक होने के कारण उत्पन्न नहीं होती अपितु यह मनुष्य व अन्य प्राणियों के शरीरों से निकल कर ही दूसरे शरीरों में आती व जाती है। परा विद्या का अध्येता इस तथ्य व रहस्य को भली भांति जानता है परन्तु भौतिकविद् और मत-मतान्तरों के पूर्वाग्रहों से ग्रसित विद्वान अपनी अविद्या व स्वार्थों को छोड़े बिना इसे नहीं जान सकते।
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